1919 का भारत सरकार अधिनियम (मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) Government of India Act of 1919 (Montague-Chelmsford Reforms)

भारत सरकार अधिनियम, 1909 भारतीयों के स्वशासन की माँग की पूर्ण करने में असमर्थ रहा था। 1905 के बाद भारत के राजनैतिक क्षेत्र में जो गरम राष्ट्रवाद के रूप में नवीन धारा उत्पन्न हुई थी, उसकी शक्ति को बढ़ने से रोकने के लिए सरकार ने दमन-नीति का सहारा लिया, जिससे भारतीयों में बहुत रोष फैल गया। उधर 1911 में बंगाल-विभाजन की निरस्ति से मुसलमान भी सरकार से नाराज हो गये। 1914 में ब्रिटेन ने तुर्की के विरुद्ध भी युद्ध की घोषणा कर दी जो मुसलमानों की आस्था का केंद्र था। मुस्लिम लीग में कुछ राष्ट्रवादी मुसलमानों के आ जाने से 1916 में कांग्रेस व लीग में ‘लखनऊ समझौता’ हो गया और उन्होंने आपसी मतभेदों को दूर करके ब्रिटिश सरकार के सामने सुधारों की एक योजना रखी, जिसे कांग्रेस-लीग योजना कहा जाता है। राष्ट्रवादी और सरकार-विरोधी भावनाओं की उठती लहर के कारण ब्रिटिश सरकार ने एक बार फिर ‘गुड़ खिलाकर डंडे मारने’ की नीति अपनाई।

ब्रिटिश सरकार के भारत मंत्री (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया) लॉर्ड एडविन मांटेग्यू ने 20 अगस्त, 1917 को हाउस ऑफ कॉमंस में एक ऐतिहासिक वक्तव्य दिया कि शासन की सभी शाखाओं में भारतीयों को शामिल करना तथा स्वायत्तशासी संस्थाओं का क्रमिक विकास करना सरकार का लक्ष्य है, जिससे ब्रिटिश भारत के अभिन्न अंग के रूप में उत्तरदायी सरकार की उत्तरोत्तर उपलब्धि हो सके। नवंबर, 1917 में भारतमंत्री मांटेग्यू ने भारत आकर तत्कालीन वायसरॉय चेम्सफोर्ड एवं अन्य असैनिक अधिकारियों एवं भारतीय नेताओं से प्रस्ताव के बारे में विचार-विमर्श किया। एक समिति सर विलियम ड्यूक, भूपेंद्रनाथ बासु, चार्ल्स रॉबर्ट की सदस्यता में बनाई गई, जिसने भारतमंत्री एवं वायसरॉय के प्रस्तावों को अंतिम रूप देने में सहयोग दिये जिसके परिणामस्वरूप ‘मांट-फोर्ड रिपोर्ट-1918’ प्रकाशित की गई, जो 1919 के अधिनियम का आधार बनी।

1909 का भारतीय परिषद् अधिनियम : मार्ले-मिंटो सुधार (Indian Council Act of 1909 : Marley-Minto Reform)

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ (Salient features of the Act)

मांटेंग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के प्रवर्तनों को भारत के रंग-बिरंगे इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण घोषणा कहा गया और इसे एक युग का अंत और एक नवीन युग का प्रारंभ बताया गया। यह अधिनियम अंतिम रूप से 1921 में लागू किया गया। इसी घोषणा में पहली बार ‘उत्तरदायी शासन शब्दों का प्रयोग किया गया। प्रशासन एवं राजस्व के कुछ विषयों को केंद्रीय सरकार के नियंत्रण से हटाकर प्रांतीय सरकार के अधिकार में दे दिया गया। प्रांतों को प्रथम बार ऋण लेने तथा कर लगाने का अधिकार भी दिया गया।

केंद्रीय और प्रांतीय शक्ति-विभाजन: केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच शक्ति-विभाजन किया गया। विषयों को पहली बार केंद्रीय व प्रांतीय भागों में बाँटा गया। संपूर्ण भारत या अंतर्प्रांतीय हितों से संबंधित राष्ट्रीय महत्त्व के विषयों को केंद्रीय सूची में शामिल किया गया, जिस पर गवर्नर जनरल सपरिषद् कानून बना सकता था। प्रांतीय हितों से संबंधित विषय प्रांतों के अंतर्गत रखे गये। विदेशी मामले, रक्षा, राजनैतिक संबंध, रेल, डाक व तार, आयकर, व्यापार, जहाजरानी, सार्वजनिक ऋण, संचार व्यवस्था, दीवानी तथा फौजदारी कानून तथा कार्य-प्रणाली इत्यादि सभी मामले केंद्रीय सूची में थे।

