फ्रांस का उत्थान: एक दीर्घकालिक ऐतिहासिक प्रक्रिया
फ्रांस के उत्थान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
फ्रांस का उत्थान इतिहास की उन विरल प्रक्रियाओं में से एक है, जो किसी एक घटना या किसी एक शासक के प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि शताब्दियों की राजनीतिक संघर्षशीलता, सांस्कृतिक परिपक्वता और संस्थागत विकास की दीर्घकालिक यात्रा का सुफल है। यह प्रक्रिया रोमन साम्राज्य के पतन (476 ई.) के पश्चात् पश्चिमी यूरोप में उत्पन्न शून्य को भरने वाले फ्रैंकी जनजातीय संघों के राजनीतिक उभार से आरंभ होती है और अठारहवीं शताब्दी के अंत में फ्रांसीसी क्रांति (1789 ई.) के महाविस्फोट तक निरंतर विकसित होती रहती है। इस सुदीर्घ ऐतिहासिक काल में फ्रांस ने अनेक राजवंशीय उतार-चढ़ाव, धार्मिक संकट, विदेशी आक्रमण, आंतरिक गृहयुद्ध और प्रशासनिक क्रांतियाँ देखीं। इन सभी अनुभवों ने मिलकर फ्रांस को न केवल यूरोप की सर्वोच्च राजनीतिक और सैन्य शक्ति बनाया, बल्कि उसे सांस्कृतिक एवं बौद्धिक नेतृत्व का केंद्र भी बना दिया।
किंतु फ्रांस के भूगोल ने इस उत्थान में एक मौन लेकिन निर्णायक भूमिका निभाई। पश्चिम में अटलांटिक महासागर, दक्षिण में भूमध्य सागर और पिरेनीज पर्वत, पूर्व में आल्प्स और राइन नदी तथा उत्तर में इंग्लिश चैनल- इन प्राकृतिक सीमाओं ने फ्रांस को एक ऐसे भूखंड पर आबाद किया जहाँ सांस्कृतिक एकरूपता और राजनीतिक एकीकरण की संभावनाएं उर्वर थीं। उपजाऊ भूमि, बड़ी नदियाँ और समशीतोष्ण जलवायु ने एक विशाल और समृद्ध जनसंख्या को पोषित किया, जो किसी महान राज्य के निर्माण के लिए आवश्यक मानवीय और भौतिक संसाधन उपलब्ध कराती थी।
मेरोविंजियन राजवंश और फ्रैंकी राज्य की नींव (481–751 ई.)
क्लोविस प्रथम और फ्रैंकों का एकीकरण
पाँचवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब रोमन साम्राज्य का पश्चिमी भाग विभिन्न जर्मनिक जनजातियों के दबाव में विघटित हो रहा था, तब क्लोविस प्रथम (शासनकाल 481–511 ई.) ने बिखरी हुई फ्रैंकी जनजातियों को एक शक्तिशाली राजनीतिक इकाई में संगठित किया। वह मेरोविंजियन राजवंश का संस्थापक और उसका सर्वाधिक प्रभावशाली शासक था। क्लोविस ने 486 ई. में रोमन सेनापति सियाग्रियस को सुआसों के युद्ध में पराजित कर गॉल के उत्तरी भाग पर अधिकार जमाया। इसके बाद उसने 496 ई. में अलामन्नी जनजाति को टॉलबियाक के युद्ध में पराजित किया। इतिहासकारों के अनुसार इसी युद्ध की विकट परिस्थितियों में क्लोविस ने ईसाई धर्म की कैथोलिक शाखा अपनाने की प्रतिज्ञा की थी, जिसे उसने बाद में पूरा किया।
धर्मांतरण का ऐतिहासिक महत्त्व
496 ई. (कुछ इतिहासकारों के अनुसार 498 या 508 ई.) में क्लोविस द्वारा कैथोलिक ईसाई धर्म स्वीकार किया जाना महज एक व्यक्तिगत आस्था का परिवर्तन नहीं, बल्कि एक सुचिंतित राजनीतिक निर्णय था। रैम्स के बिशप रेमिगियस ने रैम्स के गिरजाघर में क्लोविस को बपतिस्मा दिया, जो आगे चलकर फ्रांसीसी राजाओं के राज्याभिषेक की पवित्र परंपरा बन गई। इस धर्मांतरण के तीन सुनिश्चित राजनीतिक लाभ हुए। प्रथम, रोमन कैथोलिक चर्च, जो पश्चिमी यूरोप में सर्वाधिक संगठित और प्रभावशाली संस्था थी, का समर्थन क्लोविस को प्राप्त हो गया। द्वितीय, गॉल की बड़ी गैलो-रोमन जनसंख्या, जो रोमन संस्कृति और कैथोलिक धर्म से जुड़ी थी, ने फ्रैंकी शासन को वैधता देना स्वीकार कर लिया। तृतीय, क्लोविस अपने जर्मनिक प्रतिद्वंद्वियों- वेस्टगोथ, बर्गंडियन, और अन्य से धार्मिक आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध कर सका, क्योंकि वे अधिकांशतः एरियन ईसाई या पगान थे। इस प्रकार धर्मांतरण ने क्लोविस को एक साधारण जनजातीय प्रमुख से “ईश्वर का प्रिय राजा” (Rex Christianissimus) के पद पर आसीन कर दिया।
सैलिक कानून और विधिक परंपरा की स्थापना
