पाल राजवंश (The Pala Dynasty)

पाल राजवंश (The Pala Dynasty)
पाल राजवंश (750–1200 ई.) आठवीं शती के मध्य में भारत के पूर्वी भाग में जिस […]

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पाल राजवंश (750–1200 ई.)

आठवीं शती के मध्य में भारत के पूर्वी भाग में जिस शक्तिशाली और महत्त्वपूर्ण साम्राज्य की स्थापना हुई, उसे भारतीय इतिहास में पाल साम्राज्य के नाम से जाना जाता है। पाल राजवंश के शासकों ने लगभग 750 ई. से लेकर 12वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक बंगाल तथा उसके आसपास के क्षेत्रों पर शासन किया। यद्यपि पाल वंश का संस्थापक गोपाल (लगभग 750–770 ई.) था, किंतु गोपाल के उत्तराधिकारियों ने पाल वंश की प्रतिष्ठा को चरम पर पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस विशाल साम्राज्य का विस्तार बंगाल और बिहार से लेकर समय-समय पर कन्नौज तक हुआ। पालवंशीय शासकों ने अपनी राजनीतिक एवं सैनिक उपलब्धियों के साथ-साथ बंगाल को सांस्कृतिक रूप से भी सशक्त बनाने का हरसंभव प्रयास किया। दरअसल, पाल वंश के अधिकांश शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, जिन्होंने बौद्ध धर्म के उत्थान के लिए अनेक सराहनीय कार्य किए। पाल शासकों के संरक्षण में बौद्ध धर्म से संबंधित अनेक मठों, चैत्यों और विहारों का निर्माण हुआ, जिससे स्थापत्य एवं मूर्तिकला की उन्नति हुई। यही नहीं, पाल राजाओं ने अनेक शिव मंदिरों का भी निर्माण करवाया और शिक्षा के विकास के लिए प्रमुख शिक्षा-केंद्रों एवं महाविहारों को संरक्षण प्रदान किया। अरब यात्री सुलेमान ने पाल शासक को ‘रूहमा’ अथवा ‘धर्मा’ जैसे नामों से संबोधित किया है।

ऐतिहासिक स्रोत

पाल वंश के इतिहास की जानकारी समकालीन साहित्य एवं अभिलेखों से होती है। पालकालीन अभिलेखों में धर्मपाल का खालिमपुर ताम्रपत्र, देवपाल का मुंगेर ताम्रपत्र, नारायणपाल का भागलपुर ताम्रपत्र एवं बादल स्तंभलेख, तथा महीपाल प्रथम के बानगढ़ एवं सारनाथ अभिलेख विशेष रूप से उपयोगी हैं। साथ ही, समकालीन गुर्जर-प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट अभिलेखों से भी पाल वंश के इन राजवंशों के साथ संबंधों की जानकारी मिलती है। अभिलेखों के अतिरिक्त, संध्याकरनंदी के ‘रामचरित’ से भी पाल वंश के इतिहास पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। तिब्बती इतिहासकार तारानाथ की रचनाओं से भी पाल शासकों तथा बौद्ध धर्म के संरक्षण के संबंध में उपयोगी जानकारी प्राप्त होती है। अरब यात्रियों के विवरण भी पालकालीन राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति को समझने में सहायक हैं।

पालों की उत्पत्ति

पाल वंश की उत्पत्ति तथा उनके वंशजों के विषय में कोई स्पष्ट एवं निर्विवाद प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। खालिमपुर अभिलेख में गोपाल के पिता का नाम वप्पट और पितामह का नाम दायितविष्णु वर्णित है, किंतु अन्य किसी समकालीन अभिलेख में इनके संबंध में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती है। कुछ इतिहासकारों ने पाल राजाओं को पूर्वी बंगाल के बौद्ध शासक राजभट्ट से जोड़ने का प्रयास किया है। पाल शासकों की सामाजिक उत्पत्ति के संबंध में भी इतिहासकारों में मतभेद हैं। आरंभ में कुछ साहित्यिक स्रोतों के आधार पर यह धारणा व्यक्त की गई कि पाल किसी निम्न अथवा अप्रशस्त कुल से उत्पन्न हुए थे। व्यासचरित में उन्हें ‘हीन क्षत्रिय’ तथा आर्यमंजुश्रीमूलकल्प में ‘दासकुल’ से संबंधित बताया गया है। किंतु इन साहित्यिक उल्लेखों को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं है। बाद के समय में जब पाल शासक एक प्रमुख राजनीतिक सत्ता के रूप में स्थापित हुए, तो उनकी क्षत्रिय पहचान को स्वीकार करने के प्रयास हुए। कुछ बाद की परंपराओं में पालों को सूर्यवंशी अथवा सूर्यकुल से भी जोड़ा गया है। अतः पालों की वास्तविक जातीय एवं वंशगत उत्पत्ति अभी भी निश्चित रूप से स्थापित नहीं है।

बंगाल की राजनीतिक स्थिति

पूर्वी भारत में स्थित बंगाल को सशक्त एवं सुदृढ़ बनाने में पाल शासकों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बंगाल छठी शताब्दी ईस्वी के पूर्वार्द्ध में विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के अधीन रहा था। नंदों और मौर्यों के समय में बंगाल का एक बड़ा भाग मगध साम्राज्य के प्रभाव क्षेत्र में था। मगध की केंद्रीय सत्ता शक्तिशाली होने पर बंगाल के अनेक क्षेत्रों पर उसका अधिकार या प्रभाव बना रहता था। छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में गौड़ अथवा बंगाल ने स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता का रूप धारण कर लिया और गुप्त साम्राज्य से पृथक् हो गया। गुप्तों की सत्ता समाप्त होने के पश्चात् उत्तर भारत में हर्षवर्धन का वर्चस्व स्थापित हुआ।

