इंग्लैंड का चार्ल्स प्रथम (Charles I of England, 1625–1649)

इंग्लैंड का चार्ल्स प्रथम

जेम्स प्रथम की 1625 में मृत्यु के बाद उसका दूसरा पुत्र चार्ल्स प्रथम (19 नवंबर 1600-30 जनवरी 1649) इंग्लैंड की राजगद्दी पर आसीन हुआ। चार्ल्स प्रथम की शासन करने में कोई रुचि नहीं थी। उसे अध्ययन और एकांतवास में आनंद मिलता था। उसकी प्रवृत्ति धर्म की ओर थी। अपने पिता जेम्स प्रथम की तरह चार्ल्स भी दैवीय अधिकारों का समर्थक था। उसका विवाह 1 मई 1625 को फ्रांस की बूर्बां राजकुमारी हेनरीटा मारिया से हुआ था, जो अत्यंत अस्थिर और षडयंत्रकारी स्वभाव की महिला थी, किंतु चार्ल्स पर उसका काफी प्रभाव था, जिसे उसने कभी किसी अच्छे कार्य के लिए प्रयोग नहीं किया।

इंग्लैंड का चार्ल्स प्रथम (Charles I of England, 1625–1649)
इंग्लैंड का चार्ल्स और प्रथम हेनरीटा मारिया
चार्ल्स प्रथम एवं संसद

चार्ल्स प्रथम जिस समय इंग्लैंड के राजसिंहासन पर बैठा, उस समय इंग्लैंड की स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी थी। एलिजाबेथ प्रथम और जेम्स प्रथम के शासनकाल के दौरान एक बड़ा राजकोषीय घाटा पैदा हो गया था। जेम्स प्रथम का मंत्री बकिंघम चार्ल्स प्रथम के समय में भी मंत्री था और उसके प्रभाव में महत्वपूर्ण वृद्धि हो चुकी थी। यूरोप में तीसवर्षीय युद्ध चल रहा था। स्पेन और फ्रांस दोनों के खिलाफ बकिंघम के अल्पकालिक अभियानों के कारण चार्ल्स के पास विदेशों में युद्ध छेड़ने की वित्तीय क्षमता नहीं थी। इंग्लैंड का खजाना खाली था और संसद अपने अधिकारों के प्रति जागरूक थी। इंग्लैंड अभी भी यूरोप में सबसे कम कर वाला देश था, जहाँ कोई आधिकारिक उत्पाद शुल्क और कोई नियमित प्रत्यक्ष कराधान नहीं था।

चार्ल्स प्रथम राजा के दैवीय अधिकार में विश्वास करता था और अपनी इच्छा के अनुसार शासन करना चाहता था। उसकी कैथोलिक रानी मारिया प्रशासनिक कार्यों में भी हस्तक्षेप करती थी, जिसके कारण इंग्लैंड की जनता उसे संदेह की नजर से देखती थी। मारिया कैथोलिकों को अधिक सुविधाएँ देना चाहती थी, किंतु जनता और संसद इसका विरोध करती थी। धीरे-धीरे चार्ल्स प्रथम और संसद के संबंध खराब होते चले गये। राजा और संसद में अपने अधिकारों को लेकर 1642 में इंग्लैंड में गृहयुद्ध आरंभ हो गया, जिसकी अंतिम परिणति चार्ल्स प्रथम के मृत्युदंड के रूप में हुई।

प्रथम संसद

चार्ल्स प्रथम ने जून, 1625 में अपनी पहली संसद बुलाई, किंतु इससे पूर्व ही वह स्पेन के साथ युद्ध, जो जेम्स प्रथम के समय से चल रहा था, को जारी रखने के आदेश दे चुका था। इसके अतिरिक्त, चार्ल्स ने डेनमार्क के राजा को तीस हजार पौंड की सहायता दी, जिससे वह स्पेन के विरुद्ध युद्ध जारी रख सके। स्पेन से युद्ध जारी रखने के लिए चार्ल्स प्रथम को भी धन की आवश्यकता थी, संभवतः इसीलिए उसने संसद को आमंत्रित किया था।

संसद ने सर्वप्रथम चार्ल्स को राजा बनने पर बधाई दी। स्पेनी युद्ध के लिए धन की जरूरत के बावजूद चार्ल्स ने संसद से स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा और संसद भी इस संबंध में उदासीन ही रही। स्थिति का ज्ञान न होने के कारण संसद ने कुल माँगी गई धनराशि का केवल सातवाँ भाग ही स्वीकृत किया और पाउंडेज एवं टनेज कर की वसूली का अधिकार भी राजा को केवल एक वर्ष के लिए दिया। संसद ने राजा से अपेक्षा की कि वह कैथोलिकों के साथ सहानुभूति प्रकट नहीं करेगा।

