शुंग राजवंश: प्राचीन भारत के मौर्योत्तर काल का महत्त्वपूर्ण इतिहास
शुंग राजवंश का उदय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
शुंग वंश प्राचीन भारत का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण राजवंश था, जिसकी स्थापना पुष्यमित्र शुंग ने लगभग 185 ईसा पूर्व में मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ की हत्या के बाद की थी। शुंगों ने लगभग 185 ईसा पूर्व से 73 ईसा पूर्व तक अर्थात लगभग 112 वर्षों तक उत्तर और मध्य भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया। उनकी प्रमुख राजधानी पाटलिपुत्र थी, जबकि विदिशा भी एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण राजनीतिक एवं सांस्कृतिक केंद्र था, जिसका महत्त्व समय के साथ निरंतर बढ़ता गया। पुष्यमित्र शुंग ने वैदिक परंपराओं को व्यापक संरक्षण दिया और अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान करके ब्राह्मणवादी धार्मिक व्यवस्था के पुनरुत्थान का प्रयास किया। उसके उत्तराधिकारी अग्निमित्र के शासनकाल का महत्त्वपूर्ण उल्लेख महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध नाटक मालविकाग्निमित्रम् में मिलता है, जो शुंगकालीन राजनीतिक घटनाओं का एक मूल्यवान साहित्यिक स्रोत भी है।
शुंग काल में कला, स्थापत्य, साहित्य और संस्कृत भाषा का उल्लेखनीय विकास हुआ। भरहुत और सांची स्तूपों की वेदिकाओं एवं अलंकरणों का महत्त्वपूर्ण विकास इसी काल में हुआ, जिसका भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है। संस्कृत व्याकरण के प्रसिद्ध विद्वान पतंजलि भी इसी काल से संबंधित थे और उन्होंने पाणिनि की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य नामक विश्वप्रसिद्ध टीका की रचना की। शुंग शासकों को उत्तर-पश्चिम दिशा से होने वाले यवन (इंडो-ग्रीक) आक्रमणों का भी सतत सामना करना पड़ा, जिन्हें उन्होंने अपने सैन्य पराक्रम से सफलतापूर्वक विफल किया। वंश का अंतिम शासक देवभूति था, जिसकी हत्या उसके मंत्री वासुदेव कण्व ने लगभग 73 ईसा पूर्व कर दी और इसके साथ ही शुंग वंश का अंत हो गया तथा कण्व वंश की स्थापना हुई।
पुष्यमित्र शुंग
चंद्रगुप्त मौर्य और आचार्य चाणक्य द्वारा स्थापित विशाल मौर्य साम्राज्य की लड़खड़ाती हुई दीवारें अंततः लगभग 185 ईसा पूर्व में ढह गईं, जब सेनानी पुष्यमित्र ने अंतिम मौर्य राजा बृहद्रथ की सेना के समक्ष ही उसकी हत्या कर दी और शुंग राजवंश की स्थापना की। सम्राट अशोक के निधन के पश्चात मौर्य साम्राज्य निरंतर क्षीण होता गया था, क्योंकि उनके उत्तराधिकारी उतने सक्षम शासक सिद्ध नहीं हुए और साम्राज्य के अनेक दूरस्थ प्रांतों ने केंद्रीय सत्ता की अधीनता त्यागकर स्वतंत्रता की दिशा में कदम बढ़ा लिए थे। इसी क्षीणता और प्रशासनिक अव्यवस्था का लाभ उठाते हुए सेनापति पुष्यमित्र ने सत्ता पर अपना अधिकार जमाया।
शुंगों के इतिहास के ऐतिहासिक स्रोत
शुंगों का इतिहास जानने के स्रोत अत्यंत विविध और बहुआयामी हैं। भारतीय धार्मिक एवं धर्मेतर साहित्य के साथ-साथ अभिलेखों और अन्य पुरातात्त्विक स्रोतों से इस वंश के संबंध में महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। पुराणों से पता चलता है कि सेनानी पुष्यमित्र शुंग राजवंश का संस्थापक था, जिसने 36 वर्ष तक राज्य किया। दिव्यावदान, ललितविस्तर, मंजुश्रीमूलकल्प जैसे बौद्ध ग्रंथ भी इस वंश के इतिहास पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। जैन लेखक मेरुतुंग की थेरावली (चौदहवीं शताब्दी) में उज्जैनी के शासकों की वंशावली दी गई है, जिसमें पुष्यमित्र का भी विशेष उल्लेख मिलता है।
धर्मेतर साहित्य में पतंजलि के महाभाष्य से पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओं का ज्ञान होता है। गार्गी संहिता में यवनों के आक्रमण का विस्तृत उल्लेख है। कालिदास के ग्रंथ मालविकाग्निमित्र में भी पुष्यमित्रकालीन यवनों के आक्रमण का कुछ रोचक विवरण मिलता है। बाणभट्ट की रचना हर्षचरित से पता चलता है कि ‘अनार्य’ पुष्यमित्र ने अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या कर सिंहासन पर अधिकार किया।