हर्षवर्धन का समकालीन बंगाल का शासक गौड़वंशीय शशांक था, जिसने बंगाल को एक सुदृढ़ राजनीतिक शक्ति बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि सम्राट हर्ष और कामरूप के शासक भास्करवर्मन ने गौड़ाधिपति की शक्ति को रोकने का बहुत प्रयास किया और उसे पराजित करने की भी चेष्टा की, फिर भी उसके जीवनकाल में वे उसकी शक्ति को निर्णायक रूप से समाप्त नहीं कर सके। गौड़ नरेश शशांक की मृत्यु के पश्चात् बंगाल की राजनीतिक एकता और केंद्रीय सत्ता कमजोर हो गई, जिससे पूरा बंगाल अराजकता एवं अशांति की चपेट में आ गया। हर्षवर्धन ने भी बंगाल के कुछ क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित किया। तत्पश्चात् आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में बंगाल के विभिन्न भागों पर अनेक स्थानीय शक्तियों का अधिकार स्थापित हुआ। कश्मीर के नरेश ललितादित्य मुक्तापीड और कन्नौज नरेश यशोवर्मन ने भी बंगाल के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप किया।

मगध के परवर्ती गुप्त नरेशों का भी बंगाल के कुछ क्षेत्रों पर प्रभाव था, किंतु यह अधिकार प्रभावी एवं स्थायी नहीं था। कामरूप की शक्तियों ने भी समय-समय पर बंगाल की राजनीति में हस्तक्षेप किया। राजनीतिक एकता एवं केंद्रीय शक्ति के अभाव में बंगाल अराजकता एवं अव्यवस्था का केंद्र बन गया, जिससे मत्स्य-न्याय की स्थिति उत्पन्न हुई। अराजकता और मत्स्य-न्याय से त्रस्त बंगाल की जनता अथवा प्रमुख सामंतों ने लगभग 750 ई. में गोपाल को अपना राजा चुना। इस प्रकार बंगाल में पाल वंश की स्थापना हुई।

गोपाल (लगभग 750–770 ई.)

आठवीं शताब्दी के मध्य में गोपाल ने बंगाल का शासन सँभाला और लंबे समय से चली आ रही अराजकता तथा अव्यवस्था को समाप्त कर बंगाल में शांति एवं राजनीतिक स्थिरता स्थापित की। बौद्ध इतिहासकार तारानाथ तथा धर्मपाल के खालिमपुर ताम्रपत्र में वर्णित है कि मत्स्य-न्याय से छुटकारा पाने के लिए प्रकृतियों अर्थात् प्रमुख जनों ने गोपाल को राजा बनाया। यद्यपि राजा के पद पर गोपाल का आधुनिक अर्थों में कोई लोकतांत्रिक चुनाव नहीं हुआ था, लेकिन इतना निश्चित है कि तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में विभिन्न शक्तिशाली वर्गों की सहमति से उसका राज्यारोहण हुआ था। संभवतः उसका किसी प्रतिष्ठित राजवंश से स्पष्ट संबंध नहीं था और वह स्थानीय राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा था।

पाल वंश के अभिलेखों में गोपाल को महान विजेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है और यह कहा गया है कि उसने समुद्रपर्यंत पृथ्वी पर अधिकार कर लिया था। किंतु इस प्रकार के प्रशस्तिपरक दावों को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में सावधानी से स्वीकार करना चाहिए। गोपाल की राजनीतिक और सैनिक उपलब्धियों के विषय में विस्तृत प्रमाणित साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। संध्याकरनंदी के ‘रामचरित’ से संकेत मिलता है कि गोपाल का संबंध मूलतः वारेंद्र अर्थात् उत्तरी बंगाल से था। संभवतः गोपाल ने धीरे-धीरे बंगाल के विस्तृत क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया और एक संगठित राजनीतिक सत्ता की नींव रखी। गोपाल की राजनीतिक उपलब्धियों और सुशासन का लाभ उसके उत्तराधिकारियों ने उठाया और वे पाल राज्य को तत्कालीन भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में स्थापित करने में सफल रहे। गोपाल के सुशासन की तुलना पृथु और सगर जैसे आदर्श शासकों के शासन से की गई है।

गोपाल बौद्ध धर्म का अनुयायी था। तिब्बती परंपरा के अनुसार उसने ओदंतपुरी (उदंतपुरी) में एक प्रसिद्ध बौद्ध महाविहार की स्थापना करवाई। ओदंतपुरी वर्तमान बिहार शरीफ के निकट स्थित था और आगे चलकर बौद्ध शिक्षा का महत्त्वपूर्ण केंद्र बना। आर्यमंजुश्रीमूलकल्प में गोपाल को अनेक विहारों, चैत्यों, उद्यानों एवं जलाशयों के निर्माण का श्रेय दिया गया है। गोपाल की मृत्यु लगभग 770 ई. के आसपास हुई।

धर्मपाल (लगभग 770–810 ई.)

गोपाल के बाद उसका पुत्र धर्मपाल लगभग 770 ई. में पाल वंश की गद्दी पर बैठा, जिसने बंगाल को एक सुव्यवस्थित एवं शक्तिशाली राज्य के रूप में संगठित किया। वास्तव में पाल वंश की राजनीतिक महत्ता को व्यापक रूप से स्थापित करने का श्रेय धर्मपाल को ही दिया जाता है। उसके राज्यारोहण की निश्चित तिथि का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। धर्मपाल के समकालीन गुर्जर-प्रतिहार शासकों वत्सराज और नागभट्ट द्वितीय तथा राष्ट्रकूट शासकों ध्रुव और गोविंद तृतीय के साथ उसके संबंधों के आधार पर उसकी शासनावधि निर्धारित की जाती है।