प्रथम संसद द्वारा चार्ल्स को कम धनराशि स्वीकृत करना संसद की भूल थी। कैडिज के बंदरगाह पर इंग्लैंड के जंगी बेड़े की पराजय का वास्तविक कारण अव्यवस्था के साथ-साथ धन की कमी भी था, यद्यपि इसका समस्त उत्तरदायित्व चार्ल्स के मंत्री बकिंघम पर थोपा गया था। इसके अतिरिक्त, टनेज एवं पाउंडेज कर की वसूली का अधिकार चार्ल्स प्रथम से पूर्व राजाओं को पूरे जीवन के लिए मिलता था, क्योंकि धनाभाव में किसी भी राज्य में प्रशासन करना संभव नहीं होता। शासन का साधारण व्यय चार्ल्स प्रथम के समय तक काफी बढ़ चुका था और नई दुनिया से भारी मात्रा में चाँदी आने के कारण पौंड का मूल्य घट गया था, जिससे राजा की आय भी कम हो गई थी।

संसद द्वारा राजा को अत्यंत अल्पराशि प्रदान किये जाने के कारण चार्ल्स का संसद अधिवेशन बुलाने का उद्देश्य विफल हो गया। इसी समय संसद द्वारा बकिंघम का घोर विरोध किये जाने पर चार्ल्स को अवसर मिल गया और उसने संसद को भंग कर दिया।

द्वितीय संसद

चार्ल्स ने 1626 में दूसरी संसद बुलाई। उसने लोकसभा में प्यूरिटनों को प्रसन्न करने के उद्देश्य से कैथोलिकों के विरूद्ध नियमों का कठोरतापूर्वक पालन करना प्रारंभ किया। यद्यपि चार्ल्स का यह कार्य उसके द्वारा अपने विवाह के समय फ्रांस को दिये गये वचन के विरुद्ध था, किंतु धन प्राप्त करने के लिए चार्ल्स सब कुछ करने को तैयार था। संसद ने माँग की कि कैंडिज की घटना की जाँच होनी चाहिए, किंतु चार्ल्स इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसका कहना था कि अपने मंत्रियों की योग्यता अथवा अयोग्यता का निर्णायक वह स्वयं है, संसद नहीं। चार्ल्स के इस प्रकार के विचारों से संसद ने अपनी माँग और तेज कर दी। कैंडिज की असफलता के संबंध में सर जॉन इलियट ने बकिंघम की आलोचना करते हुए कहा: ‘हम अपमानित हो गये, हमारे जहाज जलमग्न हो गये, हमारे आदमी मारे गये और यह सब तलवार से अथवा दुश्मन के द्वारा या परिस्थितियों के कारण नहीं, बल्कि उनके कारण हुआ जिन पर हम विश्वास करते थे।’ बकिंघम के विरूद्ध हाउस ऑफ कॉमन्स ने महाभियोग की कार्यवाही शुरू कर दी। मई 1626 में चार्ल्स ने कैंब्रिज विश्वविद्यालय के चांसलर के रूप में बकिंघम को नामित किया, और बकिंघम के खिलाफ बोलने वाले दो सदस्य-डडली डिग्गेस और सर जॉन एलियट सदन के दरवाजे पर गिरफ्तार कर लिये गये। कॉमन्स अपने दो सदस्यों के गिरफ्तारी से नाराज थे, लेकिन लगभग एक सप्ताह तक हिरासत में रहने के बाद दोनों रिहा कर दिये गये।12 जून 1626 को कॉमन्स ने बकिंघम पर हमला तेज कर दिया और कहा: ‘हम महामहिम और पूरी दुनिया के सामने विरोध करते हैं कि जब तक इस महान् व्यक्ति को राज्य के महान् मामलों में दखल देने से नहीं हटाया जाता है, हम किसी अच्छे की उम्मीद नहीं कर सकते हैं।’ किंतु चार्ल्स ने बकिंघम को बर्खास्त करने से इनकार कर दिया और संसद को बर्खास्त कर दिया। इस प्रकार दूसरी संसद फरवरी, 1626 से जून, 1626 तक ही कार्य कर सकी।

