अशोक के उत्तराधिकारी
अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य की दशा
अशोक महान की मृत्यु के पश्चात् मौर्य साम्राज्य का तीव्र पतन प्रारंभ हो गया। अशोक जैसे शक्तिशाली और चक्रवर्ती सम्राट के निधन के बाद उनके उत्तराधिकारियों में न तो वह कुशलता थी और न ही वह प्रशासनिक दूरदर्शिता जिसने मौर्य साम्राज्य को भारतीय इतिहास का सबसे विशाल साम्राज्य बनाया था। यह काल मौर्य साम्राज्य के अवसान और विघटन का था, जिसमें लगभग पचास वर्षों के भीतर ही यह विशाल साम्राज्य समाप्त हो गया। इस अवधि में अशोक के विभिन्न पुत्रों और पौत्रों के बीच सत्ता संघर्ष, प्रांतों का अलग होना और केन्द्रीय सत्ता का कमज़ोर पड़ना प्रमुख घटनाएँ थीं।
अशोक के बाद के उत्तराधिकारियों के विषय में ऐतिहासिक जानकारी अपेक्षाकृत सीमित और कभी-कभी विरोधाभासी है। विभिन्न स्रोतों- पुराणों, बौद्ध व जैन ग्रंथों, ग्रीक-रोमन विवरणों और अभिलेखीय साक्ष्यों में उल्लिखित नामों, शासनकालों और घटनाओं में पर्याप्त विविधता मिलती है। इस स्रोत-विविधता के बावजूद एक बात स्पष्ट है कि अशोक की मृत्यु के साथ ही मौर्य साम्राज्य का विघटनकारी दौर प्रारंभ हो गया था।
अशोक के पुत्र: विविध साक्ष्यों में उल्लेख
तीवर: अभिलेखों में वर्णित पुत्र
अभिलेखीय साक्ष्यों से पता चलता है कि अशोक के कई पुत्र थे, किंतु उनमें से मात्र एक का नाम ही स्पष्ट रूप से अभिलेखों में उपलब्ध है। रूम्मिनदेई स्तंभलेख तथा निग्लीवा स्तंभलेख में राजकुमार तीवर और उसकी माता कारुवाकी का उल्लेख मिलता है। तीवर की माता कारुवाकी अशोक की द्वितीय पट्टरानी (रानी) थीं। यद्यपि ऐतिहासिक विश्लेषण से संकेत मिलता है कि तीवर कभी मगध के राजसिंहासन पर नहीं बैठा। संभवतः उसकी मृत्यु अपने पिता के जीवनकाल में ही हो गई थी या फिर उसने किसी कारणवश राजसिंहासन की उत्तराधिकार क्रम में भाग नहीं लिया।
महेंद्र: श्रीलंका गया बौद्ध धर्म प्रचारक
बौद्ध साहित्य में महेंद्र का नाम अशोक के पुत्र के रूप में उल्लिखित है। महावंश तथा दीपवंश जैसे श्रीलंकाई बौद्ध ग्रंथों में वर्णित है कि सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका भेजा था। महेंद्र ने ही श्रीलंका के राजा देवनाम्पिय तिस्स को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था। श्रीलंकाई परंपरा के अनुसार महेंद्र एक भिक्खु था और उसने संघ में प्रवेश ले लिया था। बौद्ध धर्मानुयायी होने के कारण संभवतः महेंद्र ने राजकार्य में रुचि नहीं ली और उसने राजसिंहासन के उत्तराधिकार का दावा नहीं किया।
अन्य पुत्रों के प्रमाण
यूनानी स्रोतों में अशोक के पुत्र के रूप में सुसीम का उल्लेख मिलता है, जिसकी मृत्यु राजसिंहासन के लिए हुए संघर्ष में हुई थी, परंतु इसकी पुष्टि अन्य स्रोतों से नहीं होती है। तारानाथ की परंपरा में वीरसेन का उल्लेख अशोक के पुत्र के रूप में है, जो गांधार का स्वतंत्र शासक था। राजतरंगिणी के अनुसार जालौक कश्मीर का स्वतंत्र शासक था। वास्तव में अशोक की मृत्यु के बाद ही मौर्य साम्राज्य का विघटन शुरू हो गया था और विभिन्न प्रांत स्वतंत्र होने लगे थे।
विभिन्न पुराणों तथा बौद्ध और तिब्बती परंपराओं के मौर्य शासक
विभिन्न पुराणों तथा बौद्ध और तिब्बती परंपराओं के ग्रंथों में सम्राट अशोक के बाद के मौर्य शासकों की अलग-अलग सूचियाँ मिलती हैं। इन सूचियों में नामों और उनके क्रम में पर्याप्त भिन्नता दिखाई देती है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई और विभिन्न क्षेत्रों में मौर्य शासकों की अलग-अलग शाखाओं ने शासन किया। इसलिए किसी एक स्रोत की सूची को अशोक के बाद के सभी शासकों की निश्चित और सर्वमान्य सूची मानना उचित नहीं है।
