खिलजी वंश (1290–1320 ई.) : दिल्ली सल्तनत का द्वितीय शासक-वंश
मुख्य लेख : दिल्ली सल्तनत
खिलजी वंश का परिचय
दिल्ली सल्तनत का दूसरा शासक परिवार खिलजी वंश था। इस वंश की स्थापना जलालुद्दीन खिलजी ने की थी, जिसने अपना जीवन एक साधारण सैनिक के रूप में प्रारंभ किया था। यद्यपि खिलजी कबीला लंबे समय से अफ़ग़ानिस्तान में बसा हुआ था, किंतु अपने पूर्ववर्ती गुलाम (इल्बारी) सुल्तानों की भाँति यह राजवंश भी मूलतः तुर्किस्तान का रहने वाला था।
खिलजी कौन थे?
खिलजी वंश की उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों में पर्याप्त मतभेद है। इतिहासकार निजामुद्दीन अहमद जलालुद्दीन खिलजी को चंगेज़ ख़ाँ का दामाद और कुलीन ख़ाँ का वंशज बताते हैं, जबकि तत्कालीन इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी का मानना है कि जलालुद्दीन तुर्कों से भिन्न जाति का था। बरनी का यह भी कहना है कि कैकुबाद की मृत्यु के बाद तुर्कों ने साम्राज्य खो दिया। किंतु खिलजियों को अफ़गान या पठान वर्ग में नहीं रखा जा सकता। इतिहासकार फ़ख़रुद्दीन ने खिलजियों को तुर्कों की 64 जातियों में से एक बताया है, और अधिकांश विद्वान भी फ़ख़रुद्दीन के इस मत का समर्थन करते हैं, जिससे यह प्रतीत होता है कि खिलजी मूलतः तुर्की मूल के थे।
भारत आने से पूर्व यह जाति अफ़ग़ानिस्तान में हेलमंद नदी के तटीय क्षेत्रों के उन भागों में निवास करती थी, जिन्हें ‘खिलजी’ के नाम से जाना जाता था। संभवतः इसीलिए इस जाति को ‘खिलजी’ कहा गया। अफ़ग़ानिस्तान में दीर्घकाल तक रहने के कारण उन्होंने अफ़गानों के अनेक गुण अपना लिए थे। इसीलिए खिलजी एक विशेषाधिकारविहीन वर्ग माने जाते थे और उन्हें इल्बारी वंश की नस्लवादी नीतियों का शिकार बनना पड़ा था।
खिलजी क्रांति
गुलाम वंश के अंतिम सुल्तान शमसुद्दीन क्यूमर्स की हत्या करके जलालुद्दीन खिलजी ने इल्बारी वंश के एकाधिकार का अंत कर दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार किया था, इसलिए इतिहास में खिलजी वंश की स्थापना को ‘खिलजी क्रांति’ के नाम से भी जाना जाता है।
खिलजी मुख्यतः सर्वहारा (साधारण) वर्ग से संबंधित थे और उन्होंने इस धारणा का अंत कर दिया कि शासन करने का अधिकार केवल विशिष्ट वर्ग को ही है। इस क्रांति के बाद तुर्की अमीर-सरदारों के प्रभाव-क्षेत्र में कमी आई। खिलजी क्रांति केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि उसने गुलाम वंश को समाप्त कर नवीन खिलजी वंश की स्थापना की, बल्कि इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इसके परिणामस्वरूप ही दिल्ली सल्तनत का सुदूर दक्षिण भारत तक विस्तार हुआ। खिलजी युग साम्राज्यवाद और मुस्लिम-शक्ति के विस्तार का युग था। खिलजी क्रांति ने प्रशासन में धर्म व उलेमा के महत्त्व को भी अस्वीकार कर दिया और यह सिद्ध किया कि राज्य को बिना धर्म की सहायता के भी न केवल जीवित रखा जा सकता है, बल्कि सफलतापूर्वक संचालित भी किया जा सकता है। इस प्रकार खिलजी शासकों की सत्ता मुख्य रूप से शक्ति (बल) पर निर्भर थी।
जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी (1290-1296 ई.)
मुख्य लेख : जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी
जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी ने अपना जीवन एक सैनिक के रूप में शुरू किया था। अपनी योग्यता के बल पर उसने ‘सर-ए-जहाँदारशाही’ (अंगरक्षक) का पद प्राप्त किया तथा बाद में समाना का सूबेदार बनाया गया। कैकुबाद ने उसे ‘आरिज़-ए-मुमालिक’ और ‘शाइस्ता ख़ाँ’ की उपाधि दी थी।
जलालुद्दीन ने दिल्ली के बजाय किलोखरी के महल में अपना राज्याभिषेक करवाया और लगभग एक वर्ष बाद दिल्ली में प्रवेश किया। दिल्ली के सरदारों एवं नागरिकों ने आरंभ में नए खिलजी शासक जलालुद्दीन फ़िरोज़ का स्वागत नहीं किया, क्योंकि वे उसे अफ़गान वंश का समझते थे। यही कारण था कि जलालुद्दीन ने किलोखरी को अपनी राजधानी बनाया। किंतु, जैसा बरनी लिखता है, उसके चरित्र की श्रेष्ठता, उसके न्याय, उदारता एवं स्नेह से धीरे-धीरे लोगों की नाराज़गी दूर हो गई तथा भूमि पाने की आशा से उसके सरदारों की श्रद्धा, अनिच्छापूर्वक ही सही, बढ़ने लगी।

जलालुद्दीन खिलजी की उपलब्धियाँ
जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी दिल्ली का पहला सुल्तान था, जिसकी आंतरिक नीति दूसरों को प्रसन्न करने के सिद्धांत पर आधारित थी। उसने सुल्तान बनने के बाद भी बलबन के संबंधियों को उनके पदों से नहीं हटाया। बलबन का एक संबंधी मलिक छज्जू अवध एवं मानिकपुर का गवर्नर बना रहा, और फ़ख़रुद्दीन भी दिल्ली का कोतवाल बना रहा। उसने अपने पुत्रों को क्रमशः खानखाना, अर्कली ख़ाँ एवं क़द्र ख़ाँ की उपाधि प्रदान की। हिंदू जनता के प्रति भी जलालुद्दीन की नीति अपेक्षाकृत उदार थी। उसकी उदार नीति का एकमात्र अपवाद तब देखने को मिलता है जब उसने सिद्दी मौला नामक एक दरवेश को फाँसी दी थी।
नए सुल्तान ने विद्रोहियों तथा अन्य अपराधियों के प्रति अत्यंत अनुचित दयालुता प्रदर्शित की। उसकी शांतिप्रिय प्रवृत्ति एवं दयालुता के स्वाभाविक परिणामस्वरूप सरदारों के षड्यंत्र पुनः आरंभ हो गए तथा दिल्ली के राजसिंहासन की सत्ता का निरादर होने लगा। अमीर ख़ुसरो ने 1291 ई. में अपनी रचना ‘मिफ़्ता-उल-फ़ुतूह’ में जलालुद्दीन खिलजी के सैन्य अभियानों, मलिक छज्जू के विद्रोह व उसके दमन, रणथंभोर पर सुल्तान के आक्रमण और अन्य विजयों का वर्णन किया है। जलालुद्दीन के अल्पकालीन शासन की कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं:
मलिक छज्जू के विद्रोह का दमन
अगस्त 1290 ई. में बलबन के एक भतीजे तथा कड़ा-मानिकपुर के जागीरदार मलिक छज्जू ने अनेक सरदारों की सहायता से विद्रोह कर दिया। उसने ‘सुल्तान मुगीसुद्दीन’ की उपाधि धारण कर अपने नाम के सिक्के चलवाए एवं खुतबा पढ़वाया। सुल्तान ने विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया और कड़ा-मानिकपुर की सूबेदारी अपने भतीजे एवं दामाद अलाउद्दीन खिलजी को सौंप दी। उसने दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्रों में ठगों का भी दमन किया।
रणथंभोर के विरुद्ध अभियान
1291 ई. में रणथंभोर के विरुद्ध जलालुद्दीन का अभियान असफल रहा; सुल्तान दुर्ग पर अधिकार किए बिना ही वहाँ से हट गया, क्योंकि वह बहुत-से मुसलमानों की बलि नहीं देना चाहता था। किंतु 1292 ई. में वह मंडौर एवं झाईन के किलों को जीतने में सफल रहा।
मंगोलों से संबंध
जलालुद्दीन को मंगोलों के एक दल के विरुद्ध निर्णायक सफलता प्राप्त हुई। 1292 ई. में मंगोल आक्रमणकारी हलाकू (हुलागू) का पौत्र अब्दुल्ला लगभग डेढ़ लाख मंगोलों के साथ पंजाब पर आक्रमण करते हुए सुनाम तक पहुँच गया। सुल्तान की सेना ने आक्रमणकारियों को बुरी तरह पराजित किया, और फिर दोनों पक्षों में सुलह हो गई। अधिकांश मंगोल भारत से वापस लौट गए, किंतु चंगेज़ के एक वंशज उलग़ू ने अपने लगभग 4,000 समर्थकों सहित इस्लाम धर्म स्वीकार कर भारत में रहने का निर्णय लिया। कालांतर में जलालुद्दीन ने उलग़ू के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया और उनके रहने के लिए दिल्ली के निकट मुगलपुर नामक बस्ती बसाई। बाद में वे ‘नवीन मुसलमान’ (नव-मुस्लिम) के नाम से जाने गए। यह एक अनुचित छूट सिद्ध हुई, जिससे भविष्य में बहुत कष्ट उठाना पड़ा। वे दिल्ली सरकार के लिए उत्पाती पड़ोसी और संकट का कारण बने।
दक्षिण भारत पर प्रथम आक्रमण
जलालुद्दीन के समय उसके भतीजे अलाउद्दीन ने चाचा की स्वीकृति लेकर 1292 ई. में मालवा, भिलसा एवं देवगिरि के विरुद्ध अभियान चलाया। देवगिरि पर यह आक्रमण मुसलमानों का दक्षिण भारत पर पहला आक्रमण था, जिसमें अलाउद्दीन को अपार संपत्ति प्राप्त हुई।
यद्यपि जलालुद्दीन खिलजी का शासन उदार निरंकुशता की नीति पर आधारित था, तथापि उसने ईरानी धार्मिक फ़कीर सिद्दी मौला को हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया। यह सुल्तान का एकमात्र कठोर कृत्य था, अन्यथा उसकी नीति उदारता और सभी को संतुष्ट करने की ही थी। अपनी उदार नीति के विषय में जलालुद्दीन कहा करता था : “मैं एक वृद्ध मुसलमान हूँ और मुसलमान का रक्त बहाना मेरी आदत नहीं है।” अमीर ख़ुसरो और इमामी, दोनों ने अलाउद्दीन खिलजी को ‘भाग्यवादी व्यक्ति’ कहा है। यह सुल्तान के भाग्य की ही विचित्र लीला थी कि उसके महत्त्वाकांक्षी भतीजे ने 1296 ई. में उसकी हत्या कर दी।
अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.)
मुख्य लेख : अलाउद्दीन खिलजी
अलाउद्दीन खिलजी जलालुद्दीन खिलजी का भतीजा और दामाद था। उसके पिता का नाम शिहाबुद्दीन मसूद था और उसका बचपन का नाम अली गुरशास्प था। पितृविहीन अलाउद्दीन का पालन-पोषण उसके चाचा जलालुद्दीन फ़िरोज़ ने ही किया था। फ़िरोज़ अपने भतीजे अलाउद्दीन से इतना अधिक स्नेह करता था कि उसने उसे अपना दामाद भी बना लिया। मलिक छज्जू के विद्रोह को दबाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण जलालुद्दीन ने उसे इलाहाबाद जिले के कड़ा-मानिकपुर की जागीर और ‘अमीर-ए-तुज़ुक’ का पद प्रदान किया। यहीं से अलाउद्दीन के मन में महत्त्वाकांक्षा के बीज पड़े। संभव है कि अपनी सास मलिका जहाँ तथा अपनी पत्नी के षड्यंत्रों से उत्पन्न पारिवारिक कष्ट से भी उसे दिल्ली दरबार से अलग शक्ति एवं प्रभाव स्थापित करने की प्रेरणा मिली हो।
दक्षिण भारत की लूट (देवगिरि अभियान, 1296 ई.)
