चंद्रगुप्त मौर्य (Chandragupta Maurya)

मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (Maurya Emperor Chandragupta Maurya)
मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य: जीवन परिचय, विजय अभियान और साम्राज्य विस्तार मुख्य लेख : मौर्य […]

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मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य: जीवन परिचय, विजय अभियान और साम्राज्य विस्तार

मुख्य लेख : मौर्य राजवंश

भारत के प्रथम ऐतिहासिक चक्रवर्ती सम्राट

चंद्रगुप्त मौर्य प्राचीन भारत के महानतम सम्राटों में गिने जाते हैं और मौर्य वंश के संस्थापक के रूप में इतिहास में अमर हैं। उन्होंने अपने गुरु एवं प्रधानमंत्री चाणक्य, जिन्हें कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है, के कुशल मार्गदर्शन में मगध के अत्याचारी नंद वंश का समूल अंत कर पाटलिपुत्र (पटना, बिहार) को अपनी राजधानी बनाया और एक विशाल एवं सुदृढ़ साम्राज्य की नींव रखी। मौर्य साम्राज्य की स्थापना भारतीय इतिहास की उन कुछ सर्वाधिक निर्णायक घटनाओं में से एक है, जिसने आने वाली कई शताब्दियों तक भारतीय राजनीति, समाज और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया।

चंद्रगुप्त मौर्य ने उत्तर-पश्चिम भारत में सिकंदर महान की आकस्मिक मृत्यु (323 ई.पू.) के पश्चात् शिथिल पड़ चुके यूनानी (यवन) प्रभाव को पूर्णतः समाप्त किया। इसके उपरांत उन्होंने सीरिया के यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को निर्णायक रूप से परास्त कर अपने साम्राज्य की सीमाओं को हिंदुकुश पर्वतमाला तक विस्तारित किया। उनके शासनकाल में एक अत्यंत सुदृढ़ एवं परिष्कृत केंद्रीकृत प्रशासनिक तंत्र विकसित हुआ, जिसकी विस्तृत जानकारी हमें दो प्रमुख स्रोतों से प्राप्त होती है- चाणक्य रचित ‘अर्थशास्त्र’ तथा मौर्य दरबार में सेल्यूकस के राजदूत रहे यूनानी यात्री मेगस्थनीज की ऐतिहासिक कृति ‘इंडिका’।

चंद्रगुप्त के ऐतिहासिक उदय के साथ भारतीय इतिहास में एक सर्वथा नए राजनीतिक युग का सूत्रपात हुआ। इससे पहले भारतीय उपमहाद्वीप अनेक छोटे-छोटे गणराज्यों, राजतंत्रों और जनपदों में बिखरा हुआ था। चंद्रगुप्त ने इन बिखरी हुई राजनीतिक इकाइयों का एकीकरण कर पहली बार भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग पर एक ही साम्राज्य का निर्माण किया। इसीलिए इतिहासकार चंद्रगुप्त मौर्य को भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट और चक्रवर्ती सम्राट मानते हैं।

जीवन के अंतिम चरण में जब चंद्रगुप्त ने सिंहासन छोड़ा, तो उसने अपने पुत्र बिंदुसार को राजपाट सौंप दिया और जैन परंपरा के अनुसार जैन आचार्य भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) की ओर प्रस्थान किया। वहाँ चंद्रगिरि पहाड़ी पर उसने जैन धर्म की संलेखना (सल्लेखना) विधि, जो उपवास द्वारा क्रमशः देहत्याग का व्रत है, के माध्यम से लगभग 298 ईसा पूर्व में अपने जीवन का अंत किया। इस प्रकार चंद्रगुप्त मौर्य ने भारत के राजनीतिक एकीकरण और एक सुदृढ़ साम्राज्यवादी शासन-व्यवस्था की वह नींव रखी, जिसे आगे चलकर उसके पौत्र सम्राट अशोक ने और अधिक विस्तारित तथा सुदृढ़ किया।

चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म और प्रारंभिक जीवन

चंद्रगुप्त मौर्य के वंश और प्रारंभिक जीवन के पुनर्निर्माण का आधार ठोस ऐतिहासिक अभिलेखों की तुलना में प्राचीन साहित्यिक परंपराओं और किंवदंतियों पर अधिक निर्भर है। इसका कारण यह है कि उस काल के प्रत्यक्ष अभिलेखीय प्रमाण अत्यंत सीमित हैं। फिर भी, बौद्ध और जैन साहित्यिक स्रोत मिलकर एक ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं जो ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

बौद्ध और जैन ग्रंथों से पता चलता है कि चंद्रगुप्त का जन्म पिप्पलिवन के मोरिय (मौर्य) नामक क्षत्रिय कुल में हुआ था। यह कुल शाक्यों- गौतम बुद्ध के वंश का दूर का संबंधी था। श्रीलंकाई बौद्ध ग्रंथ महावंश में इस परंपरा की पुष्टि करते हुए कहा गया है कि चंद्रगुप्त पिप्पलिवन के मोरिय गण का राजकुमार था। मोरिय गण वज्जि महाजनपद के निकट स्थित एक छोटा गणराज्य था, जो उस काल में कोशल और मगध की बढ़ती साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का शिकार होने वाले अनेक छोटे राज्यों में से एक था।

‘मौर्य’ शब्द की व्युत्पत्ति के विषय में विद्वानों में मतभेद है। एक परंपरा इसे ‘मयूर’ (मोर) से जोड़ती है। कहा जाता है कि इस वंश के पूर्वज मयूर-पालन का कार्य करते थे। दूसरी परंपरा इसे पिप्पलिवन के मोरिय गण से जोड़ती है। तीसरी व्याख्या के अनुसार चंद्रगुप्त की माता ‘मुरा’ नामक एक नंद राजा की शूद्र रानी थी, जिससे इस वंश का नाम मौर्य पड़ा। किंतु बौद्ध-जैन स्रोतों की क्षत्रिय-वंशावली अधिक प्रामाणिक मानी जाती है।

पिता की मृत्यु और बाल्यकाल की कठिनाइयाँ

परंपरा के अनुसार चंद्रगुप्त का पिता, जिसका नाम कुछ स्रोतों में सूर्यगुप्त बताया गया है, मोरिय गणराज्य का प्रधान था। एक सीमांत युद्ध में उसकी असामयिक मृत्यु हो गई। उस समय उसकी रानी गर्भवती थी। रानी अपने भाइयों की सहायता से शत्रुओं से बचकर भागी और पुष्पपुर (कुसुमपुर नामक नगर में आश्रय लिया, जहाँ चंद्रगुप्त का जन्म हुआ।

