मौर्यों की उत्पत्ति (Origin of the Mauryas)

मौर्यों की उत्पत्ति (Origin of the Mauryas)
मौर्यों की उत्पत्ति प्राचीन भारतीय इतिहास में मौर्यों की उत्पत्ति और विशेष रूप से चंद्रगुप्त […]

मौर्यों की उत्पत्ति

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प्राचीन भारतीय इतिहास में मौर्यों की उत्पत्ति और विशेष रूप से चंद्रगुप्त मौर्य की जाति के विषय में इतिहासकारों और साहित्यिक परंपराओं में गहरा मतभेद पाया जाता है। यह विवाद आधुनिक निर्माण नहीं, बल्कि प्राचीन काल से ही ब्राह्मण, बौद्ध, जैन तथा विदेशी (यूनानी) स्रोतों में परस्पर विरोधी विवरणों का परिणाम है। पौराणिक तथा कुछ संस्कृत नाट्य-परंपराएँ चंद्रगुप्त को निम्नकुल अथवा शूद्र सिद्ध करने का प्रयास करती हैं, जबकि बौद्ध और जैन साहित्य उसे स्पष्टतः क्षत्रिय कुल की संतान बताते हैं। इस असमानता का मूल कारण यह है कि प्रत्येक धार्मिक परंपरा ने अपनी वैचारिक दृष्टि और तत्कालीन राजनीतिक हितों के अनुसार चंद्रगुप्त की वंशावली गढ़ी।

पुराणों में नंदों को शूद्र बताया गया है, किंतु मौर्यों की उत्पत्ति के विषय में स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती। विष्णु पुराण के एक परवर्ती टीकाकार ने चंद्रगुप्त को नंदराज की पत्नी ‘मुरा’ से उत्पन्न बताया और इसी आधार पर उसे शूद्र माना गया। किंतु यह मत मूल पुराणों के स्पष्ट प्रमाण पर आधारित नहीं है। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार भी ‘मौर्य’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘मुरा’ से सिद्ध नहीं होती। विशाखदत्त के नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में चंद्रगुप्त को नंदों से संबंधित बताया गया है तथा उसके लिए ‘वृषल’ और ‘कुलहीन’ शब्दों का प्रयोग हुआ है। कुछ विद्वान इन शब्दों को शूद्र अर्थ में लेते हैं, किंतु प्राचीन साहित्य में इनका प्रयोग धर्मच्युत अथवा निम्न सामाजिक स्थिति वाले व्यक्ति के लिए भी मिलता है। चूँकि मुद्राराक्षस एक परवर्ती रचना है, अतः इसे निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। ‘कथासरित्सागर’ और क्षेमेंद्र की ‘बृहत्कथामंजरी’ में भी चंद्रगुप्त को नंदवंश से जोड़ने वाली कथाएँ मिलती हैं, किंतु ये ग्यारहवीं शताब्दी की परवर्ती रचनाएँ होने से ऐतिहासिक दृष्टि से संदिग्ध मानी जाती हैं। इसके विपरीत, बौद्ध साहित्य में चंद्रगुप्त को क्षत्रिय कहा गया है। ‘महावंस’ और ‘महाबोधिवंस’ में उसे ‘मोरिय’ नामक क्षत्रिय वंश में उत्पन्न बताया गया है, जबकि ‘महापरिनिब्बानसुत्त’ में पिप्पलिवन के मौर्यों को क्षत्रिय बताया गया है। ‘दिव्यावदान’ में बिंदुसार को विधिवत् क्षत्रिय-अभिषिक्त और अशोक को भी क्षत्रिय कहा गया है। जैन परंपरा में चंद्रगुप्त का संबंध मयूर-पोषकों के समुदाय से जोड़कर उसे क्षत्रिय माना गया है। यूनानी लेखकों के विवरण से उसके सामान्य कुल से उत्पन्न होने का संकेत मिलता है, किंतु शूद्र उत्पत्ति का निश्चित प्रमाण नहीं मिलता है। पुरातात्त्विक साक्ष्यों में भी मयूर-प्रतीक मिलता है- अशोक के लौरिया-नंदनगढ़ स्तंभ तथा साँची की कला में मयूर-अंकन से ‘मौर्य’ नाम के मयूर से संबंध की संभावना व्यक्त होती है।

