मौर्य साम्राज्य का पतन (Decline of the Mauryan Empire)

मौर्य साम्राज्य का पतन (Decline of the Mauryan Empire)
मौर्य साम्राज्य का पतन मुख्य लेख : मौर्य राजवंश मौर्य राजवंश (लगभग 322-185 ईसा पूर्व) […]

मौर्य साम्राज्य का पतन

Table of Contents

मुख्य लेख : मौर्य राजवंश

मौर्य राजवंश (लगभग 322-185 ईसा पूर्व) प्राचीन भारत का एक शक्तिशाली राजवंश था, जिसकी स्थापना 322 ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने मंत्री चाणक्य की कूटनीतिक सहायता से की थी। सिकंदर के आक्रमण के पश्चात् उत्पन्न क्षेत्रीय मतभेदों का लाभ उठाकर उसने शीघ्र ही उत्तर-पश्चिमी भारत पर भी अधिकार कर लिया। मगध क्षेत्र से आरंभ होकर पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाने वाला यह साम्राज्य सम्राट अशोक के काल में अपने वृहद्तम और गौरवशाली स्वरूप तक पहुँचा, किंतु लगभग 137 वर्षों तक शासन करने के बाद अशोक की मृत्यु के उपरांत यही विशाल साम्राज्य अपेक्षाकृत तीव्र गति से पतनोन्मुख हो गया। अंततः लगभग 185 ईसा पूर्व में मौर्य सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या कर दी, जिससे मौर्य साम्राज्य का अंत हो गया और उत्तर भारत में शुंग वंश का उदय हुआ।

मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण

मौर्य साम्राज्य, जो चंद्रगुप्त मौर्य की महत्त्वाकांक्षाओं, अनवरत युद्धों, कौटिल्य की कूटनीति तथा अशोक की बंधुत्व-भावना के फलस्वरूप मौर्य साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया था, किंतु अशोक की मृत्यु के तुरंत बाद ही बिखरने लगा और अगले लगभग पचास वर्षों में यह विशाल साम्राज्य अतीत की वस्तु बनकर रह गया। इतने अल्प समय में इतने विस्तृत साम्राज्य का इस प्रकार नष्ट हो जाना एक ऐसी उल्लेखनीय घटना है, जिसने इतिहासकारों में साम्राज्य-विनाश के कारणों की स्वाभाविक जिज्ञासा जागृत की है। क्या इसकी शुरुआत अशोक के समय से ही हो गई थी अथवा इसके लिए परवर्ती शासक उत्तरदायी थे? क्या इसके लिए अशोक की धम्म-नीति उत्तरदायी थी  अथवा मौर्यों का अत्यधिक केंद्रीकृत प्रशासन?

वास्तव में, मौर्य साम्राज्य का पतन किसी एक कारण का परिणाम नहीं था, बल्कि यह अनेक राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक तथा सामाजिक कारणों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम था। राजनीतिक स्तर पर उत्तराधिकारियों की दुर्बलता और आपसी वैमनस्य, प्रशासनिक स्तर पर केंद्रीकृत व्यवस्था का शिथिल पड़ना और प्रांतीय नियंत्रण का ढीला हो जाना, आर्थिक स्तर पर संसाधनों पर बढ़ता दबाव तथा कर-भार की वृद्धि, और सामाजिक स्तर पर जनता तथा विभिन्न वर्गों में पनपता असंतोष जैसे अनेक कारक इस पतन की प्रक्रिया में सम्मिलित थे। अंततः अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने लगभग 185 ईसा पूर्व में हत्या कर दी और शुंग वंश की स्थापना के साथ ही मौर्य साम्राज्य का औपचारिक अंत हो गया।

अयोग्य और दुर्बल उत्तराधिकारी

मौर्य साम्राज्य के पतन का सबसे तात्कालिक कारण अशोक के अयोग्य और दुर्बल उत्तराधिकारी थे। वंशानुगत साम्राज्य तभी तक स्थिर रह सकते हैं, जब तक योग्य शासकों की निरंतर शृंखला बनी रहे। सम्राट अशोक के पश्चात् परवर्ती मौर्य शासकों में शासन-संगठन और संचालन की आवश्यक योग्यता का अभाव था, जिस कारण वे विशाल साम्राज्य की एकता बनाए रखने में असफल रहे।

