प्राचीन भारत में कलिंग का राज्य और सम्राट खारवेल
प्राचीन भारत के इतिहास में कलिंग एक समृद्ध, शक्तिशाली और स्वतंत्रता-प्रिय राज्य के रूप में जाना जाता था। यह वर्तमान ओडिशा राज्य के अधिकांश भाग तथा उससे सटे कुछ क्षेत्रों में फैला हुआ था। इसी कलिंग राज्य के महामेघवाहन (चेदि) राजवंश के सबसे प्रतापी सम्राट खारवेल का उसकी वीरता, धार्मिक सहिष्णुता और लोकहितकारी नीतियों के कारण भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
प्राचीन कलिंग राज्य का भौगोलिक विस्तार और परिचय
प्राचीन कलिंग के राज्य-क्षेत्र में पुरी और गंजाम जिलों का कुछ भाग, उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम के कुछ प्रदेश तथा दक्षिण भारत के आधुनिक तेलुगु-भाषी क्षेत्रों का कुछ हिस्सा सम्मिलित था। कलिंगवासी अत्यंत स्वतंत्रता-प्रेमी थे, और यही कारण है कि मौर्य सम्राट अशोक को भी उन पर सरलता से प्रभुत्व स्थापित करने में सफलता नहीं मिली। कलिंग युद्ध (लगभग 261 ई.पू.) इतिहास के सबसे रक्तरंजित युद्धों में एक था, जिसके पश्चात् अशोक ने हिंसा त्याग कर बौद्ध धर्म अपनाया। अशोक की मृत्यु के बाद जब मौर्य साम्राज्य विघटित होने लगा और दूरवर्ती प्रांत स्वतंत्र होने लगे, तब कलिंग ने भी अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी।
हाथीगुम्फा अभिलेख: खारवेल के इतिहास का प्रमुख स्रोत
भुवनेश्वर से लगभग 4.8 किलोमीटर (3 मील) दूर स्थित उदयगिरि पहाड़ी की जैन गुफाओं में मिले हाथीगुम्फा अभिलेख से कलिंग के चेदि राजवंश के इतिहास का विस्तृत ज्ञान होता है। यह वंश स्वयं को प्राचीन चेदि नरेश वसु की संतति (वसु-उपरिचर) बताता है। हाथीगुम्फा अभिलेख की खोज उन्नीसवीं शताब्दी में हुई थी। इसे पहली बार 1825 ईस्वी में ए. स्टर्लिंग ने प्रकाश में लाया और बाद में भगवानलाल इंद्रजी, आर.डी. बनर्जी तथा काशीप्रसाद जायसवाल जैसे विद्वानों ने इसका विस्तृत पाठ-संपादन किया।
चेदि जाति और उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
चेदि भारत की एक प्राचीन जाति थी, जो लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व में बुंदेलखंड के समीपवर्ती प्रदेशों में शासन करती थी। संभवतः इसी चेदि वंश की एक शाखा कलिंग की ओर प्रवासित हुई और वहाँ एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। मौर्य सम्राट अशोक ने भीषण युद्ध के पश्चात् कलिंग को अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया था, परंतु मौर्य साम्राज्य की शक्ति शिथिल होने पर जब मगध के अनेक सुदूरवर्ती प्रदेश मौर्य अधीनता से मुक्त होने लगे, तो कलिंग भी स्वतंत्र हो गया।
कलिंग के इतिहास से संबंधित प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत
कलिंग और उसके इतिहास के संबंध में पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’, ‘महाभारत’ तथा विभिन्न पुराणों, वाल्मीकि-रचित ‘रामायण’, कालिदास-कृत ‘रघुवंश’ महाकाव्य, दंडी के ‘दशकुमारचरित’, बौद्ध जातक ग्रंथों, जैन ग्रंथ ‘उत्तराध्ययनसूत्र’, यूनानी भूगोलवेत्ता टॉलमी के भूगोल-ग्रंथ तथा सम्राट अशोक के शिलालेखों से महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनाएँ प्राप्त होती हैं।
