राष्ट्रकूट राजवंश
मुख्य लेख : दक्षिण भारत का इतिहास
राष्ट्रकूट राजवंश ने लगभग दो सौ वर्षों से अधिक समय तक भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े भू-भाग पर शासन किया। यद्यपि इस राजवंश की कई छोटी-छोटी शाखाएँ छठी और सातवीं शताब्दी में उत्तर, मध्य भारत तथा दक्कन के विभिन्न क्षेत्रों पर शासन कर रही थीं, किंतु बरार के अचलपुर (महाराष्ट्र के आधुनिक एलिचपुर) के राष्ट्रकूटों की शाखा सबसे प्रमुख और महत्त्वपूर्ण थी।
प्राचीन भारत के अन्य अनेक राजवंशों की भाँति बरार के राष्ट्रकूट भी आरंभ में बादामी के चालुक्यों के सामंत थे। किंतु आठवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में इस शाखा के दंतिदुर्ग ने आधुनिक कर्नाटक के गुलबर्गा क्षेत्र में एक स्वतंत्र साम्राज्य की स्थापना की। कालांतर में अचलपुर के राष्ट्रकूट ‘मान्यखेट के राष्ट्रकूट’ नाम से प्रसिद्ध हुए।
राष्ट्रकूट राजवंश के प्रतिभाशाली नरेशों ने न केवल सुदूर दक्षिण में रामेश्वरम् तक अपनी विजय-पताका फहराई, बल्कि उत्तर भारत की राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। जिस समय दक्षिण में मान्यखेट के राष्ट्रकूटों का उत्थान हुआ, उसी समय बंगाल के पाल और मालवा के प्रतिहार क्रमशः पूर्वी तथा उत्तर-पश्चिमी भारत में अपनी-अपनी शक्ति का विस्तार कर रहे थे। फलतः गंगा के समृद्ध मैदान में स्थित कन्नौज पर अधिकार के लिए संघर्षरत प्रतिहारों और पालों को राष्ट्रकूटों की विजयवाहिनी से पराजित होना पड़ा। आर.सी. मजूमदार ने लिखा है कि विंध्य के दक्षिण की किसी अन्य शक्ति ने उत्तरी भारत के इतिहास में अठारहवीं शताब्दी ईस्वी के मराठा पेशवाओं के समय तक इतनी प्रभावकारी भूमिका नहीं निभाई।
राष्ट्रकूट राजवंश के शासकों का शासनकाल राजनीतिक विस्तार की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि कलात्मक उपलब्धियों और साहित्यिक विकास की दृष्टि से भी दक्षिण भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। राष्ट्रकूट शासकों की कलात्मक उपलब्धियों के प्रमाण उनके द्वारा एलोरा, एलिफेंटा (आधुनिक महाराष्ट्र) और पट्टडकल (कर्नाटक) में बनवाए गए भव्य देवालय एवं गुहामंदिर हैं, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल हैं। वास्तुकला के क्षेत्र में कृष्ण प्रथम द्वारा बनवाया गया एलोरा का कैलाशनाथ मंदिर द्रविड़ शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया है।
इस राजवंश के शासकों ने संस्कृत के साथ-साथ कन्नड़ भाषा के विकास को भी प्रोत्साहन दिया, जिसके परिणामस्वरूप जैन गणितज्ञों और विद्वानों ने कन्नड़ तथा संस्कृत भाषाओं में कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। कन्नड़ साहित्य के त्रिरत्न पंप, पोन्न और रन्न थे, जिनमें से प्रथम दो विद्वानों के संरक्षक कृष्ण तृतीय थे। इस राजवंश के प्रसिद्ध शासक अमोघवर्ष प्रथम ने स्वयं ‘कविराजमार्ग’ की रचना की, जो कन्नड़ भाषा का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।
यद्यपि इस राजवंश के आरंभिक नरेश शिव और विष्णु के उपासक थे, किंतु बाद के अमोघवर्ष जैसे राजाओं ने जैन धर्म को भी प्रश्रय प्रदान किया। राष्ट्रकूट शासक अन्य संप्रदायों के प्रति भी पूर्णतः उदार थे। इस राजवंश के राजाओं ने अपने राज्य में मुसलमान व्यापारियों को बसने तथा इस्लाम के प्रचार की स्वीकृति दी। इस सहिष्णुता की नीति से विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन मिला, जिससे राष्ट्रकूट साम्राज्य में समृद्धि आई। अरब व्यापारी सुलेमान के अनुसार राष्ट्रकूट अमोघवर्ष (बल्हर) का साम्राज्य तत्कालीन विश्व के चार प्रमुख साम्राज्यों में से एक था। विश्व के तीन अन्य प्रमुख साम्राज्य बगदाद के खलीफा, चीन के शासक और रोम के शासक के थे।
ऐतिहासिक स्रोत
राष्ट्रकूट राजवंश के इतिहास-निर्माण में अभिलेखों, संस्कृत एवं कन्नड़ भाषा के समकालीन ग्रंथों और अरब यात्रियों के विवरणों से सहायता मिलती है। राष्ट्रकूट शासकों द्वारा खुदवाए गए अनेक अभिलेख और दानपत्र भारत के विभिन्न भागों से पाए गए हैं। राष्ट्रकूटों के लेखों तथा दानपत्रों में दंतिदुर्ग के एलोरा तथा समनदगढ़ के ताम्रपत्राभिलेख, गोविंद तृतीय के राधनपुर, वानी डिंडोरी तथा बड़ौदा के लेख, अमोघवर्ष प्रथम का संजन अभिलेख, इंद्र तृतीय का कमलपुर अभिलेख, गोविंद चतुर्थ के काम्बे तथा सांगली के लेख और कृष्ण तृतीय के करहद तथा देवली लेख ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष उपयोगी हैं। अधिकांश लेख तिथियुक्त हैं। इन लेखों से राष्ट्रकूट राजाओं की वंशावली, उनके सैनिक अभियान, धार्मिक अभिरुचि, शासन-व्यवस्था आदि की जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त, समकालीन राजवंशों, जैसे—प्रतिहारों, पालों, चालुक्यों, चोलों और चेदियों के लेखों से भी राष्ट्रकूटकालीन इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।
राष्ट्रकूटों के शासनकाल में पालि, कन्नड़ और संस्कृत भाषाओं में अनेक ग्रंथों की रचना हुई थी। तत्कालीन प्रमुख ग्रंथों में जिनसेन का ‘आदिपुराण’, महावीराचार्य का ‘गणितसारसंग्रह’ और अमोघवर्ष का ‘कविराजमार्ग’ ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष उपयोगी हैं। इन रचनाओं से तत्कालीन समाज और संस्कृति के संबंध में अनेक महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलती हैं।
इसके अलावा, भारत आने वाले अरब यात्रियों, जैसे—सुलेमान (851 ई.), अल-मसूदी (944 ई.) और इब्न खुर्दादबह (912 ई.) के विवरणों से भी तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है। मुस्लिम इतिहासकारों ने राष्ट्रकूटों की ‘वल्लभ’ उपाधि के स्थान पर ‘बल्हर’ शब्द का प्रयोग किया है। अरब यात्रियों ने राष्ट्रकूट साम्राज्य की गणना दुनिया के तत्कालीन चार महान् साम्राज्यों में की है।
राष्ट्रकूटों की उत्पत्ति
प्राचीन भारत के अन्य राजवंशों की भाँति दक्षिण भारत के इस ख्यातिनाम राजवंश की उत्पत्ति तथा मूल निवास-स्थान के संबंध में विवाद है। कुछ राष्ट्रकूट लेखों में इस राजवंश को ‘रट्ट’ कहा गया है। अमोघवर्ष के सिरूर लेख में इस वंश को ‘रट्टकुल से उत्पन्न’ बताया गया है। इंद्र तृतीय के नौसारी लेख के अनुसार अमोघवर्ष ने रट्टकुल-लक्ष्मी का उद्धार किया था।
कृष्ण तृतीय के करहद तथा देवली लेखों में राष्ट्रकूटों को तुंग का वंशज बताया गया है और यह कहा गया है कि राष्ट्रकूट आदिपुरुष ‘रट्ट’ का पुत्र था। वर्धा ताम्रपत्रों में राष्ट्रकूटों का संबंध राजकुमारी रट्टा से जोड़ा गया है। राष्ट्रकूट इसी का पुत्र था।
कुछ राष्ट्रकूट लेखों में इन्हें ‘यदुवंशी’ कहा गया है। संजन अनुदानपत्र में राष्ट्रकूटों को साक्षात् कृष्णकुल (यादवान्वय) ही मान लिया गया है। वानी डिंडोरी ताम्र अनुदानपत्र से ज्ञात होता है कि जिस प्रकार मुरारी के जन्म से यदुवंशी अपराजेय हो गए थे, उसी प्रकार गोविंद तृतीय के जन्म से राष्ट्रकूट अपराजेय हो गए।
आर.जी. भंडारकर जैसे इतिहासकारों का सुझाव है कि राष्ट्रकूट वंश संभवतः तुंग परिवार से संबंधित था, क्योंकि कृष्ण तृतीय के करहद तथा देवली लेखों में स्पष्ट कहा गया है कि इस कुल की उत्पत्ति तुंग से हुई थी। लेख में आदिपुरुष तुंग के पुत्र का नाम ‘रट्ट’ था। रट्ट के आधार पर ही इस वंश को राष्ट्रकूट कहा गया है।
अल्तेकर के अनुसार तुंग एवं रट्ट दोनों ही अनैतिहासिक हैं और इनके विषय में कोई जानकारी नहीं है। पुनः यदि राष्ट्रकूटों को उनसे उत्पन्न मान भी लें, तो भी उनकी उत्पत्ति और मूल-स्थान की समस्या का कोई समाधान नहीं होता।