भिलसा में अलाउद्दीन ने देवगिरि राज्य की अपार संपत्ति की अस्पष्ट अफ़वाहें सुनीं। पश्चिमी दक्कन में फैले देवगिरि राज्य पर उस समय यादव वंश का रामचंद्रदेव शासन कर रहा था। अलाउद्दीन कई हज़ार अश्वारोहियों को लेकर मध्य भारत एवं विंध्य प्रदेश होते हुए देवगिरि पहुँच गया, जबकि उसने अपने इस अभिप्राय को चाचा से गुप्त रखा था। रामचंद्रदेव ऐसे किसी आक्रमण के लिए तैयार नहीं था; उसका पुत्र शंकरदेव उस समय अधिकांश सेना के साथ दक्षिण की ओर गया हुआ था। एक निष्फल प्रतिरोध के बाद रामचंद्रदेव पराजित हो गया और उसे आक्रमणकारी के साथ संधि करनी पड़ी, जिसके अनुसार उसने बहुत बड़ी धनराशि देने का वादा किया।
अलाउद्दीन कड़ा लौटने ही वाला था कि शंकरदेव देवगिरि वापस आ गया और पिता के रोकने पर भी आक्रमणकारियों से जा भिड़ा। किंतु वह शीघ्र ही पराजित हो गया और उसकी सेना भाग खड़ी हुई। अब पहले से भी अधिक कठोर शर्तों पर संधि हुई। अलाउद्दीन सोने, चाँदी, रेशम, मोतियों और बहुमूल्य पत्थरों के रूप में विपुल लूट लेकर कड़ा लौट आया। इस आक्रमण से दक्कन को न केवल भारी आर्थिक क्षति हुई, बल्कि विंध्य पर्वत के पार के प्रदेशों की विजय का मार्ग भी खुल गया। दक्षिण में मिली विजय और संपत्ति से अलाउद्दीन की महत्त्वाकांक्षा बढ़ गई, और अब दिल्ली का सिंहासन उसका लक्ष्य बन गया।
जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी की हत्या
बूढ़े सुल्तान जलालुद्दीन फ़िरोज़ को अहमद चप जैसे पदाधिकारियों ने ईमानदारी से सलाह दी कि वह अपने भतीजे पर नियंत्रण रखे। किंतु फ़िरोज़ अपने भतीजे एवं दामाद अलाउद्दीन के स्नेह में अंधा होकर उसके बिछाए जाल में फँस गया। अपने दरबार के एक विश्वासघाती की सलाह पर वह बिना पर्याप्त आत्मरक्षा के प्रबंध किए ही अपने प्रिय भतीजे से मिलने नाव से कड़ा की ओर चल पड़ा। कड़ा पहुँचने पर नाव से उतरकर ज्यों ही जलालुद्दीन भतीजे अलाउद्दीन से गले मिला, त्यों ही उसके भाई अलमास बेग ने चुपके से छुरा घोंपकर सुल्तान की हत्या कर दी, जिसे बाद में अलाउद्दीन ने ‘उलूग ख़ाँ’ की उपाधि से विभूषित किया।
अलाउद्दीन खिलजी का राज्याभिषेक
अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या के पश्चात अलाउद्दीन के समर्थकों ने उसके पड़ाव में ही 19 जुलाई 1296 ई. को उसे सुल्तान घोषित कर दिया। इस राज्याभिषेक पर जियाउद्दीन बरनी लिखता है : “शहीद सुल्तान (जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी) के कटे मस्तक से अभी रक्त टपक ही रहा था कि शाही चंदोबा अलाउद्दीन खिलजी के सिर पर रखा गया और उसे सुल्तान घोषित कर दिया गया।”
इसके बाद अलाउद्दीन ने दिल्ली में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने का प्रयास किया। इस बीच दिल्ली में मृत सुल्तान की विधवा मलिका जहाँ ने अपने छोटे पुत्र को रुकनुद्दीन इब्राहीम के नाम से सिंहासन पर बैठा दिया था। ज्येष्ठ पुत्र अर्कली ख़ाँ माँ के कुछ कार्यों से असंतुष्ट होकर पहले ही मुल्तान जा चुका था। अलाउद्दीन भयानक वर्षा में शीघ्रता से दिल्ली की ओर बढ़ा। अल्प प्रतिरोध के पश्चात इब्राहीम अपनी माँ तथा विश्वासी अहमद चप के साथ मुल्तान भाग गया। अलाउद्दीन ने दक्कन से प्राप्त संपत्ति बाँटकर सरदारों, अधिकारियों एवं दिल्लीवासियों को अपने पक्ष में कर लिया और 3 अक्तूबर 1296 ई. को बलबन के लाल महल में पुनः अपना राज्याभिषेक कराया।
अलाउद्दीन के भाई उलूग ख़ाँ तथा मंत्री ज़फ़र ख़ाँ ने मुल्तान से मृत सुल्तान के भगोड़े संबंधियों एवं मित्रों को बंदी बना लिया। अर्कली ख़ाँ, इब्राहीम, उसके बहनोई उलग़ू ख़ाँ (मंगोल) तथा अहमद चप को अंधा कर दिया गया। अर्कली के सभी पुत्र मार डाले गए और उसे तथा उसके भाई को हाँसी के दुर्ग में बंद कर दिया गया। मलिका जहाँ तथा अहमद चप को कठोर नियंत्रण में दिल्ली में ही रखा गया।
अलाउद्दीन खिलजी की उपलब्धियाँ
अभी भी अलाउद्दीन की स्थिति अनिश्चित थी। उसे तुर्कों की शत्रुता, राजस्थान, मालवा एवं गुजरात के शासकों के विद्रोहपूर्ण व्यवहार, सरदारों के षड्यंत्र तथा मंगोलों के आक्रमण जैसी अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। किंतु नए सुल्तान ने न केवल इन समस्याओं का सामना किया, बल्कि सल्तनत का विस्तार भी किया। इस प्रकार अलाउद्दीन खिलजी के साथ साम्राज्यवादी विस्तार के लगभग 50 वर्षीय इतिहास का आरंभ होता है।

मंगोल आक्रमणों का प्रतिरोध
अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल (1296–1316 ई.) की सबसे बड़ी सैन्य चुनौतियों में मंगोल आक्रमण प्रमुख थे। मंगोलों ने दिल्ली सल्तनत की उत्तर-पश्चिमी सीमा को बार-बार चुनौती दी और कई अवसरों पर दिल्ली के अस्तित्व के लिए गंभीर संकट उत्पन्न किया। अलाउद्दीन को अपने शासनकाल में मंगोलों के सबसे अधिक तथा सबसे भयंकर आक्रमणों का सामना करना पड़ा। इन आक्रमणों का उद्देश्य प्रारंभ में लूटपाट था, किंतु बाद में मंगोलों ने भारत में स्थायी विजय प्राप्त करने का प्रयास भी किया। अलाउद्दीन की सुदृढ़ सैन्य व्यवस्था, विशाल सेना, सीमांत सुरक्षा तथा कठोर नीति के कारण अंततः मंगोलों को बार-बार पराजित होना पड़ा।
1297–1298 ई. : कादर का आक्रमण और जालंधर का युद्ध
अलाउद्दीन के शासनकाल के आरंभ में ही मंगोलों ने भारत पर एक बड़ा आक्रमण किया। 1297–1298 ई. में कादर के नेतृत्व में एक विशाल मंगोल सेना भारत की ओर बढ़ी। इस आक्रमण ने पंजाब और उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर दिया। मंगोल सेना का सामना करने के लिए अलाउद्दीन ने उलूग ख़ाँ और ज़फ़र ख़ाँ के नेतृत्व में अपनी सेना भेजी।
दोनों पक्षों के बीच जालंधर के निकट युद्ध हुआ। दिल्ली सल्तनत की सेना ने मंगोलों को निर्णायक रूप से पराजित किया। इस विजय से न केवल पंजाब क्षेत्र मंगोलों के तत्काल खतरे से सुरक्षित हुआ, बल्कि अलाउद्दीन की सैन्य शक्ति और उसके सेनापतियों की क्षमता भी स्पष्ट हुई। यह सफलता आगे होने वाले मंगोल आक्रमणों के विरुद्ध दिल्ली सल्तनत के आत्मविश्वास का आधार बनी।
1298 ई. : सलदी का आक्रमण और सिविस्तान की विजय
1298 ई. में मंगोलों ने पुनः आक्रमण किया। इस बार सलदी के नेतृत्व में मंगोल सेना ने सिविस्तान क्षेत्र पर अधिकार करने का प्रयास किया। इस अभियान का सामना अलाउद्दीन के विश्वसनीय सेनापति ज़फ़र ख़ाँ ने किया।
ज़फ़र ख़ाँ ने अपनी सैन्य क्षमता का परिचय देते हुए मंगोलों को पराजित किया। सलदी को उसके लगभग दो हजार अनुयायियों सहित बंदी बना लिया गया और उन्हें दिल्ली भेज दिया गया। इस विजय से दिल्ली सल्तनत की सैन्य प्रतिष्ठा और मजबूत हुई। लगातार दो अभियानों में मंगोलों की पराजय ने उन्हें यह संकेत दे दिया कि दिल्ली सल्तनत पर सामान्य सीमा-छापों के माध्यम से विजय प्राप्त करना आसान नहीं था।
1299 ई. : कुतलुग़ ख़्वाजा का भयंकर आक्रमण
1299 ई. का मंगोल आक्रमण अलाउद्दीन के शासनकाल की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक था। कुतलुग़ ख़्वाजा के नेतृत्व में मंगोलों की एक विशाल सेना भारत में प्रवेश कर दिल्ली की ओर बढ़ी। इस बार मंगोलों का उद्देश्य केवल लूटपाट करना नहीं था, बल्कि दिल्ली सल्तनत को पराजित करके विजय प्राप्त करना था। इसलिए उन्होंने रास्ते में आने वाले क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर लूटने में समय नष्ट नहीं किया और सीधे दिल्ली की ओर बढ़े।
मंगोल सेना दिल्ली के निकट पहुँच गई, जिससे राजधानी में भय और असुरक्षा का वातावरण उत्पन्न हो गया। अलाउद्दीन ने अपनी सेना को संगठित करके उनका सामना किया। इस संकट के समय ज़फ़र ख़ाँ ने असाधारण वीरता दिखाई। उसने मंगोलों पर आक्रमण किया और उनके विरुद्ध अत्यंत साहस से युद्ध किया। संघर्ष के दौरान ज़फ़र ख़ाँ वीरगति को प्राप्त हुआ।
यद्यपि इस युद्ध का परिणाम पूर्णतः निर्णायक नहीं था, किंतु मंगोल दिल्ली पर अधिकार करने में सफल नहीं हुए और अंततः वापस लौट गए। ज़फ़र ख़ाँ की वीरता इस संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण घटना बनी। उसकी मृत्यु ने दिल्ली सल्तनत को एक अत्यंत योग्य सेनापति से वंचित कर दिया।
1304 ई. : सीरी पर मंगोलों का आक्रमण
1304 ई. में मंगोलों ने एक बार फिर दिल्ली पर आक्रमण किया। इस बार उन्होंने सीरी के क्षेत्र को घेरने का प्रयास किया। मंगोलों ने लगभग दो महीने तक घेरा बनाए रखा, किंतु वे दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ने में असफल रहे।
अलाउद्दीन की मजबूत सैन्य व्यवस्था और राजधानी की किलेबंदी के कारण मंगोलों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। अंततः उन्होंने दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में लूटपाट की और वापस लौट गए। इस घटना से यह स्पष्ट हो गया कि मंगोलों के लिए दिल्ली के चारों ओर की मजबूत सुरक्षा व्यवस्था को भेदना कठिन होता जा रहा था।
1305 ई. : अमरोहा का युद्ध
1305 ई. में मंगोलों ने पहले से अधिक संगठित रूप में भारत में प्रवेश किया। अलीबेग, तार्ताक़ और तार्गी के नेतृत्व में मंगोल सेना भारत में आगे बढ़ती हुई अमरोहा तक पहुँच गई। यह आक्रमण दिल्ली सल्तनत के लिए गंभीर खतरा था, क्योंकि अमरोहा दिल्ली के अपेक्षाकृत निकट स्थित था।
अलाउद्दीन ने मंगोलों का सामना करने के लिए अपनी सेना भेजी। मलिक काफ़ूर और गाज़ी मलिक के नेतृत्व में दिल्ली सल्तनत की सेना ने मंगोलों पर निर्णायक आक्रमण किया। अमरोहा के निकट हुए युद्ध में मंगोलों को बुरी तरह पराजित किया गया। बड़ी संख्या में मंगोल सैनिक मारे गए और अनेक बंदी बनाए गए।
अमरोहा की विजय ने अलाउद्दीन की मंगोल-विरोधी नीति की सफलता को प्रमाणित किया। इसके बाद दिल्ली सल्तनत की सेना ने उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा को और मजबूत किया तथा मंगोलों के विरुद्ध अधिक आक्रामक रणनीति अपनाई।
1307–1308 ई. : इक़बालमंद का अंतिम प्रमुख आक्रमण
अलाउद्दीन के शासनकाल में मंगोलों का अंतिम प्रमुख आक्रमण 1307–1308 ई. के आसपास हुआ। इस बार इक़बालमंद के नेतृत्व में मंगोलों ने सिंधु नदी पार करके भारत में प्रवेश किया। उनका उद्देश्य पुनः दिल्ली सल्तनत के क्षेत्रों पर आक्रमण करना था।
दिल्ली सल्तनत की सेना ने उनका मार्ग रोक दिया। गाज़ी मलिक, जो आगे चलकर सुल्तान गयासुद्दीन तुग़लक़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, ने मंगोलों के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व किया। रावी नदी के किनारे हुए संघर्ष में मंगोलों को पराजित किया गया। इस पराजय के बाद मंगोलों की भारत में बड़े पैमाने पर आक्रमण करने की क्षमता और इच्छा दोनों कमजोर पड़ गईं।