साहित्यिक स्रोतों से यह स्पष्ट होता है कि अशोक का साम्राज्य उसके उत्तराधिकारियों में विभाजित हो गया था: राजतरंगिणी से ज्ञात होता है कि कश्मीर में जालौक ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था। तारानाथ के विवरण से पता चलता है कि वीरसेन ने गांधार में स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली थी। विदर्भ भी स्वतंत्र हो गया था और संभवतः सातवाहनों ने दकन में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी।

इस प्रकार अयोग्य और दुर्बल उत्तराधिकारियों के कारण साम्राज्य के विभिन्न भाग धीरे-धीरे स्वतंत्र होते चले गए। यद्यपि चंद्रगुप्त की विजयों, कौटिल्य की कूटनीति और चक्रवर्ती सम्राट के आदर्श के बावजूद मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत कई अर्ध-स्वतंत्र राज्य पहले से विद्यमान थे, जैसे  यवन, कांबोज, भोज और आटविक राज्य, किंतु केंद्रीय सत्ता के दुर्बल होते ही ये प्रदेश स्वतंत्र हो गए। स्थानीय स्वतंत्रता की इस भावना को चंद्रगुप्त ने अपने सुसंगठित प्रशासन के माध्यम से और अशोक ने अपनी नैतिकता पर आधारित धम्म-नीति के माध्यम से नियंत्रित करने का प्रयास किया था, किंतु अयोग्य उत्तराधिकारियों के शासनकाल में यही भावना पुनः प्रबल हो उठी और साम्राज्य के विघटन में सहायक सिद्ध हुई।

प्रांतीय शासकों के अत्याचार

हेमचंद्र रायचौधरी के अनुसार मौर्यों के दूरस्थ प्रांतों (जैसे तक्षशिला) में नियुक्त मौर्य अधिकारी और आमात्य आम जनता पर अत्याचार करने लगे थे, जिससे प्रजा में विद्रोह की भावना भड़क उठी। दिव्यावदान में बिंदुसार और अशोक दोनों के शासनकाल में तक्षशिला में विद्रोह होने का उल्लेख मिलता है। दोनों अवसरों पर वहाँ की जनता ने दुष्ट अमात्यों के विरुद्ध शिकायतें की थी :

न वयं कुमारस्य विरुद्धाः नापि राज्ञो बिंदुसारस्य।

अपितु दुष्टाः अमात्याः अस्माकं परिभवं कुर्वन्ति।।

दिव्यावदान में वर्णित अमात्यों की इस दुष्टता की पुष्टि अशोक के कलिंग अभिलेख से भी होती है, जिसमें अशोक कलिंग के उच्च अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहता है कि नागरिकों की नज़रबंदी या उन्हें दी जाने वाली यातना अकारण नहीं होनी चाहिए। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए अशोक ने प्रत्येक पाँचवें वर्ष केंद्र से निरीक्षण हेतु उच्चाधिकारियों को भेजने की व्यवस्था की थी। इससे स्पष्ट है कि अशोक ने इन अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नियंत्रण बनाए रखा था, किंतु उसके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में ये अमात्य और उच्च अधिकारी अधिकाधिक स्वतंत्र होते गए और प्रजा पर अत्याचार करने लगे। परवर्ती मौर्य शासकों में शालिशुक को विशेष रूप से अत्याचारी शासक बताया गया है : “स राष्ट्रं मर्दति घोरं धर्मवादी अधार्मिकम्” अर्थात् धर्म की बात करने वाला यह अधार्मिक शासक राष्ट्र को घोर रूप से पीड़ित करता है। इस प्रकार के अत्याचार और उत्पीड़न के कारण जनता मौर्य शासन से घृणा करने लगी और अवसर पाते ही अनेक राज्यों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी।

आर्थिक कारण

कुछ विद्वानों ने आर्थिक कारणों को भी मौर्य साम्राज्य के पतन का महत्त्वपूर्ण कारण माना है। उत्तरकालीन मौर्य शासनकाल में अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त प्रतीत होती है क्योंकि कर-वृद्धि हेतु अनेक उपाय अपनाए गए, यहाँ तक कि अभिनेताओं और गणिकाओं पर भी कर लगाए गए। इस काल के आहत सिक्कों में पर्याप्त मिलावट पाई गई है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव रहा होगा।