क्लोविस ने सैलिक कानून को संहिताबद्ध करवाया। यह लिखित कानून-संग्रह फ्रैंकी परंपरागत नियमों को व्यवस्थित रूप देने का प्रयास था। इस संहिता में संपत्ति उत्तराधिकार, हत्या के लिए रक्त-मूल्य, चोरी और अन्य अपराधों के लिए दंड निर्धारित किए गए थे। सैलिक कानून की एक महत्त्वपूर्ण धारा यह थी कि भूमि का उत्तराधिकार केवल पुरुष वंशजों को मिलेगा और यह प्रावधान सदियों बाद फ्रांसीसी सिंहासन उत्तराधिकार के विवादों में निर्णायक भूमिका निभाने वाला था।
मेरोविंजियन वंश का क्रमिक पतन
क्लोविस के बाद उसके उत्तराधिकारियों ने फ्रैंकी राज्य को बार-बार विभाजित किया। इस प्रथा को “जर्मनिक उत्तराधिकार” कहा जाता है, जिसके अनुसार राज्य पुत्रों के बीच बराबर बाँटा जाता था। इस विभाजन ने ऑस्त्रेसिया (पूर्व), न्यूस्त्रिया (पश्चिम), बर्गंडी और अकिटेन जैसे उप-राज्यों को जन्म दिया। धीरे-धीरे मेरोविंजियन शासक निर्बल होते गए और वास्तविक सत्ता “मेयर ऑफ द पैलेस” (राजमहल के प्रधान प्रशासक) के हाथों में केंद्रित होती गई। इन्हें इतिहास में “निष्क्रिय राजा” (कुछ न करने वाले राजा) कहा गया है। राजा केवल नाममात्र का प्रमुख रह गया, जबकि मेयर ऑफ द पैलेस वास्तविक शासक बन बैठा।
शार्ल मार्तेल और इस्लामी विस्तार का प्रतिरोध
इन्हीं मेयर ऑफ द पैलेस में सबसे महत्त्वपूर्ण था शार्ल मार्तेल (लगभग 718–741 ई.)। उसने 732 ई. में तूर एवं पॉटियर्स के ऐतिहासिक युद्ध में उमय्यद खलीफत की मुस्लिम सेनाओं को निर्णायक रूप से पराजित किया। इस विजय को इतिहासकार यूरोप में ईसाई सभ्यता का रक्षक मानते हैं। एडवर्ड गिबन जैसे इतिहासकारों ने लिखा है कि यदि तूर का युद्ध अन्यथा समाप्त होता, तो इस्लाम राइन नदी पार कर पूरे यूरोप में फैल सकता था। इस विजय ने शार्ल मार्तेल को अपार राजनीतिक प्रतिष्ठा दी और मेरोविंजियन राजाओं की तुलना में वह कहीं अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। उसने रोमन कैथोलिक चर्च के साथ सहयोगी संबंध विकसित किए, जो आगे चलकर कैरोलिंजियन साम्राज्य की नींव का आधार बनी।
कैरोलिंजियन राजवंश और शार्लमेन का साम्राज्य (751–843 ई.)
पेपिन तृतीय और वंश-परिवर्तन
शार्ल मार्तेल का पुत्र पेपिन तृतीय (जिसे पेपिन द शॉर्ट भी कहा जाता है) ने 751 ई. में एक साहसिक राजनीतिक कदम उठाया। उसने पोप ज़ेकरियास की धार्मिक स्वीकृति प्राप्त कर अंतिम मेरोविंजियन राजा चाइल्डरिक तृतीय को पद से हटाकर मठ में भेज दिया और स्वयं को फ्रैंकों का राजा घोषित किया। इस घटना ने कैरोलिंजियन राजवंश की स्थापना की। पोप की धार्मिक स्वीकृति और बाद में 754 ई. में पोप स्टीफन द्वितीय द्वारा पेपिन का पुनः अभिषेक एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण परंपरा का सूत्रपात था। इसने स्थापित किया कि पोप की धार्मिक मान्यता किसी राजा की राजनीतिक वैधता के लिए आवश्यक है। बदले में पेपिन ने लोम्बार्डों के विरुद्ध पोप की रक्षा की और मध्य इटली का क्षेत्र पोप को दान दिया। यही “पेपिन का दान” था, जो पोप की अस्थायी सत्ता की नींव बना।
शार्लमेन का साम्राज्य-विस्तार और पुनर्जागरण
पेपिन का पुत्र शार्लमेन (768–814 ई.) यूरोपीय इतिहास का सबसे महान शासकों में से एक था। उसने लगभग चार दशकों के निरंतर युद्धों और कूटनीतिक प्रयासों से एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया, जिसमें आधुनिक फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, उत्तरी इटली और उत्तरी स्पेन का बड़ा भाग सम्मिलित था। उसने सैक्सन जनजातियों को 30 वर्षों के युद्ध के बाद ईसाई धर्म स्वीकार करने पर विवश किया, अवार्स और बवेरिया को जीता तथा स्पेन में मुस्लिम सत्ता के विरुद्ध अभियान चलाया।
25 दिसंबर 800 ई. को जब पोप लियो तृतीय ने रोम के सेंट पीटर गिरजाघर में शार्लमेन को “पवित्र रोमन सम्राट” (होली रोमन एम्परर) का मुकुट पहनाया, तो यह घटना पश्चिमी यूरोप में रोमन साम्राज्य की प्रतीकात्मक पुनर्स्थापना थी। शार्लमेन ने अपने साम्राज्य में एकीकृत कानून-व्यवस्था “मिसी डॉमिनिसी” (राजकीय निरीक्षक) जैसी प्रशासनिक संस्थाएँ, लैटिन लेखन और शिक्षा को पुनर्जीवित करने का प्रयास और “कैरोलिंजियन पुनर्जागरण” के नाम से ज्ञात सांस्कृतिक आंदोलन को प्रोत्साहन दिया। उसके दरबार में आलकुइन जैसे विद्वान को आमंत्रित किया गया, जिसने पाठशालाओं की स्थापना और शास्त्रीय ग्रंथों के संरक्षण में अतुलनीय योगदान दिया।