धर्मपाल धार्मिक प्रवृत्ति का शासक था और अपने पिता की भाँति बौद्ध धर्म का अनुयायी था, फिर भी राजनीतिक दृष्टि से वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था। बंगाल को उत्तरी भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों की श्रेणी में स्थापित करने का श्रेय धर्मपाल को ही दिया जाता है। धर्मपाल के समय उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति काफी जटिल हो चुकी थी। तत्कालीन उत्तर भारत में कन्नौज राजनीतिक दृष्टि से सर्वप्रमुख नगर था। कन्नौज गंगा के महत्त्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग पर स्थित था, जिससे वह राजनीतिक एवं आर्थिक दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण था। उत्तर भारत की प्रमुख शक्तियाँ कन्नौज पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहती थीं। कन्नौज के लिए प्रसिद्ध त्रिकोणात्मक संघर्ष धर्मपाल के समय ही प्रारंभ हुआ।

धर्मपाल का समकालीन कन्नौज का शासक इंद्रायुध था। धर्मपाल के प्रतिद्वंद्वी के रूप में राजपूताना और मालवा के क्षेत्र में गुर्जर-प्रतिहारों का उदय हो चुका था और दक्षिण भारत के दक्कन क्षेत्र में राष्ट्रकूट अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ा रहे थे। इन प्रतिद्वंद्वी शक्तियों का उत्तर भारत में वर्चस्व स्थापित करने के लिए धर्मपाल से संघर्ष होना स्वाभाविक था।

त्रिकोणात्मक संघर्ष

पालवंशीय धर्मपाल के प्रतिहार प्रतिद्वंद्वी वत्सराज ने धर्मपाल पर आक्रमण कर उसे गंगा-यमुना दोआब के किसी क्षेत्र में पराजित किया। राधनपुर अभिलेख से पता चलता है कि वत्सराज ने गौड़ के राजा का राजकीय ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया और उसके दो श्वेत राजछत्रों को अपने अधिकार में ले लिया। परंतु वत्सराज को राष्ट्रकूट शासक ध्रुव से पराजित होना पड़ा और वह राजपूताना के रेगिस्तानी क्षेत्र की ओर पीछे हट गया। इसके बाद ध्रुव ने पाल नरेश धर्मपाल को भी पराजित किया और दक्षिण की ओर लौट गया। राष्ट्रकूट ध्रुव द्वारा वत्सराज की पराजय का धर्मपाल ने भरपूर लाभ उठाया और कन्नौज पर आक्रमण कर वहाँ के शासक इंद्रायुध को हटाकर चक्रायुध को अपने अधीन शासक के रूप में स्थापित किया।

पाल वंश के अभिलेखों में वर्णित है कि धर्मपाल ने कन्नौज में एक भव्य दरबार का आयोजन किया था, जिसमें भोज, मत्स्य, मद्र, कुरु, यदु, यवन, अवंति, गंधार और कीर आदि क्षेत्रों के शासक सम्मिलित हुए थे। खालिमपुर अभिलेख से पता चलता है कि विभिन्न शासकों ने धर्मपाल की अधिसत्ता स्वीकार की थी। इस प्रकार धर्मपाल ने उत्तर भारत में व्यापक राजनीतिक प्रभाव स्थापित किया। 11वीं शताब्दी के गुजरात के कवि सोड्ढल ने धर्मपाल को ‘उत्तरापथस्वामी’ की उपाधि से विभूषित किया है।

धर्मपाल उत्तर भारत में अपने द्वारा स्थापित राजनीतिक प्रभुत्व को स्थायी रूप से बनाए नहीं रख सका। शीघ्र ही उसे एक और चुनौती का सामना करना पड़ा। वत्सराज के उत्तराधिकारी प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज को विजित कर चक्रायुध को वहाँ से हटा दिया। चक्रायुध की सहायता के लिए आए धर्मपाल को नागभट्ट द्वितीय ने संभवतः मुंगेर के निकट एक युद्ध में पराजित किया। किंतु एक बार फिर राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय ने नागभट्ट द्वितीय को पराजित कर दिया। इसके बाद धर्मपाल और चक्रायुध ने गोविंद तृतीय की अधीनता स्वीकार की। किंतु गोविंद तृतीय के दक्षिण लौटने के बाद धर्मपाल ने पुनः कन्नौज पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया और अपने जीवन के अंतिम समय तक उत्तरी भारत की राजनीति में प्रभावशाली बना रहा।

वास्तव में धर्मपाल एक सुयोग्य और कर्मनिष्ठ शासक था। उसका प्रत्यक्ष राज्य बंगाल और बिहार के विस्तृत क्षेत्रों में था, जबकि कन्नौज का शासक चक्रायुध उसके संरक्षण में शासन करता था। उत्तर भारत के अनेक शासकों ने समय-समय पर उसकी प्रभुता स्वीकार की। तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के अनुसार धर्मपाल का साम्राज्य पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में जालंधर तथा उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विंध्य पर्वत तक विस्तृत था। संभव है कि तारानाथ का यह विवरण अत्युक्तिपूर्ण हो, किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि धर्मपाल ने उत्तरी भारत के बड़े भूभाग पर अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित किया था। अपनी महानता के अनुरूप उसने ‘महाराजाधिराज’, ‘परमेश्वर’ और ‘परमभट्टारक’ जैसी उपाधियाँ धारण की थीं।

धर्मपाल बौद्ध धर्म का एक उत्साही अनुयायी था। उसके अभिलेखों में उसे ‘परमसौगत’ कहा गया है। उसने अपने राज्य में, विशेषकर विक्रमशिला में एक प्रसिद्ध महाविहार की स्थापना करवाई तथा सोमपुर महाविहार का निर्माण करवाया। उसने नालंदा को भी संरक्षण प्रदान किया। उसके समय में विक्रमशिला नालंदा की भाँति शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र बन गया। विक्रमशिला महाविहार के संरक्षण के लिए उसने अनेक ग्राम दान में दिए। उसने अपने दरबार में प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान हरिभद्र को संरक्षण प्रदान किया। उसके समय में धीमन और वितपाल ने पाल कला की एक विशिष्ट शैली को विकसित करने में योगदान दिया। धर्मपाल के समय अरब यात्री सुलेमान ने भारत की यात्रा की। धर्मपाल की मृत्यु लगभग 810 ई. के आसपास हुई।

देवपाल (लगभग 810–850 ई.)