मंगोल आक्रमणों की असफलता के प्रमुख कारण
अलाउद्दीन की सफलता केवल युद्धभूमि की विजय तक सीमित नहीं थी। उसने मंगोल खतरे को समाप्त करने के लिए सैन्य और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर व्यापक उपाय किए। उसने एक विशाल स्थायी सेना बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया। राजधानी और उसके आसपास के महत्वपूर्ण क्षेत्रों की सुरक्षा मजबूत की गई तथा सीमांत क्षेत्रों में सैन्य चौकियाँ स्थापित की गईं।
अलाउद्दीन ने मंगोलों के विरुद्ध कठोर नीति अपनाई। मंगोल बंदियों के प्रति उसकी नीति अत्यंत कठोर थी, जिसका उद्देश्य भविष्य में होने वाले आक्रमणों को हतोत्साहित करना था। इसके साथ ही उसने सेना को नियमित वेतन देने तथा सैनिकों और घोड़ों की निगरानी के लिए दाग और चेहरा प्रणाली को प्रभावी बनाया। इससे उसकी सेना की गुणवत्ता और अनुशासन में वृद्धि हुई।
मंगोल खतरे का अंत
लगातार असफलताओं के कारण मंगोल धीरे-धीरे निरुत्साहित हो गए। अलाउद्दीन की मजबूत सैन्य व्यवस्था, सीमांत सुरक्षा, विशाल सेना और कठोर प्रतिरोध ने उन्हें यह समझने के लिए विवश कर दिया कि दिल्ली सल्तनत को पराजित करना आसान नहीं था। परिणामतः उसके शासनकाल के अंतिम वर्षों में मंगोलों के बड़े आक्रमण बंद हो गए।
इस प्रकार मंगोल आक्रमणों का सफल प्रतिरोध अलाउद्दीन खिलजी की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य उपलब्धियों में से एक था। उसने न केवल दिल्ली को बार-बार होने वाले बाहरी आक्रमणों से बचाया, बल्कि उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा को भी मजबूत किया। मंगोलों की लगातार पराजय ने दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ाई और अलाउद्दीन को एक शक्तिशाली सैन्य शासक के रूप में स्थापित किया। दिल्ली की जनता तथा उत्तर-पश्चिमी सीमा के क्षेत्रों को अंततः इन लगातार होने वाले आक्रमणों से राहत मिली।
उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा
अलाउद्दीन ने बलबन की भाँति अपने राज्य की उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा के लिए कुछ प्रतिरक्षात्मक उपाय किए। उसने मंगोलों के मार्ग में पड़ने वाले पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाई तथा नए दुर्गों का निर्माण करवाया। राजकीय सेना को सुदृढ़ किया गया, और सतत सुरक्षा हेतु समाना तथा दीपालपुर की सुदूरवर्ती चौकियों पर सदैव युद्ध हेतु तैयार सेनाएँ रखी गईं। मंगोल आक्रमण से सुरक्षा के लिए अलाउद्दीन ने 1304 ई. में सीरी को अपनी राजधानी बनाया और उसकी किलेबंदी करवाई। 1305 ई. में गाज़ी मलिक तुग़लक़ (बाद में गयासुद्दीन तुग़लक़) को सीमा-रक्षक नियुक्त किया गया, जिसने योग्यतापूर्वक मंगोलों को रोके रखा।
नव-मुस्लिमों का दमन
दिल्ली के निकट बसे नव-मुस्लिम अलाउद्दीन की नीतियों से असंतुष्ट थे, क्योंकि उनकी पद प्राप्ति या अन्य लाभों की महत्त्वाकांक्षाएँ पूरी नहीं हुई थीं। जब अलाउद्दीन की सेना गुजरात विजय कर लौट रही थी, तब इन नव-मुस्लिमों ने विद्रोह कर दिया। सुल्तान ने सभी नव-मुस्लिमों को नौकरी से हटा दिया, जिससे उनका असंतोष और बढ़ गया। निराश होकर उन्होंने सुल्तान की हत्या की योजना बनाई, किंतु शीघ्र ही इस योजना का भंडाफोड़ हो गया, और सुल्तान ने उनके पूर्ण संहार का आदेश देकर भयंकर प्रतिशोध लिया। इस तरह एक ही दिन में लगभग बीस से तीस हज़ार नव-मुस्लिम निर्दयतापूर्वक कत्ल कर दिए गए।
सल्तनत के विस्तार की महत्त्वाकांक्षा
अलाउद्दीन को अपने शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों में निरंतर सफलता मिलती गई, जिससे उसका दिमाग फिर गया। वह असंभव योजनाएँ बनाने लगा। उसने एक नया धर्म स्थापित करने और सिकंदर महान् की भाँति विश्व-विजेता बनने की योजना बनाई। इस विषय में उसने काज़ी अलाउल्मुल्क (इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी के चाचा) से परामर्श लिया, जो पहले कड़ा में उसका प्रतिनिधि तथा उस समय दिल्ली का कोतवाल था। अलाउल्मुल्क ने उसे उसकी योजनाओं की निःसारता समझाई। धर्म-प्रवर्तन के विषय में उसने कहा कि यह पद कभी राजाओं से संबद्ध नहीं रहा; विश्व-विजय के विषय में कहा कि अभी हिंदुस्तान का ही एक बड़ा भाग अविजित है, मंगोल आक्रमण का भय बना हुआ है, और सुल्तान की अनुपस्थिति में राज्य संचालन हेतु अरस्तू के समान कोई सक्षम वज़ीर भी नहीं है। इस प्रकार सुल्तान को समझाया गया और उसने अपनी अव्यावहारिक योजनाओं का परित्याग कर दिया। फिर भी उसने ‘सिकंदर द्वितीय’ (सानी) की उपाधि धारण कर इसका उल्लेख अपने सिक्कों पर करवाया।
अलाउद्दीन खिलजी की उत्तर भारत की विजयें
अलाउद्दीन खिलजी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का सुल्तान था। उसके शासनकाल में भारत के विभिन्न भागों में मुस्लिम सत्ता का तीव्रता से विस्तार आरंभ हुआ, जो लगभग आधी शताब्दी तक चलता रहा। उसने उत्तर भारत के राज्यों को जीतकर उन पर प्रत्यक्ष शासन किया, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों को अपने अधीन कर उनसे वार्षिक कर वसूल कर अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार किया।
गुजरात विजय (1297 ई.)
अलाउद्दीन ने गुजरात जीतने हेतु अपने भाई उलूग ख़ाँ तथा वज़ीर नुसरत ख़ाँ के नेतृत्व में सेना भेजी। गुजरात का राजपूत बघेल शासक कर्णदेव द्वितीय (राजकरन) अहमदाबाद के निकट पराजित हुआ और अपनी पुत्री देवलदेवी के साथ भागकर देवगिरि के रामचंद्रदेव के यहाँ शरण ली। सुल्तान की सेना ने संपूर्ण राज्य को रौंद डाला और कर्णदेव की रानी कमलादेवी को बंदी बना लिया। आक्रमणकारियों ने सूरत, सोमनाथ और कैंबे तक धावा बोला और गुजरात के समृद्ध बंदरगाहों को भी लूटा। यहीं नुसरत ख़ाँ ने एक हिंदू हिजड़ा मलिक काफ़ूर को एक हज़ार दीनार में ख़रीदा। लूट की विपुल संपत्ति, कमलादेवी और काफ़ूर के साथ सेना दिल्ली लौट आई। अलाउद्दीन ने बाद में कमलादेवी से विवाह कर उसे अपनी प्रिय रानी ‘मलिका जहाँ’ बना लिया।
रणथंभौर विजय (1301 ई.)
रणथंभौर का दुर्ग, जो कुतुबुद्दीन ऐबक तथा इल्तुतमिश द्वारा जीता गया था, राजपूतों द्वारा पुनः छीन लिया गया था। यहाँ का शासक हम्मीरदेव अपनी योग्यता एवं साहस के लिए प्रसिद्ध था। उसने मुहम्मदशाह एवं केहब जैसे कुछ असंतुष्ट नव-मुस्लिमों को शरण दे रखी थी, जिससे अलाउद्दीन क्रुद्ध हो गया। 1299 ई. में सुल्तान ने अपने भाई उलूग ख़ाँ तथा नुसरत ख़ाँ के नेतृत्व में सेना भेजी। उन्होंने झाईन जीतकर रणथंभौर के सामने पड़ाव डाला, किंतु राजपूतों ने उन्हें शीघ्र ही पराजित कर दिया और नुसरत ख़ाँ घेराबंदी के दौरान दुर्ग से छूटे एक पत्थर से मारा गया। यह सुनकर अलाउद्दीन स्वयं रणथंभौर की ओर बढ़ा। मार्ग में तिलपत में शिकार करते समय उसके भतीजे अकत ख़ाँ ने कुछ नव-मुस्लिमों के साथ मिलकर उस पर आक्रमण कर उसे घायल कर दिया, किंतु वह विश्वासघाती शीघ्र ही पकड़ा गया और अपने समर्थकों सहित मार डाला गया। अलाउद्दीन ने किले को लगभग एक वर्ष तक घेरे रखने के बाद जुलाई 1301 ई. में बड़ी कठिनाई से विजय प्राप्त की। हम्मीरदेव तथा उसके शरणागत नव-मुस्लिमों को मार डाला गया। सुल्तान ने रनमल और उसके साथियों का भी वध करवाया, जिन्होंने हम्मीरदेव से विश्वासघात कर आक्रमणकारियों का साथ दिया था। ‘तारीख़-ए-अलाई’ एवं ‘हम्मीर महाकाव्य’ में हम्मीरदेव तथा उसके परिवार के जौहर द्वारा मृत्यु को प्राप्त होने का वर्णन मिलता है।
जैसलमेर विजय (1299 ई.)
सेना के कुछ घोड़े चुराए जाने के कारण अलाउद्दीन ने जैसलमेर के शासक दूदा एवं उसके सहयोगी तिलकसिंह को पराजित कर जैसलमेर पर विजय प्राप्त की।
मेवाड़ विजय (1303 ई.)
अलाउद्दीन ने गुहिल राजपूतों की भूमि मेवाड़ पर भी आक्रमण की योजना बनाई। उस समय मेवाड़ का शासक राणा रतनसिंह था, जिसकी राजधानी चित्तौड़ थी। चित्तौड़ का दुर्ग सामरिक दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित होने के कारण अलाउद्दीन की महत्त्वाकांक्षा का लक्ष्य बना। कुछ इतिहासकारों ने इस आक्रमण का कारण राणा रतनसिंह की रानी पद्मिनी के सौंदर्य के प्रति सुल्तान का आकर्षण बताया है, किंतु किसी समकालीन इतिहास अथवा अभिलेख में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। संभवतः यह आक्रमण भी रणथंभौर अभियान की भाँति सुल्तान की राज्य-विस्तार की महत्त्वाकांक्षा का ही परिणाम था। राणा को बंदी बनाकर सुल्तान के शिविर में ले जाया गया, किंतु राजपूतों ने वीरतापूर्वक उसे छुड़ा लिया। गोरा तथा बादल नामक दो वीर नायकों के नेतृत्व में राजपूतों के एक छोटे दल ने चित्तौड़गढ़ के बाहरी द्वार पर आक्रमणकारियों को रोके रखा, किंतु दिल्ली की शक्तिशाली सेना के सामने अधिक समय तक टिक नहीं सके। अंततः 28 जनवरी 1303 ई. को सुल्तान चित्तौड़ के किले पर अधिकार करने में सफल हुआ। राणा रतनसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ और उसकी पत्नी रानी पद्मिनी ने अन्य स्त्रियों सहित जौहर कर लिया। अलाउद्दीन ने अपने पुत्र खिज्र ख़ाँ को वहाँ का शासक नियुक्त कर चित्तौड़ का नाम बदलकर खिज्राबाद कर दिया। बाद में खिज्र ख़ाँ को वापस दिल्ली बुलाकर चित्तौड़ की जिम्मेदारी राजपूत सरदार मालदेव को सौंप दी गई। अलाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात गुहिलोत वंश के हम्मीरदेव ने मालदेव पर आक्रमण कर 1321 ई. में चित्तौड़ सहित संपूर्ण मेवाड़ को पुनः स्वतंत्र करवा लिया।
मालवा विजय (1305 ई.)
चित्तौड़-विजय के बाद अलाउद्दीन ने मुल्तान के सूबेदार आईन-उल-मुल्क के नेतृत्व में मालवा पर अधिकार हेतु सेना भेजी। मालवा के राजा महलक देव तथा उसके सेनापति हरनंद (कोका प्रधान) ने वीरतापूर्वक प्रतिरोध किया, किंतु नवंबर 1305 ई. में वे पराजित होकर मारे गए। सुल्तान का हाजिब-ए-ख़ास ऐनुल्मुल्क मालवा का शासक नियुक्त हुआ, और उसकी सेना ने उज्जैन, मांडू, धार एवं चंदेरी को भी जीत लिया।
जालौर विजय (1305 ई.)
जालौर के शासक कान्हड़देव ने 1304 ई. में अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार कर ली थी, किंतु धीरे-धीरे स्वतंत्र होने का प्रयास किया। 1305 ई. में कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में सुल्तान की सेना ने कान्हड़देव को युद्ध में पराजित कर उसकी हत्या कर दी। इसके साथ ही अलाउद्दीन की राजस्थान-विजय का कठिन कार्य पूरा हुआ।
सिवाना विजय (1308 ई.)
