मौर्य राजवंश (Mauryan Dynasty)

मौर्य राजवंश (Mauryan Dynasty)
मौर्य राजवंश का इतिहास मौर्य राजवंश का परिचय मौर्य राजवंश (लगभग 322–185 ई. पू.) प्राचीन […]

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मौर्य राजवंश का इतिहास

मौर्य राजवंश का परिचय

मौर्य राजवंश (लगभग 322–185 ई. पू.) प्राचीन भारत का पहला व्यापक और सुदृढ़ केंद्रीकृत साम्राज्य था, जिसकी स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद सत्ता को पराजित कर की। चंद्रगुप्त ने चाणक्य (कौटिल्य) के मार्गदर्शन में मगध की सत्ता प्राप्त की और पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना, बिहार) को अपनी राजधानी बनाया। उसने उत्तर-पश्चिम भारत में सिकंदर के उत्तराधिकारियों की शक्ति को चुनौती दी तथा लगभग 305–303 ई.पू. में सेल्यूकस निकेटर के साथ संघर्ष के बाद संधि की, जिससे मौर्य साम्राज्य की पश्चिमी सीमा और अधिक सुदृढ़ हुई तथा हेरात, कंधार, काबुल और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्र मौर्य साम्राज्य में सम्मिलित हो गए इसी संधि के परिणामस्वरूप सेल्यूकस ने अपना राजदूत मेगस्थनीज चंद्रगुप्त के दरबार में भेजा, जिसने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘इंडिका’ की रचना की।

चंद्रगुप्त के उत्तराधिकारी बिंदुसार (लगभग 298–273 ईसा पूर्व) ने साम्राज्य की स्थिरता बनाए रखी और दक्षिण भारत के अनेक क्षेत्रों तक मौर्य प्रभाव का विस्तार किया। यूनानी स्रोतों में उसे ‘अमित्रोचेट्स’ (अमित्रघात) कहा गया है, जो संभवतः संस्कृत के ‘अमित्रघात’ (शत्रुओं का नाशक) शब्द का यूनानी रूपांतरण है। बिंदुसार के दरबार में सीरियाई शासक एंटियोकस प्रथम का राजदूत डाइमेकस भी आया था।

सम्राट अशोक (लगभग 268–232 ईसा पूर्व) मौर्य वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक था। उसके शासन के प्रारंभिक चरण में कलिंग युद्ध (लगभग 261 ईसा पूर्व) हुआ, जिसके बाद अशोक ने युद्ध और हिंसा की नीति से विरत होकर धम्म के प्रचार पर बल दिया तथा बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया। उसके शिलालेख (मेजर रॉक एडिक्ट्स), स्तंभलेख (पिलर एडिक्ट्स) और लघु शिलालेख मौर्य प्रशासन, नैतिक नीति और शासन-दृष्टि के प्रमुख स्रोत हैं। सारनाथ का सिंह-स्तंभ, जिसे स्वतंत्र भारत ने अपना राष्ट्रीय प्रतीक बनाया, अशोककालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति धीरे-धीरे कमजोर हुई और लगभग 185 ईसा पूर्व अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग द्वारा हत्या के साथ मौर्य वंश का अंत हुआ तथा भारत में शुंग वंश की स्थापना हुई।

मौर्यों के इतिहास-निर्माण के स्रोत

326 ई.पू. में जब सिकंदर की सेनाएँ पंजाब के विभिन्न राज्यों में विध्वंसक युद्धों में व्यस्त थीं, उस समय मगध में नंद वंश का राजा धननंद (महापद्मनंद वंश का अंतिम शासक) शासन कर रहा था। सिकंदर के आक्रमण से देश के लिए संकट पैदा हो गया था, किंतु धननंद का सौभाग्य था कि वह इस आक्रमण से बच गया, क्योंकि सिकंदर की सेना ब्यास नदी से आगे बढ़ने को तैयार नहीं हुई और उसे वापस लौटना पड़ा। इसी समय राजनीतिक मंच पर एक ऐसे व्यक्ति का उदय हुआ, जिसका नाम चंद्रगुप्त था। यूनानी लेखक प्लूटार्क ने इसे एंड्रोकोट्टस तथा जस्टिन, एरियन आदि ने सैंड्रोकोट्टस कहा है। विलियम जोन्स पहले विद्वान थे, जिन्होंने ‘सैंड्रोकोट्टस’ की पहचान भारतीय ग्रंथों के ‘चंद्रगुप्त’ से की है।

चंद्रगुप्त मौर्य के आगमन से भारतीय इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ और मौर्य वंश की स्थापना हुई। मौर्यों के आगमन से भारतीय इतिहासकारों के लिए अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का मार्ग खुल गया, कालानुक्रम स्पष्ट हो गया तथा अनेक छोटे-छोटे राज्य सिमटकर एक विशाल साम्राज्य में परिवर्तित हो गए।

मौर्य राजवंश के संबंध में ब्राह्मण, बौद्ध और जैन साहित्य से सूचना मिलती है। चंद्रगुप्त एवं अशोक का इतिहास कवि-कल्पना प्रसूत साहित्यिक कृतियों में ही नहीं, प्रत्युत, पुरातात्त्विक स्रोतों में भी उपलब्ध है। ब्राह्मण साहित्य में पुराण, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, सोमदेव का कथासरित्सागर आदि ग्रंथ महत्त्वपूर्ण हैं। इन स्रोतों को सुविधा की दृष्टि से तीन मुख्य श्रेणियों में बाँटा जा सकता है- साहित्यिक स्रोत, विदेशी यात्रियों-लेखकों के विवरण और पुरातात्त्विक स्रोत।

साहित्यिक स्रोत

पुराण

मौर्यों के इतिहास-निर्माण में भारतीय ग्रंथों में पुराण सर्वाधिक उपयोगी हैं। पुराणों की संख्या बहुत अधिक है, किंतु अठारह पुराणों को महापुराण की कोटि में रखा जाता है। यद्यपि धार्मिक ग्रंथ होने और ब्राह्मण प्रणेताओं के कारण बौद्ध धर्मानुयायी मौर्यों का जीवन-वृत्त उनके लिए उपेक्षणीय रहा है, किंतु मौर्यों के अभिजन तथा वंश-क्रम के निर्धारण में उनसे पर्याप्त सहायता मिलती है। मौर्यों के इतिहास-निर्माण की दृष्टि से विष्णु पुराण, भागवत पुराण एवं मारकंडेय पुराण विशेष रूप से उपयोगी हैं, क्योंकि इनमें मौर्य शासकों की वंशावली और उनके शासनकाल की अवधि का उल्लेख मिलता है।

अर्थशास्त्र

मौर्य वंश के इतिहास-निर्माण और तत्कालीन समाज एवं संस्कृति के अध्ययन की दृष्टि से अर्थशास्त्र पर्याप्त उपयोगी है। परंपरागत मत के अनुसार इसकी रचना चंद्रगुप्त मौर्य के काल (लगभग चौथी शताब्दी ई.पू.) में हुई थी, यद्यपि इसका वर्तमान संकलित रूप लगभग चौथी शताब्दी ई. के आसपास तैयार हुआ माना जाता है। इस प्रसिद्ध राजनीतिक ग्रंथ के प्रणेता कौटिल्य (विष्णुगुप्त) माने जाते हैं। विष्णुगुप्त नाम कामंदक के नीतिसार में मिलता है-

नीतिशास्त्रामृतं धीमानर्थशास्त्र महोदधे।

समुद्रधे नमस्तस्मै विष्णुगुप्ताय वेधसे।।

चणक का पुत्र होने के कारण विष्णुगुप्त को चाणक्य भी कहा जाता है। भागवत पुराण के टीकाकार ने विष्णुगुप्त के लिए कौटिल्य, वात्स्यायन, चाणक्य आदि नामों का प्रयोग किया है। अर्थशास्त्र में लगभग 6,000 श्लोक और 15 अधिकरण (खंड) हैं, किंतु बीच-बीच में गद्य शैली में भी विषय का प्रतिपादन किया गया है। इसमें मूलतः राजनीतिक सिद्धांत, राजतंत्र, कूटनीति, युद्धनीति तथा राजस्व-व्यवस्था प्रतिपादित हैं, किंतु इससे मौर्ययुगीन राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक संगठन पर भी प्रकाश पड़ता है। इस ग्रंथ की खोज का श्रेय आर. शामशास्त्री को जाता है, जिन्होंने 1905 ई. में इसकी मूल पांडुलिपि की खोज कर इसे 1909 ई. में प्रकाशित किया।

मुद्राराक्षस

मौर्य वंश के इतिहास-निर्माण में विशाखदत्तकृत मुद्राराक्षस का अद्वितीय स्थान है। यद्यपि मुद्राराक्षस का काल-निर्धारण विवादग्रस्त है, किंतु इसे चतुर्थ शताब्दी ई. के उत्तरार्ध अथवा पाँचवीं शताब्दी ई. के पूर्वार्ध में रखा जा सकता है। इस प्रकार मुद्राराक्षस गुप्तकाल से संबंधित लगता है।

मुद्राराक्षस की संपूर्ण कथावस्तु का मूलरूप लोक-प्रचलित तथा पुराणादिकों में बीजरूप में उपलब्ध था और इसे ही नाटककार ने अपनी कल्पनाओं के आधार पर पल्लवित करने का प्रयास किया है। इसमें चाणक्य द्वारा नंदवंश का विनाश, पाटलिपुत्र के सिंहासन पर चंद्रगुप्त को आसीन करने, नंद अमात्य राक्षस द्वारा चंद्रगुप्त की योजना में बाधा उत्पन्न करने तथा अंततः उसे कूटनीति द्वारा चंद्रगुप्त के पक्ष में करने जैसी ऐतिहासिक घटनाएँ वर्णित हैं। इसके अलावा इससे मौर्ययुगीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक स्थिति का भी ज्ञान होता है।