जे.एफ. फ्लीट का विचार है कि राष्ट्रकूटों का संबंध राजपूताना-कन्नौज के राठौरों अथवा राठौड़ों से है, क्योंकि ये शब्द राष्ट्रकूट शब्द से निष्पन्न हुए हैं। विश्वनाथ रेउ ने राष्ट्रकूटों को कन्नौज के गहड़वालों से संबंधित किया है, क्योंकि सोलंकी शासक त्रिलोचनपाल के शक संवत् 972 के एक अभिलेख में कहा गया है कि सोलंकियों के आदिपुरुष का विवाह कन्नौज के राष्ट्रकूट शासक की पुत्री के साथ हुआ था।
दक्षिणापथ के राष्ट्रकूटों को कन्नौज के गहड़वालों अथवा राजपूताना के राठौरों से संबंधित करने का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है। राठौरों तथा गहड़वालों का राजनीतिक उत्कर्ष राष्ट्रकूटों के पतन के बाद हुआ। गहड़वाल सूर्यवंशी क्षत्रिय थे और उनका गोत्र कश्यप था, जबकि राष्ट्रकूटों को चंद्रवंशी कहा गया है और उनका गोत्र गौतम था। इसके अलावा, गहड़वालों तथा राठौरों के अभिलेखों में उन्हें राष्ट्रकूट नहीं कहा गया है और न ही राष्ट्रकूट अभिलेखों में राष्ट्रकूटों के लिए गहड़वाल अथवा राठौर शब्द का प्रयोग मिलता है।
इस संबंध में डॉ. अल्तेकर का अनुमान है कि राठौर राष्ट्रकूटों के वंशज रहे होंगे। संभवतः ध्रुव प्रथम, गोविंद तृतीय, इंद्र तृतीय तथा कृष्ण तृतीय के उत्तर भारतीय अभियानों के समय कुछ राष्ट्रकूट परिवार उत्तर में बस गए थे, जो कालांतर में राठौर नाम से प्रसिद्ध हुए। किंतु यह मत भी अंतिम रूप से स्वीकार्य नहीं है। यदि राठौर राष्ट्रकूटों के वंशज होते, तो वे अपने संबंध अपने पूर्वजों से अवश्य प्रदर्शित करते।
डॉ. बर्नेल ने माल्खेद के राष्ट्रकूटों की द्रविड़ उत्पत्ति को स्वीकार किया है और उनका संबंध आंध्र प्रदेश के रेड्डियों से बताया है। इनके अनुसार ‘राष्ट्र’ शब्द ‘रट्ट’ से बना है, जो तेलुगु अथवा कन्नड़ भाषा के ‘रेड्डी’ का समानार्थी है। इस प्रकार बर्नेल राष्ट्रकूटों को आंध्र के रेड्डियों से संबंधित करने का प्रयास करते हैं।
किंतु यह मत भी तर्कसंगत नहीं है। ‘राष्ट्रकूट’ शब्द ‘रेड्डी’ का तेलुगु रूपांतर नहीं है। रेड्डियों की मूल भाषा तेलुगु है और उनका मूलस्थान आंध्र प्रदेश है। यह क्षेत्र अधिकांशतः राष्ट्रकूट साम्राज्य से बाहर रहा। राष्ट्रकूटों की मातृभाषा कन्नड़ थी और इनके प्राचीनतम साक्ष्य मध्य भारत तथा बंबई प्रेसीडेंसी के उत्तरी क्षेत्रों से मिले हैं, जबकि इन भागों से रेड्डी जाति के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं मिला है। इसके अलावा, प्राचीन भारत में रेड्डियों का उल्लेख कृषक एवं व्यापारी के रूप में मिलता है और उनके सैनिक अभियानों का कोई संकेत नहीं है। इस प्रकार राष्ट्रकूटों को रेड्डियों का पूर्वज नहीं माना जा सकता है।
चिंतामणि विनायक वैद्य तथा एस.सी. नंदिमठ ने अशोक के अभिलेखों में वर्णित रठिकों का समीकरण राष्ट्रकूटों से किया है। इनके अनुसार माल्खेद के राष्ट्रकूट मराठी-भाषी परिवार के थे और आधुनिक मराठों के पूर्वज थे। किंतु अल्तेकर के अनुसार राष्ट्रकूटों की मातृभाषा कन्नड़ थी, न कि मराठी। इसलिए इन्हें महाराष्ट्र के स्थान पर किसी कन्नड़ क्षेत्र से ही संबद्ध किया जाना चाहिए।
ए.एस. अल्तेकर, नीलकंठ शास्त्री, एच.सी. रे और ए.के. मजूमदार जैसे अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि ‘राष्ट्रकूट’ शब्द किसी जाति अथवा कबीले का बोधक न होकर पद का बोधक है। अल्तेकर के अनुसार ‘रट्ट’ अथवा ‘राष्ट्रकूट’ प्राचीन रथिकों या रठियों की संतान हैं, जो अशोक के समय से सामंतों के रूप में छोटे-छोटे प्रदेशों पर शासन कर रहे थे। अशोक के लेखों में रथिकों या रठिकों को पश्चिम का निवासी बताया गया है, जिससे पता चलता है कि ये लोग महाराष्ट्र तथा बरार के प्रदेशों में भी रहते थे। रानी नायनिका के नानाघाट लेख में महारठी त्रनकयिर का उल्लेख मिलता है। इस समय रथिक नाम से अनेक सामंतों के शासन करने की सूचना मिलती है। खारवेल ने अपने पश्चिमी अभियान में रथिकों और भोजकों को पराजित किया था। अल्तेकर के अनुसार रथिकों तथा महारठियों के महाराष्ट्र के साथ-साथ कर्नाटक में भी शासन करने के प्रमाण मिलते हैं। कुछ महारठी परिवार कन्नड़ परिवारों से घनिष्ठ रूप से संबंधित थे।
अल्तेकर के अनुसार रथि, महारथी, रथिक, राष्ट्रीय, राष्ट्रपति और राष्ट्रकूट शब्द किसी जाति या कबीले के बोधक नहीं, प्रत्युत् राजनीतिक एवं प्रशासनिक महत्त्व के हैं। प्राचीन काल में राज्य का विभाजन राष्ट्र में होता था। ग्राम का अधिकारी ग्रामकूट तथा राष्ट्र का अधिकारी राष्ट्रकूट कहा जाता था। सातवीं तथा आठवीं शताब्दी के दक्कन के लेखों में दान देते समय राष्ट्रपतियों तथा राष्ट्रकूटों को यह निर्देश दिया गया है कि वे दानग्रहीताओं के भोग में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न करें। इस प्रकार अल्तेकर राष्ट्रकूटों को महारठियों या रठियों की ही संतान मानते हुए इन्हें कर्नाटक का मूल निवासी मानते हैं।
नीलकंठ शास्त्री भी मानते हैं कि राष्ट्रकूट का अर्थ राष्ट्र, भाग अथवा राज्य का स्वामी है और राष्ट्रकूट वंश के शासक इसी अधिकारी वर्ग से संबंधित थे। किंतु शास्त्री अल्तेकर का यह सुझाव नहीं मानते हैं कि राष्ट्रकूट अशोक के लेखों में उल्लिखित रठिकों के वंशज थे। शास्त्री के अनुसार रठिक एक कबीला था और इसे राष्ट्रकूटों से संबंधित नहीं किया जा सकता।
इस प्रकार राष्ट्रकूट शब्द किसी जाति या कबीले का नहीं, प्रत्युत् पद का बोधक है। किंतु इससे राष्ट्रकूटों की जाति अथवा उनके कुल के निर्धारण में कोई सहायता नहीं मिलती। इससे मात्र यही अनुमान किया जा सकता है कि राष्ट्रकूटों का संबंध किसी अभिजात कुल से रहा होगा, क्योंकि इन पदों पर प्रायः इन्हीं की नियुक्ति की जाती थी।
प्राचीन भारत में वैश्यों, क्षत्रियों और ब्राह्मणों की गणना द्विजों में की गई है, इसलिए राष्ट्रकूट इन्हीं में से किसी वर्ण से संबंधित रहे होंगे। राष्ट्रकूट ब्राह्मण या वैश्य नहीं थे, क्योंकि इस प्रकार की संभावना का किसी भी साक्ष्य से कोई संकेत या समर्थन नहीं मिलता है।
लेखों में राष्ट्रकूटों को ‘यादवान्वय’ अथवा ‘चंद्रवंशीय क्षत्रिय’ कहा गया है। राष्ट्रकूटों के क्षत्रिय होने की संभावना का समर्थन अन्य उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों से भी होता है। शक संवत् 836 के एक अभिलेख में कहा गया है कि दंतिदुर्ग का जन्म यदुवंश की सात्यकि शाखा में हुआ था—
तत्रान्वये विततसात्यकिवंशजन्मा।
श्रीदन्तिदुर्गनृपतिः पुरुषोत्तमो भूत्।।
इसी प्रकार गोविंद तृतीय के 808 ई. के वानी डिंडोरी अभिलेख में कहा गया है कि जिस प्रकार मुरारि (कृष्ण) के जन्म से यदुवंशीय अपराजेय हो गए, उसी प्रकार गोविंद तृतीय के जन्म से राष्ट्रकूट अपराजेय हो गए—
यस्मिन् सर्वगुणाश्रये क्षितिपतौ श्रीराष्ट्रकूटान्वयो,
जाते यादववंशवन्मधुरिपावासीदलङ्घ्यः परैः।।
871 ई. के संजन दानपत्र में राष्ट्रकूटों को साक्षात् कृष्णकुल (यादवान्वय) का मानते हुए भगवान वीरनारायण का वंशज बताया गया है—
अनन्तभोगस्थितिरत्र पातु वः, प्रतापशीलप्रभवोदयाचलः।
सुराष्ट्रकूटोच्छ्रितवंशपूर्वजः, स वीरनारायण एव यो विभुः।।
तदीयवीर्यायतयादवान्वये,
क्रमेण वार्द्धाविव रत्नसंचयः।
बभूव गोविन्द महीपतिर् भुवः,
प्रसाधनो पृच्छकराजनन्दनः।।
