सिंध का विलय  (Annexation of Sindh)

सिंध का विलय  (Annexation of Sindh)
सिंध का विलय सिंधु नदी की निचली घाटी से लेकर समुद्र तक विस्तृत प्रदेश को […]

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सिंध का विलय

सिंधु नदी की निचली घाटी से लेकर समुद्र तक विस्तृत प्रदेश को सिंध कहा जाता है। सिंध के राज्य का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। उसकी समृद्धि सदैव आक्रमणकारियों को आकर्षित करती रही है। उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक से ही यूरोप और एशिया में अंग्रेजों के साथ फ्रांसीसियों और रूसियों की प्रतिद्वंद्विता बढ़ रही थी और अंग्रेजों को भय था कि वे अफगानिस्तान या फारस के रास्ते भारत पर आक्रमण कर सकते हैं। सिंध का विलय इसी भय का परिणाम था। फ्रांसीसी आक्रमण का खतरा तो नेपोलियन बोनापार्ट के साथ ही समाप्त हो गया, लेकिन रूस की विस्तारवादी नीति और फारस में उसके बढ़ते प्रभाव ने ब्रिटिश नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी। अंततः भारत पर रूसी आक्रमण को रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने अफगानिस्तान और फारस में अपना प्रभाव बढ़ाने का निर्णय किया। लेकिन उन्होंने यह भी अनुभव किया कि यह नीति तभी सफल हो सकेगी, जब सिंध को ब्रिटिश नियंत्रण में लाया जाए। सिंध के व्यापारिक उपयोग की संभावनाएँ भी इस नीति का एक प्रमुख कारण थीं।

सिंध का विलय (Annexation of Sindh)
सिंध की स्थिति

सिंध की राजनीतिक स्थिति

सिंध पर 1701 में कल्होरा वंश का शासन आरंभ हुआ, जब एक मुगल शाही फरमान द्वारा अरब मूल के सुन्नी मुसलमान मियाँ यार मुहम्मद कल्होरा को ‘खुदायार खान’ की उपाधि देकर ऊपरी सिंध का गवर्नर बनाया गया था। मुगल सम्राट उन्हें ‘कल्होरा नवाब’ कहते थे। नादिर शाह के आक्रमण (1739) के बाद इस प्रदेश का संबंध मुगल साम्राज्य से लगभग समाप्त हो गया।

नादिर शाह तथा अहमद शाह अब्दाली के समय में भी सिंध पर कल्होरा सरदारों का शासन था। वे अफगानिस्तान को खिराज (भूमिकर) देते थे, जो अक्सर बकाया रह जाता था। कल्होरों ने अपनी सेना में बड़ी संख्या में बलूचियों की भर्ती की थी। प्रारंभिक कल्होरों की राजधानी खुदाबाद थी, लेकिन 1768 में उन्होंने अपनी राजधानी हैदराबाद (सिंध) स्थानांतरित कर ली।

तालपुर के अमीरों का उदय

अठारहवीं शताब्दी के मध्य में तालपुर की एक बलूच जनजाति पहाड़ों से उतरकर सिंध के मैदानों में आकर बस गई। वे मीर सुलेमान काको के वंशज थे। वे बलूच उत्कृष्ट सैनिक होने के साथ-साथ प्रतिकूल जीवन-परिस्थितियों के अभ्यस्त भी थे। प्रारंभिक कल्होरों ने बलूचियों को सिंध में बसने के लिए प्रोत्साहित किया, उन्हें उच्च पदों पर नियुक्त किया, जागीरें दीं और बड़ी संख्या में अपनी सेना में भर्ती किया। धीरे-धीरे तालपुर के बलूचों की शक्ति काफी बढ़ गई। इससे भयभीत होकर कल्होरा सरदार सरफराज ने 1774 में सरदार बहराम खान तालपुर की हत्या करवा दी, जिससे कल्होरों और तालपुरों के बीच शत्रुता आरंभ हो गई। 1783 में सरफराज के पुत्र और उत्तराधिकारी अब्दुल नबी ने बहराम खान के पुत्र और पौत्र को भी मरवा दिया। इसके प्रतिशोध में तालपुरों ने अपने सरदार मीर फतेह अली खान के नेतृत्व में हलानी के युद्ध (1783) में कल्होरा शासक अब्दुल नबी को पराजित कर सिंध से निर्वासित कर दिया। इस प्रकार मीर फतेह अली खान ने 1783 में सिंध में तालपुर वंश की स्थापना की और स्वयं को सिंध का पहला ‘अमीर’ घोषित किया।

अफगानिस्तान के तत्कालीन दुर्रानी शासक तैमूर शाह ने, जिसकी सिंध पर नाममात्र की सत्ता थी, तालपुर के अमीरों को सिंध के शासक के रूप में मान्यता दे दी। फतेह अली खान ने अपने भाइयों—मीर गुलाम, मीर करम और मीर मुराद—के साथ सिंध का प्रशासन सँभाला। इन चारों को ‘चार यार’ के नाम से जाना जाता था और उनके शासन को ‘प्रथम चौयारी’ या ‘चार यार का शासन’ कहा जाता है। आरंभ में तालपुरों ने हैदराबाद को राजधानी बनाया, जो पराजित कल्होरों की राजधानी थी।

तालपुर अमीरों ने अपनी चार शाखाओं के माध्यम से सिंध पर शासन किया। ‘चार यार’ में सबसे वरिष्ठ फतेह अली खान ने सिंध के निचले भाग पर हैदराबाद से शासन किया। उसके भतीजे सोहराब खान ने सिंध के ऊपरी भाग में खैरपुर में एक शाखा की स्थापना की। एक अन्य संबंधी मीर थारा खान ने सिंध के दक्षिण-पूर्व में मीरपुर खास में मणकानी शाखा की स्थापना की और तालपुर की चौथी शाखा टांडो मुहम्मद खान में स्थित थी।

तालपुर अमीरों की चारों शाखाओं ने अपने अधीन क्षेत्रों का विभिन्न दिशाओं में विस्तार किया और अमरकोट के राजा से जोधपुर, लुज के सरदार से कराची तथा अफगानों से शिकारपुर और भककर पर अधिकार कर लिया।