मुद्राराक्षस की टीका

अठारहवीं शताब्दी ई. के प्रारंभ में ढुंढिराज ने मुद्राराक्षस पर टीका लिखी है जो मौर्यों के इतिहास-निर्माण में उपयोगी है। यद्यपि इस ग्रंथ में मनगढ़ंत और कपोलकल्पित कहानियाँ अधिक हैं, किंतु इनमें अनेक उपयोगी सूचनाएँ भी मिलती हैं।

कात्यायन का वार्तिक

कात्यायन विरचित वार्तिक से भी मौर्य वंश के इतिहास-निर्माण में प्रकारांतर से सहायता मिलती है। कात्यायन के वार्तिक में ‘देवानांप्रिय’ शब्द की व्याख्या की गई है, जो अशोक के अभिलेखों में प्रयुक्त उसकी प्रमुख उपाधियों में से एक है।

महाभाष्य

पतंजलि ने पाणिनि के अष्टाध्यायी पर महाभाष्य की रचना की है। वे शुंगवंशीय शासक पुष्यमित्र के समकालीन थे। शालिशुक जैसे दुर्बल शासक के काल में यवनाक्रमण की आँधी उनके सामने गुजरी थी। इसलिए महाभाष्य से मौर्य वंश की पतनोन्मुखी राजनीतिक एवं सामाजिक स्थिति पर प्रकाश पड़ता है। महाभाष्य से पता चलता है कि आर्थिक संकट से उबरने के लिए मौर्य शासकों ने देव-प्रतिमाएँ बनवाई तथा उनकी बिक्री की। इससे धन-संग्रह में पर्याप्त सहायता मिली।

भास के नाटक

भास ने अपने नाटकों की रचना प्राक्-मौर्ययुगीन कथानकों के आधार पर की थी, इसलिए मगध साम्राज्य के इतिहास-निर्माण में भास के नाटक (जैसे प्रतिज्ञायौगंधरायण, स्वप्नवासवदत्तम्) भी उपयोगी हैं।

मालविकाग्निमित्रम्

कालिदास के ‘मालविकाग्निमित्रम्’ से मौर्यकालीन इतिहास एवं संस्कृति पर प्रकाश पड़ता है। इस नाटक का नायक अग्निमित्र शुंगवंशीय शासक पुष्यमित्र शुंग का पुत्र था। यद्यपि इस नाटक का सीधा संबंध मौर्य वंश से नहीं है, किंतु इस वंश की पतनोन्मुख स्थिति पर प्रकाश डालने के लिए यह नाटक अत्यंत उपयोगी है।

हर्षचरित

बाणभट्ट की रचना ‘हर्षचरित’ से भी मौर्य वंश के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। इसमें बृहद्रथ के विरुद्ध पुष्यमित्र के षड्यंत्र एवं उसकी हत्या कर राज्य हड़पने का उल्लेख मिलता है।

कथासरित्सागर तथा बृहत्कथामंजरी

ग्यारहवीं शताब्दी ई. के दो संस्कृत ग्रंथों- सोमदेव के कथासरित्सागर तथा क्षेमेंद्र की बृहत्कथामंजरी में चंद्रगुप्त की शूद्र उत्पत्ति का एक भिन्न विवरण मिलता है। इन ग्रंथों की रचना प्रथम शताब्दी ई. में रचित गुणाढ्य के बृहत्कथा के आधार पर की गई है। बृहत्कथा की रचना मूलतः पैशाची भाषा में की गई थी, जिसे गंगवंशीय ‘दुर्विनीति’ ने संस्कृत में अनूदित किया था। कथासरित्सागर में नंदवंश के विनाश के पश्चात् मौर्य वंश की स्थापना का उल्लेख मिलता है।

राजतरंगिणी

कल्हणकृत ‘राजतरंगिणी’ में भी मौर्य वंश के इतिहास का विवरण मिलता है। कल्हण ने आरंभ से बारहवीं शताब्दी तक के कश्मीर के इतिहास का वर्णन किया है। प्रसंगतः उसने कश्मीर के शासक के रूप में अशोक और उसके उत्तराधिकारियों का विवरण दिया है।

बौद्ध ग्रंथ

बौद्ध ग्रंथों में ‘महावंसटीका’ व ‘महाबोधिवंस’ सर्वाधिक उपयोगी हैं। महावंसटीका को ‘वंसत्थप्पकासिनी’ भी कहते हैं, जिसकी रचना लगभग दसवीं शताब्दी ई. के मध्य हुई थी, और महाबोधिवंस, जिसके रचयिता ‘उपतिस्स’ हैं, की रचना लगभग दसवीं शताब्दी ई. के उत्तरार्ध में हुई थी। इन दोनों ही ग्रंथों का आधार ‘सीहलट्ठकथा’ तथा ‘उत्तरविहारट्ठकथा’ नामक प्राचीन ग्रंथ हैं। सीहलट्ठकथा के बारे में कहा जाता है कि उसकी रचना थेर महिंद (अशोक के पुत्र) तथा उनके साथ मगध से आए हुए अन्य भिक्षुओं ने की थी, जिन्हें संघ के प्रधान ने धर्मप्रचार के लिए लंका भेजा था। इसके अलावा ‘महावंस’, ‘दीपवंस’ तथा ‘दिव्यावदान’ भी उपयोगी हैं। दिव्यावदान में अशोकावदान नामक भाग विशेष रूप से अशोक के जीवन और उसके धम्म-प्रचार पर प्रकाश डालता है।

जैन ग्रंथ

ब्राह्मण और बौद्ध साहित्य की भाँति जैन साहित्य भी मौर्य वंश के इतिहास-निर्माण में सहायक है, जो प्राकृत और संस्कृत दोनों भाषाओं में मिलता है। यद्यपि जैन धर्म के दोनों संप्रदायों- श्वेतांबर और दिगंबर में भिन्न-भिन्न सूचनाएँ मिलती हैं, किंतु जैन साहित्य सूचनापरक और उपयोगी है। दिगंबरीय ग्रंथों में हरिषेण विरचित बृहत्कथाकोश, प्रभाचंद्रकृत आराधना सत्कथाप्रबंध, श्रीचंद्रविरचित कथाकोश तथा नेमिचंद्रकृत कथाकोश विशेष रूप से उपयोगी हैं। इनमें चाणक्य एवं चंद्रगुप्त की कथा सविस्तार वर्णित है। इसके साथ हरिवंश पुराण, उत्तर पुराण, त्रिलोकसार तथा धवला नामक ग्रंथों का भी मौर्यकालीन इतिहास के निर्माण में उपयोग किया जाता है।

श्वेतांबर संप्रदाय के ग्रंथों में आगम ग्रंथों तथा उन पर लिखी टीकाओं का विशेष महत्त्व है। सूत्रों में उत्तराध्ययनसूत्र, आवश्यकसूत्र तथा दशवैकालिकसूत्र उपयोगी हैं। इन पर लिखी निर्युक्तियों, चूर्णियों तथा टीकाओं में मौर्य इतिहास से संबंधित कथाएँ विद्यमान हैं। टीकाकारों में हरिभद्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। जैन ग्रंथों में भद्रबाहु का कल्पसूत्र, हेमचंद्र का परिशिष्टपर्वन् सूचना के प्रमुख स्रोत हैं। इसके अलावा जिनप्रभसूरि कृत विविधतीर्थकल्प में भी मौर्य इतिहास से संबंधित कुछ सूचनाएँ मिलती हैं। चौदहवीं शताब्दी ई. के पूर्वार्ध में लिखी गई मेरुतुंगकृत ‘विचारश्रेणी’ में भी मौर्यों से संबंधित सामग्री मिलती है। जैन परंपरा के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में जैन धर्म ग्रहण कर लिया था और भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) जाकर सल्लेखना (उपवास द्वारा प्राणत्याग) विधि से देहत्याग किया था।

विदेशी स्रोत

यूनानी तथा रोमन लेखकों के विवरण

विदेशी स्रोतों में क्लासिकल (यूनानी-रोमन) लेखकों के विवरण अधिक उपयोगी हैं। इन्होंने चंद्रगुप्त को ‘सैंड्रोकोट्टस’ और ‘एंड्रोकोट्टस’ कहा है। विलियम जोन्स पहले विद्वान थे, जिन्होंने ‘सैंड्रोकोट्टस’ की पहचान भारतीय ग्रंथों के ‘चंद्रगुप्त’ से की है। इससे पता चलता है कि चंद्रगुप्त सिकंदर का समकालीन था।

सिकंदरकालीन लेखकों- नियार्कस, आनेसिक्रिटस, अरिस्टोबुलस भी महत्त्वपूर्ण हैं। तीसरी शताब्दी ई.पू. में जिन यूरोपीय राजदूतों को यूनानी शासकों ने भारत भेजा था, उनमें से कुछ ने सिकंदर के इन साथियों की रचनाओं में पूरक जोड़े हैं। इनमें मेगस्थनीज की रचना ‘इंडिका’ बहुत उपयोगी है। मेगस्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत बनकर चंद्रगुप्त के दरबार में आया था और उसने पाटलिपुत्र नगर, मौर्य प्रशासन, समाज-व्यवस्था तथा सप्तवर्ण-व्यवस्था का विस्तृत विवरण दिया है। यद्यपि मेगस्थनीज की यह मूल कृति नष्ट हो गई है, किंतु उसके विवरण के कुछ अंश स्ट्रैबो, डियोडोरस, एरियन जैसे परवर्ती लेखकों की पुस्तकों में उद्धरण रूप में आज भी देखने को मिलते हैं।