पुरातात्त्विक स्रोतों में धनदेव का अयोध्या अभिलेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जिससे पता चलता है कि पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया। इसके अतिरिक्त हेलियोडोरस का बेसनगर से प्राप्त गरुड़-स्तंभ अभिलेख, भरहुत, साँची, बोधगया से प्राप्त स्तूप एवं स्मारक, तथा कौशांबी, अयोध्या, अहिच्छत्र और मथुरा से मिलने वाले सिक्कों से भी शुंगकालीन इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।
शुंगों की उत्पत्ति और वंशावली संबंधी विवाद
शुंगों की सटीक उत्पत्ति के बारे में इतिहासकारों में कोई सर्वसम्मत और निश्चित जानकारी नहीं है। ‘मित्र’ नामांत के आधार पर पहले काशीप्रसाद जायसवाल ने इन्हें ईरानी मग (पारसीक) ब्राह्मण बताया था, जिन्होंने भारत में सूर्य (मिथ्र) की उपासना आरंभ की, किंतु बाद में स्वयं उन्होंने अपना यह मत वापस ले लिया। बाणभट्ट ने हर्षचरित में पुष्यमित्र के लिए ‘अनार्य’ शब्द प्रयुक्त किया है, किंतु इसके आधार पर शुंगों को निम्न जाति का मान लेना उचित नहीं है। वास्तव में बाण के अनार्य कहने का आशय मात्र उसके नीच कार्य से है, जो उसने अपने स्वामी शासक की हत्या करके किया था। इसलिए बाण का यह उल्लेख जातिसूचक नहीं, बल्कि कर्मसूचक प्रतीत होता है। दिव्यावदान में शुंगों को मौर्यवंशीय क्षत्रिय सिद्ध करने का प्रयास किया गया है, जो अधिकांश इतिहासकारों द्वारा अमान्य ठहराया गया है।
भारतीय साहित्य में सामान्यतः शुंगों को ब्राह्मण बताया गया है। पुराण पुष्यमित्र को शुंग कहते हैं और पाणिनि ने शुंग वंश को भारद्वाज गोत्र का ब्राह्मण बताया है। कालिदास के ग्रंथ ‘मालविकाग्निमित्र’ में शुंगों को ‘बैंबिक कुल’ से संबंधित बताया गया है, जो बौधायन श्रौतसूत्र के अनुसार काश्यप गोत्र के ब्राह्मण थे।
बृहदारण्यक उपनिषद् में शौंगीपुत्र नामक एक आचार्य का उल्लेख है और अश्वालायन श्रौतसूत्र में भी शुंगों का आचार्यों के रूप में उल्लेख मिलता है। तिब्बती इतिहासकार तारानाथ भी पुष्यमित्र को ब्राह्मण बताते हैं, जिसके पूर्वज पुरोहित थे। संभवतः शुंग उज्जैन प्रदेश के भारद्वाज गोत्रीय अथवा काश्यप गोत्रीय ब्राह्मण थे, जहाँ इनके पूर्वज मौर्यकाल में पुरोहिताई का पारंपरिक कार्य छोड़कर सैनिक-वृत्ति अपनाने लगे थे।
पुराण, हर्षचरित तथा मालविकाग्निमित्र, इन सभी ग्रंथों में पुष्यमित्र को ‘सेनानी’ और उसके पुत्र अग्निमित्र को ‘राजा’ कहा गया है। इस आधार पर कुछ इतिहासकारों ने यह अनुमान लगाया है कि वह स्वयं कभी औपचारिक रूप से राजा नहीं बना और बृहद्रथ की हत्या करने के बाद उसने अपने पुत्र को ही राजा बना दिया। स्रोतों से यह भी ज्ञात होता है कि उसने दो अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया, जो प्राचीन भारत में सार्वभौम राजसत्ता का प्रतीक माना जाता था। इससे यह प्रतीत होता है कि सेनापति के रूप में अपनी मूल पहचान बनाए रखने के लिए वह राजा बनने के बाद भी अपनी ‘सेनानी’ उपाधि ही धारण करता रहा।
पुष्यमित्र शुंग की उपलब्धियाँ
मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या
पुष्यमित्र अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ का सेनापति था। उसने अपने स्वामी की हत्या करके ही सत्ता प्राप्त की। पुराणों और बाणभट्ट के हर्षचरित, दोनों में ही इस घटना का उल्लेख किया गया है। पुराणों के अनुसार ‘सेनानी पुष्यमित्र बृहद्रथ की हत्या करके 36 वर्षों तक राज्य करेगा’- पुष्यमित्रस्तु सेनानी समुद्वृत ब्रहद्रथम्। कारयिष्यति वैराज्यं षड्त्रिंशति समानृपः।।
बाणभट्ट ने हर्षचरित में इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा है कि अनार्य सेनानी पुष्यमित्र ने सेना निरीक्षण के बहाने अपने प्रज्ञा-दुर्बल स्वामी बृहद्रथ की हत्या कर दी : ‘प्रज्ञादुर्बल च बलदर्शन व्यपदेशदर्शिताशेष सैन्याः सेनानीरनार्यो मौर्य बृहद्रथं पिपेष पुष्यमित्रः स्वामिनम्।’

वस्तुतः परवर्ती मौर्यों के काल में मौर्य साम्राज्य अनेक कारणों से न केवल शिथिल और दुर्बल हो गया था, अपितु उसमें विघटन और बिखराव की प्रक्रिया भी पहले से ही प्रारंभ हो चुकी थी। व्यक्तिगत स्वार्थ और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के कारण उस समय मौर्य दरबार में सेनापति और सचिव के दो प्रतिद्वंद्वी गुट बन गए थे। सेनापति पुष्यमित्र शुंग द्वारा सेना के समक्ष ही शासक बृहद्रथ की हत्या करना इसी दरबारी गुटबंदी और राजनीतिक षड्यंत्र का सीधा परिणाम प्रतीत होता है।