मौर्यों की उत्पत्ति संबंधी विभिन्न मत

मौर्य वंश का संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य था, किंतु उसकी जाति और आरंभिक जीवन के संबंध में कोई स्पष्ट और एकमत सूचना नहीं मिलती है। ब्राह्मण ग्रंथ प्रायः एक स्वर में मौर्यों को शूद्र अथवा निम्नकुल से संबंधित करते हैं, जबकि जैन और बौद्ध ग्रंथों में उन्हें क्षत्रिय बताया गया है। कुछ इतिहासकार, विशेषकर रोमिला थापर मौर्यों को वैश्य सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। यही नहीं, डी. बी. स्पूनर जैसे कुछ इतिहासकार तो मौर्यों को पारसीक (ईरानी/आखमेनी) मूल का मानते हैं। उनका तर्क पाटलिपुत्र के राजप्रासाद में मिले स्तंभों की पर्सेपोलिस-शैली से प्रभावित बनावट पर आधारित था। किंतु विंसेंट स्मिथ, ए. बी. कीथ तथा अन्य विद्वानों ने इस मत को पूर्णतया अस्वीकार कर दिया है, क्योंकि स्थापत्य शैली में समानता मात्र से किसी शासक वंश की मूल जाति सिद्ध नहीं होती। इस प्रकार मौर्योत्पत्ति के विषय में मुख्यतः तीन प्रमुख मत प्रचलित हैं- शूद्र उत्पत्ति का मत, वैश्य उत्पत्ति का मत, तथा क्षत्रिय उत्पत्ति का मत। आगे इन तीनों मतों का विस्तार से विवेचन प्रस्तुत है।

शूद्र उत्पत्ति का मत

विद्वानों का एक वर्ग ब्राह्मण ग्रंथों- मुद्राराक्षस, विष्णु पुराण की मध्यकालीन टीका तथा अठारहवीं शताब्दी की ढुंढिराज द्वारा रचित मुद्राराक्षस की टीका के आधार पर चंद्रगुप्त को शूद्र मानता है।

पौराणिक साक्ष्य

पुराणों में नंदों को शूद्र बताया गया है और विष्णु पुराण में कहा गया है कि “शैशुनागवंशीय शासक महानंदि के बाद शूद्रयोनि के राजा पृथ्वी पर शासन करेंगे” (ततः प्रभृत्ति राजानो भविष्यन्ति शूद्रयोनयः)। विष्णु पुराण के एक भाष्यकार श्रीधरस्वामी ने चंद्रगुप्त को नंदराज की पत्नी ‘मुरा’ से उत्पन्न बताया है, और ‘मुरा’ की संतान होने के कारण ही उसे ‘मौर्य’ कहा गया (चंद्रगुप्तम् नंदस्यैव पत्यंतरस्य मुरासंज्ञस्य पुत्रं मौर्याणाम् प्रथमम्)।

मुद्राराक्षस

विशाखदत्त के नाटक मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त को नंदवंश की संतान कहा गया है, किंतु ‘नंदपुत्र’ न कहकर ‘मौर्यपुत्र’ कहा गया है। इससे पता चलता है कि वह सर्वार्थसिद्धि के पुत्र मौर्य का पुत्र था और सर्वार्थसिद्धि नौ नंदों का पिता था तथा स्वयं नंदवंश की संतान था। इस बूढ़े राजा को भी नंद कहा गया है। नाटक से पता चलता है कि राक्षस के परामर्श से वह पाटलिपुत्र छोड़कर वन में भाग गया था, क्योंकि चंद्रगुप्त तथा चाणक्य ने एक-एक करके उसके सभी पुत्रों (नौ नंदों) को मरवा डाला था। फिर भी, चंद्रगुप्त को अपने पिता का हत्यारा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसे कहीं ‘नंदपुत्र’ नहीं कहा गया है- वह उन नौ नंदों में से किसी की भी संतान नहीं था। उसके लिए प्रयुक्त ‘मौर्यपुत्र’ शब्द के कारण वह इस जघन्य अपराध के दोष से मुक्त हो जाता है।