सिंध में अंग्रेजों का प्रवेश

पुर्तगालियों की सिंध में विशेष रुचि नहीं थी, क्योंकि गुजरात तथा मलाबार तट की तरह सिंध में कोई प्रमुख व्यापारिक केंद्र नहीं था। सिंध के शासक के बुलावे पर 1555 में पुर्तगाली गवर्नर बेरेट्टो एक जहाजी बेड़े के साथ सिंध गया था। युद्ध तो नहीं हुआ, लेकिन बेरेट्टो ने लूटमार करके काफी धन प्राप्त कर लिया।

पश्चिम से स्थल मार्ग द्वारा व्यापार करने के लिए सिंध के नगर महत्त्वपूर्ण थे, लेकिन आरंभ में अंग्रेजों ने अपना प्रमुख व्यापारिक केंद्र सूरत बनाया और सिंध को अधिक महत्त्व नहीं दिया।

अंग्रेजों का सिंध से संपर्क सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ में हुआ। सर थॉमस रो जब अजमेर में जहाँगीर से मिला था, उस समय उसने बंगाल के साथ-साथ सिंध में भी व्यापार करने की अनुमति माँगी थी। 1635 में पुर्तगालियों से संधि करने के बाद इसी वर्ष एक ब्रिटिश व्यापारिक जहाजी बेड़ा पहली बार ठट्टा पहुँचा था। कल्होरा राजकुमार गुलाम शाह द्वारा प्रदत्त परवाने के कारण अंग्रेजों ने 1758 में ठट्टा में पहली व्यापारिक कोठी (फैक्टरी) खोली। 1761 में गुलाम शाह ने अंग्रेज रेजिडेंट की प्रार्थना पर न केवल पूर्व की संधि की पुष्टि की, बल्कि वहाँ व्यापार करने वाले अन्य यूरोपियों को भी बाहर कर दिया। बाद में कर्नाटक और बंगाल की घटनाओं के कारण जब कल्होरा सरदार सरफराज खान को अंग्रेजी खतरे का आभास हुआ, तो उसने अंग्रेजों को सिंध से बाहर करने का प्रयास किया। परिणामतः 1775 में कंपनी को सिंध में अपना व्यापार बंद करना पड़ा। इसके बाद 1783 में कल्होरों को हटाकर तालपुर अमीरों ने सिंध पर अधिकार कर लिया।

सिंध के प्रति ब्रिटिश नीति (1799–1820)

अठारहवीं शताब्दी के अंत में अफगानिस्तान के शासक जमान शाह ने पंजाब पर आक्रमण आरंभ किया। इससे अंग्रेजों को लगा कि नेपोलियन, काबुल के शासक जमान शाह और टीपू सुल्तान के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण करने का षड्यंत्र कर रहा है। फ्रांसीसी आक्रमण के भय से अंग्रेजों ने तालपुर के अमीरों को शाह के विरुद्ध अपने पक्ष में करने का प्रयास शुरू किया। लॉर्ड वेलेजली ने 1799 में अपने दूत क्रू को तालपुर अमीरों से वार्ता करने के लिए सिंध भेजा। लेकिन काबुल के शाह और स्थानीय व्यापारियों के दबाव में सिंध के अमीर फतेह अली तालपुर ने अक्टूबर 1800 में अंग्रेज एजेंट क्रू को सिंध छोड़ने का आदेश दे दिया। अपमानित होकर ब्रिटिश एजेंट क्रू ने सिंध छोड़ दिया और कंपनी को इस असफलता को स्वीकार करना पड़ा।

शाश्वत मित्रता की संधि (1809)

जून 1807 में रूस के जार अलेक्जेंडर प्रथम और नेपोलियन बोनापार्ट के बीच तिलसित की संधि हुई, जिससे अंग्रेजों के भारतीय साम्राज्य पर फ्रांसीसी आक्रमण का संकट फिर मंडराने लगा। फ्रांसीसी खतरे के कारण गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो ने चार्ल्स मेटकॉफ को लाहौर (पंजाब), माउंटस्टुअर्ट एल्फिंस्टन को काबुल (अफगानिस्तान), जॉन मैल्कम को तेहरान (फारस) और निकोलस हैंकली स्मिथ को सिंध भेजा। निकोलस हैंकली स्मिथ 1809 में सिंध के तालपुर अमीरों के साथ ‘शाश्वत मित्रता की संधि’ करने में सफल हुआ। इसके अनुसार दोनों पक्ष सिंध से फ्रांसीसियों को बाहर रखने और एक-दूसरे के दरबार में एजेंट भेजने पर सहमत हुए। इस संधि के अंतर्गत कच्छ में कंपनी और सिंध की सीमाएँ भी निश्चित की गईं।

संधि का नवीनीकरण (1820)

1818 में मराठा राज्यसंघ की अंतिम हार के पश्चात् कच्छ और राजस्थान के क्षेत्र अंग्रेजों के संरक्षण में आ गए, जो सिंध की सीमा पर स्थित थे और अक्सर सिंध के बलूची लुटेरों का शिकार होते रहते थे। बलूची लुटेरों को रोकने के लिए 1820 में अंग्रेजों ने 1809 की संधि में एक अनुच्छेद जोड़कर उसका नवीनीकरण किया। इसमें कहा गया था कि सिंध में किसी प्रकार की यूरोपीय या अमेरिकी बस्ती नहीं बनने दी जाएगी और अंग्रेजों या उनके सीमावर्ती मित्र राज्यों में लूटमार नहीं की जाएगी। कच्छ और सिंध की सीमा भी निश्चित कर दी गई।