लेखों से स्पष्ट है कि राष्ट्रकूट वंश यदुवंश से भिन्न था। दिनेशचंद्र सरकार का विचार है कि वानी डिंडोरी लेख में इस वंश की यदुकुल से तुलना केवल इसलिए संभव हुई कि राष्ट्रकूट शासक का नाम गोविंद था, जो वासुदेव कृष्ण का ही दूसरा नाम था। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि वैष्णव नरेश प्रायः अपने-आपको विष्णु के रूप में कृष्ण का अवतार मानते थे।
भगवानलाल इंद्रजी का अनुमान है कि राष्ट्रकूटों को यदुवंश से संबंधित करने का सिद्धांत 930 ई. से शुरू हुआ, जब राष्ट्रकूटों ने सिंह के स्थान पर विष्णु के वाहन गरुड़ को राजचिह्न के रूप में स्वीकार कर लिया। किंतु उल्लेखनीय है कि सिंह मानपुर के राष्ट्रकूटों का राजचिह्न था, न कि मान्यखेट के राष्ट्रकूटों का। राष्ट्रकूटों की प्रारंभिक मुहरों एवं दानपत्रों में गरुड़ का चिह्न मिलता है। कुछ परवर्ती लेखों में आसीन शिव का प्रतीक भी मिलता है, लेकिन सिंह का नहीं। यही नहीं, राष्ट्रकूटों के यदुवंशी होने का प्रमाण 871 ई. के संजन दानपत्रों और 808 ई. के वानी डिंडोरी दानपत्रों से ही मिलने लगता है। इस प्रकार राष्ट्रकूट चाहे यदुवंशी रहे हों या चंद्रवंशी, इतना लगभग निश्चित है कि वे क्षत्रिय थे।
राष्ट्रकूटों के क्षत्रिय होने की पुष्टि इनके वैवाहिक संबंधों से भी होती है। राष्ट्रकूट नरेश दंतिदुर्ग ने अपनी पुत्री रेवा का विवाह नंदिवर्मन् पल्लवमल्ल के साथ किया था। राष्ट्रकूट शासक परबल की पुत्री रट्टादेवी पाल शासक धर्मपाल से ब्याही गई थी। कृष्ण द्वितीय ने अपनी पुत्री का विवाह चोल शासक आदित्य प्रथम के साथ किया था। पल्लव, पाल तथा चोल सभी क्षत्रिय थे, इसलिए राष्ट्रकूट भी क्षत्रिय रहे होंगे।
राष्ट्रकूटों के अपने विवाह भी क्षत्रिय कुलों में ही हुए थे। गोविंद द्वितीय के भाई ध्रुव का विवाह वेंगी के शासक विष्णुवर्धन चतुर्थ की पुत्री शीलभट्टारिका से हुआ था। चेदि शासक कोक्कलदेव प्रथम की पुत्री महादेवी का विवाह कृष्ण द्वितीय के साथ हुआ था। इसके पुत्र जगत्तुंग का विवाह चेदि शंकरगण की पुत्री लक्ष्मी के साथ हुआ था। इंद्र ने अपना विवाह कलचुरि शासक अम्मणदेव (अनंगदेव) की पुत्री बीजाम्बा के साथ किया था। अमोघवर्ष तृतीय की रानी कलचुरि शासक दुबराज प्रथम की पुत्री कुंडक देवी थी। वेंगी, चेदि एवं कलचुरि कुलों को सामान्यतः क्षत्रिय माना जाता है। इस प्रकार राष्ट्रकूटों को क्षत्रिय माना जाना चाहिए।
राष्ट्रकूटों का मूल-स्थान
राष्ट्रकूटों का साम्राज्य मुख्यतः महाराष्ट्र के आसपास के क्षेत्रों में फैला हुआ था। इनके अधिकांश लेख यहीं से मिले हैं और इनकी प्रधान शाखा की राजधानी मान्यखेट (माल्खेद) भी इसी क्षेत्र में स्थित थी। इस आधार पर सी.वी. वैद्य तथा आर.जी. भंडारकर जैसे विद्वानों ने महाराष्ट्र को राष्ट्रकूटों का मूल निवास-स्थान स्वीकार किया। भंडारकर के अनुसार महाराष्ट्र महारठी का पर्याय है। वैद्य ने तो राष्ट्रकूटों को आर्यों का सेनापति बताया है, जिन्होंने महाराष्ट्र को अधिकृत किया था।
महाराष्ट्र को राष्ट्रकूटों का मूल निवास-स्थान नहीं माना जा सकता। आर.जी. भंडारकर का यह मत कि महाराष्ट्र महारठी का पर्याय है, ठीक नहीं है। महारठी नामक किसी जनजाति अथवा प्रजाति का कोई उल्लेख प्राचीन साहित्य में नहीं मिलता। राष्ट्रकूटों की मातृभाषा कन्नड़ थी और राष्ट्रकूट शासकों के संरक्षण में कन्नड़ साहित्य का पूर्ण विकास हुआ। राष्ट्रकूटों की मुख्य शाखा के साथ-साथ इनकी लघुशाखाओं के अभिलेख भी अधिकतर कन्नड़ भाषा में ही हैं। यदि राष्ट्रकूटों का मूलस्थान महाराष्ट्र होता, तो दक्षिणी गुजरात में शासन करने वाले राष्ट्रकूट ऐसी भाषा का प्रयोग कभी न करते, जो न तो दक्षिणी गुजरात में प्रचलित थी और न महाराष्ट्र में, बल्कि कर्नाटक में प्रचलित थी। बुंदेलखंड से प्राप्त कृष्ण तृतीय के जूरा लेख में प्रयुक्त कन्नड़ भाषा राष्ट्रकूटों का संबंध कर्नाटक से सिद्ध करती है। इसलिए राष्ट्रकूटों को महाराष्ट्र का मूल निवासी नहीं माना जा सकता है।
सामान्यतः जिन रठी या महारठी परिवारों से राष्ट्रकूटों के विकास का अनुमान लगाया जाता है, उनका अस्तित्व तृतीय शताब्दी से पहले ही कर्नाटक में प्रमाणित होता है। मैसूर में चित्तलदुर्ग के निकट से ‘सादकनि कललाय महारठि’ विरुदयुक्त सिक्के मिले हैं। धर्ममहाराजाधिराज शिवस्कंदवर्मन् के हीरहडगल्ली दानपत्र में रठिकों का भी उल्लेख मिलता है। अनेक महारठी परिवार कन्नड़ परिवारों से संबंधित थे। कन्हेरी लेख की नागमूलनिका एक महारठी से विवाहित थी, जो स्वयं एक कन्नड़ शासक की पुत्री थी। कर्नाटक में इनके लेख मिलने से उन्हें मात्र महाराष्ट्र तक सीमित नहीं किया जा सकता।
राष्ट्रकूटों के अधिकांश लेखों में ‘लट्टलूरपुरवराधीश’ (सर्वोत्तम नगर लट्टलूर का स्वामी) कहा गया है। अल्तेकर के अनुसार सौंदत्ती के रट्टों के कुछ लेखों में इसके स्थान पर ‘लट्टलूरापुरवराधीश’ पद प्रयुक्त किया गया है। इससे पता चलता है कि राष्ट्रकूट लट्टलूर के मूल निवासी थे। लट्टलूर का समीकरण पहले फ्लीट ने मध्य प्रदेश के बिलासपुर जिले के रतनपुर से किया था। बाद में फ्लीट ने अपने मत को संशोधित करते हुए सुझाव दिया कि लट्टलूर की पहचान हैदराबाद रियासत के लाटूर नामक स्थान से की जानी चाहिए। नंदिमठ का विचार है कि यह स्थान पहले कर्नाटक राज्य में शामिल था। अल्तेकर भी मानते हैं कि लट्टलूर पहले कन्नड़ भाषा-भाषी क्षेत्रों (कर्नाटक राज्य) में सम्मिलित था, क्योंकि राष्ट्रकूटों की भाषा भी कन्नड़ थी और उन्होंने कन्नड़ भाषा को राजाश्रय प्रदान किया।
अल्तेकर के अनुसार दुर्गराज, गोविंदराज तथा स्वामिकराज बादामी के चालुक्यों के अधीन जिलों के शासक थे। स्वामिकराज का पुत्र नन्नराज लट्टलूर (वर्तमान महाराष्ट्र का लातूर जिला) से बरार चला आया और अचलपुर (एलिचपुर) में चालुक्यों के अधीन सामंत के रूप में शासन करने लगा। ए.के. मजूमदार भी मानते हैं कि लट्टलूर से राष्ट्रकूटों का कुल बरार में अचलपुर (एलिचपुर) आया और अपना एक छोटा-सा राज्य स्थापित कर बादामी के चालुक्यों के अधीन शासन करने लगा। बाद में इन्हें महाराष्ट्र का निवासी मान लिया गया। इस प्रकार दंतिदुर्ग के पूर्वजों को लट्टलूर से आया हुआ मान लेने पर इनकी मातृभाषा के कन्नड़ होने में कोई अस्वाभाविकता नहीं है।
राष्ट्रकूटों की आरंभिक राजधानी
राष्ट्रकूटों की आरंभिक राजधानी कहाँ थी, इस संबंध में कोई स्पष्ट सूचना नहीं है। कथाकोश में शुभतुंग को, जो कृष्ण प्रथम की उपाधि थी, माल्खेद का शासक बताया गया है। इस आधार पर कुछ इतिहासकारों का सुझाव है कि मान्यखेट आरंभ से ही राष्ट्रकूटों की राजधानी थी। किंतु कृष्ण द्वितीय को भी शुभतुंग की उपाधि से विभूषित किया गया है, इसलिए कृष्ण प्रथम को माल्खेद या मान्यखेट का संस्थापक मानना संदिग्ध है।
कर्क द्वितीय के दानपत्रों में स्पष्ट कहा गया है कि सर्वप्रथम अमोघवर्ष प्रथम ने मान्यखेट को राष्ट्रकूटों की राजधानी बनाया था। इस प्रकार स्पष्ट है कि अमोघवर्ष प्रथम के पहले राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेट के अलावा कहीं और थी।
कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि नासिक जिले में स्थित मयूरखिंडी या मारेखिंड दुर्ग ही आरंभिक राष्ट्रकूटों की राजधानी थी, क्योंकि वानी डिंडोरी दानपत्र इसी स्थान से जारी किया गया था। किंतु लेख में प्रयुक्त ‘मयूरखिंडीशमा वासितेनमया’ पद से ज्ञात होता है कि इस दानपत्र को जारी करने के समय गोविंद तृतीय यहाँ अस्थायी शिविर में ठहरा हुआ था। इसलिए मयूरखिंडी एक अस्थायी सैनिक शिविर था, राजधानी नहीं। इसी प्रकार नासिक को भी इनकी प्रारंभिक राजधानी नहीं माना जा सकता, क्योंकि धुलिया तथा पिप्पेरी अनुदानपत्रों में नासिक को वायसराय का केंद्र बताया गया है।