धर्मपाल के बाद उसका पुत्र देवपाल पाल वंश की गद्दी पर बैठा, जो संभवतः पाल वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। गद्दी पर बैठने के बाद उसने अपने पिता की तरह विस्तारवादी नीति का अनुसरण किया और मुद्गगिरि (मुंगेर) को एक प्रमुख राजनीतिक केंद्र बनाया। देवपाल के अभिलेखों में उसे एक साम्राज्यवादी शासक के रूप में चित्रित किया गया है। संभवतः राष्ट्रकूट शक्ति में उत्पन्न परिस्थितियों का लाभ उठाकर देवपाल ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

मुंगेर से प्राप्त उसके ताम्रपत्र में दावा किया गया है कि उसकी विजयिनी सेनाओं ने विंध्य और कंबोज तक अभियान किए। अभिलेखीय प्रशस्तियों में उसकी विजय का विस्तार दक्षिण में सेतुबंध और उत्तर में हिमालय तक बताया गया है। किंतु इन दावों को प्रशस्तिपरक अतिशयोक्ति के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। देवपाल के एक अन्य अभिलेख में कहा गया है कि उसने अपने मंत्रियों दर्भपाणि तथा केदारमिश्र की नीतियुक्त मंत्रणा से प्रेरित होकर उत्कल को पराजित किया, हूणों का दर्प चूर्ण किया तथा द्रविड़ और गुर्जर राजाओं के गर्व को धूल-धूसरित कर दिया।

देवपाल के समय में भी कन्नौज के लिए पालों का संघर्ष गुर्जर-प्रतिहारों एवं राष्ट्रकूटों से होता रहा। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि बादल स्तंभलेख में जिस गुर्जर राजा के गर्व को चूर्ण करने का उल्लेख मिलता है, वह संभवतः गुर्जर-प्रतिहार शासक मिहिरभोज रहा होगा। देवपाल की सेनाओं ने दक्षिण में द्रविड़ प्रदेश तथा उत्तर-पूर्व में हिमालयी क्षेत्रों तक अभियान किए। उन्होंने राष्ट्रकूटों और गुर्जर-प्रतिहारों को अपने प्रभाव क्षेत्र से आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया। भागलपुर अभिलेख में वर्णित है कि देवपाल के भाई एवं सेनापति जयपाल के सामने उत्कल का राजा अपनी राजधानी छोड़कर भाग गया। प्राग्ज्योतिषपुर के राजा ने देवपाल की अधीनता स्वीकार कर ली और उसकी आज्ञाओं को सर्वोपरि मानते हुए अपने राज्य पर शासन किया। इस प्रकार देवपाल ने अपनी राजनीतिक और सैनिक प्रतिष्ठा का व्यापक विकास किया।

देवपाल के सुमात्रा और जावा के शासकों के साथ भी मैत्रीपूर्ण संबंध थे। उसकी राजसभा में जावा के शैलेंद्रवंशीय शासक बालपुत्रदेव ने अपना एक दूत भेजा था। नालंदा से प्राप्त ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि बालपुत्रदेव के अनुरोध पर देवपाल ने नालंदा में एक विहार की देखरेख के लिए राजगृह विषय में चार और गया विषय में एक गाँव दान में दिया। उसने बालपुत्रदेव को नालंदा के निकट एक बौद्ध विहार बनवाने की अनुमति दी और स्वयं भी इस कार्य के लिए सहायता प्रदान की।

इस प्रकार देवपाल के समय में बंगाल निश्चय ही एक शक्तिशाली राज्य था। अरब यात्री सुलेमान ने भी देवपाल को प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट शासकों की तुलना में शक्तिशाली बताया है। देवपाल भी अपने पिता की भाँति एक उत्साही बौद्ध था और ‘परमसौगत’ की उपाधि धारण करता था। उसने नालंदा एवं विक्रमशिला के विहारों को संरक्षण दिया और अनेक बौद्ध संस्थानों को दान प्रदान किया। बोधगया स्थित महाबोधि क्षेत्र के विकास में भी उसके संरक्षण का योगदान रहा। तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने देवपाल को बौद्ध धर्म का महान संरक्षक माना है। देवपाल शिक्षा एवं कला का उदार संरक्षक था। उसके समय में बंगाल में शिक्षा के साथ-साथ एक विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा के विकास को प्रोत्साहन मिला। उसके संरक्षण में वास्तुकला, मूर्तिकला तथा अन्य कलाओं को पनपने का अवसर मिला। उसकी राजसभा में बौद्ध कवि वज्रदत्त रहता था, जिसने ‘लोकेश्वरशतक’ नामक काव्य की रचना की थी। उसने नगरहार के प्रसिद्ध विद्वान वीरदेव को सम्मान दिया और उसे नालंदा महाविहार का अध्यक्ष बनाया। इस प्रकार देवपाल का शासनकाल बंगाल के इतिहास का एक उत्कृष्ट अध्याय है।

देवपाल के उत्तराधिकारियों शूरपाल प्रथम एवं विग्रहपाल प्रथम ने संभवतः अल्पकाल तक शासन किया। लगभग 855 ई. के आसपास विग्रहपाल ने अपने पुत्र के पक्ष में राज्य का परित्याग कर संन्यास धारण कर लिया।

नारायणपाल (लगभग 855–908 ई.)