इन सभी स्रोतों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है खारवेल द्वारा प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण कराया गया तिथिविहीन और सत्रह पंक्तियों वाला हाथीगुम्फा अभिलेख, जिसमें खारवेल के बचपन, शिक्षा, राज्याभिषेक तथा शासनकाल के तेरह वर्षों की घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन मिलता है। अभिलेख के रचयिता का नाम अज्ञात है और यह जैन शैली में अर्हतों तथा सिद्धों के आह्वान से आरंभ होता है।
कलिंग में चेदि राजवंश की स्थापना
कलिंग में चेदि राजवंश की स्थापना संभवतः महामेघवाहन ने की थी, इसी कारण इस वंश को ‘महामेघवाहन वंश’ भी कहा जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार काशीप्रसाद जायसवाल ने मेघवंशीय राजाओं को चेदि वंश का माना है। महामेघवाहन और खारवेल के बीच के शासकों का इतिहास पूर्णतः स्पष्ट नहीं है। उदयगिरि पहाड़ी की मंचपुरी गुफा के एक अभिलेख में महाराज वक्रदेव नामक महामेघवाहन शासक का उल्लेख मिलता है, जो संभवतः कलिंग के चेदि राजवंश का दूसरा शासक और खारवेल का पिता था। महामेघवाहन की तीसरी पीढ़ी में खारवेल उत्पन्न हुआ, जो इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली, प्रतापी और ख्यातिनामा शासक सिद्ध हुआ।
कलिंग नरेश खारवेल : प्रारंभिक जीवन और राज्याभिषेक
खारवेल की गणना संपूर्ण प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रमुख और सर्वाधिक प्रभावशाली शासकों में की जाती है। वह कलिंग (वर्तमान ओडिशा) में शासन करने वाले महामेघवाहन वंश का सबसे महान तथा प्रख्यात सम्राट था।
शिक्षा-दीक्षा और युवराज पद
हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार 15 वर्ष की आयु तक खारवेल ने राजोचित विद्याएँ सीखीं। उसका शरीर स्वस्थ और वर्ण गौर था। उसे लेख (लिपि), मुद्रा (गणना-पद्धति/सिक्का-विद्या), गणना, व्यवहार (कानून-व्यवहार), विधि (न्याय-शास्त्र) तथा अन्य विद्याओं की शिक्षा दी गई, और वह इन सभी विद्याओं में पारंगत हो गया। 15 वर्ष की आयु में वह युवराज नियुक्त हुआ और अगले 9 वर्षों तक प्रशासनिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी करता रहा।
राज्याभिषेक और उपाधियाँ
चौबीस वर्ष की अवस्था में खारवेल का औपचारिक राज्याभिषेक हुआ और वह कलिंग के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। राजा बनने पर उसने ‘कलिंगाधिपति’ और ‘कलिंग चक्रवर्ती’ जैसी गौरवशाली उपाधियाँ धारण कीं। उसका विवाह ललक हठिसिंह राजा की कन्या से हुआ, जो उसकी प्रधान महिषी (पटरानी) बनी और जिसका अभिलेखों में उल्लेख मिलता है।
खारवेल की उपलब्धियाँ
हाथीगुम्फा अभिलेख की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यह है कि यह खारवेल के शासनकाल की घटनाओं को वर्षवार, क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है, जो भारतीय पुरा-अभिलेखों में अत्यंत दुर्लभ है।
