कृष्ण प्रथम (756–774 ई.)
मुख्य लेख : राष्ट्रकूट राजवंश
चित्तलदुर्ग से प्राप्त एक लेख के अनुसार दंतिदुर्ग का कोई पुत्र नहीं था और उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका चाचा कृष्ण प्रथम लगभग 756 ई. में राष्ट्रकूट राजपीठ पर आसीन हुआ। राज्याभिषेक के अवसर पर उसने शुभतुंग एवं अकालवर्ष की उपाधियाँ धारण कीं। वी. ए. स्मिथ के अनुसार कृष्ण प्रथम ने अपने भतीजे दंतिदुर्ग को अपदस्थ कर राजसिंहासन पर अधिकार किया था, जबकि सी. वी. वैद्य के अनुसार संभवतः उसने दंतिदुर्ग की हत्या करके गद्दी प्राप्त की थी। बड़ौदा अभिलेख में दंतिदुर्ग का नाम नहीं मिलता। इसमें कहा गया है कि कृष्णराज ने अपने एक दुराचारी संबंधी की हत्या करके अपनी जाति के कल्याण (गोत्रहिताय) के लिए प्रभुसत्ता ग्रहण की थी।
कृष्ण द्वितीय के बेगुम्रा लेख में दंतिदुर्ग के लिए ‘वल्लभराजेऽकृताप्रजाबाधे’ पद प्रयुक्त हुआ है, जिसे कुछ विद्वानों ने ‘कृताप्रजाबाधे’, अर्थात् ‘प्रजा को कष्ट देने वाला’, पढ़ा है। इससे अनुमान लगाया गया है कि दंतिदुर्ग ने अपनी प्रजा पर अत्याचार किया था और कृष्ण प्रथम ने उसका विनाश करके राष्ट्रकूट राजवंश की रक्षा की। इसी कारण बड़ौदा अभिलेख में उस अत्याचारी शासक का नाम नहीं दिया गया है।
कर्कराज के शक संवत् 894 के करदा अनुदानपत्र में कहा गया है कि दंतिदुर्ग की निःसंतान मृत्यु के पश्चात् कृष्ण राजा बना। कवि एवं नौसारी अभिलेखों से भी संकेत मिलता है कि दंतिदुर्ग की मृत्यु स्वाभाविक रूप से हुई थी।
अल्तेकर ने बड़ौदा अभिलेख के ‘कृताप्रजाबाधे’ को सही रूप में ‘अकृताप्रजाबाधे’ पढ़ा है। भंडारकर के अनुसार यदि कृष्ण प्रथम ने दंतिदुर्ग की हत्या की होती, तो वह अपने अभिलेखों में उसकी प्रशंसा क्यों करता? अल्तेकर का अनुमान है कि कृष्ण प्रथम ने जिस राष्ट्रकूट शासक को पराजित किया था, वह दंतिदुर्ग नहीं, बल्कि अंतरोली-छरोली अनुदानपत्र का कर्क द्वितीय था, जो समधिगतपंचमहाशब्द परमभट्टारकमहाराजाधिराज परमेश्वर जैसी साम्राज्यिक उपाधियाँ धारण करके स्वतंत्र होने का प्रयास कर रहा था। कर्क द्वितीय को उसकी वास्तविक स्थिति का ज्ञान कराने के लिए कृष्ण प्रथम ने उसे दंडित किया होगा।
कृष्ण प्रथम की सैनिक उपलब्धियाँ
कृष्ण प्रथम दंतिदुर्ग की भाँति एक साम्राज्यवादी शासक था। सिंहासनारोहण के बाद उसने सभी दिशाओं में साम्राज्य-विस्तार की योजना बनाई। इस क्रम में उसने न केवल गुजरात पर नियंत्रण स्थापित किया, बल्कि चालुक्यों और गंगों को पराजित करके वर्तमान कर्नाटक तथा कोंकण के एक बड़े भाग पर भी अधिकार कर लिया।
कर्क द्वितीय का दमन
राज्याभिषेक के कुछ समय बाद ही कृष्ण प्रथम को अपने भतीजे तथा दक्षिणी गुजरात के शासक कर्क द्वितीय से युद्ध करना पड़ा। लगभग 757 ई. में कर्क द्वितीय ने समधिगतपंचमहाशब्द परमभट्टारकमहाराजाधिराज परमेश्वर जैसी सम्राट-सूचक उपाधियाँ धारण करके अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। कृष्ण ने कर्क को पराजित कर अपने अधीन कर लिया और गुजरात के प्रशासन पर अपना नियंत्रण स्थापित किया।
राहप्प के विरुद्ध सफलता