संभवतः राष्ट्रकूटों की आरंभिक राजधानी एलोरा के निकट सोलोबंजुन में स्थित थी, क्योंकि इस स्थल से कुछ पुरातात्त्विक अवशेष और एक विशाल जलाशय के प्रमाण मिले हैं।
अल्तेकर के अनुसार बरार में एलिचपुर आरंभिक राष्ट्रकूटों की राजधानी रही होगी। किंतु राष्ट्रकूट इतिहास में एलिचपुर कभी सत्ता का सुदृढ़ केंद्र नहीं रहा। संभव है कि दंतिदुर्ग ने एलिचपुर के स्थान पर किसी दूसरे नगर को साम्राज्य का केंद्र बनाया हो।
राष्ट्रकूटों की शाखाएँ
मानपुर अथवा मान्यपुर की शाखा
ईसा की छठी तथा सातवीं शताब्दियों में दक्षिणापथ के विभिन्न भागों में राष्ट्रकूटों के कई सामंत कुल अस्तित्व में थे। इनमें एक सामंत शासक मानपुर अथवा मान्यपुर का अभिमन्यु था। इसकी जानकारी उंडिवाटिका अनुदानपत्र से मिलती है। यद्यपि यह लेख अतिथित है, लेकिन पुरालिपिशास्त्रीय प्रमाण के आधार पर इसे सातवीं शताब्दी ईस्वी का माना जाता है।
अनुदानपत्र में दी गई वंशावली के अनुसार अभिमन्यु मानांक का प्रपौत्र, देवराज का पौत्र तथा भविष्य का पुत्र था। मानपुर के समीकरण के संबंध में विद्वान् एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों का विचार है कि मान्यपुर मध्य प्रदेश के रीवा के अंतर्गत बांधवगढ़ के निकट स्थित मानपुर है। कुछ अन्य लोगों की मान्यता है कि अभिमन्यु के पूर्वज मानांक तथा देवराज दक्षिणी कोसल के शरभपुर के मानमात्र तथा उसके पुत्र सुदेवराज से अभिन्न थे। किंतु डी.सी. सरकार के अनुसार शरभपुर के किसी राजा ने राष्ट्रकूट होने का दावा नहीं किया। दोनों परिवार दो भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न राजधानियों से शासन कर रहे थे। शरभपुर के शासकों की मुहरों पर गजलक्ष्मी का प्रतीक मिलता है, जबकि मान्यपुर के राष्ट्रकूटों की मुहरों पर सिंह का। इसके साथ ही शरभपुर के शासकों के अनुदानपत्र डिब्बानुमा शीर्षरेखा वाली लिपि में लिखे गए थे, जबकि मान्यपुर के शासकों के अनुदानपत्र ऐसे नहीं थे।
दिनेशचंद्र सरकार का मानना है कि मानांक के पौत्र अविधेय द्वारा जारी एक अनुदानपत्र कोल्हापुर के समीप मानपुर से मिला है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि मानपुर का परिवार मराठा देश के दक्षिणी भाग में शासन करता था। वी.वी. मिराशी मानपुर की पहचान सतारा जिले के मान से करते हैं। एच.सी. रे के अनुसार मानपुर का परिवार नर्मदा घाटी में म्हो से लेकर पंचमढ़ी तक शासन कर रहा था।
मानांक
मानपुर शाखा का पहला ज्ञात शासक मानांक था। उंडिवाटिका अनुदानपत्र में इसे राष्ट्रकूटों का आभूषण बताया गया है। इस आधार पर डी.सी. सरकार का अनुमान है कि शायद यह किसी राष्ट्रकूट या अन्य राजा का प्रांतीय शासक था। किंतु यह किसके अधीन था, स्पष्टतः ज्ञात नहीं है। इसके पौत्र अविधेय के पांडुरंगवल्ली अनुदानपत्र में मानांक को विदर्भ तथा अश्मक की विजयों का श्रेय दिया गया है। मानांक को कुंतल का विजेता भी कहा गया है।
मानांक के बाद उसके बेटे देवराज ने शासन किया। इसके विषय में भी अधिक ज्ञात नहीं है। इसके दो पुत्रों भविष्य तथा अविधेय के संबंध में सूचना मिलती है। अविधेय ने अपने पिता, भाई भविष्य अथवा भतीजे अभिमन्यु में से किसके बाद शासन किया, यह स्पष्टतः ज्ञात नहीं है।
अभिमन्यु के विषय में अपेक्षाकृत अधिक सूचनाएँ हैं। इसने हरिवत्स के दुर्ग के नायक जयसिंह की उपस्थिति में उंडिवाटिका गाँव भगवान शिव के सम्मान में शैव तपस्वी जटाभार को दान दिया था। दिनेशचंद्र सरकार की मान्यता है कि शायद मानपुर के शासकों को मौर्यों (कोंकण के) अथवा नलों ने पराजित किया, जिन्हें आगे चलकर प्रारंभिक चालुक्यों ने हराया।
लाट की राष्ट्रकूट शाखा
कर्कराज द्वितीय के 757 ई. के अंतरोली-छरोली अनुदानपत्र, जो गरुड़ांकित है, से लाट पर शासन करने वाले एक अन्य राष्ट्रकूट कुल का पता चलता है। इसमें कर्कराज के पहले के तीन शासकों—गोविंद (पिता), ध्रुव (पितामह) और कर्कराज प्रथम (प्रपितामह)—का उल्लेख मिलता है। अंतरोली-छरोली की पहचान सूरत के उत्तर-पूर्व स्थित स्थावरपल्लिका से की गई है। इससे लगता है कि कर्कराज द्वितीय सूरत एवं भरूच के प्रदेशों पर शासन कर रहा था।
कर्कराज द्वितीय दंतिदुर्ग का समकालीन था। दोनों परिवारों में क्या संबंध थे, स्पष्टतः ज्ञात नहीं है। डी.आर. भंडारकर कर्क एवं गोविंद को दंतिदुर्ग शाखा के इंद्र प्रथम का पिता एवं पितामह स्वीकार करते हैं।
चालुक्य विक्रमादित्य द्वितीय के नरवन अनुदानपत्रों से पता चलता है कि राष्ट्रकूट शिवराज के पुत्र गोविंदराज के अनुग्रह पर उसने नरवर गाँव ब्राह्मणों को दान में दिया था। इस गोविंदराज को अंतरोली-छरोली अनुदानपत्र के गोविंद से समीकरण करने का प्रयास किया गया है, किंतु यह उचित नहीं है, क्योंकि दोनों लेखों में गोविंद के पिता का नाम भिन्न है। अंतरोली-छरोली लेख में गोविंद के पिता का नाम ध्रुव है, जबकि नरवन पत्रों में उल्लिखित गोविंदराज का पिता शिवराज था।
बेतूल-एलिचपुर के राष्ट्रकूट
छठी तथा सातवीं शताब्दियों में एक राष्ट्रकूट परिवार आधुनिक बेतूल-एलिचपुर क्षेत्र में शासन कर रहा था। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के तिवरखेड़ (शक संवत् 553 = 631 ई.) तथा मुलताई (शक संवत् 631 = 709 ई.) अनुदानपत्रों में इस राष्ट्रकूट परिवार के चार शासकों का उल्लेख है। इन दोनों अनुदानपत्रों को नन्नराज ने जारी किया था। तिवरखेड़ तथा मुलताई अनुदानपत्रों में राष्ट्रकूट राजाओं का वंशानुक्रम इस प्रकार मिलता है—दुर्गराज, गोविंदराज, स्वामिकराज और नन्नराज। इस प्रकार नन्नराज दुर्गराज का प्रपौत्र, गोविंदराज का पौत्र एवं स्वामिकराज का पुत्र था। अल्तेकर के अनुसार दुर्गराज, गोविंदराज तथा स्वामिकराज ने अनुमानतः 570 से 630 ई. तक शासन किया।
नन्नराज
नन्नराज ने संभवतः 630 ई. में शासन ग्रहण किया था। वह अपने पूर्वजों की तुलना में अधिक शक्तिशाली था। इस तथ्य की पुष्टि उसकी ‘युद्धसूर’ तथा ‘पंचमहाशब्द’ की उपाधियों एवं उसके अभिलेखों के प्राप्ति-स्थानों से हो जाती है। नन्नराज की प्रारंभिक ज्ञात तिथि उसके तिवरखेड़ अनुदानपत्र में 631-32 ई. मिलती है और उसकी अंतिम ज्ञात तिथि मुलताई अनुदानपत्र की 709-10 ई. है। इससे लगता है कि उसने कम से कम 78 वर्ष (630 ई. से 708 ई.) तक शासन किया था।
अल्तेकर के अनुसार आरंभिक राष्ट्रकूट शासक लट्टलूर (वर्तमान लातूर) के मूलनिवासी थे, जो नन्नराज के समय में लट्टलूर से बरार चले गए और वहाँ बादामी के चालुक्यों के अधीन शासन करने लगे।
मान्यखेट के राष्ट्रकूट (दंतिदुर्ग शाखा)
एलिचपुर के राष्ट्रकूट परिवार की एक दूसरी शाखा सातवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में उत्तरी दक्षिणापथ में विद्यमान थी। आठवीं शताब्दी ईस्वी के मध्यकाल में दंतिदुर्ग की इस शाखा, जिसे बाद में मान्यखेट के राष्ट्रकूट शाखा के नाम से प्रसिद्धि मिली, ने चालुक्यों की अधिसत्ता को चुनौती देकर स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। इस शाखा को मान्यखेट अथवा माल्खेद की राष्ट्रकूट शाखा भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यखेट इनकी राजधानी थी। राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष प्रथम के समय मान्यखेट को राष्ट्रकूटों की राजधानी बनने का सौभाग्य मिला।
मान्यखेट के आरंभिक शासक
दंतिवर्मा प्रथम (650–670 ई.)
