शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार युद्ध (War of Succession Among Shah Jahan’s Sons)

शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार युद्ध (War of Succession Among Shah Jahan's Sons)
शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार युद्ध (1657-1659 ई.) राजवंशीय संकट की पृष्ठभूमि मुगल इतिहास में […]

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शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार युद्ध (1657-1659 ई.)

राजवंशीय संकट की पृष्ठभूमि

मुगल इतिहास में जितनी भव्यता शाहजहाँ के नाम से जुड़ी इमारतों में दिखाई देती है, उतना ही दुखद उसके जीवन का अंतिम अध्याय रहा। 6 सितंबर 1657 ई. को जब शाहजहाँ अपनी नई राजधानी शाहजहाँबाद (दिल्ली) में गंभीर रूप से बीमार पड़ा, तो मुगल साम्राज्य की नींव हिल गई। बादशाह के अस्वस्थ होने की सूचना ने उसके चारों महत्त्वाकांक्षी पुत्रों के बीच उस रक्तरंजित उत्तराधिकार युद्ध की चिंगारी सुलगा दी, जिसने आगे चलकर मुगल इतिहास की दिशा को सदा के लिए बदल दिया।

मुगल परंपरा में उत्तराधिकार का कोई निश्चित और वैधानिक सिद्धांत नहीं था। तुर्क-मंगोल परंपरा से प्रभावित मुगल राजतंत्र में यह मान्यता प्रचलित थी कि राज्य पैतृक संपत्ति के समान समस्त पुत्रों में विभाज्य है, और अंततः तलवार की धार तथा युद्धक्षेत्र का परिणाम ही यह निर्धारित करता था कि सिंहासन पर कौन बैठेगा। बाबर से लेकर शाहजहाँ तक, लगभग प्रत्येक मुगल सम्राट के सिंहासनारोहण के पीछे किसी न किसी उत्तराधिकार संघर्ष की कहानी छिपी हुई है। परंतु 1657-1659 ई. का यह उत्तराधिकार युद्ध अपने तीव्र सैनिक अभियानों, कूटनीतिक चालों और वैचारिक आयामों के कारण मुगल इतिहास में एक अद्वितीय तथा निर्णायक स्थान रखता है। प्रसिद्ध इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने अपनी कृति ‘हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब’ में इस संघर्ष का अत्यंत विस्तृत और प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है, जो आज भी इस विषय के अध्ययन का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

शाहजहाँ के पुत्र : चार भिन्न व्यक्तित्व

शाहजहाँ की प्रिय बेगम मुमताज महल से उत्पन्न चौदह संतानों में से केवल सात ही जीवित रह सकीं-चार पुत्र और तीन पुत्रियाँ। तीनों पुत्रियाँ क्रमशः जहाँआरा (सबसे बड़ी), रोशनआरा (दूसरी) और गौहरआरा थीं।   गौहरआरा सबसे छोटी और  मुमताज की चौदहवीं तथा अंतिम संतान थी,  जिनके जन्म के समय ही 1631 ई. में मुमताज महल का देहांत हो गया था। चारों पुत्र स्वभाव और व्यक्तित्व की दृष्टि से अत्यंत भिन्न थे और यही भिन्नता आगे चलकर उत्तराधिकार युद्ध में उनकी अलग-अलग भूमिकाओं का आधार बनी।

शाहजहाँ की बीमारी के समय (सितंबर 1657 ई.) दाराशिकोह की आयु लगभग 43 वर्ष, शाहशुजा की 41 वर्ष, औरंगजेब की 39 वर्ष और मुरादबख्श की 33 वर्ष थी। इस प्रकार चारों पुत्र उस युवावस्था और परिपक्वता के काल में थे, जब राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएँ अपने चरम पर होती हैं और सत्ता प्राप्ति की लालसा सर्वाधिक तीव्र होती है।

दाराशिकोह : विद्वान राजकुमार और शाहजहाँ का प्रिय पुत्र

दाराशिकोह का जन्म 20 मार्च 1615 ई. को अजमेर में हुआ था। वह शाहजहाँ का ज्येष्ठ पुत्र था और बादशाह उसे असाधारण स्नेह करता था। दारा इलाहाबाद, पंजाब और मुल्तान जैसे समृद्ध प्रदेशों का सूबेदार नियुक्त था, परंतु वह प्रायः अपना अधिकांश समय शाहजहाँ के साथ राजधानी में ही व्यतीत करता था। उसे प्रारंभ में 20,000 जात/20,000 सवार का मनसब तथा ‘शाहबुलंद-इकबाल’ की गौरवपूर्ण उपाधि प्राप्त हुई थी, जो आगे चलकर बढ़ाकर 40,000 कर दी गई। बाद में जब 1657 ई. में शाहजहाँ बीमार पड़ा, तो उसकी मनसबदारी और अधिक बढ़ाकर 60,000 कर दी गई, जो साम्राज्य में किसी भी शहजादे को प्राप्त सर्वोच्च मनसब थी।

दाराशिकोह असाधारण विद्यानुराग और धार्मिक उदारता का धनी था। वह वेदांत, तालमुद, बाइबिल के सिद्धांतों तथा सूफी लेखकों की रचनाओं का गंभीर अध्ययन करता था। उसने काशी के ब्राह्मण पंडितों की सहायता से अथर्ववेद सहित पचास उपनिषदों का फारसी भाषा में अनुवाद करवाया, जिसे ‘सिर्र-ए-अकबर’ (महान रहस्य) के नाम से जाना जाता है। यह अनुवाद आगे चलकर यूरोप में उपनिषद-दर्शन के प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम भी बना। उसकी रचना ‘मज्म-उल-बहरैन’ (दो समुद्रों का संगम) में उसने सूफीवाद और वेदांत दर्शन के बीच गहरी समानताएँ खोजने का प्रयास किया। वह मुगल दरबार के प्रसिद्ध सूफी संत मियाँ मीर तथा शाह मुहिबुल्लाह इलाहाबादी जैसे विद्वानों से भी गहराई से प्रभावित था, और ‘सुलह-ए-कुल’ (सार्वभौमिक सहिष्णुता) की नीति का प्रबल समर्थक था; सभी धर्मों के बीच आध्यात्मिक सामंजस्य का आधार खोजना उसके जीवन का प्रमुख लक्ष्य था।