बेगुम्रा अनुदानपत्रों और कर्क के सूरत अनुदानपत्रों में कहा गया है कि कृष्ण ने दर्पयुक्त राहप्प को पराजित करके उसका पालिध्वज अपहृत कर लिया और इसके उपलक्ष्य में राजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की। अभी तक राहप्प की निश्चित पहचान नहीं हो सकी है। कभी फ्लीट जैसे विद्वानों ने राहप्प का समीकरण कर्क द्वितीय से किया था, जिसे अब अधिकांश विद्वान स्वीकार नहीं करते।
कुछ विद्वानों के अनुसार राहप्प या तो चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन् द्वितीय रहा होगा या उसका कोई निकट संबंधी अथवा सेनापति। मेवाड़ से प्राप्त 725 ई. के एक अभिलेख में महाराजाधिराज परमेश्वर श्रीधवलप्पदेव का उल्लेख मिलता है। इस लेख के आधार पर अल्तेकर का अनुमान है कि राहप्प मेवाड़ का शासक हो सकता है, जो श्रीधवलप्पदेव का कोई पुत्र या उत्तराधिकारी रहा होगा। इस प्रकार राहप्प की वास्तविक पहचान निश्चित नहीं है।
बादामी के चालुक्यों का विनाश
दंतिदुर्ग ने चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन् द्वितीय को पराजित अवश्य किया था, लेकिन वह चालुक्यों का पूरी तरह उन्मूलन नहीं कर सका था। दंतिदुर्ग की मृत्यु के पश्चात् कीर्तिवर्मन् द्वितीय अपने खोए हुए प्रदेशों को पुनः अधिकृत करने का प्रयास कर रहा था।
कर्क और राहप्प को पराजित करने के बाद कृष्ण प्रथम ने बादामी के चालुक्यों की अवशिष्ट शक्ति को समाप्त करने की योजना बनाई। कृष्ण प्रथम के आक्रमण से पहले ही, लगभग 757 ई. में, कीर्तिवर्मन् स्वयं अपनी सेना लेकर भीमा नदी के तट पर स्थित अपने विजयस्कंधावार में उपस्थित हो गया। फलतः कृष्ण प्रथम ने कीर्तिवर्मन् को निर्णायक रूप से पराजित करके चालुक्य राजवंश का पूरी तरह विनाश कर दिया।
गोविंद तृतीय के शक संवत् 730 (807 ई.) के एक अभिलेख में वर्णित है कि वल्लभ (कृष्ण प्रथम) ने चालुक्य राजलक्ष्मी का अपहरण कर लिया—‘यश्चालुक्यकुलादनून… लक्ष्मीमाकृष्टवान् वल्लभः।’
कर्क द्वितीय के शक संवत् 734 (811 ई.) के बड़ौदा लेख से भी पता चलता है कि राजाओं में सिंह के समान कृष्ण प्रथम युद्ध की इच्छा से आगे बढ़ा और उसने महावराह (कीर्तिवर्मन् द्वितीय) को हिरण बना दिया, अर्थात् रणभूमि से भगा दिया—‘महावराहं हरिणी चकार प्राज्यप्रगावे खलु राजसिंहः।’ इसकी पुष्टि कल्याणी के चालुक्य शासकों के अभिलेखों से भी होती है, जिनमें कहा गया है कि चालुक्यों का यश कीर्तिवर्मन् के साथ समाप्त हो गया—
तद्भवो विक्रमादित्यः कीर्तिवर्मा तदात्मजः।
येन चालुक्यराज्यश्रीरन्तरायिन्यमद्भुवि।।
इस प्रकार कीर्तिवर्मन् को पराजित करके कृष्ण प्रथम ने संपूर्ण कर्नाटक प्रदेश पर अधिकार कर लिया।
गंगों के विरुद्ध सफलता
चालुक्यों के विनाश के बाद कृष्ण प्रथम ने दक्षिण में मैसूर के गंगवाड़ी राज्य पर आक्रमण किया। तलेगाँव लेख से ज्ञात होता है कि 768 ई. में मन्नपुर या मान्यपुर नामक स्थान पर कृष्ण प्रथम ने अपना सैनिक शिविर स्थापित किया था। गंगराज श्रीपुरुष और उसके पुत्र शिवमार ने बड़ी वीरता से अपने साम्राज्य की रक्षा का प्रयास किया। प्रारंभ में गंगों को सफलता भी मिली, लेकिन अंततः उन्हें पराजित होना पड़ा। कृष्ण ने उनकी राजधानी मान्यपुर पर अधिकार कर वहाँ विजयोत्सव मनाया। गंगों की बहुत-सी संपत्ति राष्ट्रकूटों ने अपने अधिकार में ले ली। कृष्ण प्रथम ने श्रीपुरुष को एक छोटे क्षेत्र का सामंत नियुक्त किया और 769 ई. में गंग राज्य से वापस लौट आया। इस प्रकार गंग राज्य के कुछ क्षेत्र भी राष्ट्रकूट साम्राज्य में सम्मिलित हो गए।