प्रथम वर्ष : राजधानी का पुनर्निर्माण
राज्यभार ग्रहण करने के प्रथम वर्ष में खारवेल ने अपनी राजधानी कलिंग नगरी में व्यापक निर्माण-कार्य करवाया। उसने तूफान में क्षतिग्रस्त हुए गोपुरों (प्रवेश-द्वारों), प्राचीरों (परकोटों) तथा तोरणों की मरम्मत करवाई और नगर का पुनर्संस्कार कर उसे सुसज्जित किया। उसने सोपानयुक्त शीतल जल वाले तड़ागों (जलाशयों) तथा उद्यानों का निर्माण भी करवाया। इन कार्यों में उसने पाँच लाख मुद्राएँ व्यय कीं, जिससे उसे अपनी प्रजा में व्यापक लोकप्रियता प्राप्त हुई और राजधानी में उसकी राजनीतिक स्थिति सुदृढ़ हो गई।
द्वितीय वर्ष: पश्चिम दिशा में प्रथम सैन्य अभियान
अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद खारवेल ने दिग्विजय की व्यापक योजना बनाई। शासन के दूसरे वर्ष उसने सातवाहन नरेश सातकर्णि की शक्ति की परवाह किए बिना अपनी विशाल सेना पश्चिम की ओर भेजी और कश्यप क्षत्रियों के सहयोग से कण्वेणा नदी पर स्थित मुसिक नगर (ऋषिक नगर) को पूर्णतः नष्ट कर दिया।
कण्वेणा नदी की पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद है- कुछ इतिहासकार इसे वैनगंगा (महाराष्ट्र की एक छोटी नदी) और उसकी सहायक नदी कन्हन से जोड़ते हैं, जबकि काशीप्रसाद जायसवाल के अनुसार कण्वेणा को आधुनिक कृष्णा नदी और मुसिक नगर को कृष्णा-मूसी संगम पर स्थित मानना चाहिए। सातकर्णि सातवाहन वंश का शासक था, जिसका आंध्र प्रदेश में स्वतंत्र राज्य विद्यमान था। मौर्य साम्राज्य की अधीनता से मुक्त होने वाले प्रांतों में आंध्र भी सम्मिलित था।
अभिलेख के वर्णन से प्रतीत होता है कि यह सैन्य अभियान एक धावा-मात्र था, क्योंकि खारवेल तथा सातकर्णि की सेनाओं के बीच किसी प्रत्यक्ष संघर्ष का उल्लेख नहीं मिलता। संभवतः दोनों शासकों में मैत्री-संबंध थे और कुछ विद्वानों के अनुसार खारवेल यह अभियान सातकर्णि के विरुद्ध नहीं, बल्कि किसी की रक्षार्थ लेकर गया था। लौटने पर तीसरे वर्ष उसने अपनी राजधानी में संगीत, वाद्य, नृत्य और नाट्य-अभिनय द्वारा भव्य उत्सव मनाया।
चतुर्थ वर्ष: भोजकों और राष्ट्रिकों की विजय
शासन के चौथे वर्ष खारवेल ने पुनः पश्चिम दिशा में आक्रमण किया और भोजकों तथा राष्ट्रिकों (रठिकों) को अपने अधीन कर लिया। भोजकों की स्थिति वर्तमान बरार (विदर्भ) क्षेत्र में थी, जबकि राष्ट्रिक पूर्वी खानदेश और अहमदनगर क्षेत्र में स्थित थे। प्राचीन अंधक-वृष्णियों की भाँति राष्ट्रिक-भोजक भी संभवतः क्षत्रिय-कुल थे, जिनके अपने गणराज्य थे और जो प्रायः सातवाहनों की अधीनता स्वीकार करते थे।