इस ग्रंथ में नंदों को ‘उच्चकुल’ तथा चंद्रगुप्त को ‘निम्नकुल’ का बताया गया है। ग्रंथ में चंद्रगुप्त के लिए ‘वृषल’ और ‘कुलहीन’ शब्दों का प्रयोग किया गया है। शूद्र उत्पत्ति के समर्थक इतिहासकार इन दोनों शब्दों को शूद्र के अर्थ में ग्रहण करते हैं।

ढुंढिराज की कथा

अठारहवीं शताब्दी ईस्वी के मुद्राराक्षस के टीकाकार ढुंढिराज ने चंद्रगुप्त को शूद्र सिद्ध करने के लिए एक नई कहानी गढ़ी है। उनके अनुसार सर्वार्थसिद्धि नामक एक क्षत्रिय राजा की दो पत्नियाँ थीं- सुनंदा और मुरा। सुनंदा एक क्षत्राणी थी, जिसके नौ पुत्र हुए और जो ‘नवनंद’ कहलाए। मुरा शूद्रा (वृषलात्मजा) थी, और उसके एक पुत्र हुआ, जो मौर्य कहलाया। ढुंढिराज के अनुसार चंद्रगुप्त का पिता मौर्य था और सर्वार्थसिद्धि ने मौर्य को अपना सेनापति बनाया था। इस पर नंदबंधुओं ने छल से मौर्य तथा उसके सभी पुत्रों को मरवा दिया, किंतु चंद्रगुप्त भाग निकला। नंदों का एक दूसरा शत्रु चाणक्य भी था; समान शत्रु के कारण दोनों मित्र बन गए।

कथासरित्सागर और बृहत्कथामंजरी का विवरण

ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के दो संस्कृत ग्रंथों- सोमदेव के ‘कथासरित्सागर’ तथा क्षेमेंद्र की ‘बृहत्कथामंजरी’ में चंद्रगुप्त की शूद्र उत्पत्ति का एक भिन्न विवरण मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार नंदराज की अचानक मृत्यु हो गई और इंद्रदत्त नामक व्यक्ति योग के बल पर उसके शरीर में प्रवेश कर गया और राजा बन बैठा। वह योगनंद के नाम से जाना जाने लगा। उसने नंदराज की पत्नी से विवाह कर लिया, जिससे उसे हिरण्यगुप्त नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वास्तविक नंदराजा के पहले ही एक पुत्र था- चंद्रगुप्त। योगनंद अपने तथा अपने पुत्र के मार्ग में चंद्रगुप्त को बाधक समझता था, जबकि वास्तविक नंदराज के मंत्री शकटार ने चंद्रगुप्त का पक्ष लिया। उसने चाणक्य नामक ब्राह्मण को अपनी ओर मिलाकर योगनंद और हिरण्यगुप्त की हत्या करवा दी, और राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी चंद्रगुप्त को गद्दी पर बैठाया। इस प्रकार चंद्रगुप्त को नंदराज का पुत्र मानकर उसे शूद्र माना जाता है।

शूद्र मत का खंडन

चंद्रगुप्त को शूद्र मानने का मत कल्पना पर आधारित प्रतीत होता है। पुराण एक स्वर से नंदों को शूद्र मानते हैं, किंतु मौर्यों की जाति के संबंध में मौन हैं। विष्णु पुराण का कथन केवल नंदों पर ही लागू होता है, क्योंकि इसके बाद के सभी राजवंश शूद्र नहीं थे। पुराणों में स्पष्ट कहा गया है कि द्विजर्षभ (श्रेष्ठ ब्राह्मण) कौटिल्य सभी नंदों को मारकर चंद्रगुप्त को सिंहासनासीन करेगा-