स्ट्रैबो (लगभग ई.पू. 64 से 19 ई.) के ‘भूगोल’ (जियोग्राफिका) के पंद्रहवें भाग का प्रथम अध्याय भारत के बारे में है, जिसमें सिकंदर के साथियों तथा मेगस्थनीज की रचनाओं से ली गई सामग्री के आधार पर भारत के भूगोल, यहाँ के निवासियों के रहन-सहन तथा रीति-रिवाजों का वर्णन किया गया है। डियोडोरस ई.पू. 36 तक जीवित रहा। इसने मेगस्थनीज की रचनाओं के आधार पर भारत का एक वृत्तांत (‘बिब्लियोथेका हिस्टोरिका’) लिखा है।

प्लिनी ज्येष्ठ (प्लिनी द एल्डर) ने ‘नेचुरल हिस्ट्री’ (प्रकृति-वृत्त) नामक विशद ज्ञानकोश की रचना की है, जो लगभग 77 ई. में प्रकाशित हुई थी। इसमें यूनानी रचनाओं तथा व्यापारियों के नवीनतम विवरणों के आधार पर भारत का वर्णन किया गया है। एरियन (लगभग 130 ई.) ने सिकंदर के अभियानों का सबसे अच्छा वृत्तांत (‘ऐनाबेसिस’) लिखा है तथा उसकी एक अन्य रचना ‘इंडिका’ में भी भारत का विवरण मिलता है। नियार्कस ने मेगस्थनीज तथा भूगोलवेत्ता एरेटोस्थनीज (ई.पू. 276–195) की रचनाओं के आधार पर भारत, इसके भूगोल, यहाँ के रहन-सहन तथा रीति-रिवाजों के बारे में एक छोटी-सी पुस्तक लिखी है।

प्लूटार्क (लगभग 45–125 ई.) की ‘जीवनियाँ’ (पैरेलल लाइव्स) नामक रचना में 57वें से 67वें अध्यायों तक सिकंदर की जीवनी दी गई है। इन अध्यायों में भारत का भी विवरण मिलता है तथा चंद्रगुप्त और सिकंदर की भेंट का प्रसिद्ध प्रसंग भी इसी रचना में मिलता है। दूसरी शताब्दी ई. में जस्टिन ने पॉम्पियस ट्रोगस की रचना पर आधारित एक ‘एपिटोम’ (सार-संग्रह) की रचना की थी, जिसके 12वें खंड में भारत में सिकंदर के विजय-अभियानों का विवरण मिलता है।

चीनी यात्रियों के विवरण

यूनानी तथा रोमन लेखकों के अलावा चीनी यात्रियों के विवरण भी मौर्ययुगीन इतिहास के लिए उपयोगी हैं। इनमें फाह्यान (लगभग 399–414 ई., गुप्तकाल में भारत आया), ह्वेनसांग (लगभग 630–645 ई., हर्षकाल में भारत आया) तथा इत्सिंग के यात्रा-विवरण विशेष उपयोगी हैं। यद्यपि इनका संबंध मौर्योत्तरकाल से है, किंतु प्रसंगतः इनके यात्रा-वृतांतों में मौर्ययुगीन सभ्यता और संस्कृति का संकेत मिलता है। फाह्यान ने अपने भ्रमण के दौरान अशोक-निर्मित अनेक स्तूपों को देखा था, जिनका वर्णन उसने अपनी पुस्तक ‘फो-क्यो-की’ में किया है। इसी प्रकार ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वृतांत ‘सी-यू-की’ में धार्मिक स्थलों के निर्माताओं और उनसे जुड़ी अनुश्रुतियों का उल्लेख किया है।

पुरातात्त्विक स्रोत

पुरातात्त्विक स्रोतों में अशोक के लेख सर्वाधिक उपयोगी हैं, जो लगभग चालीस से अधिक की संख्या में भारत, पाकिस्तान, नेपाल और अफगानिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों से पाए गए  हैं। ये अभिलेख मुख्यतः प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में हैं, यद्यपि उत्तर-पश्चिम में ये खरोष्ठी लिपि में तथा अफगानिस्तान क्षेत्र में यूनानी और आरामाइक लिपियों में भी मिलते हैं। इन्हीं अभिलेखों के आधार पर डी. आर. भंडारकर ने अपना महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘अशोक’ लिखा है। मौर्ययुगीन लेखों के साथ-साथ परवर्ती लेखों से भी मौर्यकालीन इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

कलिंग नरेश खारवेल के हाथीगुम्फा लेख से भी मौर्यों की पतनोन्मुखी स्थिति पर प्रकाश पड़ता है। इसी प्रकार श्रवणबेलगोला के समीप चंद्रगिरि पर्वत पर उत्कीर्ण लेख से चंद्रगुप्त मौर्य के प्राण-त्याग की घटना पर प्रकाश पड़ता है। इसके अलावा शक क्षत्रप रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख (लगभग 150 ई.) भी महत्त्वपूर्ण है। इस लेख से पता चलता है कि मौर्यों के प्रांतपति वैश्य पुष्यगुप्त ने यहाँ सुदर्शन नामक एक झील का निर्माण करवाया था तथा बाद में अशोक के काल में यवनराज तुषास्प ने इस झील से नहरें निकलवाई थीं। नागार्जुनी पहाड़ी के गुहालेख में दशरथ नामक मौर्य शासक (अशोक का पौत्र) का उल्लेख मिलता है। लेखों के अतिरिक्त सांची, भरहुत, बोधगया के स्तूपों, विहारों, संघारामों तथा पाटलिपुत्र व कुम्रहार के उत्खनन से प्राप्त स्तंभ-अवशेषों से भी मौर्ययुगीन सामाजिक, धार्मिक एवं स्थापत्य स्थिति पर प्रकाश पड़ता है। इसके साथ ही तक्षशिला, पाटलिपुत्र आदि स्थलों से प्राप्त मृण्मूर्तियाँ (टेराकोटा), मुद्राएँ (आहत सिक्के) तथा उत्तरी काली पॉलिशदार मृद्भांड (NBPW) भी मौर्ययुगीन भौतिक संस्कृति को समझने में सहायक हैं।

 मौर्यों की उत्पत्ति

मुख्य लेख : मौर्यों की उत्पत्ति

मौर्य वंश का संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य था, किंतु उसकी जाति और आरंभिक जीवन के संबंध में स्पष्ट एवं सर्वसम्मत प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। विभिन्न साहित्यिक परंपराओं में उसके वंश और सामाजिक स्थिति के संबंध में अलग-अलग मत मिलते हैं। ब्राह्मण ग्रंथों में मौर्यों को शूद्र अथवा निम्नकुल से संबंधित बताया गया है, जबकि बौद्ध और जैन ग्रंथों में उन्हें क्षत्रिय कहा गया है। कुछ इतिहासकारों ने मौर्यों को वैश्य सिद्ध करने का प्रयास किया है। स्पूनर जैसे कुछ विद्वानों ने मौर्यों को पारसीक अर्थात् ईरानी मूल का भी माना, किंतु स्मिथ और कीथ जैसे विद्वानों ने इस मत को अस्वीकार कर दिया। इस प्रकार चंद्रगुप्त की सामाजिक उत्पत्ति के संबंध में प्राचीन स्रोतों में पर्याप्त मतभेद दिखाई देते हैं।

ब्राह्मण ग्रंथों के आधार पर कुछ विद्वान चंद्रगुप्त को शूद्र मानते हैं। इस मत के समर्थन में मुद्राराक्षस, विष्णु पुराण की मध्यकालीन टीका तथा अठारहवीं शताब्दी में ढुंढिराज द्वारा लिखी गई मुद्राराक्षस की टीका का उल्लेख किया जाता है। पुराणों में नंदों को शूद्र बताया गया है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि शैशुनाग वंशीय शासक महानंदि के बाद शूद्रयोनि के राजा पृथ्वी पर शासन करेंगे। विष्णु पुराण के भाष्यकार श्रीधरस्वामी ने चंद्रगुप्त को नंदराज की पत्नी मुरा से उत्पन्न बताया और मुरा की संतान होने के कारण उसे मौर्य कहा। इसी आधार पर कुछ विद्वानों ने उसकी शूद्र उत्पत्ति का समर्थन किया है।

विशाखदत्त के नाटक मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त को नंदवंश से संबंधित बताया गया है, किंतु उसे नंदपुत्र न कहकर मौर्यपुत्र कहा गया है। इस ग्रंथ के अनुसार वह सर्वार्थसिद्धि नामक व्यक्ति के पुत्र मौर्य का पुत्र था। सर्वार्थसिद्धि को नौ नंदों का पिता तथा नंदवंश से संबंधित बताया गया है। नाटक में यह भी उल्लेख मिलता है कि चंद्रगुप्त और चाणक्य ने नंदों का विरोध किया और नंदवंश के विनाश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त के लिए ‘वृषल’ और ‘कुलहीन’ जैसे शब्दों का प्रयोग हुआ है, जिन्हें शूद्र उत्पत्ति के समर्थक विद्वान निम्न सामाजिक स्थिति का संकेत मानते हैं।