रोमिला थापर का सुझाव है कि मौर्यों के काल में ही सर्वप्रथम करों को राज्य की आय के प्रमुख साधन के रूप में अपनाया गया। विकसित अर्थव्यवस्था और राज्य के कार्यक्षेत्र के विस्तार के साथ करों में वृद्धि होना स्वाभाविक था और उत्तरकालीन मौर्य शासकों द्वारा लगाए गए कर अर्थशास्त्र के अनुरूप ही थे। संभवतः उत्तरकालीन मौर्यों के शासन में क्षीण नियंत्रण के कारण मिलावटी सिक्के अधिक मात्रा में जारी होने लगे, विशेषकर उन प्रदेशों में जो साम्राज्य से पृथक हो चुके थे। चाँदी की अधिक माँग के कारण यह भी संभव है कि चाँदी के सिक्कों में चाँदी की मात्रा घटा दी गई हो। इसके अतिरिक्त, कोशांबी की यह धारणा कि ये आहत सिक्के मौर्यकाल के ही हैं, निश्चित रूप से प्रमाणित नहीं है। हस्तिनापुर और शिशुपालगढ़ की खुदाइयों से प्राप्त मौर्यकालीन अवशेष तो एक विकसित अर्थव्यवस्था और भौतिक समृद्धि का ही परिचय देते हैं।

फिर भी, इन खुदाइयों के आधार पर पूर्णतः यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मौर्य अर्थव्यवस्था पर कोई दबाव नहीं था। पतंजलि के अनुसार मौर्य शासकों ने कोष-वृद्धि हेतु जनता की धार्मिक भावनाओं का सहारा लिया और देवी-देवताओं की मूर्तियों की बिक्री तक आरंभ कर दी थी। बार-बार पड़ने वाले दुर्भिक्षों (अकालों) से भी आर्थिक संतुलन निरंतर बिगड़ता गया। इसकी पुष्टि सोहगौरा और महास्थान अभिलेखों से होती है, जिनमें अकाल-पीड़ितों के लिए बनाए गए अन्नागारों का उल्लेख मिलता है। परवर्ती काल में दूरस्थ प्रांतों के साम्राज्य से पृथक होने के कारण भी केंद्रीय कोष पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसके अलावा अशोक की अत्यधिक दानशीलता से भी मौर्य अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हुई क्योंकि   दिव्यावदान में वर्णित अशोक के दान की कथाओं की पुष्टि अन्य बौद्ध अनुश्रुतियों से भी होती है।

फिर भी, आर्थिक कारणों को मौर्य साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण नहीं माना जा सकता है, क्योंकि इसका कोई ठोस और निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। सोहगौरा और महास्थान अभिलेखों में उल्लिखित अन्नागार वस्तुतः केवल आपातकाल के लिए बनाए गए थे और इन्हें प्रारंभिक मौर्यकाल का ही माना जाता है, न कि पतनकालीन।

विदेशी विचारों का अस्वीकरण

निहाररंजन राय के अनुसार पुष्यमित्र की राज्य-क्रांति मौर्य अत्याचारों तथा मौर्यों द्वारा अपनाए गए विदेशी विचारों, विशेषतः कला के क्षेत्र में, के अस्वीकरण का ही परिणाम थी। इस तर्क का आधार यह है कि साँची और भरहुत की कला लोक-परंपरा के अनुकूल और विशुद्ध भारतीय है, जबकि मौर्य कला इस लोककला से भिन्न होकर विदेशी प्रभाव से युक्त प्रतीत होती है। राय के अनुसार जनसाधारण के विद्रोह का एक अन्य कारण अशोक द्वारा प्रचलित सामाजिक रीतियों का निषेध भी था, जिससे जनता अशोक के विरुद्ध हो गई।

किंतु यह निश्चित नहीं है कि यह निषेध अशोक के उत्तराधिकारियों के काल में भी जारी रहा। इसके अतिरिक्त, जनता के व्यापक विद्रोह के लिए यह आवश्यक है कि मौर्यों की प्रजा में विभिन्न स्तरों पर एक संगठित राष्ट्रीय जागरण हो, ताकि वे पुष्यमित्र के समर्थन में मौर्य अत्याचारों के विरुद्ध सामूहिक रूप से विद्रोह कर सकें। तत्कालीन परिस्थितियों में ऐसी व्यापक जागृति की संभावना नहीं है, अतः यह मत भी पूर्णतः संतोषजनक नहीं है।

