गोविंद तृतीय (Govind III)

गोविंद तृतीय (Govind III)
गोविंद तृतीय (793–814 ई.) मुख्य लेख : राष्ट्रकूट राजवंश  ध्रुव प्रथम के कई पुत्र थे, […]

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गोविंद तृतीय (793–814 ई.)

मुख्य लेख : राष्ट्रकूट राजवंश 

ध्रुव प्रथम के कई पुत्र थे, जिनमें स्तंभ रणावलोक, कर्क सुवर्णवर्ष, गोविंद तृतीय तथा इंद्र के नाम स्पष्ट रूप से मिलते हैं। उसके चारों पुत्र योग्य एवं महत्त्वाकांक्षी थे और अपने पिता के शासनकाल में महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य कर रहे थे। स्तंभ गंगों की पराजय के बाद गंगवाड़ी के शासक के रूप में शासन कर रहा था, कर्क सुवर्णवर्ष खानदेश के प्रशासन को सँभाल रहा था तथा गोविंद और इंद्र अपने पिता के अभियानों में उसका सहयोग कर रहे थे।

ध्रुव धारावर्ष की मृत्यु के पश्चात् 793 ई. में उसका तीसरा पुत्र गोविंद तृतीय राजा हुआ। पैठण दानपत्र से स्पष्ट है कि स्वयं ध्रुव ने ही एक औपचारिक राज्याभिषेक के अवसर पर गोविंद को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया था। कर्क के सूरत दानपत्रों में भी कहा गया है कि गोविंद ने अपने पिता से युवराज पद ही नहीं, बल्कि सम्राट पद भी प्राप्त किया था—

राज्याभिषेककलशैरभिषिच्यदत्ताम्।
राजाधिराजपरमेश्वरतां स्वपित्रा।।

अपने पिता की मृत्यु के बाद गोविंद तृतीय पूर्ण रूप से राष्ट्रकूट राज्य के सिंहासन पर आसीन हुआ। सिंहासनारोहण के अवसर पर उसने प्रभूतवर्ष तथा जगत्तुंग की उपाधियाँ धारण कीं। इसके अलावा उसने श्रीवल्लभ, पृथ्वीवल्लभ, विमलादित्य, जनवल्लभ, कीर्तिनारायण तथा त्रिभुवनधवल जैसी उपाधियाँ भी धारण की थीं।

यद्यपि गोविंद तृतीय के राज्याभिषेक की सभी औपचारिकताएँ उसके पिता के समय में ही पूरी की जा चुकी थीं, फिर भी वह अपने बड़े भाई स्तंभ से सशंकित रहता था। इसलिए प्रारंभ में उसने साम और दाम की नीति का प्रयोग करके अपने सभी सामंतों, मंत्रियों और अधिकारियों को विभिन्न प्रकार से संतुष्ट कर उनका सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया। उसने अपने छोटे भाई इंद्र को दक्षिणी गुजरात का प्रशासक नियुक्त किया, जो उसका समर्थक था।

गोविंद तृतीय की उपलब्धियाँ

स्तंभ का विरोध

गोविंद का बड़ा भाई स्तंभ कुछ समय तक शांत रहा, किंतु राज्याधिकार से वंचित किए जाने के कारण वह अपनी सैनिक तैयारियों में लगा रहा। स्तंभ जानता था कि गोविंद को अकेले राजसिंहासन से अपदस्थ करना संभव नहीं है। इसलिए उसने दक्षिण के बारह राजाओं का एक संघ बनाया, जिसका नेतृत्व संभवतः कांची के पल्लव शासक दंतिवर्मन् ने किया था। इस संघ में सम्मिलित राजाओं का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है और नौसारी दानपत्र में उल्लिखित पांड्य, पल्लव, चोल, गंग, केरल, आंध्र, वेंगी, चालुक्य, मौर्य, गुर्जर, कोशल, अवंति तथा सिंहल जैसे तेरह राज्यों की सूची काल्पनिक प्रतीत होती है।