ब्रिटिश नीति में परिवर्तन

अभी तक अंग्रेजों की सिंध में कोई विशेष व्यापारिक या सैनिक रुचि नहीं थी, लेकिन 1825 के बाद इस दृष्टिकोण में परिवर्तन हो गया। इसका एक कारण यह था कि 1820 की संधि के बाद डॉ. जेम्स, जो बंबई की सेना में चिकित्सक था, अमीर मुराद अली तालपुर की चिकित्सा के लिए हैदराबाद गया। बाद में उसकी रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिससे पता चला कि सिंध बंजर नहीं है, बल्कि उसकी भूमि बहुत उपजाऊ है और सिंधु नदी के माध्यम से व्यापार किया जा सकता है। इससे सिंध के प्रति अंग्रेजों की उत्सुकता बढ़ गई।

एलेक्जेंडर बर्न्स की यात्रा

लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने सिंध के व्यापारिक और नौगम्य महत्त्व को देखते हुए 1831 में एलेक्जेंडर बर्न्स को सिंधु नदी के मार्ग की खोज के लिए पंजाब भेजा। बहाना यह बनाया गया कि वह महाराजा रणजीत सिंह के लिए उपहार ले जा रहा है। इंग्लैंड के राजा जॉर्ज चतुर्थ ने रणजीत सिंह को उपहार में कुछ घोड़े भेजे थे, जो बंबई पहुँच गए थे। बेंटिंक ने उन घोड़ों को सिंधु नदी के मार्ग से भेजने के लिए सिंध के अमीरों से अनुमति माँगी। अमीर रणजीत सिंह से डरते थे और अंग्रेजों की कूटनीति से अनभिज्ञ थे, इसलिए उन्होंने अनुमति दे दी। वास्तव में, बर्न्स की सिंधु मार्ग से पंजाब जाने का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना था कि सिंधु नदी में स्टीमर और छोटे जहाज आसानी से चलाए जा सकते हैं या नहीं। बलूचियों ने अंग्रेजों के इस बहाने को समझ लिया था। कहते हैं कि एक सैयद ने बर्न्स की अंग्रेजी नौकाओं को देखकर कहा था, ‘बड़े दुर्भाग्य की बात है। सिंध अब गया, क्योंकि अंग्रेजों ने सिंधु नदी को, जो विजय का मार्ग है, देख लिया है।’ बर्न्स ने लौटकर बेंटिंक को बताया कि सिंधु नदी में स्टीमर और छोटे जहाज आसानी से चलाए जा सकते हैं।

महाराजा रणजीत सिंह ने 1831 में रोपड़ में विलियम बेंटिंक से भेंट के समय सिंध के संबंध में प्रस्ताव रखा था कि सिंध को जीतकर दोनों पक्ष उसके क्षेत्र को बाँट लें। किंतु बेंटिंक ने इस प्रस्ताव पर बातचीत करना स्वीकार नहीं किया। रणजीत सिंह के इस प्रस्ताव के बाद 1832 में बेंटिंक ने कर्नल पोटिंगर को सिंध भेजा, ताकि तालपुर अमीरों के साथ नई व्यापारिक संधि की जा सके।

1832 की संधि

सिंध पहुँचकर कर्नल पोटिंगर ने हैदराबाद के अमीर मुराद अली से 20 अप्रैल 1832 को एक संधि की, जिसे बाद में मीरपुर और खैरपुर के अमीरों ने भी स्वीकार कर लिया। इस संधि में प्रावधान किया गया था कि—

  1. अंग्रेज व्यापारियों एवं यात्रियों को सिंध में निःशुल्क आने-जाने की अनुमति होगी और सिंधु नदी ब्रिटिश व्यापार के लिए खुली रहेगी, लेकिन कोई युद्धपोत इस नदी से होकर नहीं गुजरेगा और न ही कोई युद्ध-सामग्री इस नदी अथवा सिंध प्रदेश के माध्यम से इधर-उधर भेजी जाएगी।
  2. किसी अंग्रेज व्यापारी को सिंध में बसने की अनुमति नहीं होगी और अन्य यात्रियों एवं आगंतुकों को पासपोर्ट रखना होगा।
  3. आयात और निर्यात करों की दरें प्रकाशित की जाएँगी और सिंध से किसी प्रकार के सैन्य अधिभार या टोल की माँग नहीं की जाएगी। यदि आयात-निर्यात कर बहुत अधिक होंगे, तो अमीर उनमें परिवर्तन कर सकेंगे।
  4. तालपुर अमीर कच्छ के लुटेरों का दमन करने के लिए जोधपुर के राजा के साथ मिलकर कार्य करेंगे।
  5. पुरानी मित्रता की संधियों की पुनः पुष्टि की गई और दोनों पक्षों ने वादा किया कि वे एक-दूसरे के क्षेत्रों पर बुरी नजर नहीं डालेंगे।

आयात-निर्यात की दरें 1834 में एक पूरक व्यापारिक संधि द्वारा निश्चित कर दी गईं और कर्नल पोटिंगर को सिंध में राजनीतिक एजेंट नियुक्त कर दिया गया। इसके पश्चात् शीघ्र ही कंपनी ने सिंधु नदी के मुहाने पर लगाए गए मार्ग-कर (टोल टैक्स) में भी अपना हिस्सा माँगना शुरू कर दिया।

लॉर्ड ऑकलैंड और सिंध

लॉर्ड ऑकलैंड 1836 में भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया। एशिया में रूस के निरंतर प्रभाव-विस्तार से अंग्रेज भयभीत थे। ऑकलैंड ने सिंध के प्रश्न को रूसी संकट से जोड़ दिया और भारत को रूसी आक्रमण से बचाने के लिए अफगानिस्तान को ब्रिटिश प्रभाव में लाने की योजना बनाई। रणजीत सिंह जैसा शक्तिशाली शासक अंग्रेजों की योजना में भागीदार नहीं बन सकता था, लेकिन सिंध के निर्बल अमीरों को इस योजना में शामिल करना कठिन नहीं था। इसलिए अफगानिस्तान को अपने प्रभाव में लाने से पहले सिंध में प्रभाव बढ़ाना आवश्यक समझा गया।