दाराशिकोह किसी भी दृष्टि से पाखंडी अथवा धर्म-त्यागी नहीं था। उसने कभी इस्लाम के मूलभूत सिद्धांतों का परित्याग नहीं किया, बल्कि उसने केवल सूफी परंपरा की उस सर्वदर्शन-संग्रहकारी प्रवृत्ति को अपनाया था, जो इस्लाम की एक मान्य और स्वीकृत विचारधारा रही है। इतिहासकारों के शब्दों में कहें तो “उसमें कुछ हुमायूँ के और कुछ अकबर के गुण विद्यमान थे।” दुर्भाग्यवश, दारा में सैनिक कौशल, व्यावहारिक प्रशासनिक अनुभव और कूटनीतिक दूरदृष्टि का अभाव था। वह पुस्तकालय के वातावरण में जितना सहज था, राजनीति और युद्ध के रणांगण में उतना ही दुर्बल सिद्ध हुआ।

शाहशुजा: बंगाल का महत्त्वाकांक्षी किंतु दुर्बल सूबेदार

शाहजहाँ का दूसरा पुत्र शाहशुजा 23 जून 1616 ई. को पैदा हुआ था। वह बंगाल का सूबेदार था और बुद्धिमत्ता, साहस तथा प्रशासनिक योग्यता के गुण उसमें विद्यमान थे। फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वा बर्नियर, जो इस संपूर्ण उत्तराधिकार युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी था, ने अपने यात्रा-वृत्तांत में लिखा कि शुजा दारा से “अधिक बुद्धिमान, दृढ़-संकल्प तथा आचार-व्यवहार में श्रेष्ठतर” था और “कुचक्र रचने में बड़ा ही निपुण था।”

परंतु शाहशुजा में एक गंभीर दुर्बलता थी- वह काम-वासना और भोग-विलास का दास था। बर्नियर के ही शब्दों में : “यदि एक बार वह कामिनियों से घिर गया, तो उसकी सारी बुद्धिमानी खो जाती थी।” बंगाल की आर्द्र जलवायु और उसके विलासितापूर्ण जीवन ने उसके स्वास्थ्य को शीघ्र ही क्षीण कर दिया था और 41 वर्ष की अपेक्षाकृत कम आयु में ही उसमें बुढ़ापे के लक्षण दिखाई देने लगे थे। बंगाल तथा पूर्वी भारत के अनेक शिया मुसलमान उसे भावी बादशाह के रूप में देखना चाहते थे। इस प्रकार प्रतिभा और योग्यता के होते हुए भी वह अनुशासनहीनता तथा विलासिता के कारण अंततः उत्तराधिकार की दौड़ में अयोग्य सिद्ध हुआ।

औरंगजेब : कठोर, कूटनीतिज्ञ और अपराजेय

शाहजहाँ का तीसरा पुत्र औरंगजेब 3-4 नवंबर 1618 ई. को गुजरात के दोहद नामक स्थान पर पैदा हुआ था। वह दक्षिण भारत (दक्कन) का सूबेदार था और अपने तीनों भाइयों से सर्वथा भिन्न मिट्टी का बना था। उसने अपने जीवन का बड़ा भाग, विशेषकर 16 वर्ष की आयु से ही, कठिनाइयों और संघर्षों में व्यतीत किया था- बल्ख-बदख्शां का असफल अभियान (1646-47 ई.), कंधार के तीन असफल अभियान (1649-53 ई.), मुल्तान, गुजरात, सिंध और अंततः दक्षिण- जहाँ भी उसे भेजा गया, उसने अपनी असाधारण प्रशासनिक और सैनिक प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

औरंगजेब में अडिग साहस, दृढ़-संकल्प, उच्चकोटि की कार्यक्षमता तथा असाधारण कूटनीतिक बुद्धि विद्यमान थी। वह युद्धक्षेत्र में जितना वीर था, उतना ही शांतिपूर्ण शासन-संचालन में भी निपुण था। यद्यपि लोग उससे प्रेम की अपेक्षा भय अधिक करते थे, किंतु उसे मानव-स्वभाव की गहरी पहचान थी और वह भली-भाँति जानता था कि किससे, कब, कहाँ और किस प्रकार काम लेना चाहिए। एक कट्टर सुन्नी मुसलमान होने के नाते उसे उलेमा वर्ग तथा धार्मिक रूढ़िवादी तबके का व्यापक समर्थन भी सहज ही प्राप्त था। धूर्त और अत्यंत बुद्धिमान औरंगजेब की तुलना में दाराशिकोह राजनीतिक रणकौशल में कहीं नहीं ठहरता था।

मुरादबख्श: साहसी किंतु मूर्ख और अदूरदर्शी

शाहजहाँ का सबसे छोटा चौथा पुत्र मुरादबख्श 1624 ई. में पैदा हुआ था। वह मालवा और गुजरात का सूबेदार था। कट्टर सुन्नी मुसलमान मुरादबख्श स्वभाव से साहसी और वीर तो था, किंतु मद्यपान की गहरी लत और सुखोपभोगी प्रवृत्ति ने उसके चरित्र को भीतर से खोखला कर दिया था। उसमें सिंहासन प्राप्त करने की तीव्र लालसा तो थी, परंतु उसके लिए आवश्यक दीर्घकालिक योजना बनाने तथा उसे कार्यान्वित करने की क्षमता का सर्वथा अभाव था। कूटनीति में वह सर्वथा अनाड़ी था, और इसी कमजोरी के कारण वह अंततः अपने ही बड़े भाई औरंगजेब के जाल में फँसता चला गया। कुछ आधुनिक इतिहासकारों ने उसे मुगल राजपरिवार की ‘काली भेड़’ की संज्ञा भी दी है।

शाहजहाँ की बीमारी और उत्तराधिकार संकट का आरंभ

6 सितंबर 1657 ई. को शाहजहाँ शाहजहाँबाद में गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उसे मूत्राशय (स्ट्रैंग्युरी) की एक गंभीर बीमारी हुई, जो कुछ समय के लिए लगभग घातक सिद्ध हो गई थी। इस भीषण बीमारी की खबर ने संपूर्ण साम्राज्य में हलचल मचा दी और यह अफवाह तेजी से फैल गई कि बादशाह की मृत्यु हो चुकी है। उस समय चारों पुत्रों में से केवल दाराशिकोह ही राजधानी में बादशाह के पास उपस्थित था। शाहजहाँ ने दारा को साम्राज्य का अस्थायी भार सौंप दिया और आदेश दिया कि समस्त पदाधिकारी उसे लगभग सम्राट के समान सम्मान प्रदान करें।