तृतीय संसद

चार्ल्स प्रथम ने 1626 के बाद आगामी दो वर्षों तक संसद नहीं बुलाई और धन प्राप्त करने के लिए अन्य तरीकों का प्रयोग किया। उसने संसद की अनुमति के बिना भी टनेज एवं पाउंडेज कर कठोरतापूर्वक वसूल किया। चार्ल्स ने राजस्व बढ़ाने के लिए संसद को बिना बुलाये ‘डिस्ट्रेंट ऑफ नाइटहुड’ नामक एक पुराने कानून को फिर से लागू किया, जो एक शताब्दी से अधिक समय से स्थगित था। इस पुराने क़ानून के आधार पर चार्ल्स ने उन लोगों पर जुर्माना लगाया जो 1626 में उनके राज्याभिषेक में शामिल नहीं हो सके थे। उसने ऋण लेना भी प्रारंभ कर दिया और जब कुछ पादरियों ने ऋण देने से इनकार किया, तो चार्ल्स ने उन्हें बंदी बना लिया। न्यायाधीशों ने भी चार्ल्स का साथ दिया।

चार्ल्स प्रथम ने ‘शिपमनी’ नामक कर भी लगाया और तट पर रहने वालों के साथ-साथ अन्य स्थानों पर रहने वाले लोगों से भी वसूल किया। इसके पहले शिपमनी केवल युद्धों के दौरान और केवल तटीय क्षेत्रों पर ही लागू किया जाता था। चार्ल्स ने तर्क दिया कि शांतिकाल और पूरे राज्य में रक्षा के लिए कर एकत्र करने पर कोई कानूनी रोक नहीं थी। इसके अतिरिक्त, चार्ल्स प्रथम ने काउंटीज में एक सेना बनाई और सैनिकों को साधारण जनता के घरों में रखा, जिससे जनता को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा। सैनिकों की सुविधा के लिए उसने सैनिक कानून (मैरटियल लॉ) भी लागू किया।

सभी उचित-अनुचित साधनों का प्रयोग करने के बाद भी चार्ल्स की आर्थिक समस्या दूर नहीं हुई। अंततः विवश होकर उसे 1628 में पुनः संसद का अधिवेशन बुलाना पड़ा। चार्ल्स ने इस संसद के समक्ष अपने प्रथम भाषण में कठोरता का परिचय दिया। उसने कहा: ‘यदि संसद ने उसकी आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया, तो वह उन समस्त तरीकों का प्रयोग करेगा, जो ईश्वर ने उसे प्रदान किया है। यह धमकी नहीं है क्योंकि मैं बराबर वालों के अतिरिक्त किसी अन्य को धमकी देना अपना अपमान समझता हूँ।’

अधिकार-पत्र (पिटीशन ऑफ राइट)

संसद को चार्ल्स का यह व्यवहार पसंद नहीं आया। इसके अतिरिक्त, संसद ने देखा कि चार्ल्स प्रथम के दरबार में अनेक उच्च पदों पर आर्मीनियन नियुक्त हैं, जो कैथोलिक थे और जिनसे प्यूरिटन घृणा करते थे। जनता भी आर्मीनियनों की नियुक्ति का विरोधी थी। अब संसद ने पिम के नेतृत्व में राजा का विरोध करना शुरू कर दिया। संसद ने एक अधिकार-पत्र (पिटीशन ऑफ राइट) राजा को दिया और निर्णय लिया कि जब तक राजा इस अधिकार-पत्र को स्वीकार नहीं कर लेता, वे राजा को एक पेनी धन भी स्वीकृत नहीं करेंगे। इस अधिकार-पत्र में माँग की गई थी कि-

  1. शांति काल में सैनिक कानून न लगाया जाये।
  2. समस्त कर अथवा ऋण जो संसद की अनुमति के बिना लिये गये हैं, अवैध हैं।
  3. राजा किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाये बंदी न बनाये।
  4. सेना के सिपाहियों के रखने की व्यवस्था राजा साधारण जनता के घरों में नहीं, अपितु कहीं अन्यत्र की जाए।

चार्ल्स ने प्रारंभ में इस अधिकार-पत्र को स्वीकार नहीं किया, किंतु जब उसने देखा कि संसद उसे तब तक धन नहीं देगी, जब तक वह इसे स्वीकार नहीं करेगा, तो विवश होकर उसने इस अधिकार-पत्र को स्वीकार कर लिया। यद्यपि भविष्य में चार्ल्स ने इस अधिकार-पत्र की धाराओं का उल्लंघन किया, फिर भी, इंग्लैंड के इतिहास में इसका अत्यधिक महत्व है क्योंकि राजा जॉन द्वितीय के महास्वतंत्रता पत्र के बाद संसद और जनता के अधिकारों की रक्षा इसी अधिकार-पत्र से हो सकी। इसने जनता तथा संसद को अपने अधिकारों में वृद्धि करने का प्रोत्साहन दिया और राजा की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाया।

