यूरोप में सामंतवाद (Feudalism in Europe)

 मध्यकालीन यूरोप में सामंतवाद अपने चरमोत्कर्ष पर थी। इन सामंतों की कई श्रेणियाँ होती थीं जिनके शीर्ष पर राजा होता था। राजा के नीचे विभिन्न कोटि के सामंत होते थे और सबसे निम्न स्तर पर किसान या दास होते थे। यह एक प्रकार से रक्षक और अधीनस्थ लोगों का संगठन था, जिसमें राजा समस्त भूमि का स्वामी माना जाता था और सामंतगण राजा के प्रति स्वामिभक्ति होते थे, उसकी रक्षा के लिए सेना रखते थे और बदले में राजा से भूमि प्राप्त करते थे। किंतु सामंत भूमि का क्रय-विक्रय नहीं कर सकते थे। आरंभ में इस व्यवस्था ने स्थानीय सुरक्षा, कृषि और न्याय की समुचित व्यवस्था करके समाज की बड़ी सेवा की। किंतु कालांतर में सामंत अपनी महत्वाकांक्षा के कारण पारस्परिक युद्धों में उलझने लगे और कृषकों तथा दासों का अतिशय शोषण करने लगे। फलतः आधुनिक युग के आरंभ में व्यापारिक प्रगति, नये शहरों के उत्थान, बारूद के आविष्कार, राजाओं की शक्ति में वृद्धि, कृषकों के विद्रोह और राष्ट्रभक्ति के उदय के कारण सामंतशाही का लोप हो गया।

सामंतवाद क्या है? सामंतवाद को अंग्रेज़ी में फ़्यूडलिज़्म कहा जाता है। सामंतवाद की एक निश्चित परिभाषा देना अत्यंत कठिन है क्योंकि यूरोप के प्रत्येक देश में इसका स्वरूप अलग-अलग था। फिर भी, इतना निश्चित है कि यह सुरक्षा की भावना और भूमि-वितरण पर आधारित एक ऐतिहासिक, सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था थी, जिसका उदय मध्ययुगीन यूरोप में असामान्य परिस्थितियों में हुआ था। रोमन साम्राज्य के विघटन के बाद जब पश्चिमी यूरोप की असभ्य जातियों- फ्रैंक लोम्बार्ड तथा गोथ इत्यादि ने उस पर अधिकार कर लिया, तो इन बर्बर जातियों से अपनी सुरक्षा के लिए जनता ने शक्तिशाली वर्ग से समझौता किया, जो कालांतर में सामंतवाद के आधार बन गये। इस प्रकार सामंतवाद के जन्म में सुरक्षा की भावना प्रमुख थी।

सामंतवाद के उदय का एक दूसरा कारण यह था कि राजा अपने दूर-दूर तक विस्तृत साम्राज्य पर अेकेले शासन करने में असमर्थ थे, इसलिए उन्होंने प्रशासनिक सुविधा के लिए सामंतों को भूमि देकर सत्ता का विकेंद्रीकरण किया। धीरे-धीरे यह व्यवस्था संपूर्ण यूरोप में फैल गई, जिससे यूरोप में एक नये ढंग की व्यवस्था का सूत्रपात हुआ, जिसे ‘सामंतवाद’ के नाम से जाना जाता है। यह व्यवस्था लगभग नवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक अपने पूर्ण वैभव के साथ समस्त यूरोप में चलती रही।

सामंतवाद की विशेषताएँ

सामंतवाद का राजनीतिक और प्रशासनिक ढाँचा भूमि अनुदान और कृषि दासत्व प्रथा पर आधारित था। इस व्यवस्था के अंतर्गत समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों के लोग एक निश्चित पारस्परिक संबंध में स्वयं को बाँध लेते थे। यह संबंध प्रतिरक्षा और सेवा पर आधारित होता था। समाज का शक्तिशाली वर्ग कमजोर वर्ग के लोगों की रक्षा करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लेता था और कमजोर वर्ग शक्तिशाली वर्ग की सेवा करना स्वीकार कर लेता थ। दूसरे शब्दों में, सामंतवाद यूरोप की एक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था थी, जिसमें एक पदानुक्रमित संरचना में कुलीन, जागीरदार और सर्फ़ आपसी दायित्वों और सेवाओं के आधार पर एक जटिल संबंधों में बंधे थे। इस व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को अपने से नीचे वर्ग वाले का शोषण करने का अधिकार प्राप्त था और साथ-साथ अपने से ऊपर वाले व्यक्ति से शोषित होने का भी। सामाजिक दृष्टि से समाज प्रमुखतया दो वर्गों में विभक्त था- सत्ता और अधिकारों से युक्त राजा तथा उसके सामंत और अधिकारों से वंचित कृषक और दास।