1838 की संधि

जब रणजीत सिंह ने सिंध पर आक्रमण करने की योजना बनाई थी, तब उसने सिंध की सीमा पर स्थित रोझन नामक नगर पर अधिकार कर लिया था। कंपनी के आदेश पर पोटिंगर हैदराबाद (सिंध) गया और उसने अमीरों के समक्ष एक संधि-प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि रणजीत सिंह के विरुद्ध अमीरों की रक्षा के लिए एक सहायक सेना सिंध में रहेगी; इसके बदले अंग्रेज रणजीत सिंह के साथ होने वाले विवादों में मध्यस्थता करेंगे और सिंध में एक अंग्रेज रेजिडेंट रहेगा, जिसे संपूर्ण सिंध में आने-जाने की स्वतंत्रता होगी। तालपुर अमीरों ने कभी विदेशी सहायता की आशा या माँग नहीं की थी। उन्होंने स्पष्ट कहा, ‘हमने सिखों को पहले भी पराजित किया है और फिर पराजित करेंगे।’ जब अमीरों ने संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, तो पोटिंगर ने धमकी दी कि अंग्रेज रणजीत सिंह को समर्थन देंगे अथवा उसे आक्रमण करने के लिए प्रेरित करेंगे। अंग्रेजों की धमकी के कारण अनिच्छा से अमीरों ने 1838 में संधि पर हस्ताक्षर कर दिए।

इस संधि से अमीरों ने सिखों और उनके बीच होने वाले विवादों में कंपनी की मध्यस्थता स्वीकार कर ली और हैदराबाद में एक अंग्रेज रेजिडेंट रखना स्वीकार कर लिया, जो अंग्रेज सैनिकों के संरक्षण में सिंध में कहीं भी आ-जा सकता था। इस प्रकार अमीर लगभग अंग्रेजों के संरक्षण में आ गए। चार्ल्स नेपियर ने स्वीकार किया था कि यह सरासर अन्याय था। वास्तव में, सिंध के साथ जो व्यवहार किया गया, वह राजनीतिक दृष्टि से चाहे जितना आवश्यक रहा हो, नैतिक दृष्टि से उचित कतई नहीं था।

त्रिपक्षीय संधि (1838)

‘द ग्रेट गेम’ के अंतर्गत ब्रिटेन ने अफगानिस्तान में कठपुतली सरकार स्थापित करने का प्रयास किया। दोस्त मुहम्मद फारसियों और रूसियों से संधि-वार्ता कर रहा था, इसलिए दोस्त मुहम्मद को हटाकर शाह शुजा को काबुल की गद्दी पर बिठाने के लिए अंग्रेजों, महाराजा रणजीत सिंह और शाह शुजा के मध्य एक त्रिपक्षीय संधि हुई, जिस पर जून 1838 में हस्ताक्षर किए गए। यह त्रिपक्षीय संधि मूल रूप से आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे की सहायता करने के लिए थी। त्रिपक्षीय संधि की मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं—

  1. रणजीत सिंह और ब्रिटिश सरकार मिलकर शाह शुजा को काबुल की गद्दी पर पुनः बिठाएँगे।
  2. शाह शुजा अंग्रेजों और सिखों की सलाह से अपनी विदेश नीति का संचालन करेगा।
  3. यदि कोई शत्रु अफगानिस्तान से होकर भारत पर आक्रमण करे, तो शाह शुजा उसे रोकेगा।
  4. शाह शुजा काबुल में एक अंग्रेज रेजिडेंट को रखेगा।
  5. शाह शुजा ने सिंध पर अपने समस्त दावों को छोड़ दिया।
  6. शाह शुजा रणजीत सिंह को प्रतिवर्ष दो लाख रुपये देगा और सिंधु क्षेत्र में उसकी विजयों को मान्यता देगा।
  7. अंग्रेज पृष्ठभूमि में बने रहेंगे।

त्रिपक्षीय संधि के बाद ब्रिटिश राजनयिक दबाव के कारण फारस के शाह ने हेरात का घेरा उठा लिया। ब्रिटिश सरकार की आपत्ति पर रूस ने अपने राजदूत को काबुल से वापस बुला लिया। इस प्रकार युद्ध की आशंका काफी हद तक समाप्त हो गई थी। फिर भी, ऑकलैंड ने आक्रमण का विचार नहीं छोड़ा और अंततः यही त्रिपक्षीय संधि प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध का कारण बनी।

सहायक संधि (1839)

कर्नल पोटिंगर को संधि के मसविदे के साथ अमीरों के पास भेजा गया। उसे आदेश दिया गया था कि अमीरों को धन देने के लिए बाध्य किया जाए और 1832 की संधि के उस अनुच्छेद को समाप्त किया जाए, जो सिंधु नदी से सैनिकों के आवागमन का निषेध करता था। पोटिंगर ने तालपुर अमीरों के समक्ष जो मसविदा रखा, उसकी प्रमुख शर्तें इस प्रकार थीं—

  1. शिकारपुर और भककर में ब्रिटिश सहायक सेना तैनात की जाएगी और उसके भरण-पोषण तथा प्रबंधन के लिए सिंध के अमीर तीन लाख रुपये प्रतिवर्ष देंगे।
  2. कंपनी की अनुमति के बिना अमीर किसी अन्य राज्य से कोई संबंध नहीं रखेंगे।
  3. तालपुर अमीर ब्रिटिश सेना की आपूर्ति के लिए कराची में भंडारण-कक्ष (गोदाम) उपलब्ध कराएँगे और सिंधु नदी पर सभी यातायात कर (टोल टैक्स) समाप्त कर देंगे।

इसके अलावा, आवश्यकता पड़ने पर अमीर अंग्रेजों को सैनिक सहायता भी देंगे। इसके बदले में कंपनी अमीरों के आंतरिक प्रशासन में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी और बाहरी आक्रमण से उनकी रक्षा करेगी। अभी संधि के मसविदे पर बातचीत चल ही रही थी कि अंग्रेजी सेना ने कराची पर अधिकार कर लिया।

