1861 का भारतीय परिषद् अधिनियम (Indian Council Act of 1861)

1858 ई. के अधिनियम द्वारा भारतीय प्रदेशों को अपने प्रत्यक्ष अधिकार में लेने के बाद भी भारतीय प्रशासन में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था, जबकि भारत के प्रशासनिक ढ़ाँचे में परिवर्तन करना आवश्यक था। ब्रिटिश संसद ने तीन वर्ष बाद 1861 ई. में भारतीय परिषद् अधिनियम पारित किया जिसके द्वारा पहली बार भारतीयों को प्रशासन में भाग लेने का अवसर दिया गया। यह पहला ऐसा अधिनियम था, जिसमें विभागीय प्रणाली एवं मंत्रिमंडलीय प्रणाली की नींव रखी गई। पहली बार विधि-निर्माण के कार्य में भारतीयों का सहयोग लेने का प्रयास किया गया। इस ऐक्ट ने गवर्नर जनरल की परिषद् की विधायी शक्तियों का विकेंद्रीकरण कर दिया अर्थात बंबई और मद्रास की सरकारों को भी विधायी शक्ति प्रदान की गई।

1861 ई. के इस भारतीय परिषद् अधिनियम को ‘शुभचिंतक स्वेच्छाचारितावाद’ की संज्ञा दी जाती है। शुभचिंतक इस अर्थ में कि इस अधिनियम के द्वारा भारतीय शासन में भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया गया और स्वेच्छाचारितावाद इस अर्थ में था कि ब्रिटिश सरकार पहले की भाँति ही अनुत्तरदायी बनी रही।

1861 का अधिनियम पारित होने के कारण (Due to the Passage of the Act of 1861)

इंग्लैंड के आम जनमानस का विश्वास था कि 1857 ई. की क्रांति का कारण शासक और शासित के बीच घनिष्ठ संबंध का अभाव तथा देश की व्यवस्थापिका सभा में भारतीयों की अनुपस्थिति थी। सर सैयद अहमद खाँ ने भी भारतीय व्यवस्थापिका सभा में भारतीयों को सदस्यता न मिलना विद्रोह का एक मुख्य कारण बताया था। बंबई के गवर्नर बार्टल फ्रेरे ने भी लिखा था कि भारतीय सदस्यों को लेजिस्लेटिव कौंसिल में स्थान देना अति आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना हमारे पास ऐसा कोई साधन नहीं है, जिससे हम यह जान सकें कि सरकार द्वारा लाखों व्यक्तियों के लिए बनाया गया कानून उनके अनुकूल है या नहीं। इस प्रकार 1857 के विद्रोह ने प्रचलित भारतीय प्रणाली के दोषों को उजागर कर दिया जिसके कारण विधान परिषदों में भारतीयों को सम्मिलित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

भारतीय जनता भी शासन व्यवस्था में सुधार करने की माँग कर रही थी और शासन में भाग लेना चाहती थी। इसी माँग को पूरा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने यह अधिनियम पारित किया। इस प्रकार 1861 का अधिनियम विधान परिषदों में भारतीयों को सदस्यों के रूप में सम्मिलित करने की आवश्यकता का परिणाम था।

1833 ई. में प्रांतीय सरकारों के कानून बनाने का अधिकार सपरिषद् गवर्नर जनरल को दे दिया गया था, किंतु यह नवीन शासन व्यवस्था अनुपयोगी तथा असफल सिद्ध हुई। समयाभाव तथा यातायात के साधनों का विकास न होने के कारण सपरिषद् गवर्नर जनरल के लिए देश के विभिन्न प्रांतों की स्थिति से परिचित होना संभव नहीं था। ऐसी दशा में वे इन प्रांतों के लिए सही कानून नहीं बना पाते थे, दूसरी ओर प्रांतीय सरकारें कानून बनाने का अधिकार छिन जाने से अप्रसन्न थीं। यद्यपि 1853 के अधिनियम के द्वारा प्रांतीय सरकारों के प्रतिनिधियों को परिषद् में स्थान दिया गया था, तथापि वह उनसे संतुष्ट नहीं थे। इस शासकीय त्रुटि को दूर करने के लिए भी यह अधिनियम पारित करना आवश्यक था।

1853 ई. के अधिनियम द्वारा स्थापित भारतीय विधान परिषद् ने अपनी शक्तियाँ धीरे-धीरे बढ़ा ली थीं, जो उस समय विद्यमान शासन प्रणाली के साथ पूर्णतया असंगत थी। यह कौंसिल गवर्नर जनरल से जवाब-तलब करती थी और गोपनीय पत्रों को भी अपने सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करती थी। इससे शासकीय कार्य में बाधा उत्पन्न होती थी। इसलिए इसकी शक्ति और अधिकार को नियंत्रित करने के लिए भी यह अधिनियम पारित करना आवश्यक था।