विग्रहपाल के बाद नारायणपाल पाल वंश का शासक हुआ। उसने लगभग आधी शताब्दी तक शासन किया। नारायणपाल अपेक्षाकृत शांतिप्रिय और कमजोर शासक था। संभवतः उसके शासनकाल में राष्ट्रकूट शासक कृष्ण द्वितीय के साथ संघर्ष हुआ और उसे पराजय का सामना करना पड़ा। नारायणपाल के शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों में अंग तथा मगध उसके अधिकार में थे, किंतु शासन के अंतिम वर्षों में गुर्जर-प्रतिहार शासक मिहिरभोज तथा महेंद्रपाल के आक्रमणों के परिणामस्वरूप मगध तथा दक्षिणी बिहार के साथ-साथ उत्तरी बंगाल के अधिकांश क्षेत्रों पर पालों का नियंत्रण कमजोर हो गया। यही नहीं, उड़ीसा और असम के सामंतों ने भी विद्रोह कर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और राजसी उपाधियाँ धारण कीं। इस प्रकार नारायणपाल का राज्य कुछ समय के लिए बंगाल के सीमित क्षेत्र तक सिमट गया। किंतु बाद में प्रतिहार शक्ति के कमजोर होने का लाभ उठाकर नारायणपाल ने उत्तरी बंगाल और दक्षिणी बिहार के कुछ खोए हुए क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित किया। इस प्रकार अपने शासनकाल के अंतिम वर्षों में वह अपने पैतृक क्षेत्रों के एक बड़े भाग को पुनः प्राप्त करने में सफल रहा।

अपने कुछ पूर्वजों के विपरीत नारायणपाल शैव धर्म से भी प्रभावित था। भागलपुर दानपत्र के अनुसार उसने अनेक मंदिरों को दान दिया। उसने शैव संन्यासियों को अपने राज्य में आमंत्रित किया और मंदिरों के प्रबंधन का दायित्व पाशुपत आचार्यों को सौंपा। इन आचार्यों को उसने ग्रामदान भी दिए। इससे स्पष्ट होता है कि पाल शासकों की धार्मिक नीति व्यापक एवं सहिष्णु थी।

राज्यपाल (908–948 ई.)

नारायणपाल के बाद उसका पुत्र राज्यपाल लगभग 908 ई. में शासनाधिकारी हुआ। राज्यपाल के समय में राष्ट्रकूट शासक इंद्र तृतीय ने उत्तर भारत में अभियान किए और पाल राज्य को भी राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा। इसी काल में कंबोज अथवा कंबोज-संबंधित शक्तियों ने बंगाल के कुछ भागों पर अपना प्रभाव स्थापित किया। राज्यपाल की मृत्यु लगभग 948 ई. में हुई।

राज्यपाल के बाद गोपाल द्वितीय (948–960 ई.) गद्दी पर बैठा। उसकी माता का नाम भाग्यदेवी बताया जाता है, जिसे राष्ट्रकूट राजकुमारी माना गया है। संभवतः उसके समय में उत्तरी और पश्चिमी बंगाल के कुछ भाग पालों के हाथ से निकल गए और कंबोज शक्ति का प्रभाव बढ़ा। ऐसा प्रतीत होता है कि चंदेल शासक यशोवर्मन ने भी लगभग 953–954 ई. के आसपास पाल क्षेत्रों पर आक्रमण किया था। गोपाल द्वितीय के कुछ अभिलेख मिले हैं, जिनसे मगध और अंग पर उसके राजनीतिक अधिकार की पुष्टि होती है। उसकी मृत्यु की निश्चित तिथि ज्ञात नहीं है।

विग्रहपाल द्वितीय (960–988 ई.)

गोपाल द्वितीय के बाद विग्रहपाल द्वितीय (960–988 ई.) ने शासन किया। विग्रहपाल द्वितीय के समय तक पालों की शक्ति काफी कमजोर हो चुकी थी और बंगाल के अनेक क्षेत्रों पर उनका प्रभाव समाप्त हो गया था। इस समय पाल सत्ता मुख्यतः बिहार के कुछ क्षेत्रों तक सीमित रह गई थी। पाल साम्राज्य लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुँच चुका था कि इस वंश की गद्दी पर महीपाल प्रथम जैसा एक शक्तिशाली शासक आसीन हुआ।

पाल वंश का द्वितीय संस्थापक

महीपाल प्रथम (लगभग 988–1038 ई.)

महीपाल के राज्यारोहण के समय पाल साम्राज्य अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था। गोपाल द्वितीय एवं विग्रहपाल द्वितीय की निर्बलता के कारण पाल साम्राज्य का प्रभाव मुख्यतः मगध और बिहार के कुछ भागों तक सिमट गया था। सत्ता सँभालते ही महीपाल ने पाल साम्राज्य की खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने का हरसंभव प्रयास किया और काफी हद तक इसमें सफल हुआ। यही कारण है कि बंगाल के इतिहास में महीपाल प्रथम को पाल वंश का द्वितीय संस्थापक कहा जाता है।

महीपाल के अभिलेखों से पता चलता है कि शासक बनने के बाद उसने उत्तरी बंगाल के अनेक क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित किया तथा बंगाल के अन्य भागों में भी पाल सत्ता को पुनर्जीवित किया। बानगढ़ अभिलेख के अनुसार महीपाल ने अनधिकृत व्यक्तियों को राज्य से बाहर निकाल दिया और किरातों तथा कंबोजों की शक्ति को नष्ट किया। इस प्रकार गौड़, वारेंद्र, उत्तरी राढ़ तथा वंग-समतट जैसे क्षेत्रों पर पाल सत्ता का पुनः विस्तार हुआ।

महीपाल प्रथम के राज्यकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी चोलों का आक्रमण। लगभग 1022–1023 ई. में राजेंद्र चोल प्रथम ने उत्तर भारत की ओर एक व्यापक सैन्य अभियान किया, जिसके दौरान उसकी सेना ने उड़ीसा से होकर बंगाल और बिहार की ओर प्रस्थान किया। महीपाल प्रथम ने चोल आक्रमण का सामना किया, किंतु चोल सेना ने उसे पराजित किया। इस पराजय से पाल साम्राज्य को क्षति अवश्य पहुँची, किंतु चोल सेना स्थायी रूप से बंगाल पर अधिकार स्थापित नहीं कर सकी और महीपाल ने बाद में अपने अनेक क्षेत्रों पर पुनः नियंत्रण स्थापित कर लिया।