बौद्ध धर्म का विरोध एवं ब्राह्मण-वर्चस्व की स्थापना
कुछ इतिहासकारों के अनुसार पुष्यमित्र शुंग का यह विद्रोह बुद्धकाल से भी पहले से चली आ रही ब्राह्मण-क्षत्रिय प्रतिस्पर्धा का ही स्वाभाविक विकास था। पतंजलि के तत्त्वावधान में उनके शिष्य पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य-सम्राट बृहद्रथ को मारकर ब्राह्मण-साम्राज्य की नींव डाली, क्योंकि ब्राह्मणों के पास अपने सामाजिक-धार्मिक पुनरुद्धार के लिए मौर्य-साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प शेष नहीं बचा था। इस विद्रोह का मूल उद्देश्य बौद्ध धर्म का विरोध करना और ब्राह्मण-वर्चस्व की पुनर्स्थापना करना था। यह वर्ण-व्यवस्था के ‘सामान्य नियमों’ का भी उल्लंघन था, जिसके अनुसार परंपरागत रूप से कोई ब्राह्मण राजा नहीं हो सकता था। पुष्यमित्र ने वैदिक व्यवस्था के विरुद्ध जाकर राजा की हत्या की और राजा होने का ‘अनुचित’ अधिकार प्राप्त किया। संभवतः यही कारण है कि बाणभट्ट ने हर्षचरित में पुष्यमित्र को ‘अधम’ कहकर उसकी कठोर निंदा की है और उसके द्वारा की गई राजा की हत्या को ‘आर्य-नियम’ के सर्वथा विरुद्ध बताया है।
जन-साधारण के व्यापक संभावित विरोध से निपटने तथा ब्राह्मण-वर्चस्व को दृढ़ता से स्थापित करने के लिए मनु ने अपने विधान द्वारा पुष्यमित्र द्वारा की गई राज-हत्या और हिंसक क्रांति को न केवल अधिनियमित और विनियमित किया, बल्कि उसने ब्राह्मणों के लिए कुछ विशेष एकाधिकार, रियायतें और विशेषाधिकार स्वीकृत कर ब्राह्मणों को एक बार पुनः एक विशेषाधिकार-संपन्न वर्ग बना दिया। यही कारण है कि पुष्यमित्र की संरक्षा में रचित मनुस्मृति में श्रमण एवं शूद्र, दोनों के ही विरोध में स्पष्ट नियम बनाए गए। पतंजलि ने इस व्यापक परिवर्तन का खुलकर समर्थन किया और फिर उसके हितार्थ अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया तथा स्वयं उसमें ऋत्विज् की भूमिका निभाई।
पुष्यमित्र का संपूर्ण शासनकाल अनेकानेक चुनौतियों से भरा हुआ था। उस समय भारत पर कई विदेशी आक्रांताओं ने बार-बार आक्रमण किए, जिनका दृढ़ता से सामना पुष्यमित्र शुंग को करना पड़ा। राजा बनते ही पुष्यमित्र ने मगध की अधीनता त्याग चुके राज्यों को पुनः विजित कर मगध को संगठित करने का व्यापक प्रयास आरंभ किया। अपने विजय अभियानों द्वारा उसने मगध साम्राज्य की सीमा का विस्तार किया और प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए विदिशा को अपनी दूसरी राजधानी बनाया। वहाँ उसने अपने पुत्र अग्निमित्र को राज्य के प्रतिनिधि (उपराजा) के रूप में नियुक्त किया। ऐतिहासिक साक्ष्यों से माना जाता है कि उसने न केवल देश में शांति और सुव्यवस्था स्थापित की, वरन् विदेशी आक्रांताओं से भी देश की सफलतापूर्वक रक्षा की और वैदिक धर्म की गरिमापूर्ण प्रतिष्ठा भी सुनिश्चित की।
विदर्भ युद्ध
परवर्ती दुर्बल मौर्य राजाओं के शासनकाल में जो अनेक प्रदेश साम्राज्य की अधीनता से मुक्त होकर स्वतंत्र हो गए थे, पुष्यमित्र ने उन्हें फिर से अपने सुदृढ़ अधीन में लाने का प्रयास किया। मालविकाग्निमित्र से ज्ञात होता है कि उस समय विदर्भ (बरार) का शासक यज्ञसेन था। संभवतः वह मौर्य सचिव की ओर से विदर्भ के शासक-पद पर नियुक्त हुआ था, क्योंकि वह बृहद्रथ के सचिव का साला था। वह शुंगों का ‘स्वाभाविक शत्रु’ (प्रकृत्यमित्रः) था, किंतु मगध साम्राज्य की दुर्बलता अथवा बृहद्रथ की हत्या से उत्पन्न अराजकता का लाभ उठाकर वह इस समय स्वतंत्र हो गया था। पुष्यमित्र ने बृहद्रथ की हत्या के बाद उसके सचिव को कारागार में डाल दिया था। नाटक के अनुसार पुष्यमित्र का पुत्र अग्निमित्र विदिशा का उपराजा (राज्यपाल) था। संभवतः सेनापति गुट का सदस्य होने के कारण ही अग्निमित्र को विदिशा का प्रशासनिक शासन सौंपा गया था।