1857 ई. के बाद भारतीय तथा अंग्रेज दोनों एक दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखने लगे थे। ऐसे वातावरण में सरकार के लिए भारतीय जनता के विचारों को जानना तथा समझना और भी कठिन हो गया था। तत्कालीन भारतीय गवर्नर जनरल कैनिंग ने भारत सचिव को इस परिस्थिति में सुधार करने के लिए कुछ सुझाव भेजा, जिसके परिणामस्वरूप सर चार्ल्स वुड ने 6 जून, 1861 ई. में हाउस ऑफ कॉमंस में एक बिल प्रस्तुत किया, जो 1861 ई. में पारित होने के बाद अधिनियम बन गया।

1861 के अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ (Salient Features of the Act of 1861)

1861 ई. के अधिनियम विकेंद्रीकरण की दिशा में पहला महत्त्वपूर्ण कदम था और विधि-निर्माण के कार्य में भारतीयों को सम्मिलित कर प्रतिनिधि सस्थाओं का बीज-वपन किया। इस अधिनियम की मुख्य धाराएँ निम्नलिखित थीं-

गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद् के साधारण सदस्यों की संख्या चार से बढ़ाकर पाँच कर दी गई। वायसरॉय की परिषद् में एक सदस्य और बढ़ाकर सदस्यों की संख्या पाँच कर दी गई। पाँचवाँ सदस्य विधि विशेषज्ञ होता था जो या तो बैरिस्टर या स्कॉलैंड की फैकल्टी ऑफ एडवोकेट्स का सदस्य होता था। इन पाँच सदस्यों में तीन ऐसे व्यक्ति होने आवश्यक थे, जो नियुक्ति के समय क्राउन की सेवा में कम से कम दस वर्ष का अनुभव प्राप्त कर चुके हों।

कार्यपालिका की कार्यवाही को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए गवर्नर जनरल को नियम तथा आदेश बनाने का अधिकार दिया गया। भारत सचिव प्रधान सेनापति को इस परिषद् का असाधारण सदस्य नियुक्त कर सकता था। किसी प्रांत के गवर्नर या लेफ्टिनेंट गवर्नर को असाधारण सदस्य के रूप में परिषद् की बैठक में भाग लेने की व्यवस्था की गई। गवर्नर जनरल को यह अधिकार मिला कि वह अपनी अनुपस्थिति में किसी अन्य व्यक्ति को कौंसिल का अध्यक्ष नियुक्त कर सके। यद्यपि इस अध्यक्ष को गवर्नर जनरल के सारे अधिकार प्राप्त होते थे, किंतु वह किसी कानून को स्वीकृत, अस्वीकृत या संरक्षित नहीं कर सकता था। गवर्नर जनरल को कौंसिल के सदस्यों में कार्य-वितरण करने का अधिकार दिया गया। महत्त्वपूर्ण मामले गर्वनर जनरल की कौंसिल के समक्ष रखे जाते थे, जहाँ निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता था, किंतु अंतिम स्वीकृति गवर्नर जनरल के हाथ में होती थी।

कानून-निर्माण के कार्य में सहायता के लिए गर्वनर जनरल को अपनी कौंसिल में छः से बारह सदस्यों की वृद्धि करने का अधिकार दिया गया, किंतु यह शर्त थी कि इनमें कम से कम आधे सदस्य गैर-सरकारी होंगे। इन अतिरिक्त सदस्यों को गवर्नर जनरल दो वर्ष के लिए मनोनीत करता था। विधान परिषद् को संपूर्ण ब्रिटिश भारत के लिए कानून और नियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई। इस प्रकार कानून के संबंध में इसे सर्वोच्च शक्ति और अन्य विधान निर्माता निकायों के साथ समवर्ती शक्ति प्राप्त थी।

सेना तथा उसका अनुशासन और संगठन, धर्म तथा धार्मिक रीति-रिवाजों, विदेशी शक्तियों से संबंध, राजनीतिक संबंधों, सार्वजनिक ऋण, मुद्रा, डाक और तार, चुंगी तथा अन्य सरकारों, सिक्कों की ढलाई आदि से संबंधित मामलों पर कोई बिल पेश करने से पूर्व जनरल की स्वीकृति लेना आवश्यक था। वह किसी बिल को इंग्लैंड नरेश के विचारार्थ भी रख सकता था। विधान परिषद् द्वारा पारित कोई विधेयक सपरिषद् भारत सचिव के सुझाव पर इंग्लैंड नरेश रद्द कर सकता था।