अठारहवीं शताब्दी के टीकाकार ढुंढिराज ने चंद्रगुप्त की उत्पत्ति से संबंधित एक विस्तृत कथा प्रस्तुत की है। उसके अनुसार सर्वार्थसिद्धि नामक क्षत्रिय राजा की दो पत्नियाँ थीं—सुनंदा और मुरा। सुनंदा से नौ पुत्र हुए, जिन्हें नवनंद कहा गया, जबकि मुरा शूद्रा थी और उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो मौर्य कहलाया। मौर्य को सर्वार्थसिद्धि ने अपना सेनापति बनाया, किंतु नंदबंधुओं ने छल से मौर्य और उसके पुत्रों की हत्या कर दी। चंद्रगुप्त इस घटना में बच गया और बाद में नंदों के शत्रु चाणक्य के साथ उसका संबंध स्थापित हुआ। दोनों ने मिलकर नंद सत्ता का अंत किया।

कथासरित्सागर और बृहत्कथामंजरी में भी चंद्रगुप्त की उत्पत्ति से संबंधित एक भिन्न कथा मिलती है। इनके अनुसार नंदराज की मृत्यु के बाद इंद्रदत्त नामक व्यक्ति योगबल से उसके शरीर में प्रवेश कर राजा बन गया और योगनंद कहलाया। उसने नंदराज की पत्नी से विवाह किया, जिससे हिरण्यगुप्त नामक पुत्र हुआ। वास्तविक नंदराज का पुत्र चंद्रगुप्त था। योगनंद ने उसे अपने मार्ग का बाधक माना, जबकि मंत्री शकटार ने चंद्रगुप्त का समर्थन किया और चाणक्य की सहायता से योगनंद तथा हिरण्यगुप्त का अंत कर चंद्रगुप्त को सत्ता प्रदान की। इस प्रकार इन कथाओं में भी चंद्रगुप्त को नंदराज से जोड़कर उसकी शूद्र उत्पत्ति का समर्थन किया गया है।

हालाँकि चंद्रगुप्त को शूद्र मानने का मत पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। पुराणों में नंदों को शूद्र कहा गया है, किंतु मौर्यों की जाति के संबंध में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। विष्णु पुराण का शूद्रयोनि संबंधी कथन मुख्यतः नंदों पर लागू होता है। पुराणों में कौटिल्य द्वारा नंदों का विनाश करके चंद्रगुप्त को सिंहासन पर बैठाने का भी उल्लेख है। पाणिनीय व्याकरण के आधार पर भी ‘मौर्य’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘मुरा’ से सिद्ध नहीं होती, क्योंकि ‘मुरा’ से ‘मौरेय’ शब्द बनना अधिक उपयुक्त माना जाता है। इसी प्रकार ‘वृषल’ शब्द का अर्थ केवल शूद्र नहीं है। मनुस्मृति और महाभारत में इसका प्रयोग धर्मच्युत व्यक्ति के लिए भी हुआ है। इसलिए मुद्राराक्षस में प्रयुक्त इस शब्द को चंद्रगुप्त की जाति का निश्चित प्रमाण नहीं माना जा सकता।

मौर्यों की वैश्य उत्पत्ति का मत भी प्रस्तुत किया गया है। रोमिला थापर ने मौर्यों को वैश्य मानने का प्रयास किया है। उनके अनुसार रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में चंद्रगुप्त के प्रांतपति वैश्य पुष्यगुप्त का उल्लेख मिलता है। कुछ विद्वानों ने पुष्यगुप्त को चंद्रगुप्त का बहनोई माना है। इसके आधार पर चंद्रगुप्त की वैश्य उत्पत्ति का अनुमान लगाया गया है। किंतु पुष्यगुप्त के चंद्रगुप्त का बहनोई होने का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। साथ ही ‘गुप्त’ नामांत केवल वैश्यों तक सीमित नहीं था; ब्राह्मण और क्षत्रिय नामों में भी इसका प्रयोग मिलता है। स्वयं चाणक्य का एक नाम विष्णुगुप्त था। अतः केवल ‘गुप्त’ नामांत के आधार पर चंद्रगुप्त को वैश्य मानना उचित नहीं है।

इसके विपरीत बौद्ध और जैन ग्रंथों में चंद्रगुप्त को क्षत्रिय बताया गया है। बौद्ध परंपरा के अनुसार वह ‘मोरिय’ नामक क्षत्रिय कुल से संबंधित था। महावंस और महाबोधिवंस में उसे क्षत्रिय मोरिय वंश में उत्पन्न बताया गया है। महापरिनिब्बानसुत्त में भी मौर्यों को पिप्पलिवन के शासक और क्षत्रिय वंश का बताया गया है। दिव्यावदान में बिंदुसार को क्षत्रिय-मूर्धाभिषिक्त कहा गया है तथा अशोक को भी क्षत्रिय बताया गया है। जैन ग्रंथों में भी मौर्यों का संबंध मयूरों से जोड़ा गया है और चंद्रगुप्त को क्षत्रिय माना गया है।

यूनानी लेखकों के विवरण से भी चंद्रगुप्त के सामान्य कुल से संबंधित होने का संकेत मिलता है, किंतु उसकी जाति के संबंध में निश्चित प्रमाण नहीं मिलता। पुरातात्त्विक साक्ष्यों में भी मयूर-प्रतीक का उल्लेख मिलता है। अशोक के लौरिया-नंदनगढ़ स्तंभ पर मयूर की आकृति तथा मौर्यकालीन कला में मयूरों का अंकन इस संबंध की ओर संकेत करता है। समग्र साहित्यिक और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर इतना कहा जा सकता है कि चंद्रगुप्त संभवतः किसी अत्यंत प्रसिद्ध राजघराने से संबंधित नहीं था। उसके वंश की उत्पत्ति के विषय में मतभेद बने हुए हैं, किंतु अधिकांश आधुनिक इतिहासकार मौर्य वंश को मूलतः क्षत्रिय परंपरा से संबंधित मानते हैं।

मौर्य शासकों का इतिहास

चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 322–298 ई.पू.)

मुख्य लेख : चंद्रगुप्त मौर्य

चंद्रगुप्त मौर्य मौर्य वंश का संस्थापक और प्राचीन भारत के महानतम शासकों में से एक था। उसने नंद सत्ता का अंत करके पाटलिपुत्र को केंद्र बनाकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। उसके राजनीतिक उत्थान में कौटिल्य या चाणक्य का महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उसने भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े भू-भाग को पहली बार एक शक्तिशाली और केंद्रीकृत राजनीतिक सत्ता के अधीन संगठित किया। परंपरा के अनुसार वह पिप्पलिवन के मोरिय गण से संबंधित था और बाद में चाणक्य के मार्गदर्शन में उसने राजनीतिक एवं सैन्य शिक्षा प्राप्त की।

मौर्य राजवंश (Mauryan Dynasty)
चंद्रगुप्त मौर्य

चंद्रगुप्त के राजनीतिक जीवन की शुरुआत उत्तर-पश्चिम भारत की तत्कालीन परिस्थितियों से भी जुड़ी थी। सिकंदर की मृत्यु 323 ईसा पूर्व के बाद पंजाब और सिंधु क्षेत्र में उसके द्वारा स्थापित यूनानी प्रशासन कमजोर पड़ने लगा। विभिन्न यूनानी क्षत्रपों के विरुद्ध स्थानीय प्रतिरोध बढ़ा और राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई। इस परिस्थिति का लाभ चंद्रगुप्त ने उठाया और उत्तर-पश्चिम भारत में अपनी शक्ति स्थापित की। यूनानी-रोमन लेखकों, विशेषकर जस्टिन और प्लूटार्क के विवरणों से चंद्रगुप्त की राजनीतिक और सैन्य गतिविधियों की जानकारी प्राप्त होती है। यद्यपि उसके अभियानों का पूरा और निश्चित कालक्रम उपलब्ध नहीं है, फिर भी यह स्पष्ट है कि उसने उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करके एक व्यापक साम्राज्य के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया।

उत्तर-पश्चिम में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद चंद्रगुप्त ने मगध की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया। उस समय मगध पर नंद वंश का शासन था। बौद्ध और जैन परंपराओं में नंद शासक को धननंद के नाम से संबोधित किया गया है। चाणक्य और नंद शासक के बीच हुए कथित अपमान की घटना को परंपरा में चंद्रगुप्त के नंद-विरोधी अभियान से जोड़ा जाता है। नंदों के विरुद्ध संघर्ष के संबंध में विभिन्न परंपराओं से संकेत मिलता है कि संघर्ष के बाद चंद्रगुप्त ने पाटलिपुत्र पर अधिकार कर लिया और मौर्य सत्ता की स्थापना हुई। इस विजय के साथ मगध की विशाल राजनीतिक और आर्थिक शक्ति चंद्रगुप्त के हाथ में आ गई तथा मौर्य साम्राज्य के विस्तार का आधार तैयार हुआ।

चंद्रगुप्त की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल भू-भाग का राजनीतिक एकीकरण थी। यूनानी लेखक प्लूटार्क ने उसकी विशाल सेना का उल्लेख किया है और जस्टिन ने उसके व्यापक प्रभुत्व की ओर संकेत किया है। उपलब्ध प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि चंद्रगुप्त का साम्राज्य उत्तर-पश्चिम में सिंधु क्षेत्र से लेकर पूर्व में बंगाल और पश्चिम में सौराष्ट्र तक विस्तृत था तथा दक्षिण में उसका प्रभाव दक्कन के कुछ क्षेत्रों तक पहुँचा था। इस प्रकार उसने अनेक राजनीतिक क्षेत्रों को एक व्यापक साम्राज्य के अंतर्गत संगठित किया।

