एलिजाबेथ प्रथम (Elizabeth I, 1558–1603)

एलिजाबेथ प्रथम

इंग्लैंड की क्रूर शासिका मेरी ट्यूडर की मृत्यु (17 नवंबर, 1558) के कुछ ही समय बाद पच्चीस वर्षीय एलिजाबेथ का राजतिलक किया गया। इसके बाद शहर में भ्रमण के दौरान नागरिकों ने उसका भव्य स्वागत किया, कट्टर प्रोटेस्टेंटों के लिए यह बडी जीत थी। एलिज़ाबेथ ने भी अपनी प्रजा से बहुत स्नेह भरा व्यवहार किया। अगले दिन 15 जनवरी, 1559 को वेस्टमिंस्टर ऐबे में एलिज़ाबेथ को कार्लिस्ले के कैथोलिक पादरी ओवेन ओग्लेथोर्प के द्वारा राजमुकुट पहनाया गया और रानी घोषित किया गया। खून के आधार पर एलिजाबेथ का इंग्लैंड के सिंहासन पर सर्वाधिक अधिकार था और उसके पश्चात् स्कॉटलैंड की रानी मेरी का अधिकार था। हेनरी अष्टम की वसीयत, जिसे तत्कालीन संसद ने स्वीकार किया था, के आधार पर बिना किसी वाद-विवाद के एलिजाबेथ इंग्लैंड की महारानी बनी।

एलिजाबेथ प्रथम (Elizabeth I, 1558–1603)
एलिजाबेथ प्रथम (1558–1603)

एलिजाबेथ प्रथम एक योग्य, दूरदर्शी, साहसी तथा दृढ़ निश्चय वाली महिला थी। अपने मधुर स्वभाव, देशभक्ति एवं प्रजावत्सलता से वह जनता का हृदय जीतने में सफल हुई। उसने एक बार संसद में कहा था: ‘संसार की कोई वस्तु इस सूर्य के नीचे मुझे इतनी प्रिय नहीं है, जितनी प्रिय मुझे अपनी प्रजा की भलाई एवं प्रेम है।’ अपने देश के हित के लिए उसने विवाह तक नहीं किया। जब उसकी संसद ने उससे विवाह करने का अनुमोदन किया, तो उसने कहा था: हाँ, तुम्हारे संतोष के लिए मैं पहले ही विवाह कर चुकी हूँ, मेरा पति इंग्लैंड का साम्राज्य है और तुम सभी तथा जितने भी अंग्रेज हैं, वे सब मेरे बच्चे तथा रिश्तेदार हैं।’ वास्तव में वह स्पष्ट विचारोंवाली, दूरदर्शी, योग्य, शक्तिशाली एवं साहसी महिला थी। जहाँ एक ओर वह अपने पिता की तरह साहसी और कूटनीतिज्ञ थी, वहीं दूसरी ओर अपनी माँ की तरह चंचल भी थी।

एलिजाबेथ प्रथम का प्रारंभिक जीवन अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में व्यतीत हुआ था। जब जब एलिज़ाबेथ दो साल आठ माह की थी, तब उसके पिता हेनरी के आदेश से उसकी माँ ऐन बोलेन को 19 मई 1536 को मृत्युदंड दे दिया गया था और उसको अवैध संतान घोषित कर उसके उत्तराधिकार को गलत बताया गया था। उसने अब तक का जीवन अकेलेपन में व्यतीत किया था और उसे हर कदम सँभाल-सँभल कर रखना पड़ा था। कई बार मृत्यु उसके निकट दिखाई दी थी, विशेषकर मेरी ट्यूडर के शासनकाल में तो उसे बंदी भी बना लिया गया था। इसलिए एलिजाबेथ ने अपनी अपनी बुद्धि पर विश्वास करना, वाणी में संयम रखना और ओठों पर हँसी बनाये रखने का अभ्यास कर लिया था। वह साहस के साथ घटनाओं की प्रतीक्षा करना और आत्मरक्षा के लिए छल का प्रयोग करना भी सीख गई थी। बाद में यही गुण उसके लिए लाभकारी सिद्ध हुए। यद्यपि वह एक स्त्री थी, किंतु प्रशासन के संबंध में कमजोर नहीं थी।

एलिजाबेथ प्रथम में बहुत से अच्छे गुण थे, किंतु वह चरित्रवान नहीं थी। उसके विषय में अनेक प्रेम-कथाएँ प्रचलित हैं और डडले, वाल्टर रेले उसके प्रेमी बताये गये हैं। उसकी नीतियाँ व्यक्तिगत स्वार्थ और उपयोगिता पर आधारित थीं। वह अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए कोई भी कार्य कर सकती थी और बिना झिझके झूठ बोल सकती थी। अपने तमाम व्यक्तिगत दोषों के बावजूद वह इंग्लैंड की जनता का विश्वास जीतने और एक सुदृढ़ प्रशासन स्थापित करने में सफल रही, क्योंकि वह इंग्लैंड की शक्ति एवं एकता का मुख्य स्रोत थी।