स्थानीय स्वशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, राजस्व कर, अकाल सहायता, शांति-व्यवस्था, कृषि, जंगल आदि प्रांतीय महत्त्व के विषय थे। प्रांतीय महत्त्व के विषयों पर गवर्नर कार्यकारिणी तथा विधानमंडल की सहमति से कानून बनाता था।

भारत परिषद् में कम से कम आठ और अधिक से अधिक बारह सदस्य नियुक्त करने की व्यवस्था की गई। इन सदस्यों में से कम से कम आधे ऐसे सदस्य होने जरूरी थी जो नियुक्ति के समय से पूर्व भारत कम से कम दस वर्ष से अधिक पूर्व न छोड़ा हो। सदस्यों का कार्यकाल सात वर्ष से घटाकर पाँच वर्ष कर दिया गया। प्रत्येक सदस्य की आय बढ़ाकर 1,000 पौंड से 1,200 पौंड कर दी गई और भारतीय सदस्य के लिए 6,00 पौंड के अतिरिक्त भत्ते की व्यवस्था की गई। भारत परिषद् के कार्य-संचालन के नियमों में भी कुछ परिवर्तन किये गये।

द्विसदनीय केंद्र: केंद्र में दो सदनों की व्यवस्था की गई। केंद्रीय विधान परिषद् का स्थान राज्य परिषद् (उच्च सदन) तथा विधान सभा (निम्न सदन) वाले द्विसदनीय विधान मंडल ने ले लिया। ऊपरी सदन (राज्य परिषद्) अर्थात् कौंसिल ऑफ स्टेट में 60 सदस्य होते थे, जिनमें से 33 चुनाव से आने थे और 27 गवर्नर जनरल द्वारा मनोनीत किये जाने थे। निचले सदन अर्थात् लेजिस्लेटिव असेंबली में 144 में से 103 का चुनाव एवं शेष 41 मनोनीत होने थे। यद्यपि सदस्यों को नामजद करने की शक्ति बनाये रखी गई, फिर भी प्रत्येक सदन में निर्वाचित सदस्य का बहुमत होना सुनिश्चित किया गया। केंद्रीय विधान मंडल सम्पूर्ण भारत के लिए कानून बना सकता था। गवर्नर जनरल अध्यादेश जारी कर सकता था जिसकी प्रभाविता छः महीने तक रहती थी। केंद्रीय विधानसभा का कार्यकाल तीन वर्षों का था, जिसे गवर्नर जनरल बढ़ा सकता था।

व्यवस्थपिका सभा का विस्तार और अधिकार में वृद्धि: व्यवस्थपिका सभा को प्रभावशाली बनाने के लिए उसका विस्तार कर उसके अधिकारों में वृद्धि की गई, किंतु गवर्नर जनरल को कुछ ऐसे विशेषाधिकार प्रदान किये गये, जिनका प्रयोग वह व्यवस्थापिका की सहमति के बिना कर सकता था। इस प्रकार केंद्र में अनुत्तरदायी शासन बनाये रखा गया। आशा व्यक्त की गई कि प्रांतीय शासन के हस्तांतरित क्षेत्र में गृह सरकार द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा। इस प्रकार प्रांतों के हस्तांतरित विषयों पर भारत सचिव का नियंत्रण कम हो गया, जबकि केंद्रीय नियंत्रण बना रहा।

कार्यकारिणी परिषद् में भारतीयों की संख्या में वृद्धि: नवीन नियमों के अनुसार गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में आठ सदस्यों में से तीन भारतीय नियुक्त किये गये तथा इन्हें विधि, श्रम, शिक्षा, स्वास्थ व उद्योग विभाग सौंपे गये। इस प्रकार कार्यकारिणी परिषद् में भारतीयों की संख्या एक से बढ़ाकर तीन कर दी गई। भारतीय उच्च न्यायालय के उन वकीलों को, जिन्हे उनमें कार्य करते हुए दस वर्ष हो चुके हो, परिषद् का लॉ मेंबर होने के योग्य ठहराया गया। श्री तेजबहादुर सप्रू पहले भारतीय लॉ सदस्य हुए।