विदर्भ नरेश यज्ञसेन का चचेरा भाई माधवसेन अग्निमित्र का घनिष्ठ मित्र था, जो विदर्भ की राजगद्दी के लिए यज्ञसेन का प्रबल प्रतिद्वंद्वी था और अग्निमित्र के निरंतर संपर्क में था। एक बार विदिशा जाते समय यज्ञसेन के सीमाप्रांत के राज्यपाल (अंतपाल) ने उसे बंदी बना लिया। अग्निमित्र ने यज्ञसेन पर माधवसेन को मुक्त करने का दबाव डाला, तो यज्ञसेन ने पाटलिपुत्र के कारागार में बंद मौर्य सचिव को पहले मुक्त करने की शर्त रख दी। वार्ता असफल होने पर पुष्यमित्र के आदेश से अग्निमित्र ने अपने सेनापति वीरसेन को विदर्भ पर आक्रमण करने का आदेश दिया। युद्ध में यज्ञसेन पराजित हुआ और विदर्भ राज्य को दो भागों में विभाजित कर दिया गया, जिसमें एक भाग माधवसेन को प्राप्त हुआ। वर्धा नदी को दोनों राज्यों की सीमा मान लिया गया। दोनों ने पुष्यमित्र की अधीनता स्वीकार कर ली, जिससे पुष्यमित्र का प्रभाव-क्षेत्र नर्मदा नदी के दक्षिण तक विस्तृत हो गया। कालिदास के प्रसिद्ध नाटक मालविकाग्निमित्र में यज्ञसेन की चचेरी बहन मालविका और अग्निमित्र की प्रेमकथा के साथ-साथ विदर्भ-विजय का यह वृत्तांत भी उल्लिखित है।
इस प्रकार अग्निमित्र ने अत्यंत अल्पकाल में ही विदर्भ की स्वाधीनता को नष्ट कर दिया, क्योंकि यज्ञसेन को अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया था। वह उस समय अभी नवसंरोपित पौधे के समान था, जिसकी जड़ें अभी ठीक से जमने नहीं पाई थीं और जिसे शीघ्रता से उखाड़ा जा सकता था। इससे यह प्रतीत होता है कि विदर्भ युद्ध पुष्यमित्र द्वारा मौर्य साम्राज्य पर अधिकार करने के तत्काल बाद ही प्रारंभ हुआ था और मौर्य सचिव पुष्यमित्र का सबसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी था। ऐसा प्रतीत होता है कि बृहद्रथ के काल में मौर्य दरबार में दो प्रमुख गुट थे- एक गुट का नेतृत्व मौर्य सचिव कर रहा था और दूसरे का नेतृत्व सेनापति पुष्यमित्र। यही कारण है कि सचिव के संबंधी यज्ञसेन को विदर्भ और पुष्यमित्र के पुत्र को विदिशा का राज्यपाल बनाया गया था। जब पुष्यमित्र ने पाटलिपुत्र पर अधिकार कर लिया, तो उसने मौर्य सचिव को कारागार में डाल दिया और तब यज्ञसेन ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। मौर्य सचिव का निकट-संबंधी होने के कारण ही वह शुंगों का स्वाभाविक शत्रु बन गया था।
यवन आक्रमण
पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल की सर्वप्रमुख और सर्वाधिक चर्चित घटना यवन आक्रमण है। मौर्य सम्राटों की क्रमिक दुर्बलता का लाभ उठाकर उत्तर-पश्चिम से आए यवनों ने भारत पर आक्रमण करना शुरू कर दिया था। विभिन्न साहित्यिक साक्ष्यों से पता चलता है कि पुष्यमित्र के शासनकाल में यवनों ने भारत पर आक्रमण किया और बिना किसी सशक्त अवरोध के पाटलिपुत्र के निकट तक पहुँच गए। इस आक्रमण के संबंध में पतंजलि के महाभाष्य, गार्गी संहिता तथा कालिदास के मालविकाग्निमित्र से महत्त्वपूर्ण सूचना मिलती है। पुष्यमित्र के पुरोहित पतंजलि ने अपने महाभाष्य में लिखा है कि ‘यवनों ने साकेत पर आक्रमण किया, यवनों ने माध्यमिका पर घेरा डाला’ (अरुणद् यवनः साकेतम्। अरुणद् यवनः माध्यमिकाम्)।
गार्गी संहिता के युगपुराण खंड के अनुसार दुष्ट पराक्रमी यवनों ने साकेत, पंचाल और मथुरा को जीत लिया और पाटलिपुत्र तक जा पहुँचे। इससे प्रशासन में घोर अव्यवस्था उत्पन्न हुई तथा प्रजा अत्यंत व्याकुल हो गई। किंतु उनमें आपस में ही संघर्ष छिड़ गया और इसी कारण वे मध्य देश में स्थायी रूप से नहीं रुक सके।
कालिदास के मालविकाग्निमित्र के अनुसार भी पुष्यमित्र का यवनों के साथ महत्त्वपूर्ण युद्ध हुआ था और उसके पौत्र वसुमित्र ने सिंधु नदी के तट पर यवनों को करारी शिकस्त दी। ज्ञात होता है कि पुष्यमित्र के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा उसके पौत्र वसुमित्र के नेतृत्व में घूमते हुए सिंधु नदी के दक्षिणी तट पर यवनों द्वारा पकड़ लिया गया था, और वहीं दोनों सेनाओं के बीच घनघोर युद्ध हुआ। अंततः वसुमित्र ने यवनों को पराजित कर यज्ञ का घोड़ा पुनः पाटलिपुत्र ले आया।
इस सिंधु नदी की सटीक पहचान के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ (जैसे ई.जे. रैप्सन) के अनुसार यह पंजाब की प्रसिद्ध सिंधु न होकर मध्य भारत की चंबल की सहायक काली सिंधु अथवा यमुना की सहायक सिंधु नदी है। अन्य (जैसे रमेशचंद्र मजूमदार) इसे पश्चिमोत्तर की प्रसिद्ध सिंधु नदी ही मानते हैं। मालविकाग्निमित्र के अंतःसाक्ष्य से यह स्पष्ट होता है कि इस सिंधु नदी का आशय पश्चिमोत्तर की सिंधु नदी से ही है। अब अधिकांश इतिहासकार यह मानने लगे हैं कि यहाँ सिंधु से आशय पंजाब की प्रसिद्ध सिंधु नदी से ही है, क्योंकि मालविकाग्निमित्र के अनुसार विदिशा से यह नदी बहुत दूर स्थित थी। इस प्रकार पुष्यमित्र शुंग ने यवनों को पराभूत कर मगध साम्राज्य की शक्ति और गरिमा को कायम रखने में असाधारण सफलता प्राप्त की।