अभिलेख में उल्लेख है कि खारवेल ने विद्याधरों के क्षेत्र में निवास किया। संभवतः विद्याधर क्षेत्र में जैनियों का कोई तीर्थस्थल था, जिस पर राष्ट्रिकों-भोजकों ने अधिकार कर लिया था। खारवेल ने इस पवित्र स्थल की रक्षा हेतु उन्हें पराजित कर उनका रत्न-धन छीन लिया और उन्हें अपने चरणों में नमन करवाया। उल्लेखनीय है कि अशोक के शिलालेखों में भी राष्ट्रिकों और भोजकों का उल्लेख मिलता है, जो मौर्य साम्राज्य के अधीन थे और सातवाहन शासकों से इनके मैत्रीपूर्ण संबंध भी थे। यही नहीं, सातकर्णि प्रथम की पत्नी स्वयं महारठी (महारष्ट्रिक) वंश की राजकुमारी थी।
पंचम वर्ष: तनसुलि नहर और सिंचाई-व्यवस्था
शासन के पाँचवें वर्ष खारवेल ने नंद राज द्वारा पूर्व में खुदवाई गई तनसुलि नहर को अपनी राजधानी से जोड़ दिया, जिससे उसकी प्रजा को सिंचाई और यातायात दोनों की सुविधा प्राप्त हुई। यह ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण उल्लेख है, क्योंकि इसी संदर्भ के आधार पर खारवेल के काल-निर्धारण का प्रयास किया जाता है। किंतु यह स्पष्ट नहीं है कि यह नंद शासक मगध का महापद्मनंद था अथवा कलिंग का कोई स्थानीय नंद-वंशी शासक।
षष्ठ एवं सप्तम वर्ष : प्रजाहितकारी कार्य
छठे वर्ष खारवेल ने एक लाख मुद्राएँ व्यय कर अपनी प्रजा को सुखी रखने हेतु अनेक कार्य किए। उसने गाँवों तथा नगरों के निवासियों पर अनुग्रह करते हुए सभी प्रकार के करों को माफ कर दिया, जो प्राचीन भारत में राजकोषीय उदारता का एक दुर्लभ उदाहरण है। सातवें वर्ष का विवरण अभिलेख में क्षतिग्रस्त होने के कारण संदिग्ध है; संभवतः इसी वर्ष उसका विवाह ललक हठिसिंह की कन्या से हुआ तथा उसने राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान भी करवाया।
अष्टम वर्ष: मगध पर आक्रमण और यवनराज दिमित का पलायन
शासन के आठवें वर्ष खारवेल ने उत्तर भारत की ओर एक महत्त्वपूर्ण सैन्य अभियान चलाया। उसकी सेना ने बराबर पहाड़ी पर स्थित गोरथगिरि के दुर्ग को ध्वस्त कर राजगृह को घेर लिया। इस अभियान से भयभीत होकर एक यवन-राज ‘दिमित’ मथुरा की ओर भाग गया। इस ‘दिमित’ की निश्चित पहचान विवादास्पद है, परंतु अनेक विद्वान इसे हिंद-यवन (इंडो-ग्रीक) शासक डेमेट्रियस से जोड़ते हैं, जिसके आधार पर खारवेल का काल-निर्धारण करने का भी प्रयास किया जाता है।
नवम वर्ष: महाविजय प्रासाद का निर्माण
राज्यारोहण के नौवें वर्ष खारवेल ने अपनी सैन्य विजयों की स्मृति में प्राची नदी के दोनों तटों पर लगभग 38 लाख मुद्राओं की भारी लागत से ‘महाविजय प्रासाद’ नामक भव्य राजमहल बनवाया। साथ ही उसने ब्राह्मणों को स्वर्ण-निर्मित कल्पवृक्ष, अश्व, गज (हाथी) और रथ जैसी बहुमूल्य वस्तुएँ भेंट कीं।
दशम वर्ष: भारतवर्ष पर पुनः आक्रमण
दसवें वर्ष खारवेल ने पुनः पृथ्वी-विजय की महत्त्वाकांक्षा से भारतवर्ष (गंगा घाटी क्षेत्र) पर आक्रमण किया, किंतु इस अभियान में उसे कोई विशेष उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली।
एकादश वर्ष: दक्षिण भारत की ओर अभियान