दारा ने अपनी स्थिति को अधिक सुदृढ़ करने के लिए बीमार शाहजहाँ से औरंगजेब और मुराद के विरुद्ध अनेक फरमान जारी करवाए। उसने बादशाह को यह विश्वास दिलाया कि मुराद ने घृणित अपराध किए हैं और औरंगजेब ने गोलकुंडा अभियान (1656 ई.) से प्राप्त संपत्ति अनुचित रूप से दबा रखी है। इन आरोपों के आधार पर शाहजहाँ ने दोनों पुत्रों के विरुद्ध कठोर आदेश जारी कर दिए। इसके साथ ही दारा ने साम्राज्य के सभी प्रमुख संचार मार्ग बंद करवा दिए, ताकि शाहजहाँ की बीमारी की सही सूचना अन्य भाइयों तक न पहुँच सके। दारा के इस संदिग्ध व्यवहार से उसके भाइयों में यह धारणा और भी दृढ़ हो गई कि बादशाह की वास्तव में मृत्यु हो चुकी है और दारा ने छल-पूर्वक सत्ता हथिया ली है।

यद्यपि नवंबर 1657 ई. के मध्य तक बादशाह के स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार हो गया और वह पुनः आगरा भी लौट आया, किंतु तब तक दूर के प्रांतों में फैली मृत्यु की अफवाहों तथा दारा की सत्ता-केंद्रीकरण संबंधी गतिविधियों ने पूरे साम्राज्य में अराजकता और अविश्वास का वातावरण उत्पन्न कर दिया था। इस स्थिति के बाद उत्तराधिकार युद्ध अब लगभग अपरिहार्य हो चुका था।

उत्तराधिकार युद्ध के मूलभूत कारण

शाहजहाँ के जीवित रहते हुए उसके पुत्रों के बीच सत्ता के लिए युद्ध होना मुगलकाल का पहला ऐसा प्रत्यक्ष उदाहरण था। इस भीषण युद्ध के लिए अनेक परस्पर जुड़े हुए कारण उत्तरदायी थे। सबसे प्रमुख कारण यह था कि मुगलों में उत्तराधिकार के कोई निश्चित और संहिताबद्ध वैधानिक नियम नहीं थे। दिल्ली सल्तनत की भाँति ही मुगलों में यह अलिखित परंपरा प्रचलित थी कि सिंहासन तलवार के बल पर ही प्राप्त किया जा सकता है, अतः बादशाह की मृत्यु या अशक्तता के समय उत्तराधिकार के लिए संघर्ष होना लगभग अनिवार्य हो जाता था। इसके अतिरिक्त शाहजहाँ के चारों पुत्र न केवल अत्यंत महत्त्वाकांक्षी थे, बल्कि उनके पास अपनी-अपनी सुसंगठित सेनाएँ, विशाल संसाधन और वर्षों का प्रशासनिक अनुभव भी उपलब्ध था, क्योंकि प्रत्येक पुत्र दीर्घकाल तक किसी न किसी विशाल प्रांत का सूबेदार रह चुका था और स्वयं को किसी भी दृष्टि से अपने भाइयों से कमतर नहीं मानता था।

चारित्रिक भिन्नता और परस्पर ईर्ष्या ने भी इस संघर्ष को अवश्यंभावी बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। शाहजहाँ दाराशिकोह को असाधारण रूप से प्रेम करता था, जिससे शेष तीनों भाइयों में स्वाभाविक ईर्ष्या और असंतोष की भावना उत्पन्न हुई। जब बीमारी के समय बादशाह ने दारा को साम्राज्य का प्रभार सौंपा और उसकी मनसबदारी को अन्य भाइयों की तुलना में कहीं अधिक बढ़ाया, तो यह खुला पक्षपात और भी स्पष्ट रूप से उजागर हो गया।

मुगल दरबार की तीनों प्रमुख राजकुमारियों का अपने-अपने प्रिय भाइयों के लिए सक्रिय राजनीतिक समर्थन भी इस संघर्ष का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कारक सिद्ध हुआ। जहाँआरा, जो शाहजहाँ की सर्वाधिक प्रभावशाली पुत्री थी और जिसे ‘पादशाह बेगम’ की उपाधि प्राप्त थी, सदैव दाराशिकोह का पक्ष लेती थी और उसे ही भावी बादशाह बनाना चाहती थी। इसके विपरीत रोशनआरा औरंगजेब की प्रबल समर्थक थी और उसे युद्ध के दौरान गुप्त रूप से महत्त्वपूर्ण दरबारी सूचनाएँ पहुँचाती रहती थी। गौहरआरा अपेक्षाकृत कम सक्रिय होते हुए भी मुरादबख्श को बादशाह के रूप में देखना पसंद करती थी। इसी प्रकार दरबारी अमीर और सरदार भी अलग-अलग गुटों में विभाजित हो गए थे- कट्टर सुन्नी मुसलमान औरंगजेब को समर्थन देते थे, उदारवादी विचारधारा के लोग दाराशिकोह का पक्ष लेते थे तथा शिया मुसलमानों का एक वर्ग शाहशुजा के पक्षधर थे।

उत्तराधिकार युद्ध की घटनाएँ

शाहजहाँ की गंभीर बीमारी की सूचना पाते ही मुरादबख्श ने सबसे पहले 5 सितंबर 1657 ई. को अहमदाबाद में स्वयं को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर दिया। इससे पूर्व उसने अपने दीवान अलीनकी को, जिसने उसे इस साहसिक कदम से रोकने का प्रयास किया था, मार डाला था। लगभग इसी समय शाहशुजा ने भी बंगाल की तत्कालीन राजधानी राजमहल में स्वयं को बादशाह घोषित किया और अपनी सेना लेकर आगरा की ओर कूच किया। इन दोनों घटनाओं का सामना औरंगजेब ने अत्यंत सतर्कता, धैर्य और कूटनीतिक सूझबूझ के साथ किया। उसने अपनी वास्तविक महत्त्वाकांक्षा को छिपाते हुए मुरादबख्श और शाहशुजा दोनों को पृथक-पृथक पत्र लिखकर यह प्रस्ताव भेजा कि पहले संयुक्त रूप से दारा को पराजित कर दिया जाए, उसके पश्चात साम्राज्य को आपस में उचित रूप से बाँट लिया जाएगा।

बहादुरपुर का युद्ध (24 फरवरी 1658 ई.)