इस यवन आक्रमणकारी के संबंध में इतिहासकारों में सर्वसम्मति नहीं है। कुछ इतिहासकार इसका नेता डेमेट्रियस (दिमित्र) मानते हैं, तो कुछ मिनेंडर (मिलिंद) को। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि भारत पर दो पृथक यवन आक्रमण हुए- एक डेमेट्रियस के नेतृत्व में पुष्यमित्र के शासन के आरंभिक दिनों में, और दूसरा उसके शासन के अंतिम दिनों में अथवा उसकी मृत्यु के तत्काल बाद मिनेंडर के नेतृत्व में। इसके विपरीत डब्ल्यू.डब्ल्यू. टार्न एक ही संयुक्त यवन आक्रमण को स्वीकार करते हैं। उनका मानना है कि इस आक्रमण का प्रमुख नेता डेमेट्रियस ही था, परंतु वह अपने साथ भाई अपोलोडोटस और सेनापति मिनेंडर को भी लाया था। उसने अपनी सेना को दो भागों में विभाजित कर दिया था, जिसमें एक भाग उसके स्वयं के नेतृत्व में सिंधु नदी पारकर चित्तौड़ होता हुआ पाटलिपुत्र तक पहुँचा। दूसरा भाग मिनेंडर के अधीन मथुरा, पांचाल तथा साकेत के मार्ग से होते हुए पाटलिपुत्र आया। ए.के. नरायन का विचार है कि मध्य भारत पर यवनों का एक ही आक्रमण पुष्यमित्र के शासन के अंत में मिनेंडर के नेतृत्व में हुआ था, क्योंकि डेमेट्रियस कभी भी काबुल घाटी के आगे नहीं बढ़ सका था। कैलाशचंद्र ओझा के अनुसार मगध पर डेमेट्रियस या मिनेंडर के समय में कोई ठोस यवन आक्रमण हुआ ही नहीं, क्योंकि मध्य गंगा घाटी में यवन इन दोनों शासकों के बहुत बाद, प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में ही आए थे।
कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि प्रथम यवन आक्रमण डेमेट्रियस के नेतृत्व में स्वयं मौर्य नरेश बृहद्रथ के काल में ही हुआ था और उस समय सेनापति के रूप में पुष्यमित्र ने ही यवनों को पराजित किया था। इससे पुष्यमित्र की लोकप्रियता जनसाधारण में अत्यधिक बढ़ गई, और संभवतः इसी बढ़ी हुई लोकप्रियता के बल पर उसने बृहद्रथ की हत्या कर सत्ता पर अधिकार कर लिया होगा। शासक बनने पर पुष्यमित्र को दूसरे यवन आक्रमण का सामना करना पड़ा, जब यवन सेनाएँ मिनेंडर के नेतृत्व में साकेत और माध्यमिका तक चली आई थीं। इसी दूसरे आक्रमण को पतंजलि ने ‘अरुणद् यवनः साकेतम्, अरुणद् यवनः माध्यमिकाम्’ लिखकर सांकेतिक रूप से निर्देशित किया है।
खारवेल से युद्ध का प्रश्न
परवर्ती मौर्यों की निर्बलता का लाभ उठाकर कलिंग देश (उड़ीसा) भी स्वतंत्र हो गया था। कलिंग नरेश खारवेल ने दूर-दूर तक सैन्य आक्रमण कर कलिंग की शक्ति और प्रभुता का व्यापक विस्तार किया। खारवेल के प्रसिद्ध हाथीगुम्फा शिलालेख से ज्ञात होता है कि उसने मगध पर भी आक्रमण किया था और ‘बहसतिमित’ नामक मगध के किसी शासक को पराजित किया था। अनेक विद्वानों ने हाथीगुम्फा शिलालेख के इस ‘बहसतिमित्र’ शब्द को बृहस्पतिमित्र के रूप में पढ़ा है। चूँकि बृहस्पति पुष्य नक्षत्र का स्वामी माना जाता है, इसी आधार पर काशीप्रसाद जायसवाल ने यह निष्कर्ष निकाला था कि खारवेल ने मगध पर आक्रमण करके पुष्यमित्र को ही पराभूत किया था। परंतु अनेक इतिहासकार जायसवाल के इस समीकरण से सहमत नहीं हैं। उनका विचार है कि खारवेल ने मगध के जिस शासक पर आक्रमण किया था, वह मौर्य वंश का ही कोई राजा रहा होगा। यह संभावना भी व्यक्त की गई है कि खारवेल का मगध पर आक्रमण मौर्य नरेश शालिशुक अथवा उसके किसी उत्तराधिकारी के शासनकाल में हुआ हो। हाथीगुम्फा शिलालेख में यह अंश अस्पष्ट और क्षतिग्रस्त है और इसे ‘बहसतिमित’ पढ़ना अनेक इतिहासकारों की दृष्टि में संदिग्ध है।
पुष्यमित्र शुंग का साम्राज्य तथा प्रशासनिक व्यवस्था