बालक की सुरक्षा की दृष्टि से उसके मामा ने उसे एक गोशाला में छोड़ दिया। परंपरागत विवरणों के अनुसार वहाँ ‘चंद्र’ नामक एक वृषभ (बैल) ने उसकी रक्षा की, जिसके कारण उसका नाम ‘चंद्रगुप्त’ पड़ा। बाद में एक गड़रिए ने इस बालक को गोद लेकर पुत्र की भाँति उसका लालन-पालन किया। जब चंद्रगुप्त कुछ बड़ा हुआ, तो उसे एक शिकारी (लुब्धक) के हाथों बेच दिया गया जिसने उसे गाय-भैंस चराने का काम सौंपा। इस प्रकार चंद्रगुप्त का बचपन मयूरपोषकों, चरवाहों और शिकारियों के बीच अत्यंत सामान्य परिस्थितियों में व्यतीत हुआ।

नेतृत्व की प्रतिभा: राजकीलम् खेल

बाल्यावस्था में ही चंद्रगुप्त की असाधारण नेतृत्व-क्षमता प्रकट होने लगी थी। कहा जाता है कि उसने ‘राजकीलम्’ नामक एक विशेष खेल का आविष्कार किया था। इस खेल में वह स्वयं राजा बनता था, अपने साथियों को अपना अनुचर, मंत्री और सामंत नियुक्त करता था और एक बाल-राजसभा की अध्यक्षता करते हुए न्याय भी करता था। इस खेल में प्रदर्शित उसका आत्मविश्वास, संगठन-कौशल और निर्णय-क्षमता असाधारण थी।

चाणक्य से भेंट

गाँव के बच्चों की एक बाल-राजसभा के दौरान तक्षशिला के महान आचार्य और राजनीतिशास्त्री चाणक्य की दृष्टि इस असाधारण ग्रामीण बालक पर पड़ी। चाणक्य उस समय अपने किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए उस क्षेत्र से गुजर रहे थे। उनकी पैनी और दूरदर्शी दृष्टि ने इस सामान्य से दिखने वाले बालक में राजत्व की असाधारण प्रतिभा और भावी सम्राट के लक्षण पहचान लिए। चाणक्य ने एक हजार कर्षापण देकर बालक चंद्रगुप्त को उसके पालक-पिता से खरीद लिया। यह भेंट भारतीय इतिहास की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक सिद्ध हुई।

मगध के तत्कालीन शासक धननंद

मगध साम्राज्य पर उस समय नंद वंश का शासन था। पालि ग्रंथों में मगध के तत्कालीन सम्राट का नाम धननंद बताया गया है, जबकि संस्कृत स्रोतों में उसे केवल ‘नंद’ कहा गया है। जिस समय चाणक्य पाटलिपुत्र पहुँचा था, उस समय धननंद ही वहाँ का सर्वेसर्वा था। धननंद शब्द ही अपने आप में उसकी असाधारण संपत्ति का परिचायक है- ‘धन’ अर्थात् संपत्ति और ‘नंद’ अर्थात् आनंद।

धननंद अपने काल का अत्यंत समृद्ध और धनाढ्य सम्राट था। पालि स्रोतों के अनुसार वह लगभग अस्सी करोड़ (कोटि) की संपत्ति का स्वामी था और अपनी राजस्व-लिप्सा इतनी अधिक थी कि वह खालों, गोंद के वृक्षों तथा पत्थरों तक पर कर वसूल करता था। कथासरित्सागर में नंद की निन्यानवे करोड़ स्वर्ण-मुद्राओं का उल्लेख मिलता है। यह भी कहा जाता है कि उसने गंगा नदी की तली में एक विशाल चट्टान खुदवाकर उसमें अपना सारा खजाना छिपा दिया था। उसकी अपार धन-संपदा की ख्याति उत्तर से दक्षिण तक फैली हुई थी। एक प्राचीन तमिल कविता में भी उल्लेख मिलता है कि उसकी संपदा पहले पाटलि नगर में संचित हुई और बाद में गंगा की बाढ़ में लुप्त हो गई।

दानशाला और चाणक्य का अपमान

नंदराज के दरबार में दानशाला नामक एक विशेष संस्था कार्यरत थी, जिसका संचालन एक संघ के हाथों में था। इस संघ का अध्यक्ष सदैव कोई योग्य ब्राह्मण ही होता था। नियमानुसार अध्यक्ष एक करोड़ मुद्राओं तक का दान दे सकता था, जबकि संघ का सबसे कनिष्ठ सदस्य एक लाख मुद्राओं तक का। अपनी विद्वत्ता और कूटनीतिक बुद्धि के कारण चाणक्य को इस महत्त्वपूर्ण संघ का अध्यक्ष चुना गया। परंतु चाणक्य की कुरूपता और उग्र स्वभाव को नंद राजा बर्दाश्त नहीं कर सका और उसने उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित करते हुए उस पद से हटा दिया।

यह अपमान चाणक्य के जीवन का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। क्रोध में आकर चाणक्य ने अपनी शिखा खोलते हुए नंद वंश को समूल नष्ट कर देने की दृढ़ प्रतिज्ञा ली। एक नग्न आजीविक साधु का वेश धरकर वह वहाँ से निकल भागे, जो कालांतर में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की प्रेरणा बनी।

तक्षशिला में शिक्षा और सिकंदर से भेंट

परंपरा के अनुसार भारत पर सिकंदर महान के आक्रमण (लगभग 326 ई.पू.) के समय चाणक्य विश्वविख्यात शिक्षा-केंद्र तक्षशिला में एक प्रतिष्ठित आचार्य थे। उन्होंने चंद्रगुप्त को इस प्रसिद्ध विद्या-केंद्र में प्रवेश दिलाया, जहाँ उसे सैद्धांतिक (अप्राविधिक) विषयों के साथ-साथ व्यावहारिक एवं प्राविधिक कलाओं की सर्वांगीण शिक्षा दी गई।

तक्षशिला उस काल में केवल प्राथमिक नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा का भी अत्यंत प्रसिद्ध केंद्र था, जहाँ सुदूर देशों से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। जातक कथाओं से पता चलता है कि यहाँ तीनों वेदों के साथ-साथ धनुर्विद्या (इस्सत्थ-सिप्प), आखेट और गजशास्त्र (हत्थिसुत्त) जैसी अठारह ‘सिप्पों’ अर्थात् शिल्प-विद्याओं की शिक्षा दी जाती थी। चंद्रगुप्त ने यहाँ सैन्य विज्ञान, राजनीति, कूटनीति, अर्थशास्त्र और दर्शन का गहन अध्ययन किया। तक्षशिला की यह शिक्षा उनके भावी शासन-कौशल और सैन्य-संगठन की दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान सिद्ध हुई।