महीपाल प्रथम के शासनकाल के उत्तरार्द्ध में उसके राज्य की सीमाएँ कुछ संकुचित हुईं। संभवतः कलचुरि नरेश गांगेयदेव ने भी उसके राज्य के पश्चिमी भागों पर आक्रमण किया। इसके बावजूद मुजफ्फरपुर, पटना, गया और त्रिपुरा आदि क्षेत्रों से प्राप्त अभिलेखों से पता चलता है कि महीपाल का राज्य पर्याप्त विस्तृत था। सारनाथ अभिलेख (1026 ई.) काशी क्षेत्र पर उसके अधिकार का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है। इस प्रकार महीपाल अपने पूर्वजों द्वारा खोए गए अनेक क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित कर पाल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित करने में सफल रहा। यद्यपि चोलों एवं कलचुरियों के आक्रमणों के कारण महीपाल उत्तर भारत की राजनीति में निरंतर सक्रिय नहीं रह सका, तथापि धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान था।

महीपाल बौद्ध धर्म का अनुयायी था। उसके काल में बौद्ध दार्शनिक अतीश दीपंकर श्रीज्ञान के नेतृत्व में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का कार्य हुआ और बाद में अतीश तिब्बत गए। एक निर्माता के रूप में महीपाल प्रथम ने अनेक धार्मिक एवं स्थापत्य कार्य करवाए। उसने बनारस, सारनाथ, बोधगया और नालंदा में अनेक चैत्यों, बौद्ध विहारों एवं अन्य धार्मिक संरचनाओं के जीर्णोद्धार तथा निर्माण को संरक्षण दिया। नालंदा के एक विशाल बौद्ध मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य उसके शासनकाल में हुआ। महीपाल ने सारनाथ में धर्मचक्रप्रवर्तन स्थल का जीर्णोद्धार करवाया तथा वहाँ स्थित बौद्ध स्मारकों के संरक्षण में योगदान दिया। उसके इन कार्यों में स्थिरपाल और बसंतपाल ने सहायता की थी। बंगाल की लोकपरंपराओं में आज भी महीपाल के नाम से संबंधित अनेक अनुश्रुतियाँ मिलती हैं।

पाल वंश की अवनति

महीपाल की मृत्यु के पश्चात् पाल वंश की अवनति की प्रक्रिया पुनः आरंभ हो गई। महीपाल के उत्तराधिकारी उसके पुत्र नयपाल (लगभग 1038–1055 ई.) ने लगभग 15 वर्षों तक शासन किया। तिब्बती अनुश्रुतियों से पता चलता है कि नयपाल को कलचुरि-चेदि नरेश गांगेयदेव के उत्तराधिकारी लक्ष्मीकर्ण के साथ दीर्घकालीन संघर्ष में उलझना पड़ा। युद्ध के प्रारंभ में कलचुरि सेनाओं को सफलता मिली और उन्होंने अनेक बौद्ध स्थलों को क्षति पहुँचाई, किंतु बाद में कलचुरि सेनाओं को नयपाल से पराजित होना पड़ा। अंततः महाबोधि विहार के भिक्षु दीपंकर श्रीज्ञान के माध्यम से पालों और कलचुरियों के बीच संधि हुई और लक्ष्मीकर्ण की पुत्री यौवनश्री का विवाह नयपाल के पुत्र विग्रहपाल से कर दिया गया।

विग्रहपाल तृतीय (लगभग 1055–1070 ई.)

नयपाल के बाद उसका पुत्र विग्रहपाल तृतीय पाल वंश का राजा हुआ। विग्रहपाल के काल में भी कलचुरि शासक कर्ण ने पाल क्षेत्रों पर आक्रमण किया। ‘रामचरित’ में कहा गया है कि विग्रहपाल ने कर्ण को पराजित किया था। इस काल में बंगाल और उसके आसपास के क्षेत्रों में अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ सक्रिय थीं और पालों को लगातार संघर्ष करना पड़ा। उड़ीसा की शक्तियों तथा अन्य क्षेत्रीय शासकों ने भी पाल सत्ता को चुनौती दी। किंतु अभिलेखों से पता चलता है कि विग्रहपाल तृतीय का अब भी गौड़ (बंगाल) और मगध के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार था।

विग्रहपाल तृतीय भी बौद्ध धर्मानुयायी था, लेकिन वह धर्मसहिष्णु शासक था। उसने सूर्यग्रहण एवं चंद्रग्रहण के अवसर पर गंगा में स्नान किया और ब्राह्मणों को ग्रामदान दिया। इससे उसकी धार्मिक उदारता का पता चलता है। विग्रहपाल की मृत्यु के पश्चात् पाल साम्राज्य के पतन की गति तेज हो गई।

विग्रहपाल के तीन पुत्र थे—महीपाल द्वितीय, शूरपाल द्वितीय और रामपाल। विग्रहपाल की मृत्यु के बाद उसके तीनों पुत्रों के बीच उत्तराधिकार के लिए संघर्ष आरंभ हो गया। महीपाल द्वितीय ने अपने दोनों भाइयों—शूरपाल तथा रामपाल—को बंदी बना लिया और स्वयं सिंहासन पर बैठा। किंतु महीपाल द्वितीय (लगभग 1070–1075 ई.) के समय राज्य में अशांति, अराजकता और अव्यवस्था फैली रही। इस अराजकता का लाभ उठाकर महीपाल के गया क्षेत्र के सामंत विश्वादित्य तथा ढेक्करी के शासक ईश्वरघोष ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। इसी बीच कैवर्त समुदाय के सरदार दिव्य ने भी महीपाल के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। उसने महीपाल की हत्या कर उत्तरी बंगाल पर अधिकार कर लिया। संयोग से रामपाल किसी प्रकार बंदीगृह से भाग निकला।

रामपाल (लगभग 1077–1120/1130 ई.)

