अमोघवर्ष द्वितीय, गोविंद चतुर्थ और अमोघवर्ष तृतीय (Amoghavarsha II, Govind IV and Amoghavarsha III)

अमोघवर्ष द्वितीय, गोविंद चतुर्थ और अमोघवर्ष तृतीय (Amoghavarsha II, Govind IV and Amoghavarsha III)
अमोघवर्ष द्वितीय, गोविंद चतुर्थ और अमोघवर्ष तृतीय (929–939 ई.) मुख्य लेख : राष्ट्रकूट राजवंश  अमोघवर्ष […]

अमोघवर्ष द्वितीय, गोविंद चतुर्थ और अमोघवर्ष तृतीय (929–939 ई.)

मुख्य लेख : राष्ट्रकूट राजवंश 

अमोघवर्ष द्वितीय (929–930 ई.)

इंद्र तृतीय के पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र अमोघवर्ष द्वितीय लगभग 929 ई. में मान्यखेट के राष्ट्रकूट वंश का राजा हुआ। गोविंद चतुर्थ के सांगली लेख में अमोघवर्ष द्वितीय का नाम नहीं मिलता है। इस आधार पर फ्लीट ने अनुमान लगाया है कि अमोघवर्ष द्वितीय ने शासन नहीं किया था। किंतु कई परवर्ती राष्ट्रकूट अभिलेखों में अमोघवर्ष द्वितीय का नामोल्लेख मिलता है और शिलाहार शासक अपराजित के भदन दानपत्र में स्पष्ट कहा गया है कि उसने एक वर्ष (929–930 ई.) तक शासन किया था।

लगभग एक वर्ष के अल्पकालीन शासन के पश्चात् अमोघवर्ष की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु स्वाभाविक थी या किसी षड्यंत्र का परिणाम, यह स्पष्ट नहीं है। राष्ट्रकूट लेखों के अनुसार उसकी मृत्यु पिता की मृत्यु के दुःसह वियोग के कारण हुई थी। गोविंद चतुर्थ के काम्बे और सांगली लेखों में एक श्लोक मिलता है, जिसके अनुसार गोविंद संसार में साहसांक के समान केवल त्याग और अतुलनीय साहस के कारण प्रसिद्ध हुआ। उसने सामर्थ्य होते हुए भी अपने बड़े भाई के साथ निंदनीय क्रूरता का व्यवहार नहीं किया, बंधु की भार्या के साथ गमन आदि दुराचारों द्वारा अपयश भी नहीं कमाया और भय के कारण शौच-अशौच से पराङ्मुख होकर पैशाच व्रत भी स्वीकार नहीं किया—

सामर्थ्ये सति निन्दिता प्रविहिता नैवाग्रजे क्रूरता,
बन्धुस्त्रीगमनादिभिः कुचरितैरावर्जितं नायशः।
शौचाशौचपराङ्मुखं न च भिया पैशाच्यमङ्गीकृतं,
त्यागेनासमसाहसैश्च भुवने यः साहसाङ्कोऽभवत्।।

इस श्लोक में गोविंद की तुलना साहसांक (चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य) से की गई है। संभवतः इस श्लोक में गोविंद ने स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि यद्यपि उसमें भाई के साथ क्रूरता का व्यवहार करने या उसकी भार्या से विवाह करने की क्षमता थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इससे अप्रत्यक्ष रूप से संकेत मिलता है कि गोविंद ने न केवल अमोघवर्ष को युद्ध में पराजित कर उसकी हत्या की होगी, बल्कि उसकी पत्नी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव भी रखा होगा। इस कार्य से गोविंद की काफी अपकीर्ति हुई होगी और इस अपकीर्ति को मिटाने के लिए उसने सांगली और काम्बे के लेखों में इस श्लोक को अंकित करवाया होगा। सत्यता जो भी हो, संभावना यही है कि अमोघवर्ष को अपदस्थ कर गोविंद चतुर्थ ने राजसिंहासन पर अधिकार किया होगा।

गोविंद चतुर्थ (930–936 ई.)