‘उद्वरिष्यति तान् सर्वान् कौटिल्यो द्विजर्षभः।

कौटिल्याश्चंद्रगुप्तं तु ततो राज्येभिषेक्ष्यति।।‘

पाणिनीय व्याकरण के अनुसार ‘मौर्य’ शब्द की व्युत्पत्ति पुल्लिंग ‘मूर’ शब्द से होगी। ‘मुरा’ शब्द से ‘मौरेय’ बन सकता है, ‘मौर्य’ नहीं। व्याकरणिक दृष्टि से भी ‘मुरा’ से चंद्रगुप्त का संबंध जोड़ना संदिग्ध है। मुद्राराक्षस का साक्ष्य भी विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि इसमें नंदों को स्वयं ‘उच्चकुल’ का बताया गया है। जहाँ तक ‘वृषल’ और ‘कुलहीन’ शब्दों का प्रश्न है, इस आधार पर भी चंद्रगुप्त को शूद्र नहीं माना जा सकता है। मनुस्मृति तथा महाभारत में ‘वृषल’ शब्द का प्रयोग धर्मच्युत व्यक्ति के लिए किया गया है, जाति-विशेष के लिए नहीं। मुद्राराक्षस में ‘वृषल’ का प्रयोग चंद्रगुप्त के लिए कौटिल्य द्वारा वस्तुतः अच्छे अर्थों में किया गया प्रतीत होता है क्योंकि एक स्थान पर उसे राजाओं में ‘वृष’ (राजाओं में सर्वोत्तम) कहा गया है, इसलिए इसे जाति का बोधक नहीं माना जा सकता है।

चंद्रगुप्त ने अपने जीवन के अंतिम काल में जैन धर्म को अंगीकार कर लिया था। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार उसने श्रवणबेलगोला में भद्रबाहु के साथ संन्यास लेकर सल्लेखना (उपवास द्वारा देहत्याग) की। संभवतः इसीलिए मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त के लिए ‘वृषल’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जो कि जैन धर्मानुयायियों के प्रति वैदिक परंपरा के तिरस्कारपूर्ण दृष्टिकोण का सूचक है। इसी प्रकार ‘कुलहीन’ शब्द का आशय भी सामान्य कुल में उत्पन्न होने से है। इससे मात्र इतना सिद्ध होता है कि चंद्रगुप्त किसी प्रतिष्ठित एवं सुविख्यात राजघराने से संबंधित नहीं था, न कि यह कि वह शूद्र था। वस्तुतः परवर्ती रचना होने के कारण मुद्राराक्षस की ऐतिहासिकता ही संदिग्ध है और मुद्राराक्षस के टीकाकार ढुंढिराज की कथा भी काल्पनिक है, जिसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है। कथासरित्सागर और बृहत्कथामंजरी भी बाद की रचनाएँ होने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से पूर्णतः श्रद्धेय नहीं मानी जाती हैं।

वैश्य उत्पत्ति का मत

प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर मौर्यों को वैश्य स्वीकार करती हैं। उनके अनुसार शक क्षत्रप रुद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख (लगभग 150 ई.) में मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त के एक प्रांतपति वैश्य पुष्यगुप्त का नाम मिलता है (मौर्यस्य राज्ञः चंद्रगुप्तस्य राष्ट्रियेण वैश्येन पुष्यगुप्तेन कारितं…)। यह अभिलेख सुदर्शन झील के निर्माण और मरम्मत से संबंधित है, जिसका निर्माण पुष्यगुप्त वैश्य ने चंद्रगुप्त के शासनकाल में करवाया था। कीलहर्न के अनुसार वैश्य पुष्यगुप्त चंद्रगुप्त का बहनोई था। चंद्रगुप्त ने अपने बहनोई को साम्राज्य के पश्चिमी भाग (सौराष्ट्र) में अधिकारी के रूप में नियुक्त किया था। थापर के अनुसार ‘गुप्त’ उपाधि वैश्यों द्वारा धारण की जाती थी, इसलिए चंद्रगुप्त को भी वैश्य माना जा सकता है।