वर्दुन की संधि और फ्रांस का पूर्वगामी राज्य
814 ई. में शार्लमेन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र लुई द पायस गद्दी पर बैठा, परंतु उसके तीन पुत्रों- लोथायर, लुई द जर्मन और चार्ल्स द बाल्ड में उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष हो गया। इस संघर्ष का समाधान 843 ई. की वर्दुन की संधि के माध्यम से हुआ, जिसने साम्राज्य को तीन भागों में विभाजित कर दिया। पश्चिमी फ्रैंकी राज्य चार्ल्स द बाल्ड को मिला, जो आगे चलकर आधुनिक फ्रांस का पूर्वगामी बना। मध्यवर्ती भाग लोथायर को और पूर्वी भाग लुई द जर्मन को प्राप्त हुआ, जो आधुनिक जर्मनी का पूर्वगामी बना। इस प्रकार वर्दुन की संधि ने यूरोप के दो महान राष्ट्रों- फ्रांस और जर्मनी की ऐतिहासिक नींव रखी।
नवम शताब्दी के उत्तरार्ध में नॉर्सेमन (वाइकिंग) के आक्रमणों ने कैरोलिंजियन शक्ति को और कमजोर किया। 911 ई. में फ्रांसीसी राजा चार्ल्स द सिंपल ने वाइकिंग नेता रोल्लो को नॉर्मंडी का क्षेत्र देकर उनसे शांति संधि की। यह नॉर्मंडी डची आगे चलकर फ्रांसीसी इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली थी।
कैपेटियन राजवंश और सत्ता का केंद्रीकरण (987–1328 ई.)
ह्यूगो कैपे और नए राजवंश की स्थापना
987 ई. में कैरोलिंजियन वंश की प्रत्यक्ष शाखा के समाप्त होने पर फ्रांसीसी सामंतों ने पेरिस के काउंट ह्यूगो कैपे को अपना राजा चुना। इस प्रकार कैपेटियन राजवंश की स्थापना हुई, जो 1328 ई. तक अटूट पुरुष वंशक्रम में शासन करने वाला यूरोप का एकमात्र राजवंश था। यह अपने आप में एक असाधारण ऐतिहासिक घटना थी। आरंभिक कैपेटियन राजाओं की वास्तविक सत्ता अत्यंत सीमित थी। ह्यूगो कैपे का प्रत्यक्ष नियंत्रण केवल इल-द-फ्रांस के छोटे से क्षेत्र पर था। नॉर्मंडी के ड्यूक, अकिटेन के ड्यूक, शैंपेन के काउंट और फ्लैंडर्स के काउंट जैसे शक्तिशाली सामंत अपने-अपने क्षेत्रों में व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र शासक थे।
प्रारंभिक कैपेटियन नीति की सफलता
परंतु कैपेटियन राजाओं ने एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक कौशल प्रदर्शित किया। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही अपने ज्येष्ठ पुत्र को सह-राजा घोषित करने की परंपरा अपनाई, जिससे उत्तराधिकार विवाद समाप्त हो गए और राजवंश की निरंतरता सुनिश्चित हुई। इसके साथ ही उन्होंने चर्च के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे और अपनी राजकीय डोमेन का क्रमशः विस्तार किया।
फिलिप द्वितीय ऑगस्तस : राजकीय शक्ति का नया युग
फिलिप द्वितीय ऑगस्तस (1180–1223 ई.) ने कैपेटियन राजशाही को एक नई ऊर्जा प्रदान की। उसने इंग्लैंड के प्लांटाजेनेट राजाओं से, विशेषतः राजा जॉन (जिसे “लैकलैंड” कहा जाता था) से फ्रांस में स्थित उनके विशाल सामंती क्षेत्रों को छीनने की योजनाबद्ध नीति अपनाई। 1204 ई. में उसने नॉर्मंडी, मेन, अंजु और तुरेन पर अधिकार कर लिया। 1214 ई. में बुविन के युद्ध में उसने इंग्लैंड के राजा जॉन और पवित्र रोमन सम्राट ओटो IV की संयुक्त सेना को निर्णायक पराजय दी। इस विजय ने फ्रांसीसी राजकीय डोमेन को तीन गुना कर दिया और कैपेटियन सत्ता को अभूतपूर्व शक्ति प्रदान की। फिलिप ने प्रशासन को भी सुव्यवस्थित किया। उसने “बैली” और “सेनेशाल” नामक राजकीय अधिकारी प्रांतों में नियुक्त किए, जो केंद्रीय सरकार के प्रति उत्तरदायी थे।
लुई नवम (सेंट लुई) : न्याय और शासन का आदर्श