सिंध के अमीरों ने कहा कि शाह शुजा की धन की माँग तो उपहास मात्र है। उन्होंने एक घोषणा-पत्र दिखाया, जिसके अनुसार शाह शुजा ने 1833 के बाद सिंध के अमीरों पर अपने सभी अधिकार स्वयं त्याग दिए थे। किंतु सबसे महत्त्वपूर्ण तर्क यह दिया गया, ‘जिस राजा को आप पिछले 25 वर्ष से रोटी दे रहे हैं, उसकी ओर से जो भी माँग है, वह आपकी माँग है, शाह की नहीं।’

कर्नल पोटिंगर ने अमीरों पर दबाव बनाने के लिए उन पर फारस के शाह से साँठ-गाँठ करने का आरोप लगाया और धमकी दी कि अंग्रेजों के पास उन्हें पूर्णतः समाप्त कर देने की शक्ति है। अंततः विवश होकर अमीरों ने फरवरी 1839 में नई संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। इस सहायक संधि से अमीरों की स्वतंत्रता लगभग पूर्ण रूप से समाप्त हो गई और व्यावहारिक रूप से सिंध ब्रिटिश प्रभाव के अधीन आ गया। इसके संबंध में ऑकलैंड ने लिखा था, ‘सिंध अब औपचारिक रूप से हमारे नियंत्रण में है और हमारे भारतीय संबंधों के वृत्त के अंतर्गत है।’

अफगान युद्ध (1839–1842)

प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध के दौरान सिंध की भूमि का उपयोग किया गया और युद्ध के दौरान अमीरों को अंग्रेजी सेना की सहायता का पूरा भार उठाना पड़ा। उनके कुछ क्षेत्र उनसे स्पष्टतः स्थायी रूप से ले लिए गए थे, पुराने कर के स्थान पर उन्हें बहुत-सा धन देना पड़ा और उनकी स्वाधीन स्थिति लगातार कमजोर होती गई। इतना होने पर भी, तालपुर अमीरों ने संधि का अक्षरशः पालन किया और जब अफगानिस्तान में अंग्रेजी सेना पर विपत्ति आई, उस समय उन्होंने अंग्रेजों के साथ कोई विश्वासघात नहीं किया। किंतु इस निष्ठा के बदले उनकी प्रशंसा करने के बजाय उन पर आधारहीन आरोप लगाए गए कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार का विरोध किया और उसके प्रति घृणा फैलाई।

लॉर्ड एलनबरो और सिंध का विलय

अफगान युद्ध समाप्त होने से पहले ही 1842 में ऑकलैंड के स्थान पर लॉर्ड एलनबरो गवर्नर जनरल के रूप में भारत आया। लॉर्ड एलनबरो आरंभ से ही सिंध के अमीरों के विरुद्ध था और उन्हें अंग्रेजों का कट्टर शत्रु समझता था। सिंध के अमीरों के साथ व्यवहार में वह ऑकलैंड से भी अधिक कठोर और कूटनीतिक रूप से आक्रामक सिद्ध हुआ। वी. ए. स्मिथ के कथनानुसार, ‘एलनबरो उस प्रदेश को सम्मिलित करने के लिए बहाना खोज रहा था और शीघ्र ही उसे सफलता मिली; उसने जानबूझकर युद्ध आरंभ किया ताकि वह प्रांत को जीत सके।’

ऐसा लगता है कि लॉर्ड ऑकलैंड और लॉर्ड एलनबरो के काल में उस महान जलमार्ग को नियंत्रित करना ही सिंध-विलय की नीति का मुख्य उद्देश्य था। दूसरा, लॉर्ड एलनबरो ने अफगान युद्ध में खोई हुई अंग्रेजी प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने के लिए बहुत कठिन प्रयास किया। उसने आउट्रम को, जो उस समय हैदराबाद में ब्रिटिश रेजिडेंट था, लिखा था, ‘अफगान युद्ध में सफलता प्राप्त होने से अमीरों को मालूम हो गया होगा कि अंग्रेज इतने कमजोर नहीं थे, जितना वे समझते थे।’

एलनबरो सिंध को अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित करने का संकल्प कर चुका था। सितंबर 1842 में सर चार्ल्स नेपियर को सिंध में कंपनी का रेजिडेंट बनाकर भेजा गया, जो उदंड और क्रोधी स्वभाव का था। रेजिडेंट मेजर आउट्रम को वापस बुला लिया गया, क्योंकि वह ईमानदार था और नेपियर की आक्रामक नीति का विरोधी था। नेपियर को पूर्ण असैनिक और सैनिक अधिकार दिए गए तथा उत्तरी और दक्षिणी सिंध की सेनाएँ उसके अधीन कर दी गईं। नेपियर ने सिंध पर अधिकार करने का निश्चय कर लिया था, इसलिए उसने आक्रामक नीति अपनाई। उसे विश्वास था कि भारत सरकार संधियों की उपेक्षा करके जो चाहे कर सकती है। वास्तव में, नेपियर युद्ध के लिए अत्यंत उत्सुक था।

सिंध-विलय के कारण

सिंध पर अधिकार करने के लिए एलनबरो ने जो कार्यवाही की, उसके कई कारण थे। पहला, सिंध सामरिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण था। अफगानिस्तान जाने का एक महत्त्वपूर्ण मार्ग सिंध से होकर जाता था। अफगानिस्तान में असफल होने के बाद अंग्रेज चाहते थे कि इस मार्ग पर उनका अधिकार बना रहे। दूसरा, उत्तर-पश्चिम के देशों से व्यापार करने के लिए भी सिंध पर अधिकार करना महत्त्वपूर्ण था। तीसरा, अफगानिस्तान में भयानक पराजय के बाद अंग्रेजों के लिए आवश्यक था कि वे अपनी सैनिक शक्ति का प्रदर्शन करें और विजय प्राप्त करें। इसके लिए सिंध सबसे उपयुक्त क्षेत्र था। चौथा, सिंध के अमीरों पर अंग्रेजों ने जो दबाव और कठोरताएँ डाली थीं, उनके कारण भी एलनबरो सिंध के अमीरों से आशंकित था। उसे लगता था कि अमीर कभी भी प्रतिशोध के लिए अंग्रेज-विरोधी कार्य कर सकते थे। पाँचवाँ, सिंध को पूर्णतः अधीन करने के लिए एक नई संधि की आवश्यकता थी, जो अमीरों पर दबाव डालकर ही की जा सकती थी। इसलिए अमीरों के विश्वासघात और शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियों का प्रचार किया गया। इसके अलावा, सिंध-विलय का एक कारण सेनापति नेपियर स्वयं था, जो प्रारंभ से ही सिंध पर अधिकार करने के लिए उत्सुक था।