संभवतः शिक्षाकाल के दौरान ही चंद्रगुप्त ने विश्व-विजेता सिकंदर महान से पंजाब में भेंट की थी। यह उसके सैन्य-प्रशिक्षण का ही एक अंग रहा होगा। यूनानी इतिहासकार प्लूटार्क ने स्पष्ट लिखा है : “ऐंड्रोकोट्टस (चंद्रगुप्त), जो उस समय एक नवयुवक ही था, स्वयं सिकंदर से मिला था।” रोमन इतिहासकार जस्टिन के अनुसार किसी कारणवश रुष्ट होकर सिकंदर ने चंद्रगुप्त को बंदी बना लेने का आदेश दे दिया था, किंतु चंद्रगुप्त अपनी चतुराई और फुर्ती से उसके चंगुल से निकल भागने में सफल रहा।

सैंड्रोकोटस की पहचान

आधुनिक इतिहासकारों ने ग्रीक-रोमन स्रोतों में वर्णित ‘सैंड्रोकोटस’ अथवा ‘ऐंड्रोकोट्टस’ की पहचान चंद्रगुप्त मौर्य से की है। यह पहचान सर्वप्रथम सर विलियम जोन्स ने 1793 ईस्वी में की थी और यही खोज प्राचीन भारतीय इतिहास की कालक्रम-रचना के लिए आधारभूत सिद्ध हुई। इस पहचान से ही सिकंदर के भारत-आक्रमण, नंद वंश के अंत, मौर्य साम्राज्य की स्थापना और सेल्यूकस के साथ संधि जैसी घटनाओं को एक निश्चित कालक्रम में रखा जा सका है। इसीलिए इतिहासकार इसे भारतीय इतिहास-कालक्रम की ‘शिलाधार-तिथि’ कहते हैं।

चंद्रगुप्त मौर्य (Chandragupta Maurya)
चंद्रगुप्त मौर्य

चंद्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियाँ और विजय अभियान

पंजाब-सिंधु से यूनानी सत्ता का उन्मूलन

इतिहासकारों में इस विषय पर मतभेद है कि चंद्रगुप्त और चाणक्य ने सर्वप्रथम पश्चिमोत्तर भारत में यूनानियों से युद्ध किया अथवा मगध के नंद वंश को नष्ट किया। यूनानी-रोमन तथा बौद्ध स्रोतों से यह संकेत मिलता है कि चंद्रगुप्त ने पहले पंजाब तथा सिंधु प्रदेश को विदेशी यूनानी सत्ता से मुक्त कराया था।

चंद्रगुप्त ने अत्यंत बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किया और एक विशाल सेना खड़ी कर विदेशी सत्ता के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। अर्थशास्त्र के अनुसार उसकी सेना में विविध श्रेणियों के योद्धा सम्मिलित थे- चोर अथवा प्रतिरोधक, म्लेच्छ, चोरगण, आटविक (वनवासी) और शस्त्रोपजीवी। यही कारण था कि जस्टिन ने चंद्रगुप्त की सेना को ‘डाकुओं का गिरोह’ कहकर संबोधित किया। मैक्रिंडल के अनुसार इससे तात्पर्य पंजाब के उन गणजातीय (रिपब्लिकन) लोगों से है जिन्होंने सिकंदर के आक्रमण का भी प्रबल प्रतिरोध किया था।

मुद्राराक्षस तथा जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन् से पता चलता है कि चंद्रगुप्त को पर्वतक नामक किसी पहाड़ी क्षेत्र के शासक से सैन्य सहायता प्राप्त हुई थी। कुछ इतिहासकार इस पर्वतक की पहचान राजा पोरस से करते हैं, जिसने झेलम के तट पर सिकंदर से वीरतापूर्वक युद्ध लड़ा था, जबकि अन्य इतिहासकार इसे अभिसारका राजा मानते हैं।

अनुकूल राजनीतिक परिस्थितियाँ

चंद्रगुप्त का यह सौभाग्य था कि उस समय पंजाब तथा सिंधु की राजनीतिक परिस्थितियाँ पूर्णतः उनके अनुकूल थीं। सिकंदर के वापस लौटते ही इन प्रदेशों में विद्रोह भड़क उठे और अनेक यूनानी क्षत्रप मौत के घाट उतार दिए गए। 323 ईसा पूर्व में बेबीलोन में सिकंदर की आकस्मिक मृत्यु के बाद सिंधु और पंजाब में उसके द्वारा स्थापित प्रशासनिक ढाँचा पूरी तरह लड़खड़ा गया। उसके सेनापतियों- डायोडोकी के बीच उत्तराधिकार के लिए गृहयुद्ध छिड़ गया, जिससे भारत में शेष यूनानी शक्ति और भी कमज़ोर पड़ गई।

इतिहासकार जस्टिन के प्रसिद्ध शब्दों में : “सिकंदर की मृत्यु के पश्चात् भारत ने अपनी गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंका तथा उसके गवर्नरों की हत्या कर दी। इस स्वतंत्रता का जन्मदाता सैंड्रोकोटस (चंद्रगुप्त) था।” चंद्रगुप्त की सैन्य और राजनीतिक सफलता का उस समय चरम पर पहुँच गई जब 317 ई.पू. में पश्चिमी पंजाब के अंतिम यूनानी क्षत्रप यूडेमस ने भी भारत छोड़ दिया। इस प्रकार सिंधु और पंजाब के समस्त प्रदेशों पर चंद्रगुप्त का पूर्ण अधिकार स्थापित हो गया।

मगध पर अधिकार और नंद वंश का पतन

चाणक्य और चंद्रगुप्त ने अपना विजय-अभियान एक सुविचारित रणनीति के अंतर्गत सीमांत प्रदेशों से प्रारंभ किया। पालि में इसे ‘पच्चंततो पट्ठाय’ कहा गया है। मार्ग में पड़ने वाले अनेक राष्ट्रों और जनपदों को जीतते हुए व। मगध की ओर बढ़े।