एलिजाबेथ ने अपने पूर्वजों की तरह सशक्त राजतंत्र, कौंसिल द्वारा शासन और स्वतंत्र वैदेशिक नीति के सिद्धांतों का अनुसरण किया। इसलिए उसने पार्लियामेंट की बैठकें कम बुलाईं। फ्रांस और स्पेन के राजाओं को विवाह का लालच देते हुए उसने उनको सदैव धोखे में रखा। फ्रांस और स्कॉटलैंड के संयुक्त आक्रमण के भय से वह हमेशा सतर्क रहती थी। स्कॉटलैंड की रूपवती रानी मेरी के विरुद्ध भी षड्यंत्रों में वह शामिल रही। जब मेरी स्कॉटलैंड से भागकर इंग्लैंड आई, तो उसे बेदी बना लिया और अंत में प्राणदंड दे दिया।

एलिजाबेथ प्रथम की गृहनीति

इंग्लैंड के राजसिंहासन पर आसीन होने के बाद एलिजाबेथ प्रथम ने अनुभव किया कि देश के समक्ष अनेक समस्याएँ हैं, जिनका समाधान करना अत्यंत आवश्यक है। वास्तव में मेरी ट्यूडर और उसकी अत्याचारपूर्ण नीति के कारण इंग्लैंड की सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक स्थिति अव्यवस्थित हो चुकी थी। उसनेअपनी दूरदर्शिता और सूझबूझ से इंग्लैंड में शांति और व्यवस्था स्थापित कर देश को उन्नति के पथ पर अग्रसर किया, जिससे देश में सुख, शांति और समृद्धि आई। यही कारण है कि एलिजाबेथ के शासनकाल को इंग्लैंड के इतिहास में ‘स्वर्णयुग’ के नाम से जाना जाता है।

एलिजाबेथ प्रथम और प्यूरिटन

देश को धर्मिक वाद-विाद से बचाने के लिए एलिजाबेथ ने मध्यम मार्ग का सहारा लिया और अपने पिता के समय की धार्मिक व्यवस्था को पुनर्प्रचलित किया। उसने इंग्लैंड को पोप के प्रभाव से मुक्त रखने के लिए ‘सर्वोच्चता का नियम’ पारित करवाया। इस अधिनियम से पोप का प्रभाव इंग्लैंड से समाप्त हो गया और एलिजाबेथ चर्च की सर्वोच्च अधिकारी हो गई।

कैथोलिकों को प्रसन्न करने के लिए एलिजाबेथ प्रथम ने चर्च के प्रधान के स्थान पर ‘चर्च की शासिका’ की उपाधि धारण की। उसने एडवर्डकालीन ‘द्वितीय प्रार्थना पुस्तक’ में कैथालिकों को चुभने वाली धाराएँ भी निकाल दी और रविवार को प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रार्थना करना अनिवार्य कर दिया। ऐसा न करने वाले को प्रति रविवार एक शिलिंग दंड देना पड़ता था।

किंतु इंग्लैंड के प्यूरिटन (उग्रवादी प्रोटेस्टेंट) एलिजाबेथ की उदार धार्मिक नीति से संतुष्ट नहीं थे और कैथोलिकों का कठोरतापूर्वक दमन चाहते थे। इस समय प्यूरिटन धार्मिक मामलों के अतिरिक्त राजनीति में भी हस्तक्षेप करने लगे थे। इनका विचार था कि धर्म मनुष्य का व्यक्तिगत विषय है, इसमें राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। प्यूरिटन राजनीतिक स्वतंत्रता की भी माँग करने लगे थे।

प्यूरिटनों का मानना था कि एलिजाबेथ प्रथम ने जो धार्मिक सुधार किये हैं, वे ईसाई धर्म के विरोधी हैं। इसके अतिरिक्त पादरियों की नियुक्ति को लेकर भी प्यूरिटन असंतुष्ट थे। उनकी माँग थी कि गिरजाघरों के अधिकारी सरकारी व्यक्ति न नियुक्त किये जाये और न ही सरकार उन्हें कोई आर्थिक सहायता दे। गिरजाघर के पदाधिकारी जनता द्वारा नियुक्त किये जायें और दान आदि से अपनी जीविका चलायें। प्यूरिटन चाहते थे कि गिरजाघरों में मूर्ति या चित्रपूजा न किया जाये क्योंकि यह कैथोलिक पद्धति थी। प्यूरिटन पादरियों के विवाह करने के भी विरोधी थे क्योंकि उनका मानना था कि पादरियों को सांसारिक जीवन से दूर रहना चाहिए।

प्यूरिटनों को इंग्लैंड के शक्तिशाली सरदारों का समर्थन प्राप्त था। मध्य वर्ग में भी इनकी संख्या बहुत बढ़ गई थी, जिसके कारण संसद और प्रिवी कौंसिल में भी इनका प्रभाव था। थॉमस कार्टराइट नामक कैंब्रिज का प्रोफेसर अपने लेखों द्वारा प्यूरिटन वर्ग के विचारों का प्रसार तथा एंग्लिकन चर्च की बुराई करता था।