वैश्य मत का खंडन

किंतु मात्र पुष्यगुप्त के संबंधों के आधार पर चंद्रगुप्त को वैश्य नहीं माना जा सकता है । इस बात का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है कि पुष्यगुप्त चंद्रगुप्त का बहनोई था। हो सकता है कि चंद्रगुप्त ने पुष्यगुप्त की बहन के साथ विवाह किया हो, जिसके बदले में पुष्यगुप्त को प्रांतीय अधिकारी का पद मिला हो। विवाह-संबंध मात्र से जाति की समानता सिद्ध नहीं होती। गुप्त नामांत के आधार पर भी मौर्यों को वैश्य नहीं माना जा सकता है। संस्कृत साहित्य में कई नामों के अंत में ‘गुप्त’ शब्द मिलता है, किंतु वे सभी वैश्य नहीं थे। स्वयं चाणक्य का ही एक नाम विष्णुगुप्त था, जो ब्राह्मण था। थापर स्वयं मानती हैं कि ‘गुप्त’ नामांत शासक ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों वर्णों में मिलते हैं। इस प्रकार मौर्यों को केवल इस आधार पर वैश्य नहीं माना जा सकता और यह मत अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता है।

क्षत्रिय उत्पत्ति का मत

ब्राह्मण ग्रंथों के विपरीत बौद्ध रचनाओं में चंद्रगुप्त को असंदिग्ध रूप से अभिजात कुल का बताया गया है। कहा गया है कि वह ‘मोरिय’ नामक क्षत्रिय जाति की संतान था। मोरिय जाति शाक्यों की उच्च तथा पवित्र जाति की एक शाखा थी।

‘मोरिय’ नाम की उत्पत्ति

जब अत्याचारी कोसल नरेश विडूडभ ने शाक्यों पर आक्रमण किया, तो शाक्य परिवार के कुछ लोग कोशल नरेश के कोप से बचने के लिए हिमालय के एक सुरक्षित स्थान में जाकर बस गए। वह प्रदेश मोरों के लिए प्रसिद्ध था, इस कारण वहाँ आकर बसने वाले लोग ‘मोरिय’ कहलाने लगे। ‘मोरिय’ शब्द ‘मोर’ से निकला है, जो संस्कृत के ‘मयूर’ शब्द का पालि पर्याय है अर्थात मोरिय का अर्थ है मोरों के स्थान के निवासी। एक दूसरी कथा के अनुसार इस नगर का नाम मोरिय इसलिए रखा गया था कि वहाँ की इमारतें मोर की गर्दन के रंग की ईंटों की बनी हुई थीं; जिन लोगों ने इस नगर का निर्माण किया था, वे ‘मोरिय’ कहलाए। प्रसिद्ध इतिहासकार के. पी. जायसवाल ने भी इस शाक्य-मोरिय संबंध के सिद्धांत का प्रबल समर्थन किया है और इसे चंद्रगुप्त की क्षत्रिय उत्पत्ति का सशक्त प्रमाण माना है।

बौद्ध साहित्य के साक्ष्य

महाबोधिवंस में कहा गया है कि राजाओं के कुल में (नरिंद्रकुलसंभव) जन्मा कुमार चंद्रगुप्त क्षत्रियों के मोरिय नामक वंश में हुआ था, जिसका निर्माण साक्यपुत्तों ने किया था। महावंस में भी कहा गया है कि चंद्रगुप्त का जन्म क्षत्रियों के मोरिय नामक वंश में हुआ था-

मोरियानम् खत्तियानम् वंसे जातं सिरीधरं मौर्यो चंद्रगुप्तोति पंचातं चणक्कोब्राह्मणो ततो। नवम् धननंदतं घातेत्वा चंडकोधसा, सकलेजम्बूद्वीपंहि रज्ज समभिसिंचिसो।।