गोविंद चतुर्थ 930 ई. में राष्ट्रकूट राजवंश के सिंहासन पर बैठा। उसने संभवतः अपने बड़े भाई अमोघवर्ष को अपदस्थ कर राजसिंहासन पर अधिकार किया था। सिंहासनारोहण के समय उसकी आयु लगभग 26 वर्ष थी। काम्बे अभिलेख से पता चलता है कि उसने अपना राज्याभिषेक बड़ी धूमधाम से संपन्न किया और ब्राह्मणों तथा मंदिरों को बहुत दान दिया।

अभिषेक के समय गोविंद ने प्रभूतवर्ष की उपाधि धारण की। उसकी अन्य उपाधियाँ नृपतुंग, सुवर्णवर्ष, वीरनारायण, साहसांक, शशांक, रट्टकंदर्प, नृपतित्रिनेत्र, विक्रांतनारायण, वल्लभनरेंद्र, परमेश्वर, परमभट्टारक तथा श्रीपृथ्वीवल्लभ आदि थीं।

गोविंद चतुर्थ का शासनकाल राजनीतिक उपलब्धियों की दृष्टि से महत्त्वहीन रहा। यद्यपि सांगली लेख में गंगा-यमुना द्वारा उसके राजप्रासाद में सेवा करने का उल्लेख मिलता है, किंतु इससे यह अनुमान करना निरर्थक है कि उसने इलाहाबाद तक विजय प्राप्त की थी। संभवतः इंद्र तृतीय की सेना उत्तर से लौटते समय कुछ समय के लिए इलाहाबाद में ठहरी थी।

वेंगी में राष्ट्रकूट समर्थक चालुक्य शासक युद्धमल्ल को भीम ने अपदस्थ कर दिया, किंतु गोविंद ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। यही नहीं, चालुक्य लेखों में पूर्वी चालुक्य शासक भीम द्वितीय ने गोविंद की विशाल सेना को पराजित करने का दावा किया है।

राष्ट्रकूट लेखों से ज्ञात होता है कि गोविंद चतुर्थ एक अयोग्य और विलासी शासक था। राज्यारोहण के कुछ ही समय बाद वह रासरंग में लिप्त हो गया, जिससे शासन का कार्य शिथिल पड़ने लगा। करहट लेख से पता चलता है कि उसकी बुद्धि तरुणियों के दृष्टिपाश में बंध गई थी और वह नित्य नवयुवतियों से घिरा रहता था। उसे साम्राज्य की आंतरिक एवं बाहरी घटनाओं का कोई ज्ञान नहीं रहता था। अनेक व्याधियों से घिरे होने के कारण उसका शरीर दुर्बल पड़ गया और वह जनता की सहानुभूति खोने लगा। राज्य के सभी अंग शिथिल हो गए, उसकी शक्ति समाप्तप्राय हो गई और अंततः उसका पतन स्वाभाविक हो गया।

देवली एवं करहट लेखों से ज्ञात होता है कि गोविंद चतुर्थ की विलासिता से उद्विग्न होकर सामंतों एवं जनता ने विद्रोह करना प्रारंभ कर दिया। उसके प्रमादी जीवन से असंतुष्ट होकर उसके सामंतों, अधिकारियों तथा मंत्रियों ने भी उसे पदच्युत करने की योजना बनाई और उसके चाचा अमोघवर्ष तृतीय को सिंहासन पर आसीन करने का निश्चय किया।

पंप कवि के ‘विक्रमार्जुनविजय’ काव्य में भी कहा गया है कि उसके दुर्व्यसनों से असंतुष्ट होकर सामंतों ने गोविंद चतुर्थ के चाचा अमोघवर्ष तृतीय से गोविंद को राजसिंहासन से हटाने का अनुरोध किया था। अभिलेखीय साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि अमोघवर्ष तृतीय का विवाह चेदि राजकुमारी के साथ हुआ था और वह शासन के प्रति उदासीन होकर त्रिपुरी में शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा था। राजशेखर के ‘विद्धशालभंजिका’ से भी संकेत मिलता है कि अमोघवर्ष तृतीय अपने ससुर युवराज प्रथम के यहाँ निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा था।

इसी बीच गोविंद ने दक्षिणी कर्नाटक के वेमुलवाड़ के अपने सामंत अरिकेशरि से युद्ध छेड़ दिया। अरिकेशरि का विवाह इंद्र तृतीय की पुत्री रेवकनिम्मडि के साथ हुआ था। पंप के ‘विक्रमार्जुनविजय’ के अनुसार वेमुलवाड़ के चालुक्य सामंत अरिकेशरि द्वितीय ने वेंगी के चालुक्य शासक विजयादित्य पंचम को आश्रय प्रदान किया। जब गोविंद चतुर्थ ने विजयादित्य पंचम को वापस करने का आदेश दिया, तो अरिकेशरि द्वितीय ने इसे अस्वीकार कर दिया और दक्षिणी कर्नाटक के किसी युद्ध में गोविंद को पराजित कर दिया।