ग्यारहवें वर्ष खारवेल ने अपना ध्यान दक्षिण भारत की ओर केंद्रित किया। उसकी सेना ने प्राचीन नगर पिथुंड को ध्वस्त किया और आगे बढ़कर ‘तमिल संघ’ का भेदन किया (भेदति तमिर-देश-संगहतं)। ऐसा प्रतीत होता है कि खारवेल का सामना करने हेतु दक्षिण के तमिल राजाओं ने किसी संघ की स्थापना की थी, जिसे खारवेल ने छिन्न-भिन्न कर दिया। अभिलेख के अनुसार खारवेल ने पिथुंड नगर को नष्ट कर उसे एक विशाल कृषि-फार्म में बदल दिया और गदहों से हल चलवाया। यह अपमानजनक कृत्य विजित शत्रु को दंडित करने की तत्कालीन परंपरा का सूचक है। पिथुंड नगर की पहचान मसुलीपट्टम (मछलीपट्टनम) के निकट स्थित पिटुंड्र नामक स्थान से की जाती है, जिसका उल्लेख यूनानी भूगोलवेत्ता टॉलमी ने भी किया है। दक्षिण की ओर विजय-यात्रा करता हुआ खारवेल पांड्य राज्य तक जा पहुँचा। इसी वर्ष उसने तेरह सौ वर्ष पुरानी एक जैन प्रतिमा के साथ एक भव्य जुलूस भी निकाला।
द्वादश वर्ष: दो निर्णायक सैन्य अभियान
बारहवें वर्ष खारवेल ने एक साथ दो महत्त्वपूर्ण सैन्य अभियान किए- एक उत्तर भारत में, दूसरा दक्षिण भारत में। उत्तरापथ विजय और नंद-प्रतिमा की वापसी खारवेल ने सर्वप्रथम उत्तरापथ पर आक्रमण कर मगध नरेश को पराभूत किया और उसे अपने चरणों की वंदना करवाई। उसने अपने घोड़ों तथा हाथियों को गंगा नदी में स्नान करवाकर अपनी विजय का प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया। इसके पश्चात् वह लगभग तीन शताब्दियों पूर्व नंद राज द्वारा कलिंग से छीन ली गई प्रथम जैन प्रतिमा को अतुल संपत्ति के साथ पुनः अपनी राजधानी ले आया। यह घटना धार्मिक और राजनीतिक, दोनों दृष्टियों से अत्यंत प्रतीकात्मक है। उत्तर भारत से प्राप्त धन से उसने भुवनेश्वर में एक भव्य मंदिर बनवाया, जिसका उल्लेख ओडिशा से प्राप्त ब्रह्मांड पुराण की एक हस्तलिखित प्रति में भी मिलता है।
बृहस्पतिमित्र की पहचान संबंधी विवाद जिस मगध नरेश को खारवेल ने अपने चरणों पर झुकने के लिए विवश किया, उसके नाम को लेकर इतिहासकारों में गहरा मतभेद है। काशीप्रसाद जायसवाल ने इस शासक को बृहस्पतिमित्र पढ़कर उसे शुंगवंशी सम्राट पुष्यमित्र शुंग का पर्यायवाची मान लिया और यह प्रतिपादित किया कि खारवेल ने पुष्यमित्र शुंग को पराजित किया था। परंतु अनेक आधुनिक विद्वान इस नाम को न तो बृहस्पतिमित्र पढ़ने से सहमत हैं और न ही उसे पुष्यमित्र के साथ समीकृत करने से। फिर भी इतना निश्चित माना जाता है कि खारवेल ने उत्तरापथ अभियान में मगध पर विजय प्राप्त की और वहाँ के शासक को नतमस्तक होने पर विवश किया।
पांड्य राज्य की अधीनता बारहवें वर्ष का ही खारवेल का अंतिम सैन्य अभियान सुदूर दक्षिण के पांड्य राजाओं के विरुद्ध हुआ। पांड्य नरेश ने खारवेल की अधीनता स्वीकार कर ली और उसे हाथी, घोड़े, हीरे तथा बहुमूल्य जवाहरात भेंट किए। खारवेल अपार संपत्ति के साथ राजधानी लौटा। इन चतुर्दिक विजयों के कारण खारवेल की रानी के अभिलेख में उसे ‘चक्रवर्ती’ की संज्ञा दी गई है।

त्रयोदश वर्ष: गुहा-विहारों का निर्माण
शासन के तेरहवें और अंतिम वर्ष में खारवेल ने आश्रयहीन धर्मोपदेशक जैन अर्हतों के निवास हेतु कुमारी पर्वत (उदयगिरि-खंडगिरि पहाड़ी) पर अनेक गुहा-विहारों का निर्माण करवाया, जो उसकी धार्मिक निष्ठा का प्रमुख प्रमाण है।