अधिकार-पत्र को स्वीकार करने के बाद भी संसद चार्ल्स से प्रसन्न नहीं हुई। अब संसद ने चार्ल्स के मंत्री बकिंघम और उसके दरबार में आर्मीनियनों की उपस्थिति को लेकर विरोध करना शुरू किया। संसद के इस व्यवहार से चार्ल्स क्षुब्ध हो गया कि वह संसद को जितने अधिकार देता जा रहा है, संसद की माँगे भी उतनी ही बढ़ती जा रही हैं। इसी समय 23 अगस्त 1628 को जॉन फाल्टन नामक एक व्यक्ति ने बकिंघम की हत्या कर दी, जिससे चार्ल्स को बहुत दुःख हुआ। चार्ल्स दो दिनों तक अपने कमरे में विलाप करता रहा। इसके विपरीत, बकिंघम की मृत्यु पर जनता ने खुशियाँ मनाईं, जिससे अदालत और राष्ट्र के बीच तथा राजा और संसद के बीच की खाई को और बढ़ गई।

चार्ल्स को लगता था कि बकिंघम के कारण ही संसद उसका विरोध करती है और उसकी मृत्यु के बाद संबंधों में सुधार होगा, किंतु बकिंघम की मृत्यु से चार्ल्स और संसद के बीच संघर्ष समाप्त नहीं हुआ, क्योंकि संसद ने अब वेंटवर्थ का विरोध करना प्रारंभ कर दिया। वेंटवर्थ प्रारंभ में संसद का नेता था और चार्ल्स का विरोधी था, किंतु राजा द्वारा अधिकार-पत्र स्वीकार किये जाने के बाद वह राजा का समर्थक हो गया था। राजा का समर्थक हो जाने के कारण संसद उसका विरोध करती थी।

चार्ल्स प्रथम ने संसद की निरंतर विरोध करने की नीति से तंग आकर मार्च, 1629 में तीसरी संसद को भी भंग कर दिया, किंतु भंग होने से पूर्व संसद के अध्यक्ष को बलपूर्वक रोककर तीन प्रस्ताव पारित किये गये- धार्मिक नियमों में परिवर्तन करने वाला, संसद द्वारा अस्वीकृत करों को देने वाला और राजा को टनेज तथा पाउंडेज कर लगाने में सहायता देने वाला देशद्रोही माना जायेगा। तीसरी संसद का यह अंतिम कार्य था क्योंकि इसके बाद संसद भंग हो गई और संसद के नेता सर जॉन ईलियट को बंदी बना लिया गया, जहाँ उसकी मृत्यु हो गई।

चार्ल्स प्रथम एवं संसद के बीच संघर्ष के गंभीर परिणाम सामने आये। इंग्लैंड की आंतरिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई और विदेशों में भी इंग्लैंड के सम्मान को भारी आघात पहुँचा, जिससे विदेशी व्यापार में भी कमी आई।

शक्तिशाली सेना तैयार करने के उद्देश्य से चार्ल्स प्रथम ने 1640 में लघु संसद आमंत्रित की, जिसने 13 अप्रैल 1640 से 5 मई 1640 तक कार्य किया। इस संसद ने भी उसे अपेक्षित धन नहीं दिया, इसलिए इस संसद को भी शीघ्र ही भंग कर दिया गया।

दीर्घ संसद

चार्ल्स प्रथम की अदूरदर्शिता के कारण इंग्लैंड और स्कॉटलैंड में युद्ध हुआ, जिसमें चार्ल्स प्रथम को अत्यधिक अपमान सहना पड़ा। स्पिन की संधि के द्वारा चार्ल्स ने 850 पौंड प्रतिदिन स्कॉटिश सेना को देना स्वीकार किया, जिससे उसकी आर्थिक आवश्यकताएँ और बढ़ गईं। इसी अशांति की पृष्ठभूमि में चार्ल्स को 1640 के मध्य में दिवालियेपन का सामना करना पड़ा और उसे कोई भी ऋण देने को तैयार नहीं था। इस संकट से निपटने के लिए चार्ल्स ने जुलाई में लंदन के टॉवर के टकसाल में रखे 130,000 डालर मूल्य के चाँदी के बुलियन को जब्त कर लिया और इसके मालिकों को बाद में 8 प्रतिशत ब्याज के साथ वापसी का वादा किया, जिससे स्थिति और भी गंभीर हो गई।

चार्ल्स ने मजबूर होकर संसदीय सहमति के बिना ऋण के माध्यम से युद्ध के लिए धन जुटाने की कोशिश करके अशांति को और भड़का दिया। अगस्त में, ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा ऋण देने से इनकार करने के बाद लॉर्ड कॉटिंग्टन ने कंपनी के काली मिर्च और मसालों के स्टॉक को जब्त कर लिया और इसे 60,000 (बाजार मूल्य से बहुत कम) डॉलर में बेच दिया और वादा किया कि बाद में ब्याज सहित पैसे वापस कर दिये जायेंगे।