इसी समय सामंतों और मंत्रियों की सलाह पर अमोघवर्ष त्रिपुरी से चलकर मान्यखेट आ गया। संभवतः पयोष्णी नदी के किनारे गोविंद चतुर्थ और अमोघवर्ष की सेनाओं का आमना-सामना हुआ, जिसमें राष्ट्रकूट नरेश गोविंद चतुर्थ की सेना पराजित हुई। अमोघवर्ष तृतीय ने चेदि सेनाओं की सहायता से गोविंद चतुर्थ को अपदस्थ कर दिया और 936 ई. में मान्यखेट के राष्ट्रकूट सिंहासन पर अधिकार कर लिया।

अनुमान किया जाता है कि गोविंद चतुर्थ के विरुद्ध एक संघ का निर्माण किया गया था। यद्यपि अमोघवर्ष तृतीय इसमें सक्रिय नहीं रहा, किंतु उसके महत्त्वाकांक्षी पुत्र कृष्ण तृतीय ने अपने पिता को सिंहासनारूढ़ करने के लिए अवश्य ही इस संघ में सक्रिय भूमिका निभाई होगी। कृष्ण तृतीय चेदियों, चालुक्यों, अरिकेशरि एवं अन्य मंत्रियों के सहयोग से अपने उद्देश्य में सफल रहा।

गोविंद युद्ध में मारा गया अथवा बंदी बना लिया गया, यह स्पष्ट नहीं है। परांतक प्रथम के तक्कोलम अभिलेख में गोविंदवल्लभरायर का उल्लेख है, जो परांतक का दामाद था। संभव है कि यह गोविंद चतुर्थ ही रहा हो। गोविंद की अंतिम ज्ञात तिथि 934 ई. है। इससे लगता है कि उसके शासनकाल का अंत 935–936 ई. के आसपास हुआ होगा।

अमोघवर्ष तृतीय (936–939 ई.)

गोविंद चतुर्थ को अपदस्थ कर अमोघवर्ष तृतीय लगभग 936 ई. में मान्यखेट के राष्ट्रकूट राजसिंहासन पर बैठा। उसका वास्तविक नाम बड्डेग था। उसका विवाह कलचुरि शासक युवराज प्रथम की पुत्री कुंडकदेवी के साथ हुआ था। उसके अनेक पुत्र थे, जिनमें कृष्ण तृतीय ज्येष्ठ था। अन्य पुत्रों में जगत्तुंग, निरुपम तथा खोट्टिग आदि थे। अमोघवर्ष तृतीय की पुत्री रेवकनिम्मडि थी, जिसका विवाह गंगराज राजमल्ल तृतीय के भाई बुतुग के साथ हुआ था।

सिंहासनारोहण के अवसर पर बड्डेग ने अमोघवर्ष की उपाधि धारण की और इसी नाम से वह प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने श्रीपृथ्वीवल्लभ, महाराजाधिराज, परमेश्वर तथा परमभट्टारक की उपाधियाँ भी धारण कीं।

अमोघवर्ष तृतीय धार्मिक प्रवृत्ति का शासक था। वह परम शैव था। उसने शिव के कई मंदिरों का निर्माण करवाया और ब्राह्मणों आदि को पर्याप्त दान दिया। वह शासन की अपेक्षा ब्रह्म-चिंतन में अधिक रुचि रखता था। आध्यात्मिक क्रियाओं में उसकी व्यस्तता के कारण शासन के कार्य का संचालन उसके योग्य पुत्र एवं युवराज कृष्ण तृतीय ने किया।

अमोघवर्ष तृतीय की सैनिक उपलब्धियाँ

अमोघवर्ष तृतीय के शासनकाल में राष्ट्रकूटों ने जो सैनिक सफलताएँ प्राप्त कीं, उनका संपूर्ण श्रेय उसके पुत्र कृष्ण तृतीय को ही दिया जाता है। 940 ई. के देवली ताम्रलेख में उसकी तुलना कुमार से की गई है। कृष्ण तृतीय के प्रभाव के संबंध में लेखों में कहा गया है कि पूर्वी एवं पश्चिमी समुद्रों के बीच शासन करने वाले सभी सामंत कृष्ण तृतीय की आज्ञा मानते थे और वह स्वयं अपने पिता का आज्ञाकारी पुत्र था।