खारवेल की धार्मिक नीति: जैन धर्म का संरक्षण एवं सर्व-धर्म समभाव
खारवेल स्वयं जैन धर्म का अनुयायी था और संभवतः उसके समय में कलिंग की बहुसंख्यक जनता भी वर्धमान महावीर के धर्म को अपना चुकी थी। उसने जैन भिक्षुओं के निर्वाह हेतु प्रभूत दान दिया और उनके आवास के लिए आरामदायक गुफाओं का निर्माण करवाया। यह उल्लेखनीय है कि भिक्षु-आवासों का विवरण सुरक्षित रखने के उद्देश्य से ही खारवेल ने हाथीगुम्फा अभिलेख उत्कीर्ण करवाया था। इसके अतिरिक्त, उसने पाभार नामक स्थान पर तपस्वियों के लिए स्तंभों का निर्माण भी करवाया।
सर्व-पंथ समादर की नीति
खारवेल जैन धर्मानुयायी होते हुए भी अन्य धर्मों के प्रति उतना ही श्रद्धालु था। हाथीगुम्फा अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने सभी देवताओं के मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाया और वह समस्त संप्रदायों का समान आदर करता था। इसे अभिलेख में ‘सब पासंड पूजक सब देवायतन संकारक’ कहा गया है। उसने विद्वानों (पंडितों) की एक विराट् सभा का भी आयोजन किया। इसी धार्मिक उदारता के कारण खारवेल को शांति एवं समृद्धि का सम्राट, भिक्षु सम्राट तथा धर्मराज के रूप में स्मरण किया जाता है।
खारवेल की लोकोपकारी नीतियाँ
खारवेल एक प्रजावत्सल तथा लोकोपकारी शासक था, जो प्रजा-कल्याण हेतु धन-व्यय की चिंता नहीं करता था। उसने प्रजा की भलाई के लिए तीन सौ वर्ष पूर्व नंद राज द्वारा निर्मित तनसुलि नहर को राजधानी से जोड़ा, नगर व गाँवों की प्रजा को करों से मुक्त किया, और जनता के मनोरंजन के लिए समय-समय पर नृत्य-संगीत के भव्य समारोहों का आयोजन करवाता रहा।
कला, साहित्य और स्थापत्य का संरक्षक
हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार राजा खारवेल कला, साहित्य, गणित तथा सामाजिक विज्ञान का भी गहन ज्ञाता था। अभिलेख पालि-प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि पालि तत्कालीन उड़िया-भाषी लोगों की मूल भाषा रही होगी।
नृत्य-नाट्य कला को संरक्षण
कला के संरक्षक के रूप में खारवेल की बड़ी ख्याति थी। उसने अपनी राजधानी में नृत्य और नाट्य-कला को उदारतापूर्वक प्रोत्साहन दिया। उदयगिरि की रानी गुफा तथा खंडगिरि की अनंत गुफा में उत्कीर्ण भित्ति-चित्र आज भी चित्रकला की दृष्टि से उच्च कोटि के माने जाते हैं।
भवन-निर्माण एवं गुहा-विहार
खारवेल को भवन-निर्माण में विशेष रुचि थी। राजा बनते ही उसने अपनी राजधानी को प्राचीरों, तोरणों, तड़ागों और उद्यानों से अलंकृत करवाया, तथा भव्य ‘महाविजय प्रासाद’ का निर्माण करवाया, जो उसके स्थापत्य-प्रेम का जीवंत प्रमाण है। उदयगिरि में 19 तथा खंडगिरि में 16 गुहा-विहारों का निर्माण श्रमण-संप्रदायों के प्रति उसकी अटूट श्रद्धा का परिचायक है। ये गुफाएँ आज भी पुरातत्त्वविदों तथा पर्यटकों के लिए प्राचीन जैन स्थापत्य-कला का महत्त्वपूर्ण अध्ययन-स्रोत बनी हुई हैं।
खारवेल का काल-निर्धारण