वायु पुराण में अशोक के बाद कुणाल, बंधुपालित, इंद्रपालित, देववर्मन, शतधनुष और बृहद्रथ के नाम मिलते हैं। विष्णु पुराण में सुयशस, दशरथ, संगत, शालिशुक, सोमशर्मन और बृहद्रथ का उल्लेख है। मत्स्य पुराण की सूची में दशरथ, संप्रति, शतधनु और बृहद्रथ के नाम आते हैं। भागवत पुराण में सुयश, संगत, शालिशुक, सोमशर्मा, शतधन्वा और बृहद्रथ का क्रम मिलता है। बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान में संप्रति, बृहस्पति, वृषसेन, पुण्यधर्मन और पुष्यमित्र के नाम मिलते हैं। कलियुगराजवृत्तांत में सुपार्श्व, बंधुपालित, इंद्रपालित, संगत, शालिशुक, देववर्मा, शतधनु और बृहद्रथ का उल्लेख है, जबकि तिब्बती इतिहासकार तारानाथ की परंपरा में कुणाल, विगताशोक और वीरसेन के नाम मिलते हैं।
इन विभिन्न परंपराओं की व्याख्या करते हुए कुछ इतिहासकारों ने शासकों के नामों की पहचान करने का प्रयास किया है। एच. सी. रायचौधरी का अनुमान है कि विष्णु और भागवत पुराणों में उल्लिखित सुयशस संभवतः कुणाल का ही दूसरा नाम या उपाधि हो सकता है। बौद्ध परंपरा में कुणाल को धर्मविवर्धन नाम से भी जोड़ा जाता है, यद्यपि इन समानताओं को पूर्णतः निश्चित ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता है।
अशोक के अन्य पुत्रों के संबंध में भी विभिन्न परंपराओं में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। जालौक को कश्मीर से तथा वीरसेन को गांधार से जोड़ने वाली परंपराएँ मिलती हैं। इन स्रोतों में मौजूद भिन्नताओं से संकेत मिलता है कि अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य की राजनीतिक एकता कमजोर हो गई थी और संभवतः विभिन्न क्षेत्रों में मौर्य परिवार की अलग-अलग शाखाओं का प्रभाव स्थापित हुआ था। अतः अशोक के उत्तराधिकारियों की सूची निर्धारित करते समय पुराणों, बौद्ध ग्रंथों, तिब्बती परंपराओं तथा अभिलेखीय साक्ष्यों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
कुणाल
पुराणों के अनुसार अशोक के बाद कुणाल गद्दी पर बैठा। कुणाल की कहानी दिव्यावदान और अन्य बौद्ध स्रोतों में विस्तार से वर्णित है। परंपरा के अनुसार वह अंधा था। किंवदंती है कि अशोक की एक रानी तिष्यरक्षिता (कुछ स्रोतों में तिष्य) ने कुणाल की आँखें निकलवा दी थीं क्योंकि वह उसे अपने पुत्र के लिए खतरा मानती थी।
जैन और बौद्ध ग्रंथों के अनुसार कुणाल के अंधेपन के कारण वह स्वयं शासन-कार्य में असमर्थ था। इसलिए शासन की वास्तविक बागडोर उसके पुत्र संप्रति के हाथों में चली गई। यह एक अप्रत्यक्ष शासन था, जहाँ संप्रति वास्तविक शक्ति का प्रयोग करता था और कुणाल नाममात्र का सम्राट बना रहा। अनुश्रुतियों के अनुसार संप्रति ही कुणाल का वास्तविक उत्तराधिकारी था।
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि कुणाल का अंधापन एक रूपक है, जो उसकी राजनीतिक दुर्बलता या नेतृत्वहीनता का सूचक है। हो सकता है कि वह शारीरिक रूप से अंधा न हो, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से अदूरदर्शी या कमजोर शासक रहा हो, जो अपने साम्राज्य को बचाने में असमर्थ था क्योंकि उसके काल में ही मौर्य साम्राज्य के विघटन की प्रक्रिया तेज़ हुई।
दशरथ
पुराणों तथा नागार्जुनी पहाड़ियों (गया, बिहार) की गुफाओं के शिलालेखों के अनुसार दशरथ कुणाल का पुत्र था। दशरथ ने अपने दादा अशोक की भाँति ‘देवानांप्रिय’ उपाधि धारण की थी। नागार्जुनी गुफाओं के शिलालेखों में दशरथ का नाम मिलता हैं, जिनमें उसने इन गुफाओं को आजीविकों को दान में दिया था।