प्रांतों में द्वैध शासन की स्थापना: 1919 के अधिनियम की सबसे प्रमुख विशेषता थी- प्रांतों में द्वैध शासन की स्थापना। आठ प्रमुख प्रांतों में, जिन्हें ‘गवर्नर का प्रांत’ कहा जाता था, द्वैध शासन की एक नई पद्धति शुरू की गई। दोहरी शासन प्रणाली के तहत प्रांतीय सरकारों को अधिक अधिकार दिये गये। प्रांतीय सूची के विषयों को दो भागों में बाँटा गया- सुरक्षित विषय और हस्तांतरित विषय। सुरक्षित सूची के विषय गवर्नर के अधिकार क्षेत्र में थे और वह इन विभागों को अपने कार्यकारिणी की सहायता से देखता था। वित्त, कानून और व्यवस्था जैसे कुछ विषय ‘आरक्षित’ घोषित करके गवर्नर के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखे गये। शिक्षा, जन-स्वास्थ्य तथा स्थानीय स्वशासन जैसे कुछ विषयों को हस्तांतरित घोषित करके भारतीय मंत्रियों के अधिकार में दिये गये थे, जिनकी नियुक्ति भारतीय सदस्यों में से होती थी। इसका अर्थ यह भी था कि जिन विभागों में काफी धन खर्च होता, वे हस्तांतरित तो होंगे, किंतु उनमें भी वित्त पर पूरा नियंत्रण गवर्नर का ही रहेगा। यह द्वैध शासन पद्धति 1 अप्रैल, 1921 को लागू की गई, जो 1 अप्रैल, 1937 तक चलती रही। किंतु बंगाल में 1924 से 1927 तक और मध्य प्रांत में 1924 से 1926 तक यह कार्य नहीं कर सकी।

मद्रास, बंबई और बंगाल की सरकारों के रक्षित भाग के चार सदस्यों में से दो तथा शेष प्रांतों में जहाँ रक्षित भाग के केवल दो सदस्य होने थे, एक सदस्य भारतीय रखा गया। इनकी नियुक्ति भारतमंत्री की सिफारिश पर ब्रिटिश सम्राट द्वारा की जाती थी।

इस कानून में प्रांतीय विधायी परिषदों का आकार बढ़ा दिया गया और निश्चित किया गया कि उनके अधिकांश सदस्य चुनाव जीतकर आयेंगे। बडे प्रांतों की परिषदों में अधिक से अधिक 140 और छोटे प्रांतों में कम से कम 60 सदस्य रखने की व्यवस्था की गई। इनमें कम से कम 70 प्रतिशत सदस्य निर्वाचित होने जरूरी थे।

मताधिकार एवं सांप्रदायिक-निर्वाचन का विस्तार: इस अधिनियम के अनुसार सदस्यों का चुनाव सीमांकित निर्वाचन क्षेत्रों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाना था। मताधिकार का विस्तार करके भारत की लगभग 10 प्रतिशत जनता को मताधिकार दिया गया। निर्वाचक मंडल के लिए अर्हताएँ सांप्रदायिक समूह, निवास और संपत्ति पर आधारित थीं। सांप्रदायिक-निर्वाचन का विस्तार करते हुए इस अधिनियम में मुसलमानों के अतिरिक्त सिखों, यूरोपियनों, आंग्ल-भारतीयों तथा ईसाइयों के लिए भी पृथक् निर्वाचन-व्यवस्था लागू की गई।

नरेश मंडल: 8 फरवरी, 1921 को दिल्ली में नरेश मंडल की स्थापना की गई, जिसकी कुल सदस्य संख्या 121 थी। इसका प्रधान वायसरॉय था और यह मंडल वस्तुतः एक परामर्शदात्री सभा के समान था।