एलिजाबेथ प्रथम को लगता था कि प्यूरिटन एंग्लिकन चर्च के लिए कैथोलिकों के समान ही खतरनाक हो सकते हैं। उसने देखा कि प्यूरिटन पादरी प्रार्थना में नियमों का पालन नहीं करते हैं। अतः उसने कैंटबरी के आर्क बिशप के द्वारा नियमों का पालन करने का आदेश दिया। जिन पादरियों ने इस आदेश का पालन नहीं किया, उन्हें उनके पद से हटा दिया गया। प्रोफेसर कार्टराइट भी अपने पद से हटा दिये गये। वह बंदी बनाये जाने के भय से इंग्लैंड से भाग गया। एलिजाबेथ ने प्यूरिटनों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करते हुए अनेक प्यूरिटनों को बंदी बना लिया। एलिजाबेथ का उद्देश्य रक्तपात करना नहीं था, किंतु देश और एंग्लिकन चर्च की सुरक्षा के लिए उसे विवष होकर कठोर नीति का पालन करना पड़ा और इस प्रकार उसने दोनों ही संप्रदायों को संरक्षण प्रदान किया।

सामाजिक सुधार

एलिज़ाबेथ प्रथम अपनी जनता को सुखी और समृद्ध बनाना चाहती थी। वह जानती थी कि देश में फैली अव्यवस्था के अलावा, जनता की गरीबी और भिक्षावृत्ति का प्रमुख कारण बेरोजगारी थी। यद्यपि सोलहवीं शताब्दी में इंग्लैंड में भिक्षावृत्ति पर प्रतिबंध लगाने के लिए अनेक नियम पारित किये गये थे, किंतु वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सके थे। इस दिशा में एलिजाबेथ ने सबसे पहले नियम पारित कर सड़कों पर भिक्षा माँगने पर प्रतिबंध लगा दिया और जिनके पास जीविकोपार्जन के साधन नहीं थे, उनके लिए दरिद्रालय (पुअर हॉउसेज) की व्यवस्था की। अपंगों अथवा अपाहिजों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था की गई और काम कर सकने वालों को काम दिया गया। उसने 1601 में एक दरिद्र संरक्षण अधिनियम (पुअर लॉ) पारित करके न्यायाधिपतियों (जस्टिस ऑफ पीसेज) को दरिद्रालय के प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंप दी। इन दरिद्रालयों का व्यय वहन करने के लिए जनता से थोड़ा-सा कर लिया गया। इस प्रकार एलिजाबेथ ने भिक्षुओं की समस्या को शीघ्र ही दूर कर दिया।

एलिजाबेथ प्रथम के शासनकाल के समय में सड़कों की दशा दयनीय थी और मार्ग में लुटेरों का भय बना रहता था। सरायों की दशा भी शोचनीय थी और अधिकांश जनता गंदे घरों में रहती थी, जिनमें हवा और प्रकाश की समुचित व्यवस्था नहीं थी। नगरों में भी गंदगी का अंबार था, जिसके कारण अकसर प्लेग जैसी भयंकर बीमारियाँ फैलती रहती थीं। यद्यपि एलिजाबेथ इस समस्या का पूर्ण रूप समाधान नहीं कर सकी, फिर भी उसने इंग्लैंड में विशाल एवं भव्य भवनों का निर्माण करवाया, नगरों की सफाई का प्रबंध किया और मकानों में रोशनदान व खिड़कियों की व्यवस्था करवाई। नगरों में बाग और वृक्ष लगवाये गये, जिससे पर्यावरण के साथ-साथ जनता की रुचि में भी परिवर्तन आया। इस प्रकार इंग्लैंड का समाज उन्नति के पथ पर अग्रसर हुआ।

आर्थिक स्थिति एवं व्यापार

एलिजाबेथ प्रथम के शासनकाल से पूर्व इंग्लैंड की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। हेनरी अष्टम ने युद्धों एवं दरबार पर व्यय के लिए विभिन्न तरीकों से धन अर्जित किया था। उसने मुद्रा में मिलावट करके उसका मूल्य गिरा दिया था, जिससे देश का व्यापार चौपट हो गया था। मेरी के शासनकाल में भी स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था।

एलिजाबेथ प्रथम ने शांतिप्रिय नीति अपनाते हुए काफी घन संचित किया, जिससे उसे संसद पर निर्भर न रहना पड़े। उसके शासनकाल में व्यापार में असाधारण प्रगति हुई और समुद्री लुटेरों द्वारा स्पेन के जहाजों की लूट के कारण इंग्लैंड की आर्थिक स्थिति में भी सुधार हुआ।