प्रशासनिक व्यवस्था

रोमिला थापर ने प्रशासन के संगठन तथा राज्य या राष्ट्र की अवधारणा को मौर्य साम्राज्य के पतन का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण बताया है। उनके अनुसार मौर्य साम्राज्य के पतन की संतोषजनक व्याख्या सैनिक अकर्मण्यता, ब्राह्मण-रोष, सार्वजनिक विद्रोह अथवा आर्थिक दबाव के आधार पर नहीं की जा सकती। इसके स्थान पर शासन-संगठन का अत्यधिक केंद्रीकरण तथा राष्ट्र की संकल्पना का अभाव ही पतन का मूल कारण था।

मौर्य प्रशासन में केंद्रीकरण की प्रधानता थी और सभी कार्य सम्राट के प्रत्यक्ष नियंत्रण में संपन्न होते थे। इस केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था की सफलता पूर्णतः सम्राट की व्यक्तिगत योग्यता पर निर्भर करती थी, क्योंकि सम्राट द्वारा ही वरिष्ठ पदाधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी और उनकी निष्ठा राज्य के प्रति न होकर सम्राट के प्रति व्यक्तिगत होती थी। अशोक की मृत्यु के बाद, विशेषकर जब साम्राज्य का विभाजन हो गया, तब केंद्र का नियंत्रण शिथिल पड़ गया और एक-एक कर प्रांत साम्राज्य से पृथक होते चले गए।

थापर का दूसरा तर्क यह था कि अधिकारी-तंत्र भली-भाँति प्रशिक्षित नहीं था। प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर चुने गए अधिकारी ही राजनीतिक हलचल के बीच शांति-व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम हो सकते थे और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ऐसी व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। किंतु थापर का यह मत स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि अर्थशास्त्र से स्पष्ट है कि सभी उच्च कर्मचारी योग्यता के आधार पर ही नियुक्त किए जाते थे। मौर्यकाल में यथार्थ-परीक्षण आधारित जो नियुक्ति-व्यवस्था प्रचलित थी, वह प्राचीन या मध्यकालीन भारत में अन्यत्र कहीं नहीं पाई जाती और आधुनिक प्रतियोगिता-परीक्षा पद्धति की कल्पना उस युग पर आरोपित करना ऐतिहासिक दृष्टि से अनुचित है।

इसी क्रम में यह भी कहा गया है कि प्रतिनिधि सभा के अभाव के कारण राजा के कार्यों पर कोई नियंत्रण नहीं था। किंतु राजतंत्र पर आधारित सभी प्राचीन और मध्यकालीन राज्यों की यह एक सामान्य विशेषता रही है, अतः प्रतिनिधि संस्था के अभाव को मौर्य साम्राज्य के पतन का विशिष्ट कारण नहीं माना जा सकता।

थापर का एक अंतिम तर्क यह भी था कि मौर्यकालीन राजनीतिक व्यवस्था में “राज्य” की संकल्पना का अभाव था, अर्थात् ऐसी सत्ता जिसके प्रति व्यक्ति की निष्ठा शासन और समाज से भी ऊपर हो। संपूर्ण मौर्य साम्राज्य में समान रीति-रिवाज, भाषा और परंपराएँ नहीं थीं। आर्थिक दृष्टि से उत्तरी भारत समृद्ध था जबकि दकन प्रदेश अपेक्षाकृत अविकसित था। किंतु मौर्यकाल में राज्य की संकल्पना विद्यमान थी। कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित सप्तांग राज्य की अवधारणा अत्यंत विकसित थी। यदि यह मान भी लिया जाए कि मौर्ययुग में ऐसी संकल्पना अनुपस्थित थी, तो यूनान को छोड़कर विश्व के किसी भी प्राचीन या मध्यकालीन समाज में ऐसी संकल्पना नहीं पाई जाती। इसी प्रकार राष्ट्रीय भावना भी मूलतः एक आधुनिक राजनीतिक तत्त्व है, जिसकी खोज प्राचीन-मध्यकाल में करना निरर्थक है।  यह भावना एथेंस-स्पार्टा जैसे छोटे नगर-राज्यों में तो संभव थी, किंतु अनेक जातियों व राज्यों से युक्त विशाल साम्राज्य में इसकी कल्पना करना असंगत है। इस प्रकार रोमिला थापर द्वारा प्रस्तुत उपर्युक्त तीनों कारणों में से किसी को भी मौर्य साम्राज्य के विघटन का निर्णायक कारण नहीं माना जा सकता है।

साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार

मौर्य साम्राज्य के पतन का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण उसका अत्यधिक भौगोलिक विस्तार था। मौर्य साम्राज्य का विस्तार उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक और पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में असम तक था। इतने विशाल साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण रखना सरल कार्य नहीं था, इसीलिए इसे प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से विभिन्न प्रांतों में विभाजित किया गया था। यह विभाजन तात्कालिक दृष्टि से उचित था, किंतु इसके दूरगामी परिणाम साम्राज्य के लिए अत्यंत अहितकर सिद्ध हुए। जैसे ही प्रांतीय अधिकारियों को केंद्रीय शक्ति की दुर्बलता का आभास हुआ, उन्होंने अपनी-अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी, जिससे संपूर्ण साम्राज्य में अराजकता और अव्यवस्था का वातावरण उत्पन्न हो गया।

गृह-कलह और दरबारी षड्यंत्र

परवर्ती मौर्य शासकों के मध्य गृह-कलह और परस्पर ईर्ष्या ने भी साम्राज्य को भीतर से कमजोर किया। इस अंतर्कलह और दरबारी षड्यंत्र के प्रमाण स्वयं अशोक के समय से ही मिलने लगते हैं, जब उसने राधागुप्त की सहायता से अपने भाई सुसीम को हटाकर सत्ता पर अधिकार प्राप्त किया था। अशोक की मृत्यु के पश्चात् मौर्य साम्राज्य का विभाजन इसी अंतर्कलह का स्पष्ट प्रमाण है।

मालविकाग्निमित्र नाटक से यह भी ज्ञात होता है कि बृहद्रथ के शासनकाल में राजदरबार दो प्रमुख गुटों में विभाजित हो गया था- एक सचिव-गुट और दूसरा सेनापति-गुट। इन दोनों गुटों के बीच निरंतर प्रतिद्वंद्विता बनी रहती थी। अंततः सेनापति-गुट के प्रमुख पुष्यमित्र शुंग ने सेना के समक्ष ही राजा बृहद्रथ की हत्या कर सत्ता हथियाने में सफलता प्राप्त की।

अशोक के उत्तराधिकारी और मौर्य साम्राज्य का पतन (The Successors of Asoka and the Fall of the Mauryan Empire)
अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या

अशोक का उत्तरदायित्व

अनेक इतिहासकारों ने मौर्य साम्राज्य के पतन के लिए स्वयं अशोक और उसकी नीतियों को उत्तरदायी ठहराया है। इस संबंध में मुख्यतः दो प्रकार के मत प्रस्तुत किए गए हैं- कुछ विद्वान अशोक की ब्राह्मण-विरोधी नीति को, तो कुछ अन्य उसकी अहिंसावादी शांति-नीति को साम्राज्य के पतन का कारण मानते हैं।

अशोक की ब्राह्मण-विरोधी नीति

महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने अशोक की धार्मिक नीति को साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण माना है। उनके अनुसार अशोक की धार्मिक नीति बौद्धों के पक्ष में झुकी हुई थी और ब्राह्मणों के परंपरागत विशेषाधिकारों तथा उनकी सामाजिक श्रेष्ठता पर सीधा आघात करती थी। अशोक द्वारा पशुबलि पर रोक लगाए जाने से ब्राह्मण वर्ग विशेष रूप से नाराज़ हुआ, क्योंकि वे यज्ञादि संपन्न कराते थे जिनमें पशुबलि एक अनिवार्य कृत्य मानी जाती थी और यज्ञ के माध्यम से ब्राह्मण मनुष्यों तथा देवताओं के बीच मध्यस्थता का कार्य करते थे। इस प्रकार अशोक के इस निर्णय से ब्राह्मणों की परंपरागत शक्ति और सामाजिक सम्मान को आघात पहुँचा। अपने रूपनाथ लघुस्तंभलेख में अशोक स्वयं यह उल्लेख करता है कि उसने “भू-देवों” को मिथ्या सिद्ध कर दिया और चूँकि ब्राह्मण भू-देव माने जाते थे, इससे उनकी प्रतिष्ठा को क्षति पहुँची। इसके अतिरिक्त, अशोक ने धम्म-महामात्रों की नियुक्ति करके न्याय-प्रशासन में दंड-समता तथा व्यवहार-समता का सिद्धांत लागू किया और इसे भी ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों का हनन माना गया। शास्त्री जी का अनुमान है कि जब तक शक्तिशाली अशोक जीवित रहा, तब तक ब्राह्मणों पर नियंत्रण बना रहा, किंतु उसकी मृत्यु के बाद परवर्ती मौर्य शासकों और ब्राह्मणों के बीच संघर्ष आरंभ हो गया, जिसकी चरम परिणति पुष्यमित्र के विद्रोह में देखी जा सकती है।