खारवेल ने कुल तेरह वर्ष शासन किया, किंतु उसका सटीक काल-निर्धारण आज भी इतिहासकारों के बीच विवादग्रस्त विषय बना हुआ है। काशीप्रसाद जायसवाल ने हाथीगुम्फा अभिलेख में उल्लिखित मगध-नरेश को बृहस्पतिमित्र पढ़कर उसे पुष्यमित्र शुंग के समकक्ष माना और यवन-राज ‘दिमित’ को इंडो-ग्रीक शासक डेमेट्रियस मानकर यह निष्कर्ष निकाला कि खारवेल पुष्यमित्र शुंग तथा डेमेट्रियस का समकालीन था। इस आधार पर वे खारवेल को लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में रखते हैं।
अनेक आधुनिक इतिहासकार इस समीकरण को संदिग्ध मानते हैं और हाथीगुम्फा अभिलेख की लिपि-शैली (पैलियोग्राफी) के आधार पर खारवेल का काल प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व निर्धारित करते हैं। अभिलेख की छठी पंक्ति में उल्लेख है कि खारवेल ने नंद राज द्वारा ‘तिवससत’ (तीन सौ वर्ष) पूर्व निर्मित तनसुलि नहर को अपनी राजधानी से जोड़ा था। इस शब्द के पाठ को लेकर भी विद्वानों में गंभीर मतभेद है। राखालदास बनर्जी जैसे विद्वान इसका अर्थ ‘300’ वर्ष मानते हैं, जबकि कुछ अन्य विद्वान इसे ‘103’ वर्ष पढ़ने के पक्षधर हैं। इस पाठ-भेद के कारण खारवेल के काल-निर्धारण में लगभग 200 वर्षों तक का अंतर हो जाता है, यद्यपि वर्तमान में ‘300 वर्ष’ वाला पाठ अधिक मान्य है। प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के समर्थक इतिहासकार अभिलेख में उल्लिखित नंद राज की पहचान मगध के महापद्मनंद (लगभग 344 ई.पू.) से करते हुए खारवेल को लगभग प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य भाग में स्थापित करते हैं।
इस प्रकार खारवेल के शासनकाल की सर्वसम्मत तिथि अभी भी निर्धारित नहीं हो सकी है। खारवेल के पश्चात् चेदि राजवंश के संबंध में कोई निश्चित ऐतिहासिक सूचना नहीं मिलती है। संभवतः उसकी मृत्यु के बाद उसका शक्तिशाली साम्राज्य शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गया।
खारवेल का ऐतिहासिक मूल्यांकन
खारवेल ने एक महान सेनानायक के रूप में न केवल मगध को पराजित कर उसे अपने चरणों की वंदना करवाई और यवन शासक को भयभीत कर भगाया, अपितु ‘तमिल संघ’ का भेदन कर सुदूर दक्षिण के पांड्य राज्य से मुक्तामणियों का उपहार भी प्राप्त किया और इन्हीं विजयों के आधार पर ‘कलिंगाधिपति’ की गौरवशाली उपाधि धारण की। वह एक महान विजेता और लोकोपकारी शासक होने के साथ-साथ धर्म-सहिष्णु, कला-प्रेमी सम्राट भी था। वह स्वयं विद्वान (राजर्षि) था और विद्वानों का उदार आश्रयदाता भी था।
हाथीगुम्फा अभिलेख में खारवेल को अप्रतिहत वाहिनी, बल चक्रधर, प्रवृत्त चक्र, आर्य महाराज, लेम राज, वृद्ध राज, धर्म राज तथा महाविजय राज जैसी उपाधियों से संबोधित किया गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि उसमें एक राज-विजयी और धर्म-विजयी शासक के गुणों का अद्भुत समन्वय था। अपने कृतित्व और व्यक्तित्व के माध्यम से खारवेल ने कलिंग के गौरव को उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया और आज भी वह प्राचीन भारतीय इतिहास के सर्वाधिक बहुआयामी शासकों में गिना जाता है।


