जहाँदार शाह (Jahandar Shah)

जहाँदारशाह (Jahandar Shah)
जहाँदार शाह (1712–1713 ई.) मुख्य लेख : परवर्ती मुग़ल जहाँदार शाह का पूरा नाम अबुल […]

जहाँदार शाह (1712–1713 ई.)

मुख्य लेख : परवर्ती मुग़ल

जहाँदार शाह का पूरा नाम अबुल फ़तह मुईज़-उद-दीन मुहम्मद जहाँदार शाह साहिब-ए-किरान बादशाह-ए-जहाँ था। उनका मूल नाम मिर्ज़ा मुइज़-उद-दीन बेग मुहम्मद ख़ान था। वे बहादुर शाह प्रथम के ज्येष्ठ पुत्र थे। उन्होंने 1712 से 1713 ई. तक मुगल साम्राज्य पर शासन किया और उनका शासनकाल एक वर्ष से भी कम रहा। अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में मुगल साम्राज्य राजनीतिक पतन, उत्तराधिकार संघर्षों और गुटीय राजनीति से जूझ रहा था। जहाँदार शाह का शासन इसी संकटपूर्ण दौर का प्रतिनिधित्व करता है। जहाँदार शाह के शासनकाल में दरबारी अमीरों का प्रभाव बढ़ा और सम्राट की राजनीतिक शक्ति कमजोर हुई। राजस्व प्रशासन में भी कुछ नए प्रयोग किए गए। यद्यपि जहाँदार शाह का शासन अत्यंत अल्पकालिक था, फिर भी यह मुगल दरबार में रईसों के बढ़ते प्रभाव, केंद्रीय सत्ता के क्षरण और प्रशासनिक अव्यवस्था को समझने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इससे औरंगज़ेब के बाद मुगल साम्राज्य के क्रमिक पतन की प्रक्रिया को समझने में सहायता मिलती है।

प्रारंभिक जीवन

जहाँदार शाह का जन्म 10 मई 1661 ई. को दक्कन में हुआ था, जहाँ उस समय उनके पिता राजकुमार मुअज़्ज़म तैनात थे। उनकी माता निज़ाम बाई, फ़तेहयावर जंग की पुत्री थीं। वे मुअज़्ज़म के ज्येष्ठ पुत्र और तत्कालीन मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के ज्येष्ठ पौत्र थे। मुग़ल परंपरा के अनुसार, उनके जन्म पर शाही दरबार में भव्य उत्सव मनाया गया।

औरंगज़ेब के शासनकाल में जहाँदार शाह ने युवावस्था में दक्कन के सैन्य अभियानों में भाग लिया। 1706 ई. में उन्होंने डेरा ग़ाज़ी ख़ान क्षेत्र के विद्रोही मीरानी सरदार को पराजित कर अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया। 1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उनके पिता मुअज़्ज़म उत्तराधिकार के संघर्ष में विजयी हुए और बहादुर शाह प्रथम के नाम से सम्राट बने। इसके बाद मुईज़-उद-दीन को ‘जहाँदार शाह’ की उपाधि प्रदान की गई तथा थट्टा और मुल्तान का सूबेदार नियुक्त किया गया।

उत्तराधिकार का संघर्ष

14 मार्च 1712 ई. को बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद उनके चार पुत्रों—जहाँदार शाह, अज़ीम-उश-शान, रफ़ी-उश-शान और जहाँशाह—के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हुआ। इनमें अज़ीम-उश-शान सबसे शक्तिशाली थे, क्योंकि बंगाल के सूबेदार के रूप में उनके पास पर्याप्त आर्थिक और सैन्य संसाधन थे। इसके विपरीत, जहाँदार शाह की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर थी और वे मुख्यतः ज़ुल्फ़िकार ख़ान के समर्थन पर निर्भर थे।

ईरानी दल के प्रभावशाली अमीर और मीर बख़्शी ज़ुल्फ़िकार ख़ान ने जहाँदार शाह, रफ़ी-उश-शान और जहाँशाह के बीच गठबंधन कराया। संघर्ष में अज़ीम-उश-शान पराजित होकर मारे गए। इसके बाद जहाँदार शाह ने अपने शेष भाइयों को भी पराजित कर दिया। ज़ुल्फ़िकार ख़ान के समर्थन से वे उत्तराधिकार संघर्ष में विजयी हुए और 29 मार्च 1712 ई. को लाहौर में सम्राट बने। उन्होंने ‘शहंशाह-ए-ग़ाज़ी अबुल फ़तह मुईज़ुद्दीन जहाँदार शाह बहादुर’ की उपाधि धारण की।