जनवरी 1658 ई. में सबसे पहले शाहशुजा अपनी विशाल सेना लेकर बनारस तक आगे बढ़ आया। शाहजहाँ ने इस चुनौती से निपटने के लिए दाराशिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह, प्रसिद्ध राजपूत सेनापति मिर्जा राजा जयसिंह और दिलेर खाँ के नेतृत्व में एक शाही सेना उसका सामना करने के लिए भेजी। 24 फरवरी 1658 ई. को बनारस के निकट बहादुरपुर नामक स्थान पर उत्तराधिकार युद्ध की पहली बड़ी लड़ाई हुई। इस युद्ध में शाही सेना ने शाहशुजा को बुरी तरह पराजित कर दिया, जिससे उसे विवश होकर पुनः बंगाल लौटना पड़ा।

इस पराजय के फलस्वरूप उत्तर-पूर्व दिशा से आक्रमण का तात्कालिक खतरा तो कुछ समय के लिए टल गया, परंतु दक्षिण दिशा में स्थिति अत्यंत गंभीर बनी रही, जहाँ औरंगजेब और मुरादबख्श की संयुक्त शक्ति निरंतर आगरा की ओर बढ़ती जा रही थी।

औरंगजेब और मुरादबख्श का गठबंधन

औरंगजेब ने मुरादबख्श के साथ एक औपचारिक ‘अहदनामा’ (लिखित समझौता) संपन्न किया, जिसे अल्लाह और पैगंबर मुहम्मद के पवित्र नाम पर स्वीकृत किया गया था। इस समझौते के अनुसार युद्ध में प्राप्त लूट के माल का एक-तिहाई भाग मुरादबख्श को तथा शेष दो-तिहाई भाग औरंगजेब को प्राप्त होना निश्चित हुआ। साथ ही यह भी तय हुआ कि विजय प्राप्त होने के पश्चात पंजाब, अफगानिस्तान, कश्मीर और सिंध के प्रांत मुरादबख्श को सौंप दिए जाएँगे। इसी समझौते में दाराशिकोह को धूर्ततापूर्वक ‘रईस-अल-मुलाहिदा’ (अपधर्मी/नास्तिक शहजादा) की संज्ञा देकर उसके विरुद्ध धार्मिक घृणा को एक शक्तिशाली प्रचार-हथियार के रूप में प्रयोग किया गया।

अप्रैल 1658 ई. में औरंगजेब और मुराद की संयुक्त सेनाएँ पंजाब के दीपालपुर नामक स्थान पर आपस में मिलीं। इसी समय बंगाल के पूर्व दीवान तथा एक अत्यंत कुशल सेनानायक मीरजुमला, जिसके पास शक्तिशाली आधुनिक तोपखाना तथा फ्रांसीसी एवं अंग्रेज तोपची उपलब्ध थे, भी औरंगजेब से आकर मिल गया। ध्यातव्य है कि मीरजुमला को वास्तव में शाहजहाँ ने शाही दरबार में उपस्थित होने के लिए बुलाया था, परंतु औरंगजेब ने अपनी बेजोड़ कूटनीतिक चतुराई से उसे मार्ग में ही अपनी ओर आकर्षित कर लिया। इन गतिविधियों की जानकारी पाकर दारा ने जोधपुर (मारवाड़) के राठौड़ शासक राजा जसवंत सिंह और कासिम खाँ को अपने भाइयों की संयुक्त सेना का सामना करने के लिए भेजा।

धरमत का युद्ध (15 अप्रैल 1658 ई.)

उत्तराधिकार युद्ध की दूसरी और अत्यंत निर्णायक लड़ाई 15 अप्रैल 1658 ई. को मालवा में उज्जैन के निकट धरमत नामक स्थान पर हुई। औरंगजेब और मुरादबख्श की संयुक्त सेना ने राजा जसवंत सिंह तथा कासिम खाँ की शाही सेना को बुरी तरह पराजित कर दिया। घायल जसवंत सिंह युद्धक्षेत्र छोड़कर जोधपुर की ओर भाग गया, जहाँ लोकश्रुति के अनुसार उसकी वीरांगना पत्नी ने रणक्षेत्र से भागने के इस अपमान के कारण दुर्ग के द्वार उसके लिए बंद करवा दिए थे। धरमत की इस निर्णायक विजय से औरंगजेब की स्थिति संपूर्ण साम्राज्य में अत्यंत सुदृढ़ हो गई और उसने इस विजय की स्थायी स्मृति में समीप ही ‘फतेहाबाद’ नामक एक नए नगर की स्थापना भी करवाई।

सामूगढ़ का निर्णायक युद्ध (29 मई 1658 ई.)

धरमत की विजय के पश्चात औरंगजेब और मुराद की संयुक्त सेनाएँ ग्वालियर होते हुए तेजी से आगरा की ओर बढ़ीं। दारा को धरमत के युद्ध की पराजय की सूचना घटना के लगभग दस दिन बाद प्राप्त हुई। यह सूचना मिलते ही वह एक विशाल सेना लेकर आगरा दुर्ग से लगभग आठ मील पूर्व स्थित सामूगढ़ नामक स्थान पर जा पहुँचा। दारा की सेना संख्या की दृष्टि से अत्यंत विशाल थी, परंतु सामरिक संगठन तथा युद्ध-कौशल की दृष्टि से अपेक्षाकृत दुर्बल सिद्ध हुई। 28 मई 1658 ई. को औरंगजेब भी अपनी सेना सहित सामूगढ़ के मैदान में जा पहुँचा।

29 मई 1658 ई. को सामूगढ़ के मैदान में इस उत्तराधिकार युद्ध की सर्वाधिक निर्णायक लड़ाई हुई। कड़ी गर्मी में लड़े गए इस युद्ध में राजपूत सैनिकों ने असाधारण वीरता और शौर्य का प्रदर्शन किया, परंतु औरंगजेब की कुशल सैन्य रणनीति और मीरजुमला के आधुनिक तोपखाने के समक्ष दारा की सेना अंततः टिक नहीं सकी। दाराशिकोह की करारी पराजय हुई, और वह शाहजहाँ से मिले बिना ही आगरा में मात्र एक दिन रुककर दिल्ली की दिशा में पलायन कर गया। सामूगढ़ के इस युद्ध ने व्यावहारिक दृष्टि से संपूर्ण उत्तराधिकार युद्ध का निर्णय लगभग निश्चित कर दिया। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि मुगल सिंहासन पर औरंगजेब का अंतिम अधिकार सामूगढ़ की इस विजय का ही तार्किक और अपरिहार्य परिणाम था।

आगरा पर अधिकार और शाहजहाँ की नजरबंदी (8 जून 1658 ई.)