परंतु आरंभिक अभियान में चंद्रगुप्त ने एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक भूल की। उसने अपनी पीछे की जीती हुई भूमि को सुरक्षित रखने के लिए कोई स्थायी सेना नहीं छोड़ी। परिणामस्वरूप जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता, पराजित जातियाँ पुनः स्वतंत्र होकर आपस में संगठित हो जातीं और उसकी पीठ पर वार करतीं। इस भूल से गंभीर सीख लेकर चंद्रगुप्त ने अपनी रणनीति में आमूल परिवर्तन किया। अब जैसे-जैसे वह किसी राष्ट्र या जनपद पर विजय प्राप्त करता, वहाँ अपनी स्थायी सेनाएँ भी नियुक्त कर देता। पालि में इसे ‘उग्गहितनया बलम् संविधाय’ कहा गया है। यह रणनीतिक परिपक्वता उसकी भावी सफलताओं का आधार बनी।

पाटलिपुत्र की घेराबंदी और नंद-मौर्य संघर्ष

सिंधु तथा पंजाब में अपनी स्थिति को पूर्णतः सुदृढ़ करने के पश्चात् चंद्रगुप्त ने अपनी विशाल सेना के साथ मगध की सीमा में प्रवेश किया। तत्कालीन मगध-सम्राट धननंद के पास अपार धन-संपत्ति और विशाल सैनिक शक्ति थी, परंतु वह अपनी प्रजा में अत्यंत अलोकप्रिय था। उसके अत्यधिक करों, मनमानी शासन-नीति और ब्राह्मण-विरोधी व्यवहार ने व्यापक असंतोष उत्पन्न कर दिया था। इसके अतिरिक्त उसने चाणक्य को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की जो भूल की थी, वह अंततः उसके विनाश का कारण बनी।

चंद्रगुप्त तथा नंदों के मध्य हुए वास्तविक युद्ध का विस्तृत विवरण किसी भी एकल स्रोत में उपलब्ध नहीं है। जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन् के एक श्लोक में उल्लेख मिलता है कि “नंद के शासन को समूल नष्ट करने के लिए भूमि के नीचे छिपाकर रखे गए गुप्त धनकोषों की सहायता से चाणक्य ने चंद्रगुप्त की सेना हेतु व्यापक सैनिक भर्ती की।” बौद्ध ग्रंथ मिलिंदपन्हो में भी इस युद्ध का वर्णन मिलता है, जिसमें नंदों के मंत्री भद्दशाल का उल्लेख है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि चंद्रगुप्त ने नंदों के विरुद्ध इस युद्ध में यूनानी वेतनभोगी सैनिकों का भी उपयोग किया होगा।

अंततः इस घमासान युद्ध में धननंद पराजित हुआ। सामान्य मान्यता के अनुसार धननंद मारा गया, यद्यपि कुछ स्रोत उसे देश-निष्कासित बताते हैं। पाटलिपुत्र पर चंद्रगुप्त का पूर्ण अधिकार हो गया और मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ।

प्लूटार्क ने इस विजय की भव्यता का वर्णन करते हुए लिखा है : “उसने छह लाख सेना लेकर समूचे भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।” जस्टिन के अनुसार भी संपूर्ण भारत उसके अधिकार में था। महावंश में उल्लेख है कि कौटिल्य ने चंद्रगुप्त को सकल जंबुद्वीप का सम्राट बनाया।

साम्राज्य विस्तार

पश्चिमी भारत की विजय

पश्चिमी भारत में चंद्रगुप्त के प्रत्यक्ष शासन का सबसे महत्त्वपूर्ण अभिलेखीय प्रमाण शक महाक्षत्रप रुद्रदामन् का प्रसिद्ध जूनागढ़ अभिलेख (लगभग 150 ई.) है। इस अभिलेख के अनुसार वैश्य पुष्यगुप्त सौराष्ट्र प्रांत में चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यपाल (राष्ट्रिय) था और उसने वहाँ प्रसिद्ध सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था। यह झील तत्कालीन भारतीय अभियंत्रण-कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

सौराष्ट्र के दक्षिण में स्थित महाराष्ट्र के सोपारा (नालासोपारा, मुंबई के निकट) से अशोक का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। चूँकि बिंदुसार या अशोक द्वारा इस क्षेत्र की विजय का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है, अतः इस प्रदेश की विजय का श्रेय चंद्रगुप्त मौर्य को ही दिया जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि पश्चिमी तटीय क्षेत्र भी मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत था।

दक्षिण भारत की विजय

चंद्रगुप्त की दक्षिण-विजय के संबंध में अशोक के शिलालेखों, तमिल साहित्य एवं जैन स्रोतों से महत्त्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त होते हैं। मैसूर क्षेत्र से प्राप्त शिलालेखों के अनुसार उत्तरी मैसूर पर चंद्रगुप्त का शासन था। अशोक के लेख सिद्धपुर, ब्रह्मगिरि, जटिंगरामेश्वर (चित्तलदुर्ग, कर्नाटक), गोविमठ, पालक्कि गुंडु, मास्की तथा गूटी (करनूल, आंध्र प्रदेश) जैसे दूरस्थ स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

अशोक के तेरहवें शिलालेख से यह स्पष्ट होता है कि अशोक ने स्वयं केवल कलिंग की ही विजय की थी और उसके बाद उसने युद्ध-घोष के स्थान पर धम्म-घोष को अपना लिया था। इससे स्पष्ट रूप से यह अनुमान होता है कि दक्षिण भारत का विशाल भाग पहले से ही मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत था, जो चंद्रगुप्त के काल में ही विजित हुआ होगा।

प्राचीन तमिल लेखक मामुलनार ने तिनेवेल्लि जिले की पोदियिल पहाड़ियों तक हुए मौर्य आक्रमणों का उल्लेख किया है। तमिल परंपरा से यह भी ज्ञात होता है कि मौर्यों ने एक विशाल सेना के साथ कोशर और वड्डगर जातियों के सहयोग से दक्षिण क्षेत्र के मोहर के राजा पर आक्रमण किया था। चौदहवीं शताब्दी के एक अभिलेख के अनुसार शिकारपुर ताल्लुके के नागरखंड की रक्षा का दायित्व भी मौर्यों पर था। जैन परंपरा के अनुसार चंद्रगुप्त स्वयं अपने जीवन के अंतिम काल में श्रवणबेलगोला में रहे, जो दक्षिण भारत पर मौर्य अधिकार की पुष्टि करता है।

इस प्रकार प्लूटार्क, जस्टिन, तमिल ग्रंथों तथा मैसूर के अभिलेखों के संयुक्त प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि भारत के प्रथम मौर्य सम्राट ने विंध्यपार के अधिकांश भारतीय क्षेत्रों को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था।

सेल्यूकस निकेटर के विरुद्ध सफलता

सेल्यूकस का भारत अभियान (305-304 ई.पू.)