पुष्यमित्र प्राचीन मौर्य साम्राज्य के मध्यवर्ती भाग को सुरक्षित रखने में पर्याप्त सफल रहा। उसके साम्राज्य की सीमा पश्चिम में सिंधु नदी तक अवश्य विस्तृत थी। दिव्यावदान के अनुसार साकल (सियालकोट) भी उसके साम्राज्य के अंतर्गत था। अयोध्या से प्राप्त धनदेव का अभिलेख मध्यदेश पर उसके प्रभावी शासन का पुख्ता प्रमाण है। विदर्भ-विजय से उसके साम्राज्य की दक्षिणी सीमा नर्मदा नदी तक जा पहुँची थी। इस प्रकार पुष्यमित्र का साम्राज्य हिमालय से नर्मदा नदी तक और सिंधु नदी से प्राच्य समुद्र तक विस्तृत था। पाटलिपुत्र अभी भी इस साम्राज्य की औपचारिक राजधानी बनी हुई थी, किंतु विदिशा का राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्त्व निरंतर बढ़ता जा रहा था। कालांतर में इस नगर ने पाटलिपुत्र का स्थान भी ले लिया।
पुष्यमित्र ने संभवतः मौर्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था के ढाँचे को ही व्यापक रूप से बनाए रखा। काशीप्रसाद जायसवाल के अनुसार पुष्यमित्र के ब्राह्मण राज्य का वैचारिक समर्थन करने के उद्देश्य से मनु ने राजा की दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत का प्रतिपादन किया और यह स्थापित किया कि बालक राजा का भी अपमान नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही मनु ने प्रजा-पालन एवं प्रजा-रक्षण को राजा का सर्वश्रेष्ठ धर्म भी घोषित किया, जिससे यह प्रतीत होता है कि राजा धर्म और स्थापित व्यवहार के अनुसार ही शासन संचालित करता था।
साम्राज्य के विभिन्न भागों पर समुचित प्रशासन के लिए राजपरिवार अथवा उससे संबंधित व्यक्तियों को राज्यपाल नियुक्त करने की मौर्यकालीन परंपरा निरंतर चलती रही। वायुपुराण में कहा गया है कि पुष्यमित्र ने अपने पुत्रों को साम्राज्य के विभिन्न भागों में सह-शासक के रूप में नियुक्त किया था। मालविकाग्निमित्र से यह स्पष्ट है कि उसका पुत्र अग्निमित्र विदिशा का उपराजा था। वसुमित्र के उदाहरण से स्पष्ट है कि राजकुमार सेना का प्रत्यक्ष संचालन भी करते थे। अयोध्या अभिलेख से ज्ञात होता है कि धनदेव कोशल प्रदेश का राज्यपाल था। मालविकाग्निमित्र के ‘अमात्य परिषद्’ और महाभाष्य के ‘सभा’ शब्द से यह भी ज्ञात होता है कि शासन-संचालन में सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद् कार्यरत होती थी। कौटिल्य के समान ही मनु ने भी राजा को सात या आठ मंत्रियों को नियुक्त करने की सलाह दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्रीय प्रशासन की शिथिलता के कारण अब सामंतीकरण की प्रवृत्तियाँ भी धीरे-धीरे सक्रिय होने लगी थीं।
अश्वमेध यज्ञ और ब्राह्मणवादी पुनरुत्थान
पुष्यमित्र शुंग ने अपनी सार्वभौम प्रभुसत्ता की घोषणा करने और ब्राह्मण धर्म की पुनर्स्थापना के प्रतीक के रूप में अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया। पुष्यमित्र शुंग द्वारा अश्वमेध यज्ञ किए जाने की पुष्टि अभिलेखिक और साहित्यिक दोनों ही प्रकार के साक्ष्यों द्वारा होती है। पतंजलि के महाभाष्य में वर्तमान लट्लकार का प्रयोग करते हुए बताया गया है कि ‘हम यहाँ पुष्यमित्र के लिए यज्ञ कर रहे हैं’ (इह पुष्यमित्रं याजयामः)।
हरिवंश पुराण में कहा गया है कि ‘कलियुग में एक औद्भिज्ज (नवोदित) काश्यपगोत्रीय द्विज सेनानी अश्वमेध यज्ञ का पुनरुद्धार करेगा’-
औद्भिज्जो भविता कश्चित् सेनानी काश्यपो द्विजः।
अश्वमेधं तु कलियुगे पुनः प्रत्याहरिष्यति।।
धनदेव के अयोध्या अभिलेख में पुष्यमित्र को ‘द्विराश्वमेधयाजिनः’ (अर्थात दो अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला) कहा गया है। इससे यह स्पष्ट है कि पुष्यमित्र ने अपने संपूर्ण शासनकाल में कुल दो बार अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया। मालविकाग्निमित्र से भी यह पता चलता है कि अश्वमेध के घोड़े का पीछा करते हुए पुष्यमित्र के पौत्र वसुमित्र ने सिंधु नदी के दक्षिणी तट पर यवनों को पराजित कर अश्वमेध के घोड़े को मुक्त करवाया। ऐसा प्रतीत होता है कि पुष्यमित्र ने राजधानी में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के बाद प्रथम अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया। दूसरा यज्ञ संभवतः उसके शासन के अंतिम चरण में संपन्न हुआ होगा, जिसका उल्लेख मालविकाग्निमित्र में हुआ है। यह भी पूर्णतः संभव है कि डेमेट्रियस और मिनेंडर के विरुद्ध प्राप्त अपनी विजयों के उपलक्ष्य में ही पुष्यमित्र ने दोनों अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया हो। प्रसिद्ध इतिहासकार वी.ए. स्मिथ के अनुसार ‘पुष्यमित्र के स्मरणीय अश्वमेध यज्ञ से उस ब्राह्मण प्रतिक्रिया का आरंभ होता है, जो समुद्रगुप्त तथा उसके उत्तराधिकारियों के काल में, अर्थात लगभग पाँच शताब्दियों बाद, पूर्णरूप से विकसित हो गई।’