यूरोप में सामंतवाद (Feudalism in Europe)
सामंतवाद की विशेषताएँ

मध्ययुगीन यूरोप में सामंतवाद की तीन प्रमुख विशेषताएँ थीं- जागीर, संरक्षण और संप्रभुता। जागीर साधारणतया भूमि को कहते थे, जो सामंती पदानुक्रम का प्रमुख आधार थी। सामंतों के पास बड़ी-बड़ी जागीरें थीं, जो उन्हें राजा से सैन्य-सेवा के बदले में मिली थीं। संरक्षण का अर्थ भूमिदाता द्वारा भूमि पाने वाले की सुरक्षा से था, और संप्रभुता अपनी जागीर में भूमिपति के पूर्ण अथवा आंशिक स्वामित्व को कहा जाता था। दूसरे शब्दों में, सामंतवाद एक ऐसी मध्ययुगीन प्रशासकीय प्रणाली और सामाजिक व्यवस्था थी, जिसके अंतर्गत कानूनी रूप से राजा या सम्राट समस्त भूमि का स्वामी होता था और भूमि विविध श्रेणी के सामंतों और सैनिकों में विभक्त होती थी। भूमि, धन और संपत्ति का साधन समझी जाती थी। सामंतों में यह वितरित भूमि उनकी जागीर होती थी जिसमें वे अपनी इच्छानुसार कृषकों से खेती करवाते हुए उनसे कर वसूल करते थे, भेंट और उपहार लेते थे।

व्यावहारिक रूप में सामंत अपनी जागीर में प्रभुता-संपन्न होते थे और उन तमाम प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग करते थे, जो पहले केवल राजाओं को मिले हुए थे। अपनी जागीर में शांति और सुरक्षा बनाये रखना सामंतों का दायित्व था और इसके बदले में वे कृषकों से कर वसूल करते थे, उनके मुकदमे सुनकर न्याय करते थे और समय-समय पर बेगार लेते थे। राजा या सम्राट से इन सामंतों का मात्र इतना ही संबंध था कि वे राजा को आवश्यकता पड़ने पर सैनिक सहायता देते थे, निर्धारित वार्षिक कर देते थे और विशेष अवसरों पर राजधानी में उसके समक्ष उपस्थित होकर भेंट या उपहार देते थे। इस प्रकार कृषि दासत्व और सैनिक संगठन दोनों सामंतवाद के मुख्य आधार थे। वेब्सटर के अनुसार ‘सामंतवाद एक ऐसी प्रणाली है जिसमें स्थानीय शासक उन शक्तियों का प्रयोग करते हैं जो राजा, सम्राट अथवा किसी केंद्रीय शक्ति को प्राप्त होते हैं। सामंतवाद वैयक्तिक शासन, एक विशिष्ट भूमि व्यवस्था और व्यक्तिगत निर्भरता का मिश्रित रूप था।

सामंतवाद के दोष

सामंतवादी व्यवस्था में अनेक दोष थे, जिसके कारण आधुनिक युग के आरंभ के  साथ ही यह व्यवस्था ढहने लगी। इस व्यवस्था के कारण समाज अनेक वर्गों में बँट गया था। उच्च वर्ग को मिले असीमित अधिकारों व उनके शोषण करने की प्रवृत्ति ने उच्च और निम्न वर्गों के संबंधों में कटुता उत्पन्न कर दी थी। सामंती व्यवस्था के अंतर्गत अपने से नीचे वर्ग का शोषण करना उच्च वर्ग अपना अधिकार समझता था। उच्च वर्ग के इन विशेषाधिकारों को समाप्त करने में यूरोप की जनता को सदियों तक संघर्ष करना पड़ा।

सामंतवादी व्यवस्था के कारण युद्धों को भी बढ़ावा मिला क्योंकि प्रत्येक सामंत की अपनी अलग सेना होती थी और वे अपनी जागीरों के विस्तार के लिए समय-समय पर अपनी सेना का प्रयोग करते थे, जिससे जनसाधारण को अपार कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इन युद्धों के कारण कृषि और व्यापार प्रभावित हो़ता था और देश की आर्थिक स्थिति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था।