चंद्रगुप्त का अंतिम बड़ा युद्ध सिकंदर के पूर्व सेनापति और उत्तराधिकारियों में सर्वाधिक शक्तिशाली- सीरिया के यूनानी सम्राट सेल्यूकस निकेटर के साथ हुआ। सिकंदर की मृत्यु के पश्चात् सेल्यूकस को उसके साम्राज्य का पूर्वी भाग उत्तराधिकार में मिला था। उसने 312 ईसा पूर्व में बेबीलोन पर विजय प्राप्त की और फिर ईरान के विभिन्न राज्यों को जीतते हुए बैक्ट्रिया पर भी अधिकार कर लिया।

भारत के पंजाब और सिंधु पर पुनः अपना प्रभुत्व स्थापित करने के उद्देश्य से सेल्यूकस 305-304 ईसा पूर्व में सिंधु नदी तक जा पहुँचा। परंतु तब तक भारत की राजनीतिक स्थिति पूर्णतः बदल चुकी थी। अब सेल्यूकस को पंजाब-सिंधु के परस्पर युद्धरत छोटे-छोटे राज्यों से नहीं, बल्कि एक सुसंगठित और शक्तिशाली साम्राज्य के स्वामी चंद्रगुप्त से मुकाबला करना था।

संधि और उसकी शर्तें

यूनानी तथा रोमन लेखकों ने इस युद्ध का विस्तृत विवरण नहीं दिया है। एप्पियानुस ने संक्षेप में लिखा है : “सेल्यूकस ने सिंधु नदी पार की और भारत के सम्राट चंद्रगुप्त से युद्ध छेड़ दिया। अंततः उनके बीच संधि हो गई और वैवाहिक संबंध स्थापित हो गया।” एप्पियानुस के इस कथन से स्पष्ट होता है कि सेल्यूकस को चंद्रगुप्त के विरुद्ध कोई निर्णायक सैनिक सफलता नहीं मिली, बल्कि उसे अपने पूर्वी राज्य की सुरक्षा हेतु चंद्रगुप्त से संधि करना ही उचित समझा।

भूगोलवेत्ता स्ट्रैबो के अनुसार सेल्यूकस ने इस विवाह-संबंध के फलस्वरूप ऐरियाना का प्रदेश चंद्रगुप्त को सौंप दिया और बदले में पाँच सौ हाथी प्राप्त किए। इस संधि में चंद्रगुप्त को सेल्यूकस से चार महत्त्वपूर्ण प्रांत प्राप्त हुए-एरिया (हेरात, अफगानिस्तान),अराकोसिया (कंधार, अफगानिस्तान), जेड्रोसिया (मकरान, बलूचिस्तान) और पेरीपेमिसदाई (काबुल घाटी)। अशोक के अभिलेखों से भी पुष्टि होती है कि काबुल की घाटी और गांधार (योन) प्रदेश मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत थे।

प्लूटार्क के अनुसार चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 हाथी उपहारस्वरूप भेंट किए। इन भारतीय हाथियों का पश्चिमी युद्धों पर गहरा और दीर्घकालीन प्रभाव पड़ा। इप्सस के युद्ध (301 ई.पू.) में चंद्रगुप्त के दिए हाथियों ने सेल्यूकस के प्रबल शत्रु एंटीगोनस की पराजय में निर्णायक भूमिका निभाई। इसके पश्चात् पश्चिमी देशों में भारतीय हाथियों की भारी माँग होने लगी। 281 ईसा पूर्व में एपिरोस के राजा पाइर्रहोस इन हाथियों को इटली ले गए। 251 ईसा पूर्व में हसड्रुबल ने पैनोरमन के युद्ध में भारतीय महावतों द्वारा संचालित हाथियों का प्रयोग किया। रोम के विरुद्ध द्वितीय प्यूनिक युद्ध में हनिबाल तथा हसड्रुबल ने भी इन्हीं हाथियों का प्रयोग किया और राफिया के युद्ध में टॉलेमी के लीबियाई हाथी एंटीओकस के भारतीय हाथियों के सामने टिक न सके

मेगस्थनीज का आगमन और इंडिका की रचना

इस ऐतिहासिक संधि के फलस्वरूप सेल्यूकस ने अपने राजदूत मेगस्थनीज को चंद्रगुप्त के दरबार में भेजा। मेगस्थनीज ने चंद्रगुप्त के दरबार में लगभग 304 से 299 ईसा पूर्व तक निवास किया और भारत के विषय में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक इंडिका लिखी। इसमें उसने मौर्यकालीन भारत के समाज, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, नगर-नियोजन और जनजीवन का विस्तृत वर्णन किया। यद्यपि मूल ग्रंथ उपलब्ध नहीं है, परंतु उसके अनेक अंश बाद के यूनानी और रोमन लेखकों के ग्रंथों में मिलते हैं।

यूनानी लेखक एथेनियस के अनुसार चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस के पास कुछ भारतीय औषधियों का उपहार भी भेजा था, जिनमें एक प्रकार का विशेष द्रव भी था। इस प्रकार यह संधि केवल युद्ध और भू-अधिग्रहण तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसने दोनों साम्राज्यों के बीच वाणिज्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक आदान-प्रदान का मार्ग भी प्रशस्त किया।

संधि का महत्त्व

यह संधि चंद्रगुप्त की एक महान् कूटनीतिक और सैन्य सफलता थी। इसके पश्चात् उसका साम्राज्य भारतीय सीमा को लाँघकर ईरानी (पारसीक) साम्राज्य की सीमा को स्पर्श करने लगा और उसमें अफगानिस्तान का एक बड़ा भाग भी सम्मिलित हो गया। चंद्रगुप्त और सेल्यूकस के राज्यों के मध्य हिंदुकुश पर्वत-शृंखला भारत की स्वाभाविक (वैज्ञानिक) सीमा बन गई, जिसे यूनानी लेखकों ने पैरोपनिसस (इंडियन काकेशस) कहा है। दो हज़ार वर्ष से भी अधिक समय पूर्व भारत के प्रथम ऐतिहासिक सम्राट ने उस प्राकृतिक सीमा को प्राप्त कर लिया था, जिसके लिए बाद में अंग्रेज व्यर्थ ही तरसते रहे और जिसे मुगल सम्राट भी कभी पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सके।

चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य की सीमाएँ

मगध के विस्तार की जो परंपरा राजा बिंबिसार (544-492 ई.पू.) के काल से आरंभ हुई थी, वह चंद्रगुप्त मौर्य के समय में अपनी पराकाष्ठा पर जा पहुँची। चंद्रगुप्त का विशाल साम्राज्य उत्तर-पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक (मैसूर क्षेत्र) तक फैला हुआ था। पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तथा सोपारा तक के समस्त प्रदेश उसके अधीन थे। सिंधु एवं गंगा के विशाल मैदानी क्षेत्र तथा सुदूर उत्तर-पश्चिम (अफगानिस्तान का भाग) भी चंद्रगुप्त के नियंत्रण में आ गए थे।

प्रशासनिक प्रांत-विभाजन

चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में विशाल मौर्य साम्राज्य को प्रभावी प्रशासन और नियंत्रण की सुविधा के लिए चार प्रशासनिक इकाइयों में संगठित किया गया था। प्रमुख केंद्रों में उत्तर-पश्चिम में तक्षशिला, पश्चिमी एवं मध्य भारत में उज्जयिनी तथा दक्षिणी क्षेत्र में सुवर्णगिरि का विशेष महत्व था, जबकि पाटलिपुत्र साम्राज्य की केंद्रीय राजधानी और सर्वोच्च प्रशासनिक केंद्र था। तक्षशिला उत्तर-पश्चिमी सीमा क्षेत्रों के प्रशासन तथा विदेशी आक्रमणों की निगरानी के लिए महत्वपूर्ण थी, उज्जयिनी पश्चिमी और मध्य भारत के प्रशासन का प्रमुख केंद्र थी तथा सुवर्णगिरि दक्षिणी क्षेत्रों के प्रशासन से जुड़ा महत्वपूर्ण केंद्र था। पाटलिपुत्र से सम्राट और केंद्रीय प्रशासन पूरे साम्राज्य पर नियंत्रण रखते थे। किंतु चंद्रगुप्त मौर्य के समय साम्राज्य को ठीक-ठीक चार प्रांतों-उत्तरापथ, अवंतिराष्ट्र, दक्षिणापथ और प्राच्य में विभाजित किए जाने का स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है और इन नामों और प्रांतीय व्यवस्था का विस्तृत विवरण मुख्यतः बाद के स्रोतों तथा अशोककालीन प्रशासन से संबंधित साक्ष्यों से मिलता है।

प्रत्येक प्रांत का शासन एक राजकुमार अथवा उच्च राजपुरुष के अधीन होता था, जिससे इतने विशाल साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण रखना संभव हो सका। यह प्रांतीय व्यवस्था मौर्य प्रशासनिक प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण है।

चंद्रगुप्त मौर्य का प्रशासन

मुख्य लेख : चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था

केंद्रीकृत प्रशासनिक तंत्र

चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने विशाल साम्राज्य के संचालन हेतु एक अत्यंत सुदृढ़ एवं केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की। इस व्यवस्था में संगठित कर-प्रणाली, एक शक्तिशाली स्थायी सेना, कुशल प्रशिक्षित अधिकारीगण, एक प्रभावी गुप्तचर तंत्र तथा कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने की सुव्यवस्थित प्रणालियाँ सम्मिलित थीं। राज्य के कार्यों और नीतियों के संचालन के लिए एक मंत्रिपरिषद थी, जिसमें चाणक्य (कौटिल्य) मुख्यमंत्री और प्रधान सलाहकार थे। पाटलिपुत्र मौर्य प्रशासन का केंद्र था और यहीं से सम्राट तथा उनके अधिकारी विशाल साम्राज्य का संचालन करते थे।

विशाल सैन्य शक्ति

साम्राज्य की सुरक्षा और आंतरिक शांति सुनिश्चित करने के लिए मौर्य राज्य के पास पैदल सेना, अश्वारोही सेना, रथ तथा युद्ध हाथियों से युक्त एक विशाल स्थायी सेना थी। मेगस्थनीज ने सेना के छह विभागों का उल्लेख किया है- नौसेना, परिवहन एवं रसद, पैदल सेना, अश्वारोही सेना, रथ सेना और गजसेना। प्रत्येक विभाग में पाँच-पाँच सदस्यों की एक समिति होती थी। यूनानी विवरणों में सेना की संख्या के भिन्न-भिन्न अनुमान मिलते हैं, परंतु ये सभी एक अत्यंत शक्तिशाली सैन्य बल की ओर संकेत करते हैं।

गुप्तचर व्यवस्था

मौर्य प्रशासन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता एक सुदृढ़ गुप्तचर तंत्र भी था। अर्थशास्त्र में गुप्तचरों की विभिन्न श्रेणियों- संस्था (स्थायी गुप्तचर) और संचार (भ्रमणशील गुप्तचर) का विस्तृत वर्णन है। इस सूचना-संकलन व्यवस्था से राज्य को अधिकारियों पर निगरानी रखने, राजनीतिक घटनाक्रमों पर नज़र रखने तथा संभावित खतरों की पहचान करने में सहायता मिलती थी। यह गुप्तचर तंत्र भारतीय इतिहास का सबसे परिष्कृत प्रारंभिक खुफिया तंत्र माना जाता है।

पाटलिपुत्र की नगर-प्रशासन व्यवस्था

मेगस्थनीज ने राजधानी पाटलिपुत्र के प्रशासन हेतु छह विशेष समितियों का उल्लेख किया है, जो नगर की विभिन्न गतिविधियों की देखरेख करती थीं-

  1. शिल्प और उद्योग समिति : औद्योगिक उत्पादन का नियमन
  2. विदेशी नागरिक समिति : विदेशियों की सुरक्षा और देखभाल
  3. जनगणना समिति : जन्म-मृत्यु का लेखा-जोखा
  4. व्यापार समिति : व्यापार-वाणिज्य का नियमन
  5. निर्मित वस्तु समिति : विनिर्मित वस्तुओं पर नियंत्रण
  6. कर-वसूली समिति : राजस्व संग्रह

यह नगर-प्रशासन व्यवस्था तत्कालीन विश्व में अत्यंत उन्नत और परिष्कृत मानी जाती है।

कृषि, व्यापार और अवसंरचना विकास

कृषि एवं व्यापार मौर्य अर्थव्यवस्था के आधार-स्तंभ थे। राज्य आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करता था तथा संचार, परिवहन एवं वाणिज्यिक आदान-प्रदान में सहायक अवसंरचना को बढ़ावा देता था। पाटलिपुत्र को तक्षशिला एवं अन्य क्षेत्रों से जोड़ने वाले प्रमुख राजमार्ग बनाए गए, जिनसे लोगों, वस्तुओं और सैन्य बलों की आवाजाही सुगम होती थी। यह प्राचीन ‘उत्तरापथ’ मार्ग आगे चलकर अनेक शताब्दियों तक भारत की वाणिज्यिक जीवन-रेखा बना रहा।