मान्यखेट के राष्ट्रकूटों का वास्तविक संस्थापक दंतिदुर्ग (735–756 ई.) था। किंतु इसके पूर्व शासन करने वाले राष्ट्रकूट शासकों का इतिहास तिमिराच्छादित है। दंतिदुर्ग के अभिलेखों में सामान्यतः इसके पूर्वजों की तीन पीढ़ियों का उल्लेख मिलता है। किंतु एलोरा की दशावतार गुहा में उत्कीर्ण लेख में दंतिदुर्ग के पाँच पूर्वजों—क्रमशः इंद्र द्वितीय, कर्क प्रथम, गोविंदराज, इंद्र पृच्छकराज एवं दंतिवर्मा—के नाम उल्लिखित हैं। इस प्रकार दंतिदुर्ग शाखा का प्रथम शासक दंतिवर्मा प्रतीत होता है।
सातवीं शताब्दी के मध्य के लगभग उत्तरी दक्षिणापथ में दंतिवर्मा प्रथम राज्य कर रहा था। एलिचपुर के राष्ट्रकूट शासक नन्नराज युद्धसूर से दंतिदुर्ग के क्या संबंध थे, स्पष्टतः ज्ञात नहीं है। यह संभवतः नन्नराज का पुत्र या भाई था।
दंतिवर्मा भी संभवतः बादामी के चालुक्यों की अधीनता में शासन करता था। इसकी मृत्यु के लगभग 80 वर्ष बाद जारी किए गए दशावतार गुहालेख में इसकी परंपरागत प्रशस्ति मिलती है और उसे ‘पंचमहाशब्दाधिगत’ कहा गया है। इसका शासनकाल 650–670 ई. के लगभग माना जा सकता है।
इंद्र पृच्छकराज एवं गोविंदराज (670–700 ई.)
दशावतार लेख में दंतिवर्मा के बाद इसके पुत्र इंद्र पृच्छकराज तथा पौत्र गोविंदराज का नाम मिलता है। लेख से पता चलता है कि इंद्र वीर शासक था और यज्ञों में श्रद्धा रखता था। इसने संभवतः 670–690 ई. के लगभग तक शासन किया।
गोविंदराज को वीरनारायण के नाम से भी जाना जाता था। कर्कराज सुवर्णवर्ष के 812 ई. के बड़ौदा दानपत्र से लगता है कि वह शिव का परम भक्त था। आर.जी. भंडारकर उसका समीकरण गोविंद नामक उस शासक से करते हैं, जिसे पुलकेशिन द्वितीय ने भीमा नदी के उत्तर में पराजित किया था। किंतु इस मत से सहमत होना कठिन है। गोविंदराज ने लगभग 690 से 700 ई. तक राज्य किया।
कर्कराज (700–715 ई.)
गोविंदराज के बाद उसका पुत्र कर्कराज 700 ई. के आसपास राजा हुआ। दशावतार अभिलेख के अनुसार उसका नाम सुनते ही उसके शत्रुओं की स्त्रियों के नेत्र अश्रुपूर्ण हो जाते थे और उनकी कलाइयों से वलय गिरने लगते थे। विष्णु के उपासक कर्क ने वैदिक यज्ञ का संपादन किया था। इसने अनुमानतः पंद्रह वर्ष (700–715 ई.) तक शासन किया।
कर्कराज के तीन पुत्र थे—इंद्र, कृष्ण और नन्न (नन्नराज)। 757 ई. के अंतरोली-छरोली ताम्रपत्र के आधार पर कुछ इतिहासकार ध्रुव को भी कर्क का पुत्र मान लेते हैं। कर्कराज के पुत्रों में इंद्र ज्येष्ठ होने के कारण कर्क का उत्तराधिकारी हुआ।
इंद्र प्रथम (715–735 ई.)
आरंभिक राष्ट्रकूट शासकों में इंद्र प्रथम सबसे अधिक महत्त्वाकांक्षी एवं योग्य था। यद्यपि इंद्र प्रथम भी वातापी के चालुक्य शासक विजयादित्य द्वितीय का सामंत था, लेकिन उसने अपने बाहुबल एवं योग्यता के बल पर उत्तर की ओर अपने राज्य का विस्तार किया और मध्य भारत के मराठी-भाषी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।
अमोघवर्ष प्रथम के संजन दानपत्रों से ज्ञात होता है कि इंद्रराज ने खेटक (गुजरात में कैरा नामक स्थान) में चालुक्य राजकुमारी भवनागा के साथ राक्षस-विवाह किया था—
इंद्रराजस्ततोऽग्राहयश्चालुक्यनृपात्मजाम्।
राक्षसेन विवाहेन रणे खेटकमण्डपे।।
भवनागा संभवतः लाट के चालुक्य सामंत मंगलेश विनयादित्य या उसके पुत्र पुलकेशिन की पुत्री या भतीजी थी। कैरा संभवतः वल्लभी के मैत्रकों के अधीन था। लगता है कि चालुक्य राजकुमारी भवनागा का विवाह किसी मैत्रक राजकुमार के साथ निश्चित था, इसलिए कैरा में उसका स्वयंवर हो रहा था।
इंद्र एक शक्तिशाली शासक था और उसके पास अश्वारोहियों तथा गजारोहियों की विशाल सेना थी। फलतः उसने गुजरात के चालुक्यों एवं वल्लभी के मैत्रकों की अवहेलना करते हुए विवाह-मंडप से कन्या का अपहरण कर लिया। यह विवाह संभवतः 722 ई. के आसपास हुआ होगा। इंद्र का शासनकाल अनुमानतः 715 ई. से 735 ई. तक माना जाता है।
स्वतंत्र राष्ट्रकूट साम्राज्य की स्थापना
दंतिदुर्ग (735–756 ई.)
मुख्य लेख : दंतिदुर्ग
दंतिदुर्ग को राष्ट्रकूट राजवंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। प्रारंभ में वे बादामी के चालुक्य शासक विक्रमादित्य द्वितीय के सामंत थे, किंतु धीरे-धीरे उन्होंने अपनी सैन्य और राजनीतिक शक्ति का विस्तार किया। लगभग 753 ई. में उन्होंने चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन् द्वितीय को पराजित कर चालुक्य सत्ता का अंत किया और दक्कन में स्वतंत्र राष्ट्रकूट राज्य की स्थापना की। दंतिदुर्ग ने अपने प्रभाव का विस्तार मालवा तथा दक्षिण और मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों तक किया। उनके शासन से संबंधित अभिलेखों में उज्जयिनी में सम्पन्न हिरण्यगर्भ महादान का उल्लेख मिलता है, जिसके माध्यम से उन्होंने अपने राजकीय अधिकार और क्षत्रिय वैधता को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। उन्होंने महाराजाधिराज, परमेश्वर और परमभट्टारक जैसी राजकीय उपाधियाँ धारण कीं। लगभग 756 ई. में उनकी मृत्यु के बाद उनके चाचा कृष्ण प्रथम राष्ट्रकूट शासक बने। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि मान्यखेट (मालखेड़) को राष्ट्रकूटों की राजधानी दंतिदुर्ग ने नहीं बनाया था; बाद में अमोघवर्ष प्रथम के शासनकाल में मान्यखेट राष्ट्रकूट साम्राज्य की प्रमुख राजधानी बना। इस प्रकार दंतिदुर्ग ने चालुक्य प्रभुत्व को समाप्त कर दक्कन में राष्ट्रकूटों को एक स्वतंत्र और शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में स्थापित किया।
कृष्ण प्रथम (756–774 ई.)
मुख्य लेख : कृष्ण प्रथम
दंतिदुर्ग की मृत्यु के बाद, उनके कोई पुत्र न होने के कारण उनके चाचा कृष्ण प्रथम (लगभग 756–774 ई.) राष्ट्रकूट सिंहासन पर बैठे। उन्होंने राष्ट्रकूट सत्ता को सुदृढ़ करते हुए दक्कन में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। उन्होंने बादामी के चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन् द्वितीय को पराजित कर चालुक्य सत्ता का पूर्णतः अंत किया तथा मैसूर के पश्चिमी गंगों, कोंकण और वेंगी के पूर्वी चालुक्यों पर भी अपना प्रभाव स्थापित किया। उनके शासनकाल में राष्ट्रकूट साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति और क्षेत्रीय प्रभुत्व में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। कृष्ण प्रथम की सबसे प्रसिद्ध उपलब्धि एलोरा (महाराष्ट्र) का कैलाश मंदिर है, जिसे चट्टान को काटकर निर्मित एक भव्य एकाश्म मंदिर के रूप में विकसित कराया गया। यह मंदिर राष्ट्रकूटकालीन स्थापत्य-कला की उत्कृष्ट उपलब्धि और भारतीय शैल-वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। इस प्रकार कृष्ण प्रथम ने सैन्य विजयों के माध्यम से राष्ट्रकूट साम्राज्य को सुदृढ़ करने के साथ-साथ कला और स्थापत्य के क्षेत्र में भी स्थायी योगदान दिया।
गोविंद द्वितीय (774–780 ई.)