लगता है कि गोविंद तृतीय के विरोधी संघ में ऐसे पड़ोसी तथा सामंत शासक थे, जो उसके पिता ध्रुव की नीतियों से असंतुष्ट थे और अपना बदला लेना चाहते थे। इनमें नोलंबवाड़ी के चारुपोन्नेर, बनवासी के कत्तियिर तथा धारवाड़ के सामंत मारवर्श प्रमुख थे। संजन लेख से पता चलता है कि राज्य के कुछ उच्चाधिकारी भी स्तंभ का समर्थन कर रहे थे, क्योंकि वे ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण स्तंभ को ही राज्य का वैध उत्तराधिकारी मानते थे।

जब गोविंद तृतीय को स्तंभ की विद्रोही गतिविधियों की सूचना मिली, तो उसने सबसे पहले गंगराज शिवमार को जेल से मुक्त करके उसे गंगवाड़ी का राज्य वापस करने का प्रलोभन दिया। दरअसल, गोविंद तृतीय ने शिवमार एवं स्तंभ के बीच वैमनस्य उत्पन्न करने के उद्देश्य से यह चाल चली थी। किंतु गोविंद की योजना असफल हो गई, क्योंकि गंगवाड़ी पहुँचते ही शिवमार ने स्तंभ से मित्रता कर ली। संभवतः स्तंभ ने भी शिवमार को उसका राज्य वापस करने का वादा किया होगा।

स्तंभ पर आक्रमण और उसका दमन

गोविंद तृतीय अपनी व्यक्तिगत योग्यता एवं कूटनीतिक कुशलता के कारण अपने उद्देश्य में सफल रहा। उसने राज्य का भार अपने विश्वसनीय भाई इंद्र पर डालकर गंगवाड़ी पर आक्रमण किया और स्तंभ को बुरी तरह पराजित करके बंदी बना लिया। अल्तेकर का अनुमान है कि गोविंद तृतीय ने स्तंभ को उसके मित्रों से सहायता मिलने से पहले ही पराजित कर दिया था। राधनपुर ताम्रपत्रों से प्रमाणित होता है कि गोविंद ने यह विजय लगभग 798 ई. में प्राप्त की थी।

संजन लेख से संकेत मिलता है कि बंदी स्तंभ के साथ गोविंद ने उदारता का व्यवहार किया और उसे पुनः गंगवाड़ी का वायसराय बना दिया। उसने अपने सहयोगी भाई इंद्र को लाट प्रदेश का वायसराय नियुक्त किया।

गंगवाड़ी पर विजय

स्तंभ के विद्रोह का दमन करने के बाद गोविंद तृतीय ने स्तंभ के अन्य सहयोगियों को दंडित करने के लिए सैनिक अभियान किया। इस क्रम में उसने सबसे पहले गंगवाड़ी के शिवमार पर आक्रमण किया, क्योंकि बंदीगृह से मुक्त होने के बाद उसने कोंगुणि राजाधिराज परमेश्वर श्रीपुरुष जैसी स्वाधीनता-सूचक उपाधियाँ धारण कर ली थीं और गोविंद के विरुद्ध स्तंभ का साथ दिया था।

राधनपुर लेख के अनुसार गोविंद ने बड़ी सरलता से शिवमार तथा उसके पुत्र को पराजित कर दिया और 798 ई. में उसे पुनः बंदीगृह में डाल दिया। गंगवाड़ी को पुनः राष्ट्रकूट सीमा में सम्मिलित कर लिया गया, जहाँ कम से कम 802 ई. तक स्तंभ ने गवर्नर के रूप में शासन किया।

नोलंबवाड़ी पर आक्रमण

गोविंद तृतीय ने गंगवाड़ी पर पूर्णतः अधिकार करने के बाद नोलंबवाड़ी के विरुद्ध अभियान किया। नोलंबवाड़ी के राजा चारुपोन्नेर की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह गोविंद तृतीय का सामना कर सके। अतः उसने बिना शर्त गोविंद तृतीय के समक्ष आत्मसमर्पण करके उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। गोविंद तृतीय ने उसे उसका राज्य वापस कर दिया। चित्तलदुर्ग से उपलब्ध कुछ लेखों से भी ज्ञात होता है कि नोलंबवाड़ी का शासक चारुपोन्नेर गोविंद का सामंत था।