आर्थिक संकट से निपटने के लिए चार्ल्स प्रथम ने विवश होकर 3 नवंबर 1640 को पुनः संसद को आमंत्रित किया। इस संसद ने लगभग 20 वर्षों तक कार्य किया, इसलिए इसे ‘दीर्घ संसद’ के नाम से जाना जाता है। दीर्घ संसद का प्रमुख उद्देश्य सांविधानिक समस्या को स्थायी रूप से हल करना और राजा और संसद के संबंधों की स्पष्ट रूपरेखा तैयार करना था। इस दीर्घ संसद में अधिकांश सदस्य ग्रामीण, उग्र प्रोटेस्टेंट और एंग्लिकन थे, किंतु आरंभ में सबने मिलकर कार्य किया। इस संसद का नेतृत्व पिम ने किया। हैम्पडन भी एक प्रसिद्ध नेता था, जिसने शिपमनी का घोर विरोध किया था। इसके अतिरिक्त, एक अन्य प्रसिद्ध नेता ओलीवर क्रामवेल था, जो प्रारंभ में गंभीर एवं शांत-चित्त व्यक्ति था, किंतु कुछ समय बाद अत्यंत उग्र हो गया।

दीर्घ संसद के कार्य

दीर्घकालीन संसद ने सर्वप्रथम स्कॉटलैंड की सेना को आवश्यक धन देकर संतुष्ट किया। इसके बाद इस संसद ने अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए अनेक नियम पारित किये, जिनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण ‘त्रिवर्षीय अधिनियम’ (ट्रेनियल ऐक्ट) था। इस नियम के द्वारा राजा को बाध्य किया गया कि वह प्रत्येक तीन वर्ष बाद संसद का अधिवेशन अवश्य आमंत्रित करेगा। यदि राजा ऐसा नहीं करेगा, तो स्वतः संसद का चुनाव हो जायेगा। इस संसद ने यह भी निर्णय लिया कि संसद को राजा स्वेच्छा से भंग नहीं कर सकेगा। संसद भंग करने के लिए संसद से परामर्श करना आवश्यक होगा।

यद्यपि राजा इस नियम को पारित नहीं करना चाहता था, क्योंकि ऐसा करने से उसकी शक्तियों पर आघात होता था, किंतु चार्ल्स ने विवश होकर इसे फरवरी 1641 में स्वीकार कर लिया। व्यापारी तभी राजा ऋण देने को तैयार होते, जब उन्हें विश्वास हो कि संसद भंग नहीं होगी। राजा पर उन्हें भरोसा नहीं था। चार्ल्स प्रथम को धन की आवश्यकता थी, इसलिए वह विवश था। संसद ने राजा द्वारा टनेज और पाउंडेज कर लगाया जाना भी अनुचित घोषित कर दिया और बलपूर्वक ऋण अथवा उपहार लेने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। शिपमनी कर भी समाप्त कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, इस संसद ने विशेष न्यायालयों- कोर्ट ऑफ स्टार चेंबर, कौंसिल ऑफ नॉर्थ तथा कोर्ट ऑफ हाई कमीशन को समाप्त कर दिया और हैम्पडन तथा डारनेल के मुकदमों में न्यायाधीशों के निर्णय को रद्द कर दिया। इस प्रकार संसद ने राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगाने का प्रयास किया। इस दीर्घकालीन संसद की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि यही थी क्योंकि भविष्य में यही इंग्लैंड के संविधान के स्वरूप की आधारशिला बनी।

वेंटवर्थ (स्टैफोर्ड) तथा संसद

अपनी स्थिति को सुदृढ करने के बाद संसद ने 3 नवंबर 1640 को राजा के सलाहकारों पर उच्च राजद्रोह के लिए महाभियोग लगाने की कार्यवाही शुरू कर दी। वेंटवर्थ को चार्ल्स ने आयरलैंड का डिप्टी लॉर्ड बनाया था और ‘अर्ल ऑफ स्टैफोर्ड’ की उपाधि दी थी। 10 नवंबर को स्ट्रैफ़ोर्ड को हिरासत में ले लिया गया और लौड पर 18 दिसंबर को महाभियोग चलाया गया। चार्ल्स ने विलियम लौड को 1633 में कैंटरबरी का आर्कबिशप नियुक्त किया था। संसद जानती थी कि स्टैफोर्ड की सलाह से शिपमनी कर तथा अनेक अन्य कर लगाये गये थे, किंतु उसके विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं था। स्टैफोर्ड पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया, किंतु वह प्रमाणित न हो सका। आयरलैंड के शासन के विषय में भी स्टैफोर्ड का घोर विरोध हुआ। उस पर आरोप लगाया गया कि उसने राजा को सलाह दिया था कि वह आयरलैंड की सेना का प्रयोग करके इंग्लैंड की जनता को भयाक्रांत करे। इस आरोप को भी संसद प्रमाणित नहीं कर सकी।