इसके अतिरिक्त, सामंतवादी व्यवस्था के कारण मध्यकाल में यूरोप में शक्तिशाली देशों का उदय नहीं हो सका, क्योंकि देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त थे, जिनके सामंतों पर राजा का कोई विशेष नियंत्रण नहीं था। इसका कारण यह भी था कि अनेक सामंत अपने राजा से भी अधिक शक्तिशाली होते थे। साधारण जनता को किसी प्रकार के  राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे और प्रजा तथा राजा के बीच कोई सीधा संपर्क नहीं था। इस प्रकार साधारण जनता शोषण और अत्याचार की शिकार थी। उद्योग-धंधों के विकसित न होने के कारण जनसाधारण को जीवन-यापन के लिए कृषि पर ही निर्भर रहना पड़ता था, जो पूर्णतः सामंतों के  ही नियंत्रण में थी।

इस सामतंवादी व्यवस्था में कृषकों दशा अत्यंत दयनीय थी। कृषकों को अपने स्वामी की भूमि पर खेती करना पड़ती थी, अपने स्वामी को अनेक प्रकार के कर, उपहार और बेगार देने पड़ते थे। सामंत के आखेट के समय कृषकों को हर प्रकार की सुविधा देनी पड़ती थी। इस प्रकार कृषकों का संपूर्ण जीवन सामंतों के अधीन होता था। वास्तव में मध्ययुग की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही सामंतवाद का प्रचलन हुआ था। किंतु कालांतर में सामतंवाद अपने ही अंतर्विरोधों के कारण अपनी उपयोगिता खो बैठा और समाज के लिए अभिशाप बन गया।

सामंतवाद के पतन के कारण

यद्यपि यूरोप में सामंतवाद का विकास पाँचवी शताब्दी में आरंभ हो गया था, किंतु इसका पूर्ण विकास 9वीं शताब्दी में हुआ। 15वीं शताब्दी में यह पतनोन्मुख होने के बावजूद यह लंबे समय तक यूरोप में विद्यमान रहा। यद्यपि सामंतवाद के पतन के लिए अनेकानेक कारण उत्तरदायी थे, किंतु उनमें से कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार थे-

कृषकों के विद्रोह

सामंत के पतन का एक प्रमुख कारण था- कृषकों का विद्रोह। सामंतों के शोषण और अत्याचार से कृषक वास्तविक रूप में पीड़ित थे। सामंतों द्वारा कृषि अधिशेष के अत्यधिक दोहन से किसान बुरी तरह प्रभावित थे। अधिशेष दोहन की दर में लगातार वृद्धि से उनके पास मुश्किल से ही कुछ बच पाता था। अनुमानतः सामंतों द्वारा आश्रित किसानों से कुल उपज का आधा भाग ले लिया जाता था। इसके साथ-साथ लगातार कृषि के कारण भूमि की उर्वरता भी कम होती जा रही थी और किसान अपनी सीमित आय के कारण उन्नत बीज, उर्वरक और तकनीक पर खर्च करने की स्थिति में नहीं थे। इससे कृषि उत्पादन में गिरावट आई और खाद्य-पदार्थों के असमान वितरण तथा आबादी में लगातार वृद्धि से खाद्य-संकट पैदा हो गया। सामंतों द्वारा कृषि के विकास में कोई रूचि न लेने और भोग-विलास पर अधिक खर्च करने से भी स्थिति खराब हो रही थी। अनुमान है कि सामंतों के द्वारा कुल आय का मात्र पाँच प्रतिशत ही उत्पादन में निवेश किया जाता था। इन प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण 14वीं सदी में फ्रांस, बेल्जियम, इंग्लैंड आदि देशों में किसानों के संगठित विद्रोह होने लगे और उनका दमन करना प्रायः असंभव हो गया। इसके पहले किसानों के विद्रोह संगठित न होने के कारण सामंतों द्वारा कुचल दिये जाते थे।