पल्लव राज्य पर आक्रमण

इसके बाद गोविंद तृतीय ने पल्लव राज्य के विरुद्ध अभियान किया, जहाँ पल्लव नरेश दंतिवर्मन् शासन कर रहा था। गोविंद के पूर्व उसके पिता ध्रुव ने पल्लवों पर आक्रमण करके उन्हें राष्ट्रकूट साम्राज्य के अधीन कर लिया था। किंतु लगता है कि ध्रुव की मृत्यु के बाद पल्लव नरेश ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी और गोविंद को अपदस्थ करने का षड्यंत्र करने लगा था। गोविंद तृतीय के विरुद्ध स्तंभ ने बारह राजाओं का जो संघ बनाया था, उसका नेता पल्लव नरेश दंतिवर्मन् ही था।

गोविंद तृतीय ने लगभग 803 ई. में पल्लव राज्य पर आक्रमण करके दंतिवर्मन् को पराजित किया। गोविंद तृतीय के 804 ई. के ब्रिटिश म्यूज़ियम ताम्रपत्रों के अनुसार कांची-विजय के बाद वह रामेश्वरम् तीर्थ में अपने एक सैनिक शिविर में रुका था। इससे पता चलता है कि उसने दंतिवर्मन् को 804 ई. से पहले पराजित किया होगा। किंतु गोविंद की यह विजय स्थायी नहीं रह सकी, क्योंकि अपने शासन के अंत में उसे पुनः पल्लवों के विरुद्ध अभियान करना पड़ा।

वेंगी के चालुक्यों से संघर्ष

दक्षिणी सीमा को सुरक्षित करने के बाद गोविंद ने पूर्वी सीमा पर वेंगी के चालुक्यों की शक्ति का दमन किया। इस समय विष्णुवर्धन चतुर्थ तथा विजयादित्य नरेंद्रराज प्रमुख चालुक्य शासक थे। विष्णुवर्धन चतुर्थ गोविंद तृतीय का नाना था, इसलिए संभवतः विजयादित्य ही गोविंद के कोप का शिकार हुआ। गोविंद ने नवाभिषिक्त शासक विजयादित्य को बुरी तरह पराजित करके उस पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इसकी पुष्टि राधनपुर तथा संजन लेखों से भी होती है, जिनके अनुसार पराजित वेंगी नरेश को गोविंद तृतीय के अस्तबलों के लिए अहाता तैयार करना पड़ा और उसके शिविर का फर्श साफ करना पड़ा था। इन विजयों के परिणामस्वरूप गोविंद तृतीय दक्षिण भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट बन गया।

गोविंद तृतीय का उत्तर भारत की ओर अभियान

दक्षिण भारत में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के पश्चात् अपने पिता के समान गोविंद तृतीय ने भी उत्तर भारत की ओर अभियान किया। इसके परिणामस्वरूप कन्नौज पर नियंत्रण को लेकर राष्ट्रकूटों, पालों और प्रतिहारों के बीच पुनः त्रिपक्षीय संघर्ष आरंभ हुआ।

उत्तर भारत से ध्रुव प्रथम के प्रत्यावर्तन के बाद अनेक परिवर्तन हुए थे। वत्सराज की पराजय से प्रोत्साहित होकर धर्मपाल ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया और इंद्रायुध को हटाकर अपने समर्थक चक्रायुध को वहाँ का शासक नियुक्त किया। धर्मपाल के खालिमपुर दानपत्र से ज्ञात होता है कि भोज, मत्स्य, मद्र, कुरु, यदु, यवन, अवंति तथा गांधार के शासकों ने चक्रायुध के राज्याभिषेक के अवसर पर उपस्थित होकर उसे अपनी स्वीकृति प्रदान की थी। किंतु धर्मपाल की यह सफलता स्थायी नहीं रह सकी।

प्रतिहार नरेश वत्सराज का पुत्र नागभट्ट द्वितीय अपने पिता से अधिक महत्त्वाकांक्षी शासक था। उसने कन्नौज पर आक्रमण करके चक्रायुध को युद्ध में बुरी तरह पराजित कर दिया। जब चक्रायुध की ओर से धर्मपाल नागभट्ट के विरुद्ध आगे बढ़ा, तो उसे भी नागभट्ट के हाथों पराजित होना पड़ा। इन विजयों के बाद 806–807 ई. तक नागभट्ट द्वितीय उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली सम्राट बन गया।