कृष्ण प्रथम की मृत्यु के पश्चात् गोविंद द्वितीय 774 ई. के आसपास राष्ट्रकूट वंश की गद्दी पर बैठा। उसने अपने छोटे भाई ध्रुव को नासिक का राज्यपाल नियुक्त किया और स्वयं महाराजाधिराज, विक्रमावलोक, प्रभूतवर्ष, प्रतापावलोक एवं वल्लभ जैसी उपाधियाँ धारण कीं।
दौलताबाद अनुदानपत्र के अनुसार गोविंद द्वितीय (774–780 ई.) ने गोवर्धन का उद्धार किया और परिजात को पराजित किया था। गोवर्धन की स्थिति नासिक जिले में थी और परिजात संभवतः कोई स्थानीय शासक था। अल्तेकर के अनुसार ध्रुव नासिक एवं खानदेश का राज्यपाल था, इसलिए संभव है कि गोविंद ने गोवर्धन में अपने विद्रोही भाई ध्रुव को पराजित किया हो।
वास्तव में गोविंद ने युवराज के रूप में अपनी प्रशासनिक योग्यता एवं सैन्य-संचालन की क्षमता का अच्छा परिचय दिया था, किंतु लगता है कि राजा बनने के बाद उसने विलासितापूर्ण जीवन बिताना प्रारंभ कर दिया और प्रशासन का उत्तरदायित्व अपने भाई ध्रुव पर छोड़ दिया। ध्रुव योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी था। उसने अपने भाई गोविंद की अकर्मण्यता का लाभ उठाकर उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया।
ध्रुव के विद्रोह को दबाने के लिए गोविंद ने राष्ट्रकूटों के पुराने शत्रुओं—मालवा, गंगवाड़ी, वेंगी तथा कांची के शासकों—से गठबंधन किया, जिससे गोविंद के मंत्री आदि भी उसका साथ छोड़कर ध्रुव के समर्थक हो गए। किंतु किसी शासक की सहायता मिलने से पहले ही ध्रुव ने गोविंद पर आक्रमण कर उसे पराजित कर दिया। गोविंद या तो युद्ध में मारा गया अथवा बंदी बना लिया गया।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार गोविंद द्वितीय उदार एवं दूरदर्शी शासक था। वह अपनी दुर्बलता और ध्रुव की योग्यता से परिचित था। अतः उसने राज्य एवं प्रजा के हित में स्वयं राजसिंहासन त्याग दिया और ध्रुव को प्रशासन का संपूर्ण उत्तरदायित्व दे दिया। ध्रुव गोविंद द्वितीय के प्रति सदैव निष्ठावान बना रहा। किंतु प्रामाणिक साक्ष्यों के अभाव में यह अनुमान मान्य नहीं है। गोविंद द्वितीय ने अनुमानतः छह वर्ष (774–780 ई.) तक शासन किया।
ध्रुव ‘धारावर्ष’ (780–793 ई.)
मुख्य लेख : ध्रुव धारावर्ष
ध्रुव धारावर्ष राष्ट्रकूट वंश के सबसे शक्तिशाली और महत्त्वपूर्ण शासकों में से एक था। वह कृष्ण प्रथम का पुत्र और गोविंद द्वितीय का छोटा भाई था। लगभग 780 ई. में उसने गोविंद द्वितीय को हटाकर राष्ट्रकूट सिंहासन पर अधिकार किया। उसके राज्यारोहण के साथ राष्ट्रकूट साम्राज्य की शक्ति और विस्तार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। ध्रुव ने कालीवल्लभ, श्रीवल्लभ, धारावर्ष, महाराजाधिराज और परमेश्वर जैसी उपाधियाँ धारण कीं। उसके शासनकाल में राष्ट्रकूटों की शक्ति दक्कन से आगे बढ़कर उत्तर भारत की राजनीति को भी प्रभावित करने लगी। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि उत्तर भारतीय अभियान थे, जिनमें उसने गुर्जर-प्रतिहार शासक वत्सराज और पाल शासक धर्मपाल को पराजित कर कन्नौज पर अपना प्रभाव स्थापित किया। कन्नौज पर प्रभुत्व के लिए राष्ट्रकूटों, गुर्जर-प्रतिहारों और पालों के बीच विकसित संघर्ष को आगे चलकर त्रिपक्षीय संघर्ष के रूप में जाना गया। ध्रुव की उत्तर भारतीय विजयें स्थायी क्षेत्रीय अधिग्रहण में परिवर्तित नहीं हुईं, किंतु उन्होंने राष्ट्रकूटों को उत्तर भारतीय राजनीति की प्रमुख शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया। दक्षिण भारत में भी उसने राष्ट्रकूट प्रभुत्व को सुदृढ़ किया। उसने वेंगी के पूर्वी चालुक्य शासक विष्णुवर्धन चतुर्थ को पराजित कर अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया तथा पश्चिमी गंग शासक शिवमारा द्वितीय को पराजित कर बंदी बनाया और गंगावाड़ी पर राष्ट्रकूट प्रभाव स्थापित किया। इसके अतिरिक्त, उसने कांची के पल्लव शासक दन्तिवर्मन के विरुद्ध अभियान चलाकर अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया। ध्रुव की विजयों का उद्देश्य दक्कन में राष्ट्रकूटों की सर्वोच्चता स्थापित करने के साथ-साथ उत्तर और दक्षिण भारत की राजनीति में राष्ट्रकूट प्रभाव का विस्तार करना था। यद्यपि उत्तर भारत में उसके द्वारा जीते गए प्रदेशों पर स्थायी प्रशासन स्थापित नहीं किया जा सका, फिर भी उसकी सैन्य सफलताओं ने राष्ट्रकूटों को तत्कालीन भारत की प्रमुख साम्राज्यवादी शक्तियों में शामिल कर दिया। लगभग 793 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र गोविंद तृतीय उत्तराधिकारी बना, जिसने अपने पिता की साम्राज्यवादी नीति को आगे बढ़ाया। इस प्रकार ध्रुव धारावर्ष का शासन राष्ट्रकूट साम्राज्य के राजनीतिक उत्कर्ष की दिशा में एक निर्णायक चरण था।
गोविंद तृतीय (793–814 ई.)
मुख्य लेख : गोविंद तृतीय
गोविंद तृतीय राष्ट्रकूट वंश के सबसे शक्तिशाली शासकों में से एक थे और उन्होंने अपने पिता ध्रुव धारावर्ष के बाद लगभग 793 ई. में सिंहासन संभाला। राज्यारोहण के समय उन्हें अपने भाइयों तथा दक्षिण के कुछ सामंतों के विद्रोह का सामना करना पड़ा, जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक दबाकर अपनी सत्ता सुदृढ़ की। इसके बाद उन्होंने उत्तर भारत में अभियान चलाकर गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय तथा पाल शासक धर्मपाल को पराजित किया और कन्नौज की राजनीति में राष्ट्रकूट प्रभाव स्थापित किया। दक्षिण भारत में उन्होंने पल्लव, चोल, पांड्य और चेर शासकों के विरुद्ध सफल अभियान चलाकर राष्ट्रकूट प्रभुत्व को व्यापक बनाया। उनके शासनकाल में राष्ट्रकूट साम्राज्य का प्रभाव दक्कन से आगे बढ़कर उत्तर और दक्षिण भारत के विस्तृत क्षेत्रों तक पहुँच गया तथा राष्ट्रकूटों की प्रतिष्ठा एक प्रमुख अखिल-भारतीय शक्ति के रूप में स्थापित हुई। उनकी सैन्य सफलताओं के कारण उन्हें जगतुंग, कीर्तिनारायण, प्रभूतवर्ष और श्रीवल्लभ जैसी उपाधियाँ प्राप्त थीं। उनके शासनकाल में राष्ट्रकूट साम्राज्य ने राजनीतिक और सैन्य शक्ति के चरम चरणों में प्रवेश किया। लगभग 814 ई. में गोविंद तृतीय की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अमोघवर्ष प्रथम ने राष्ट्रकूट सिंहासन संभाला।
शर्व ‘अमोघवर्ष’ प्रथम (814–878 ई.)
मुख्य लेख : अमोघवर्ष प्रथम
अमोघवर्ष प्रथम (814–878 ई.) राष्ट्रकूट वंश के प्रमुख शासकों में से एक थे और उन्होंने लगभग 64 वर्षों तक शासन किया। उनका मूल नाम शर्व बताया जाता है। वे अल्पायु में सिंहासन पर बैठे और प्रारंभिक वर्षों में उन्हें आंतरिक विद्रोहों तथा बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिन्हें उन्होंने अपने सामंतों और सहयोगियों की सहायता से नियंत्रित किया। उनके शासनकाल में मान्यखेट (मान्यखेड़) राष्ट्रकूटों की प्रमुख राजधानी के रूप में विकसित हुआ और यह राजनीतिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्त्वपूर्ण केंद्र बना। अमोघवर्ष स्वयं साहित्य और विद्या के संरक्षक थे तथा उनके नाम से संबद्ध कविराजमार्ग कन्नड़ साहित्य की प्रारंभिक महत्त्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है। उनके दरबार में जिनसेन, महावीराचार्य और अन्य विद्वानों को संरक्षण प्राप्त था। उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई और जैन धर्म के प्रति विशेष अनुराग प्रदर्शित किया। अरब यात्री सुलेमान ने भी राष्ट्रकूट सम्राट की शक्ति और प्रतिष्ठा का उल्लेख किया है। युद्ध की अपेक्षा शांति, साहित्य, धर्म और संस्कृति के संरक्षण में उनकी अधिक रुचि के कारण आधुनिक इतिहास-लेखन में उन्हें कभी-कभी ‘दक्षिण का अशोक’ कहा जाता है। इस प्रकार अमोघवर्ष प्रथम का शासन राष्ट्रकूट साम्राज्य के राजनीतिक स्थायित्व के साथ-साथ साहित्यिक और सांस्कृतिक उत्कर्ष के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
कृष्ण द्वितीय (878–914 ई.)
मुख्य लेख : कृष्ण द्वितीय
अमोघवर्ष प्रथम के उपरांत उसका पुत्र कृष्ण द्वितीय लगभग 878 ई. में राष्ट्रकूट वंश की गद्दी पर बैठा और 914 ई. तक शासन किया। उसने शुभतुंग, अकालवर्ष और वल्लभराज जैसी उपाधियाँ धारण कीं। कृष्ण द्वितीय ने अपनी राजनीतिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए वैवाहिक संबंधों का सहारा लिया। उसका विवाह चेदि के हैहय राजवंश की राजकुमारी महादेवी के साथ हुआ था। उसके शासनकाल में राष्ट्रकूटों का गुर्जर-प्रतिहारों के साथ मालवा और उत्तर भारत में प्रभुत्व स्थापित करने के लिए संघर्ष जारी रहा। इसके अतिरिक्त, उसे वेंगी के पूर्वी चालुक्यों सहित अपने प्रायः सभी पड़ोसी शासकों के साथ संघर्ष करना पड़ा। यद्यपि कृष्ण द्वितीय को उत्तर भारत में कोई स्थायी सफलता प्राप्त नहीं हुई, फिर भी उसने राष्ट्रकूट साम्राज्य की राजनीतिक निरंतरता और शक्ति को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसके शासनकाल में कला, साहित्य और धार्मिक गतिविधियों को भी संरक्षण प्राप्त हुआ। इस प्रकार कृष्ण द्वितीय का शासन राष्ट्रकूट साम्राज्य की राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था।
इंद्र तृतीय (914–929 ई.)