एलिजाबेथ प्रथम ने देश की व्यापारिक उन्नति के लिए अपने कुशल मंत्री विलियम सीसिल (लॉथ बलीं) को लगाया, जो एक कुशल अर्थशास्त्री और परिश्रमी व्यक्ति था। विलियम सीसिल ने 1563 में शिल्पकार अधिनियम पारित करवाया, जिसके द्वारा श्रमिक श्रेणियों के सभी अलग-अलग विनियमों को समाप्त कर सभी उद्योगों की रोजगार-संबंधी शर्तों और स्थितियों को नियमित किया गया। अब गाँवों और कस्बों में एक ही नियम-कानून लागू किये गये। यह आदेश दिया गया कि सभी स्वस्थ व्यक्तियों को खेत-मजदूर के रूप में कार्य करना होगा। इससे उन्हीं लोगों को छूट दी जाती थी, जो किसी अन्य शिल्प में कार्य करते थे। इस शिल्पकार अधिनियम के द्वारा देश की संपूर्ण श्रमशक्ति को संगठित करने का प्रयत्न किया गया। अब शिल्पियों के लिए सात वर्ष का प्रशिक्षण अनिवार्य कर दिया गया और मजदूरी की दरें निर्धारित करने का कार्य न्यायाधिपतियों को दे दिया गया।

सीसिल के प्रयासों से इंग्लैंड के उद्योग, नौ-परिवहन तथा व्यापार में भी असाधारण प्रगति हुई। विदेशों से भागकर आये हुए शिल्पकारों को भी सीसिल ने संरक्षण दिया और कपड़ा, काँच, कागज, बर्तन तथा चीनी साफ करने के लिए जर्मनी से खनिज मँगाये गये। सीसिल ने इंग्लैंड की इमारती लकड़ी के साधनों के उपयोग तथा युद्ध-सामग्री, विशेषकर बारूद एवं तोप की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया। संभवतः सीसिल के प्रयासों का ही परिणाम था कि इंग्लैंड स्पेन के जहाजी बेड़े को परास्त करने में सफल हो सका।

व्यापार और व्यवसाय की उन्नति से इंग्लैंड में कल-कारखानों की संख्या में वृद्धि हुई। इसी समय नये प्रदेशों की खोज हुई और अपने देश में निर्मित सामानों को नये देशों तक पहुँचाने के लिए साधनों की आवश्यकता हुई। इस दिशा में काम करते हुए सीसिल ने जहाज निर्माण के कारखानों को आर्थिक सहायता प्रदान की। 1578 में बाल्टिक प्रदेशों से व्यापार करने के उद्देश्य से सर्वप्रथम ‘दि ईस्टलैंड कंपनी’ की स्थापना की गई। इस व्यापार से होने वाले मुनाफे को देखकर 1581 में पूर्वी मेडिटेरियन प्रदेशों में व्यापार करने के लिए ‘लेवांट कंपनी’ की स्थापना की गई। इन कंपनियों से इंग्लैंड को बहुत लाभ हुआ। 1600 ई. में ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ नामक एक अन्य कंपनी की स्थापना की गई, जिसने न केवल भारत से व्यापार किया, बल्कि कुछ समय बाद भारत पर अधिकार भी कर लिया। इस प्रकार, धीरे-धीरे इंग्लैंड ने व्यापारिक क्षेत्र में असीमित प्रगति की और इंग्लैंड में समृद्धि एवं संतुष्टि आई।

साहित्य एवं संगीत

एलिजाबेथ प्रथम की साहित्य एवं संगीत में भी रुचि थी। उसके काल में अंग्रेजी साहित्य की बड़ी उन्नति हुई, विशेषकर कविता एवं नाटकों के क्षेत्र में, जिसके कारण एलिजाबेथ का शासनकाल ‘गाने वाले पक्षियों का घोसला’ कहा जाने लगा था। चॉसर के बाद अब तक इंग्लैंड में कोई महत्वपूर्ण कवि नहीं हुआ था, किंतु 1579 और उसके बाद के वर्षों में, विशेषकर 1588 के बाद इंग्लैंड में अनेक साहित्यकारों और कवियों का उदय हुआ, जिन्होंने इंग्लैंड को संगीतमय बना दिया।

कविता के क्षेत्र में सर्वप्रथम रचना एडमंड स्पेंसर की ‘शेफर्ड्स कैलेंडर’ थी। नार्थ द्वारा ‘प्लूटार्क की जीवनी’ का अनुवाद किया गया। ‘यूफ्यूसेज’ लिखकर लिली ने गद्य की एक नवीन शैली को जन्म दिया। गीत-काव्य लेखक सर फिलिप सिडनी की रचनाओं- ‘आर्केडिया’ तथा ‘डिफेंस ऑफ पाएजी’ ने अंग्रेजी साहित्य के सुसंस्कृत और सच्चे स्वरूप को जन्म दिया।

प्रसिद्ध नाटककार शेक्सपीयर भी एलिजाबेथ युग की ही देन है। उससे पूर्व अंग्रेजी नाटककार बरविज तथा ग्रीनपील लॉज अपना साहित्यिक जीवन आरंभ कर चुके थे। शेक्सपीयर ने अपना साहित्यक जीवन सुखांत नाटक ‘लब्स लेबर लॉस्ट’ की रचना करके आरंभ किया था। एलिजाबेथ की मृत्यु से पहले ‘हेमलेट’ नाटक का अभिनय हो चुका था। 1590 और 1600 के बीच ‘डेटन’ तथा ‘डेनियल’ के गीतकाव्यों की रचना हो चुकी थी। 1598 ई. में बेन जॉनसन की रचना ‘एवरी मैन इन हिज ह्यूमर’ प्रकाशित हुई।