गोविंद तृतीय के उत्तर भारतीय अभियान का कारण स्पष्ट नहीं है। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि धर्मपाल ने अपनी पराजय का बदला लेने के लिए गोविंद तृतीय को नागभट्ट पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। संभवतः नागभट्ट ने मालवा तथा गुजरात की ओर अपने साम्राज्य का विस्तार करने का प्रयास किया, जबकि इन प्रदेशों पर राष्ट्रकूटों का प्रभुत्व था। इसलिए गोविंद तृतीय के लिए नागभट्ट द्वितीय की महत्त्वाकांक्षा पर लगाम लगाना आवश्यक हो गया।

कारण जो भी रहा हो, गोविंद तृतीय ने सुनियोजित ढंग से अपने उत्तर भारतीय अभियान को क्रियान्वित किया। उसने अपने कुछ सेनानायकों को मालवा, कोशल, उड़ीसा तथा वेंगी राज्यों पर नियंत्रण रखने का उत्तरदायित्व सौंपा और अपने छोटे भाई इंद्र को गृहराज्य की रक्षा में नियुक्त किया। इसके पश्चात् वह स्वयं एक विशाल सेना के साथ भोपाल-झाँसी मार्ग से गंगा-यमुना के दोआब की ओर बढ़ा।

गोविंद तृतीय का उत्तर भारतीय अभियान पूर्णतः सफल रहा। युद्ध में नागभट्ट पराजित हुआ और उसे भागकर राजपूताना में शरण लेनी पड़ी। राष्ट्रकूट अभिलेखों में गोविंद तृतीय की उत्तर भारत की विजय का अस्पष्ट और अतिरंजित विवरण मिलता है। 811–812 ई. के बड़ौदा ताम्रपत्रों में कहा गया है कि इंद्र ने अकेले ही गुर्जर-प्रतिहारों को पराजित कर दिया था। संजन तथा राधनपुर लेखों में कहा गया है कि जिस प्रकार शरद ऋतु के आते ही आकाश से बादल गायब हो जाते हैं, उसी प्रकार गोविंद के आते ही गुर्जर सम्राट नागभट्ट द्वितीय किसी अज्ञात स्थान में छिप गया। वह इतना भयाक्रांत था कि स्वप्न में भी यदि किसी युद्ध का दृश्य देखता, तो डर से काँपने लगता था। इस प्रकार स्पष्ट है कि गोविंद ने नागभट्ट द्वितीय को पराजित किया और उसे भी वत्सराज की भाँति राजस्थान की मरुभूमि में शरण लेनी पड़ी थी।

गोविंद तृतीय तथा नागभट्ट द्वितीय के बीच युद्ध किस स्थान पर हुआ, इसका उल्लेख नहीं मिलता है। अल्तेकर के अनुसार दोनों सेनाओं की मुठभेड़ मध्य प्रदेश में झाँसी तथा ग्वालियर के बीच किसी स्थान पर हुई होगी।

गोविंद तृतीय की विजयों से भयभीत होकर कन्नौज के शासक चक्रायुध और उसके संरक्षक धर्मपाल ने बिना युद्ध किए ही आत्मसमर्पण कर दिया और गोविंद तृतीय की अधीनता स्वीकार कर ली। वास्तव में नागभट्ट द्वितीय से पराजित होने के बाद धर्मपाल गोविंद तृतीय से युद्ध करने की स्थिति में नहीं रहा होगा। इसलिए उसने बिना धन-जन की हानि किए गोविंद तृतीय के समक्ष आत्मसमर्पण करना ही श्रेयस्कर समझा होगा।

गोविंद तृतीय के उत्तर भारतीय अभियान की तिथि के संबंध में विवाद है। 808 ई. के राधनपुर लेख में गुर्जरों की पराजय का विवरण मिलता है। इस आधार पर फ्लीट, आर. सी. मजूमदार, आर. एस. त्रिपाठी तथा बी. सी. सेन जैसे विद्वानों ने इस अभियान की तिथि 807–808 ई. के बीच निर्धारित की है। अल्तेकर का अनुमान है कि यह अभियान 806–807 ई. के बीच हुआ होगा, क्योंकि 804 ई. तक गोविंद तृतीय ने कांची की विजय कर ली थी।