जब संसद स्टैफोर्ड को दंडित नहीं कर सकी, तो उसने महाभियोग का विचार त्यागकर सीधे मृत्युदंड अर्थात् बिना सुनवाई के सजा दिये जाने का रास्ता अपनाया। संसद ने ‘बिल ऑफ अटैंडर’ पारित किया, जिसका आशय था कि स्टैफोर्ड अपराधी है, इसलिए उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए। राजा इस पर हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं था, किंतु उसके राजप्रासाद को क्रुद्ध जनसमूह ने घेर लिया और उसकी रानी पर अभियोग चलाने की माँग करने लगी। चार्ल्स ने विवश होकर बिशपों, न्यायाधीशों और स्वयं वेंटवर्थ (स्टैफोर्ड) की सलाह पर बिल पर हस्ताक्षर कर दिया और 12 मई, 1641 को स्टैफोर्ड को मृत्युदंड की सजा दी गई। इस दंड में निश्चित रूप से प्रतिशोध की भावना विद्यमान थी और जनता में इसकी प्रतिक्रिया भी हुई। लौड को बंदीगृह में डाल दिया गया और बाद में, 1645 में उसे भी मृत्युदंड दे दिया गया।

धार्मिक मतभेद

यद्यपि संसद ने चार्ल्स प्रथम की निरंकुशता एवं स्वेच्छाचारिता पर रोक लगाकर उसके शासन के दोषों को समाप्त करने में सफलता प्राप्त कर ली थी, किंतु धार्मिक विषय पर स्वयं संसद में ही मतभेद था क्योंकि संसद में एंग्लिकन, प्रेस्बीटेरियन, प्यूरिटन आदि विभिन्न मतों के अनुयायी थे। अतः चर्च में सुधार करना कठिन कार्य था। संसद में 1641 में ही ‘रूट और ब्रांच बिल’ रखा गया, जिसका उद्देश्य तत्कालीन चर्च में आमूल परिवर्तन करना और गिरजाघरों से बिशपों को निष्कासित करना था। इस बिल का एडवर्ड हाइड (लॉर्ड क्लेरेंडन के नाम से प्रसिद्ध) और लॉर्ड फॉकलैंड ने घोर विरोध किया और वह अत्यंत अल्प बहुमत से पारित हो सका। संसद में इस बिल के समर्थक एवं विरोधी लगभग समान थे। इस गंभीर वातावरण में संसद की सभा कुछ समय के लिए स्थगित कर दी गई।

आयरलैंड में विद्रोह

आयरलैंड में अक्टूबर, 1641 में विद्रोह हो गया और आयरिश कैथोलिकों ने लगभग पाँच हजार प्रोटेस्टेंटों की हत्या कर दी। इंग्लैंड में जनता के सामने इस घटना का अतिरंजित वर्णन प्रस्तुत किया गया। विद्रोहियों का कहना था कि वे राजा के कहने पर ऐसा कर रहे हैं। राजा के विरोधियों ने इस बात को सही माना। अब संसद के समक्ष यह प्रश्न पैदा हो गया कि इस विद्रोह का दमन करने के लिए राजा पर विश्वास किया जाए या नहीं। इस विषय पर संसद में गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गया।

महान् विरोध-पत्र

संसद ने 1641 में एक महान् विरोध-पत्र तैयार किया, जिसमें चार्ल्स प्रथम द्वारा किये गये अत्याचारों और अनियमितताओं का लेखा-जोखा था। संसद के अधिवेशन में इसे पिम ने प्रस्तुत किया। यह राजा के प्रति स्पष्ट रूप से अविश्वास था। इसके अतिरिक्त, इसमें एक सुधार योजना भी थी। इसमें प्रस्ताव किया गया कि लोकसभा द्वारा अनुमोदित मंत्रियों को ही रखा जाये और धार्मिक परिवर्तन के लिए प्रेस्बीटेरियन पादरियों की एक सभा की व्यवस्था की जाए। इस प्रकार की व्यवस्था कार्यान्वित होने पर राजा पद की प्रतिष्ठा धूल-धूसरित हो जाती और पादरियों का पद भी निंदनीय हो जाता।