मौर्य प्रशासन तौल-माप, कराधान तथा आर्थिक नियमन पर भी विशेष ध्यान देता था। अर्थशास्त्र में बाट-माप की अधिकृत प्रणाली, मानकीकृत मुद्रा और व्यापारिक नियमों का विस्तृत उल्लेख है।

लोकोपकारी कार्य

यद्यपि चंद्रगुप्त मौर्य एक शक्तिशाली और केंद्रीकृत शासन व्यवस्था वाला सम्राट था, फिर भी उसने प्रजा के भौतिक जीवन को सुखी और सुरक्षित बनाने का प्रयास किया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजा के अनेक जनकल्याणकारी दायित्वों का उल्लेख मिलता है। राज्य द्वारा रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने, विधवाओं और अनाथों के भरण-पोषण, मजदूरी तथा वस्तुओं के मूल्य पर नियंत्रण और श्रमिकों तथा दासों को स्वामियों के अत्याचार से बचाने के लिए नियम बनाए गए थे। युद्ध में मारे गए सैनिकों के परिवारों तथा असहाय लोगों की सहायता का दायित्व भी राज्य पर था। मेगस्थनीज के विवरण से पता चलता है कि अधिकारी भूमि की नाप-जोख करते थे और सिंचाई के लिए नहरों के जल का उचित वितरण सुनिश्चित करते थे।

सुदर्शन झील

सिंचाई-व्यवस्था के लिए चंद्रगुप्त ने विशेष प्रबंध किया था। रुद्रदामन् के जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि पश्चिमी भारत में सौराष्ट्र प्रांत के राज्यपाल पुष्यगुप्त वैश्य ने ऐतिहासिक सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था। यह झील गिरनार पर्वत के समीप रैवतक तथा ऊर्जयत पर्वतों के जलस्रोतों पर कृत्रिम बाँध बनाकर तैयार की गई थी। अभिलेख में उल्लेख है- ‘मौर्यस्य राज्ञस्य चंद्रगुप्तस्य राष्ट्रियेण वैश्येन पुष्यगुप्तेन कारितं, अशोकस्य मौर्यस्य यवनराजेन तुषास्पेनाधिष्ठाय प्रणालीभिरलंकृतं कृतम्’ अर्थात् यह झील चंद्रगुप्त के राज्यपाल पुष्यगुप्त ने बनवाई और अशोक के काल में यवन-राज्यपाल तुषास्प ने इसमें नहरें बनवाईं। कौटिल्य ने भी अपने अर्थशास्त्र में सिंचाई के लिए बाँधों के निर्माण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया है।

 चंद्रगुप्त मौर्य का यह शासन-प्रबंध एक कल्याणकारी राज्य की प्रारंभिक अवधारणा को साकार करता प्रतीत होता है- शासन निरंकुश था, दंड-व्यवस्था कठोर थी, परंतु अंतिम लक्ष्य सदैव लोकहित ही रहा।

चंद्रगुप्त मौर्य का धर्म और धार्मिक नीति

चंद्रगुप्त मौर्य धार्मिक विषयों में भी विशेष रुचि रखता था। यूनानी लेखकों के अनुसार जिन चार अवसरों पर राजा अपने महल से बाहर निकलता था, उनमें से एक यज्ञ-अनुष्ठान का अवसर होता था। चाणक्य स्वयं उसका पुरोहित तथा मुख्यमंत्री दोनों था।

जैन आचार्य हेमचंद्र ने भी लिखा है कि चंद्रगुप्त ब्राह्मणों का विशेष आदर करता था। मेगस्थनीज के अनुसार चंद्रगुप्त वन में निवास करने वाले तपस्वियों (श्रमणों) से नियमित परामर्श करता था और उन्हें देवताओं की पूजा-अर्चना के कार्य में नियुक्त करता था। वर्ष में एक बार विद्वान ब्राह्मणों की एक विशेष सभा भी बुलाई जाती थी, ताकि वे जनकल्याण संबंधी उचित परामर्श दे सकें। दार्शनिकों तथा विद्वानों से निरंतर संपर्क बनाए रखना चंद्रगुप्त मौर्य की जिज्ञासु एवं ज्ञानपिपासु प्रवृत्ति का स्पष्ट परिचायक है।

चंद्रगुप्त मौर्य का कालक्रम

यूनानी विवरणों तथा चीन के प्रसिद्ध कैंटोन अभिलेख के आधार पर चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण सामान्यतः 322 ईसा पूर्व में माना जाता है। पुराणों के अनुसार उसने कुल 24 वर्षों तक शासन किया था। इस आधार पर उसका शासनकाल 322 ईसा पूर्व से 298 ईसा पूर्व तक निर्धारित किया जाता है।

चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन का अंतिम चरण

जैन धर्म का ग्रहण

जैन परंपराओं के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने जीवन के अंतिम चरण में जैन धर्म स्वीकार कर लिया और आचार्य भद्रबाहु की शिष्यता ग्रहण की। आचार्य भद्रबाहु उस काल के सर्वाधिक प्रतिष्ठित जैन आचार्य थे और दिगंबर जैन परंपरा के आद्य प्रवर्तक माने जाते हैं। कहा जाता है कि उनके शासनकाल के अंतिम वर्षों में मगध में लगातार बारह वर्षों तक भीषण अकाल पड़ा था, जिसके कारण राज्य में भयंकर संकट उत्पन्न हो गया था, किंतु इस अकाल की घटना का समर्थन किसी अन्य स्वतंत्र ऐतिहासिक स्रोत से नहीं होता है।

श्रवणबेलगोला में अंतिम जीवन

चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने पुत्र बिंदुसार के पक्ष में स्वेच्छापूर्वक सिंहासन का त्याग किया और भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला (कर्नाटक के मैसूर क्षेत्र में स्थित) की ओर प्रस्थान किया। वहाँ चंद्रगिरि पहाड़ी पर लगभग **298 ईसा पूर्व में उसने एक सच्चे जैन भिक्षु की भाँति धीरे-धीरे अन्न-जल का त्याग करके सल्लेखना व्रत के माध्यम से अपने जीवन का अंत किया। जैन धर्म में सल्लेखना एक पवित्र धार्मिक व्रत माना जाता है, जिसमें निर्धारित धार्मिक परिस्थितियों में क्रमशः आहार का त्याग किया जाता है।