लुई नवम (1226–1270 ई.) को फ्रांसीसी इतिहास के सर्वाधिक सम्मानित शासकों में गिना जाता है। उसने न्याय-व्यवस्था में मौलिक सुधार किया और “पार्लेमां ऑफ पेरिस” को एक स्थायी न्यायिक संस्था के रूप में स्थापित किया, जो राजकीय न्याय का सर्वोच्च केंद्र बनी। उसने युद्ध के समाधान के रूप में “द्वंद्वयुद्ध” की बर्बर प्रथा को हतोत्साहित किया और तथ्य एवं साक्ष्य पर आधारित न्यायिक प्रक्रिया को प्रोत्साहन दिया। उसने यह भी घोषित किया कि सभी नागरिक राजा के दरबार में न्याय की माँग कर सकते हैं। इस प्रकार उसने सामंती न्याय के समक्ष एक प्रभावी विकल्प खड़ा किया। लुई नवम ने सातवें (1248 ई.) और आठवें (1270 ई.) धर्मयुद्ध का नेतृत्व भी किया। आठवें धर्मयुद्ध के दौरान ट्यूनिस में उसकी मृत्यु हो गई। 1297 ई. में पोप बोनिफेस VIII ने उसे संत घोषित किया।
फिलिप चतुर्थ (फिलिप द फेयर) और आधुनिक राज्य की अवधारणा
फिलिप चतुर्थ (1285–1314 ई.) को “फिलिप द फेयर” कहा जाता था। उसने फ्रांसीसी राज्य को एक नई दिशा दी और प्रशिक्षित कानूनविदों की एक कुशल नौकरशाही विकसित की जो सामंतों पर नहीं, बल्कि राजा पर निर्भर थी। 1302 ई. में उसने पहली बार “एस्टेट्स जनरल” का आयोजन किया, जो तीन वर्गों- पादरी, कुलीन और सामान्य जन का प्रतिनिधि सम्मेलन था। यद्यपि यह संस्था इंग्लैंड की संसद जितनी शक्तिशाली नहीं थी, फिर भी इसने राजतंत्र और प्रजा के बीच एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक संवाद का सूत्रपात किया। फिलिप ने पोप बोनिफेस VIII के साथ कड़ा संघर्ष किया। उसने 1303 ई. में पोप को अनाग्नी में अपमानित करवाया, जिससे पोप कुछ समय बाद मर गए। इसके बाद 1309 से 1377 ई. तक पोप का निवास एविग्नों (फ्रांस) में रहा, जो “एविग्नोन की कैद” के नाम से जाना जाता है। फिलिप ने 1307 ई. में टेम्पलर शूरवीरों को कुचलकर उनकी विशाल संपत्ति जब्त की, जो राजकीय शक्ति का एक साहसिक प्रदर्शन था। इस प्रकार कैपेटियन काल में फ्रांसीसी राज्य भौगोलिक, प्रशासनिक और न्यायिक दृष्टि से एक सुदृढ़ संस्था के रूप में स्थापित हुआ।
सौ वर्षीय युद्ध और राष्ट्रीय चेतना का उदय (1337–1453 ई.)
युद्ध के कारण और वालोआ राजवंश की स्थापना
1328 ई. में कैपेटियन वंश की प्रत्यक्ष पुरुष शाखा का अंत हो गया। फ्रांसीसी सामंतों ने सैलिक कानून का हवाला देते हुए फिलिप VI (वालोआ वंश) को फ्रांस का राजा चुना, परंतु इंग्लैंड के राजा एडवर्ड III ने अपनी माँ, जो फिलिप IV की पुत्री थीं, के माध्यम से फ्रांसीसी सिंहासन पर अपना दावा प्रस्तुत किया। इसके साथ ही फ्लैंडर्स के व्यापारिक हित, गास्कनी की सामंती समस्याएँ और स्कॉटलैंड पर प्रतिस्पर्धी दावे भी दोनों देशों के बीच तनाव के कारण बने। इन सभी कारणों का संयुक्त परिणाम हुआ- सौ वर्षीय युद्ध (1337–1453 ई.), जो वास्तव में 116 वर्षों में लड़े गए विभिन्न संघर्षों की श्रृंखला थी।
प्रमुख युद्ध और फ्रांस की कठिनाइयाँ
युद्ध के आरंभिक चरणों में फ्रांस को गंभीर झटके लगे। 1346 ई. में क्रेसी के युद्ध में इंग्लैंड की लंबे धनुष वाली सेना ने फ्रांसीसी घुड़सवार सेना को धूल चटाई। 1356 ई. में पॉटियर्स के युद्ध में फ्रांस के राजा जॉन द गुड को बंदी बना लिया गया। 1360 ई. की ब्रेटिग्नी की संधि से फ्रांस को भारी क्षेत्रीय हानि उठानी पड़ी। 1415 ई. में अजैंकोर्ट के युद्ध में हेनरी V ने फ्रांसीसी सेना को पुनः पराजित किया। 1420 ई. की ट्रॉयस की संधि ने तो यहाँ तक निर्धारित किया कि हेनरी V फ्रांस का उत्तराधिकारी होगा, जो फ्रांसीसी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए यह सबसे गहरी पराजय थी। इसी काल में 1347–1351 ई. के बीच यूरोप में फैले ब्लैक डेथ (प्लेग महामारी) ने फ्रांस की एक-तिहाई से अधिक जनसंख्या का विनाश किया, जिसने युद्ध की पीड़ा को और भी असह्य बना दिया।
जॉन ऑफ आर्क और राष्ट्रीय भावना का उत्थान