अलाउद्दीन ने सिवाना पर अधिकार हेतु आक्रमण किया। वहाँ के परमार राजपूत शासक शीतलदेव ने कड़ा संघर्ष किया, किंतु अंततः मारा गया। कमालुद्दीन गुर्ग को वहाँ का शासक नियुक्त किया गया। इस प्रकार लगभग 1308 ई. तक प्रायः समस्त उत्तरी भारत खिलजी साम्राज्य के अधीन आ चुका था।
उत्तर भारत की इन विजयों से अलाउद्दीन का मनोबल इतना बढ़ गया कि वह स्वयं की तुलना पैगंबर मुहम्मद से करने लगा। उसने कहा कि जिस प्रकार पैगंबर के चार प्रमुख योद्धा थे, उसी प्रकार उसके भी चार योद्धा- उलूग ख़ाँ, नुसरत ख़ाँ, ज़फ़र ख़ाँ और अलप ख़ाँ हैं। वह सिकंदर से भी प्रभावित था और विश्व-विजय करना चाहता था, इसीलिए उसने अपने सिक्कों पर ‘सिकंदर-ए-सानी’ की उपाधि खुदवाई। अब उसका ध्यान दक्षिण भारत (दक्कन) की विजय की ओर गया।
अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण भारत की विजयें
यद्यपि व्यापार के कारण भारत का पश्चिमी समुद्र-तट मुसलमानों के संपर्क में पहले से ही आ चुका था, फिर भी दक्कन की प्रथम विजय अलाउद्दीन के नेतृत्व में खिलजियों द्वारा ही हुई। अलाउद्दीन ने मुख्यतः राजनैतिक एवं आर्थिक कारणों से दक्षिण पर आक्रमण किया। उत्तर पर अधिकार करने के बाद दक्षिण पर प्रभाव स्थापित करना उसके जैसे महत्त्वाकांक्षी शासक के लिए स्वाभाविक था और दक्कन की संपत्ति भी एक बड़ा प्रलोभन थी।
दक्षिण भारत की राजनीतिक स्थिति
तेरहवीं शताब्दी के अंतिम चरण और चौदहवीं शताब्दी के आरंभ में दक्षिण भारत किसी एक केंद्रीय सत्ता के अधीन नहीं था। यह क्षेत्र अनेक शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्यों में विभाजित था। इनमें देवगिरि के यादव, तेलंगाना के काकतीय, द्वारसमुद्र के होयसल और माबर के पांड्य प्रमुख थे। इनके अतिरिक्त भी कई छोटे-छोटे राज्य और स्थानीय राजवंश विद्यमान थे। इन राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, क्षेत्रीय संघर्ष और परस्पर अविश्वास की स्थिति बनी रहती थी। यही राजनीतिक विखंडन आगे चलकर अलाउद्दीन खिलजी और उसके उत्तराधिकारियों के दक्षिण भारतीय अभियानों के लिए अनुकूल परिस्थिति बना।
देवगिरि का यादव राज्य
दक्षिण भारत में उत्तर की ओर स्थित प्रमुख राज्य देवगिरि का यादव राज्य था। यादवों की राजधानी देवगिरि थी, जिसे बाद में दौलताबाद के नाम से भी जाना गया। यादव राज्य का प्रभाव वर्तमान महाराष्ट्र के एक बड़े भू-भाग पर था और यह उत्तर तथा दक्षिण भारत के बीच महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं व्यापारिक क्षेत्र में स्थित था।
इस समय यादव वंश का प्रमुख शासक रामचंद्रदेव था, जिसने लगभग 1271 से 1309 ई. तक शासन किया। उसके शासनकाल में यादव राज्य आर्थिक और राजनीतिक रूप से पर्याप्त समृद्ध था। देवगिरि की भौगोलिक स्थिति भी अत्यंत महत्वपूर्ण थी। यह दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में स्थित एक शक्तिशाली दुर्ग था और दक्षिण भारत की ओर जाने वाले मार्गों पर उसका प्रभाव था।
फिर भी रामचंद्रदेव को अपने पड़ोसी राज्यों से लगातार चुनौती मिलती रहती थी। विशेष रूप से यादवों और होयसल शासकों के बीच राजनीतिक संघर्ष की स्थिति बनी रहती थी। दक्षिण के राज्यों में व्याप्त इस प्रतिस्पर्धा के कारण वे किसी बाहरी शक्ति के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा नहीं बना सके।
तेलंगाना का काकतीय राज्य
दक्षिण भारत का दूसरा महत्वपूर्ण राज्य तेलंगाना का काकतीय राज्य था। काकतीयों की राजधानी वारंगल थी, जो वर्तमान तेलंगाना क्षेत्र में स्थित है। वारंगल राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य दृष्टि से दक्षिण भारत का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।
इस काल में काकतीय राज्य का शासन प्रतापरुद्रदेव प्रथम के हाथों में था। काकतीय शासकों ने तेलंगाना क्षेत्र में एक शक्तिशाली राज्य का निर्माण किया था। उनकी प्रशासनिक व्यवस्था, दुर्ग-निर्माण और सिंचाई संबंधी कार्य उल्लेखनीय थे। वारंगल का दुर्ग विशेष रूप से प्रसिद्ध था और दक्षिण भारत में काकतीय शक्ति का प्रमुख आधार था।
काकतीय राज्य का प्रभाव केवल तेलंगाना तक सीमित नहीं था, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी उसका राजनीतिक प्रभाव था। इसके बावजूद काकतीय शासक यादव, होयसल और पांड्य शासकों के साथ किसी स्थायी राजनीतिक संघ का निर्माण नहीं कर सके। इसलिए जब उत्तर भारत से सैन्य शक्तियाँ दक्षिण की ओर बढ़ीं, तब काकतीयों को भी अलग-अलग परिस्थितियों में उनका सामना करना पड़ा।
द्वारसमुद्र का होयसल राज्य
दक्षिण भारत के पश्चिमी और मध्य भाग में होयसल वंश एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति था। इस राज्य की राजधानी द्वारसमुद्र थी, जिसे वर्तमान में हलेबिड़ के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र वर्तमान कर्नाटक में स्थित है।
इस समय होयसल शासक वीर बल्लाल तृतीय था, जिसने लगभग 1292 से 1342 ई. तक शासन किया। वीर बल्लाल तृतीय के शासनकाल में होयसल राज्य दक्षिण भारत की प्रमुख शक्तियों में बना रहा। द्वारसमुद्र केवल राजनीतिक केंद्र ही नहीं था, बल्कि दक्षिण भारतीय कला और स्थापत्य का भी महत्वपूर्ण केंद्र था।
होयसल स्थापत्य अपनी अत्यंत सूक्ष्म मूर्तिकला, अलंकृत मंदिरों और विशिष्ट स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध था। द्वारसमुद्र के मंदिर इस सांस्कृतिक समृद्धि के उत्कृष्ट उदाहरण थे।
राजनीतिक दृष्टि से होयसल राज्य का यादवों तथा दक्षिण के अन्य राज्यों के साथ संबंध हमेशा मैत्रीपूर्ण नहीं था। कई बार क्षेत्रीय प्रभुत्व को लेकर इनके बीच संघर्ष हुआ। विशेष रूप से यादवों के साथ होयसल शासकों की प्रतिद्वंद्विता ने दक्षिण की राजनीतिक एकता को कमजोर किया।
माबर अथवा पांड्य राज्य
दक्षिण भारत के सुदूर दक्षिणी भाग में माबर अथवा पांड्य राज्य स्थित था। माबर से आशय मुख्यतः तमिल क्षेत्र के उस भू-भाग से था जिसमें आधुनिक मदुरा, रामनाद और टिनेवेली के क्षेत्र सम्मिलित थे। पांड्य राज्य इस समय दक्षिण भारत की अत्यंत समृद्ध और प्रभावशाली शक्तियों में से एक था।
इस काल का प्रमुख पांड्य शासक मारवर्मन कुलशेखर था, जिसने लगभग 1268 से 1311 ई. तक शासन किया। उसके शासनकाल में पांड्य राज्य आर्थिक दृष्टि से काफी समृद्ध था। दक्षिण भारत के समुद्री व्यापार और विदेशी व्यापारिक संपर्कों से पांड्य राज्य को पर्याप्त लाभ प्राप्त होता था।
पांड्य राज्य में उत्तराधिकार और राजकीय सत्ता को लेकर आंतरिक संघर्ष भी उत्पन्न हुए। राजवंशीय विवादों ने उसकी राजनीतिक शक्ति को कमजोर किया और बाद में दिल्ली सल्तनत के दक्षिण भारतीय अभियानों के लिए अनुकूल परिस्थिति तैयार की।
दक्षिण भारत के अन्य छोटे राज्य
इन चार प्रमुख राज्यों के अतिरिक्त दक्षिण भारत में कई छोटे तथा क्षेत्रीय राज्य भी विद्यमान थे। नेल्लोर क्षेत्र में तेलुगु चोल शासकों का प्रभाव था और वहाँ ममसिद्ध तृतीय का उल्लेख मिलता है। उड़ीसा में पूर्वी गंग वंश का शासन था, जिसके शासक के रूप में भानुदेव का नाम मिलता है।
इसी प्रकार कोल्लम अथवा क्विलन क्षेत्र में केरल के शासक रविवर्मन का प्रभाव था। पश्चिमी तटीय क्षेत्र में मंगलौर के आसपास आलुप वंश का शासन था और इस क्षेत्र के शासक के रूप में बांकिदेव आलुपेंद्र का उल्लेख किया जाता है।
इन छोटे राज्यों की अपनी-अपनी क्षेत्रीय राजनीतिक प्राथमिकताएँ थीं। वे प्रायः अपने निकटवर्ती राज्यों के साथ सत्ता, व्यापारिक मार्गों और क्षेत्रीय प्रभुत्व को लेकर संघर्ष करते रहते थे। इसलिए दक्षिण भारत में किसी व्यापक राजनीतिक संघ की स्थापना नहीं हो सकी।
देवगिरि पर द्वितीय अभियान (1307 ई.)
अलाउद्दीन ने मार्च 1307 ई. में मलिक काफ़ूर के नेतृत्व में (जो अब राज्य का मलिक नायब/सेनाध्यक्ष कहलाता था) देवगिरि के रामचंद्रदेव के विरुद्ध सेना भेजी, क्योंकि उसने पिछले तीन वर्षों से एलिचपुर प्रांत का कर देना बंद कर दिया था और गुजरात के भगोड़े शासक कर्णदेव द्वितीय को शरण भी दी थी। काफ़ूर मालवा होते हुए देवगिरि पहुँचा, संपूर्ण देश को उजाड़ा, भारी धन लूटा और रामचंद्रदेव को संधि हेतु विवश किया। कर्णदेव की पुत्री देवलदेवी को पकड़कर गुजरात के शासक अल्प ख़ाँ दिल्ली ले गया, जहाँ उसका विवाह सुल्तान के ज्येष्ठ पुत्र खिज्र ख़ाँ से कर दिया गया। काफ़ूर अपार धन-संपत्ति, अनेक हाथी तथा स्वयं रामचंद्रदेव के साथ दिल्ली लौटा। सुल्तान ने रामचंद्रदेव के साथ दयापूर्ण व्यवहार करते हुए उसे ‘राय-ए-रायान’ की उपाधि दी और छह माह बाद गुजरात की नवसारी जागीर तथा एक लाख स्वर्ण टंके देकर वापस भेज दिया। इसके बाद रामचंद्रदेव दिल्ली सल्तनत के सामंत के रूप में शासन करता रहा और द्वारसमुद्र-अभियान में मलिक काफ़ूर की सहायता भी की।
तेलंगाना (काकतीय) विजय (1310 ई.)
1303 ई. में अलाउद्दीन का काकतीय राजा प्रतापरुद्रदेव पर आक्रमण असफल रहा था, किंतु यादवों को अधीन करने के बाद उसने 1307 ई. में दूसरा प्रयास किया। सुल्तान वारंगल राज्य को अपने साम्राज्य में मिलाना नहीं चाहता था, क्योंकि दूरी के कारण उस पर शासन करना कठिन होता; उसका मुख्य उद्देश्य धन प्राप्त करना और अधीनता स्वीकार करवाना था। काफ़ूर ने असीरगढ़ (मेरागढ़) के मार्ग से तेलंगाना में प्रवेश किया, और रामचंद्रदेव ने उसकी सहायता की। 1310 ई. में काफ़ूर वारंगल पहुँचा। घेराबंदी के बाद मार्च 1310 ई. में काकतीय राजा ने अपनी सोने की मूर्ति बनवाकर आत्मसमर्पण-स्वरूप काफ़ूर के पास भेजी और सौ हाथी, सात हज़ार घोड़े तथा प्रचुर जवाहरात एवं ढले सिक्के समर्पित कर प्रतिवर्ष कर देना स्वीकार किया। इसी अवसर पर प्रतापरुद्रदेव ने काफ़ूर को विश्व-प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी भेंट किया।
द्वारसमुद्र (होयसल) विजय (1311 ई.)
अपनी सफलताओं से उत्साहित होकर अलाउद्दीन ने सुदूर दक्षिण के धनी राज्यों को जीतने का निश्चय किया। 18 नवंबर 1310 ई. को मलिक काफ़ूर तथा ख़्वाजा हाजी के नेतृत्व में एक विशाल सेना देवगिरि होते हुए द्वारसमुद्र पहुँची। 1311 ई. में एक साधारण युद्ध के बाद होयसल राजा वीर बल्लाल तृतीय ने आत्मसमर्पण कर अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार कर ली। काफ़ूर ने अपार संपत्ति तथा एक होयसल युवराज को दिल्ली भेजा; अलाउद्दीन ने बल्लाल देव को खिलअत, मुकुट, छत्र तथा दस लाख टंके भेंट किए। होयसल अब दिल्ली सल्तनत के सामंत बन गए और माबर अभियान में काफ़ूर की सहायता भी की।
माबर/पांड्य विजय (1311 ई.)
द्वारसमुद्र में बारह दिन ठहरने के बाद मलिक काफ़ूर ने माबर (पांड्य) देश की ओर रुख किया, जो लगभग संपूर्ण कोरोमंडल (चोलमंडल) तट तथा क्विलन से लेकर कुमारी अंतरीप तक फैला था। पांड्य राजा कुलशेखर के औरस पुत्र सुंदर पांड्य और अवैध किंतु पिता के प्रिय पुत्र वीर पांड्य के बीच सत्ता-संघर्ष से मलिक काफ़ूर को अवसर मिल गया। मई 1310 ई. में सुंदर पांड्य ने राजा की हत्या कर राजमुकुट पर अधिकार किया, किंतु उसी वर्ष नवंबर में भाई से युद्ध में पराजित हो गया और मुसलमानों से सहायता माँगी। काफ़ूर 14 अप्रैल 1311 ई. को पांड्यों की राजधानी मदुरा पहुँचा और उनके महत्त्वपूर्ण केंद्र ‘वीरधूल’ पर आक्रमण किया। वीर पांड्य तो नहीं मिला, किंतु नगर बुरी तरह लूटा गया। अमीर ख़ुसरो के अनुसार पाँच सौ बारह हाथी, पाँच हज़ार घोड़े तथा पाँच सौ मन हीरे-मोती-पन्ना-लालमणि आदि जवाहरात प्राप्त हुए, और काफ़ूर रामेश्वरम् तक पहुँच गया। यह आर्थिक दृष्टि से काफ़ूर का संभवतः सर्वाधिक सफल अभियान था। 18 अक्तूबर 1311 ई. को वह छह सौ बारह हाथी, बीस हज़ार घोड़े, छियानबे हज़ार मन सोना तथा जवाहरात-मोतियों के संदूकों के साथ दिल्ली लौटा। इस प्रकार माबर देश साम्राज्यवादियों के हाथ आ गया, जो मुहम्मद तुग़लक़ के शासनकाल के आरंभ तक दिल्ली सल्तनत के अधीन रहा।
देवगिरि पर तृतीय अभियान (1313 ई.)