संकटकालीन परिस्थितियों में गवर्नर जनरल बिना अपनी परिषद् से परामर्श किए अध्यादेश जारी कर सकता था जो 6 महीने तक लागू रह सकते थे, किंतु 6 महीने से पहले भी भारत सचिव तथा उसकी कौंसिल और गवर्नर जनरल की विधान परिषद् उसे रद्द कर सकती थी। गवर्नर जनरल को निषेधाधिकार का पूर्ण अधिकार दिया गया, अब वह किसी भी प्रांतीय सरकार द्वारा निर्मित कानूनों को संशोधित या रद्द कर सकता था।

सपरिषद् गवर्नर जनरल को फोर्ट विलियम प्रेसीडेंसी, उत्तर-पश्चिमी प्रांत और पंजाब के लिए कानून और विनियम बनाने का अधिकार दिया गया।

1865 ई. के अधिनियम के द्वारा सपरिषद् गवर्नर जनरल को किसी नये प्रांत बनाने, उनकी सीमाओं में परिवर्तन करने तथा आश्यकतानुसार विभाजित करने का अधिकार दिया गया। इसी तरह 1869 के अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को विदेश में रहने वाले भारतीयों के संबंध में कानून बनाने का अधिकार दिया गया। 1873 ई. के अधिनियम के द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को किसी भी समय भंग करने का प्रावधान किया गया। इसी के अनुक्रम में 1 जनवरी, 1874 ई. को ईस्ट इंडिया कंपनी को भंग कर दिया गया।

देशी रियासतों या अन्य राज्यों में भारत सरकार के लोक सेवकों पर सपरिषद् गवर्नर जनरल को क्षेत्रातिरिक्त अधिकार प्रदान किया गया।

इस अधिनियम की व्यवस्था के अनुसार बंबई एवं मद्रास प्रांतों को विधि-निर्माण एवं उनमें संशोधन का अधिकार पुनः प्रदान कर दिया गया, किंतु इनके द्वारा निर्मित कानून तभी वैध माने जाते, जब उन्हें वायसरॉय वैध ठहराता। वायसरॉय को प्रांतों में विधान परिषद् की स्थापना करने तथा लेफ्टीनेंट गवर्नर की नियुक्ति करने का अधिकार मिल गया।

इन प्रांतीय गवर्नरों को कानून तथा विनियम बनाने के लिए अपनी विधान परिषदों में कम से कम चार और अधिक से अधिक आठ अतिरिक्त सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार दिया गया। इन अतिरिक्त सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष था और इनमें से कम से कम आधे सदस्यों का गैर-सरकारी होना आवश्यक था।

प्रांतीय विधान परिषदों को प्रांतों में शांति और अनुशासन की स्थापना के लिए कानून तथा नियम बनाने का अधिकार था, परंतु वे संसदीय अधिनियम के विरुद्ध नहीं होने चाहिए थे। प्रांतों के सार्वजनिक राजस्व से संबंधित विधेयक गवर्नर या लेफ्टिनेंट गवर्नर की पूर्व अनुमति के बिना प्रांतीय विधान परिषद् में प्रस्तुत नहीं हो सकता था। प्रांतों द्वारा पारित प्रत्येक कानून पर प्रांतीय गवर्नर और जनरल दोनों की स्वीकृति आवश्यक थी। इस विधि के अनुसार बनाये गये प्रांतीय कानूनों को भी इंग्लैंड नरेश भारत सचिव के माध्यम से रद्द कर सकता था।

किंतु इस अधिनियम से भारतीय जनता को वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका। विधान परिषद् का कार्य केवल कानून बनाना था। गवर्नर-जनरल को संकटकालीन अवस्था में विधान परिषद् की अनुमति के बिना ही अध्यादेश जारी करने की अनुमति थी। इस अधिनियम के द्वारा गैर-सरकारी भारतीयों को विधि-निर्माण के कार्य में भाग लेने का अवसर जरूर दिया गया, किंतु ये गैर-सरकारी सदस्य भारतीय जनता के वास्तविक प्रतिनिधि नहीं होते थे। गवर्नर जनरल दीवानों, जमींदारों और देशी राजाओं या सेवानिवृत्त कर्मचारियों में से गैर-सरकारी सदस्यों की नियुक्ति करते थे जिन्हें भारतीयों के हितों से कुछ लेना-देना नहीं था।