जहाँदार शाह का शासन

सिंहासन पर बैठते ही जहाँदार शाह ने ज़ुल्फ़िकार ख़ान को 10,000 का मनसब और वज़ीर का पद प्रदान किया। उसके पिता असद ख़ान को 12,000 का मनसब देकर ‘वकील-ए-मुतलक’ नियुक्त किया गया तथा गुजरात की सूबेदारी सौंपी गई। ज़ुल्फ़िकार ख़ान को दक्कन की सूबेदारी भी प्रदान की गई।

जहाँदार शाह के शासनकाल में प्रशासनिक शक्ति मुख्यतः ज़ुल्फ़िकार ख़ान के हाथों में केंद्रित हो गई। समकालीन और बाद के इतिहासकारों ने जहाँदार शाह को कमजोर तथा विलासप्रिय शासक के रूप में चित्रित किया है। उनकी राजनीतिक निर्भरता के कारण वज़ीर का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया। ज़ुल्फ़िकार ख़ान ने राजपूतों, मराठों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ संबंध सुधारकर साम्राज्य में स्थिरता लाने का प्रयास किया। इस समय मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक और सैन्य स्थिति पहले ही कमजोर हो चुकी थी।

जहाँदार शाह संगीत, मनोरंजन, मदिरापान और दरबारी विलासिता में विशेष रुचि रखते थे। उन्होंने नर्तकी लालकुँवर को ‘इम्तियाज़ महल’ की उपाधि प्रदान की और उसे शाही विशेषाधिकार दिए। समकालीन लेखकों के अनुसार लालकुँवर का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि वह दरबारी मामलों में भी हस्तक्षेप करने लगी थी। खाफी ख़ाँ ने उनके शासनकाल को चारणों, गायकों, नर्तकों और नाट्यकर्मियों के लिए अनुकूल बताया है। इरादत ख़ाँ ने जहाँदार शाह की तीखी आलोचना की है। किंतु आधुनिक इतिहासकार उनके पतन के लिए केवल व्यक्तिगत विलासिता को ही उत्तरदायी नहीं मानते, बल्कि राजनीतिक कमजोरी, दरबारी गुटबाज़ी और केंद्रीय सत्ता के क्षरण को भी महत्त्वपूर्ण कारण मानते हैं।

ज़ुल्फ़िकार ख़ान की नीतियाँ

जहाँदार शाह के शासनकाल में वास्तविक प्रशासनिक शक्ति ज़ुल्फ़िकार ख़ान के हाथों में थी। उन्होंने साम्राज्य को स्थिर करने के लिए व्यावहारिक नीतियाँ अपनाईं। राजपूतों के प्रति मैत्रीपूर्ण नीति के तहत आमेर के जयसिंह को मालवा का सूबेदार नियुक्त कर ‘मिर्ज़ा राजा सवाई’ की उपाधि दी गई। मारवाड़ के अजीतसिंह को ‘महाराजा’ की उपाधि देकर गुजरात का सूबेदार बनाया गया।

मराठों के साथ समझौते के अंतर्गत दक्कन की चौथ और सरदेशमुखी उन्हें प्रदान की गई, यद्यपि इसकी वसूली मुग़ल अधिकारियों के माध्यम से की जानी थी। ज़ुल्फ़िकार ख़ान ने चूड़ामन जाट और छत्रसाल बुंदेला जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ भी मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए, जबकि बंदा बहादुर के नेतृत्व वाले सिख आंदोलन के विरुद्ध दमन की नीति जारी रखी। उन्होंने जागीरों और मनसबों के विस्तार पर नियंत्रण लगाकर साम्राज्य की वित्तीय स्थिति सुधारने का प्रयास किया।

जहाँदार शाह के शासनकाल में गैर-मुसलमानों पर लगाए जाने वाले जज़िया को समाप्त कर दिया गया। साथ ही, राजस्व वसूली की इजारा व्यवस्था को प्रोत्साहन दिया। इस व्यवस्था के अंतर्गत भूमि से राजस्व वसूलने का अधिकार नीलामी के माध्यम से ठेकेदारों को दिया जाता था। सबसे अधिक बोली लगाने वाला व्यक्ति राजस्व ठेकेदार बनता था और निर्धारित राशि राज्य को देकर अतिरिक्त वसूली को अपने लाभ के रूप में रखता था। इससे राज्य को तत्काल और निश्चित आय तो प्राप्त होती थी, किंतु ठेकेदार अधिक लाभ कमाने के लिए किसानों से मनमाना राजस्व वसूलते थे, जिसके परिणामस्वरूप कृषकों का शोषण बढ़ गया।

जहाँदार शाह के सिक्के

जहाँदार शाह ने अपने अल्पकालिक शासनकाल में सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के जारी किए। उनके सिक्कों पर शेर अर्थात् दोहे अंकित करने की परंपरा दिखाई देती है। कुछ सिक्कों पर ‘अबुल फ़तह’ और ‘साहिब-ए-क़िरान’ जैसे शब्द अंकित थे। ताँबे के सिक्के विभिन्न भार-मानों में ढाले गए थे। इन सिक्कों से स्पष्ट होता है कि राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद जहाँदार शाह ने मुग़ल शाही परंपरा और मुद्रा-व्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास किया।