श्रवणबेलगोला की वह छोटी पहाड़ी आज भी ‘चंद्रगिरि’ के नाम से प्रसिद्ध है और वहाँ आज भी ‘चंद्रगुप्त बस्ती’ नामक एक प्राचीन मंदिर विद्यमान है। 900 ईस्वी के बाद के अनेक शिलालेखों में भद्रबाहु और चंद्रगुप्त दोनों का एक साथ उल्लेख मिलता है, जो इस परंपरा की प्राचीनता और व्यापक लोकप्रियता को प्रमाणित करता है।

चंद्रगुप्त मौर्य का मूल्यांकन

चंद्रगुप्त मौर्य का शासन भारतीय इतिहास में मौर्य साम्राज्यवादी परंपरा की शुरुआत का प्रतीक है। उसके राजनीतिक प्रयासों, प्रशासनिक व्यवस्था, सैन्य संगठन और कूटनीतिक कुशलता ने उस मज़बूत साम्राज्य की नींव रखी, जिसे बाद में उसके पुत्र बिंदुसार और पौत्र अशोक ने और अधिक विस्तार दिया। मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त केवल एक कुशल योद्धा, सफल सेनानायक और महान् विजेता ही नहीं था, वरन् एक अत्यंत योग्य और दूरदर्शी शासक भी था।

एक सामान्य कुल में जन्म लेकर अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में पले-बढ़े चंद्रगुप्त ने अपनी असाधारण योग्यता, अदम्य धैर्य और कुशल रणनीति के बल पर भारत के प्रथम ऐतिहासिक सम्राट होने का गौरव प्राप्त किया। उसने प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में वर्णित चक्रवर्ती सम्राट के आदर्श को वास्तविक धरातल पर मूर्त रूप दिया।

चंद्रगुप्त के विशाल साम्राज्य में लगभग संपूर्ण उत्तरी और पूर्वी भारत के साथ-साथ उत्तर में बलूचिस्तान, दक्षिण में मैसूर तथा दक्षिण-पश्चिम में सौराष्ट्र तक का विस्तृत भू-भाग सम्मिलित था। उसने भारत की उस वैज्ञानिक (प्राकृतिक) सीमा को प्राप्त कर लिया था, जिसे पाने के लिए बाद में मुगल सम्राट तरसते रहे और अंग्रेज केवल लालसा लिए रह गए।

चंद्रगुप्त मौर्य युद्ध-क्षेत्र में जितना स्फूर्तिवान् और तीक्ष्ण था, शांतिकाल में उतना ही परिश्रमी और कर्मठ शासक था। उसकी संपूर्ण शासन-व्यवस्था का चरम लक्ष्य अर्थशास्त्र के इस उद्धरण से भली-भाँति व्यक्त होता है-

“प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा की भलाई में ही उसकी भलाई है। राजा को जो अच्छा लगे वह हितकर नहीं है, वरन् हितकर वह है जो प्रजा को अच्छा लगे।” यही सिद्धांत आगे चलकर चंद्रगुप्त के पौत्र सम्राट अशोक की धम्म-नीति का भी आधार बना। इसीलिए चंद्रगुप्त मौर्य न केवल एक महान् विजेता, बल्कि भारतीय राजतंत्र में जनकल्याण की परंपरा का अग्रदूत भी था।

चंद्रगुप्त मौर्य से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. चंद्रगुप्त मौर्य कौन थे?

चंद्रगुप्त मौर्य प्राचीन भारत के महानतम सम्राट और मौर्य वंश के संस्थापक थे। उन्होंने गुरु चाणक्य के सहयोग से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की, जिसे उनके पौत्र अशोक ने अपनी चरम सीमा तक पहुँचाया।

2. चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश को कैसे समाप्त किया?

चाणक्य के मार्गदर्शन में चंद्रगुप्त ने सर्वप्रथम पंजाब-सिंधु से यूनानी सत्ता समाप्त की, फिर क्रमबद्ध सीमांत रणनीति अपनाते हुए नंद शासक धननंद को युद्ध में पराजित कर मगध में मौर्य सत्ता की स्थापना की।

3. चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस निकेटर के बीच क्या संबंध था?

लगभग 305-304 ईसा पूर्व में हुए संघर्ष में चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को सफलतापूर्वक रोका। संधि के अंतर्गत सेल्यूकस ने चार प्रांत (एरिया, अराकोसिया, जेड्रोसिया, पेरीपेमिसदाई) सौंपे और वैवाहिक संबंध स्थापित हुआ, बदले में चंद्रगुप्त ने 500 हाथी भेंट किए। इसी संधि के फलस्वरूप मेगस्थनीज मौर्य दरबार में राजदूत बनकर आया।

4. चंद्रगुप्त मौर्य के शासन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?

चंद्रगुप्त मौर्य के शासन की विशेषताएँ थीं- सुदृढ़ केंद्रीकृत प्रशासन, विशाल संगठित सेना, व्यवस्थित कर-प्रणाली, कुशल गुप्तचर तंत्र, सिंचाई व जनकल्याण के विशेष प्रबंध, तथा पाटलिपुत्र में छह नगर-प्रशासन समितियाँ। अर्थशास्त्र इस व्यवस्था को समझने का प्रमुख स्रोत है।

5. चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन का अंतिम चरण कैसा था?

जैन परंपरा के अनुसार चंद्रगुप्त ने राजपाट पुत्र बिंदुसार को सौंपकर जैन धर्म अपनाया और आचार्य भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) गए, जहाँ चंद्रगिरि पहाड़ी पर लगभग 298 ईसा पूर्व में सल्लेखना व्रत द्वारा जीवन का अंत किया।

6. सैंड्रोकोटस की पहचान चंद्रगुप्त मौर्य से कैसे हुई?

यूनानी-रोमन स्रोतों में वर्णित ‘सैंड्रोकोटस’ की पहचान चंद्रगुप्त मौर्य से सर्वप्रथम प्राच्यविद् सर विलियम जोन्स ने 1793 ईस्वी में की थी। यह खोज प्राचीन भारतीय इतिहास की कालक्रम-निर्धारण प्रक्रिया में एक मील का पत्थर सिद्ध हुई।

7. चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य कहाँ तक फैला था?

चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य उत्तर-पश्चिम में सिंधु नदी व अफगानिस्तान के भाग से लेकर दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक तक, तथा पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र-सोपारा तक विस्तृत था। यह प्राचीन भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग पर फैला पहला एकीकृत साम्राज्य था।
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