बी. पी. सिन्हा तथा मिराशी ने सुझाव दिया है कि 802 ई. तक गोविंद तृतीय की अधिकांश विजयें पूर्ण हो चुकी थीं। इसलिए उत्तर भारतीय अभियान की तिथि 799–801 ई. के मध्य मानी जानी चाहिए। संभव है कि गोविंद तृतीय ने 795 ई. के लगभग उत्तर भारत की दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया हो और 800 ई. के आसपास वहाँ से दकन वापस लौटा हो।

इस प्रकार दूसरी बार भी राष्ट्रकूट सेना ने उत्तरी भारत के मैदानों में अपनी विजय का झंडा गाड़ दिया। राष्ट्रकूटों के राजकवियों के अनुसार दकन की रणभेरियों से हिमालय की कंदराएँ गुंजायमान हो गई थीं। प्रतिहार सम्राट नागभट्ट द्वितीय और पाल सम्राट धर्मपाल पर उसकी विजय का वर्णन करते हुए अमोघवर्ष प्रथम के संजन लेख में कहा गया है कि गोविंद तृतीय के घोड़े हिमालय की धाराओं का बर्फीला पानी पीते थे और उसके हाथियों ने गंगा-यमुना के पवित्र जल में स्नान किया था। यद्यपि गोविंद के हिमालय तक जाने का विवरण अतिरंजित है, किंतु संभवतः उसने प्रयाग, वाराणसी एवं गया जैसे तीर्थस्थानों की यात्रा की थी।

गोविंद के उत्तरी अभियान से प्रतिहारों तथा पालों को कोई क्षेत्रीय हानि नहीं हुई। लगता है कि गोविंद तृतीय की उत्तर भारत की दिग्विजय का प्रमुख उद्देश्य क्षेत्रीय लाभ प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना था।

दक्षिण भारत की विजय

उत्तर भारत की विजयों के बाद गोविंद दकन वापस लौट गया, क्योंकि दक्षिण के द्रविड़ राजाओं ने उसे अपदस्थ करने के लिए एक संयुक्त मोर्चे का निर्माण कर लिया था।

द्रविड़ शासकों के विद्रोह का दमन

जिस समय गोविंद तृतीय अपनी राजधानी से दूर उत्तर भारत के विजय-अभियान में व्यस्त था, उसी दौरान सुदूर दक्षिण के द्रविड़ शासकों ने राष्ट्रकूटों के विरुद्ध एक संघ बनाया। इस संघ में पल्लव, पांड्य, चोल, केरल तथा पश्चिमी गंग राज्यों के शासक शामिल थे। इस राष्ट्रकूट-विरोधी संघ के राजाओं ने राष्ट्रकूट साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया।

गोविंद तृतीय ने 802–803 ई. में तुंगभद्रा नदी के तट पर दक्षिणी राजाओं के सम्मिलित मोर्चे को तहस-नहस कर दिया। संजन लेख से ज्ञात होता है कि गंग राजा इस युद्ध में मारा गया और चोलों, पल्लवों तथा पांड्यों की पताका को गोविंद ने छीन लिया। इस प्रकार गोविंद की यह विजय दक्षिण भारत की तत्कालीन राजनीति में निर्णायक सिद्ध हुई और दक्षिण के प्रायः सभी शासकों ने पुनः उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।

गोविंद तृतीय की शक्ति से भयभीत होकर सिंहल (लंका) के शासक ने अपनी तथा अपने मंत्री की अधीनता-सूचक प्रतिमाओं के साथ एक दूत-मंडल राष्ट्रकूट सम्राट की सेवा में उस समय समर्पित किया, जब वह कांची में ठहरा हुआ था। इन मूर्तियों को गोविंद ने अपनी राजधानी मान्यखेट में एक शिवमंदिर के समक्ष अपने विजय-स्तंभ के रूप में स्थापित करवाया था—

लंकातः किल तत्प्रभुप्रतिकृती काँचीमुपेती ततः।
कीर्तिस्तंभनिभी शिवायतनके येनेह संस्थापिती।।  — संजन ताम्रलेख