‘रामचरित’ से पता चलता है कि महीपाल के पश्चात् उसके भाई रामपाल ने अपने समर्थकों की सहायता से बंगाल में पाल वंश के सिंहासन पर अधिकार कर लिया। यद्यपि शूरपाल के विषय में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, किंतु कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि शूरपाल ने लगभग दो वर्षों तक शासन किया था।

रामपाल पाल वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक था। कैवर्तों द्वारा उत्तरी बंगाल पर अधिकार कर लेने के पश्चात् रामपाल के अधिकार क्षेत्र में केवल मगध और राढ़ के कुछ भाग ही रह गए थे। किंतु रामपाल ने अपने पुत्रों, मंत्रियों और सहयोगी सामंतों की सहायता से कैवर्त शासक भीम को पराजित कर उत्तरी बंगाल के वारेंद्र क्षेत्र को पुनः अपने अधिकार में ले लिया। इसका विस्तृत वर्णन संध्याकरनंदी की रचना ‘रामचरित’ में मिलता है। इस ग्रंथ में संध्याकरनंदी ने स्वयं को वाल्मीकि और रामपाल को राम के रूप में प्रस्तुत करते हुए उसकी कैवर्त-विजय का वर्णन किया है।

रामपाल ने अपनी कैवर्त विजय की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए रामावती नामक नगर की स्थापना की और इस नगर को बौद्ध तथा हिंदू धार्मिक संरचनाओं से सुसज्जित करवाया। उसने उत्तरी बिहार और कामरूप के क्षेत्रों में भी अपना प्रभाव स्थापित किया। इसके बाद उसने दक्षिण-पश्चिम में कलिंग और पूर्व में कामरूप की ओर अभियान किए और अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया। संभवतः इसी समय गहड़वालों ने बिहार के पश्चिमी क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाया। रामपाल की मृत्यु की तिथि के संबंध में विद्वानों में मतभेद है; सामान्यतः उसका शासन 12वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक माना जाता है। कुछ परंपराओं में उसकी मृत्यु गंगा में डूबने से होने का उल्लेख मिलता है, किंतु इसे पूर्णतः निश्चित तथ्य के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं है। कुछ विद्वान रामपाल को पाल वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक मानते हैं। उसका पाल साम्राज्य की पुनर्प्रतिष्ठा का प्रयास अंततः स्थायी सिद्ध नहीं हुआ।

अभिलेखों से पता चलता है कि रामपाल के पश्चात् उसका पुत्र कुमारपाल सिंहासन पर बैठा। उसके समय में कामरूप के अधीनस्थ शासकों ने स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाए। कुमारपाल के उपरांत गोपाल तृतीय पाल वंश का शासक हुआ। उसके बाद मदनपाल ने शासन किया। मदनपाल के समय में पूर्वी बंगाल में सेन वंश ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। अपने शासन के अंतिम दिनों में मदनपाल का राज्य बिहार के सीमित क्षेत्र तक सिमट गया था।

मदनपाल के पश्चात् गोविंदपाल का नाम पाल वंश के अंतिम शासकों में मिलता है। उसका प्रभाव गया तथा उसके आसपास के सीमित क्षेत्र तक रह गया था। अंततः पाल शासकों की राजनीतिक दुर्बलता, चालुक्यों, कलचुरियों तथा अन्य समकालीन शक्तियों के आक्रमणों, स्थानीय सामंतों के विद्रोहों और सेन वंश के उत्कर्ष के कारण पाल साम्राज्य का पतन हो गया। इस प्रकार लगभग चार शताब्दियों तक बिहार और बंगाल के बड़े भाग पर प्रभाव बनाए रखने के बाद पाल सत्ता 12वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ऐतिहासिक मंच से धीरे-धीरे विलुप्त हो गई।

पाल शासन का महत्त्व

पाल राजवंश के शासकों ने लगभग चार शताब्दियों तक बंगाल तथा बिहार के विस्तृत क्षेत्रों पर शासन किया। इस दौरान पाल शासकों ने अपनी राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों के द्वारा भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण अध्याय का सृजन किया। गोपाल द्वारा स्थापित पाल साम्राज्य की राजनीतिक सत्ता का चरमोत्कर्ष धर्मपाल, देवपाल एवं महीपाल प्रथम के शासनकाल में देखने को मिलता है। इन शासकों ने बंगाल को एक शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया, परंतु इनके उत्तराधिकारियों के काल में पालों की स्थिति कमजोर होती गई और अनेक पाल नरेश नाममात्र के शासक रह गए। बाद में तत्कालीन नवोदित शक्तियों ने पाल साम्राज्य पर आक्रमण कर पाल वंश को पतन की ओर धकेल दिया। पालों का शासन न केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण था।

पाल वंश के शासकों ने कृषि के विकास के लिए सिंचाई के साधनों को प्रोत्साहित किया, व्यापार एवं वाणिज्य को बढ़ावा दिया और शिक्षा, कला तथा साहित्य को संरक्षण प्रदान किया। पाल वंश के अधिकांश शासक बौद्ध धर्मानुयायी थे। उन्होंने बौद्ध धर्म को न केवल राजकीय संरक्षण प्रदान किया, बल्कि उसके पुनरुत्थान में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पाल नरेशों ने संपूर्ण बंगाल और बिहार में अनेक चैत्यों, विहारों तथा बौद्ध मूर्तियों के निर्माण एवं संरक्षण को प्रोत्साहन दिया। पाल शासन के दौरान बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ अतीश दीपंकर श्रीज्ञान, कमलशील आदि विद्वानों ने तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। किंतु पाल नरेशों का धार्मिक दृष्टिकोण संकीर्ण नहीं था। उन्होंने ब्राह्मणों को भी दान-दक्षिणा देकर सम्मानित किया और हिंदू मंदिरों तथा धार्मिक संस्थानों को संरक्षण प्रदान किया।