1312 ई. में रामचंद्रदेव के पुत्र शंकरदेव ने दिल्ली को कर देना बंद कर पुनः स्वतंत्र होने का प्रयास किया। मलिक काफ़ूर ने पुनः दिल्ली से जाकर शंकरदेव को पराजित कर मार डाला। इस प्रकार संपूर्ण दक्षिण भारत को दिल्ली सल्तनत की प्रभुसत्ता स्वीकार करनी पड़ी।
इस प्रकार अलाउद्दीन ने दिल्ली सल्तनत के अभूतपूर्व विस्तार का कार्य पूर्ण किया। ‘ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह’ में अलाउद्दीन खिलजी को विश्व का सुल्तान, युग का विजेता और जनता का चरवाहा कहा गया है। जोधपुर के एक अभिलेख में उल्लेख मिलता है कि अलाउद्दीन खिलजी के देवतुल्य शौर्य से पृथ्वी अत्याचारों से मुक्त हो गई।
अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में विद्रोह एवं षड्यंत्र
अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में केवल बाहरी आक्रमण ही चुनौती नहीं थे, बल्कि उसे अपने ही साम्राज्य के भीतर अनेक विद्रोहों और षड्यंत्रों का सामना करना पड़ा। उसके शासन के आरंभिक वर्षों में कुछ विद्रोह उसके निकट संबंधियों, अमीरों तथा सैनिक वर्ग से जुड़े थे। इन घटनाओं ने अलाउद्दीन को यह अनुभव कराया कि केवल बाहरी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आंतरिक विद्रोहों को नियंत्रित करना भी उसके शासन की स्थिरता के लिए आवश्यक है। इसलिए उसने विद्रोहियों के प्रति अत्यंत कठोर नीति अपनाई और संभावित षड्यंत्रों को प्रारंभिक स्तर पर ही समाप्त करने का प्रयास किया।
1299 ई. का नवीन मुसलमानों का विद्रोह
अलाउद्दीन के शासनकाल का एक महत्वपूर्ण विद्रोह 1299 ई. में ‘नवीन मुसलमानों’ से संबंधित था। ‘नवीन मुसलमान’ उन मंगोलों के लिए प्रयुक्त संज्ञा थी जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर दिल्ली सल्तनत की सेना या समाज में स्थान प्राप्त किया था। मंगोलों के विरुद्ध अभियानों के दौरान बड़ी संख्या में मंगोल बंदी बनाए गए थे और उनमें से कुछ ने इस्लाम स्वीकार कर सल्तनत की सेवा ग्रहण की थी।
समय बीतने के साथ इन नवीन मुसलमानों में असंतोष उत्पन्न हुआ। उनके विद्रोह ने अलाउद्दीन की शासन-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर दी। इस विद्रोह को नियंत्रित करने का दायित्व नुसरत ख़ाँ को सौंपा गया। नुसरत ख़ाँ ने कठोर कार्रवाई करते हुए विद्रोह को दबा दिया।
इस घटना ने अलाउद्दीन को यह समझने के लिए विवश किया कि सेना और राजधानी में ऐसे तत्वों पर विशेष निगरानी आवश्यक है, जिनकी निष्ठा संदिग्ध हो सकती है। इसके बाद उसने शासन और सैन्य व्यवस्था पर अपना नियंत्रण और अधिक मजबूत किया।
अकत ख़ाँ का षड्यंत्र और अलाउद्दीन पर हमला
अलाउद्दीन के शासनकाल में उसके अपने परिवार के भीतर से भी उसके विरुद्ध षड्यंत्र हुआ। उसका भतीजा अकत ख़ाँ कुछ नवीन मुसलमानों की सहायता से सुल्तान के विरुद्ध षड्यंत्र में शामिल हुआ। उसने अलाउद्दीन पर प्राणघातक हमला करने का प्रयास किया।
अकत ख़ाँ का उद्देश्य अलाउद्दीन की हत्या करके सत्ता पर अधिकार करना था। उसने अवसर पाकर सुल्तान पर हमला किया और यह समझ लिया कि वह अपने उद्देश्य में सफल हो गया है। किंतु अलाउद्दीन इस हमले से बच गया। बाद में षड्यंत्र का पता चलने पर अकत ख़ाँ को पकड़ लिया गया।
अलाउद्दीन ने अपने विरुद्ध हुए इस गंभीर अपराध के लिए उसे कठोर दंड दिया और अकत ख़ाँ की हत्या कर दी गई। इस घटना से स्पष्ट होता है कि अलाउद्दीन अपने निकट संबंधियों को भी विद्रोह या राजद्रोह के मामले में क्षमा करने के लिए तैयार नहीं था।
उमर ख़ाँ और मंजू ख़ाँ का विद्रोह
अलाउद्दीन को अपने परिवार के अन्य सदस्यों की ओर से भी चुनौती मिली। उसके भानजे उमर ख़ाँ और मंजू ख़ाँ ने उसके विरुद्ध विद्रोह किया। दोनों महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर नियुक्त थे—उमर ख़ाँ अवध का और मंजू ख़ाँ बदायूँ का गवर्नर था।
इन दोनों के पास अपने-अपने क्षेत्रों में प्रशासनिक तथा सैन्य संसाधन उपलब्ध थे। इसलिए उनका विद्रोह सामान्य स्थानीय विद्रोह की तुलना में अधिक गंभीर था। यदि उन्हें अन्य प्रांतीय अधिकारियों या अमीरों का समर्थन मिल जाता, तो अलाउद्दीन की केंद्रीय सत्ता के लिए बड़ी समस्या उत्पन्न हो सकती थी।
अलाउद्दीन ने उनके विरुद्ध तत्काल कार्रवाई की। उसकी सेनाओं ने विद्रोहियों को पराजित कर दिया और विद्रोह को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। उमर ख़ाँ और मंजू ख़ाँ की हत्या कर दी गई। इस प्रकार अलाउद्दीन ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्रांतीय गवर्नर भी केंद्रीय सत्ता के विरुद्ध स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकते।
दिल्ली में हाजी मौला का षड्यंत्र
अलाउद्दीन के शासनकाल में दिल्ली के भीतर भी एक महत्वपूर्ण षड्यंत्र हुआ। इसका नेतृत्व हाजी मौला ने किया। उसने दिल्ली में राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर सत्ता पर अपना प्रभाव स्थापित करने का प्रयास किया।
हाजी मौला का षड्यंत्र केवल व्यक्तिगत विद्रोह नहीं था, बल्कि राजधानी की सुरक्षा और केंद्रीय शासन के लिए गंभीर चुनौती था। यदि वह दिल्ली में अपनी स्थिति मजबूत करने में सफल हो जाता, तो इससे अलाउद्दीन की सत्ता की प्रतिष्ठा को बड़ा आघात पहुँच सकता था।
इस षड्यंत्र का दमन हमीदुद्दीन ने किया। उसने हाजी मौला की गतिविधियों को नियंत्रित किया और दिल्ली में सुल्तान की सत्ता को पुनः स्थापित किया। इस प्रकार राजधानी में उत्पन्न विद्रोह को भी शीघ्र ही समाप्त कर दिया गया।
अलाउद्दीन के शासनकाल में हुए इन विद्रोहों के पीछे कई कारण थे। सबसे प्रमुख कारण था सुल्तान की अत्यधिक केंद्रीकरणवादी नीति। अलाउद्दीन अमीरों, प्रांतीय अधिकारियों और अपने परिवार के सदस्यों तक को स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति विकसित करने का अवसर नहीं देना चाहता था। इसके अतिरिक्त, सत्ता और संपत्ति पर नियंत्रण को लेकर अमीरों तथा शाही परिवार के सदस्यों में असंतोष था। नवीन मुसलमानों के बीच भी सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को लेकर असंतोष उत्पन्न हुआ। दरबार में मौजूद विभिन्न गुटों के बीच प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ने भी षड्यंत्रों को जन्म दिया।
विद्रोहों के प्रति अलाउद्दीन की कठोर नीति
इन विद्रोहों के अनुभवों ने अलाउद्दीन को अपनी शासन-व्यवस्था को और अधिक कठोर बनाने के लिए प्रेरित किया। उसने अमीरों की गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाई तथा ऐसी परिस्थितियों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जिनसे भविष्य में विद्रोह उत्पन्न हो सकते थे। उसने अमीरों के आपसी मेल-जोल, गुप्त बैठकों और अत्यधिक धन-संपत्ति के संचय को संदेह की दृष्टि से देखा। उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई शक्तिशाली अमीर या अधिकारी इतना प्रभावशाली न बन सके कि केंद्रीय सत्ता को चुनौती दे सके। इसी व्यापक नीति के अंतर्गत अलाउद्दीन ने गुप्तचर व्यवस्था को मजबूत किया, मद्यपान और अमीरों की अनियंत्रित दावतों पर नियंत्रण लगाया तथा आर्थिक नीतियों के माध्यम से उनके आर्थिक संसाधनों को भी सीमित करने का प्रयास किया। इन उपायों का प्रमुख उद्देश्य राज्य के विरुद्ध संभावित षड्यंत्रों को रोकना था।
इन विद्रोहों और षड्यंत्रों से अलाउद्दीन को यह विश्वास हो गया कि उसके साम्राज्य की स्थिरता के लिए केंद्रीय सत्ता का अत्यधिक मजबूत होना आवश्यक है। परिणामस्वरूप उसके शासन में निरंकुशता और केंद्रीकरण की प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट हुई। उसने किसी भी विद्रोही को उसके पद, संबंध या सामाजिक स्थिति के आधार पर विशेष छूट नहीं दी। चाहे विद्रोही उसका भतीजा हो, भानजा हो, प्रांतीय गवर्नर हो या राजधानी में सक्रिय कोई व्यक्ति—सभी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की गई। इन विद्रोहों के दमन से अलाउद्दीन की केंद्रीय सत्ता मजबूत हुई और साम्राज्य पर उसका व्यक्तिगत नियंत्रण बढ़ा। साथ ही, इन घटनाओं ने उसकी शासन-नीति को अधिक कठोर और केंद्रीकृत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दृष्टि से उसके शासनकाल के विद्रोह केवल तत्कालीन राजनीतिक घटनाएँ नहीं थे, बल्कि उन्होंने अलाउद्दीन की प्रशासनिक एवं राजकीय नीतियों के विकास को भी गहराई से प्रभावित किया।
अलाउद्दीन खिलजी का राजत्व-सिद्धांत
राजत्व एवं प्रभुसत्ता के विषय में अलाउद्दीन के विचार उसके पूर्ववर्तियों से भिन्न थे। वह दिल्ली का प्रथम सुल्तान था, जिसने स्पष्ट रूप से घोषित किया कि राजत्व रक्त-संबंध नहीं जानता। यद्यपि उसने खलीफ़ा की सत्ता को स्वीकार कर ‘यामिन-उल-खिलाफ़त-नासिरी-अमीर-उल-मोमिनीन’ की उपाधि ग्रहण की, किंतु खलीफ़ा से अपने पद की स्वीकृति लेना आवश्यक नहीं समझा। उसने उलेमा वर्ग को भी अपने शासन-कार्य में हस्तक्षेप नहीं करने दिया और अपने शासन में इस्लामी सिद्धांतों की अपेक्षा राज्यहित को सर्वोपरि रखा। उसने घोषणा की : “अपनी सरकार के राजनैतिक हित के लिए मैं बिना उलेमाओं के परामर्श के भी कार्य करूँगा।” बियाना के काज़ी मुगीसुद्दीन से, जो धार्मिक वर्ग की प्रधानता का समर्थक था, उसने कहा : “मैं नहीं जानता कि यह वैध है अथवा अवैध; जो भी मैं राज्य के लिए हितकारी अथवा आपातकाल के लिए उचित समझता हूँ, वही आज्ञा दे देता हूँ।”
किंतु इससे यह अनुमान लगाना उचित नहीं कि वह इस्लाम धर्म की अवहेलना करता था। भारत के बाहर वह इस्लाम के एक महान् प्रतिरक्षक के रूप में विख्यात था। भारत में इस विषय पर मतभेद रहा है। बरनी एवं उसके अनुयायी उसके धर्म की उपेक्षा को अधिक महत्त्व देते हैं, जबकि सुसंस्कृत एवं सूक्ष्मदर्शी अमीर ख़ुसरो उसे इस्लाम का समर्थक बताते हैं। अलाउद्दीन ने स्वयं काज़ी से कहा था : “यद्यपि मैंने इल्म (विद्या) अथवा किताब (क़ुरान शरीफ़) नहीं पढ़ी है, फिर भी मैं मुसलमान वंश का एक मुसलमान हूँ।” अलाउद्दीन के स्मारकों के अभिलेख भी यह स्पष्ट करते हैं कि इस्लाम में उसकी आस्था नष्ट नहीं हुई थी।
विद्रोह-निरोधी अध्यादेश
अलाउद्दीन एक दृढ़-निश्चयी सुल्तान था, जो प्रत्येक कार्य में संपूर्णता की नीति का पालन करता था, ताकि केंद्र में एक शक्तिशाली सरकार स्थापित हो सके। सल्तनत के विभिन्न भागों में हुए षड्यंत्रों के कारणों का अध्ययन कर उसने उन्हें समाप्त करने हेतु निरोधी-नियमों की एक संहिता (अध्यादेश) बनाई —
व्यक्तिगत संपत्ति पर आघात