हेमचंद्र रायचौधरी ने हरप्रसाद शास्त्री के इन मतों की समीक्षा करते हुए उन्हें निराधार सिद्ध किया है। रायचौधरी के अनुसार प्रथमतः अशोक ने पशुबलि पर पूर्ण प्रतिबंध कभी नहीं लगाया था। द्वितीयतः, स्वयं ब्राह्मण ग्रंथों में भी यज्ञादि अवसरों पर पशुबलि के विरुद्ध स्वर स्पष्ट रूप से सुनाई देते हैं। उपनिषदों में पशुबलि और हिंसा का स्पष्ट निषेध मिलता है। मुंडकोपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि यज्ञ टूटी हुई नौकाओं के समान हैं, और जो मूढ़ इन्हें श्रेय मानकर इनकी प्रशंसा करते हैं, वे बार-बार जरा-मृत्यु के चक्र को ही प्राप्त होते हैं।

यह कहना भी उचित नहीं है कि अशोक ने भू-देवों को मिथ्या सिद्ध कर दिया था। वास्तव में शास्त्री जी ने रूपनाथ लघुशिलालेख की पदावली का गलत अर्थ लगाया था। सिलवां लेवी के अनुसार इसका वास्तविक अर्थ है : “भारतवासी, जो पहले देवताओं से पृथक थे, अब अपने उन्नत चरित्र के कारण देवताओं के समकक्ष हो गए हैं”, इस कथन में ब्राह्मणों के विरुद्ध कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार धम्म-महामात्रों के कर्तव्यों में भी ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता है जिसे ब्राह्मण-विरोधी कहा जा सके। वे तो ब्राह्मण, श्रमण आदि सभी वर्गों के कल्याण हेतु नियुक्त किए गए थे। राजूकों जैसे न्यायाधिकारियों को दिए गए अधिकार भी ब्राह्मणों के अधिकारों पर आघात करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि दंड-विधान को अधिक लोकहितकारी और मानवीय बनाने के उद्देश्य से प्रेरित थे। अशोक के तीसरे, चौथे और पाँचवें शिलालेखों से भी स्पष्ट होता है कि वह ब्राह्मणों का पूर्ण सम्मान करता था। इस बात का भी कोई सबल प्रमाण नहीं है कि उसने बौद्ध धर्म को विशेष संरक्षण प्रदान किया था, यद्यपि भाब्रू लेख में वह बौद्ध संघ को प्रणाम करता है, किंतु उल्लेखनीय है कि अशोक उस अवसर पर एक बौद्ध शैक्षिक संस्थान में अतिथि के रूप में गया था। अतः किसी बौद्ध संस्थान में बौद्ध संघ को प्रणाम करना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि उसने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया। इसके विपरीत, अपने शिलालेखों में वह स्वयं कहता हैं कि सभी धर्मों में संवृद्धि होनी चाहिए तथा अपने धर्म की प्रशंसा और दूसरे धर्म की निंदा नहीं करनी चाहिए।

परवर्ती मौर्यों और ब्राह्मणों के बीच संघर्ष होने का भी कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिलता है।  राजतरंगिणी से पता चलता है कि कश्मीर के शासक जालौक और ब्राह्मणों के बीच मधुर संबंध थे। इसके अतिरिक्त सेनापति के पद पर स्वयं पुष्यमित्र (ब्राह्मण) की नियुक्ति यह सिद्ध करती है कि प्रशासन में उच्च पदों पर ब्राह्मणों की नियुक्ति सामान्य प्रक्रिया थी।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार पुष्यमित्र शुंग के विद्रोह को ब्राह्मणों द्वारा संगठित एक धार्मिक क्रांति कहना भी उचित नहीं है। उनके अनुसार यह मूलतः एक सैनिक क्रांति थी, जिसमें धर्म का कोई पुट नहीं था। पुष्यमित्र की राज्य-क्रांति का वास्तविक कारण सेना पर पूर्ण अधिकार रखने वाले एक महत्त्वाकांक्षी सेनापति की व्यक्तिगत आकांक्षा थी, न कि असंतुष्ट ब्राह्मण-समुदाय का संगठित नेतृत्व। नीलकंठ शास्त्री भी यही प्रस्तावित करते हैं कि अशोक की बौद्ध-नीति संकीर्ण नहीं थी, बल्कि उसकी धार्मिक नीति विश्वात्मक सहिष्णुता और विविध धर्मों में परस्पर मैत्री स्थापित करने की थी। पुष्यमित्र की प्रधान सेनापति के पद पर नियुक्ति स्वयं यह सिद्ध करती है कि परवर्ती मौर्य शासक ब्राह्मणों को प्रतिक्रियावादी नहीं मानते थे। मालविकाग्निमित्र से भी यही स्पष्ट होता है कि बृहद्रथ की हत्या वस्तुतः राजदरबार की आंतरिक गुटबंदी का ही परिणाम थी, न कि किसी धार्मिक आंदोलन का।