इसी समय 1348 ई. में ‘काली मौत’ नामक महामारी यूरोप में फैल गई, जिसके चार साल के तांडव में यूरोप की लगभग एक चौथाई आबादी नष्ट हो गई, जिससे मजदूरों और कृषकों की भारी कमी हो गई। किसानों और मजदूरों की कमी के कारण मजदूरी में वृद्धि होना स्वाभाविक था। जब खेतिहर मजदूरों और कृषिदासों ने अधिक वेतन और अधिकारों की माँग की, तो सामंतों ने मजदूरी को सीमित रखने का प्रयास किया, इसलिए मजदूरों और किसानों ने संयुक्त रूप से विद्रोह किया। सर्वाधिक महत्वपूर्ण विद्रोह 1358 में फ्रांस में हुआ, जिसे ‘ग्रैंड जैकरी’ के नाम से जाना जाता है। कृषकों के इन विद्रोहों को शिल्पियों और निम्न श्रेणी के कारीगरों और छोटे पादरियों ने सहयोग दिया। यद्यपि कृषकों के विद्रोह दबा दिये गये, किंतु अब कृषक सामंतों पर निर्भर नहीं रह गये, क्योंकि वे गाँवों को छोड़कर नगरों की ओर मुड़ गये थे। इस प्रकार कृषकों के विद्रोह और ग्रामीण क्षेत्र से उनके पलायन ने सामंतवाद की जड़ों को हिलाकर रख दिया।

व्यापार-वाणिज्य में वृद्धि

बेल्जियम के इतिहासकार हेनरी पिरेन ने सामंतवाद के पतन के लिए व्यापार के प्रसार और शहरी केंद्रों के उदय को जिम्मेदार बताया है। धर्मयुद्धों और नई भौगोलिक खोजों के कारण पूरब एवं पश्चिम के लोग एक-दूसरे के संपर्क में आये और जिससे व्यापार और वाणिज्य का पुनरूत्थान हुआ और एक नवीन व्यापारी वर्ग का उदय हुआ। इससे सामंतों की प्रभुसत्ता कमजोर हुई क्योंकि इससे सामंतों की प्रभुसत्ता कमजोर हुई क्योंकि व्यापारी वर्ग सामंती व्यवस्था से बंधा हुआ नहीं था। व्यापार का वातावरण स्वतंत्रता का वातावरण था और सामंती प्रथा का वातावरण असंतोष और संकीर्णता का। इसलिए दोनों में संघर्ष होना स्वाभाविक था। व्यापार में कुछ व्यापारियों ने इतना धन कमाया कि वे सामंतों से अधिक धनी, संपन्न और वैभवशाली हो गये। व्यापारियों को सामंतों से हेय समझा जाता था, जिसके कारण वे सामंतों से ईर्ष्या करते थे और सामंतों के विरूद्ध राजा को भी सहयोग दिये। इस प्रकार व्यापार की उन्नति और राजाओं की शक्ति में वृद्धि के साथ-साथ सामंतवाद का पतन होना स्वाभाविक था।

नवीन नगरों का आविर्भाव

सामंतवाद का अंत उस समय से हुआ जब व्यापार की उन्नति के कारण यूरोप के प्रत्येक देश में नवीन नगरों और शहरों का उदय और विकास हुआ, जिससे रोजगार के नये अवसर सृजित हुए और किसानों-मजदूरों को जीवन-यापन के लिए सामंतों पर निर्भर रहना आवश्यक नही रह गया। आजीविका के स्रोतों पर एकाधिकार न रहने के कारण सामंतों के अधिकार धीरे-धीरे कम होते गये और किसानों का पूर्ववत् शोषण करना उनके लिए कठिन हो गया। इसके अतिरिक्त, व्यापारियों और सामंतों के पारस्परिक संघर्ष ने भी सामंतीय व्यवस्था के पतन का मार्ग तैयार किया।

व्यापारियों और सामंतों का संघर्ष

व्यापारियों ने अपने उद्योग-धंधों की वृद्धि और विकास के लिए गाँवों के कृषकों और कृषि दासों को प्रलोभन देकर नगरों में आकर बसने के लिए प्रेरित किया। यह सांमतों के हितों के विरूद्ध था। इसलिए व्यापारी वर्ग और सामंत वर्ग में परस्पर संघर्ष-सा छिड़ गया। नवोदित व्यापारिक वर्ग अपने व्यापारिक हित-संवर्धन के लिए राजा का समर्थन और संरक्षण चाहता था। राजा भी सामंतों से मुक्ति चाहता था, इसलिए उसने भी व्यापारियों का समर्थन किया। ऐसी परिस्थिति में व्यापारियों ने राजाओं को सहयोग देकर सामंतों की शक्ति को कम करने में अपना योगदान दिया।

राजशक्ति में वृद्धि

मध्यकालीन यूरोप के देशों के राजा साधारणतया दुर्बल थे। उनकी अपनी कोई व्यक्तिगत सेना नहीं होती थी, इसलिए राजा होने के बावजूद शासन की वास्तविक शक्ति उनके हाथों में न होकर सामंतों के हाथ में रहती थी। अतः सामंत अपनी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र थे और राजा चाहते हुए उन पर किसी प्रकार का अंकुश लगाने में असमर्थ था।