सामूगढ़ की विजय के तुरंत बाद औरंगजेब और मुराद की संयुक्त सेनाएँ आगरा जा पहुँचीं। शाहजहाँ ने इस विकट परिस्थिति में बातचीत के माध्यम से किसी समाधान की तलाश करने का प्रयास किया और औरंगजेब को व्यक्तिगत रूप से मिलने के लिए आमंत्रित किया, परंतु औरंगजेब ने संदेह के आधार पर इस प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया। इसके पश्चात औरंगजेब ने आगरा दुर्ग का पूर्ण घेराव कर दिया। जब दुर्ग में जल तथा रसद की आपूर्ति पूर्णतः बंद हो गई, तब विवश होकर शाहजहाँ ने 8 जून 1658 ई. को आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद औरंगजेब ने अपने ही पिता शाहजहाँ को आगरा के किले में ही आजीवन नजरबंद कर दिया। 13 जून 1658 ई. को औरंगजेब दाराशिकोह का पीछा करने के लिए दिल्ली की दिशा में रवाना हुआ।

औरंगजेब का दिल्ली पर अधिकार और प्रथम राज्याभिषेक (31 जुलाई 1658 ई.)

मथुरा पहुँचने पर औरंगजेब को यह ज्ञात हुआ कि उसका सहयोगी मुरादबख्श अपने कुछ अदूरदर्शी समर्थकों के बहकावे में आकर अब उसका ही विरोध करने की योजना बना रहा है। फलतः औरंगजेब ने एक अत्यंत कुशल कूटनीतिक चाल से मुरादबख्श को स्थायी रूप से मार्ग से हटाने का निर्णय लिया। उसने चतुराईपूर्वक मुराद को सौहार्दपूर्ण भोज पर आमंत्रित किया। मुराद कुछ हिचकिचाहट के साथ 25 जून 1658 ई. को मथुरा के निकट रूपनगर (रोहतक) में स्थित औरंगजेब के शिविर में पहुँचा, जहाँ उसे प्रचुर मात्रा में मद्यपान कराकर भोज के दौरान ही धोखे से बंदी बना लिया गया। मुराद के बंदी बनते ही उसकी संपूर्ण सेना ने बिना किसी प्रतिरोध के औरंगजेब की अधीनता स्वीकार कर ली। इसके पश्चात दाराशिकोह दिल्ली छोड़कर लाहौर की ओर भाग गया और औरंगजेब ने 21 जुलाई 1658 ई. को बिना किसी सशस्त्र संघर्ष के दिल्ली पर पूर्ण अधिकार कर लिया।

31 जुलाई 1658 ई. को औरंगजेब ने दिल्ली में अपना प्रथम राज्याभिषेक संपन्न किया और “अबुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब बहादुर” की भव्य उपाधि धारण की। इस अवसर पर विधिवत खुतबा पढ़ा गया तथा तोपों की सलामी दी गई, परंतु यह प्रथम अभिषेक वस्तुतः एक अंतरिम और औपचारिक कदम मात्र था, क्योंकि उस समय तक शेष भाइयों- शाहशुजा और दाराशिकोह के साथ संघर्ष अभी पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ था।

खजवा का युद्ध (5-6 जनवरी 1659 ई.)

इसी बीच दाराशिकोह दिल्ली और लाहौर से होते हुए सिंध की दिशा में भाग गया। औरंगजेब ने उसका पीछा करने के लिए बहादुर खाँ को लाहौर की ओर भेजा और स्वयं इलाहाबाद की दिशा में मुड़ गया, क्योंकि उसे सूचना मिली थी कि फतेहपुर जिले के खजवा नामक स्थान पर शाहशुजा ने पुनः संगठित होकर अपना सैनिक शिविर स्थापित कर लिया है। 5-6 जनवरी 1659 ई. को खजवा के मैदान में औरंगजेब और शाहशुजा की सेनाओं के बीच एक भीषण युद्ध हुआ, जिसमें अंततः शाहशुजा पराजित होकर पुनः बंगाल की ओर भाग गया। औरंगजेब ने उसका अंतिम रूप से पीछा करने के लिए अपने ज्येष्ठ पुत्र मुहम्मद सुल्तान तथा सेनापति मीरजुमला को नियुक्त किया।

पूर्णतः पराजित और हताश शाहशुजा अंततः अराकान (म्यांमार का रखाइन प्रांत) की ओर भाग गया, जहाँ स्थानीय मघ (मेघ) जाति के लोगों ने उसका तथा उसके संपूर्ण परिवार का निर्ममतापूर्वक वध कर दिया। इस पूरे प्रकरण में औरंगजेब के ज्येष्ठ पुत्र मुहम्मद सुल्तान ने कुछ समय के लिए मीरजुमला के विरुद्ध विद्रोह करते हुए शाहशुजा का साथ दे दिया था, परंतु इस भूल की कीमत उसे आजन्म कारावास के रूप में चुकानी पड़ी- ग्वालियर के किले में बंदी जीवन बिताते हुए 1676 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

देवराई की घाटी का युद्ध (मार्च 1659 ई.)

औरंगजेब के अनुभवी सेनापति निरंतर दाराशिकोह का पीछा करते रहे। शरण की खोज में इधर-उधर भटकते हुए दारा ने सिंध से गुजरात में प्रवेश किया, जहाँ के सूबेदार शाह नवाज खाँ (जो उसका ससुर भी था) ने उसका स्वागत किया। जोधपुर नरेश जसवंत सिंह की सहायता का आश्वासन पाकर वह अजमेर की ओर बढ़ा, परंतु तब तक औरंगजेब पहले ही जसवंत सिंह को मारवाड़ की सूबेदारी और अन्य रियायतों का प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला चुका था। इस प्रकार राजपूत नायक जसवंत सिंह ने अपने पूर्व वादे से मुकरते हुए अंततः औरंगजेब का ही पक्ष ग्रहण कर लिया।

अंततः दारा ने अजमेर के निकट देवराई की घाटी में अपने भाग्य की अंतिम परीक्षा लेने का साहसिक निर्णय लिया। मार्च 1659 ई. में लगभग तीन दिनों तक चले इस भीषण युद्ध में औरंगजेब की सुसंगठित सेना ने दाराशिकोह को पूर्णतः और निर्णायक रूप से पराजित कर दिया, जिसके बाद उसे पुनः पलायन करने के अतिरिक्त कोई विकल्प शेष नहीं रहा।

दाराशिकोह का दुखद अंत (30 अगस्त 1659 ई.)