फ़र्रुख़सियर का विद्रोह और जहाँदार शाह का पतन

जहाँदार शाह के शासन के आरंभ से ही उनके भतीजे फ़र्रुख़सियर ने सिंहासन पर अपना दावा प्रस्तुत किया। वह अज़ीम-उश-शान का पुत्र था और उस समय बंगाल में था। ज़ुल्फ़िकार ख़ान पर जहाँदार शाह की अत्यधिक निर्भरता, उनकी विलासप्रियता तथा लालकुँवर के बढ़ते प्रभाव ने उनकी सत्ता को कमजोर कर दिया। ज़ुल्फ़िकार ख़ान से असंतुष्ट अनेक शाही अमीर, विशेषकर सैयद बंधु-अब्दुल्ला ख़ान और हुसैन अली ख़ान जहाँदार शाह को अपदस्थ करने के उद्देश्य से फ़र्रुख़सियर के पक्ष में हो गए। दोनों पहले अज़ीम-उश-शान के समर्थक थे और बाद में फ़र्रुख़सियर के साथ जा मिले।

फ़र्रुख़सियर ने सैयद बंधुओं की सहायता से एक शक्तिशाली सेना संगठित की। 10 जनवरी 1713 ई. को आगरा के निकट सामूगढ़ के युद्ध में उसने जहाँदार शाह की सेना को पराजित कर दिया। पराजय के बाद जहाँदार शाह दिल्ली पहुँचे और ज़ुल्फ़िकार ख़ान के पिता असद ख़ान के यहाँ शरण लेने का प्रयास किया, किंतु असद ख़ान ने उन्हें कैद कर लिया। अंततः फ़र्रुख़सियर के आदेश पर जहाँदार शाह और ज़ुल्फ़िकार ख़ान की हत्या कर दी गई। बाद में जहाँदार शाह के पार्थिव शरीर को हुमायूँ के मक़बरे में दफ़नाया गया।

इस प्रकार जहाँदार शाह तैमूर वंश का पहला बादशाह था, जो अपने नीच, क्रूर स्वभाव, मानसिक दुर्बलता और कायरता के कारण शासन करने में पूरी तरह अयोग्य सिद्ध हुआ। इतिहासकार इरादत खाँ ने लिखा : ‘जहाँदार शाह के शासनकाल में उल्लू बाज के घोंसले में रहता था और कोयल का स्थान कौवे ने ले लिया था।’

निजी जीवन

जहाँदार शाह के वैवाहिक जीवन का उल्लेख विभिन्न समकालीन और बाद के स्रोतों में मिलता है। उनकी पहली पत्नी मिर्ज़ा मुकर्रम ख़ान सफ़वी की पुत्री थीं, जिनसे उनका विवाह 13 अक्टूबर 1676 ई. को हुआ था। बाद में उन्होंने सैयद-उन-निसा बेगम से विवाह किया, जो मिर्ज़ा रुस्तम की पुत्री थीं। यह विवाह 30 अगस्त 1684 को हुआ और इसका औपचारिक समारोह शाही परिवार की उपस्थिति में संपन्न हुआ। उनकी एक अन्य पत्नी अनूप बाई थीं। उनके संबंध में स्रोतों में मतभेद मिलता है। इतिहासकार विलियम इरविन ने उन्हें मुहम्मद अज़ीज़-उद-दीन मिर्ज़ा की माता बताया है, जो आगे चलकर आलमगीर द्वितीय के नाम से मुग़ल सम्राट बने। यद्यपि आलमगीर द्वितीय के शासनकाल के समकालीन स्रोतों में उनकी माता का नाम मुअज़्ज़माबादी महल मिलता है। लाल कुंवर जहाँदार शाह की सबसे प्रसिद्ध पत्नी या प्रिय संगिनी थीं। वे खासूसियत ख़ान की पुत्री थीं। जहाँदार शाह ने उन्हें ‘इम्तियाज़ महल’ की उपाधि प्रदान की और उनके परिवार को दरबार में अत्यधिक प्रभाव प्राप्त हुआ।

इस प्रकार जहाँदार शाह का शासन अत्यंत अल्पकालिक रहा। उनका शासन मुग़ल साम्राज्य में केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने, दरबारी गुटबाज़ी और अमीरों के बढ़ते प्रभाव का स्पष्ट उदाहरण था। उनके पतन ने उत्तरकालीन मुग़ल राजनीति में सैयद बंधुओं के बढ़ते प्रभाव का मार्ग प्रशस्त किया।

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