अफगान युद्ध के बाद एलनबरो ने निश्चय कर लिया था कि सिंधु नदी पर अंग्रेजों का नियंत्रण होना चाहिए। इसके अलावा, कराची, भककर और सक्कर में स्थायी रूप से सेनाएँ रखना भी आवश्यक समझा गया। उसने यह निश्चय कर लिया था कि यदि तालपुर अमीर नई संधि स्वीकार नहीं करेंगे, तो वह सिंध को अंग्रेजी राज्य में मिला लेगा।

अमीरों पर आरोप

तालपुर अमीरों के विरुद्ध कार्यवाही को उचित सिद्ध करने के लिए उन पर तरह-तरह के आरोप लगाए गए। खैरपुर के अमीर रुस्तम पर आरोप लगाया गया कि उसने संधि की धाराओं के विरुद्ध विदेशी शक्तियों से बातचीत की है; ब्रिटिश पदाधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार किया है; सिंधु नदी में आने-जाने में बाधा डाली है और ब्रिटिश प्रजा को अवैध रूप से बंदी बनाया है।

हैदराबाद के नासिर खान के विरुद्ध यह आरोप था कि उसने मीरपुर के शेर मुहम्मद के साथ सीमा-विवाद के मामले में, जो अंग्रेजों की मध्यस्थता के अधीन था, सेना एकत्र की है। दूसरे, जब उसे अफगानिस्तान में अंग्रेजों की हार का समाचार मिला, तो उसने शिकारपुर के हस्तांतरण में देरी की; अंग्रेजों को धोखा देने की नीयत से उसने कर का धन देने के लिए खोटे सिक्के ढाले; अवैध मार्ग-कर लिया और सिंधु नदी से आने-जाने में बाधा डाली; अपनी प्रजा को कराची में स्थित ब्रिटिश छावनी में बसने और व्यापार करने पर रोक लगाई इत्यादि।

सबसे प्रमुख आरोप यह था कि दोनों अमीर संधि का उल्लंघन करके विदेशी शक्तियों से कंपनी के विरुद्ध रक्षात्मक और आक्रामक संधियाँ कर रहे थे। इस संबंध में अमीरों के कुछ पत्र भी मिले थे। इनमें से एक पत्र हैदराबाद के अमीर नासिर खान ने मुल्तान के गवर्नर सांवल दास को लिखा था। दूसरा पत्र खैरपुर के अमीर रुस्तम खान ने महाराजा शेर सिंह को लिखा था। यद्यपि इन पत्रों में अंग्रेजों के विरुद्ध कोई स्पष्ट बात नहीं थी, फिर भी उन्हें अंग्रेज-विरोधी माना गया।

नवीन प्रस्तावित संधि

लॉर्ड एलनबरो ने सिंध के अमीरों के साथ एक नई संधि करने के लिए आउट्रम को सिंध भेजा। नई संधि में अमीरों से भविष्य के लिए अधिक धन की माँग की गई थी और अतीत में की गई कथित भूलों के दंड के रूप में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रदेश छोड़ने को कहा गया था। सिंधु नदी में चलने वाले कंपनी के स्टीमरों (जहाजों) के ईंधन, कोयले आदि का खर्च भी अमीरों को देना था।

इसके अलावा, अमीरों को अपना सिक्का ढालने का अधिकार कंपनी को देना था। कहा गया था कि 1845 के बाद कंपनी सिंध के जो नए सिक्के ढालेगी, उन पर एक ओर इंग्लैंड की रानी की प्रतिमा होगी। अमीरों को इस संधि पर 20 जनवरी 1843 तक हस्ताक्षर करने का समय दिया गया।

दरअसल, संधि का प्रस्ताव केवल दिखावा था और नेपियर को सिंध पर अधिकार करने का बहाना चाहिए था। इसी समय हैदराबाद और खैरपुर में उत्तराधिकार की समस्या उठ खड़ी हुई, जिससे नेपियर को युद्ध का बहाना भी मिल गया।

उत्तराधिकार की समस्या

हैदराबाद में अमीर पद के दो उम्मीदवार थे—नासिर खान और सोबदार खान। खैरपुर का अमीर रुस्तम खान बहुत बूढ़ा था और उसका छोटा भाई अली मुहम्मद स्वयं अमीर बनना चाहता था, जबकि रुस्तम अपने पुत्र को उत्तराधिकारी बनाना चाहता था। अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सोबदार खान और अली मुहम्मद अंग्रेजों से मिल गए, जिससे नेपियर को तालपुरों के उत्तराधिकार-विवाद में हस्तक्षेप करने का अवसर मिल गया।

युद्ध का आरंभ

नेपियर ने खैरपुर के बूढ़े अमीर रुस्तम खान के पुत्र का समर्थन न करके उसके भाई अली मुहम्मद का समर्थन किया। नेपियर चाहता था कि प्रत्येक प्रांत में केवल एक ही अमीर हो, ताकि कंपनी को कई अमीरों के स्थान पर एक ही अमीर से बातचीत करनी पड़े।

मीर रुस्तम खान अपने पुत्र को सिंहासन सौंपकर भाग गया और ऊपरी सिंध के अमीर हैदराबाद चले गए, ताकि समय आने पर संगठित प्रतिरोध किया जा सके। अमीरों को आतंकित करने के लिए नेपियर ने 11 जनवरी 1843 को इमामगढ़ के किले को बारूद से उड़ा दिया। इसके बाद नेपियर हैदराबाद गया, जहाँ रेजिडेंट आउट्रम अमीरों से संधि की वार्ता कर रहा था। अमीरों ने आउट्रम पर विश्वास करके अनमने भाव से 12 फरवरी 1843 को नई संधि पर हस्ताक्षर कर दिए।