दान, उपहार एवं पेंशन के रूप में अमीरों को दी गई भूमि जब्त कर उस पर अधिकाधिक कर लगाए गए, तथा मिल्कियत, इनाम एवं वक़्फ़ में स्थित सभी गाँव जब्त कर लिए गए। बरनी लिखता है कि लोगों पर दबाव डाला जाता और हर बहाने से उनसे धन चूसा जाता था — अंततः अवस्था यहाँ तक पहुँच गई कि मलिकों, अमीरों, अधिकारियों, मुल्तानियों तथा महाजनों (बैंकरों) को छोड़कर किसी के पास अत्यंत छोटी रक़म भी नहीं बची।
गुप्तचर विभाग का संगठन
बरीद (गुप्तचर अधिकारी) एवं मुनहियान (गुप्तचर) जैसे कर्मचारी नियुक्त किए गए, जो सुल्तान को बाज़ारों की साधारण गपशप तक की सूचना देते थे। यह प्रणाली इतनी सशक्त थी कि सरदार कहीं भी ऊँचे स्वर में बोलने का साहस नहीं करते थे और संकेतों के द्वारा ही भाव व्यक्त करते थे।
मादक द्रव्यों एवं जुए पर प्रतिबंध
शराब, मादक औषधि तथा जुआ खेलने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया। सुल्तान ने स्वयं मदिरापान का त्याग कर दृष्टांत प्रस्तुत किया और मदिरा के सभी पात्र चकनाचूर करवा दिए गए।
सामाजिक मेलजोल पर प्रतिबंध
सरदारों के आपसी मेल-जोल, सार्वजनिक समारोहों एवं वैवाहिक-संबंधों पर प्रतिबंध लगाया गया; वे सुल्तान की विशेष आज्ञा के बिना नहीं मिल सकते थे। यह नियम इतना कठोर था कि भोज तथा अतिथि-सत्कार की प्रथा लगभग लुप्त हो गई।
अलाउद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधार
अपने पूर्वकालीन सुल्तानों की भाँति अलाउद्दीन के पास भी कार्यपालिका, व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका की सर्वोच्च शक्तियाँ थीं। वह स्वयं को धरती पर ईश्वर का नायक अथवा खलीफ़ा होने का दावा करता था। उसने प्रशासन के केंद्रीकरण हेतु प्रांतों के सूबेदार तथा अन्य अधिकारियों को अपने पूर्ण नियंत्रण में रखा और अपने राजनीतिक निर्णयों में उलेमा के हस्तक्षेप को कभी स्वीकार नहीं किया। मंत्रीगण उसे केवल सलाह देते तथा राज्य के दैनिक कार्य संभालते थे। उसके समय पाँच महत्त्वपूर्ण मंत्री प्रशासन-कार्य संचालित करते थे —
दीवान-ए-वज़ारत
मुख्यमंत्री (वज़ीर) को यह पद प्राप्त होता था, जो सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्री होता था। बरनी के अनुसार “एक बुद्धिमान वज़ीर के बिना राजत्व व्यर्थ है” तथा “सुल्तान के लिए बुद्धिमान वज़ीर से बढ़कर अभियान और यश का कोई दूसरा स्रोत नहीं हो सकता।” वित्त के अतिरिक्त उसे सैनिक अभियानों में शाही सेनाओं का नेतृत्व भी करना पड़ता था। अलाउद्दीन के काल में ख़्वाजा ख़ातिर, ताजुद्दीन काफ़ूर, नुसरत ख़ाँ आदि इस पद पर रहे।
आरिज़-ए-मुमालिक (दीवान-ए-आरिज़)
युद्ध एवं सैन्य मंत्री, वज़ीर के बाद दूसरा महत्त्वपूर्ण पद। इसका कार्य सैनिकों की भर्ती, वेतन-वितरण, सेना की दक्षता व साज-सज्जा की देखभाल तथा युद्ध के समय सेनापति के साथ रणक्षेत्र में जाना था। मलिक नासिरुद्दीन इस पद पर तथा ख़्वाजा हाजी उसके उपाधिकारी (नायब आरिज़) थे।
दीवान-ए-इंशा
तीसरा महत्त्वपूर्ण विभाग, जिसका प्रधान दबीर-ए-ख़ास अथवा दबीर-ए-मुमलिकात कहलाता था। इसका कार्य शाही उद्घोषणाओं व पत्रों का प्रारूप तैयार करना तथा प्रांतपतियों व स्थानीय अधिकारियों से पत्र-व्यवहार करना था; सहायक सचिव को ‘दबीर’ कहा जाता था।
दीवान-ए-रसालत
चौथा मंत्री, जो मुख्यतः विदेश विभाग एवं कूटनीतिक पत्र-व्यवहार से संबद्ध था। पड़ोसी राज्यों को भेजे जाने वाले पत्रों का प्रारूप तैयार करना तथा विदेशी राजदूतों से संपर्क बनाए रखना इसका कार्य था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह धर्म से संबंधित विभाग भी था।
अलाउद्दीन ने दो नए विभागों- दीवान-ए-मुस्तख़राज, जो राजस्व अधिकारियों के बकाये की जाँच व वसूली करता था एवं दीवान-ए-रिसायत, जो व्यापारी वर्ग पर नियंत्रण रखता था, की भी स्थापना की। इनके अतिरिक्त सुल्तान के अंगरक्षकों के मुखिया को सरजानदार, राजमहल के कार्यों की देखरेख करने वाले मुख्य अधिकारी को वकील-ए-दर कहा जाता था। राजमहल के अन्य अधिकारियों में अमीर-ए-आख़ूर, शहना-ए-पील, अमीर-ए-शिकार, शराबदार, मुहरदार आदि सम्मिलित थे। बाज़ार व्यवस्था के कुशल संचालन हेतु ‘शहना-ए-मंडी’ (बाज़ार का दरोगा) तथा ‘मुहतसिब’ (जन-आचरण एवं माप-तौल का निरीक्षक) जैसे नए पद भी सृजित किए गए।
न्याय प्रशासन
न्याय का सर्वोच्च स्रोत एवं सर्वोच्च अदालत सुल्तान स्वयं होता था। उसके बाद सद्र-ए-जहाँ अथवा काज़ी-उल-कुज़ात होता था, जिसके अधीन नायब काज़ी या अदल कार्य करते थे, तथा उनकी सहायता के लिए मुफ़्ती होते थे। अमीर-ए-दाद नामक अधिकारी दरबार में उन प्रभावशाली व्यक्तियों को प्रस्तुत करता था, जिन पर काज़ियों का सीधा नियंत्रण नहीं होता था।
पुलिस एवं गुप्तचर व्यवस्था
कोतवाल पुलिस विभाग का प्रमुख अधिकारी होता था। पुलिस विभाग को अधिक क्रियाशील बनाने हेतु अलाउद्दीन ने दीवान-ए-रिसायत का गठन किया, जो व्यापारी वर्ग पर नियंत्रण रखता था। शहना व दंडाधिकारी भी पुलिस विभाग से संबद्ध थे, और मुहतसिब सेंसर-अधिकारी के रूप में जन-सामान्य के आचरण की देखभाल करता था। गुप्तचर विभाग का प्रमुख अधिकारी बरीद-ए-मुमालिक होता था, जिसके नियंत्रण में बरीद (संदेशवाहक) कार्य करते थे; अन्य सूचनादाताओं को मुहनियान कहा जाता था, जो लोगों के घरों में जाकर गौण अपराधों को रोकते थे। इन्हीं अधिकारियों के कारण अलाउद्दीन की बाज़ार-नियंत्रण नीति सफल हो सकी।
डाक पद्धति
अलाउद्दीन द्वारा स्थापित डाक-चौकियों पर कुशल घुड़सवारों एवं लिपिकों को नियुक्त किया जाता था, जो राज्य भर में शीघ्रता से समाचार पहुँचाते थे, जिससे विद्रोहों एवं युद्ध-अभियानों की सूचना तुरंत प्राप्त हो जाती थी।
सैनिक प्रबंध
अलाउद्दीन आंतरिक विद्रोहों के दमन, बाहरी आक्रमणों के प्रतिरोध तथा साम्राज्य-विस्तार हेतु एक विशाल, सुदृढ़ एवं स्थायी सेना का गठन करने वाला दिल्ली का प्रथम सुल्तान था। उसने सेना का केंद्रीकरण कर सैनिकों की सीधी भर्ती एवं नक़द वेतन देने की प्रथा प्रारंभ की। उसकी सेना में घुड़सवार, पैदल सैनिक और हाथी-सैनिक सम्मिलित थे, किंतु घुड़सवार सैनिक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे। अमीर ख़ुसरो के अनुसार दस हज़ार सैनिकों की टुकड़ी को ‘तुमन’ कहा जाता था, और भलीभाँति जाँच-परखकर भर्ती किए गए सैनिक को ‘मुरत्तब’ कहा जाता था। अलाउद्दीन ने घोड़ों को दागने (दाग़ प्रथा) एवं सैनिकों के हुलिया लिखे जाने (चेहरा प्रथा) की नई व्यवस्था बनाई; दीवान-ए-आरिज़ प्रत्येक सैनिक की नामावली एवं हुलिया रखता था। फ़रिश्ता के अनुसार अलाउद्दीन के पास लगभग 4 लाख 75 हज़ार सुसज्जित एवं वर्दीधारी सैनिक थे। एक घोड़े वाले (‘एक अस्पा’) सैनिक को प्रतिवर्ष 234 टंका तथा दो घोड़ों वाले (‘दो अस्पा’) सैनिक को 78 (अथवा कुछ स्रोतों में 234 से अधिक स्तर पर, स्रोत-भेद सहित) टंका वेतन दिया जाता था।
भू-राजस्व सुधार
मध्यस्थों का अंत
अलाउद्दीन ने राजकीय आय में वृद्धि एवं मध्यस्थों के अंत तथा धन के संकेंद्रण को रोकने के उद्देश्य से भू-राजस्व के क्षेत्र में सुधार किए। उसने सर्वप्रथम मिल्क, इनाम एवं वक्फ के अंतर्गत दी गई भूमि को वापस लेकर उसे खालसा भूमि में बदल दिया और खूतों, मुकदमों आदि लगान अधिकारियों के विशेषाधिकार को समाप्त कर दिया। ग्रामीण क्षेत्रों में मध्यस्थ वर्ग में खुत, मुकद्दम, चौधरी को किस्मत-ए-खुती के रूप में, हकूक-ए-खुती के रूप में भू-राजस्व का 10 प्रतिशत प्राप्त होता था जिसे अलाउद्दीन खिलजी ने रद्द कर दिया। साथ ही उन्हें अपनी भूमि पर भू-राजस्व नहीं देना पड़ता था। अलाउद्दीन खिलजी ने उनकी भूमि की माप कराई और उस पर भी भू-राजस्व का निर्धारण किया। सुल्तान उनकी अवस्था इतनी दयनीय बना देना चाहता था कि उनके लिए अस्त्र-शस्त्र रखना, घोड़े पर चढ़ना, अच्छे वस्त्र धारण करना अथवा जीवन के किसी अन्य सुख का उपभोग करना असंभव हो जाए। इससे इनकी दशा इतनी खराब हो गई कि बरनी कहता है कि अब वे अरबी घोड़े पर नहीं चलते थे और पान नहीं खाते थे। कोई भी अपना सिर ऊपर उठाकर नहीं रख सकता था तथा उनके घरों में सोने, चाँदी, टंका, जीतल या किसी फालतू चीज का कोई चिन्ह नहीं रह गया था…दरिद्रता के कारण खुतों एवं मुकद्दमों की स्त्रियाँ मुसलमानों के घर जाकर चक्की-बर्तन किया करती थीं।
मसाहत (भूमि-मापन)
अलाउद्दीन पहला मुस्लिम शासक था जिसने भूमि की पैमाइश कराकर (मसाहत) उसकी वास्तविक आय पर लगान लेना निश्चित किया। अलाउद्दीन प्रथम सुल्तान था, जिसने भूमि माप के लिए एक ‘बिस्वा’ को एक इकाई माना। भूमि-मापन की एक एकीकृत पद्धति अपनाई गई और सबसे समान रूप से कर लिया गया। सबसे पहले दोआब क्षेत्र में भूमि की माप कराई गई और मध्यस्थों का अंत किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे जमींदार कृषकों की स्थिति में आ गए।
दोआब में भू-राजस्व 50 प्रतिशत
अलाउद्दीन खिलजी ने नए सिरे से दोआब क्षेत्र में कर का निर्धारण किया और भू-राजस्व की राशि कुल उत्पादन का 50 प्रतिशत निर्धारित किया। लगान को अन्न के रूप में वसूलने को महत्त्व दिया जाता था। उसने दो नवीन कर भी लगाए, जैसे- चराई कर, जो दुधारू पशुओं पर लगाया गया था और घरों एवं झोपड़ी पर लगाया गया था। करही नाम के एक कर का भी उल्लेख मिलता है। जजिया कर गैर-मुस्लिमों से वसूला जाता था। खम्स कर 4/5 भाग राज्य के हिस्से में तथा 1/5 भाग सैनिकों को मिलता था। जकात केवल मुसलमानों से लिया जाने वाला एक धार्मिक कर था, जो संपत्ति का 40वाँ हिस्सा होता था।
दीवान-ए-मुस्तख़राज की स्थापना
राजस्व-संग्रहण हेतु सभी वंशानुगत कर-निर्धारक तथा कर-संग्राहक एक ही कानून के अंतर्गत लाए गए। दीवान-ए-मुस्तख़राज नामक विभाग राजस्व अधिकारियों की बकाया राशि की जाँच व वसूली करता था। इस नियम को सुल्तान के नायब वज़ीर शर्फ़ क़ाई तथा अन्य अधिकारियों ने इतनी दृढ़ता से लागू किया कि लोग राजस्व-अधिकारियों को ज्वर से भी बुरा समझने लगे, और मुंशीगीरी इतना अप्रिय पेशा बन गया कि कोई भी अपनी पुत्री किसी मुंशी को नहीं ब्याहना चाहता था।
अलाउद्दीन खिलजी की बाज़ार-नियंत्रण नीति
अलाउद्दीन खिलजी की आर्थिक नीति के विषय में जियाउद्दीन बरनी की कृति ‘तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही’ से व्यापक जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त अमीर ख़ुसरो की ‘ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह’, इब्न बतूता की ‘रेहला’ एवं इसामी की ‘फ़ुतूह-उस-सलातीन’ से भी बाज़ार-नियंत्रण नीति के विषय में जानकारी मिलती है।