वस्तुतः अहिंसा-प्रधान बौद्ध और जैन धर्मों के तत्कालीन उत्कर्ष के कारण कर्मकांडीय यज्ञ-याग की पारंपरिक परिपाटी लगभग विलुप्त सी हो गई थी, और ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग ने दो भव्य अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान कर यज्ञप्रधान ब्राह्मण धर्म के गौरवशाली पुनरुत्थान का प्रयास किया।
पुष्यमित्र शुंग और बौद्ध धर्म के साथ संबंध
बौद्ध धर्म की परंपराओं और उसकी रचनाओं में पुष्यमित्र शुंग को बौद्ध धर्म का घोर विरोधी बताया गया है। तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ के विवरणों तथा बौद्ध ग्रंथ ‘दिव्यावदान’ में पुष्यमित्र शुंग को बौद्धों का प्रबल शत्रु कहा गया है। दिव्यावदान से पता चलता है कि पुष्यमित्र बौद्धों से गहरा द्वेष रखता था और उसने कथित रूप से 84,000 स्तूपों को ध्वंस करवाया। इसी क्रम में उसने साकल से यह क्रूर घोषणा भी की थी कि ‘यो मे एकं श्रमणसिरं दास्यति तस्याहं दीनार शतं दास्यामि’ अर्थात् ‘जो व्यक्ति मुझे एक श्रमण का सिर लाकर देगा, मैं उसे सौ दीनार पारितोषिक दूँगा।’
तारानाथ के विवरण से पता चलता है कि उसने अनेक स्तूपों को ध्वस्त किया और बड़ी संख्या में बौद्धधर्मावलंबियों की हत्या भी करवाई। ‘आर्यमंजुश्रीमूलकल्प’ से भी यह ज्ञात होता है कि पुष्यमित्र बौद्धद्रोही था। क्षेमेंद्रकृत ‘अवदानकल्पलता’ में भी पुष्यमित्र का चित्रण बौद्ध धर्म के एक क्रूर संहारक के रूप में किया गया है। कौशांबी के प्रसिद्ध घोषिताराम विहार में विनाश तथा अग्निदाह के कुछ पुरातात्त्विक प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं। यह भी संभव है कि कुछ बौद्धों ने पुष्यमित्र की सत्ता का सक्रिय विरोध किया हो और शुद्ध राजनीतिक कारणों से पुष्यमित्र ने उनके साथ कठोरता का व्यवहार किया हो, न कि केवल धार्मिक द्वेष के कारण।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार भरहुत स्तूप का निर्माण और साँची स्तूप की वेदिकाएँ (रेलिंग) वास्तव में शुंगकाल की ही कृतियाँ हैं और भरहुत की वेष्टनी पर खुदा हुआ ‘सुगनंरजे’ (अर्थात शुंगों के राज-काल में) अभिलेख पुष्यमित्र की धार्मिक सहिष्णुता का महत्त्वपूर्ण परिचायक माना जाता है। इस विषय में अभी और अधिक शोध और तथ्यों की निष्पक्ष जाँच-पड़ताल किए जाने की आवश्यकता है, ताकि पुष्यमित्र की वास्तविक धार्मिक नीति का समग्र और संतुलित उद्घाटन हो सके। वैसे अपने ही स्वामी की हत्या कर सिंहासन पर अधिकार करने वाला व्यक्ति ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धारकर्ता तो अवश्य माना जा सकता है, किंतु उसे संपूर्ण भारतीय संस्कृति का निर्विवाद संरक्षक मान लेना उचित नहीं होगा।
शुंगकालीन कला और साहित्य का संरक्षण
पुष्यमित्र शुंग कला का उदार संरक्षक भी था। उसने साँची स्तूप का व्यापक सुंदरीकरण करवाया और उसमें एक भव्य रेलिंग (वेदिका) का निर्माण भी करवाया। भरहुत स्तूप भी उसकी कलाप्रियता का एक अत्यंत उत्कृष्ट प्रमाण है। विदिशा के गजदत्त शिल्पी द्वारा निर्मित साँची स्तूप के तोरणद्वार आज भी उस बीते हुए स्वर्णिम युग की अद्भुत कलात्मक प्रतिभा के मूक साक्षी हैं।
कला के अतिरिक्त पुष्यमित्र शुंग का शासन साहित्य की श्रीवृद्धि के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है। साहित्य के क्षेत्र में पतंजलि ने पाणिनि की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य नामक अपनी कालजयी रचना की। पतंजलि स्वयं पुष्यमित्र शुंग द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ के पुरोहित (आचार्य) भी थे, जिससे राजसत्ता और विद्वत्समाज के बीच घनिष्ठ संबंध का पता चलता है।
पुष्यमित्र शुंग का शासनकाल और मृत्युकाल