अशोक की शांति और अहिंसा की नीति

आर.डी. बनर्जी, आर.के. मुकर्जी, भंडारकर, रायचौधरी और एन.एन. घोष जैसे प्रतिष्ठित इतिहासकारों के अनुसार अशोक की शांति और अहिंसा की नीति ने मौर्य साम्राज्य के पतन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बनर्जी के अनुसार अशोक के आदर्शवाद और धार्मिक नीति से सैन्य अनुशासन प्रभावित हुआ और जब भेरीघोष (युद्ध का नगाड़ा) का स्थान धम्म-विजय ने ले लिया, तो वहीं से साम्राज्य के पतन की घंटी बज उठी।

भंडारकर का विचार है कि विजय के स्थान पर धम्म-विजय की नीति अपनाने का परिणाम आध्यात्मिक दृष्टि से भले ही शानदार रहा हो, राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत विनाशकारी सिद्ध हुआ। रायचौधरी भी मानते हैं कि अशोक की इस शांतिवादी नीति ने मौर्य साम्राज्य की सैन्य शक्ति को क्षीण कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप वह आगे चलकर यवनों के आक्रमण का प्रभावी सामना नहीं कर सका। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि अशोक स्वयं अपने चौथे शिलालेख में कहता है कि उसके राज्य में अब भेरीघोष धम्म-घोष में परिवर्तित हो गया है। एन.एन. घोष का मानना है कि कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक ने रणचंडी (युद्ध-देवी) के आह्वान की नीति का पूर्णतः परित्याग कर दिया था। राधाकुमुद मुकर्जी भी यह मानते हैं कि मौर्य साम्राज्य के पतन में अशोक की धार्मिक नीति का कुछ योगदान अवश्य था, किंतु वे इसे पतन का एकमात्र या निर्णायक कारण नहीं मानते हैं।

साम्राज्य के पतन के वास्तविक उत्तरदायी कारणों की समग्र दृष्टि से देखा जाए, तो उपर्युक्त आरोप अंततः निराधार ही प्रतीत होते हैं, क्योंकि यह सिद्ध करने के लिए कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि अशोक की बौद्ध-नीति वस्तुतः शांतिवादी और सैन्य-विरोधी थी। यदि अशोक वास्तव में इतना अहिंसावादी होता, तो वह अपने राज्य में मृत्युदंड की व्यवस्था को भी समाप्त करवा देता, किंतु ऐसा नहीं हुआ। अभिलेखीय साक्ष्यों से स्पष्ट है कि उसकी सैन्य शक्ति यथावत सुदृढ़ बनी रही। अपने तेरहवें शिलालेख में वह सीमांत प्रदेशों की जनता और जंगली जनजातियों को स्पष्ट चेतावनी देता है कि वह केवल उन्हीं को क्षमा कर सकता है जो इसके योग्य होंगे। अशोक ने न तो अपनी सेना को भंग किया था और न ही उसका अनुशासन किसी प्रकार शिथिल हुआ था। वास्तव में, यदि अशोक अपने पिता चंद्रगुप्त और पितामह की “रक्त और लौह” की कठोर नीति का ही अनुसरण करता, तब भी मौर्य साम्राज्य का पतन कभी-न-कभी अवश्यंभावी था क्योंकि इसके पीछे अन्य अनेक संरचनात्मक कारण विद्यमान थे। इसके विपरीत, सभ्य संसार के एक विशाल भाग पर भारतीय संस्कृति का जो नैतिक आधिपत्य स्थापित हुआ, जिसके लिए अशोक ही मुख्य कारण माना जाता है, वह शताब्दियों तक उसकी ख्याति का स्थायी स्मारक बना रहा और आज लगभग दो हज़ार वर्षों से अधिक समय व्यतीत हो जाने के बाद भी वह पूर्णतः विलुप्त नहीं हुआ है। अतः स्पष्ट है कि अशोक की शांति और अहिंसा की नीति को मौर्य साम्राज्य के अधःपतन के लिए उत्तरदायी नहीं माना जा सकता है।