युद्ध की घटनाएँ

अमीरों द्वारा संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद भी युद्ध नहीं रुका। बलूच अमीरों ने आउट्रम से माँग की कि रुस्तम को खैरपुर के अमीर पद पर बना रहने दिया जाए या अली मुहम्मद से उन्हें विवाद हल करने की अनुमति दी जाए, लेकिन आउट्रम ने इस संबंध में अपनी असमर्थता प्रकट की। फलतः नेपियर की आक्रामक कार्यवाही से आक्रोशित तालपुर अमीरों ने 15 फरवरी 1843 को हैदराबाद स्थित ब्रिटिश रेजिडेंसी पर आक्रमण कर दिया और सर जेम्स आउट्रम (1803–1863) को भागकर सिंधु नदी पर एक स्टीमर में शरण लेनी पड़ी। इस प्रकार नियमित युद्ध आरंभ हो गया।

मेजर जनरल नेपियर ने 17 फरवरी 1843 को लगभग 3,000 सैनिकों की सहायता से मियानी के युद्ध में सिंध के लगभग 30,000 बलूच सैनिकों को निर्णायक रूप से हरा दिया। मियानी में विजय के बाद नेपियर ने हैदराबाद पर अधिकार कर लिया। एक माह बाद उसने खैरपुर की सेना को दुब्बा नामक स्थान पर पराजित किया।

5 मार्च को लॉर्ड एलनबरो ने घोषणा की कि सुक्कुर से समुद्र तक का क्षेत्र अंग्रेजों का है। 13 मार्च 1843 को लॉर्ड एलनबरो ने मेजर जनरल नेपियर को सिंध का गवर्नर नियुक्त कर दिया, जो 1847 तक अपने पद पर बना रहा। अंतिम प्रमुख युद्ध 24 मार्च 1843 को हुआ, जिसमें मीरपुर का अमीर पराजित हुआ और मीरपुर पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।

मीरपुर की विजय के बाद नेपियर ने एलनबरो को संदेश भेजा—‘Peccavi’, जिसका लैटिन में अर्थ है, ‘मैंने पाप किया है।’ किंतु यहाँ उसका अभिप्राय था—‘मैंने सिंध पर अधिकार कर लिया है।’ इंग्लैंड में ‘पंच’ पत्रिका ने इस पर एक प्रसिद्ध निंदात्मक कार्टून प्रकाशित किया।

अगस्त 1843 तक समस्त सिंध अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित कर लिया गया। सभी अमीर बंदी बना लिए गए और उन्हें सिंध से बाहर भेज दिया गया। नेपियर ने अपनी डायरी में लिखा था, ‘हमें सिंध पर अधिकार करने का कोई अधिकार नहीं है, फिर भी हम ऐसा करेंगे और यह एक बहुत लाभदायक, लेकिन मानवीय दुष्टता का कार्य होगा।’ सिंध विजय के पश्चात् नेपियर को लूट में 70,000 पाउंड मिले, जबकि आउट्रम का हिस्सा 3,000 पाउंड था, जिसे उसने विरोधस्वरूप दान कर दिया।

1857 में लेफ्टिनेंट जनरल सर डब्ल्यू. एफ. पी. नेपियर ने सर चार्ल्स नेपियर की इन शब्दों में प्रशंसा की थी, ‘उसने इस प्रकार हमारे ऐंग्लो-इंडियन साम्राज्य को पश्चिम में एक अधिक छोटी एवं सुरक्षित सीमा प्रदान की और सिंधु नदी पर अधिकार दिलाया, मध्य एशिया के लिए सीधा व्यापारिक मार्ग खोल दिया और एक बड़े प्रदेश में अंग्रेजी शक्ति की धाक जमा दी।’ उसने आगे लिखा, ‘ऐसे दुष्ट, विश्वासघाती और निष्ठुर शासकों को हटा देना इंग्लैंड की महत्ता के सर्वथा अनुकूल ही था। इस उपलब्धि की महत्ता न्याय की वेदी पर प्रज्वलित की गई एक शुद्ध ज्वाला है।’ लॉर्ड एलनबरो ने भी नेपियर की बड़ी प्रशंसा की कि उसने मिस्र जितना बड़ा और उर्वर प्रदेश अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।

सिंध-विजय की आलोचना

सिंध-विजय एक घोर अनैतिक कार्य था और प्रायः सभी इतिहासकारों ने सिंध-विजय की कड़े शब्दों में निंदा की है। आउट्रम स्वयं नेपियर की नीति से सहमत नहीं था। उसने एलनबरो को लिखा था, ‘मैं इस नीति से हैरान हूँ। मैं यह नहीं कह सकता कि आपकी नीति सबसे अच्छी है, लेकिन निःसंदेह तलवार की नीति संक्षिप्ततम होती है। मेरी कामना थी कि आप उसका प्रयोग अच्छे कार्य के लिए करते।’ हेनरी पोटिंगर ने स्वयं लिखा है, ‘मेरे विचार में, हम चाहे जितने तर्क क्यों न दें, सिंध के अमीरों के साथ हमारे व्यवहार से जो कलंक हमारी ईमानदारी और प्रतिष्ठा पर लगा है, उसको किसी प्रकार साफ नहीं किया जा सकता है।’ वास्तव में, सिंध को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने की परिस्थितियाँ एवं कारण जानबूझकर तैयार किए गए थे और इसके लिए अमीरों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उन्होंने अंग्रेजों को किसी प्रकार की गंभीर हानि नहीं पहुँचाई थी।