पंद्रहवीं सदी में आधुनिक युग के आविर्भाव के साथ ही यूरोप में अनेक राजाओं ने अपनी शक्ति को बढ़ाने का प्रयास किया, अपनी पृथक् सेना का निर्माण तथा प्रयोग किया और स्वतंत्र तथा शक्तिशाली राजतंत्रों की स्थापना की। इंग्लैंड के ट्यूडरवंशीय शासक हेनरी सप्तम ने अपनी सेना बनाकर निरंकुश और अत्याचारी सामंतों की शक्ति का दमन किया और राजा की वास्तविक सत्ता को स्थापित किया। इसी प्रकार यूरोप के अन्य राज्यों में भी सामंतों का दमन किया गया। राजा को अपनी संप्रभुता स्थापित करने के लिए उनके द्वारा प्रचलित किये गये सिक्कों ने भी योगदान दिया। सामंतों का उन्मूलन करने में राजाओं को अपनी प्रजा, विशेषकर मध्यमवर्ग का भी सहयोग मिला, क्योंकि जनसाधारण पहले से ही इस व्यवस्था से घृणा करता था। इस प्रकार राजा और प्रजा के सहयोग से सामंतवाद का धीरे-धीरे उन्मूलन होने  लगा।

राष्ट्रीयता की भावना का उदय

 मध्ययुग में राजाओं की दुर्बलता और देश के अनेक सामंतों के अधीन होने के कारण राष्ट्रवादी भावनाओं का अभाव था, किंतु जब शक्तिशाली राजाओं का उदय हुआ और राष्ट्रीय सरकारों की स्थापना हुई तो प्रत्येक देश में राष्ट्रवाद का उदय हुआ जिसने सामंतवाद का पतन सुनिश्चित कर दिया। राष्ट्रवाद एक राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन था जिसने राष्ट्रीय पहचान और राष्ट्र-राज्य के महत्व पर जोर दिया। राष्ट्रवाद ने सामंती व्यवस्था के पारंपरिक आदेश को चुनौती दी, क्योंकि जनसाधारण अपने स्वामी की तुलना में अपने राष्ट्र के साथ अधिक पहचान करने लगे। राष्ट्रवाद ने चर्च की शक्ति को भी कम किया, क्योंकि लोगों ने सवाल करना शुरू कर दिया कि उन्हें पोप के प्रति वफादार क्यों होना चाहिए, जबकि उनकी वफादारी अपने राष्ट्र के प्रति होनी चाहिए।

नवीन हथियारों तथा बारूद का प्रयोग

नवीन हथियारों और बारूद के प्रयोग ने भी सामंतवाद के  पतन में महत्वपूर्ण सहयोग दिया। सामंतों ने अपने-अपने क्षेत्रों में शक्तिशाली दुर्गों का निर्माण कर रखा था, जिसके कारण उन्हें पराजित करना और उनके दुर्गों पर अधिकार करना आसान नहीं था, किंतु बारूद के आविष्कार और युद्धों में उसके प्रयोग ने सामंतों की स्थिति में परिवर्तन कर दिया। राजाओं ने अपनी स्वयं की सेनाएँ स्थापित की और उनको नवीन बंदूकों और बारूद से सुसज्जित किया। बारूद के प्रयोग से सामंतों के शक्तिशाली दुर्गों को ढहाना और उन पर अधिकार करना आसान हो गया।

पारस्परिक संघर्ष

सामंतवादी व्यवस्था के पतन का एक प्रमुख कारण सामंतों का पारस्परिक संघर्ष था। प्रत्येक सामंत की अपनी अलग-अलग सेना होती थी, जिनका मुख्य उद्देश्य आवश्यकता पड़ने पर देश की सुरक्षा करना होता था। मध्यकालीन यूरोप में राजा की अपनी कोई व्यक्तिगत सेना नहीं होती थी। युद्ध की स्थिति उत्पन्न होने पर वह अपने सामंतों की संयुक्त सेना का प्रयोग करता था। किंतु ये सामंत प्रायः आपस में लड़ते रहते थे। इंग्लैंड में ‘गुलाब के फूलों का युद्ध’ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। फ्रांस की स्थिति इंग्लैंड से भी खराब थी। वहाँ सामंतों में निरंतर पारस्परिक संघर्ष चलता रहता था, जिससे न केवल देश की हानि होती थी. उनकी स्वयं की शक्ति का भी हृास होता था।