गद्य लेखकों में 1508 में हुकर की अमरकृति ‘एक्लेशियास्टिकल पॉलिटी’ लिखी गई। बेकन की सुस्पष्ट प्रज्ञा का परिचय 1597 में प्रकाशित उसके निबंधों में मिला। इस प्रकार एलिजाबेथ युग में अंग्रेजी भाषा का साहित्य किसी भी देश के साहित्य से कम वैभवपूर्ण नहीं था।

एलिजाबेथ प्रथम की वैदेशिक नीति

एलिजाबेथ प्रथम के सिंहासनारोहण के समय इंग्लैंड पर विपत्ति के बादल मँडरा रहे थे। देश की आंतरिक एवं बाह्य स्थिति शोचनीय थी। एक ओर देश में प्रोटेस्टेंटों और कैथोलिकों के बीच संघर्ष चल रहा था, तो दूसरी ओर स्कॉटलैंड, स्पेन तथा फ्रांस, इंग्लैंड पर अधिकार करने का सपना देख रहे थे। इन विपरीत परिस्थितियों में एलिजाबेथ ने अपनी योग्यता, बुद्धिमत्ता और प्रशासनिक क्षमता द्वारा न केवल समस्त संकटों पर विजय प्राप्त किया, बल्कि इंग्लैंड के सम्मान को उन्नति की चरम सीमा तक पहुँचा दिया।

देश में शांति स्थापित करने के साथ-साथ एलिजाबेथ प्रथम ने अपनी दूरदर्शिता से इंग्लैंड के तीनों शक्तिशाली शत्रुओं- स्कॉटलैंड, स्पेन तथा फ्रांस का भिन्न-भिन्न तरीकों से सामना करने का निश्चय किया। स्कॉटलैंड की रानी मेरी स्कॉट, हेनरी सप्तम की पुत्री मार्गरेट की पौत्री होने के कारण स्वयं को इंग्लैंड के सिंहासन की अधिकारिणी मानती थी। मेरी स्कॉट का विवाह फ्रांस के राजकुमार से होने के कारण वह भी स्वयं को इंग्लैंड का भावी शासक मानता था। इसके अतिरिक्त स्पेन, जिसके राजा से मेरी ट्यूडर का विवाह हुआ था, इंग्लैंड पर अपना अधिकार समझता था। स्पेन प्रोटेस्टेंट धर्म विरोधी आंदोलन का नेता होने के कारण भी एलिजाबेथ को पदच्युत् करना चाहता था। उधर पोप ने भी एलिजाबेथ को वैध शासिका नहीं स्वीकार किया था।

एलिजाबेथ प्रथम ने स्पेन और फ्रांस के राजाओं को यह आशा दिलाई कि वह उनसे विवाह कर लेगी। स्पेन तथा फ्रांस के परस्पर शत्रु होने से एलिजाबेथ को अत्यधिक सहायता मिली। उन्हें इंग्लैंड के समर्थन की आवश्यकता थी, इसलिए वे प्रत्यक्ष रूप से एलिजाबेथ को अप्रसन्न नहीं करना चाहते थे। एलिजाबेथ ने कूटनीति से काम लेते हुए स्पेन और फ्रांस में विद्रोहियों को गुप्त रूप से सहायता देकर आंतरिक विद्रोह की अग्नि को भड़काया और उन्हें अपनी आंतरिक समस्याओं को सुलझाने में व्यस्त कर दिया। उसने स्कॉटलैंड में भी विद्रोहियों की सहायता की, जिससे वहाँ प्रोटेस्टेंट धर्म की विजय हुई और स्कॉटलैंड के संकट को समाप्त कर दिया।

एलिजाबेथ, हेनरी सप्तम के समान शांतिप्रिय वैदेशिक नीति का पक्षधर थी। उसकी शांतिप्रियता का एक कारण उसका खाली खजाना और निर्बल सेना थी। एडवर्ड षष्ठ और मेरी ट्यूडर के शासनकाल में खजाना खाली हो गया था। इसलिए ऐसी परिस्थितियों में किसी भी देश से युद्ध करने में इंग्लैंड के सम्मान को चोट लग सकती थी। इतिहासकार रीज के अनुसार, ‘उसका उद्देश्य था कि वह देखे कि धार्मिक समझौता देश में जड़ जमाने में कितना समय लेता है, क्योंकि वह अपने देशवासियों को सिखाना चाहती थी कि वे पहले अंग्रेज हैं और बाद में कैथोलिक, जिससे यदि युद्ध करना ही पड़े तो वे उसका सामना संगठित होकर करें।