मत्स्य और वायु पुराण में भी दशरथ को अशोक के पौत्र के रूप में उल्लिखित किया गया है। इससे स्पष्ट है कि दशरथ और संप्रति दोनों अशोक के पौत्र तथा कुणाल के पुत्र थे।
इन प्रमाणों के आधार पर इतिहासकारों ने अनुमान है कि अशोक की मृत्यु के बाद मगध साम्राज्य दो भागों में विभक्त हो गया था। एक ओर दशरथ का अधिकार साम्राज्य के पूर्वी भाग (मगध केंद्रित) में था, जबकि संप्रति का पश्चिमी भाग (अवंति एवं मध्य भारत) में। यह विभाजन संभवतः सत्ता संघर्ष या प्रशासनिक सुविधा के कारण हुआ था।
पुराणों में दशरथ का शासनकाल आठ वर्ष बताया गया है। इस दौरान उसने पूर्वी क्षेत्रों पर शासन किया और अपने पूर्वज अशोक की धार्मिक नीतियों को आगे बढ़ाया।
संप्रति
संप्रति दशरथ के बाद भी जीवित रहा और संभवतः उसने पाटलिपुत्र पर पुनः अधिकार कर लिया। जैन साहित्य में संप्रति को वही स्थान प्राप्त है, जो बौद्ध साहित्य में अशोक को। जैन ग्रंथों में उसे ‘त्रिखंडाधिपति’ (तीनों खंडों का स्वामी) कहा गया है।
जैन परंपरा के अनुसार संप्रति मौर्य शासकों में सर्वश्रेष्ठ था और उसके काल में मौर्य साम्राज्य का विकास चरम पर पहुँच गया था। उसने जैन धर्म को राजाश्रय दिया और उसके काल में जैन धर्म का व्यापक प्रसार हुआ। पुराणों के अनुसार उसने नौ वर्ष तक शासन किया।
शालिशुक
विष्णु पुराण और गार्गी संहिता के अनुसार दशरथ और संप्रति के बाद शालिशुक मौर्य शासक हुआ। दिव्यावदान में संप्रति के पुत्र बृहस्पति का उल्लेख मिलता है। रायचौधरी शालिशुक और बृहस्पति को एक ही व्यक्ति मानते हैं।
गार्गी संहिता में शालिशुक को अत्यंत झगड़ालू और धूर्त शासक बताया गया है, जो अधार्मिक था और प्रजा पर निर्दयतापूर्वक अत्याचार करता था। यह विवरण संभवतः प्रचलित बौद्ध या जैन विरोधी भावनाओं से प्रभावित है, क्योंकि शालिशुक का शासन धार्मिक सहिष्णुता से हटकर अधिक राजकीय और कठोर रहा होगा।
देववर्मन, सोमशर्मन और शतधन्वा
इतिहासकारों का मानना है कि देववर्मन और सोमशर्मन संभवतः एक ही व्यक्ति थे। विभिन्न स्रोतों में प्रचलित नामों में समानता और अंतर के कारण यह भ्रम उत्पन्न हुआ है।
इसी प्रकार शतधनुष और शतधन्वा भी एक ही व्यक्ति के नाम प्रतीत होते हैं। संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘शतधनुष’ पुल्लिंग रूप है और ‘शतधन्वा’ विभक्ति युक्त रूप।
वृषसेन और पुण्यधर्मन
वृषसेन और पुण्यधर्मन के संबंध में अधिक जानकारी नहीं है। संभवतः ये क्षेत्रीय शासक या उपशासक थे, जिन्होंने मौर्य साम्राज्य के विघटन के दौर में अलग-अलग क्षेत्रों पर शासन किया।
बृहद्रथ: मौर्य वंश का अंतिम सम्राट
पुराणों और हर्षचरित में उल्लेख
पुराणों में ही नहीं, बल्कि बाणभट्ट रचित हर्षचरित में भी मगध के अंतिम सम्राट का नाम बृहद्रथ मिलता है। हर्षचरित के अनुसार मौर्यवंश के अंतिम सम्राट बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने सेना के सामने ही कर दी और स्वयं सिंहासन पर आरूढ़ हो गया।

इस ऐतिहासिक घटना का वर्णन हर्षचरित में इस प्रकार मिलता है: बृहद्रथ एक दुर्बल और अयोग्य शासक था। उसके काल में मौर्य साम्राज्य पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो चुका था। सेना में असंतोष व्याप्त था और प्रशासन अस्त-व्यस्त हो चुका था। बृहद्रथ का सेनापति पुष्यमित्र शुंग एक महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था। एक दिन सेना के निरीक्षण के अवसर पर पुष्यमित्र ने बृहद्रथ की हत्या कर दी। कहा जाता है कि उसने यह कार्य खुलेआम किया, जिससे सेना उसके पक्ष में आ गई। इस प्रकार मौर्य वंश का अंत हुआ और शुंग वंश की स्थापना हुई। यह घटना लगभग 185 ईसा पूर्व के आसपास मानी जाती है।