गंगवाड़ी के बुतुग द्वितीय की सहायता

अमोघवर्ष तृतीय के शासनकाल में उसके आज्ञाकारी पुत्र कृष्ण तृतीय ने अपने बहनोई गंग बुतुग द्वितीय को गंग सिंहासन पर आसीन करने के लिए राजमल्ल को पदच्युत करने की योजना बनाई। देवली लेख से पता चलता है कि उसने गंगवाड़ी के शासक राजमल्ल के सामंत नोलंबवंशीय दंतिग तथा बप्पुग का युद्धभूमि में वध किया और अंततः राजमल्ल भी वीरगति को प्राप्त हुआ। इस प्रकार कृष्ण तृतीय ने राजमल्ल को पराजित कर अपने संबंधी बुतुग द्वितीय को 937 ई. में गंगवाड़ी का राजा बनाया। देवली लेख के आधार पर अल्तेकर का अनुमान है कि कृष्ण तृतीय ने युवराज के रूप में ही बुतुग को गंग सिंहासन पर आसीन किया था।

कलचुरियों के विरुद्ध अभियान

अमोघवर्ष तृतीय और कृष्ण तृतीय दोनों का विवाह चेदि राजकुमारियों के साथ हुआ था। इसके बावजूद युवराज कृष्ण तृतीय ने 938 ई. के लगभग अपने पुराने संबंधी कलचुरि चेदियों पर आक्रमण किया और उन्हें पराजित किया। देवली पत्र से स्पष्ट है कि कृष्ण तृतीय ने अपनी माता एवं पत्नी के अग्रजों को पराजित किया था। इसकी पुष्टि श्रवणबेलगोला लेख से भी होती है।

बुंदेलखंड पर आक्रमण

इसके बाद कृष्ण तृतीय ने बुंदेलखंड पर आक्रमण कर गुर्जर-प्रतिहारों को पराजित किया और चंदेल राज्य के कालंजर तथा चित्रकूट के दुर्गों पर अधिकार कर लिया। बघेलखंड से उपलब्ध कृष्ण तृतीय के जूरा लेख में उसे परमभट्टारक, परमेश्वर और महाराजाधिराज की उपाधि दी गई है। देवली पत्र के आधार पर अल्तेकर का अनुमान है कि कृष्ण तृतीय ने युवराज के रूप में ही कालंजर एवं चित्रकूट के दुर्गों को अधिकृत किया था।

इस प्रकार स्पष्ट है कि कृष्ण तृतीय ने अपने पिता के शासनकाल में युवराज के रूप में गंगवाड़ी, चेदि तथा बुंदेलखंड के विरुद्ध सैनिक अभियान कर अपनी योग्यता और वीरता की धाक जमा ली थी।

अमोघवर्ष तृतीय ने केवल तीन वर्ष (संभवतः 936–939 ई.) तक शासन किया। उसकी मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र और युवराज कृष्ण तृतीय 939 ई. में राष्ट्रकूट राजवंश का राजा बना।

महत्त्वपूर्ण FAQ

1. अमोघवर्ष द्वितीय का शासनकाल कितना था?

अमोघवर्ष द्वितीय ने लगभग एक वर्ष (929–930 ई.) तक शासन किया। वह इंद्र तृतीय का ज्येष्ठ पुत्र था।

2. गोविंद चतुर्थ ने कब और कैसे राष्ट्रकूट सिंहासन प्राप्त किया?

गोविंद चतुर्थ लगभग 930 ई. में सिंहासन पर बैठा। संभावना है कि उसने अपने बड़े भाई अमोघवर्ष द्वितीय को अपदस्थ कर सत्ता प्राप्त की थी।

3. गोविंद चतुर्थ के पतन के प्रमुख कारण क्या थे?

उसकी विलासिता, प्रशासन के प्रति उदासीनता, सामंतों एवं मंत्रियों की नाराजगी और वेमुलवाड़ के सामंत अरिकेशरि से संघर्ष उसके पतन के प्रमुख कारण थे। अंततः सामंतों के समर्थन से अमोघवर्ष तृतीय ने उसे अपदस्थ कर दिया।

4. अमोघवर्ष तृतीय का वास्तविक नाम क्या था और उसका शासनकाल कितना था?

अमोघवर्ष तृतीय का वास्तविक नाम बड्डेग था। उसने लगभग 936–939 ई. तक शासन किया। वह धार्मिक प्रवृत्ति का शासक था और शासन का अधिकांश कार्य उसके पुत्र एवं युवराज कृष्ण तृतीय ने संभाला।

5. अमोघवर्ष तृतीय के शासनकाल में कृष्ण तृतीय की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थीं?

कृष्ण तृतीय ने युवराज के रूप में गंगवाड़ी के राजमल्ल को पराजित कर बुतुग द्वितीय को सिंहासन पर बैठाया, कलचुरियों को पराजित किया तथा बुंदेलखंड में कालंजर और चित्रकूट पर अधिकार किया। 939 ई. में अमोघवर्ष तृतीय की मृत्यु के बाद कृष्ण तृतीय राष्ट्रकूट शासक बना।

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