पुराणों के अनुसार पुष्यमित्र शुंग ने कुल 36 वर्ष तक राज्य किया। इस गणना के अनुसार उसकी मृत्यु लगभग 149 ईसा पूर्व में हुई होगी। किंतु वायु एवं ब्रह्मांड पुराण से यह भी ज्ञात होता है कि उसने कुल 60 वर्ष तक शासन किया। ऐसा प्रतीत होता है कि इन 60 वर्षों में पुष्यमित्र का वह कालखंड भी सम्मिलित कर लिया गया है, जिसमें वह मौर्य साम्राज्य के अधीन अवंति प्रदेश में एक राज्यपाल के पद पर कार्यरत था। सामान्यतया आधुनिक इतिहासकार उसका राजकीय शासनकाल लगभग 185 ईसा पूर्व से 149 ईसा पूर्व तक मानते हैं, यद्यपि इतिहासकार रोमिला थापर जैसे कुछ विद्वान बृहद्रथ की हत्या की तिथि को 180 अथवा 181 ईसा पूर्व के आसपास भी मानते हैं।
पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी और शुंग वंशावली
पुराणों के अनुसार शुंग वंश में कुल दस शासक हुए। इन सभी राजाओं ने मिलकर कुल 112 वर्षों तक राज्य किया। पुष्यमित्र की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अग्निमित्र शुंग वंश का द्वितीय शासक हुआ। इसके शासनकाल की किसी विशेष महत्त्वपूर्ण घटना का विस्तृत ज्ञान उपलब्ध नहीं है। इसके आठ वर्ष के शासन के उपरांत वसुज्येष्ठ राजा हुआ। शुंग वंश का चौथा शासक वसुमित्र था, जिसने अपने पितामह के अश्वमेध यज्ञ की रक्षा करते हुए यवनों को सिंधु नदी के तट पर हराकर यज्ञ का घोड़ा छुड़वाया था। संभवतः शासक बनने पर वसुमित्र विलासी स्वभाव का हो गया। हर्षचरित से ज्ञात होता है कि नृत्य का आनंद लेते समय मूलदेव नामक किसी व्यक्ति ने उसकी हत्या कर दी। पुराणों के अनुसार उसने कुल 10 वर्ष तक राज्य किया।
वसुमित्र के पश्चात् जो शुंग शासक हुए, उनमें भद्रक, पुलिंदक, घोष और देवभूति के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस वंश का नवाँ शासक भगभद्र था। इसके शासनकाल के 14वें वर्ष में तक्षशिला के इंडो-ग्रीक शासक एंटियालकीड्स का राजदूत हेलियोडोरस उसके दरबार में विदिशा आया था। उसने भागवत धर्म को स्वीकार कर विदिशा (बेसनगर) में एक गरुड़-ध्वज की स्थापना करके भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की। यह हेलियोडोरस स्तंभ प्राचीन भारत में किसी विदेशी द्वारा स्थापित सबसे प्राचीन ज्ञात हिंदू धार्मिक अभिलेखों में से एक माना जाता है और इस ध्वज पर दंभ (आत्म-निग्रह), त्याग और अप्रमाद, ये तीन महत्त्वपूर्ण शब्द अंकित हैं।
पुराणों से ज्ञात होता है कि शुंग वंश का अंतिम शासक देवभूति स्वभाव से अत्यधिक दुर्व्यसनी और विलासी था, जिसके कारण वह जनता में बहुत अलोकप्रिय हो गया था। उसने कुल 10 वर्ष तक शासन किया। उसके अमात्य वासुदेव कण्व ने कपटपूर्वक उसकी हत्या करके शुंग वंश का अंत किया और स्वयं कण्व वंश की स्थापना कर दी, जिसने आगे लगभग 45 वर्षों तक मगध पर शासन किया।
शुंग शासन का ऐतिहासिक महत्त्व
शुंग शासकों के काल में धर्म, साहित्य एवं कला के क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति हुई। प्रसिद्ध इतिहासकार हेमचंद्र रायचौधरी का मानना है कि संपूर्ण भारतीय इतिहास में, विशेषरूप से मध्य भारत के इतिहास में पुष्यमित्रवंशीय राजाओं का विशेष और स्थायी महत्त्व है। इनके शासनकाल में यूनानी आक्रमणकारियों को गहरा आघात पहुँचा और मध्यदेश के लिए निरंतर संकटकालीन स्थिति उत्पन्न करने वाले आक्रमण एक हद तक रुक गए। सीमावर्ती यूनानी राजाओं ने भी अपनी आक्रामक नीति में परिवर्तन किया और वे कालांतर में सेल्यूकसकालीन कूटनीतिक नीति का अनुसरण करने लगे। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस काल में साहित्य, कला और धर्म के क्षेत्रों में गुप्तकालीन स्वर्णयुग जैसे पुनरुत्थान की एक लहर-सी आ गई थी, किंतु अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इस अतिरंजित वर्णन को एक जातीय पूर्वाग्रह से प्रेरित मानते हैं और इसे सावधानीपूर्वक संतुलित दृष्टिकोण से देखने की सलाह देते हैं।
शुंग काल को प्राचीन भारतीय इतिहास में मौर्योत्तर काल की संक्रमण-अवस्था के रूप में भी देखा जाता है, जब केंद्रीकृत मौर्य साम्राज्य धीरे-धीरे क्षेत्रीय सत्ताओं में विभाजित होने लगा था, किंतु साथ ही कला, स्थापत्य और भाषा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण नवाचार भी होते रहे। भरहुत और साँची के शिल्प-सौंदर्य, पतंजलि का व्याकरण-चिंतन, तथा कालिदास-पूर्व संस्कृत नाट्य-परंपरा के प्रारंभिक सूत्र, ये सभी शुंगकालीन सांस्कृतिक समृद्धि के प्रमुख उदाहरण माने जाते हैं।