वेंगी में हस्तक्षेप

गोविंद तृतीय को वेंगी की राजनीति में भी हस्तक्षेप करना पड़ा। वस्तुतः विष्णुवर्धन चतुर्थ के समय तक वेंगी के चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बने रहे। किंतु उसकी मृत्यु के बाद 799 ई. में जब विजयादित्य द्वितीय राजा हुआ, तो उसने राष्ट्रकूटों की प्रभुसत्ता मानने से इनकार कर दिया। इसी दौरान विजयादित्य के भाई भीमसलुकि ने उत्तराधिकार के लिए संघर्ष छेड़ दिया और गोविंद तृतीय से सहायता माँगी। फलतः गोविंद ने 803 ई. में वेंगी पर आक्रमण करके विजयादित्य को पराजित किया और भीमसलुकि को वेंगी के राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया।

गोविंद तृतीय का मूल्यांकन

गोविंद तृतीय राष्ट्रकूट वंश के महानतम शासकों में से एक था। उसने पालों, प्रतिहारों, गंगों, चोलों, चालुक्यों, पांड्यों तथा पल्लवों को पराजित करके उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में श्रीलंका तक और पश्चिम में सौराष्ट्र से लेकर पूर्व में बंगाल तक के विस्तृत भूभाग में अपनी विजय-पताका फहराई। कहा जाता है कि दकन के ढोल हिमालय की गुफाओं से लेकर मालाबार के तट तक सुनाई देते थे। गोविंद तृतीय की शक्ति इतनी बढ़ गई थी कि सिंहल नरेश ने भी भयभीत होकर बिना किसी संघर्ष के उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। वाणी-डिंडोरी अभिलेख में सही कहा गया है कि गोविंद के राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित होने के पश्चात् राष्ट्रकूट अजेय हो गए थे। राष्ट्रकूट अभिलेखों में गोविंद तृतीय की तुलना महाभारत के पार्थ (अर्जुन) तथा सिकंदर महान् से अकारण नहीं की गई है।

शासन के अंतिम दिनों में गोविंद तृतीय ने अपने अल्पवयस्क पुत्र शर्व ‘अमोघवर्ष’ को युवराज घोषित करके अपने भतीजे इंद्र के पुत्र कर्क सुवर्णवर्ष को उसका संरक्षक नियुक्त किया। कर्क मालवा एवं गुजरात का प्रांतीय शासक था। चूँकि गोविंद तृतीय ने दिसंबर 813 ई. में तोखर्दे ताम्रपत्र जारी किया था, इसलिए अनुमान किया जाता है कि उसने 793 से 814 ई. तक शासन किया।

महत्त्वपूर्ण FAQ

1. गोविंद तृतीय का शासनकाल कब था?

गोविंद तृतीय ने लगभग 793 से 814 ई. तक राष्ट्रकूट साम्राज्य पर शासन किया। वह ध्रुव धारावर्ष का तीसरा पुत्र था।

2. गोविंद तृतीय ने किन प्रमुख शासकों को पराजित किया?

उसने गंगों, पल्लवों, वेंगी के चालुक्यों, प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय तथा पाल शासक धर्मपाल को पराजित किया और राष्ट्रकूट साम्राज्य की शक्ति को अत्यधिक बढ़ाया।

3. गोविंद तृतीय का उत्तर भारत अभियान क्यों महत्त्वपूर्ण था?

गोविंद तृतीय ने उत्तर भारत में अभियान चलाकर नागभट्ट द्वितीय और धर्मपाल को पराजित किया। इससे राष्ट्रकूटों का प्रभाव उत्तर भारत तक स्थापित हुआ और कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष में राष्ट्रकूटों की शक्ति पुनः प्रभावशाली बनी।

4. गोविंद तृतीय की प्रमुख उपाधियाँ क्या थीं?

गोविंद तृतीय ने प्रभूतवर्ष, जगत्तुंग, श्रीवल्लभ, पृथ्वीवल्लभ, विमलादित्य, जनवल्लभ, कीर्तिनारायण और त्रिभुवनधवल जैसी उपाधियाँ धारण की थीं।

5. गोविंद तृतीय का ऐतिहासिक मूल्यांकन कैसे किया जाता है?

गोविंद तृतीय राष्ट्रकूट वंश के महानतम विजेता शासकों में से एक था। उसके अभियानों से राष्ट्रकूट साम्राज्य का प्रभाव दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक फैल गया। उसने राष्ट्रकूटों को एक प्रमुख अखिल भारतीय शक्ति के रूप में स्थापित किया।

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