पश्चिमी भारत में चंद्रगुप्त की सत्ता का प्रमाण सौराष्ट्र से मिलता है। जूनागढ़ के बाद के अभिलेख में सौराष्ट्र में मौर्य प्रशासन का उल्लेख है तथा पुष्यगुप्त को चंद्रगुप्त का राज्यपाल बताया गया है। पुष्यगुप्त ने सुदर्शन झील का निर्माण कराया था, जो सिंचाई और जल-प्रबंधन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण थी। सुदर्शन झील का उल्लेख बाद के रुद्रदामन अभिलेख में भी मिलता है। इससे पता चलता है कि मौर्य शासन केवल सैन्य विस्तार तक सीमित नहीं था, बल्कि कृषि और सिंचाई जैसी आर्थिक आवश्यकताओं पर भी ध्यान देता था।

चंद्रगुप्त के दक्षिणी विस्तार के संबंध में भी विभिन्न प्रमाण मिलते हैं। मैसूर क्षेत्र से प्राप्त अभिलेखीय प्रमाणों और तमिल परंपराओं के आधार पर यह माना जाता है कि मौर्य प्रभाव दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों तक पहुँच गया था।

चंद्रगुप्त की विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता सेल्यूकस निकेटर के साथ उसका संघर्ष और उसके बाद हुई संधि थी। सिकंदर की मृत्यु के बाद उसके साम्राज्य के पूर्वी भाग पर सेल्यूकस का अधिकार स्थापित हुआ था। लगभग 305–304 ईसा पूर्व के आसपास उसने भारतीय क्षेत्रों पर अपना प्रभाव पुनः स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु  इस समय उसका सामना एक संगठित और शक्तिशाली मौर्य साम्राज्य से हुआ। यूनानी स्रोतों के अनुसार संघर्ष के बाद दोनों शासकों के बीच संधि हुई और वैवाहिक संबंध भी स्थापित हुआ। संधि के परिणामस्वरूप चंद्रगुप्त को उत्तर-पश्चिम के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रदेश प्राप्त हुए और उसने सेल्यूकस को 500 युद्ध-हाथी प्रदान किए।

सेल्यूकस के साथ संधि ने मौर्य साम्राज्य की पश्चिमोत्तर सीमा को मजबूत किया और दोनों शक्तियों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए। इसी राजनयिक संबंध के परिणामस्वरूप मेगस्थनीज चंद्रगुप्त के दरबार में राजदूत के रूप में आया। उसने भारत के संबंध में ‘इंडिका’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसका मूल ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं है, किंतु उसके उद्धरण बाद के यूनानी लेखकों के विवरणों में मिलते हैं। मेगस्थनीज के विवरण से मौर्य प्रशासन, समाज, नगर व्यवस्था और आर्थिक जीवन के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है।

चंद्रगुप्त ने अपने विशाल साम्राज्य के संचालन के लिए सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। कौटिल्य के अर्थशास्त्र और मेगस्थनीज के विवरण से मौर्यकालीन शासन की केंद्रीकृत प्रकृति का पता चलता है। राज्य ने कृषि, सिंचाई, व्यापार, शिल्प, राजस्व और कानून-व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया। अर्थशास्त्रीय परंपरा में अनाथों, विधवाओं और असहाय लोगों की सहायता तथा श्रमिकों और आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करने संबंधी व्यवस्थाओं का उल्लेख मिलता है। सुदर्शन झील का निर्माण भी राज्य की आर्थिक और लोककल्याणकारी नीति का महत्त्वपूर्ण उदाहरण था।

धार्मिक दृष्टि से चंद्रगुप्त के शासनकाल में विभिन्न धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान दिखाई देता है। यूनानी विवरणों में उसके द्वारा तपस्वियों और दार्शनिकों से संपर्क रखने का उल्लेख मिलता है। जैन परंपरा के अनुसार जीवन के अंतिम चरण में चंद्रगुप्त ने जैन धर्म स्वीकार किया और भद्रबाहु के साथ दक्षिण भारत के श्रवणबेलगोला चला गया, जहाँ उसने संलेखना द्वारा जीवन का अंत किया।

इस प्रकार चंद्रगुप्त मौर्य का महत्त्व केवल एक विजेता के रूप में नहीं, बल्कि एक सफल साम्राज्य-निर्माता और प्रशासक के रूप में भी है। उसने नंद सत्ता का अंत किया, उत्तर-पश्चिम में विदेशी प्रभाव को चुनौती दी, मौर्य साम्राज्य का व्यापक विस्तार किया और केंद्रीकृत शासन की मजबूत नींव रखी। उसकी प्रशासनिक व्यवस्था, सैन्य शक्ति, कूटनीतिक सफलता तथा लोककल्याणकारी कार्यों ने मौर्य साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान किया।

बिंदुसार (लगभग 298–273 ई.पू.)

मुख्य लेख : बिंदुसार

बिंदुसार चंद्रगुप्त मौर्य का पुत्र और मौर्य साम्राज्य का दूसरा शासक था। उसका शासनकाल सामान्यतः लगभग 297 ई.पू. से 273 ई.पू. के बीच माना जाता है। उसने अपने पिता से प्राप्त विशाल साम्राज्य को न केवल सुरक्षित रखा, बल्कि उसके दक्षिणी भागों में मौर्य सत्ता के विस्तार में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यूनानी लेखकों के विवरण में उसका नाम अलग-अलग रूपों में मिलता है। यूनानी स्रोतों में उसे अमित्रोखेट्स या कहा गया है, जिसे संस्कृत के ‘अमित्रघात’ से संबंधित माना जाता है। यह उपाधि उसके सैन्य पराक्रम और शत्रुओं के दमन की ओर संकेत करती है, यद्यपि इसके अर्थ और ऐतिहासिक प्रयोग को लेकर विद्वानों में मतभेद भी हैं।

बिंदुसार के शासन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में मौर्य साम्राज्य का दक्षिण भारत की ओर विस्तार था। कुछ परंपराओं और बाद के स्रोतों से पता चलता है कि बिंदुसार के समय मौर्य प्रभाव दक्कन के बड़े हिस्से तक पहुँच गया था। किंतु उसके सैन्य अभियाणों का प्रत्यक्ष और समकालीन प्रमाण उपलब्ध नहीं है। दक्षिण भारत के कुछ प्रमुख राज्य मौर्य साम्राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर थे क्योंकि अशोक के तेरहवें शिलालेख में चोल, पांड्य, सत्यपुत्र और केरलपुत्र जैसे दक्षिणी राज्यों का उल्लेख स्वतंत्र राजनीतिक शक्तियों के रूप में मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि संपूर्ण दक्षिण भारत मौर्य शासन के अधीन नहीं था। इसी प्रकार कलिंग भी बिंदुसार के समय मौर्य साम्राज्य का हिस्सा नहीं था और बाद में अशोक ने इसे विजय करके साम्राज्य में सम्मिलित किया।

बिंदुसार के शासनकाल में मौर्य साम्राज्य के विदेशी संबंध भी महत्त्वपूर्ण रहे। यूनानी-रोमन लेखकों के विवरणों से पता चलता है कि उसके समय मौर्य दरबार और हेलेनिस्टिक राज्यों के बीच राजनयिक संपर्क बने हुए थे। सीरिया के शासक एंटियोकस प्रथम ने अपने राजदूत डाइमेकस को बिंदुसार के दरबार में भेजा था। यूनानी लेखक एथेनियस के विवरण से यह भी संकेत मिलता है कि मिस्र के शासक टॉलेमी द्वितीय फिलाडेल्फस की ओर से डायोनिसियस भारत आया था। इन राजनयिक संपर्कों से स्पष्ट है कि मौर्य साम्राज्य का उस समय पश्चिमी एशिया और भूमध्यसागरीय विश्व की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों से संपर्क था।

बिंदुसार के धार्मिक जीवन के संबंध में भी विभिन्न परंपराएँ मिलती हैं। बौद्ध स्रोतों में उसके संबंध में विस्तृत जानकारी नहीं मिलती है। कुछ परंपराओं में उसे आजीवक संप्रदाय से संबंधित या उसका समर्थक बताया गया है। तिब्बती बौद्ध परंपरा में तारानाथ ने भी बिंदुसार के समय आजीवकों के प्रभाव का उल्लेख किया है। किंतु इन विवरणों की समकालीन अभिलेखों से पुष्टि नहीं होती है, यद्यपि यह माना जा सकता है कि उसके शासनकाल में विभिन्न धार्मिक संप्रदायों को संरक्षण प्राप्त था।

बिंदुसार का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान यह था कि उसने चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित विशाल साम्राज्य को स्थिरता प्रदान की और उसके प्रशासन को निरंतर बनाए रखा, जिसके कारण बिंदुसार को चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी माना जा सकता है।

सम्राट अशोक (लगभग 268–232 ई.पू.)

