सेन राजवंश  (The Sen Dynasty)

बंगाल का सेन राजवंश  (The Sen Dynasty of Bengal)
सेन राजवंश 12वीं शताब्दी के प्रारंभ में बंगाल में सेन राजवंश ने अपना प्रभुत्व स्थापित […]

सेन राजवंश

12वीं शताब्दी के प्रारंभ में बंगाल में सेन राजवंश ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया और लगभग 128 वर्षों तक शासन किया। बंगाल के इस महत्त्वपूर्ण राजवंश की स्थापना सामंतसेन ने ‘राढ़’ नामक क्षेत्र में की थी। इसकी प्रारंभिक राजधानी नदिया थी, जो बाद में विक्रमपुर और लखनौती (गौड़) बनी। सेन राजवंश के उत्कर्षकाल में पूर्वी भारत के विस्तृत क्षेत्र, जिनमें बंगाल, बिहार, उड़ीसा तथा संभवतः असम के कुछ भाग सम्मिलित थे, पर उसका प्रभाव था। सेन शासकों के शासनकाल में अनेक देवालयों का निर्माण कराया गया। कहा जाता है कि बल्लालसेन ने ढाकेश्वरी मंदिर का निर्माण कराया था। गीतगोविंद के रचयिता प्रसिद्ध कवि जयदेव सेन शासक लक्ष्मणसेन के दरबार के प्रमुख विद्वानों में से एक थे। लक्ष्मणसेन ने अपने नाम पर ‘लक्ष्मण संवत्’ का प्रवर्तन किया था। सेन वंश के अभिलेख मुख्यतः संस्कृत में उत्कीर्ण हैं।

बंगाल के सेन वंश के संस्थापक सामंतसेन को अभिलेखों में कर्णाट क्षत्रिय कहा गया है। इससे संकेत मिलता है कि सेन वंश का मूलस्थान दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक, में था। 9वीं, 10वीं और 11वीं शताब्दियों में मैसूर तथा धारवाड़ क्षेत्र में कुछ जैन उपदेशकों के सेन वंश से संबंधित होने का उल्लेख मिलता है, किंतु बंगाल के सेनों और इन जैन उपदेशकों के परिवार के बीच प्रत्यक्ष संबंध का स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। फिर भी, अनेक प्रमाणों से यह संकेत मिलता है कि बंगाल के सेन शासकों का मूल निवास दक्षिण भारत में था। सेन शासक स्वयं को कर्णाट क्षत्रिय, ब्रह्म-क्षत्रिय और क्षत्रिय कहते थे तथा अपनी उत्पत्ति कर्नाट वंश के पौराणिक नायकों से जोड़ते थे।

पाल शासक देवपाल के समय दक्षिण भारत से आए कुछ लोगों को प्रशासन में महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त हुए थे। कालांतर में इनमें से कुछ अधिकारी शक्तिशाली होकर स्थानीय शासक बन गए और स्वयं को ‘राजपुत्र’ कहने लगे। इन्हीं में से किसी परिवार से बंगाल के सेन वंश के संस्थापक सामंतसेन के उदय की परंपरा मिलती है। उसने पाल साम्राज्य की कमजोर होती केंद्रीय सत्ता का लाभ उठाकर बंगाल में सेन सत्ता की नींव रखी। सेन शासक संभवतः मूलतः ब्राह्मण थे, किंतु सैनिक वृत्ति अपनाने के कारण बाद में क्षत्रिय माने जाने लगे। इसी कारण उन्हें ‘ब्रह्म-क्षत्रिय’ भी कहा गया है।

सामंतसेन

सेन वंश के संस्थापक सामंतसेन ने दक्षिण भारत के एक शासक, संभवतः द्रविड़ देश के शासक राजेंद्र चोल, को पराजित कर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाई। सामंतसेन के बाद उसका उत्तराधिकारी हेमंतसेन हुआ। हेमंतसेन के शासन के संबंध में विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है।

विजयसेन (लगभग 1096–1159 ई.)

हेमंतसेन के बाद उसका पुत्र तथा सामंतसेन का पौत्र विजयसेन सेन वंश का शासक बना। उसने अपने परिवार की राजनीतिक प्रतिष्ठा को सुदृढ़ किया और सेन वंश को एक स्वतंत्र एवं शक्तिशाली राजवंश के रूप में स्थापित किया। विजयसेन ने ‘अरिराजवृषभशंकर’, ‘परममाहेश्वर’, ‘परमेश्वर’, ‘महाराजाधिराज’ और ‘परमभट्टारक’ जैसी उपाधियाँ धारण कीं।