इस प्रकार मौर्य साम्राज्य का पतन किसी एक अकेले कारण का परिणाम नहीं था, बल्कि अनेक कारकों की संयुक्त परिणति थी। अशोक के अयोग्य और दुर्बल उत्तराधिकारी, प्रांतीय शासकों के बढ़ते अत्याचार, आर्थिक दबाव, अत्यधिक केंद्रीकृत तथा राष्ट्र-संकल्पना से रहित प्रशासनिक ढाँचा, साम्राज्य का अत्यधिक भौगोलिक विस्तार, राजदरबार की आंतरिक गुटबंदी और गृह-कलह जैसे कारणों ने मिलकर मौर्य साम्राज्य को भीतर से खोखला कर दिया। इसके विपरीत, अशोक की ब्राह्मण-विरोधी नीति अथवा उसकी अहिंसा-नीति को पतन का प्रत्यक्ष अथवा प्रमुख कारण मानने के तर्क साक्ष्यों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। अंततः इन संचित कमजोरियों के बीच सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने लगभग 185 ईसा पूर्व में अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या कर दी, जिससे मौर्य साम्राज्य का औपचारिक अंत हो गया और भारतीय इतिहास में शुंग वंश के शासन का नवीन अध्याय आरंभ हुआ।

मौर्य वंश के पतन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

प्रश्न 1: मौर्य वंश के पतन के प्रमुख कारण क्या थे?

मौर्य साम्राज्य के पतन के पीछे कई कारण थे। अशोक के बाद कमजोर उत्तराधिकारी, विशाल साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण की कमी, प्रांतीय शासकों की बढ़ती स्वायत्तता, प्रशासनिक एवं आर्थिक दबाव तथा केंद्रीय सत्ता का कमजोर होना इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं।

प्रश्न 2: क्या अशोक की नीतियाँ मौर्य साम्राज्य के पतन का कारण बनीं?

अशोक की धम्म-नीति को सीधे तौर पर साम्राज्य के पतन का कारण मानना उचित नहीं है। कुछ इतिहासकारों ने सैन्य गतिविधियों में कमी और अहिंसा पर जोर को साम्राज्य की सैन्य शक्ति से जोड़ा है, लेकिन इसके निर्णायक प्रमाण नहीं हैं। पतन के लिए राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक परिस्थितियाँ अधिक महत्त्वपूर्ण थीं।

प्रश्न 3: अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य क्यों कमजोर हो गया?

अशोक के बाद ऐसे शक्तिशाली शासक नहीं हुए जो इतने विशाल साम्राज्य को उसी प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकें। उत्तराधिकार संबंधी समस्याओं और केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने से विभिन्न प्रांतों में स्वतंत्रता की प्रवृत्ति बढ़ी और साम्राज्य धीरे-धीरे विघटित होने लगा।

प्रश्न 4: मौर्य साम्राज्य के पतन में प्रांतीय विद्रोहों की क्या भूमिका थी?

विशाल साम्राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखना कठिन था। केंद्रीय सत्ता कमजोर होने पर प्रांतीय अधिकारियों और स्थानीय शक्तियों की स्वायत्तता बढ़ी। इससे साम्राज्य की एकता कमजोर हुई और मौर्य शासन का प्रभाव कई क्षेत्रों में घटने लगा।

प्रश्न 5: मौर्य वंश का अंतिम शासक कौन था?

मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहद्रथ मौर्य था। वह लगभग 187–185 ईसा पूर्व के बीच शासन करता था। लगभग 185 ईसा पूर्व उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उसकी हत्या कर शुंग वंश की स्थापना की।

प्रश्न 6: मौर्य साम्राज्य का पतन कब हुआ?

मौर्य साम्राज्य का अंतिम राजनीतिक पतन लगभग 185 ईसा पूर्व में हुआ, जब अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या पुष्यमित्र शुंग ने कर दी। इसके साथ ही मौर्य सत्ता का अंत हुआ और उत्तर भारत में शुंग वंश का उदय हुआ।
error: Content is protected !!
Scroll to Top
Enable Notifications OK No thanks