अनेक सामंतों ने धर्मयुद्धों में भाग लेने और ईसाई धर्म की सुरक्षा के लिए अपनी भूमि या तो बेच दी या उसे गिरवी रख दिया। इससे उनकी सत्ता व शक्ति क्षीण हो गई। अनेक सामंत इन धर्मयुद्धों में वीरगति को प्राप्त हुए और उनकी भूमि पर राजाओं ने अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

पुनर्जागरण और सुधार आंदोलन

पुनर्जागरण और सुधार आंदोलन जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों ने समाजार्थिक मूल्यों और दृष्टिकोणों में बदलाव किया, जिससे सामंती व्यवस्था का पतन निश्चित हो गया। 14वीं शताब्दी में पुनर्जागरण की लहर इटली में शुरू होकर शीघ्र ही पूरे यूरोप में फैल गई। इस आंदोलन ने समाज, राजनीति और संस्कृति के संबंध में पारंपरिक मध्ययुगीन विश्वदृष्टि के स्थान पर एक नये दृष्टिकोण का प्रचार किया। पुनर्जागरण के विचारकों ने मानव के तर्क, व्यक्तिवाद और शिक्षा के महत्व पर जोर दिया, जो आज्ञाकारिता, पदानुक्रम और वफादारी के पारंपरिक सामंती मूल्यों के विपरीत थे। पुनर्जागरण ने कला, साहित्य और विज्ञान के नये रूपों को भी जन्म दिया, जिसने पारंपरिक सामंती संस्कृति को चुनौती दी। 16वीं शताब्दी में सुधार आंदोलन ने भी कैथोलिक चर्च के साथ-साथ पारंपरिक सामंती संबंधों को चुनौती दी।

नवीन दृष्टिकोण और आदर्शों का प्रसार

मुद्रण के आविष्कार, विद्या एवं ज्ञान की वृद्धि और जीवन तथा ज्ञान-विज्ञान के प्रति नवीन दृष्टिकोण से समाज में नये सिद्धांतों, विचारों और आदर्शों का प्रसार हुआ। सामाजिक दृष्टि से यूरोपीय समाज के संगठन एवं स्वरूप में परिवर्तन हुआ। अब सामतंवादी संस्थाओं और व्यवस्था के स्थान पर नवीन सामाजिक व सांस्कृतिक संस्थाओं का उदय हुआ, जिससे कृषि प्रधान समाज का स्वरूप बदल गया और इसका स्थान धन-संपन्न जागरूक शिक्षित मध्यम वर्ग ने ले लिया।

जनसंख्या में वृद्धि

1960-70 के दशक में नव-माल्थसवादियों ने सामंतवाद के पतन की अपने तरीके से व्याख्या की। इनका मानना है कि जनसंख्या में आये बदलाव के कारण सामंती अर्थव्यवस्था का पतन हुआ। सामंती कृषि-व्यवस्था बढ़ी हुई आबादी का बोझ सहन करने में असमर्थ थी। जनसंख्या में वृद्धि के साथ-साथ उत्पादकता में गिरावट, जोतांे का विखंडन, मजदूरी में गिरावट और लगान में वृद्धि के कारण कृषि संकट पैदा हुआ। अतः 1314-15 ई. में अकाल और 1348-51 में महामारी से मध्ययुगीन यूरोप का संपूर्ण संतुलन बिगड़ गया और पूँजीवाद की ओर संक्रमण हुआ।

इसके अलावा, सामंती व्यवस्था के अनेक दोष भी इस व्यवस्था के पतन के कारण बने। अनेक सामंत विजय और वैवाहिक उत्तराधिकार आदि के द्वारा ऐसी भूमि पर अधिकार कर लेते थे जिसके अनेक स्वामी होते थे, जिससे गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती थी। इसके अतिरिक्त, सामंतवाद शोषण के सिद्धांत पर टिका था। किंतु शोषण बहुत लंबे समय तक नहीं किया जा सकता था। यही कारण है कि जैसे ही शोषित वर्ग ने सिर उठाया वैसे ही सामंतवाद का पतन हो गया। मार्टिन ने कहा था कि ‘सामंतवाद की आस्तीन में ऐसा हथियार छिपा हुआ है जो किसी दिन उसी पर वार करेगा।’ अंततः यह भविष्यवाणी सत्य साबित हुई और सामंतवाद का पतन हो गया।

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