विजयसेन को अपने दीर्घ शासनकाल में अनेक युद्ध करने पड़े और उसे इनमें पर्याप्त सफलता मिली। उसकी विजयों का उल्लेख देवपाड़ा प्रशस्ति में मिलता है। इस प्रशस्ति की रचना कवि उमापतिधर ने की थी। विजयसेन की उपलब्धियों से प्रभावित होकर श्रीहर्ष ने भी उसकी प्रशंसा में विजयप्रशस्ति नामक काव्य की रचना की थी।

विजयसेन की राजनीतिक उपलब्धियों से ज्ञात होता है कि उसने बंगाल में वर्मन वंश की सत्ता का अंत किया, पाल शासक मदनपाल को उत्तरी बंगाल से हटाया और गौड़ पर अधिकार स्थापित किया। कहा जाता है कि उसने नान्यदेव को पराजित कर मिथिला पर अधिकार किया, गंगा के मार्ग से जलसेना द्वारा गहड़वालों के विरुद्ध अभियान चलाया, असम पर आक्रमण किया, उड़ीसा पर धावा बोला तथा कलिंग के शासक अनंतवर्मन चोडगंग के पुत्र राघव को पराजित किया।

रामपाल की मृत्यु के बाद विजयसेन ने पाल साम्राज्य के कमजोर होते क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित कर एक विस्तृत राज्य का निर्माण किया, जिसमें पूर्वी, पश्चिमी और उत्तरी बंगाल के क्षेत्र सम्मिलित थे। परंपरा के अनुसार विजयसेन ने दो प्रमुख राजधानियों की स्थापना की—विजयपुर, जो पश्चिमी बंगाल में स्थित थी, तथा विक्रमपुर, जो पूर्वी बंगाल में स्थित थी।

सैन्य विजयों के साथ-साथ विजयसेन ने अनेक सांस्कृतिक और धार्मिक कार्य भी किए। उसकी ‘अरिराजवृषभशंकर’ तथा ‘परममाहेश्वर’ उपाधियों से उसके शैव मतावलंबी होने का संकेत मिलता है। उसने वारेंद्री के देवपाड़ा में प्रद्युम्नेश्वर शिव का मंदिर बनवाया, एक झील का निर्माण कराया और विद्वान उमापतिधर को संरक्षण दिया। इन्हीं उपलब्धियों के कारण विजयसेन को सेन वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

बल्लालसेन (लगभग 1159–1179 ई.)

विजयसेन के बाद उसका पुत्र बल्लालसेन सेन वंश की गद्दी पर बैठा। उसने अपने पिता के शासनकाल में शासन-कार्य में सहयोग किया था। सिंहासन पर बैठने के बाद उसने अपने उत्तराधिकार में प्राप्त राज्य की रक्षा की और ‘परममाहेश्वर’, ‘घोड़ेश्वर’, ‘परमभट्टारक’, ‘निःशंकशंकर’ तथा ‘महाराजाधिराज’ जैसी उपाधियाँ धारण कीं।

लघुभारत तथा बल्लालचरित जैसे ग्रंथों से संकेत मिलता है कि बल्लालसेन का अधिकार मिथिला और उत्तरी बिहार तक था। इसके अतिरिक्त, उसके राज्य में वारेंद्र, राढ़, बागड़ी और बंगाल जैसे क्षेत्र सम्मिलित थे। परंपरा के अनुसार उसने गौड़पुर, सुवर्णग्राम और विक्रमपुर को प्रमुख प्रशासनिक केंद्रों के रूप में विकसित किया।

बल्लालसेन विद्वान और समाज-सुधारक शासक माना जाता है। उसे बंगाल में कुलीन प्रथा को व्यवस्थित करने का श्रेय दिया जाता है। उसने वर्ण-व्यवस्था तथा सामाजिक प्रतिष्ठा को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से कुलीनवाद को प्रोत्साहित किया। इसके परिणामस्वरूप विभिन्न जातियों में उपविभाजन की प्रक्रिया को बढ़ावा मिला, जो कालांतर में अधिक कठोर और जटिल होती गई।

बल्लालसेन स्वयं विद्वान था। कहा जाता है कि उसने अपने गुरु की सहायता से दानसागर की रचना की तथा अद्भुतसागर नामक ग्रंथ की रचना आरंभ की, जिसे वह पूरा नहीं कर सका। उसने अपने दरबार में अनेक विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया।

उसकी ‘घोड़ेश्वर’ और ‘निःशंकशंकर’ जैसी उपाधियों से उसके शैव मतावलंबी होने का संकेत मिलता है। जीवन के अंतिम समय में उसने संन्यास ग्रहण कर लिया था।

लक्ष्मणसेन (लगभग 1179–1206 ई.)