वेंगी के विरुद्ध अभियान
गंगों को पराजित करने के बाद कृष्ण प्रथम ने वेंगी के चालुक्यों के विरुद्ध अभियान किया। वेंगी के चालुक्य भी वातापी के चालुक्यों की ही एक शाखा थे। अलस लेख से ज्ञात होता है कि कृष्ण प्रथम ने अपने ज्येष्ठ पुत्र गोविंद को युवराज बनाया और उसके नेतृत्व में एक बड़ी सेना चालुक्य राज्य के विरुद्ध भेजी। राष्ट्रकूट सेना लगभग 769 ई. में कृष्णा एवं मूसी नदियों के संगम तक पहुँच गई, जो वेंगी से लगभग 160 किमी की दूरी पर था। इस युद्ध में वेंगी नरेश विष्णुवर्धन चतुर्थ पराजित हुआ। किंतु बाद में दोनों राजवंशों में संधि हो गई। संधि की शर्तों के अनुसार विष्णुवर्धन ने अपने राज्य का कुछ भाग गोविंद द्वितीय को दे दिया और अपनी पुत्री शीलभट्टारिका का विवाह उसके छोटे भाई ध्रुव के साथ कर दिया।
इस प्रकार वेंगी राज्य का कुछ भाग भी राष्ट्रकूट साम्राज्य में सम्मिलित हो गया। मंदुक लेख से ज्ञात होता है कि संपूर्ण मराठी मध्य प्रांत 772 ई. तक राष्ट्रकूटों के अधीन था।
दक्षिणी कोंकण का अधिग्रहण
कृष्ण प्रथम ने दक्षिणी कोंकण पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया और शिलाहार वंश के संस्थापक सणफुल्ल को वहाँ का शासक नियुक्त किया। रट्टराज के खारेपाटन दानपत्रों से पता चलता है कि सणफुल्ल ने सह्य पर्वत तथा समुद्र के मध्य का प्रदेश कृष्णराज की कृपा से प्राप्त किया था। इस प्रकार कृष्ण प्रथम ने दक्षिणी कोंकण को अधिकृत करके सणफुल्ल को अपना सामंत नियुक्त किया। कोंकण के शिलाहार लंबे समय तक राष्ट्रकूटों के प्रति निष्ठावान बने रहे।
कृष्ण प्रथम का मूल्यांकन
कृष्ण प्रथम एक कुशल योद्धा होने के साथ-साथ योग्य शासक भी था। उसने अकालवर्ष एवं शुभतुंग के अलावा पृथ्वीवल्लभ तथा श्रीवल्लभ जैसी उपाधियाँ भी धारण कीं और उत्तराधिकार में प्राप्त साम्राज्य का पर्याप्त विस्तार किया। उसके साम्राज्य में संपूर्ण महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश का एक बड़ा भाग शामिल था। अल्तेकर के अनुसार अपने अल्प शासनकाल में कृष्ण प्रथम ने राष्ट्रकूट राज्य की पैतृक सीमा का लगभग तीन गुना विस्तार किया और अपनी विजयों से अपने उत्तराधिकारियों के लिए वह मार्ग प्रशस्त किया, जिसके माध्यम से वे उत्तर भारत की राजनीति में भाग ले सके।
कृष्ण प्रथम विजेता एवं साम्राज्य-निर्माता होने के साथ-साथ कला एवं साहित्य का उदार संरक्षक भी था। प्रसिद्ध जैन विद्वान् अकलंक भट्ट कृष्ण प्रथम के समकालीन थे। कहा जाता है कि उन्होंने ‘राजवार्तिक’ तथा अन्य कई ग्रंथों की रचना की थी। कृष्ण ने अपने नाम पर कनेश्वर (कृष्णेश्वर) नामक एक देवकुल का निर्माण कराया, जिसमें अनेक विद्वान् निवास करते थे।