पंद्रहवीं शताब्दी के तीसरे दशक में फ्रांस के लिए एक अभूतपूर्व घटना हुई। एक ग्रामीण बालिका जेन डी आर्क (जॉन ऑफ आर्क), जो ईश्वरीय दर्शन और आदेशों का अनुभव करने का दावा करती थी, ने फ्रांसीसी राष्ट्रीय पुनरुत्थान का नेतृत्व किया। 1429 ई. में उसने अपनी अदम्य साहसिकता और असाधारण सैन्य नेतृत्व से ऑरलियाँ की घेराबंदी तोड़ी और फ्रांसीसी सेना को नई ऊर्जा प्रदान की। इसके तुरंत बाद उसने युवराज चार्ल्स को रैम्स में फ्रांस के राजा चार्ल्स VII के रूप में राज्याभिषेक करवाया, जो फ्रांसीसी राजसत्ता की पारंपरिक वैधता की पुनर्स्थापना थी। 1430 ई. में बर्गंडियन सैनिकों ने उसे बंदी बनाकर अंग्रेजों को सौंप दिया और 1431 ई. में रुआं में उसे चर्च के आदेश पर जादू-टोने के आरोप में जीवित जला दिया गया। परंतु उसके बलिदान ने फ्रांसीसी जनमानस में एक ऐसी राष्ट्रीय चेतना का संचार किया जो फ्रांस का अंतिम प्रेरणास्रोत बना। 1455–1456 ई. में पोप कालिस्तस III ने उसके विरुद्ध के निर्णय को रद्द किया और 1920 ई. में पोप बेनेडिक्ट XV ने उसे संत घोषित किया। आज भी जॉन ऑफ आर्क फ्रांस की राष्ट्रीय वीरांगना के रूप में पूजी जाती हैं।

युद्ध की समाप्ति और उसके दीर्घकालिक परिणाम
1435 ई. में बर्गंडी फ्रांस के पक्ष में आ गया, जो युद्ध में निर्णायक मोड़ था। 1453 ई. में कास्टिलोन के युद्ध में फ्रांस की अंतिम निर्णायक विजय से सौ वर्षीय युद्ध समाप्त हुआ। फ्रांस ने कैले को छोड़कर समस्त भूमि वापस प्राप्त की (कैले 1558 ई. तक इंग्लैंड के पास रहा)। इस दीर्घकालिक संघर्ष के तीन स्थायी परिणाम हुए। प्रथम, फ्रांसीसी राष्ट्रीय भावना का उदय हुआ। जो पहले केवल सामंती निष्ठा थी, वह अब “फ्रांस” के प्रति राष्ट्रीय प्रेम में बदल गई। द्वितीय, संगठित और स्थायी राजकीय सेना की आवश्यकता स्पष्ट हुई, जो केवल राजा के प्रति वफादार हो, न कि सामंतों के प्रति। तृतीय, नियमित कराधान-व्यवस्था की स्थापना हुई, जिसने राजकोष को सामंतों की सहायता पर निर्भरता से मुक्त किया। इन तीनों परिणामों ने निरंकुश राजतंत्र की नींव रखी।
निरंकुश राजतंत्र की नींव और पुनर्जागरण (पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी)
लुई ग्यारहवें : “मकड़ी राजा” और आधुनिक राजनीति का अग्रदूत
लुई ग्यारहवें (1461–1483 ई.) को इतिहास में “मकड़ी राजा” (द स्पाइडर किंग) की संज्ञा दी गई, क्योंकि वह शत्रुओं को अपने जाल में फँसाने की कला में निपुण था। उसने अपने पिता चार्ल्स VII की नीतियों से आगे बढ़कर फ्रांस में केंद्रीय राजसत्ता को एक नई ऊँचाई पर ले जाने का कार्य किया। लुई ने कुलीन सामंतों के गठबंधन “लीग ऑफ पब्लिक वेल” का दमन किया। उसने कूटनीति, गुप्तचर प्रणाली, सोने की ताकत और विभाजन की नीति से बड़े-बड़े सामंतों को नियंत्रित किया। शक्तिशाली बर्गंडी के ड्यूक चार्ल्स द बोल्ड को उसने 1477 ई. में नैंसी के युद्ध में मरवाया और बर्गंडी को फ्रांस में मिला लिया। उसने डाक-सेवा की स्थापना की और व्यापार को प्रोत्साहन दिया। उसका शासन-दर्शन यह था कि राजा को अपनी प्रजा का भौतिक कल्याण सुनिश्चित करना चाहिए, चाहे इसके लिए कितनी भी कठोर नीतियाँ अपनानी पड़ें। इतालवी पुनर्जागरण के राजनीतिक दार्शनिक मैकियावेली ने अपनी प्रसिद्ध कृति “द प्रिंस” में लुई XI के तरीकों का उल्लेख किया है।
इतालवी युद्ध और पुनर्जागरण का संपर्क
लुई ग्यारहवें के बाद उसके पुत्र चार्ल्स VIII (1483–1498 ई.) ने 1494 ई. में इटली पर आक्रमण किया। यह फ्रांसीसी इतिहास में एक नई दिशा का आरंभ था। चार्ल्स ने नेपल्स पर अपना दावा प्रस्तुत किया और तेज़ी से दक्षिण इटली तक पहुँच गया। परंतु एक इतालवी गठबंधन (League of Venice, 1495 ई.) ने उसे वापस लौटने पर मजबूर कर दिया। लुई बारहवें (1498–1515 ई.) ने मिलान पर अपना दावा किया और इटली में फ्रांसीसी उपस्थिति बनाए रखी।
इन इतालवी अभियानों का एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक परिणाम यह हुआ कि फ्रांसीसी सैनिक और दरबारी इटली के पुनर्जागरण की कला, वास्तुकला, साहित्य और दर्शन से परिचित हुए और उसे फ्रांस लाए।
फ्रांसिस प्रथम : पुनर्जागरण का शाही संरक्षक