उद्देश्य: इस नीति के उद्देश्यों को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। समकालीन इतिहासकार बरनी के अनुसार इन सुधारों का मूल उद्देश्य मंगोलों के भीषण आक्रमणों का सामना करने हेतु एक विशाल, शक्तिशाली एवं स्थायी सेना तैयार करना था। फ़रिश्ता के अनुसार सुल्तान के पास लगभग 50,000 दास थे, जिन पर अत्यधिक व्यय होता था। इन सभी व्ययों को दृष्टि में रखते हुए अलाउद्दीन ने नई आर्थिक नीति बनाई थी। दूसरी ओर बनारसी प्रसाद सक्सेना, के. ए. निज़ामी और इरफ़ान हबीब जैसे इतिहासकारों का मत है कि सामान्य जनता की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर इसे लागू किया गया था। बरनी स्वयं अपनी दूसरी कृति ‘फ़तवा-ए-जहाँदारी’ में इसे जनता की आवश्यकताओं से प्रेरित मानता है, और अमीर ख़ुसरो के अनुसार सुल्तान ने इन सुधारों को जनकल्याण की भावना से लागू किया था।
वस्तुतः अलाउद्दीन को साम्राज्य-विस्तार की महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति तथा निरंतर होने वाले मंगोल आक्रमणों से निपटने हेतु एक विशाल शक्तिशाली सेना की आवश्यकता थी। ऐसे समय में जब दक्षिण से आए धन-प्रवाह से मुद्रा का मूल्य घट गया और वस्तुओं के दाम बढ़ गए, तब अलाउद्दीन ने आर्थिक क्षेत्र में सुधार कर बाज़ार-नियंत्रण व्यवस्था लागू की।
यह भी एक विवादास्पद प्रश्न है कि यह मूल्य-नियंत्रण केवल दिल्ली भू-भाग में लागू था या संपूर्ण सल्तनत में — मोरलैंड एवं के.एस. लाल इसे केवल दिल्ली तक सीमित मानते हैं, जबकि बनारसी प्रसाद सक्सेना इस मत का खंडन करते हैं।
अलाउद्दीन सैनिकों का वेतन बढ़ाना नहीं चाहता था, क्योंकि इससे राज्य के साधनों पर अतिरिक्त भार पड़ता। इसलिए सैनिकों को सीमित वेतन में भी संतोषजनक जीवन देने के उद्देश्य से उसने कुछ राजाज्ञाएँ जारी कीं, जिनके द्वारा जीवन की अत्यावश्यक वस्तुओं से लेकर विलासिता की वस्तुओं-दास, अश्व, हथियार, रेशम आदि तथा दैनिक सामग्री तक सभी वस्तुओं के मूल्य निश्चित कर दिए गए और आपूर्ति-माँग के नियम को यथासंभव व्यवस्थित किया गया। सुल्तान ने हर सैनिक का वार्षिक वेतन 234 टंका तथा दो घोड़े रखने वाले सैनिक के लिए 78 टंका अतिरिक्त निश्चित किया। एक अधिनियम द्वारा दैनिक उपयोग की वस्तुओं के मूल्य भी निर्धारित किए गए, जैसे गेहूँ 7.5 जीतल प्रति मन, चावल 5 जीतल प्रति मन, जौ 4 जीतल प्रति मन, उड़द 5 जीतल प्रति मन, तथा घी लगभग एक जीतल प्रति सवा दो सेर (2.5 सेर)।
तीन प्रकार के बाज़ार
अलाउद्दीन की बाज़ार-व्यवस्था उत्पादन-लागत की प्रगतिशील पद्धति पर आधारित थी, जिसके अंतर्गत तीन प्रकार के बाज़ार स्थापित किए गए —
शहना-ए-मंडी (खाद्यान्न बाज़ार)
खाद्यान्नों की बिक्री हेतु स्थापित। राशन-व्यवस्था के अंतर्गत दोआब क्षेत्र एवं राजधानी के आसपास के खालसा गाँवों में भूमिकर नक़द के बजाय अन्न के रूप में लिया जाने लगा, जबकि पूर्वी राजस्थान के झाईन क्षेत्र से आधी मालगुज़ारी अनाज में तथा आधी नक़द वसूल की जाती थी। अकाल या बाढ़ के समय सुल्तान प्रत्येक घर को प्रति व्यक्ति आधा मन अनाज देता था। यह राशनिंग-व्यवस्था अलाउद्दीन की नई सोच थी। अनाज दिल्ली की राजकीय अन्न-शालाओं (राजकीय गोदामों) में संचित किया जाता था ताकि आवश्यकता के समय बाज़ार में भेजा जा सके, और किसी को भी अन्न का व्यक्तिगत संचय करने की अनुमति नहीं थी। मुख्य अनाजों की बिक्री शहना नामक अधिकारी के नियंत्रण में होती थी, और सबके ऊपर एक शहना-ए-मंडी नियुक्त था; मलिक कबूल को इस पद पर नियुक्त किया गया था।
सराय-ए-अदल (कपड़ा बाज़ार)
यह मुख्यतः वस्त्र, शक्कर, जड़ी-बूटी, मेवा, दीपक-तेल तथा अन्य निर्मित वस्तुओं का बाज़ार था, जिसके माध्यम से अमीरों को निश्चित मूल्य पर बेशकीमती कपड़े उपलब्ध कराए जाते थे। इसके लिए राज्य मुल्तानी व्यापारियों को राजकीय सहायता भी देता था। सराय-ए-अदल का निर्माण बदायूँ के समीप एक बड़े मैदान में हुआ था, जहाँ एक टंके से लेकर 10,000 टंके तक मूल्य की वस्तुएँ बिकती थीं। इसका मुख्य अधिकारी रायपरवाना कहलाता था।
घोड़े, मवेशी एवं दासों का बाज़ार
पशुओं की खरीद-बिक्री में दलालों के कारण मूल्य बढ़ जाता था, अतः दलालों को बाज़ार से बाहर कर दिया गया और सभी पशुओं की कीमतें निर्धारित कर दी गईं , जैसे अच्छी नस्ल के घोड़े की कीमत 120 टंका तथा साधारण टट्टू की कीमत 10 टंका थी।
बाज़ार-नियंत्रण के प्रमुख अधिकारी
संपूर्ण बाज़ार-नियंत्रण व्यवस्था का संचालन दीवान-ए-रियासत नामक विभाग करता था, जिसका प्रधान मलिक याक़ूब था, तथा शहना-ए-मंडी के पद पर मलिक कबूल नियुक्त था। उनके अधीन कर्मचारी वस्तुओं के क्रय-विक्रय एवं व्यवस्था का निरीक्षण करते थे। दिल्ली में व्यापार करने वाले प्रत्येक व्यापारी को दीवान-ए-रियासत में अपना नाम पंजीकृत कराना पड़ता था तथा अपनी सामग्री बेचने के लिए बदायूँ द्वार के भीतर सराय-अदल में लाने की प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी, साथ ही अपने आचरण के लिए पर्याप्त जमानत भी देनी पड़ती थी। मूल्य-नियंत्रण को प्रभावी ढंग से लागू करवाने के लिए मुहतसिब (सेंसर) एवं नाज़िर (माप-तौल अधिकारी) भी नियुक्त थे।
प्रत्येक बाज़ार का अधीक्षक शहना-ए-मंडी कहलाता था, जिसके अधीन बरीद (राजकीय गुप्तचर) बाज़ार में घूम-घूमकर निरीक्षण करते और सुल्तान को सूचनाएँ देते थे, तथा बरीद के नीचे मुनहियान (व्यक्तिगत गुप्तचर) कार्य करते थे। इस प्रकार तीन भिन्न स्रोतों से सुल्तान को सूचना प्राप्त होती रहती थी। नियमों का उल्लंघन करने पर कठोर दंड दिया जाता था। दुकानदारों द्वारा हल्के बटखरों के प्रयोग को रोकने के लिए यह नियम था कि तौल जितनी कम हो, उतना ही माँस उनके शरीर से काट लिया जाए। बरनी इस बाज़ार-व्यवस्था की भूरि-भूरि प्रशंसा करता है और लिखता है कि मूल्य-नियंत्रण पूर्णतः सफल रहा- मूल्यों में आधे जीतल से अधिक का अंतर भी कभी नहीं आया।
अलाउद्दीन खिलजी की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
सुल्तान के शासनकाल में अमीर ख़ुसरो तथा हसन निज़ामी जैसे उच्चकोटि के विद्वानों को राजकीय संरक्षण प्राप्त था। बरनी लिखता है कि अलाउद्दीन का विद्या से विशेष परिचय नहीं था, परंतु फ़रिश्ता के अनुसार सुल्तान ने गद्दी पर बैठने के बाद फ़ारसी भाषा सीखी थी।
सुल्तान भवन-निर्माण एवं वास्तुकला का भी प्रेमी था। उसकी आज्ञा से अनेक दुर्ग निर्मित हुए, जिनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध वृत्ताकार अलाई किला (कुश्क-ए-सीरी) था, जिसकी दीवारें पत्थर, ईंट तथा चूने से बनी थीं और जिसमें सात द्वार थे। यह प्रारंभिक तुर्की स्थापत्य कला का एक श्रेष्ठ नमूना माना जाता है।
अमीर ख़ुसरो के अनुसार अलाउद्दीन ने अनेक नष्ट हो चुकी मस्जिदों का पुनर्निर्माण करवाया। उसने 1311 ई. में क़ुतुब मस्जिद (क़ुव्वत-उल-इस्लाम) का विस्तार करते हुए उसके प्रांगण में पुरानी क़ुतुब मीनार से भी ऊँची एक नई मीनार बनवाने का कार्य आरंभ करवाया, जो उसके जीवनकाल में पूर्ण नहीं हो सका (इसे ‘अलाई मीनार’ कहा जाता है, जो अधूरी ही रह गई)। उसी वर्ष उसने लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर से निर्मित अलाई दरवाज़ा भी बनवाया, जो क़ुतुब मस्जिद परिसर का विशाल प्रवेश-द्वार है।
अलाउद्दीन खिलजी का चरित्र-मूल्यांकन
अलाउद्दीन इतिहास में मुख्यतः अपने साम्राज्यवादी कार्यों के लिए विख्यात है। वह एक साहसी एवं योग्य सैनिक तथा एक कुशल शासक भी था। उसके काल के प्रायः सभी सैनिक अभियान सफल रहे। वह बलबन के सैनिकवादी आदर्श को न्यायोचित सीमा तक ले गया। पुरोहित वर्ग के प्रभाव और मार्गदर्शन से मुक्त होकर राज्य-संचालन करने का श्रेय सर्वप्रथम उसे ही प्राप्त है। वह किसी भी मूल्य पर अपने शासन को सबल बनाना चाहता था।
साथ ही अलाउद्दीन एक निरंकुश सुल्तान भी था, जिसकी महत्त्वाकांक्षाएँ असीम तथा अनियंत्रित थीं और जिसके तरीके प्रायः सिद्धांत-शून्य थे। बरनी लिखता है कि फ़िरौन जितना निरपराध रक्त बहाने के लिए दोषी ठहराया गया, उससे भी अधिक निरपराध रक्त अलाउद्दीन ने बहाया। जलालुद्दीन फ़िरोज़ का दुखद अंत, मृत सुल्तान के संबंधियों के साथ उसका क्रूर व्यवहार, तथा नव-मुस्लिमों के प्रति उसकी निर्दयतापूर्ण कार्रवाइयाँ (जिनमें उनकी स्त्रियों और बच्चों को भी नहीं बख़्शा गया) उसके कठोर स्वभाव के प्रमाण हैं। वह अत्यंत संदेही तथा ईर्ष्यालु भी था। गद्दी पर बैठने के बाद उसने उन बहुत-से सरदारों को धन एवं घरों से वंचित कर दिया, बंदीगृहों में भेज दिया अथवा अंधा करवाकर मरवा डाला, जिन्होंने कभी उसका पक्ष लिया था। यहाँ तक कि वह अपने ही सेनापति ज़फ़र ख़ाँ की वीरता से ईर्ष्या करने लगा था। जब मंगोलों ने ज़फ़र ख़ाँ को मार डाला, तो सुल्तान को यह संतोष हुआ कि उससे बिना अपमानित हुए ही छुटकारा मिल गया।
अलाउद्दीन खिलजी की नीतियों के दुष्परिणाम एवं मृत्यु
अलाउद्दीन खिलजी ने जिस सैनिक राजतंत्र के निर्माण का प्रयास किया, उसकी नींव वस्तुतः बालू पर रखी गई थी। ऊपर से उसकी कठोरता के कारण यह सबल प्रतीत होता था, परंतु इससे दमित सरदारों तथा अपमानित नायकों के मन में असंतोष पनपता रहा, और वे अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा तथा शक्ति पुनः प्राप्त करने के अवसर की प्रतीक्षा करते रहे। उसकी शासन-प्रणाली की सबसे बड़ी कमी यह थी कि यह शासित वर्ग का स्वेच्छापूर्वक समर्थन और शुभकामनाएँ प्राप्त नहीं कर सकी, जो किसी भी सरकार की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। उसका अस्तित्व मूलतः अपने निर्माता के प्रबल व्यक्तित्व पर निर्भर था; इसके पतन के लक्षण सुल्तान के अंतिम दिनों में ही दिखने लगे और उसकी मृत्यु के बाद शीघ्र ही पूर्णरूप से प्रकट हो गए। अपने चाचा के प्रति की गई कृतघ्नता का प्रतिशोध, विडंबनास्वरूप, उसके अपने ही परिवार पर आ पड़ा और उसकी शक्ति एवं प्रतिष्ठा का नाश उसी व्यक्ति ने किया, जिस पर सुल्तान की सर्वाधिक आस्था थी: उसका दुलारा एवं विश्वासपात्र सेनापति मलिक काफ़ूर।
मलिक काफ़ूर के बहकावे में आकर अलाउद्दीन ने अपने पुत्र खिज्र ख़ाँ को उत्तराधिकारी न बनाकर अपने अल्पवयस्क पुत्र शिहाबुद्दीन उमर को उत्तराधिकारी नियुक्त किया। जलोदर (जलशोफ़) रोग से ग्रस्त अलाउद्दीन खिलजी का अंतिम समय अत्यंत कष्टपूर्ण बीता, और 5 जनवरी 1316 ई. को उसकी मृत्यु हो गई।
अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद काफ़ूर ने शिहाबुद्दीन को नाममात्र का सुल्तान बनाकर शासन-सत्ता स्वयं अपने हाथ में ले ली और स्वयं सुल्तान बनने का स्वप्न देखने लगा। उसने अलाउद्दीन के सभी वयस्क पुत्रों को बंदी बनाकर उन्हें अंधा करना आरंभ कर दिया। अलाउद्दीन का एक पुत्र मुबारक ख़लजी किसी प्रकार बंदीगृह से भाग निकलने में सफल रहा। अंततः लगभग 35 दिन की सत्ता-प्राप्ति के बाद मलिक काफ़ूर की हत्या कर दी गई।
कुतुबुद्दीन मुबारकशाह खिलजी (1316-1320 ई.)