1861 के अधिनियम का मूल्यांकन (Evaluation of the Act of 1861)

इस अधिनियम ने भारतीयों को लेजिस्लेटिव कौंसिलों का सदस्य नियुक्त करके उन्हें पहली बार अपने देश के शासन-प्रबंध में भाग लेने का अवसर दिया। भारतीयों को कौंसिलों की सदस्यता मिलने से अंग्रेजों तथा भारतीयों की जातिगत शत्रुता कम होने की संभावनाएँ बढीं।

भारतीयों को कौंसिलों में सदस्यता मिलने तथा प्रांतों को पुनः कानून बनाने की शक्तियों से भारतीयकरण तथा विकेंद्रीकरण की एक ऐसी नीति का श्रीगणेश हुआ, जो कालांतर में स्वशासन का आधार बनी। इसके द्वारा बंबई और मद्रास की विधान परिषदों को दुबारा कानून बनाने का अधिकार दिया गया और अन्य प्रांतों के लिए भी ऐसी ही व्यवस्था की गई। यह बीसवीं शताब्दी के भारतीय विधान मंडलों का प्राइमरी चार्टर था, जिसके कारण 1935 ई. के अधिनियम के अनुसार 1937 ई. में प्रांतों को अंदरूनी मामलों में स्वराज्य दिया गया।

इस अधिनियम का संवैधानिक महत्त्व यह भी है कि इसके द्वारा भारत में उत्तरदायी संस्था का सूत्रपात हुआ। अधिनियम द्वारा भारत में विभाग पद्धति आरंभ की गई और अधिनियम की धारा आठ के अनुसार कौंसिल का कार्य उसके सदस्यों में विभाजित कर दिया गया। इससे न केवल गवर्नर जनरल का भार कम हुआ, अपितु शासन की कार्य-कुशलता में भी वृद्धि हुई। इससे भारत में प्रतिनिधि संस्थाओं के प्रारंभ तथा विकास को प्रोत्साहन मिला।

इस अधिनियम का उद्देश्य भारतीय जनता को विधान परिषदों में वास्तविक प्रतिनिधित्व देना नहीं था, क्योंकि इंग्लैंड की सरकार ने अधिनियम पारित होने से पहले ही यह घोषणा कर दी थी कि भारतवर्ष में उत्तरदायी सरकार की स्थापना करने का उसका कोई इरादा नहीं है। इस प्रकार 1861 ई. के अधिनियम से जो आशा की गई थी, वह पूरी नहीं हो सकी।

1861 ई. के अधिनियम द्वारा निर्मित विधान परिषदें केवल नाममात्र की कानून बनाने वाली समितियाँ मात्र थीं। भारतीय विधान परिषदों में सम्मिलित सभी सरकारी, गैर-सरकारी अतिरिक्त सदस्य ब्रिटिश सरकार के राजभक्त होते थे जिनका काम केवल सरकार का समर्थन करना था। इस अधिनियम के द्वारा विधान परिषदों के अधिकार तथा शक्तियों को अत्यंत सीमित कर दिया गया। वे न तो प्रश्न पूछ सकती थीं और न ही प्रस्ताव पेश कर सकती थीं। उन्हें बजट पर भी विचार करने का अधिकार नहीं था। इस अधिनियम का सबसे बड़ा दोष यह था कि विधान परिषदें कार्यपालिका के ऊपर कोई नियंत्रण नहीं रखती थी।

इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल की शक्तियों में असाधारण रूप से वृद्धि की गई और उसे अपनी विधान परिषद् और प्रांतीय विधान परिषदों द्वारा पारित विधेयकों पर वीटो करने का अधिकार मिल गया। इस प्रकार समस्त अंतिम शक्तियाँ गवर्नर जनरल में केंद्रित हो गईं। गवर्नर जनरल को भारत में शांति और सुशासन बनाये रखने के लिए अध्यादेश जारी करने की शक्ति दे दी गई। यह एक ऐसा ‘ब्रह्मबाण’ था जिसे गवर्नर जनरल ने अपने शासन के अंतिम क्षणों तक अपने तर्कश में रखा।’

इसी क्रम में 1876 ई. के शाही उपाधि अधिनियम के अंतर्गत 28 अप्रैल, 1876 को एक घोषणा द्वारा महारानी विक्टोरिया को ‘भारत की साम्राज्ञी’ घोषित किया गया। औपचारिक रूप से भारत सरकार का ब्रिटिश सरकार को अंतरण मान्य किया गया।

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