इस महान् विरोध-पत्र को लेकर संसद में दो गुट हो गये- एक गुट का नेतृत्व पिम और हैम्पडन ने किया जो राजा का विरोधी था, दूसरे गुट का नेतृत्व हाइड तथा फॉकलैंड ने किया जो राजा के समर्थन में थे। दोनों दलों में दीर्घकालीन वाद-विवाद हुआ और अंत में पिम तथा हैम्पडन ग्यारह मतों से जीत गये। इस कानून की प्रतिलिपियाँ जनता में बाँटी गईं, जिससे जनता में भी दो दल बनने लगे और गृहयुद्ध का आभास होने लगा।

इसी समय राजा के विरोधी दल ने एक ‘सेना विधेयक’ प्रस्तुत किया, जिसका उद्देश्य राजा के हाथों से जल एवं थल सेना का आधिपत्य छीनकर संसद द्वारा नियुक्त अधिकारियों को सौंपना था, किंतु राजा ने इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। रैम्जे म्योर के अनुसार, ‘इस प्रकार का प्रयास एक सांविधानिक क्रांति थी।’

चार्ल्स को 4 जनवरी, 1642 को पता चला कि संसद उसकी रानी पर अभियोग लगाने जा रही है। फलतः चार्ल्स 400 सैनिकों के साथ संसद के पाँच सदस्यों- पिम, हैम्पडन, हैज़लेरिंग, हौल्डा और स्ट्रोड को बंदी बनाने के लिए संसद भवन पहुँच गया। चार्ल्स इन सदस्यों को बंदी बनाकर इन पर महाभियोग लगाना चाहता था, किंतु पाँचों सदस्य पहले ही वहाँ से जा चुकेे थे। गिरफ्तारी का यह विफल प्रयास चार्ल्स के लिए राजनीतिक रूप से विनाशकारी सिद्ध हुआ। किसी भी अंग्रेज शासक ने कभी भी हाउस ऑफ कॉमन्स में प्रवेश नहीं किया था। सदन के सदस्यों को गिरफ्तार करने के लिए उसके अभूतपूर्व आक्रमण को संसदीय विशेषाधिकार का घोर उल्लंघन माना गया। राजा के इस कार्य से सांसदोें को लगा कि उन्हें किसी भी समय बंदी बनाया जा सकता है। अब जनता की भावनाओं ने भी उग्र रूप लेना प्रारंभ कर दिया। अतः चार्ल्स जनवरी, 1642 में लंदन छोड़कर नौटिंघम भाग गया और उसकी रानी फ्रांस चली गई। इस समय संसद ने ‘उन्नीस प्रस्ताव’ पारित किये, जिनमें राजा से प्रार्थना की गई थी कि वह वैधानिक रूप से शासन करे। इस वैधानिक रूप को उन्नीस प्रस्तावों के द्वारा चिन्हित किया गया था, किंतु इन प्रस्तावों से वह नाममात्र का राजा रह जाता। अतः चार्ल्स ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और इस प्रकार गृहयुद्ध होना निश्चित हो गया।

दीर्घकालीन संसद द्वारा किये गये कार्यों का इंग्लैंड के इतिहास में विशेष महत्व है क्योंकि इसके द्वारा यह स्पष्ट हो गया कि मंत्री, संसद के प्रति उत्तरदायी होंगे। लोकसभा देश की आर्थिक व्यवस्था का प्रबंध करेगी और कानून एवं न्यायालय ही देश की सर्वाेच्च संस्थाएँ होंगी। सम्राट् की स्वेच्छाचारिता समाप्त हो गई और वह पूर्ण रूप से संसद के नियंत्रण में आ गया। यद्यपि राजा के हाथों में अभी भी पर्याप्त शक्ति थी, किंतु अब वह मनमानी नहीं कर सकता था क्योंकि उस पर संसद का नियंत्रण हो गया था। अब देश में संसद सर्वाेच्च प्रशासक संस्था बन गई।

1642 में इंग्लैंड में गृहयुद्ध प्रारंभ हो गया। यह गृहयुद्ध एक धार्मिक और राजनीतिक संघर्ष था। धर्म की आड़ में राजनीतिक और वैधानिक स्वतंत्रता का युद्ध लड़ा जा रहा था। मूल प्रश्न संप्रभुता की शक्ति का था। संघर्ष इस बात पर था कि संप्रभुता राजा के हाथों में रहे या राजा व संसद के हाथों में सम्मिलित रूप से रहे। युद्ध में संसद और प्यूरिटन दल एक साथ हो गये और उसका नेतृत्व पिम तथा हैम्पडन ने किया। कैथोलिक लोग, लॉर्ड सभा के तीन-चौथाई सदस्य और कॉमन सभा के एक चौथाई सदस्य चार्ल्स प्रथम के समर्थक थे। चार्ल्स प्रथम के समर्थक कैवेलियर्स तथा संसद के समर्थक राउंडहैड्स के नाम से जाने जाते थे।