मुख्य लेख : अशोक

बिंदुसार की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य के उत्तराधिकार को लेकर संभवतः संघर्ष हुआ था। बौद्ध परंपराओं में अशोक और उसके भाइयों के बीच उत्तराधिकार संघर्ष का उल्लेख मिलता है, किंतु इस संघर्ष की वास्तविक प्रकृति, अवधि तथा इसमें मारे गए भाइयों की संख्या के संबंध में उपलब्ध विवरणों में पर्याप्त भिन्नता है। जो भी हो, बिंदुसार की मृत्यु के बाद अशोक मौर्य सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। सामान्यतः उसका राज्यारोहण लगभग 268 ईसा पूर्व के आसपास माना जाता है। यद्यपि अशोक के प्रारंभिक शासन के संबंध में जानकारी अपेक्षाकृत सीमित है, किंतु उसके अभिलेखों से उसके शासन, प्रशासनिक दृष्टिकोण और बाद में विकसित हुई धम्म-नीति की स्पष्ट जानकारी प्राप्त होती है।

मौर्य राजवंश (Mauryan Dynasty)
अशोक महान

अशोक के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना कलिंग युद्ध थी। उसके प्रमुख शिलालेख, विशेषकर तेरहवें शिलालेख से ज्ञात होता है कि उसने राज्याभिषेक के लगभग आठ वर्ष बाद लगभग 261 ई.पू. में कलिंग पर विजय प्राप्त की। कलिंग के विरुद्ध युद्ध में मौर्य सेना ने विजय प्राप्त की, किंतु इस युद्ध में भारी जनहानि और विस्थापन हुआ। अशोक के तेरहवें शिलालेख में लगभग डेढ़ लाख लोगों के निर्वासन, एक लाख लोगों की हत्या तथा उससे भी अधिक लोगों की मृत्यु का उल्लेख मिलता है।

कलिंग युद्ध के बाद अशोक के राजनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। तेरहवें शिलालेख में अशोक ने कलिंग विजय के कारण हुई पीड़ा और जनहानि पर गहरा पश्चात्ताप व्यक्त किया है। इसके बाद उसने सैन्य विजय या दिग्विजय की अपेक्षा धम्म-विजय को अधिक महत्त्व देने की घोषणा की। धम्म-विजय का अर्थ केवल किसी एक धर्म का प्रचार करना नहीं था, बल्कि नैतिक आचरण, प्रजा के कल्याण, संयम, दया, सहिष्णुता और सभी संप्रदायों के प्रति सम्मान को बढ़ावा देना था। अशोक ने विजय की इस नई अवधारणा को अपनी शासन-नीति का महत्त्वपूर्ण अंग बनाया। किंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि उसने राज्य की सैन्य व्यवस्था समाप्त कर दी थी या वह पूरी तरह युद्ध-विहीन शासक बन गया था। उसके अभिलेखों से स्पष्ट है कि वह राजनीतिक सत्ता और साम्राज्य की सुरक्षा के प्रति सजग बना रहा।

अशोक के जीवन में बौद्ध धर्म का भी महत्त्वपूर्ण स्थान रहा। बौद्ध परंपराएँ उसे बौद्ध धर्म का महान संरक्षक बताती हैं। उसके अपने अभिलेखों से भी बौद्ध धर्म के प्रति उसकी व्यक्तिगत आस्था के प्रमाण मिलते हैं। लघु शिलालेखों में वह स्वयं को बौद्ध उपासक के रूप में प्रस्तुत करता है। फिर भी अशोक की धम्म-नीति को सीधे-सीधे बौद्ध धर्म का पर्याय मानना उचित नहीं है। उसका धम्म एक व्यापक नैतिक-सामाजिक आचार-संहिता थी, जिसका उद्देश्य विभिन्न धार्मिक समुदायों और सामाजिक समूहों के बीच सद्भाव स्थापित करना था। इसलिए अशोक की धम्म-नीति में बौद्ध तत्त्वों के साथ-साथ सामान्य नैतिक मूल्यों को भी प्रमुख स्थान प्राप्त था।

अशोक के अभिलेखों में धम्म के अंतर्गत माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान, वृद्धों के प्रति आदर, ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति सम्मान, दासों एवं सेवकों के साथ उचित व्यवहार, जीवों के प्रति दया, संयम तथा धार्मिक सहिष्णुता जैसे मूल्यों पर बल दिया गया है। अशोक ने विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच पारस्परिक सम्मान को आवश्यक माना। उसके बारहवें शिलालेख में संप्रदायों के बीच सहिष्णुता और एक-दूसरे के विचारों को समझने की भावना पर विशेष जोर दिया गया है। इस प्रकार उसकी धम्म-नीति का प्रमुख उद्देश्य नैतिक अनुशासन और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देना था।

अशोक ने अपने धम्म के प्रचार और उसके व्यावहारिक कार्यान्वयन के लिए प्रशासनिक स्तर पर भी कई कदम उठाए। उसने धम्म-महामात्रों की नियुक्ति की, जिनका कार्य धम्म से संबंधित गतिविधियों को बढ़ावा देना तथा विभिन्न सामाजिक समूहों के कल्याण पर ध्यान देना था। उसने मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं के कल्याण की ओर भी ध्यान दिया। उसके अभिलेखों में चिकित्सा व्यवस्था, औषधीय पौधों की व्यवस्था, कुओं के निर्माण तथा मार्गों पर वृक्ष लगाने जैसे लोककल्याणकारी कार्यों का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि अशोक के लिए धम्म केवल धार्मिक उपदेश नहीं था, बल्कि शासन और सामाजिक जीवन से जुड़ा हुआ व्यावहारिक नैतिक कार्यक्रम भी था।

अशोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म का भारत से बाहर प्रसार भी हुआ। बौद्ध परंपरा, विशेषकर श्रीलंकाई ग्रंथों में उसके शासनकाल के दौरान बौद्ध मिशनों के विभिन्न क्षेत्रों में भेजे जाने का उल्लेख मिलता है। उसके पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रसार का श्रेय दिया जाता है। अशोक के तेरहवें शिलालेख में भी पश्चिमी क्षेत्रों के कुछ समकालीन शासकों का उल्लेख मिलता है, जिनमें अंतियोकस, टॉलेमी, एंटिगोनस, मागस और एलेक्जेंडर के नाम मिलते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि अशोक ने धम्म-विजय की अवधारणा को सीमाओं से परे भी प्रस्तुत किया था। यद्यपि उसके द्वारा इन सभी राज्यों में बौद्ध धर्म के प्रचारक भेजने  का उसके अभिलेखों में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है।

श्रीलंकाई बौद्ध परंपरा के अनुसार अशोक के शासनकाल में लगभग 250 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की। इस संगीति का उद्देश्य संघ में उत्पन्न मतभेदों को दूर करना और बौद्ध समुदाय को व्यवस्थित करना था। इसी परंपरा में संगीति के बाद विभिन्न क्षेत्रों में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भिक्षुओं को भेजे जाने का उल्लेख मिलता है। किंतु तृतीय बौद्ध संगीति का विस्तृत विवरण मुख्यतः बौद्ध ग्रंथों में मिलता है और अशोक के अभिलेखों में इसका प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है।

इस प्रकार अशोक का शासन भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है। अशोक ने साम्राज्यवादी शक्ति को केवल सैन्य विजय के माध्यम से नहीं, बल्कि नैतिक प्रभाव और जनकल्याण के माध्यम से प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। यही कारण है कि भारतीय इतिहास में अशोक को केवल एक महान विजेता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे शासक के रूप में भी याद किया जाता है जिसने सत्ता, नैतिकता और लोककल्याण के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया।

परवर्ती मौर्य शासक

मुख्य लेख : अशोक के उत्तराधिकारी

अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। अशोक के उत्तराधिकार के संबंध में विभिन्न साहित्यिक स्रोतों में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। पुराणों, बौद्ध तथा जैन ग्रंथों से परवर्ती मौर्य शासकों के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। अशोक के बाद विशाल मौर्य साम्राज्य को एकीकृत रखना कठिन हो गया और साम्राज्य के विभिन्न भागों पर अलग-अलग शासकों का प्रभाव स्थापित होने लगा। परिणामस्वरूप मौर्य साम्राज्य का राजनीतिक एवं प्रशासनिक विघटन क्रमशः आरंभ हो गया।

अशोक के बाद कुणाल का नाम प्रमुख रूप से मिलता है। परंपरा के अनुसार कुणाल अशोक का पुत्र था और उसे उसका उत्तराधिकारी माना जाता है। किंतु उसके शासन तथा पूरे मौर्य साम्राज्य पर उसके प्रभावी नियंत्रण के संबंध में ऐतिहासिक प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं। बौद्ध ग्रंथों में कुणाल के जीवन से संबंधित अनेक कथाएँ मिलती हैं। उसके समय तक मौर्य साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति पहले की अपेक्षा कमजोर हो चुकी थी।

कुणाल के बाद दशरथ गद्दी पर बैठा, जिसे अशोक का पौत्र माना जाता है। दशरथ के अभिलेख नागार्जुनी पहाड़ियों की गुफाओं से प्राप्त हुए हैं। इन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उसने धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण प्रदान किया। उसके शासनकाल में भी मौर्य साम्राज्य का क्षेत्र और राजनीतिक प्रभाव सीमित होता गया।

दशरथ के बाद संप्रति का नाम मिलता है। जैन परंपरा में संप्रति को विशेष महत्त्व दिया गया है और उसे जैन धर्म का प्रमुख संरक्षक बताया गया है। उसके संबंध में कहा जाता है कि उसने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में सहायता की तथा अनेक धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण प्रदान किया। इसके बाद शालिशुक मौर्य शासक बना। पुराणों में उसका उल्लेख मिलता है। उसके शासनकाल में प्रांतीय शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगा तथा बाहरी शक्तियों के दबाव ने भी केंद्रीय सत्ता को चुनौती दी।

शालिशुक के बाद देववर्मन और फिर शतधन्वन् ने शासन किया। इन दोनों शासकों के शासनकाल के संबंध में ऐतिहासिक जानकारी बहुत कम है। इनके समय तक केंद्रीय प्रशासन की पकड़ कमजोर होने के कारण विभिन्न प्रांतों पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखना कठिन हो गया था। साम्राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों में स्थानीय शक्तियाँ अधिक प्रभावशाली होती गईं और मौर्य सत्ता का वास्तविक प्रभाव मुख्यतः मगध क्षेत्र तक सीमित होता चला गया।