देवराई की पराजय के पश्चात दारा अफगानिस्तान की ओर शरण पाने की आशा से सिंध की दिशा में रवाना हुआ। इसी दुखद यात्रा के दौरान उसकी प्रिय और वफादार पत्नी नादिरा बेगम गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गईं। जून 1659 ई. में दारा ने बोलान दर्रे के निकट दादर नामक स्थान पर बलूची सरदार मलिक जीवन खाँ से शरण की याचना की। इसी दौरान नादिरा बेगम का दुखद निधन हो गया। दारा ने अपने कुछ विश्वसनीय सैनिकों के साथ उनके पार्थिव शरीर को दफनाने के लिए आगरा भेजा। इसी क्षणिक असावधानी का लाभ उठाकर उस विश्वासघाती सरदार जीवन खाँ ने दाराशिकोह, उसकी दो पुत्रियों और छोटे पुत्र सिपिह शिकोह को धोखे से बंदी बनाकर औरंगजेब के सेनापति बहादुर खाँ के हवाले कर दिया।

बहादुर खाँ 23 अगस्त 1659 ई. को दाराशिकोह को बंदी बनाकर दिल्ली ले आया। 29 अगस्त को औरंगजेब ने अपने बड़े भाई को अत्यंत अपमानजनक ढंग से एक गंदे और जर्जर हाथी पर बिठाकर संपूर्ण नगर में घुमाया, जिससे उसे भरे बाजार में सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जा सके। इसके पश्चात एक तथाकथित ‘न्याय समिति’ अर्थात काजियों तथा उलेमाओं की सभा का गठन किया गया, जिसने 30 अगस्त 1659 ई. को धर्म और शरीयत के उल्लंघन के आरोप में दाराशिकोह को ‘विधर्मी’ (मुर्तद) घोषित करके उसे प्राणदंड की सजा सुना दी। उसी रात्रि दारा की हत्या कर दी गई, उसके कटे हुए सिर को दिल्ली की सड़कों पर घुमाया गया, और अंततः उसके शव को हुमायूँ के मकबरे परिसर में बिना किसी विशेष सम्मान के दफना दिया गया।

शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार युद्ध (War of Succession Among Shah Jahan's Sons)
दाराशिकोह का दुखद अंत (30 अगस्त 1659 ई.)

इस अत्यंत अपमानजनक दृश्य के प्रत्यक्षदर्शी बर्नियर ने अपने संस्मरण में लिखा : “विशाल भीड़ एकत्र थी, सर्वत्र मैंने लोगों को रोते-बिलखते तथा दारा के दुर्भाग्य पर खुले तौर पर शोक प्रकट करते हुए देखा।” दारा का पुत्र सुलेमान शिकोह गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्र में स्थानीय हिंदू राजा पृथ्वीपति शाह के संरक्षण में कुछ समय तक छिपा रहा, परंतु औरंगजेब के निरंतर राजनीतिक दबाव में आकर उस राजा ने 27 दिसंबर 1660 ई. को उसे धोखे से शत्रुओं के हवाले कर दिया। अंततः मई 1662 ई. में सुलेमान शिकोह को भी क्रूरतापूर्वक मृत्युदंड दे दिया गया।

मुरादबख्श का अंत (4 दिसंबर 1661 ई.)

जनवरी 1661 ई. में मुरादबख्श को ग्वालियर के सुदृढ़ किले में स्थानांतरित करके कैद कर दिया गया। लगभग तीन वर्षों तक कारावास में रहने के पश्चात 4 दिसंबर 1661 ई. को उस पर पूर्व में अहमदाबाद में हुई अपने ही दीवान अलीनकी की हत्या का विधिवत मुकदमा चलाया गया, और इस मुकदमे के आधार पर उसे फाँसी की सजा देकर मार डाला गया। इस प्रकार औरंगजेब ने एक सुनियोजित कानूनी मुकदमे की आड़ में अपने ही भाई को स्थायी रूप से समाप्त कर दिया। किंतु औरंगजेब ने दाराशिकोह के कनिष्ठ पुत्र सिपिह शिकोह और मुरादबख्श के पुत्र इज्जत बख्श को भविष्य में कोई राजनीतिक खतरा न मानते हुए उन्हें जीवनदान प्रदान कर दिया। बाद के वर्षों में इन दोनों राजकुमारों का विवाह औरंगजेब की अपनी ही पुत्रियों के साथ संपन्न करा दिया गया, जिससे संभावित भावी विरोध की आशंका भी समाप्त हो गई।

औरंगजेब का द्वितीय राज्याभिषेक और उपाधि-धारण (5 जून 1659 ई.)

खजवा और देवराई की निर्णायक विजयों के पश्चात औरंगजेब ने 5 जून 1659 ई. को दिल्ली में अपना दूसरा तथा पूर्ण एवं औपचारिक राज्याभिषेक संपन्न किया। इस भव्य अवसर पर उसने “आलमगीर पादशाह गाजी” की गौरवशाली उपाधि धारण की, जिसका शाब्दिक अर्थ है “विश्वविजेता योद्धा बादशाह।” यह अभिषेक-समारोह शाही महल में विधिवत कुरान पाठ, तोपों की गगनभेदी सलामी तथा भव्य दरबारी उत्सवों के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर फारस के शाह अब्बास द्वितीय ने भी अपना मैत्रीपूर्ण दूत भेजा, जो मुगल वैभव तथा औरंगजेब की नवीन सत्ता को प्राप्त अंतरराष्ट्रीय मान्यता का प्रतीक बना।

शाहजहाँ का बंदी जीवन और अंत (22 जनवरी 1666 ई.)