एक धर्मनिष्ठ शासक के रूप में कृष्ण ने ब्राह्मणों को धन दान दिया और लगभग 18 मंदिरों का निर्माण करवाया। उसके काल का सबसे उत्कृष्ट निर्माण एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर है, जो तत्कालीन शैलकृत वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है। इस मंदिर का निर्माण एक ही शैलखंड को काटकर किया गया है। बड़ौदा अभिलेख के अनुसार, जब देवताओं ने कैलाश मंदिर को देखा, तो वे भी आश्चर्यचकित होकर कहने लगे कि इस प्रकार की सुंदरता कला में अन्यत्र दुर्लभ है। संभवतः आरंभ में इस देवालय का नाम उसके निर्माता के नाम पर कृष्णेश्वर था, किंतु वर्तमान में यह कैलाश मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।
कुछ विद्वानों का मानना है कि घमौरी (अमरावती तालुका) से प्राप्त मुद्राभांड, जिसमें 1,800 चाँदी के सिक्के हैं और जिन पर एक ओर राजा का शीश तथा दूसरी ओर ‘परममाहेश्वर माहादित्यपादानुध्यात श्रीकृष्णराज’ लेख अंकित है, कृष्ण प्रथम के सिक्के हैं। किंतु इस मत को अंतिम रूप से स्वीकार करना कठिन है।
कृष्ण प्रथम की अंतिम ज्ञात तिथि 772 ई. के तलेगाँव लेख से प्राप्त होती है, जबकि उसके उत्तराधिकारी पुत्र ध्रुव की प्रथम ज्ञात तिथि 775 ई. के पिम्परी अनुदानपत्र की है, जिसमें कृष्ण प्रथम का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इससे अनुमान होता है कि कृष्ण प्रथम ने लगभग 774 ई. तक शासन किया।
कृष्ण प्रथम के दो पुत्र थे—गोविंद द्वितीय तथा ध्रुव। कृष्ण प्रथम ने अपने पुत्र गोविंद द्वितीय को 770–772 ई. के बीच युवराज नियुक्त कर दिया था। युवराज की हैसियत से ही उसने वेंगी के चालुक्य शासक विष्णुवर्धन चतुर्थ के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व किया था।
महत्त्वपूर्ण FAQ
1. कृष्ण प्रथम कौन था और वह राष्ट्रकूट सिंहासन पर कैसे बैठा?
कृष्ण प्रथम, दंतिदुर्ग का चाचा और राष्ट्रकूट वंश का प्रमुख शासक था। दंतिदुर्ग की मृत्यु के बाद लगभग 756 ई. में वह राष्ट्रकूट सिंहासन पर बैठा। उसने शुभतुंग और अकालवर्ष जैसी उपाधियाँ धारण कीं।
2. कृष्ण प्रथम की प्रमुख सैन्य उपलब्धियाँ क्या थीं?
कृष्ण प्रथम ने कर्क द्वितीय और राहप्प को पराजित किया तथा बादामी के चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन् द्वितीय का अंत किया। उसने गंगवाड़ी और वेंगी के विरुद्ध भी सफल अभियान चलाए तथा दक्षिणी कोंकण पर राष्ट्रकूट अधिकार स्थापित किया।
3. कृष्ण प्रथम का राष्ट्रकूट साम्राज्य के विस्तार में क्या योगदान था?
उसने राष्ट्रकूट साम्राज्य का व्यापक विस्तार करते हुए महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश के बड़े भाग और दक्षिणी कोंकण पर अपना प्रभाव स्थापित किया। उसकी विजयों ने राष्ट्रकूटों को एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में स्थापित किया।
4. कृष्ण प्रथम का सबसे प्रसिद्ध स्थापत्य निर्माण कौन-सा है?
कृष्ण प्रथम के शासनकाल की सबसे प्रसिद्ध स्थापत्य उपलब्धि एलोरा का कैलाश मंदिर है। यह एकाश्म शैलकृत वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है और राष्ट्रकूटकालीन कला की महान उपलब्धियों में गिना जाता है।
5. कृष्ण प्रथम के उत्तराधिकारी कौन थे?
कृष्ण प्रथम के दो प्रमुख पुत्र थे—गोविंद द्वितीय और ध्रुव। उसने गोविंद द्वितीय को लगभग 770–772 ई. के बीच युवराज नियुक्त किया था। बाद में ध्रुव राष्ट्रकूट सिंहासन पर बैठा और एक शक्तिशाली शासक बना।
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