स्कॉटलैंड से संबंध

एलिजाबेथ प्रथम की समकालीन स्कॉटलैंड की शासिका जेम्स पंचम की पुत्री मेरी (1542-1587) थी। मेरी स्वयं को इंग्लैंड की उत्तराधिकारिणी समझती थी, अतः एलिजाबेथ के स्कॉटलैंड से संबंध खराब होना स्वाभाविक था। मेरी स्कॉट कैथोलिक धर्म की अनुयायी थी, अतः उसे समस्त कैथोलिक देशों का समर्थन प्राप्त था। इंग्लैंड की कैथोलिक जनता की सद्भावना भी मेरी के साथ ही थी। मेरी का विवाह फ्रांस के राजा फ्रांसिस से हुआ था, अतः एलिजाबेथ को स्कॉटलैंड के प्रति नीति निर्धारित करने में अत्यंत सावधानी से कार्य करना पड़ा।

एलिजाबेथ प्रथम ने इस समय फ्रांस एवं स्पेन की पारस्परिक शत्रुता से लाभ उठाया। वह जानती थी कि स्पेन कभी भी यह पसंद नहीं करेगा कि इंग्लैंड, फ्रांस व स्कॉटलैंड मिलकर एक हो जायें, जो मेरी के इंग्लैंड की शासिका बनने पर संभव हो जाता। एलिजाबेथ ने स्पेन के शासक फिलिप को यह भी लालच दिया कि वह उससे विवाह कर लेगी। अतः फिलिप इंग्लैंड का समर्थक हो गया। एलिजाबेथ को स्कॉटलैंड के प्रोटेस्टेंट वर्ग का भी समर्थन प्राप्त था।

एलिजाबेथ प्रथम जिस समय इंग्लैंड की शासिका बनी थी, उस समय स्कॉटलैंड में प्रोटेस्टेंटों और कैथोलिकों में संघर्ष चल रहा था। कैथोलिकों की सहायता फ्रांस का शासक फ्रांसिस भी कर रहा था, अतः एलिजाबेथ ने प्रोटेस्टेंटों की सहायता की और उन्हें विजय दिलाई। 1560 में फ्रांसिस की मृत्यु होने से स्कॉटलैंड में कैथोलिकों व मेरी की स्थिति और भी खराब हो गई। मेरी के अनेक विवाहों के कारण हुई बदनामी और प्रोटेस्टेंटों द्वारा उसके विरुद्ध विद्रोह के कारण उसे स्कॉटलैंड से भागना पड़ा। मेरी भागकर इंग्लैंड आई और एलिजावेथ से सहायता माँगी, किंतु एलिजाबेथ ने उसे बंदी बना लिया। मेरी के स्कॉटलैंड से भाग जाने पर वहाँ प्रोटेस्टेंट धर्म की स्थापना हो गई, इसलिए एलिजाबेथ को स्कॉटलैंड से किसी प्रकार का भय न रहा।

स्पेन से संबंध

जिस समय एलिजाबेथ प्रथम इंग्लैंड की शासिका बनी, उस समय इंग्लैंड और स्पेन दोनों का फ्रांस के शासक फ्रांसिस से तनावपूर्ण संबंध था। इसके अतिरिक्त, एलिजाबेथ भी स्पेन के शासक को उससे विवाह कर लेने का लालच देकर स्पेन से मधुर संबंध बनाये हुई थी।

एलिजाबेथ प्रथम (Elizabeth I, 1558–1603)
स्पेनी आर्मडा

1560 में फ्रांसिस (मेरी स्कॉट का पति) की मृत्यु हो जाने पर स्पेन को इस बात का भय नहीं रहा कि यदि मेरी स्कॉट इंग्लैंड की शासिका बन गई तो फ्रांस, इंग्लैंड व स्कॉटलैंड मिल जायेंगे। इसलिए उसने एलिजाबेथ के विरोधियों को सहायता देना प्रारंभ कर दिया। फिर भी, जब तक मेरी स्कॉट को मृत्युदंड (1587) नहीं दिया गया, स्पेन, इंग्लैंड पर आक्रमण करने का साहस नहीं कर सका। 1587 में एलिजाबेथ द्वारा मेरी स्कॉट को मृत्युदंड दिये जाने के कुछ समय बाद ही स्पेन ने 1588 में इंग्लैंड पर आक्रमण किया, किंतु इंग्लैंड ने स्पेन के जहाजी बेडे (अर्माडा) को परास्त कर दिया।

फ्रांस से संबंध

एलिजाबेथ प्रथम के शासनकाल में फ्रांस से इंग्लैंड के संबंध अच्छे नहीं थे क्योंकि इंग्लैंड का प्रोटेस्टेंट धर्म का और फ्रांस कैथोलिक धर्म का समर्थक था। इसके अतिरिक्त, कैले को लेकर भी दोनों देशों में संबंध तनावपूर्ण थे। कैले फ्रांस में स्थित था। प्रारंभ में इस पर इग्लैंड का अधिकार था, किंतु बाद में फ्रांस ने इस पर अधिकार कर लिया था। एलिजाबेथ कैले पर पुनः अधिकार करना चाहती थी।