औरंगजेब के पूर्ण रूप से सत्तारूढ़ होने के बाद शाहजहाँ को आगरा के उसी भव्य किले में लगभग आठ वर्षों तक अत्यंत कष्टप्रद बंदी जीवन व्यतीत करना पड़ा। इस दुखद और एकाकी काल में उसका एकमात्र सच्चा सहारा उसकी ज्येष्ठ तथा सर्वाधिक प्रिय पुत्री जहाँआरा रही, जिसने स्वेच्छा से समस्त राजसी सुख-सुविधाओं का त्याग करके अपने वृद्ध पिता के साथ इस बंदी जीवन को साझा किया। 22 जनवरी 1666 ई. को लगभग 74 वर्ष की आयु में शाहजहाँ ने आगरा के किले में ही अंतिम साँस ली। उसके पार्थिव शरीर को ताजमहल में उसकी प्रिय बेगम मुमताज महल की कब्र के ठीक बगल में सम्मानपूर्वक दफनाया गया—वही ताजमहल, जिसे स्वयं उसने अपनी बेगम की अमर प्रेमपूर्ण स्मृति में बनवाया था।

उत्तराधिकार युद्ध और धार्मिक मामले: एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण

शाहजहाँ के पुत्रों के बीच हुए इस उत्तराधिकार युद्ध को अनेक इतिहासकारों ने धार्मिक दृष्टिकोण से भी व्याख्यायित करने का प्रयास किया है, और इस संबंध में इतिहासकारों में मुख्यतः तीन प्रमुख विचारधाराएँ प्रचलित रही हैं।

पहला मत यह है कि यह युद्ध वस्तुतः धार्मिक सहिष्णुता और मुस्लिम धर्मांधता के बीच का एक वैचारिक संघर्ष था। स्टैनली लेनपूल जैसे कुछ पाश्चात्य इतिहासकारों के अनुसार यदि दारा विजयी होता तो वह एक ‘लघु अकबर’ सिद्ध होता, जबकि औरंगजेब की विजय को धार्मिक रूढ़िवादिता की जीत के रूप में देखा गया। किंतु अधिकांश आधुनिक और गंभीर इतिहासकार इस अत्यंत सरलीकृत मत को पूर्णतः स्वीकार नहीं करते।

दूसरा मत यह मानता है कि यह युद्ध मुख्यतः दो समुदायों-हिंदुओं और मुसलमानों के बीच का धार्मिक संघर्ष था। शिबली नोमानी, एम. फारूकी और आई.एच. कुरैशी जैसे इतिहासकार इसी विचारधारा के समर्थक रहे हैं; वे दारा को इस्लाम धर्म का ‘गद्दार’ और औरंगजेब को मुसलमानों का सच्चा ‘रक्षक’ मानते हैं। पाकिस्तानी इतिहासकार इफ्तिखार खान घोरी ने तो इसे शिया और सुन्नी संप्रदायों के बीच का संघर्ष तक बता दिया है।

तीसरा और सर्वाधिक तथ्यसंगत तथा विद्वानों द्वारा व्यापक रूप से स्वीकृत मत यह है कि धर्म इस संपूर्ण संघर्ष में केवल एक सुविधाजनक राजनीतिक हथियार मात्र था, जबकि वास्तविक और एकमात्र उद्देश्य मुगल राजसिंहासन प्राप्त करना ही था। इस मत के समर्थन में अनेक ठोस ऐतिहासिक तथ्य उपस्थित हैं। स्वयं औरंगजेब ने मेवाड़ के राणा राजसिंह प्रथम को जो ‘निशान’ (आज्ञापत्र) भेजा था, उसमें स्पष्ट रूप से लिखा था: “विभिन्न समुदायों और धर्मों के व्यक्तियों को शांति से तथा समृद्धि में जीवन-यापन करना चाहिए।” इससे यह स्पष्ट होता है कि उत्तराधिकार युद्ध के उस काल में भी औरंगजेब की व्यावहारिक धार्मिक नीति में कट्टरता का उतना स्पष्ट अभाव था, जितना उसके बाद के शासन-काल में देखने को मिलता है।

दरबारी अमीरों में भी धार्मिक आधार पर कोई स्पष्ट विभाजन दिखाई नहीं देता। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार लगभग 23 हिंदू उमरा औरंगजेब और मुराद के पक्ष में सक्रिय थे, जबकि लगभग 24 हिंदू उमरा दाराशिकोह के पक्ष में लड़े। इसी प्रकार मीरजुमला तथा शाइस्ता खाँ, जो मूलतः ईरानी शिया मुसलमान थे तथा मुमताज महल के सगे भाई भी थे, औरंगजेब के पक्ष में सम्मिलित हुए, जबकि शाह नवाज खाँ सफवी, जो स्वयं भी शिया मुसलमान था, दारा के पक्ष में डटा रहा। इससे यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि यह युद्ध न तो शुद्ध रूप से हिंदू-मुस्लिम संघर्ष था और न ही शिया-सुन्नी संघर्ष। औरंगजेब ने अपनी सूझबूझ से बड़ी संख्या में शक्तिशाली राजपूत राजाओं को भी अपनी ओर मिला लिया था। उसने जसवंत सिंह को मारवाड़ का वैध शासक मान्यता प्रदान की और आगे चलकर गुजरात का सूबेदार भी नियुक्त किया, मिर्जा राजा जयसिंह को दक्षिण भारत का महत्त्वपूर्ण सूबेदार बनाया तथा राजा रघुनाथराव को साम्राज्य का दीवान नियुक्त किया।

सच तो यह है कि उस ‘अहदनामे’ में दारा को धूर्ततापूर्वक ‘अपधर्मी’ कहना केवल कट्टर सुन्नी मुरादबख्श तथा उसके धार्मिक समर्थकों का व्यावहारिक समर्थन प्राप्त करने की एक सुनियोजित कूटनीतिक चाल मात्र थी। औरंगजेब की सर्वोच्च तथा एकमात्र वास्तविक महत्त्वाकांक्षा प्रारंभ से ही मुगल राजसिंहासन प्राप्त करना था। जैसा कि ‘आलमगीरनामा’ के लेखक मुहम्मद काजिम स्वयं भी स्पष्ट रूप से बताते हैं, दारा पर लगाया गया ‘विधर्मी’ का यह गंभीर आरोप वस्तुतः उसे कानूनी रूप से मृत्युदंड देने के लिए गढ़ा गया एक सुविधाजनक बहाना मात्र था।