काफ़ूर की हत्या के बाद मुबारकशाह खिलजी स्वयं सुल्तान शिहाबुद्दीन का संरक्षक बन गया। बाद में उसने अपने छोटे भाई को अंधा करवाकर स्वयं कुतुबुद्दीन मुबारकशाह खिलजी के नाम से सुल्तान बन गया। उसके शासनकाल में राज्य में प्रायः शांति बनी रही। मुबारकशाह ने ‘अल-इमाम’, ‘उल-इमाम’ एवं ‘खिलाफ़त-उल्लाह’ जैसी उपाधियाँ धारण कीं तथा स्वयं को इस्लाम धर्म का सर्वोच्च धर्माधिकारी और ‘अल-वासिक़-बिल्लाह’ (स्वर्ग तथा पृथ्वी के अधिपति का खलीफ़ा) घोषित किया।

देवगिरि तथा गुजरात के विद्रोह
कुतुबुद्दीन मुबारकशाह खिलजी ने लगभग चार वर्ष शासन किया, जिस दौरान गुजरात और देवगिरि को छोड़कर शेष देश में शांति रही। उसने वारंगल के शासक प्रतापरुद्रदेव के क्षेत्र पर तथा ख़ुसरव ख़ाँ के नेतृत्व में माबर (मदुरा) क्षेत्र पर भी आक्रमण करवाया।
गुजरात के सूबेदार ज़फ़र ख़ाँ, जो मुबारकशाह का ससुर भी था, ने विद्रोह कर दिया, जिसे मुबारकशाह ने बलपूर्वक दबा दिया। इसी प्रकार देवगिरि के शासक हरगोपाल देव ने भी विद्रोह किया, जो अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली था, अतः मुबारकशाह ने स्वयं एक बड़ी सेना का नेतृत्व कर उसका दमन किया। हरगोपाल देव भागने का प्रयास करते हुए पकड़ा गया और मारा गया। सुल्तान ने देवगिरि में एक विशाल मस्जिद बनवाई और दिल्ली लौट आया।
मुबारकशाह के सुधार-कार्य
शासन के प्रारंभिक काल में मुबारकशाह ने कुछ लोकप्रिय कार्य किए। राजनीतिक बंदियों को रिहा किया, अपने सैनिकों को छह माह का अग्रिम वेतन दिया, तथा विद्वानों एवं महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की छीनी गई जागीरें वापस लौटा दीं। उसने अलाउद्दीन खिलजी की कठोर दंड-व्यवस्था एवं बाज़ार-नियंत्रण प्रणाली को भी समाप्त कर दिया, जिससे जनता को अपार हर्ष एवं संतोष हुआ।
पतन एवं हत्या
किंतु मुबारकशाह स्वयं भोग-विलास में लिप्त एक व्यक्ति था, जिसे नग्न स्त्री-पुरुषों की संगत बहुत प्रिय थी। बरनी के अनुसार वह कभी-कभी राजदरबार में स्त्री का वेश धारण कर पहुँचता अथवा नग्न होकर दरबारियों के बीच घूमता था। वह अपना अधिकांश समय सुरा-सुंदरी में व्यतीत करने लगा और अपना सारा राजकार्य ख़ुसरव ख़ाँ को प्रधानमंत्री बनाकर उसके ऊपर छोड़ दिया। ख़ुसरव ख़ाँ एक निम्न वर्ग का धर्मांतरित गुजराती (बरई) था, जो कुतुबुद्दीन मुबारकशाह को हटाकर स्वयं सुल्तान बनना चाहता था। अंततः 15 अप्रैल 1320 ई. को ख़ुसरव ख़ाँ ने छुरा भोंककर मुबारकशाह खिलजी की हत्या कर दी और स्वयं ‘नासिरुद्दीन ख़ुसरो शाह’ की उपाधि धारण कर दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बन बैठा।
सीमांत क्षेत्र के शक्तिशाली शासक गाज़ी तुग़लक़ ने ख़ुसरव ख़ाँ का विरोध किया और प्रांतीय अधिकारियों से सहायता माँगी। उसने ख़ुसरव ख़ाँ पर इस्लाम-विरोधी आचरण, अलाउद्दीन के वंश के प्रति विश्वासघात और अन्य अपराधों के आरोप लगाए। अंततः गाज़ी तुग़लक़ ने दिल्ली पर आक्रमण कर ख़ुसरव ख़ाँ को पराजित किया और सत्ता पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
इस प्रकार खिलजी शासकों ने जिस प्रकार रक्तपात के माध्यम से दिल्ली का सिंहासन प्राप्त किया था, अंततः रक्तपात के द्वारा ही उनके वंश का पतन हो गया।
खिलजी वंश के पतन के कारण
खिलजी वंश (1290-1320 ई.) की स्थापना जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी ने की थी, किंतु इसका वास्तविक उत्कर्ष और अंततः पतन दोनों ही अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.) के शासन-काल से जुड़े हुए हैं। वंश का अंत कुतुबुद्दीन मुबारकशाह खिलजी की हत्या के साथ हुआ, जब गाज़ी तुग़लक़ ने सत्ता हथिया ली। खिलजी वंश के पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे —
अलाउद्दीन की कठोर नीतियों से उत्पन्न असंतोष
अलाउद्दीन की निरंकुश एवं दमनकारी नीतियों (विद्रोह-निरोधी अध्यादेश, संपत्ति की जब्ती, कठोर गुप्तचर प्रणाली, बाज़ार-नियंत्रण) ने सरदारों, अमीरों तथा जनता में गहरा असंतोष उत्पन्न किया। इन नीतियों ने व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं को कुचल दिया, जिससे शासित वर्ग का सच्चा समर्थन कभी प्राप्त नहीं हुआ। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद यह असंतोष खुलकर विद्रोह के रूप में प्रकट हो गया।
व्यक्तित्व-निर्भर शासन-प्रणाली
अलाउद्दीन का सुदृढ़ शासन मूलतः उसके प्रबल व्यक्तित्व पर टिका था। 1316 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी अपेक्षाकृत निर्बल सिद्ध हुए। शासन की नींव वस्तुतः ‘बालू पर’ रखी गई थी, जो सुल्तान के जीवित रहते सुदृढ़ प्रतीत होती थी, किंतु उसके बाद शीघ्र ही ढह गई।
मलिक काफ़ूर की महत्त्वाकांक्षा एवं विश्वासघात
अलाउद्दीन का विश्वस्त सेनापति मलिक काफ़ूर उसके अंतिम दिनों में सर्वाधिक प्रभावशाली बन गया था। काफ़ूर के प्रभाव में अलाउद्दीन ने बड़े पुत्र खिज्र ख़ाँ को हटाकर अल्पवयस्क शिहाबुद्दीन उमर को उत्तराधिकारी नियुक्त किया। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद काफ़ूर ने सत्ता हथिया ली, अलाउद्दीन के पुत्रों को अंधा करवाया और स्वयं सुल्तान बनने का प्रयास किया। यद्यपि मात्र 35 दिनों में उसकी हत्या हो गई, किंतु इससे वंशीय अस्थिरता और अधिक बढ़ गई।
उत्तराधिकारियों की अयोग्यता एवं पारिवारिक कलह
शिहाबुद्दीन उमर मात्र एक अल्पवयस्क कठपुतली शासक था। कुतुबुद्दीन मुबारकशाह खिलजी ने शासन के आरंभ में कुछ लोकप्रिय सुधार अवश्य किए (बंदियों की रिहाई, जागीरें लौटाना, कठोर कानूनों को हटाना), किंतु शीघ्र ही वह भोग-विलास में डूब गया, दरबार में अशोभनीय आचरण करने लगा और राज्य-कार्य ख़ुसरव ख़ाँ जैसे महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति को सौंप दिया। मुबारकशाह द्वारा अपने ही भाई को अंधा करवाना भी वंश की आंतरिक कमज़ोरी को दर्शाता है।
ख़ुसरव ख़ाँ का षड्यंत्र एवं हत्या
मुबारकशाह द्वारा प्रधानमंत्री बनाए गए महत्त्वाकांक्षी ख़ुसरव ख़ाँ ने 15 अप्रैल 1320 ई. को उसकी हत्या कर स्वयं सुल्तान पद धारण कर लिया। उसके इस्लाम-विरोधी आचरण एवं विश्वासघात ने मुस्लिम सरदारों को उसके विरुद्ध एकजुट कर दिया।
प्रांतीय विद्रोह एवं बाहरी हस्तक्षेप
गुजरात एवं देवगिरि में समय -समय पर विद्रोह होते रहे। सीमांत के शक्तिशाली शासक गाज़ी तुग़लक़ (आगे चलकर तुग़लक़ वंश का संस्थापक) ने ख़ुसरव ख़ाँ का विरोध करते हुए प्रांतीय अधिकारियों की सहायता से दिल्ली पर आक्रमण किया और सत्ता पर अधिकार कर लिया, जिससे खिलजी वंश का अंत हो गया।
रक्तपातपूर्ण आरंभ का प्रतिशोध
वंश की स्थापना ही रक्तपात से हुई थी- अलाउद्दीन ने अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या कर सत्ता प्राप्त की थी। यह मानो कर्मफल के रूप में वंश पर ही लौट आया, जब पारिवारिक हत्याएँ और विश्वासघात वंश की नियति बन गए। इतिहासकार बरनी के शब्दों में : “रक्तपात से प्राप्त सिंहासन रक्तपात से ही नष्ट हुआ।”
समग्र रूप से खिलजी वंश का पतन आंतरिक कमज़ोरियों (नेतृत्व की कमी, दरबारी षड्यंत्र), अलाउद्दीन की दमनकारी नीतियों की नकारात्मक विरासत, तथा प्रांतीय विद्रोह एवं बाहरी हस्तक्षेप इन सबका संयुक्त परिणाम था। यह वंश मात्र लगभग 30 वर्षों में ही समाप्त हो गया, जिसके पश्चात तुग़लक़ वंश की स्थापना हुई।
इस प्रकार खिलजी वंश दिल्ली सल्तनत के इतिहास का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं गतिशील अध्याय है। जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी की उदार किंतु दुर्बल नीति से आरंभ होकर, अलाउद्दीन खिलजी के काल में यह वंश सैन्य-शक्ति, प्रशासनिक केंद्रीकरण, भू-राजस्व सुधार, बाज़ार-नियंत्रण तथा उत्तर एवं दक्षिण भारत के अभूतपूर्व साम्राज्यवादी विस्तार के चरमोत्कर्ष पर पहुँचा। अलाउद्दीन ने राजत्व को धर्म एवं उलेमा के प्रभाव से मुक्त कर राज्यहित को सर्वोपरि माना, और मंगोल आक्रमणों का सफलतापूर्वक प्रतिरोध कर उत्तर-पश्चिम सीमा को सुरक्षित किया। किंतु उसकी अत्यधिक निरंकुश एवं दमनकारी नीतियाँ, तथा उत्तराधिकार की अनिश्चितता, अंततः वंश के पतन का कारण बनीं। मलिक काफ़ूर का विश्वासघात, मुबारकशाह की अयोग्यता तथा ख़ुसरव ख़ाँ के षड्यंत्र ने इस प्रक्रिया को गतिमान किया, और अंततः गाज़ी तुग़लक़ के उदय के साथ 1320 ई. में खिलजी वंश का अंत हो गया तथा तुग़लक़ वंश की स्थापना हुई। इस प्रकार खिलजी काल भारतीय इतिहास में साम्राज्यवादी विस्तार, प्रशासनिक नवाचार तथा सत्ता की नश्वरता दोनों का प्रतिनिधि उदाहरण प्रस्तुत करता है।
खिलजी वंश से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs
1. खिलजी वंश की स्थापना किसने की थी?
2. खिलजी वंश का शासनकाल कब से कब तक था?
3. खिलजी वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक कौन था?
4. अलाउद्दीन खिलजी ने सत्ता कैसे प्राप्त की?
5. अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण भारत की विजय का नेतृत्व किसने किया था?
उत्तर: दक्षिण भारत के अभियानों का नेतृत्व मुख्यतः उसके सेनापति मलिक काफूर ने किया। उसने देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र और मदुरै आदि क्षेत्रों में अभियान चलाकर दिल्ली सल्तनत की शक्ति का विस्तार किया।