इंग्लैंड को प्रारंभ में स्पेन की भी सहानुभूति प्राप्त थी, किंतु कुछ समय पश्चात् स्पेन व फ्रांस में मित्रता हो गई। इस मित्रता का कारण स्पेन के शासक फिलिप का फ्रांस की राजकुमारी से विवाह करना था। फ्रांस और स्पेन की मित्रता से एलिजाबेथ का चिंतित होना स्वाभाविक था। अंततः उसने फ्रांस से चाटुकैंब्रेसीज की संधि कर ली, जिसके द्वारा दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आक्रमण न करने वादा किया।

फ्रांस में भी प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक वर्ग में संघर्ष चल रहा था। प्रोटेस्टेंट इंग्लैंड से सहायता चाहते थे। इंग्लैंड ने उन्हें सहायता देने का वचन दिया, किंतु कुछ समय पश्चात् ही यह संघर्ष समाप्त हो गया। इसी समय रिफोल्डी नामक व्यक्ति ने स्पेन की सहायता से इंग्लैंड में एलिजाबेथ के विरुद्ध विद्रोह करने का प्रयास किया। इससे इंग्लैंड और स्पेन के संबंध और भी तनावपूर्ण हो गये। फ्रांस भी स्पेन की बढती हुई शक्ति से भयभीत था। इसलिए इंग्लैंड और फ्रांस ने 1572 में ‘ब्लोइस की संधि’ कर ली। इस संधि के द्वारा फ्रांस ने इंग्लैंड की स्कॉटलैंड के प्रति नीति का समर्थन किया, जबकि एलिजाबेथ ने कैले पर फ्रांस के अधिकार को स्वीकार कर लिया।

1574 में हेनरी तृतीय फ्रांस का सम्राट बना। एलिजाबेथ ने उसे भी विवाह का प्रलोभन देकर फ्रांस से मधुर संबंध बनाये रखने का प्रयत्न किया।

आयरलैंड से संबंध

आयरलैंड प्रारंभ से ही इंग्लैंड के लिए एक समस्या रहा है। एलिजाबेथ प्रथम से पूर्व भी ट्यूडर शासकों ने आयरलैंड की समस्या सुलझाने का प्रयत्न किया, किंतु यह समस्या और भी जटिल होती गई। मेरी ट्यूडर ने अपने जमींदारों को आयरलैंड में बसाया और उनका राष्ट्रीयकरण करने का प्रयास किया, किंतु वह समस्या का समाधान करने में असफल रही। मेरी ट्यूडर के शासनकाल (1553-1588) में पोप के अधिकारों के इंग्लैंड में पुनर्स्थापित हो जाने से आयरलैंड भी पूर्णत कैथोलिक हो गया था।

एलिजाबेथ प्रथम के शासनकाल में इंग्लैंड में पुनः प्रोटेस्टेंट धर्म प्रधान हो गया, किंतु आयरलैंड के निवासी कैथोलिक धर्म छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। आयरलैंड की जनता पर एलिजाबेथ के धार्मिक समझौते का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वह स्पेन का समर्थन करक एलिजाबेथ के विरुद्ध षड्यंत्र करना प्रारंभ कर दिया।

आयरलैंड के मारिस नामक एक सरदार ने पोप से सहायता से 1575 में इंग्लैंड के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, किंतु एलिजाबेथ ने इन विद्रोहों का दमन कर दिया। मारिस ने 1579 में मंसटर प्रदेश में पुनः विद्रोह किया। इस बार एलिजाबेथ ने अत्यंत कठोरतापूर्वक विद्रोह को कुचल दिया और अनेक जमींदारों की भूमि पर अधिकार कर लिया। इसी समय आयरलैंड में अकाल पड़ गया, जिससे आयरिश जनता को भयानक कष्ट उठाने पड़े। इस विद्रोह और अकाल के कारण हजारों लोग अकाल काल के गाल में समा गये।

इतने संकटों के बाद भी आयरलैंड की जनता कैथोलिक धर्म को त्यागने के लिए तैयार नहीं थी। एलिजाबेथ जानती थी कि जब तक आयरलैंड में कैथोलिक धर्म जीवित है, विद्रोह की आग शांत नहीं होगी, क्योंकि स्पेन और फ्रांस आयरलैंड को भड़काते रहेंगे। स्पेन के जहाजी बेड़े को भी आयरिशों ने गुप्त रूप से सहायता दी थी। इसी समय आयरलैंड में दो नेताओं ओ‘नील और ओ‘डोनल ने स्पेन की सहायता से आयरलैंड में इंग्लैंड के विरुद्ध विद्रोह किया। स्पेन ने आयरलैंड की सहायता के लिए 1597 में दूसरा जहाजी बेड़ा भेजा, किंतु वह भी समुद्री तूफान से नष्ट हो गया। 1598 में स्पेन के शासक फिलिप की मृत्यु होने से आयरिशों को अत्यंत निराशा हुई। एलिजाबेथ ने इस विद्रोह के दमन के लिए 1599 में लॉर्ड एसेक्स को आयरलैंड भेजा, किंतु कुछ स्थानों पर सफलता प्राप्त करने के बाद वह असफल होकर इंग्लैंड लौट आया। एलिजाबेथ ने लॉर्ड एसेक्स के स्थान पर माउंट ज्वाय को नियुक्त किया, जिसने अत्यंत क्रूरता और अत्याचारपूर्ण ढंग से विद्रोह का दमन किया। यद्यपि माउंट ज्वाय ने विद्रोह का दमन कर दिया, किंतु एलिजाबेथ द्वारा कराये गये अत्याचार को आयरलैंड के निवासी भुला नहीं सके।