मुख्य लेख : इंद्र तृतीय
इंद्र तृतीय (914–929 ई.) राष्ट्रकूट वंश के अत्यंत शक्तिशाली शासकों में से एक था। वह कृष्ण द्वितीय का पौत्र और जगत्तुंग का पुत्र था तथा पिता की मृत्यु के बाद 914 ई. के उत्तरार्द्ध में राष्ट्रकूट सिंहासन पर बैठा। उसके शासनकाल में राष्ट्रकूट शक्ति ने उत्तर भारत में पुनः अपना प्रभाव स्थापित किया। इंद्र तृतीय ने गुर्जर-प्रतिहार सामंत उपेंद्र परमार तथा कन्नौज के प्रतिहार शासक महिपाल प्रथम को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया और उसे लूटा। इस विजय से गंगा-यमुना दोआब तथा मध्य भारत में राष्ट्रकूटों की राजनीतिक प्रतिष्ठा पुनः सुदृढ़ हुई। यद्यपि कन्नौज पर उसका अधिकार स्थायी नहीं रहा, फिर भी इस अभियान ने उत्तर भारतीय राजनीति में राष्ट्रकूटों की सैन्य शक्ति का प्रभाव स्पष्ट कर दिया। उसने वेंगी के चालुक्यों को भी पराजित किया और नित्यवर्ष, रत्तकंदराप, राजमार्तण्ड तथा कीर्तिनारायण जैसी उपाधियाँ धारण कीं। उसके शासनकाल में अरब यात्री अल-मसूदी भारत आया था। इंद्र तृतीय कला और साहित्य का संरक्षक भी था। उसके दरबार में संस्कृत के प्रसिद्ध कवि त्रिविक्रम भट्ट को आश्रय प्राप्त था, जिन्होंने दमयंतीकथा और मदालसा चंपू की रचना की। इस प्रकार इंद्र तृतीय के शासनकाल में राष्ट्रकूट साम्राज्य ने सैन्य शक्ति, राजनीतिक प्रतिष्ठा तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं।
अमोघवर्ष द्वितीय (929–930 ई.)
मुख्य लेख : अमोघवर्ष द्वितीय, गोविंद चतुर्थ और अमोघवर्ष तृतीय
अमोघवर्ष द्वितीय (929–930 ई.) इंद्र तृतीय के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र था, जो लगभग 929 ई. में राष्ट्रकूट वंश का शासक बना और लगभग एक वर्ष तक शासन कर सका। उसके शासन के अस्तित्व को लेकर प्रारंभिक इतिहासकारों, विशेषकर फ्लीट, के बीच कुछ मतभेद थे, क्योंकि उपलब्ध कुछ अभिलेखों में उसका नाम स्पष्ट रूप से नहीं मिलता था। किंतु शिलाहार शासक अपराजित के भदन दानपत्र से उसके अल्पकालीन शासन का प्रमाण मिलता है। संभवतः 930 ई. के आसपास उसके छोटे भाई गोविंद चतुर्थ ने उसे अपदस्थ कर राष्ट्रकूट सिंहासन पर अधिकार कर लिया। कुछ स्रोतों में संकेत मिलता है कि गोविंद चतुर्थ ने सत्ता प्राप्त करने के लिए अमोघवर्ष द्वितीय की हत्या अथवा किसी षड्यंत्र का सहारा लिया था, किंतु इस संबंध में निश्चित और सर्वसम्मत प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इस प्रकार अमोघवर्ष द्वितीय का शासनकाल अत्यंत संक्षिप्त रहा, किंतु राष्ट्रकूटों के उत्तराधिकार-क्रम में उसका महत्त्व है, क्योंकि उसके बाद गोविंद चतुर्थ के सत्ता में आने से राजवंश में उत्तराधिकार-संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता का एक नया चरण आरंभ हुआ।
गोविंद चतुर्थ (930–936 ई.)
मुख्य लेख : अमोघवर्ष द्वितीय, गोविंद चतुर्थ और अमोघवर्ष तृतीय
गोविंद चतुर्थ (930–936 ई.) इंद्र तृतीय के पुत्र और अमोघवर्ष द्वितीय के छोटे भाई थे। उन्होंने लगभग 930 ई. में अपने भाई को अपदस्थ कर राष्ट्रकूट राजवंश के सिंहासन पर अधिकार किया। उन्होंने प्रभूतवर्ष और सुवर्णवर्ष जैसी उपाधियाँ धारण कीं। उनके शासनकाल में राष्ट्रकूट साम्राज्य की राजनीतिक स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। अभिलेखीय और साहित्यिक परंपराओं में उन्हें विलासी जीवन, व्यक्तिगत दुराचार तथा कठोर और अलोकप्रिय नीतियों के कारण आलोचना का पात्र बताया गया है। राज्यारोहण के कुछ ही समय बाद वे विलासिता और दुर्व्यसनों में आसक्त हो गए, जिसके कारण अनेक सामंत और उच्च अधिकारी उनसे असंतुष्ट हो गए। वेंगी के चालुक्यों के साथ संघर्ष में भी उन्हें उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली, जिससे उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा और कमजोर हुई। अंततः राष्ट्रकूट सामंतों और कुलीनों के व्यापक विरोध के कारण उन्हें सत्ता से हटा दिया गया और उनके चाचा अमोघवर्ष तृतीय ने लगभग 936 ई. में मान्यखेट के राष्ट्रकूट सिंहासन पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार गोविंद चतुर्थ का शासनकाल राष्ट्रकूट साम्राज्य में आंतरिक कलह, सामंती असंतोष और केंद्रीय सत्ता के क्रमिक पतन का महत्त्वपूर्ण चरण था।
बड्डेग ‘अमोघवर्ष’ तृतीय (936–939 ई.)
मुख्य लेख : अमोघवर्ष द्वितीय, गोविंद चतुर्थ और अमोघवर्ष तृतीय
अमोघवर्ष तृतीय (936–939 ई.), जिन्हें बड्डेग के नाम से भी जाना जाता है, इंद्र तृतीय के छोटे भाई और गोविंद चतुर्थ के चाचा थे। गोविंद चतुर्थ को अपदस्थ करने के बाद अमोघवर्ष तृतीय लगभग 936 ई. में मान्यखेट के राष्ट्रकूट सिंहासन पर बैठे। गोविंद चतुर्थ के अलोकप्रिय शासन और उनके विरुद्ध बढ़ते सामंती असंतोष के परिणामस्वरूप राष्ट्रकूट सामंतों तथा अधिकारियों ने उन्हें सत्ता से हटाकर अमोघवर्ष तृतीय को सिंहासन पर बैठाया। इस सत्ता-परिवर्तन में वेमुलवाड़ा के चालुक्य सामंत अरिकेसरी की महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। अमोघवर्ष तृतीय की रुचि शासन की अपेक्षा धर्म और ब्रह्म-चिंतन में अधिक थी। इसलिए शासन का वास्तविक संचालन उनके योग्य पुत्र और युवराज कृष्ण तृतीय ने किया। उनका शासनकाल लगभग तीन वर्षों का रहा। इस अल्प अवधि में वे कोई बड़े सैन्य अथवा प्रशासनिक परिवर्तन नहीं कर सके, किंतु उनके शासन से राष्ट्रकूट साम्राज्य में कुछ समय के लिए राजनीतिक स्थिरता स्थापित हुई। 939 ई. के आसपास उनके बाद उनके पुत्र कृष्ण तृतीय ने राष्ट्रकूट सिंहासन संभाला और आगे चलकर राजवंश के सबसे शक्तिशाली शासकों में अपना स्थान बनाया।
कृष्ण तृतीय (939–967 ई.)