अंग्रेजी गृहयुद्ध दो चरणों में हुआ- प्रथम चरण 1642 से 1646 ई. तक चला, जब स्कॉटलैंड ने संसद का पक्ष लिया। इस चरण में राजा पराजित हुआ, किंतु संसद राजा से समझौता करके सीमित राजतंत्र को स्थापित करना चाहती थी। दूसरा चरण 1646 से 1649 तक चला। इस चरण में चार्ल्स प्रथम ने संसद से वार्ता की आड़ मंे स्कॉटलैंड और विदेशों से सहायता प्राप्त करने का प्रयत्न किया। संसद की सेना ने स्कॉटलैंड की सेना को पराजित किया।

गृहयुद्ध समाप्त होने के बाद चार्ल्स प्रथम पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। 20 जनवरी 1649 को वेस्टमिंस्टर हॉल में शुरू हुए उच्च राजद्रोह और ‘अन्य उच्च अपराधों’ के आरोप में केवल 68 सांसद चार्ल्स के मुकदमे में शामिल हुए। जॉन ब्रैडशॉ ने अदालत के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया और अभियोजन पक्ष का नेतृत्व सॉलिसिटर जनरल जॉन कुक ने किया।

चार्ल्स पर देश की भलाई के बजाय अपने व्यक्तिगत हित के लिए शक्ति का दुरुपयोग करके इंग्लैंड के खिलाफ राजद्रोह का आरोप लगाया गया। अदालत ने इसके विपरीत संप्रभु उन्मुक्ति के सिद्धांत को चुनौती दी और तर्क दिया कि ‘इंग्लैंड का राजा एक व्यक्ति नहीं था, बल्कि एक कार्यालय था जिसके प्रत्येक अधिवासी को देश के कानूनों के अनुसार और उसके अनुसार शासन करने की एक सीमित शक्ति सौंपी गई थी।’ अंततः 30 से अधिक गवाहों को सुनने के बाद 26 जनवरी को उनचास आयुक्तों ने चार्ल्स की मृत्यु वारंट पर हस्ताक्षर किये और 30 जनवरी 1649 को अपराह्न लगभग 2.00 बजे चार्ल्स को फाँसी दे दी गई।

चार्ल्स को वेस्टमिंस्टर एब्बे में दफनाने की अनुमति नहीं मिली, तो उसके शरीर को 7 फरवरी की रात में विंडसर ले जाया गया और उसे 9 फरवरी 1649 को विंडसर कैसल में हेनरी अष्टमत और उसकी तीसरी पत्नी जेन सीमोर के साथ दफना दिया गया।

राजतंत्र को उखाड़ फेंकने के साथ इंग्लैंड एक गणतंत्र या ‘राष्ट्रमंडल’ बन गया। रम्प कॉमन्स ने हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स को समाप्त कर दिया और कार्यकारी शक्ति एक राज्य परिषद द्वारा ग्रहण की गई। ब्रिटेन और आयरलैंड में सभी महत्वपूर्ण सैन्य-विरोध तीसरे अंग्रेजी नागरिक युद्ध में आलिवर क्रॉमवेल की सेना और आयरलैंड की क्रॉमवेलियन विजय द्वारा समाप्त हो गये थे। क्रॉमवेल ने 1653 में रम्प पार्लियामेंट को भंग कर दिया और स्वयं को लॉर्ड प्रोटेक्टर के रूप में प्रोटेक्टोरेट स्थापित किया। 1658 में उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र रिचर्ड को कुछ समय के लिए उसका उत्तराधिकारी बनाया गया, किंतु इसके बाद इंग्लैंड में राजतंत्र की पुनर्स्थापना हो गई।

यद्यपि चार्ल्स अपने पिता की तुलना में अधिक शांत और प्रौढ़ था, किंतु वह हठी था। उसंने जानबूझकर अलोकप्रिय नीतियों का अनुसरण किया और स्वयं को बर्बाद कर दिया। चार्ल्स और जेम्स दोनों ही राजा के दैवीय अधिकार के समर्थक थे, किंतु पूर्ण विशेषाधिकार से संबंधित जेम्स की महत्वाकांक्षाएँ अपनी प्रजा के साथ समझौते और आम सहमति से संयमित थीं, जबकि चार्ल्स का मानना था कि उन्हें समझौता करने या अपने कार्यों की व्याख्या करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। उसने सोचा था कि वह ‘अपने कार्यों का हिसाब देने के लिए केवल भगवान के प्रति उत्तरदायी था, जनता के लिए नहीं’।

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