फ्रांसिस प्रथम (1515–1547 ई.) फ्रांसीसी पुनर्जागरण का सबसे उत्साही संरक्षक था। 1515 ई. में उसने मारिग्नानो के युद्ध में मिलान पर विजय प्राप्त की। इटली से लौटते समय वह अपने साथ इतालवी पुनर्जागरण की संस्कृति और कलाकारों को फ्रांस ले आया। उसने विश्व के महानतम प्रतिभाशाली व्यक्ति लियोनार्डो दा विंची को 1516 ई. में फ्रांस आमंत्रित किया, जहाँ दा विंची ने अपने जीवन के अंतिम तीन वर्ष बिताए और 1519 ई. में उसकी मृत्यु हुई। फ्रांसिस ने फॉन्टेनब्लो महल को भव्य रूप से पुनर्निर्मित करवाया, जो फ्रांसीसी पुनर्जागरण वास्तुकला का प्रमुख केंद्र बना। उसने 1539 ई. में विलर्स-कॉट्रेट्स के अध्यादेश जारी किया, जिसने लैटिन के स्थान पर फ्रेंच को कानूनी और प्रशासनिक भाषा घोषित किया। यह आधुनिक फ्रांसीसी भाषा के मानकीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। उसने पेरिस में कॉलेज ऑफ फ्रांस की स्थापना की, जो लैटिन-केंद्रित सोरबोन विश्वविद्यालय के समानांतर ग्रीक, हिब्रू और गणित पढ़ाने का केंद्र बना।
फ्रांसिस प्रथम का यूरोपीय परिदृश्य पर हैब्सबर्ग सम्राट चार्ल्स V के साथ दीर्घकालिक प्रतिद्वंद्विता भी उल्लेखनीय है। 1525 ई. के पाविया के युद्ध में वह स्वयं बंदी हो गए, जो फ्रांस के लिए एक भारी राजनयिक अपमान था। परंतु इस संघर्ष ने फ्रांस को यूरोपीय राजनीति के केंद्र में स्थापित कर दिया। फ्रांसिस के शासनकाल के उत्तरार्ध में प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार आंदोलन ने फ्रांस को अंदर से हिला दिया, जो आने वाले दशकों के लिए गंभीर संकट की भूमिका बनाने लगा।
सोलहवीं शताब्दी : धार्मिक युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता (1559–1589 ई.)
धर्मसुधार आंदोलन और फ्रांस में ह्यूगनॉट समुदाय का उदय
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में जर्मनी में मार्टिन लूथर द्वारा प्रारंभ किया गया प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार शीघ्र ही फ्रांस में भी अपनी लहरें फैलाने लगा। फ्रांस में जाक लेफेवरे द’एटापल जैसे मानवतावादी विद्वानों ने बाइबल के मूल ग्रंथों पर लौटने की बात की और कैथोलिक चर्च की परंपराओं पर प्रश्न उठाए। जेनेवा में जॉन काल्विन ने एक सुव्यवस्थित प्रोटेस्टेंट धर्मशास्त्र विकसित किया, जो फ्रांस में “काल्विनवाद” के रूप में फैल गया। इन फ्रांसीसी प्रोटेस्टेंटों को “ह्यूगनॉट” कहा जाने लगा। इस शब्द की उत्पत्ति विवादित है, परंतु संभवतः यह जर्मन शब्द “ऐडगेनोस्सेन” (शपथ-बद्ध साथी) से निकला है। पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य तक ह्यूगनॉट समुदाय फ्रांस में एक महत्त्वपूर्ण अल्पसंख्यक शक्ति बन चुका था, जो मुख्यतः दक्षिणी और पश्चिमी फ्रांस में केंद्रित था और जिसमें बड़ी संख्या में कुलीन, व्यापारी और बुद्धिजीवी थे।
फ्रांसिस प्रथम ने अपने शासनकाल के उत्तरार्ध में धर्मसुधारकों का कठोर दमन आरंभ किया। 1540 के दशक में हजारों लोगों को जला दिया गया या देशनिकाला दिया गया। 1545 ई. में वॉडोइस समुदाय के गाँवों के विरुद्ध नरसंहार आदेश दिया गया, जिसमें मेरिंडोल और आसपास के 22 गाँव जलाए गए और हजारों निर्दोष लोगों की जानें गईं। इस घटना को “मेरिंडोल नरसंहार” कहा जाता है और यह फ्रांस के इतिहास का एक काला अध्याय है।
हेनरी द्वितीय और धार्मिक दमन की नीति
हेनरी द्वितीय (1547–1559 ई.) ने अपने पिता की धार्मिक असहिष्णुता की नीति जारी रखी और उसे और अधिक संगठित रूप दिया। उसने 1547 ई. में “चेंबर आर्डेंट” (जलती हुई अदालत) नामक विशेष न्यायिक निकाय स्थापित किया, जो विशेष रूप से विधर्मियों के मुकदमे सुनने के लिए था। उसने स्पेनिश इन्क्विजिशन के समान एक फ्रांसीसी इन्क्विजिशन स्थापित करने का प्रयास किया, परंतु पेरिस की पार्लेमां के कड़े विरोध के कारण यह योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। 1559 ई. में हेनरी द्वितीय ने स्पेन के राजा फिलिप द्वितीय के साथ कैटियो-कैम्ब्रेसीस की संधि की, जिसने इतालवी युद्धों को समाप्त किया। परंतु उसी वर्ष एक शाही टूर्नामेंट में हेनरी द्वितीय घायल हो गया और 10 जुलाई 1559 ई. को उसकी मृत्यु हो गई। उसकी असामयिक मृत्यु ने फ्रांस को गंभीर राजनीतिक अस्थिरता की ओर धकेल दिया।
कैथरीन डी मेडिसी का संरक्षण काल (1559–1589 ई.)