महापरिनिब्बानसुत्त में मौर्यों को पिप्पलिवन का शासक तथा क्षत्रिय वंश का बताया गया है। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात् पिप्पलिवन के मोरिय क्षत्रियों ने भी बुद्ध के अवशेषों पर अपना अधिकार जताया था, जिससे इस वंश की प्राचीनता और क्षत्रिय प्रतिष्ठा दोनों सिद्ध होती हैं। दिव्यावदान में बिंदुसार के बारे में कहा गया है कि उसका क्षत्रिय राजा के रूप में विधिवत् अभिषेक हुआ था (क्षत्रिय-मूर्धाभिषिक्त) और अशोक (चंद्रगुप्त के पौत्र) को भी क्षत्रिय कहा गया है। इसी ग्रंथ में एक स्थल पर बिंदुसार एक स्त्री से कहता है कि “तुम नाईन हो और मैं मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय हूँ, इसलिए मेरा तुम्हारा समागम कैसे हो सकता है?” (त्वं नापिनी अहं राजा क्षत्रियोमूर्धाभिषिक्तः कथं मया सार्धं समागमो भविष्यति) । यह कथन मौर्य राजपरिवार की क्षत्रिय-चेतना को स्पष्टतः प्रकट करता है।

जैन साहित्य के साक्ष्य

जैन ग्रंथों में भी मौर्यों को मयूरों से संबंधित किया गया है और क्षत्रिय बताया गया है। हेमचंद्र के ‘परिशिष्टपर्वन्’ के अनुसार चंद्रगुप्त मयूर-पोषकों के मुखिया की दुहिता का पुत्र था। आवश्यकसूत्र की हरिभद्रीया टीका में भी चंद्रगुप्त को मयूर-पोषकों के ग्राम के मुखिया के कुल में उत्पन्न बताया गया है। रामचंद्र मुमुक्षु रचित ‘पुण्याश्रवकथाकोश’ में भी चंद्रगुप्त को क्षत्रिय स्वीकार किया गया है। जैन परंपरा में चंद्रगुप्त और चाणक्य दोनों के जीवन-चरित्र को जोड़कर कई कथाएँ प्रचलित हैं, जो मौर्य वंश के प्रति जैन धर्म के विशेष लगाव का परिचायक हैं। यही कारण है कि परवर्ती जैन साहित्य में चंद्रगुप्त के जीवन के अंतिम वर्षों में जैन धर्म ग्रहण करने और श्रवणबेलगोला (वर्तमान कर्नाटक) में सल्लेखनापूर्वक देहत्याग करने का विशद वर्णन मिलता है।

यूनानी लेखकों के विवरण

यूनानी लेखकों ने चंद्रगुप्त को एंड्रोकोट्टस तथा सैंड्रोकोट्टस कहा है। जस्टिन के विवरण से पता चलता है कि उसका जन्म एक सामान्य कुल में हुआ था। प्लूटार्क के विवरण से पता चलता है कि जब वह युवा ही था, उसने पंजाब में यवन (यूनानी) विजेता सिकंदर से भेंट कर बताया था कि वह बड़ी आसानी से संपूर्ण भारत को जीत सकता है, क्योंकि तत्कालीन मगध का नंद शासक अपनी निम्न उत्पत्ति के कारण जनता में घृणित और अप्रिय है। उसने अपनी स्पष्टवादिता से सिकंदर को नाराज कर दिया था; सिकंदर ने उसे बंदी बना लेने का आदेश दिया, किंतु वह अपने शौर्य का प्रदर्शन करता हुआ सिकंदर के शिकंजे से भाग निकला। इससे स्पष्ट है कि यदि चंद्रगुप्त स्वयं निम्न जाति का होता, तो वह नंदों की निम्नजातीयता पर इस प्रकार जोर नहीं देता। स्ट्रैबो और एरियन जैसे अन्य यूनानी-रोमन लेखकों के विवरणों में भी चंद्रगुप्त (सैंड्रोकोट्टस) को मगध का सशक्त और साहसी विजेता बताया गया है, जिसने सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर सिंधु घाटी के विस्तृत क्षेत्र पर अधिकार प्राप्त किया।