रॉयल कमीशन की नियुक्ति का विधान: इस अधिनिमय के द्वारा दस वर्ष बाद द्वैध शासन प्रणाली तथा संवैधानिक सुधारों के व्यावहारिक रूप की जाँच के लिए और उत्तरदायी सरकार की प्रगति से संबंधित मामलों पर सिफारिश करने के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा ‘रॉयल कमीशन की नियुक्ति का प्रावधान किया गया। इसी प्रावधान के अनुसार 1927 में साइमन आयोग का गठन किया गया था। केंद्रीय सार्वजनिक सेवाओं की भर्ती के लिए भारत में लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई।

भारतीय उच्चायुक्त नियुक्ति: इस अधिनियम के द्वारा भारत सचिव के राजनीतिक और व्यावसायिक कार्यों को पृथक् कर एक नया अधिकारी ‘भारतीय उच्चायुक्त’ नियुक्त किया गया, जिसे भारत सचिव के व्यावसायिक कार्य सौंप दिये गये। भारतीय उच्चायुक्त को भारतीय राजकोष से वेतन देने की व्यवस्था की गई। केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के हिसाब-किताब की जाँच के लिए स्वतंत्र महालेखा परीक्षक की भी व्यवस्था की गई।

अधिनियम का मूल्यांकन (Evaluation of Act)

1919 के अधिनियम में अनेक त्रुटियाँ थीं। इसने उत्तरदायी सरकार की माँग को पूरा नहीं किया। केंद्र सरकार का प्रांतीय सरकारों पर अबाध नियंत्रण बना रहा। प्रांतीय विधान मंडल गवर्नर जनरल की स्वीकृति के बिना अनेक विषयों में विधेयक पर बहस नहीं कर सकते थे। सिद्धांततः केंद्रीय विधानमंडल संपूर्ण क्षेत्र में कानून बनाने के लिए सर्वोच्च तथा सक्षम बना रहा। केंद्र तथा प्रांतों के बीच शक्तियों के बँटवारे के बावजूद ब्रिटिश भारत का संविधान एकात्मक राज्य का संविधान ही बना रहा। प्रांतों में द्वैध शासन पूरी तरह विफल रहा। गवर्नर का पूर्ण वर्चस्व कायम रहा। वित्तीय शक्ति के अभाव में मंत्री अपनी नीतियों को प्रभावी रूप से कार्यान्वित नहीं कर सकते थे। इसके अलावा मंत्री विधानमंडल के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी नहीं थे। वस्तुतः मंत्रियों को दो मालिकों को खुश रखना पड़ता था- एक तो विधान परिषद् को और दूसरा गवर्नर जनरल को। इसके अलवा वोट का अधिकार बहुत सीमित था। 1920 में निचले सदन के लिए कुल 9,09,874 मतदाता तथा ऊपरी सदन के लिए 17,364 मतदाता थे।

हस्तांतरित व आरक्षित विषयों का विभाजन भी दोषपूर्ण था, जैसे- सिंचाई आरक्षित विषय था और कृषि हस्तांतरित, जबकि दोनों एक दूसरे से अविभेद्य हैं। इसी प्रकार उद्योग हस्तांतरित था, जबकि जलशक्ति, कल-कारखाने आदि आरक्षित विषय थे, जिन्हें एक दूसरे से पृथक् करना अव्यवहारिक था। पृथक् निर्वाचन का विस्तार कर सांप्रदायिकता का बीज बोया गया जो भारत के विभाजन का कारण बना।

वस्तुतः इस अधिनियम से भारतीयों को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। अब भारतीय राष्ट्रवादी अधिनियम की छूटों से आगे बढ़ चुके थे। वे राजनीतिक सत्ता की छाया मात्र से संतुष्ट होनेवाले नहीं थे। कांग्रेस ने इन सुझावों को ‘निराशाजनक और असंतोषजनक बताकर प्रभावी स्वशासन की माँग की, यद्यपि सुरेंद्र्नाथ बनर्जी के नेतृत्व में कुछ वयोवृद्ध कांग्रेसी सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार करने के पक्ष में थे, जिन्होंने कांग्रेस छोड़कर ‘इंडियन लिबरल एसोसिएशन’ की स्थापना की।

<1861 का भारतीय परिषद् अधिनियम 

1909 का भारतीय परिषद् अधिनियम : मार्ले-मिंटो सुधार 

भारत में सांप्रदायिकता का विकास