परवर्ती मौर्य शासकों में बृहद्रथ अंतिम शासक था। उसके समय तक मौर्य साम्राज्य अत्यंत कमजोर हो चुका था। केंद्रीय सत्ता की दुर्बलता का लाभ उठाकर उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने लगभग 185 ईसा पूर्व में सैनिक निरीक्षण के दौरान बृहद्रथ की हत्या कर दी और स्वयं सत्ता पर अधिकार कर लिया। इसके साथ ही शुंग वंश की स्थापना हुई और मौर्य वंश का अंत हो गया।

मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण

मुख्य लेख : मौर्य साम्राज्य का पतन 

मौर्य साम्राज्य प्राचीन भारत का पहला विशाल और केंद्रीकृत साम्राज्य था। चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार और अशोक के शासन में इसकी सीमाएँ अत्यंत विस्तृत हो गई थीं। किंतु अशोक की मृत्यु के बाद कुछ ही दशकों में इस विशाल साम्राज्य का विघटन शुरू हो गया। इसके पतन के पीछे राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक, सैन्य और सामाजिक कई कारणों का संयुक्त प्रभाव रहा है।

अशोक की धम्म-नीति

अशोक के शासनकाल में कलिंग युद्ध के बाद उसकी नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। उसने युद्ध और विजय के स्थान पर धम्म, अहिंसा, सहिष्णुता तथा नैतिक जीवन पर अधिक बल दिया। उसने प्रजा के नैतिक उत्थान तथा विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच सद्भाव स्थापित करने का प्रयास किया।

कुछ इतिहासकारों ने तर्क दिया है कि अशोक की अहिंसावादी नीति तथा सैन्य अभियानों से दूरी के कारण मौर्य साम्राज्य की सैन्य शक्ति और साम्राज्यवादी विस्तार की क्षमता कमजोर हुई। सैनिक वर्ग में भी इससे असंतोष उत्पन्न हुआ होगा, ऐसा कुछ इतिहासकारों का मत है। हालांकि, इस मत को सर्वसम्मति प्राप्त नहीं है। अशोक ने सेना को पूरी तरह समाप्त नहीं किया था और न ही उसकी धम्म-नीति को सीधे साम्राज्य के पतन का कारण सिद्ध करने वाला पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध है। इसलिए इसे एक संभावित सहायक कारण के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

अशोक के बाद कमजोर उत्तराधिकारी

मौर्य साम्राज्य के पतन का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण अशोक के बाद आने वाले शासकों की कमजोरी को माना जाता है। अशोक के बाद साम्राज्य को संभालने वाले शासक उसकी तरह प्रभावशाली और सक्षम नहीं थे। कुणाल, दशरथ, संप्रति, शालिशुक, देववर्मन, शतधन्वन और बृहद्रथ जैसे उत्तराधिकारियों के शासनकाल में केंद्रीय सत्ता लगातार कमजोर होती गई।

अशोक जैसा शक्तिशाली सम्राट विशाल साम्राज्य को अपने व्यक्तिगत प्रभाव और मजबूत प्रशासन के माध्यम से नियंत्रित कर सकता था, लेकिन उसके बाद केंद्रीय सत्ता में वह क्षमता नहीं रही। परिणामस्वरूप प्रांतीय शासकों और स्थानीय शक्तियों की स्वायत्तता बढ़ने लगी तथा साम्राज्य धीरे-धीरे छोटे राजनीतिक क्षेत्रों में विभाजित होने लगा।

साम्राज्य का अत्यधिक विशाल आकार

मौर्य साम्राज्य का विस्तार उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर दक्षिण में दक्कन तथा पूर्व में बंगाल तक था। इतने विशाल भू-भाग पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखना उस समय की परिस्थितियों में अत्यंत कठिन था।

उस समय संचार और परिवहन के साधन सीमित थे। पाटलिपुत्र से दूर स्थित प्रांतों तक शाही आदेश पहुँचने और उनका प्रभावी ढंग से पालन कराने में काफी समय लगता था। दूर-दराज के क्षेत्रों में केंद्रीय प्रशासन की पकड़ कमजोर होते ही स्थानीय अधिकारी अधिक शक्तिशाली होने लगे। इस प्रकार साम्राज्य का विशाल आकार उसकी शक्ति के साथ-साथ उसकी कमजोरी भी बन गया।

प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरियाँ

मौर्य प्रशासन अत्यंत केंद्रीकृत था। इसका अर्थ था कि साम्राज्य की राजनीतिक स्थिरता काफी हद तक सम्राट की व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर थी। अशोक के बाद जब केंद्रीय नेतृत्व कमजोर हुआ, तो इतनी केंद्रीकृत व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाना कठिन हो गया।

प्रांतों में नियुक्त अधिकारी विशाल शक्तियों का प्रयोग करते थे। यदि केंद्र कमजोर हो जाए तो यही अधिकारी अपने क्षेत्र में स्वतंत्र प्रवृत्तियाँ अपना सकते थे। इस प्रकार प्रशासनिक विकेंद्रीकरण बढ़ा और मौर्य साम्राज्य की एकता धीरे-धीरे समाप्त होने लगी।

आर्थिक संकट

विशाल साम्राज्य को बनाए रखने के लिए विशाल सेना, प्रशासनिक अधिकारियों, सड़कों, सुरक्षा व्यवस्था तथा लोककल्याणकारी कार्यों पर बहुत अधिक धन खर्च होता था। लगातार बढ़ते प्रशासनिक खर्च और साम्राज्य के व्यापक क्षेत्र को नियंत्रित करने की लागत ने आर्थिक दबाव बढ़ाया होगा।

पतंजलि के महाभाष्य से संबंधित एक परंपरा में परवर्ती मौर्य शासकों की आर्थिक कठिनाइयों का संकेत मिलता है। इसमें ऐसी स्थिति का उल्लेख मिलता है जिसमें धन की आवश्यकता के कारण देव-प्रतिमाओं की बिक्री तक किए जाने की बात कही गई है। यद्यपि इस विवरण की ऐतिहासिक व्याख्या सावधानी से की जानी चाहिए, फिर भी इससे परवर्ती मौर्य काल में आर्थिक संकट की संभावना का संकेत मिलता है।

प्रांतीय शासकों का बढ़ता प्रभाव और विद्रोह

मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में प्रांतों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। तक्षशिला और उज्जैन जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में राजकुमारों अथवा उच्च अधिकारियों को नियुक्त किया जाता था। लेकिन जैसे-जैसे केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई, प्रांतीय अधिकारियों और स्थानीय शक्तियों की स्वायत्तता बढ़ने लगी।

तक्षशिला में विद्रोहों की घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि केंद्र और प्रांतों के बीच तनाव मौजूद था। अशोक के समय भी तक्षशिला में विद्रोह की समस्या सामने आई थी। इससे पता चलता है कि इतने विशाल साम्राज्य में स्थानीय प्रशासन को नियंत्रित करना मौर्य शासकों के लिए चुनौतीपूर्ण था।

विदेशी आक्रमण और यवनों का दबाव

मौर्य साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा हमेशा बाहरी शक्तियों के लिए संवेदनशील रही। अशोक के बाद केंद्रीय सत्ता कमजोर होने पर यवनों के लिए उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाना आसान हुआ।

पतंजलि के महाभाष्य में यवनों द्वारा साकेत और माध्यमिका पर आक्रमण का उल्लेख मिलता है। इससे संकेत मिलता है कि दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों पर विदेशी दबाव बढ़ रहा था। इन आक्रमणों ने मौर्य साम्राज्य की सीमाओं को कमजोर करने में योगदान दिया।

ब्राह्मण-प्रतिक्रिया का मत

मौर्य पतन की व्याख्या में एक मत यह भी है कि अशोक की बौद्ध धर्म के प्रति सहानुभूति तथा उसकी धार्मिक नीति से कुछ ब्राह्मण वर्ग असंतुष्ट हुए। हरप्रसाद शास्त्री जैसे कुछ इतिहासकारों ने ब्राह्मण प्रतिक्रिया को मौर्य पतन से जोड़ने का प्रयास किया है।

इस मत के अनुसार अशोक की नीतियों से पारंपरिक ब्राह्मणवादी संस्थाओं की स्थिति प्रभावित हुई और बाद में ब्राह्मण शक्ति के पुनरुत्थान ने मौर्य सत्ता के अंत में भूमिका निभाई। किंतु आधुनिक इतिहासकर इसे मौर्य साम्राज्य के पतन का एकमात्र या निर्णायक कारण नहीं मानते हैं क्योंकि इसके समर्थन में प्रत्यक्ष और पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।

साम्राज्य का विभाजन

अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों पर अलग-अलग उत्तराधिकारियों का नियंत्रण स्थापित होने लगा। इससे केंद्रीय राजनीतिक एकता कमजोर हुई। विशेष रूप से उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों पर मौर्य नियंत्रण धीरे-धीरे समाप्त हुआ। जब साम्राज्य का एक बड़ा हिस्सा केंद्र से अलग होने लगा, तो मगध की वास्तविक शक्ति भी सीमित होती गई। परिणामस्वरूप मौर्य साम्राज्य अपने प्रारंभिक विशाल स्वरूप को बनाए रखने में असफल रहा।

सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व का कमजोर होना

चंद्रगुप्त और बिंदुसार के समय मौर्य सत्ता के पास एक शक्तिशाली सैन्य संगठन था। अशोक के समय भी विशाल सेना साम्राज्य की सुरक्षा का प्रमुख आधार थी। लेकिन अशोक के बाद केंद्रीय नेतृत्व और राजनीतिक अनुशासन कमजोर होने लगा। जब सेना और प्रशासन पर सम्राट का प्रभाव कम हुआ, तो सेनापतियों तथा शक्तिशाली अधिकारियों का महत्त्व बढ़ गया। अंततः यही स्थिति मौर्य राजसत्ता के लिए घातक सिद्ध हुई।