पुरातात्त्विक साक्ष्य

साहित्यिक स्रोतों के साथ-साथ पुरातात्त्विक स्रोतों से भी मौर्यों का क्षत्रिय होना पुष्ट होता है। अशोक के लौरिया-नंदनगढ़ स्तंभ के नीचे भाग में मयूर की आकृति उत्कीर्ण मिलती है। लगता है कि मौर्य (पालि-मोरिय) नाम मोर टोटेम का सूचक है। यही कारण है कि मौर्ययुगीन कलाकृतियों में मयूरों का अंकन बहुतायत से मिलता है। जॉन मार्शल के अनुसार साँची स्तूप के पूर्वी द्वार तथा अन्य भवनों को सजाने के लिए मयूरों के चित्र बनाए गए थे। मैसूर के लेखों में चंद्रगुप्त को पुरातन क्षत्रियों का संरक्षक बताया गया है। इसके अतिरिक्त कुछ विद्वान चंद्रगुप्त मौर्य की मूर्तियों तथा मुद्राओं (सिक्कों) पर अंकित मयूर-चिह्नों को भी इसी वंश-प्रतीक से जोड़कर देखते हैं, यद्यपि इस विषय में पूर्ण एकमतता नहीं है।

इस प्रकार चंद्रगुप्त के वंश के संबंध में ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन परंपराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वह संभवतः किसी सुविख्यात कुलीन राजघराने से संबंधित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है। तथापि समग्र साक्ष्यों, विशेषकर बौद्ध एवं जैन साहित्य की स्पष्टता, पुरातात्त्विक साक्ष्यों में मयूर-प्रतीक की व्यापकता तथा पौराणिक व मुद्राराक्षस के साक्ष्यों की अंतर्निहित असंगतियों के आधार पर अधिकांश आधुनिक इतिहासकार यह मानते हैं कि मौर्य वंश मूलतः क्षत्रिय कुल से संबंधित था, यद्यपि वह किसी अत्यंत प्रतिष्ठित या सुविख्यात राजवंश की शाखा नहीं था।

मौर्यों की उत्पत्ति से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. चंद्रगुप्त मौर्य की जाति को लेकर विवाद क्यों है?

क्योंकि ब्राह्मण, बौद्ध, जैन और यूनानी स्रोतों में उसकी उत्पत्ति के अलग-अलग विवरण मिलते हैं। कुछ संस्कृत परंपराएँ उसे निम्नकुल का बताते हैं, जबकि बौद्ध और जैन ग्रंथ उसे क्षत्रिय बताते हैं।

2. चंद्रगुप्त मौर्य की उत्पत्ति के प्रमुख मत कौन-से हैं?

मुख्यतः तीन मत हैं—शूद्र उत्पत्ति, वैश्य उत्पत्ति और क्षत्रिय उत्पत्ति। इनमें बौद्ध-जैन साहित्य के आधार पर क्षत्रिय उत्पत्ति के मत को अधिक समर्थन मिलता है।

3. चंद्रगुप्त को ‘मौर्य’ नाम कैसे मिला?

बौद्ध परंपरा में ‘मौर्य’ (पालि—‘मोरिय’) नाम को मोर या मयूर से जोड़ा गया है। ‘मुरा’ से मौर्य नाम की व्युत्पत्ति का मत बाद की पौराणिक टीका-परंपरा में मिलता है, लेकिन इसे भाषावैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं माना जाता है।

 4. ‘वृषल’ और ‘कुलहीन’ शब्दों का क्या अर्थ है?

‘वृषल’ का अर्थ अनिवार्य रूप से शूद्र नहीं है; इसका प्रयोग धर्मच्युत या निम्न स्थिति वाले व्यक्ति के लिए भी हुआ है। ‘कुलहीन’ का अर्थ प्रतिष्ठित राजवंश से संबंध न होना है।

5. वैश्य उत्पत्ति के मत का आधार क्या है?

मौर्यों की वैश्य उत्पत्ति का संबंध रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में उल्लिखित पुष्यगुप्त से जोड़ा जाता है। लेकिन पुष्यगुप्त को चंद्रगुप्त का संबंधी मानने का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, इसलिए यह मत निर्णायक नहीं माना जाता है।

6. अधिकांश आधुनिक इतिहासकार मौर्यों को किस वर्ण का मानते हैं?

बौद्ध और जैन साहित्य के आधार पर अधिकांश इतिहासकार मौर्यों को क्षत्रिय कुल से संबंधित मानते हैं, यद्यपि उनकी किसी प्रसिद्ध राजवंशीय शाखा से संबद्धता निश्चित नहीं है।
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