अस्थिर उत्तराधिकार और रानी-माँ का शासन
हेनरी द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् फ्रांसीसी सिंहासन पर क्रमशः तीन अल्पवयस्क और निर्बल शासक आए। फ्रांसिस द्वितीय (1559–1560 ई.) मात्र 15 वर्ष की आयु में राजा बना और केवल 17 महीने शासन करने के पश्चात् कान की बीमारी से मर गया। उसके बाद चार्ल्स नवम (1560–1574 ई.) मात्र 10 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा। तत्पश्चात् हेनरी तृतीय (1574–1589 ई.) राजा बना। इन तीनों की अल्पायु और अनुभवहीनता के कारण वास्तविक शासन-सत्ता उनकी माता कैथरीन डी मेडिसी के हाथों में रही।
कैथरीन डी मेडिसी फ्लोरेंस के मेडिसी परिवार की पुत्री थी और उसने पोप क्लेमेंट VII की भतीजी होने के नाते एक प्रतिष्ठित वंश का प्रतिनिधित्व किया। वह महत्त्वाकांक्षी, बुद्धिमान और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत सचेत थी, परंतु उसकी नीतियों में अकसर सुसंगत दिशा का अभाव था। वह धार्मिक रूप से विशेष कट्टर नहीं थी, परंतु वालोआ राजवंश की सत्ता को किसी भी कीमत पर बनाए रखना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता थी।
धार्मिक गृहयुद्धों का आरंभ
कैथरीन ने 1562 ई. में जनवरी का अध्यादेश जारी कर ह्यूगनॉटों को नगर की सीमाओं के बाहर सीमित धार्मिक पूजा का अधिकार दिया। परंतु यह अध्यादेश न तो कैथोलिकों को संतुष्ट कर सका, जो किसी भी रूप में ह्यूगनॉट पूजा को सहन नहीं करना चाहते थे और न ही ह्यूगनॉटों को, जो अधिक व्यापक अधिकार चाहते थे। मार्च 1562 ई. में एक विनाशकारी घटना हुई। ड्यूक फ्रांसिस ऑफ गीज के सैनिकों ने वासी नामक स्थान पर एक खलिहान में ईश्वर-उपासना कर रहे निहत्थे ह्यूगनॉटों पर आक्रमण किया, जिसमें लगभग 50 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए, जिसे “वासी का नरसंहार” कहा जाता है। इस घटना ने फ्रांस में धार्मिक गृहयुद्धों की एक दीर्घ श्रृंखला का उद्घाटन किया और 1562 से 1598 ई. तक आठ प्रमुख धार्मिक युद्ध लड़े गए।
सेंट बार्थोलोम्यू नरसंहार (24 अगस्त 1572 ई.)
इन धार्मिक युद्धों की सबसे भयावह और ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी सेंट बार्थोलोम्यू नरसंहार। अगस्त 1572 ई. में पेरिस में नवारे के राजा हेनरी, जो ह्यूगनॉट थे और मार्गरेट डी वालोआ के विवाह के लिए प्रमुख ह्यूगनॉट नेता एकत्र हुए थे। कैथरीन डी मेडिसी ने, जिसका मानना था कि ह्यूगनॉट नेता एडमिरल कोलिग्नी उसके पुत्र चार्ल्स IX पर अत्यधिक प्रभाव डाल रहे हैं, ह्यूगनॉट नेतृत्व के सफाए की योजना बनाई। 24 अगस्त 1572 ई. को, जो सेंट बार्थोलोम्यू का पर्वदिन था, पेरिस में एडमिरल कोलिग्नी सहित हजारों ह्यूगनॉटों की हत्या कर दी गई। यह हिंसा पेरिस से फैलकर पूरे फ्रांस में फैल गई और अगले कुछ सप्ताहों में संपूर्ण फ्रांस में अनुमानतः 5,000 से 30,000 ह्यूगनॉट मारे गए। यह घटना यूरोपीय इतिहास की सबसे भीषण धार्मिक हिंसाओं में से एक है और इसने यूरोप के प्रोटेस्टेंट राज्यों में फ्रांस के प्रति गहरी शत्रुता उत्पन्न की।
तीन हेनरियों का युद्ध (1576–1589 ई.)