इस प्रकार अशोक की मृत्यु के बाद लगभग आधी शताब्दी तक मौर्य साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर होता रहा। अंततः अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ के समय केंद्रीय सत्ता अत्यंत दुर्बल हो चुकी थी। लगभग 185 ईसा पूर्व में उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने सैनिक निरीक्षण के दौरान बृहद्रथ की हत्या कर दी और स्वयं सत्ता पर अधिकार कर लिया। इसके बाद शुंग वंश की स्थापना हुई और मौर्य साम्राज्य का औपचारिक अंत हो गया।

मौर्य वंश का मूल्यांकन

मौर्य वंश प्राचीन भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक एवं प्रशासनिक अध्याय था। चंद्रगुप्त मौर्य ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े भाग को एक राजनीतिक सत्ता के अधीन संगठित किया। कौटिल्य के मार्गदर्शन में विकसित मौर्य प्रशासन ने केंद्रीकृत शासन, सुदृढ़ राजस्व व्यवस्था, विशाल सेना और व्यवस्थित नौकरशाही को मजबूत आधार प्रदान किया।

मौर्यकाल में कृषि, व्यापार और शिल्प का विकास हुआ तथा राज्य ने आर्थिक गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया। चंद्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियों को यूनानी लेखक मेगस्थनीज के विवरण तथा अन्य साहित्यिक स्रोतों से भी समझा जा सकता है। अशोक के अभिलेख मौर्य प्रशासन, समाज और तत्कालीन धार्मिक विचारों के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद धम्म, अहिंसा, धार्मिक सहिष्णुता, नैतिक आचरण और लोककल्याण को विशेष महत्त्व दिया। उसके धम्म ने विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक समूहों के बीच सद्भाव स्थापित करने का प्रयास किया। अशोक के अभिलेखों के माध्यम से उसके शासन और विचारों की प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त होती है। मौर्यकालीन कला और स्थापत्य, विशेषकर अशोक के स्तंभ, स्तूप तथा शिलालेख भारतीय कला के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

किंतु मौर्य शासन की कुछ सीमाएँ भी थीं। अत्यधिक केंद्रीकृत प्रशासन सम्राट की व्यक्तिगत क्षमता पर काफी निर्भर था। अशोक के बाद कमजोर उत्तराधिकारियों के कारण केंद्रीय सत्ता कमजोर होने लगी। विशाल साम्राज्य को नियंत्रित करना कठिन हुआ तथा प्रांतीय शक्तियों के बढ़ते प्रभाव, आर्थिक दबाव और बाहरी आक्रमणों ने साम्राज्य के विघटन को तेज किया।

इस प्रकार मौर्य वंश का ऐतिहासिक महत्त्व राजनीतिक एकीकरण, केंद्रीकृत प्रशासन, आर्थिक संगठन, लोककल्याण तथा कला-संस्कृति के विकास में निहित है। यद्यपि मौर्य साम्राज्य दीर्घकाल तक स्थिर नहीं रह सका, फिर भी इसने भारतीय इतिहास में साम्राज्य निर्माण और प्रशासन की एक ऐसी परंपरा स्थापित की, जिसका प्रभाव बाद की राजनीतिक व्यवस्थाओं पर भी पड़ा। इस प्रकार मौर्य वंश प्राचीन भारत का प्रथम महान साम्राज्यवादी एवं केंद्रीकृत राजनीतिक शक्ति था।

मौर्य राजवंश से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

प्रश्न 1: मौर्य इतिहास के पुनर्निर्माण के प्रमुख स्रोत कौन-से हैं?

मौर्य इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए अशोक के शिलालेख एवं स्तंभलेख, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, बौद्ध ग्रंथ जैसे दीपवंस और महावंस, जैन ग्रंथ, पुराण तथा यूनानी-रोमन लेखकों के विवरण प्रमुख स्रोत हैं। इन स्रोतों की पारस्परिक तुलना से मौर्यकालीन राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक और धार्मिक इतिहास का पुनर्निर्माण किया जाता है।

प्रश्न 2: मौर्यों की उत्पत्ति के संबंध में प्रमुख मत क्या हैं?

मौर्यों की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न परंपराएँ मिलती हैं। बौद्ध ग्रंथ मौर्यों को ‘मोरिय’ नामक क्षत्रिय कुल से जोड़ते हैं, जबकि कुछ जैन और ब्राह्मण ग्रंथों में उनकी उत्पत्ति के संबंध में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। इसलिए मौर्यों की सामाजिक उत्पत्ति के प्रश्न पर इतिहासकारों में पूर्ण एकमत नहीं है, यद्यपि अधिकांश साक्ष्य क्षत्रिय मत का समर्थन करते हैं।

प्रश्न 3: ‘मौर्य’ नाम की उत्पत्ति कैसे समझी जाती है?

बौद्ध परंपरा में ‘मोरिय’ नाम को मोर से संबंधित माना गया है। महावंस में पिप्पलिवन के मोरिय क्षत्रियों का उल्लेख मिलता है। यद्यपि ‘मौर्य’ नाम की व्युत्पत्ति के संबंध में उपलब्ध परंपराओं को ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ सावधानीपूर्वक समझना आवश्यक है।

प्रश्न 4: चंद्रगुप्त मौर्य की उत्पत्ति के बारे में यूनानी स्रोत क्या बताते हैं?

यूनानी लेखकों ने चंद्रगुप्त मौर्य का उल्लेख ‘सैंड्रोकोट्टस’ के नाम से किया है। यूनानी विवरणों से उसके उदय तथा सेल्यूकस निकेटर के साथ संघर्ष की जानकारी मिलती है। उसकी सामाजिक उत्पत्ति के संबंध में भारतीय बौद्ध, जैन और ब्राह्मण परंपराएँ अधिक विस्तृत, किंतु परस्पर भिन्न विवरण प्रस्तुत करती हैं।

प्रश्न 5: मौर्य इतिहास के निर्माण में पुरातात्त्विक साक्ष्यों का क्या महत्त्व है?

अशोक के शिलालेख, स्तंभ, स्तूप, नगर-अवशेष, मुद्राएँ तथा अन्य पुरातात्त्विक सामग्री मौर्य इतिहास के अत्यंत महत्त्वपूर्ण साक्ष्य हैं। विशेष रूप से अशोक के अभिलेख उसके शासन, प्रशासन, धम्म, प्रजा-कल्याण तथा साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के संबंध में समकालीन प्रमाण प्रदान करते हैं।

प्रश्न 6: चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य साम्राज्य की स्थापना कैसे की?

 चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य (कौटिल्य) की सहायता से नंद सत्ता को पराजित कर मगध में मौर्य सत्ता की स्थापना की। इसके बाद उसने उत्तर-पश्चिमी भारत में अपनी शक्ति का विस्तार किया और यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर के साथ संघर्ष के बाद संधि की। इस प्रकार चंद्रगुप्त ने एक शक्तिशाली और विशाल साम्राज्य की नींव रखी।

प्रश्न 7: चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस निकेटर के बीच संबंध कैसे थे?

चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस निकेटर के बीच लगभग 305–303 ई.पू. के दौरान संघर्ष हुआ। संघर्ष के बाद दोनों के बीच संधि हुई, जिसके परिणामस्वरूप चंद्रगुप्त को उत्तर-पश्चिम के कुछ क्षेत्र (हेरात, कंधार, काबुल, बलूचिस्तान) प्राप्त हुए और दोनों शक्तियों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज चंद्रगुप्त के दरबार में आया और लंबे समय तक पाटलिपुत्र में रहा।

प्रश्न 8: मौर्य प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?

मौर्य प्रशासन अत्यधिक केंद्रीकृत और संगठित था। सम्राट प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी था तथा उसकी सहायता के लिए मंत्रिपरिषद और विभिन्न अधिकारी कार्य करते थे। साम्राज्य को प्रांतों में विभाजित किया गया था, जिनका प्रशासन प्रायः राजकुमारों (कुमार/आर्यपुत्र) द्वारा किया जाता था। कर-व्यवस्था, गुप्तचर व्यवस्था, न्याय, सेना और नगर प्रशासन पर राज्य का व्यापक नियंत्रण था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा अशोक के अभिलेख मौर्य प्रशासन को समझने के प्रमुख स्रोत हैं।

प्रश्न 9: अशोक के ‘धम्म’ की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?

अशोक का धम्म किसी एक संप्रदाय का धर्म नहीं था, बल्कि नैतिक एवं सामाजिक आचरण पर आधारित एक व्यापक नीति थी। इसमें माता-पिता का सम्मान, बड़ों का आदर, सभी संप्रदायों के प्रति सहिष्णुता, प्राणियों के प्रति दया, संयम और नैतिक जीवन पर बल दिया गया। अशोक ने अपने अभिलेखों तथा धम्म-महामात्रों नामक विशेष अधिकारियों के माध्यम से धम्म के इन सिद्धांतों का प्रचार किया।

प्रश्न 10: मौर्य साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण क्या थे?

मौर्य साम्राज्य के पतन के पीछे कई कारण माने जाते हैं। अशोक के बाद कमजोर उत्तराधिकारी, विशाल साम्राज्य को नियंत्रित करने में कठिनाई, प्रशासनिक एवं आर्थिक दबाव, प्रांतीय शक्तियों का बढ़ता प्रभाव, यवन आक्रमण तथा केंद्रीय सत्ता की कमजोरी प्रमुख कारण थे। अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने लगभग 185 ई.पू. में सैनिक परेड के दौरान कर दी, जिसके साथ मौर्य साम्राज्य का अंत और शुंग वंश का उदय हुआ।
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