मुख्य लेख : कृष्ण तृतीय
कृष्ण तृतीय (939–967 ई.) अमोघवर्ष तृतीय के बाद 939 ई. में राष्ट्रकूट सिंहासन पर बैठा। वह मान्यखेट के राष्ट्रकूट वंश के अंतिम महान और शक्तिशाली शासकों में से एक था। अपनी सैन्य क्षमता और राजनीतिक कुशलता के बल पर उसने राष्ट्रकूट साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा को चरम पर पहुँचाया। उसके शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि 949 ई. का टक्कोलम का युद्ध था, जिसमें उसने चोल नरेश परांतक प्रथम को पराजित कर चोल शक्ति को गंभीर आघात पहुँचाया। इसके बाद उसने कांची और तंजावूर पर अपना प्रभाव स्थापित किया तथा दक्षिण भारत में राष्ट्रकूट शक्ति का विस्तार किया। उसके दक्षिणी अभियानों का प्रभाव रामेश्वरम् तक पहुँचा। उसने वेंगी के चालुक्यों तथा अन्य दक्षिण भारतीय शक्तियों के विरुद्ध भी अभियान चलाए। उसकी विजयों के कारण उसे ‘अकालवर्ष’ तथा ‘कांचीयुम तंजैयुमकोंड’ अर्थात् ‘कांची और तंजावूर को विजित करने वाला’ जैसी उपाधियाँ प्राप्त हुईं। उसके शासनकाल में राष्ट्रकूट साम्राज्य ने राजनीतिक और सैन्य क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की तथा कन्नड़ साहित्य को भी संरक्षण मिला। हालांकि कृष्ण तृतीय की मृत्यु के बाद राष्ट्रकूट शक्ति तेजी से कमजोर होने लगी और 973 ई. में तैलप द्वितीय ने कर्क द्वितीय को पराजित कर मान्यखेट के राष्ट्रकूट साम्राज्य का अंत कर दिया। इस प्रकार कृष्ण तृतीय को राष्ट्रकूट साम्राज्य का अंतिम महान सम्राट माना जाता है।
खोट्टिग (अमोघवर्ष चतुर्थ)
कृष्ण तृतीय की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई खोट्टिग (अमोघवर्ष चतुर्थ) 967 ई. में राष्ट्रकूट वंश के सिंहासन पर बैठा और लगभग 972 ई. तक शासन किया। उसका शासनकाल राष्ट्रकूट साम्राज्य के पतन का निर्णायक चरण था। इस समय साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता कमजोर हो गई थी और सामंतों की शक्ति बढ़ रही थी। इसी स्थिति का लाभ उठाकर मालवा के परमार शासक सियक द्वितीय ने राष्ट्रकूट राज्य पर आक्रमण किया और मान्यखेट की राजधानी को लूट लिया। परमार उदयादित्य की उदयपुर प्रशस्ति में उल्लेख है कि श्रीहर्ष अर्थात् सियक द्वितीय ने खोट्टिग की राजलक्ष्मी का अपहरण कर लिया था। इस आक्रमण से राष्ट्रकूट साम्राज्य की प्रतिष्ठा को गंभीर आघात पहुँचा और उसकी राजनीतिक शक्ति तेजी से क्षीण होने लगी। परमारों के साथ संघर्ष के बाद खोट्टिग की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका भतीजा कर्क द्वितीय 972 ई. के आसपास राष्ट्रकूट सिंहासन पर बैठा, जिसके शासनकाल में 973 ई. में तैलप द्वितीय ने राष्ट्रकूट सत्ता का अंत कर कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना की।
कर्क द्वितीय
कर्क द्वितीय (लगभग 972–973 ई.) राष्ट्रकूट राजवंश के अंतिम शासकों में से एक था। वह खोट्टिग अमोघवर्ष के भाई नृपतुंग (निरुपम) का पुत्र और खोट्टिग का भतीजा था। खोट्टिग की मृत्यु के बाद वह लगभग 972 ई. में राष्ट्रकूट सिंहासन पर आसीन हुआ। उस समय तक राष्ट्रकूट साम्राज्य अपनी पूर्व शक्ति खो चुका था और राजनीतिक रूप से अत्यंत कमजोर हो गया था। इससे पहले मालवा के परमार शासक सियक द्वितीय ने मान्यखेट पर आक्रमण कर उसे लूटा था, जिससे राष्ट्रकूटों की केंद्रीय सत्ता और प्रतिष्ठा को गंभीर आघात पहुँचा। कर्क द्वितीय ने साम्राज्य को पुनः संगठित करने का प्रयास किया, किंतु परिस्थितियाँ उसके अनुकूल नहीं थीं। उसके शक्तिशाली सामंत पश्चिमी गंग शासक मारसिंह द्वितीय सत्यवाक्य ने राष्ट्रकूटों को सैन्य सहायता प्रदान की, किंतु साम्राज्य के पतन को नहीं रोक सका। 973 ई. में राष्ट्रकूट सामंत तैलप द्वितीय ने कर्क द्वितीय की कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर उसके विरुद्ध अभियान किया और उसे पराजित कर सत्ता पर अधिकार कर लिया। कलचुरी अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार, तैलप द्वितीय ने कर्क द्वितीय की हत्या कर दी। इसके साथ ही दक्कन में राष्ट्रकूट सत्ता का अंत हो गया और कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य वंश के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ। राष्ट्रकूट साम्राज्य को पुनर्जीवित करने के लिए मारसिंह द्वितीय ने कृष्ण तृतीय के पौत्र इंद्रराज चतुर्थ को सिंहासन पर स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु यह प्रयास असफल रहा। इस प्रकार कर्क द्वितीय का संक्षिप्त शासन राष्ट्रकूट साम्राज्य के अंतिम चरण और उसके पतन का निर्णायक अध्याय सिद्ध हुआ।
राष्ट्रकूट राजवंश का पतन
मुख्य लेख : राष्ट्रकूट राजवंश का पतन
राष्ट्रकूट राजवंश ने लगभग 735 ई. से 973 ई. तक भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृष्ण तृतीय (939–967 ई.) के शासनकाल तक राष्ट्रकूट साम्राज्य अपनी शक्ति और विस्तार के चरम पर था तथा नर्मदा से लेकर रामेश्वरम् तक उसका प्रभाव स्थापित हो चुका था, किंतु उनके बाद साम्राज्य को ऐसे योग्य शासक नहीं मिले जो विशाल राज्य को प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकें। परिणामस्वरूप केंद्रीय सत्ता धीरे-धीरे कमजोर हुई, उत्तराधिकार संबंधी संघर्ष बढ़े और शक्तिशाली सामंत अधिकाधिक स्वायत्त होने लगे। 972 ई. में मालवा के परमार शासक सियाक द्वितीय ने मान्यखेट पर आक्रमण कर उसे लूट लिया, जिससे राष्ट्रकूटों की राजनीतिक प्रतिष्ठा और सैन्य शक्ति को गंभीर आघात पहुँचा। इस संकट का लाभ उठाकर राष्ट्रकूट सामंत तैलप द्वितीय ने 973 ई. में विद्रोह कर राष्ट्रकूट सत्ता का अंत कर दिया और कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य वंश की स्थापना की। इस प्रकार, राष्ट्रकूट साम्राज्य का पतन किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि दुर्बल उत्तराधिकारियों, आंतरिक राजनीतिक संघर्ष, सामंतों की बढ़ती स्वायत्तता तथा बाहरी आक्रमणों के दीर्घकालिक संयुक्त प्रभाव का परिणाम था। यह तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि जिस वंश ने लगभग ढाई शताब्दियों तक दक्कन और दक्षिण भारत की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाई, वह कृष्ण तृतीय की मृत्यु के मात्र कुछ वर्षों बाद ही राजनीतिक रूप से समाप्त हो गया। हालांकि कृष्ण तृतीय की नीतियों को सीधे राष्ट्रकूट पतन का कारण मानना उचित नहीं है; उनके शासनकाल में साम्राज्य अपनी चरम शक्ति पर था, जबकि उसके वास्तविक विघटन के प्रमुख कारण उनके बाद उत्पन्न उत्तराधिकार-संकट, कमजोर केंद्रीय सत्ता और सामंती शक्तियों का उदय थे।
महत्त्वपूर्ण FAQ
1. राष्ट्रकूट वंश की स्थापना किसने की थी?
राष्ट्रकूट वंश के संस्थापक के रूप में सामान्यतः दन्तिदुर्ग (लगभग 735–756 ई.) को माना जाता है। उन्होंने चालुक्य सत्ता को पराजित कर दक्कन में स्वतंत्र राष्ट्रकूट साम्राज्य की नींव रखी।
2. राष्ट्रकूट वंश की राजधानी क्या थी?
राष्ट्रकूटों की प्रमुख राजधानी मान्यखेट (मान्यखेता) थी, जो वर्तमान कर्नाटक के कलबुर्गी क्षेत्र के निकट स्थित थी। कृष्ण द्वितीय के समय से मान्यखेट राष्ट्रकूट साम्राज्य का प्रमुख राजनीतिक केंद्र बना।
3. राष्ट्रकूट वंश का सबसे महान शासक कौन था?
राष्ट्रकूटों के महान शासकों में अमोघवर्ष प्रथम, ध्रुव, गोविंद तृतीय और कृष्ण तृतीय विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें कृष्ण तृतीय को राष्ट्रकूटों का अंतिम महान शासक माना जाता है।
4. अमोघवर्ष प्रथम क्यों प्रसिद्ध है?
अमोघवर्ष प्रथम (लगभग 814–878 ई.) अपने दीर्घ शासन, धार्मिक प्रवृत्ति, साहित्य-प्रेम और प्रशासनिक क्षमता के लिए प्रसिद्ध थे। उन्हें कन्नड़ साहित्य के प्रारंभिक महान संरक्षकों में माना जाता है तथा ‘कविराजमार्ग’ उनके काल की महत्त्वपूर्ण कृति है।
5. राष्ट्रकूटों का उत्तर भारत की राजनीति में क्या योगदान था?
राष्ट्रकूट शासकों ने कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष में पालों और गुर्जर-प्रतिहारों के साथ प्रतिस्पर्धा की। ध्रुव और गोविंद तृतीय ने उत्तर भारत में सफल सैन्य अभियान चलाकर राष्ट्रकूटों की राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ाई।
6. राष्ट्रकूटों की सबसे प्रसिद्ध स्थापत्य उपलब्धि कौन-सी है?
राष्ट्रकूटों की सबसे प्रसिद्ध स्थापत्य उपलब्धि एलोरा का कैलास मंदिर है। इसका निर्माण सामान्यतः राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम (लगभग 756–773 ई.) के शासनकाल से संबंधित माना जाता है। यह एक ही चट्टान को काटकर निर्मित भव्य मंदिर है।
7. कृष्ण तृतीय की प्रमुख सैन्य विजय कौन-सी थी?
कृष्ण तृतीय की सबसे प्रसिद्ध विजय 949 ई. के टक्कोलम युद्ध में हुई, जिसमें उन्होंने चोल शासक परांतक प्रथम को पराजित किया। इसके बाद राष्ट्रकूटों का प्रभाव कांची और तंजावूर तक बढ़ा तथा दक्षिण भारत में उनकी शक्ति चरम पर पहुँची।
8. राष्ट्रकूट साम्राज्य का पतन क्यों हुआ?
राष्ट्रकूट साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारणों में दुर्बल उत्तराधिकारी, उत्तराधिकार-संघर्ष, सामंतों की बढ़ती स्वायत्तता, आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी आक्रमण शामिल थे। 972 ई. में परमार शासक सियाक द्वितीय द्वारा मान्यखेट की लूट ने राष्ट्रकूटों की शक्ति को गंभीर आघात पहुँचाया।
9. राष्ट्रकूट वंश का अंत किसने किया?
लगभग 973 ई. में तैलप द्वितीय ने अंतिम राष्ट्रकूट शासक कर्क द्वितीय को पराजित कर दक्कन में राष्ट्रकूट सत्ता का अंत कर दिया। इसके बाद तैलप द्वितीय ने कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य वंश की स्थापना की।
10. राष्ट्रकूट वंश का भारतीय इतिहास में क्या महत्त्व है?
राष्ट्रकूटों ने लगभग 8वीं से 10वीं शताब्दी तक दक्कन और दक्षिण भारत की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक संपर्क को मजबूत किया तथा कला, स्थापत्य, कन्नड़ साहित्य और धार्मिक सहिष्णुता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। एलोरा का कैलास मंदिर उनकी स्थापत्य प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण है।