औपनिवेशिक विस्तार

एलिजाबेथ प्रथम के शासनकाल में अनेक नाविकों ने अपनी साहसिक यात्राओं द्वारा इंग्लैंड को लाभ पहुँचाया। इन साहसी नाविकों में से एक वाल्टर रैले ने अमरीका में अनेक उपनिवेश स्थापित किये और एलिजाबेथ के नाम पर वर्जीनिया नामक नगर की स्थापना की।. वाल्टर रेले अमरीका से आलू तथा तंबाकू के बीज लाया और आयरलैंड में इनकी खेती आरंभ की।

एक अन्य नाविक हॉकिंस ने दासों का व्यापार प्रारंभ किया। उसने अफ्रीका के हब्शियों को अमरीका में बेचा। इसके अतिरिक्त, उसने न्यूफाउंडलैंड की खोज की और उसे इंग्लैंड के उपनिवेश के रूप में बसाया। ड्रेक ने तीन वर्षों में संपूर्ण विश्व की परिक्रमा की। इन उपनिवेशों से इग्लैंड को बहुत लाभ हुआ। एलिजाबेथ ने इन नाविकों को पर्याप्त प्रदान की और 1600 में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना कर साम्राज्यवाद को प्रोत्साहित किया।

इस प्रकार ऐलिजाबेथ प्रथम अपनी कुशल वैदेशिक नीति के परिणामस्वरूप अपने उद्देश्यों को पूर्ण करने में सफल रही। इंग्लैंड को अब स्पेन, फ्रांस तथा स्कॉटलैंड किसी का भी भय नहीं रहा। उसने अपने प्रयासों के फलस्वरूप न केवल इंग्लैंड का सम्मान बढ़ाया, बल्कि स्पेनी जहाजी बेड़े को पराजित कर इंग्लैंड को ‘समुद्र की रानी’ बना दिया। अब इंग्लैंड की गिनती यूरोप के शक्तिशाली राष्ट्रों में होने लगी। वास्तव में एलिजाबेथ की वैदेशिक नीति की सफलता, विस्तृत, आर्थिक तथा व्यावसायिक समृद्धि और राज्य की धार्मिक सहिष्णुता की नीति ने इंग्लैंड को जहाँ एक नये समाज का ढाँचा दिया, वहीं उसे राजनीतिक स्थिरता भी प्रदान की।

एलिजाबेथ प्रथम का मूल्यांकन

इंग्लैंड के इतिहास में एलिजाबेथ प्रथम का शासनकाल अत्यंत गौरवशाली और महत्वपूर्ण है। वह एक चतुर राजनीतिज्ञ, देशभक्त, प्रजावत्सल शासिका थी। उसने अपनी बुद्धिमता और दूरदर्शिता से देश में फैली अशांति एवं धार्मिक अराजकता को समाप्त किया और अपने योग्य मंत्रियों के परामर्श से देश को शक्तिशाली एवं वैभवशाली बनाया। उसके शासनकाल में देश में न केवल शांति और समृद्धि आई, बल्कि कला-कौशल, साहित्य और उद्योग-धंधों का भी विकास किया। उसके शासनकाल में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आश्चर्यजनक रूप से प्रगति हुई, जिसके कारण उसके काल को इंग्लैंड के इतिहास में ‘स्वर्णकाल’ माना जाता है।

एलिजाबेथ प्रथम को अपनी वैदेशिक नीति में भी पर्याप्त सफलता मिली, किंतु इसके लिए उसे अपूर्व त्याग करना पड़ा। देश की शांति और स्थिरता के लिए उसने आजीवन विवाह नहीं किया। अपने दीर्घकालीन शासन (1558-1603) में वह इंग्लैंड के सम्मान एवं प्रतिष्ठा को उन्नति की चरम सीमा तक पहुँचाने में सफल रही। स्पेन के शक्तिशाली जहाजी बेड़े को पराजित करके उसने दिखा दिया कि इंग्लैंड की नौ-सेना विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना थी।

1603 में एलिजाबेथ प्रथम की मृत्यु हो गई, जबकि वह प्रतिष्ठा के उच्चतम शिखर पर थी। सिंहासनारूढ होते समय आपत्तिग्रस्त और विभक्त राष्ट्र उसे मिला था, मरते समय उसने एकता-संपन्न विजयी राष्ट्र छोड़ा। 1601 में एलिजाबेथ प्रथम ने संसद के समक्ष कहा था, ‘मैं इसे गर्व की बात समझती हूँ कि मैंने आपके स्नेह से शासन किया है।’

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