उत्तराधिकार युद्ध का ऐतिहासिक महत्त्व

यह उत्तराधिकार युद्ध मुगल इतिहास का एक ऐसा निर्णायक जलविभाजक सिद्ध हुआ, जिसने संपूर्ण साम्राज्य की भावी दिशा को सदा के लिए बदल दिया। यदि दाराशिकोह इस संघर्ष में विजयी होता, तो संभवतः मुगल साम्राज्य का मार्ग अकबर की सर्वधर्म-समभाव तथा उदार सांस्कृतिक समन्वय की नीति पर ही आगे बढ़ता रहता। किंतु औरंगजेब की अंतिम विजय ने भारतीय इतिहास के लिए एक सर्वथा भिन्न और अंततः अधिक कठोर दिशा खोल दी।

व्यक्तित्व की कसौटी पर परखने पर दाराशिकोह और औरंगजेब में स्पष्ट तथा मूलभूत वैचारिक विरोध दिखाई देता है। दाराशिकोह में गहरी बौद्धिक जिज्ञासा, धार्मिक उदारता तथा अकबर जैसी सर्वधर्म-प्रेमी भावना विद्यमान थी, जबकि औरंगजेब में कठोर अनुशासन, अदम्य साहस, तीव्र कूटनीतिक बुद्धि तथा शासनकाल के साथ-साथ क्रमशः बढ़ता हुआ धार्मिक रूढ़िवाद स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। दोनों भाइयों की परस्पर भिन्न जीवन-दृष्टि तथा शासन-पद्धति के आधार पर यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि यह युद्ध वस्तुतः दो सर्वथा भिन्न संभावित भारतीय भविष्यों के बीच का एक निर्णायक चुनाव था। औरंगजेब ने आगे चलकर लगभग 49 वर्षों (1658-1707 ई.) का दीर्घकालीन शासन किया और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न स्थितियाँ-साम्राज्य का क्रमिक विखंडन, दक्कन के लंबे युद्धों में साम्राज्य की आर्थिक शक्ति का क्षरण, राजपूत तथा विशेषकर मराठा शक्तियों का सुदृढ़ उत्थान और अंततः अठारहवीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य का क्रमिक पतन इसी 1657-1659 ई. के रक्तरंजित उत्तराधिकार युद्ध की सबसे दूरगामी और महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत मानी जाती है।

शाहजहाँ के पुत्रों के बीच उत्तराधिकार युद्ध से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

प्रश्न 1: शाहजहाँ के पुत्रों के बीच उत्तराधिकार युद्ध क्यों हुआ?

सितंबर 1657 ई. में शाहजहाँ के गंभीर रूप से बीमार पड़ने के बाद उसके चारों पुत्रों-दाराशिकोह, शाहशुजा, औरंगजेब और मुरादबख्श ने मुगल सिंहासन पर अपना-अपना दावा प्रस्तुत किया। मुगल राजतंत्र में उत्तराधिकार के कोई निश्चित तथा वैधानिक नियम न होने के कारण,और चारों भाइयों के पास अपनी-अपनी सुसंगठित सेनाएँ तथा प्रांतीय संसाधन उपलब्ध होने के कारण यह संघर्ष अत्यंत तीव्र और रक्तरंजित हो गया।

प्रश्न 2: उत्तराधिकार युद्ध में प्रमुख दावेदार कौन-कौन थे?

दाराशिकोह शाहजहाँ का ज्येष्ठ तथा सर्वाधिक प्रिय पुत्र था और सम्राट ने अनौपचारिक रूप से उसे ही अपना उत्तराधिकारी माना था। शाहशुजा बंगाल का, औरंगजेब दक्कन (दक्षिण भारत) का तथा मुरादबख्श मालवा और गुजरात का सूबेदार था। इन चारों ने ही सिंहासन प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनी-अपनी सेनाओं को संगठित किया और मैदान में उतरे।

प्रश्न 3: उत्तराधिकार युद्ध की प्रमुख लड़ाइयाँ कौन-सी थीं?

इस संघर्ष की प्रमुख लड़ाइयों में बहादुरपुर का युद्ध (24 फरवरी 1658 ई.), धरमत का युद्ध (15 अप्रैल 1658 ई.), सामूगढ़ का युद्ध (29 मई 1658 ई.), खजवा का युद्ध (5-6 जनवरी 1659 ई.) तथा देवराई की घाटी का युद्ध (मार्च 1659 ई.) सम्मिलित थे। इनमें सामूगढ़ का युद्ध सर्वाधिक निर्णायक सिद्ध हुआ, जिसमें औरंगजेब ने दाराशिकोह को पूर्णतः पराजित करके व्यावहारिक रूप से सत्ता का निर्णय कर दिया।

प्रश्न 4: औरंगजेब ने उत्तराधिकार युद्ध में विजय कैसे प्राप्त की?

औरंगजेब ने अपने असाधारण सैन्य कौशल, रणनीतिक चतुराई और बेजोड़ राजनीतिक कूटनीति का अत्यंत प्रभावी उपयोग किया। उसने प्रारंभ में सुविधा की दृष्टि से मुरादबख्श के साथ ‘अहदनामा’ नामक गठबंधन किया, धरमत तथा सामूगढ़ में निर्णायक विजय प्राप्त की, इसके बाद खजवा में शाहशुजा को तथा देवराई में पुनः दारा को पराजित किया और अंततः धोखे से अपने ही सहयोगी मुराद को भी बंदी बना लिया। इस प्रकार उसने अपने तीनों प्रतिद्वंद्वी भाइयों को क्रमशः एक-एक करके पूर्णतः समाप्त कर दिया।

प्रश्न 5: शाहजहाँ के पुत्रों के उत्तराधिकार युद्ध के क्या अंतिम परिणाम हुए?

अंततः औरंगजेब इस संपूर्ण संघर्ष में विजयी हुआ और उसने 1658 ई. में पहला तथा 1659 ई. में पूर्ण एवं औपचारिक राज्याभिषेक संपन्न करके ‘आलमगीर’ की गौरवशाली उपाधि धारण की। शाहजहाँ को आगरा के किले में आठ वर्षों तक नजरबंद रखा गया, जहाँ 1666 ई. में उसकी मृत्यु हुई। दाराशिकोह को 1659 ई. में तथा मुरादबख्श को 1661 ई. में मृत्युदंड दिया गया, जबकि शाहशुजा पराजित होकर अराकान (म्यांमार) भाग गया, जहाँ उसकी और उसके परिवार की हत्या कर दी गई। इस दीर्घकालीन युद्ध के पश्चात संपूर्ण मुगल साम्राज्य की सत्ता अंततः औरंगजेब के हाथों में पूर्ण रूप से केंद्रित हो गई।
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