बल्लालसेन के बाद उसका पुत्र लक्ष्मणसेन सेन वंश का शासक बना। वह सेन वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक था। उसने बंगाल के विस्तृत क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा और लक्ष्मणवती अथवा लखनौती को प्रमुख राजधानी के रूप में विकसित किया। यह प्राचीन गौड़ के निकट स्थित थी। लक्ष्मणसेन ने अपने नाम पर ‘लक्ष्मण संवत्’ का भी प्रवर्तन किया।

अभिलेखों में लक्ष्मणसेन को कलिंग, असम, वाराणसी और प्रयाग की विजय का श्रेय दिया गया है तथा इन स्थानों पर विजय-स्तंभ स्थापित करने का उल्लेख मिलता है। किंतु लक्ष्मणसेन गहड़वाल शासक जयचंद्र का समकालीन था, जिसके अधिकार में वाराणसी और प्रयाग थे। इसलिए इन क्षेत्रों पर लक्ष्मणसेन की स्थायी विजय का दावा संदिग्ध या अतिशयोक्तिपूर्ण माना जाता है। संभवतः उसने असम और कलिंग में सैन्य अभियान चलाए थे।

मुस्लिम इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज के विवरण के अनुसार, लगभग 1203–04 ई. में मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने नदिया (नवद्वीप) पर आक्रमण किया। उस समय वृद्ध लक्ष्मणसेन पूर्वी बंगाल की ओर चला गया। बख्तियार खिलजी ने नदिया और बाद में लखनौती पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इस प्रकार सेन सत्ता का प्रमुख केंद्र बंगाल के पश्चिमी भाग से समाप्त हो गया, यद्यपि लक्ष्मणसेन के उत्तराधिकारियों ने पूर्वी बंगाल में कुछ समय तक शासन जारी रखा। बाद में देव वंश ने पूर्वी बंगाल में अपनी सत्ता स्थापित की।

लक्ष्मणसेन का शासन संस्कृत साहित्य के विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। वह स्वयं भी विद्वान था और उसे अपने पिता बल्लालसेन द्वारा आरंभ किए गए अद्भुतसागर को पूरा करने का श्रेय दिया जाता है।

लक्ष्मणसेन ने अपने दरबार में अनेक विद्वानों को संरक्षण दिया। उसकी राजसभा में जयदेव (गीतगोविंद), उमापतिधर, धोयी (पवनदूत), हलायुध (ब्राह्मणसर्वस्व) और श्रीहर्ष जैसे विद्वान प्रतिष्ठित थे। इनमें जयदेव, धोयी, उमापतिधर, हलायुध और श्रीहर्ष को परंपरा में उसके दरबार के प्रमुख विद्वानों के रूप में स्मरण किया जाता है। हलायुध विद्वान होने के साथ-साथ राजकीय पद पर भी कार्यरत था।

लक्ष्मणसेन की ‘परमभागवत’ उपाधि से स्पष्ट होता है कि वह अपने पूर्वजों की शैव परंपरा के विपरीत वैष्णव धर्म का अनुयायी था।

महत्त्वपूर्ण FAQ

1. सेन वंश की स्थापना किसने और कहाँ की थी?

सेन वंश की स्थापना सामंतसेन ने बंगाल के राढ़ क्षेत्र में की थी। सेन शासकों का मूल संबंध दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक, से माना जाता है।

2. सेन वंश का वास्तविक संस्थापक किसे माना जाता है?

विजयसेन को सेन वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उसने पालों की कमजोर होती सत्ता का लाभ उठाकर बंगाल में सेन शक्ति को सुदृढ़ किया और अपने राज्य का विस्तार किया।

3. बल्लालसेन की प्रमुख उपलब्धि क्या थी?

बल्लालसेन को बंगाल में कुलीन प्रथा को व्यवस्थित एवं प्रोत्साहित करने का श्रेय दिया जाता है। वह विद्वान शासक था तथा उसने दानसागर की रचना की और अद्भुतसागर की रचना आरंभ की।

4. लक्ष्मणसेन के दरबार के प्रमुख विद्वान कौन थे?

लक्ष्मणसेन के दरबार में जयदेव, धोयी, उमापतिधर, हलायुध और श्रीहर्ष जैसे प्रसिद्ध विद्वानों को संरक्षण प्राप्त था। जयदेव गीतगोविंद और धोयी पवनदूत के रचयिता थे।

5. सेन वंश का पतन कैसे हुआ?

लगभग 1203–04 ई. में बख्तियार खिलजी ने नदिया पर आक्रमण कर सेन सत्ता को गंभीर आघात पहुँचाया। वृद्ध लक्ष्मणसेन पूर्वी बंगाल चले गए। उनके उत्तराधिकारियों ने पूर्वी बंगाल में कुछ समय तक शासन किया, किंतु धीरे-धीरे सेन वंश का पतन हो गया।

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