पाल वंश के शासकों ने शिक्षा और साहित्य को भी संरक्षण प्रदान किया। शिक्षा के संरक्षण और प्रसार के लिए पालों ने ओदंतपुरी, सोमपुर तथा विक्रमशिला जैसे प्रमुख बौद्ध शिक्षा-केंद्रों को स्थापित अथवा संरक्षण प्रदान किया, जिनका यश दूर-दूर तक फैला हुआ था। इस काल के प्रमुख संरक्षित विद्वानों में संध्याकरनंदी का नाम विशेष उल्लेखनीय है, जिसने ‘रामचरित’ नामक श्लेषात्मक काव्यग्रंथ की रचना की। अन्य विद्वानों में हरिभद्र, चक्रपाणि दत्त, वज्रदत्त आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। बौद्ध कवि वज्रदत्त ने देवपाल के समय में ‘लोकेश्वरशतक’ काव्य की रचना की थी।

पाल शासकों ने संस्कृत साहित्य को संरक्षण दिया और बंगाल की प्रारंभिक भाषायी एवं लिपिकीय परंपराओं के विकास के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान किया। पालकालीन अभिलेखों और पांडुलिपियों से उस समय की लिपि के विकास का भी पता चलता है, जिसने आगे चलकर बंगाली, असमिया और मैथिली जैसी पूर्वी भारतीय लिपि-परंपराओं के विकास में योगदान दिया। संभवतः हिंदू विधिशास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान जीमूतवाहन को भी पालोत्तर बंगाल की विद्वत् परंपरा से जोड़ा जाता है, यद्यपि उनके काल-निर्धारण के संबंध में मतभेद हैं।

पालों ने कला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और पाल कला को एक विशिष्ट रूप प्रदान किया। राजनीतिक अस्थिरता के वातावरण के बावजूद पालों द्वारा निर्मित या संरक्षित चैत्य, विहार, मंदिर एवं अन्य स्मारक इस बात के साक्षी हैं कि उनके समय में बिहार एवं बंगाल में स्थापत्य कला को उल्लेखनीय विकास प्राप्त हुआ। पाल कलाकार कांस्य मूर्तियों के निर्माण में विशेष रूप से सिद्धहस्त थे। पाल शासकों के काल में नालंदा, बोधगया और कुर्किहार मूर्तिकला के प्रमुख केंद्र बने। पालकालीन बौद्ध मूर्तिकला में बुद्ध, बोधिसत्त्वों, तारा तथा अन्य बौद्ध देवी-देवताओं की उत्कृष्ट प्रतिमाएँ निर्मित की गईं। पाल कला का प्रभाव नेपाल, तिब्बत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के बौद्ध कला-क्षेत्रों पर भी पड़ा। इस प्रकार पालों का शासन राजनीतिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि धार्मिक, शैक्षिक, साहित्यिक, कलात्मक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

महत्वपूर्ण FAQ

1. पाल वंश की स्थापना किसने और कब की थी?

पाल वंश की स्थापना गोपाल ने लगभग 750 ई. में की थी। बंगाल में व्याप्त अराजकता और मत्स्य-न्याय की स्थिति से मुक्ति पाने के लिए स्थानीय शक्तियों ने गोपाल को शासक चुना था।

2. पाल वंश के प्रमुख शासक कौन-कौन थे?

पाल वंश के प्रमुख शासकों में गोपाल, धर्मपाल, देवपाल, नारायणपाल, महीपाल प्रथम, नयपाल, विग्रहपाल तृतीय और रामपाल प्रमुख थे। धर्मपाल और देवपाल के शासनकाल में पाल साम्राज्य अपनी शक्ति के चरम पर पहुँचा।

3. पाल वंश के समय कौन-सा प्रमुख राजनीतिक संघर्ष हुआ था?

पालों, गुर्जर-प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों के बीच कन्नौज पर अधिकार के लिए त्रिकोणात्मक संघर्ष हुआ। धर्मपाल के समय यह संघर्ष विशेष रूप से तीव्र रहा।

4. धर्मपाल को पाल वंश का महत्त्वपूर्ण शासक क्यों माना जाता है?

धर्मपाल ने पाल साम्राज्य का व्यापक विस्तार किया और कन्नौज पर अपना प्रभाव स्थापित किया। उसने विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा सोमपुर महाविहार जैसे प्रमुख बौद्ध शिक्षा-केंद्रों को संरक्षण दिया। उसे ‘उत्तरापथस्वामी’ की उपाधि से भी संबोधित किया गया है।

5. देवपाल के शासनकाल की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थीं?

देवपाल पाल वंश का अत्यंत शक्तिशाली शासक था। उसने साम्राज्य का विस्तार किया, बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया तथा नालंदा और विक्रमशिला जैसे शिक्षा-केंद्रों को प्रोत्साहन दिया। उसके समय में पालों के सुमात्रा और जावा के शैलेंद्र शासकों से मैत्रीपूर्ण संबंध थे।

6. पाल वंश का द्वितीय संस्थापक किसे कहा जाता है और क्यों?

महीपाल प्रथम (988–1038 ई.) को पाल वंश का द्वितीय संस्थापक कहा जाता है। उसने पाल साम्राज्य की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया तथा बंगाल, बिहार और आसपास के क्षेत्रों में पाल सत्ता को मजबूत किया।

7. पाल शासकों का बौद्ध धर्म के विकास में क्या योगदान था?

पाल शासकों ने बौद्ध धर्म को व्यापक राजकीय संरक्षण दिया। उनके समय में विक्रमशिला, सोमपुर और औदंतपुरी जैसे प्रमुख बौद्ध शिक्षा-केंद्र विकसित हुए। अतिश, कमलशील और दीपंकर जैसे विद्वानों के माध्यम से बौद्ध धर्म का प्रभाव तिब्बत तक पहुँचा।

8. पाल वंश का पतन किन कारणों से हुआ?

पाल वंश के पतन के प्रमुख कारणों में दुर्बल उत्तराधिकारी, आंतरिक उत्तराधिकार संघर्ष, स्थानीय सामंतों के विद्रोह, कलचुरियों एवं चालुक्यों के आक्रमण तथा सेन वंश के उत्कर्ष को माना जाता है। अंततः 12वीं शताब्दी में पाल सत्ता बिहार के सीमित क्षेत्र तक सिमट गई और लगभग 1174 ई. के आसपास इसका अंत हो गया।

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