अंग्रेजों का व्यवहार पूर्णतः मनमाना और स्वेच्छाचारी था और उन्होंने ही संधियों का उल्लंघन किया। उन्होंने भारतीय राज्यों पर मनमाने ढंग से दासता की शर्तें थोपने की तरह अमीरों पर भी कठोर शर्तें थोपीं, जो घोर अनैतिक और अवांछनीय थीं। सच तो यह है कि सिंध के अधिग्रहण की कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं थी। 1832 में बेंटिंक ने अमीरों से स्पष्ट वादा किया था कि अंग्रेज सिंध की ओर नजर नहीं उठाएँगे और सिंध के रास्ते सेना या सैनिक सामग्री नहीं ले जाएँगे, लेकिन अंग्रेजों ने इन शर्तों का कभी पालन नहीं किया। सिंध के अमीरों से खिराज माँगना भी अनुचित था और अमीरों पर विद्रोह के आरोप भी निराधार थे। अमीरों ने सदैव संधियों का पालन किया था और अंग्रेजों का कभी खुला विरोध नहीं किया था। नेपियर का व्यवहार असभ्य और बर्बर था। अमीरों ने उसकी सभी शर्तों को मान लिया था, फिर भी उसने सिंध पर अधिकार करने के लिए जानबूझकर उत्तेजनात्मक कार्यवाही की, जिससे अमीरों का संचित आक्रोश फूट पड़ा।

दरअसल, प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध के कारण अंग्रेजों के सम्मान और प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुँची थी, जिससे अंग्रेज बुरी तरह तिलमिला उठे थे। अतः दुर्बल सिंध को हड़पकर वे अपने कलंक को धोना चाहते थे। इस प्रकार सिंध-विजय अफगान युद्ध का स्वाभाविक परिणाम थी। एच. एच. डॉडवेल के अनुसार, ‘यदि हम विस्तृत दृष्टि से देखें, तो सिंध को सम्मिलित करना कर्नाटक को जीतने के समान ही है। दोनों मामलों में मूर्खतापूर्ण और विपरीत व्यवहार का लाभ उठाकर पर्याप्त राजनीतिक लाभ प्राप्त किया गया। एलनबरो, वेलेजली की भाँति ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थिति को सुदृढ़ करने में अधिक तत्पर था।’

संचालक मंडल ने भी सिंध को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की निंदा की, लेकिन उसने भी इस गलती को सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री रॉबर्ट पील ने भी इसे उचित नहीं माना, परंतु इतना होते हुए भी उसने भारत सरकार के इस निर्णय को नहीं बदला। ग्लैडस्टन ने भी कहा था कि सिंध को जीतना तो बुरा था ही, परंतु उसे छोड़ना उससे भी अधिक बुरा होता।

अफगान युद्ध का परिणाम

कहा जाता है कि सिंध का विलय अफगान युद्ध का परिणाम था। पी. ई. रॉबर्ट्स का कहना है कि सिंध-विजय अफगान युद्ध के पश्चात् हुई और नैतिक एवं राजनीतिक रूप से उसी का परिणाम थी। नेपियर ने भी स्वीकार किया था, ‘यह अफगान तूफान की पूँछ थी।’ सच तो यह है कि अफगानिस्तान की पराजय और अपमान से अंग्रेज बुरी तरह तिलमिलाए हुए थे। अतः दुर्बल सिंध को हड़पकर वे अपने कलंक को धोना चाहते थे। इस प्रकार सिंध-विजय को प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध के स्वाभाविक परिणाम के रूप में देखा जा सकता है।

महत्त्वपूर्ण FAQ

1. सिंध का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में कब हुआ?

सिंध का पूर्ण विलय 1843 ई. में हुआ। मेजर जनरल सर चार्ल्स नेपियर ने मियानी (17 फरवरी 1843) और दुब्बा (24 मार्च 1843) के युद्धों में तालपुर अमीरों को पराजित किया। इसके बाद अगस्त 1843 तक पूरा सिंध ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।

2. अंग्रेजों ने सिंध पर अधिकार क्यों किया?

सिंध पर अधिकार के प्रमुख कारणों में रूसी विस्तारवाद का भय, अफगानिस्तान की सामरिक स्थिति, सिंधु नदी के व्यापारिक एवं सामरिक महत्त्व, उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा तथा अफगान युद्ध के बाद ब्रिटिश प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने की इच्छा शामिल थी। इसके अतिरिक्त, कराची और सिंधु नदी के माध्यम से मध्य एशिया के साथ व्यापार की संभावनाएँ भी अंग्रेजों के लिए आकर्षण का कारण थीं।

3. सिंध के विलय में चार्ल्स नेपियर की क्या भूमिका थी?

चार्ल्स नेपियर ने सिंध के अमीरों के विरुद्ध आक्रामक नीति अपनाई। उसने 11 जनवरी 1843 को इमामगढ़ के किले को नष्ट किया और इसके बाद तालपुर अमीरों पर दबाव बढ़ाया। 17 फरवरी 1843 को मियानी के युद्ध तथा बाद में दुब्बा के युद्ध में विजय प्राप्त कर उसने सिंध पर ब्रिटिश अधिकार स्थापित किया। 13 मार्च 1843 को उसे सिंध का गवर्नर नियुक्त किया गया।

4. मियानी के युद्ध का क्या महत्त्व था?

17 फरवरी 1843 को मियानी के युद्ध में लगभग 3,000 ब्रिटिश सैनिकों ने बड़ी संख्या में बलूची सैनिकों वाली सिंध की सेना को पराजित किया। इस विजय के बाद हैदराबाद पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया और सिंध के तालपुर अमीरों की राजनीतिक शक्ति निर्णायक रूप से समाप्त हो गई। यह युद्ध सिंध के ब्रिटिश विलय की दिशा में निर्णायक घटना था।

5. सिंध के विलय की आलोचना क्यों की गई?

सिंध का विलय व्यापक रूप से अनैतिक और साम्राज्यवादी कार्रवाई माना गया। आलोचकों के अनुसार तालपुर अमीरों ने ब्रिटिश संधियों का अधिकांशतः पालन किया था, फिर भी अंग्रेजों ने उन पर आरोप लगाकर नई और कठोर संधियाँ थोप दीं तथा अंततः युद्ध का बहाना बनाया। प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध में हुई पराजय के बाद ब्रिटिश प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने की इच्छा ने भी सिंध-विलय को प्रेरित किया। इसीलिए सिंध की विजय को अक्सर “अफगान युद्ध की पूँछ” कहा जाता है।

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