तीन दावेदार और फ्रांस का विघटन
1574 ई. में चार्ल्स नवम की क्षयरोग से मृत्यु के बाद उसका भाई हेनरी तृतीय राजा बना। हेनरी तृतीय स्वयं बुद्धिमान था, परंतु उसका स्वास्थ्य कमजोर था और उसके कोई उत्तराधिकारी नहीं था। फ्रांस में इस समय तीन प्रमुख दावेदार और शक्तिकेंद्र थे। पहले, स्वयं राजा हेनरी तृतीय जो राजसत्ता की केंद्रीयता को बनाए रखना चाहता था। दूसरे, ड्यूक हेनरी ऑफ गीज, जो “कैथोलिक लीग” का नेता था। यह लीग स्पेन के राजा फिलिप II के धन से पोषित थी और फ्रांस को कट्टर कैथोलिक बनाने का उद्देश्य रखती थी। तीसरे, नावारे का हेनरी, जो बूर्बो वंश का था और ह्यूगनॉट नेता था। सैलिक कानून के अनुसार यदि हेनरी तृतीय निःसंतान मरे, तो हेनरी ऑफ नावारे फ्रांस का वैध उत्तराधिकारी था।
गठबंधन, विश्वासघात और हत्याएँ
1576 ई. में कैथोलिक लीग की स्थापना हुई और उसने हेनरी ऑफ गीज के नेतृत्व में फ्रांस में अपनी शक्ति का विस्तार किया। स्पेन से धन और समर्थन प्राप्त होने के कारण लीग ने हेनरी तृतीय को चुनौती देना आरंभ किया। 1588 ई. में “बैरिकेड्स का दिन” घटित हुआ, जब पेरिस की जनता ने ह्यूगनॉट-समर्थक राजनीति के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और हेनरी ऑफ गीज ने व्यावहारिक रूप से पेरिस पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। हेनरी तृतीय को पेरिस से भागना पड़ा। इसके प्रतिशोध में दिसंबर 1588 ई. में हेनरी तृतीय ने हेनरी ऑफ गीज और उसके भाई कार्डिनल ऑफ लोरेन को ब्लोआ के महल में बुलाकर हत्या करवा दी। इस हत्या ने कैथोलिक लीग को क्रुद्ध कर दिया और पोप ने हेनरी तृतीय की निंदा की। विवश होकर हेनरी तृतीय ने नावारे के हेनरी के साथ गठबंधन किया। 1 अगस्त 1589 ई. को एक कट्टरपंथी डोमिनिकन भिक्षु जाक क्लेमाँ ने हेनरी तृतीय की हत्या कर दी। मृत्युशय्या पर हेनरी तृतीय ने हेनरी ऑफ नावारे को अपना वैध उत्तराधिकारी घोषित किया।
हेनरी चतुर्थ (1589–1610 ई.) : फ्रांस का उद्धारकर्ता
नए राजवंश की स्थापना और पुनर्मिलन की चुनौती
1589 ई. में नावारे का हेनरी “हेनरी चतुर्थ” के नाम से फ्रांस का राजा बना। इसके साथ ही वालोआ राजवंश का अंत और बूर्बो राजवंश का आरंभ हुआ, जिसने आगे चलकर न केवल फ्रांस, बल्कि स्पेन में भी शासन किया। परंतु हेनरी चतुर्थ के सामने चुनौतियाँ अत्यंत विकट थीं। वह एक प्रोटेस्टेंट राजा था, जबकि फ्रांस की बहुसंख्यक जनसंख्या कैथोलिक थी। कैथोलिक लीग ने उसेस्वीकार करने से इनकार कर दिया। कुछ क्षेत्रों में स्पेनी सेनाएँ भी थीं। पेरिस, जो कैथोलिक गढ़ था, उसके लिए बंद था। हेनरी चतुर्थ ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता, धैर्य और व्यावहारिकता का उपयोग किया।

धर्म-परिवर्तन और पेरिस की विजय (1593–1594 ई.)
जुलाई 1593 ई. में हेनरी चतुर्थ ने कैथोलिक धर्म स्वीकार कर लिया। उसका प्रसिद्ध कथन “पेरिस एक मास के योग्य है” (Paris is well worth a mass)। यद्यपि इतिहासकार इस उद्धरण की प्रामाणिकता पर बहस करते हैं, जो उसकी व्यावहारिक राजनीतिक सोच का प्रतीक बन गया। इस धर्मांतरण के पश्चात् फरवरी 1594 ई. में रैम्स में उसका राज्याभिषेक हुआ और मार्च 1594 ई. में पेरिस ने उसके सामने द्वार खोले। पोप क्लेमेंट VIII ने भी 1595 ई. में उसकी कैथोलिक वैधता को मान्यता दी। कैथोलिक लीग धीरे-धीरे टूट गई क्योंकि हेनरी ने रणनीतिक रूप से विभिन्न सामंती नेताओं को धन और पद देकर तोड़ लिया।
नांटेस का अध्यादेश (13 अप्रैल 1598 ई.)
हेनरी चतुर्थ की सबसे महत्त्वपूर्ण और दूरदर्शी उपलब्धि थी नांटेस का अध्यादेश, जो 13 अप्रैल 1598 ई. को जारी किया गया। इस ऐतिहासिक अध्यादेश ने ह्यूगनॉटों को व्यापक धार्मिक स्वतंत्रता, पूजा के अधिकार, सरकारी नौकरियों में समान अवसर, 75 दुर्गों और सैन्य-नगरों पर नियंत्रण, अपनी सेना बनाए रखने का अधिकार और राजकोष से आर्थिक सहायता प्रदान की। यह युग के संदर्भ में एक असाधारण उदार दस्तावेज था। यह अध्यादेश आधुनिक धार्मिक सहिष्णुता की अवधारणा का प्रारंभिक प्रतीक माना जाता है। इसी वर्ष स्पेन के साथ वर्विन्स की हुई, जिसने स्पेनी हस्तक्षेप समाप्त किया।
आर्थिक और प्रशासनिक सुधार
हेनरी चतुर्थ ने अपने वित्त मंत्री मैक्सिमिलियन डी बेथून, ड्यूक ऑफ सुली के साथ मिलकर फ्रांस की जर्जर अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण का कार्य आरंभ किया। सुली ने कर-व्यवस्था में व्यापक सुधार किए, राजस्व संग्रह की अनियमितताओं को समाप्त किया, अनावश्यक सरकारी कर्मचारियों को हटाया और फिजूलखर्ची पर नियंत्रण लगाया। उसने कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी- उसकी प्रसिद्ध उक्ति थी- “खेती और चरागाह फ्रांस के दो स्तन हैं।” हेनरी चतुर्थ ने सिंचाई-व्यवस्था सुधारी, बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया, देश भर में सड़कों, पुलों और नहरों का निर्माण करवाया। औद्योगिक विकास की दिशा में रेशम, कांच, मिट्टी के बर्तन और लोहे के उद्योगों को राजकीय प्रोत्साहन दिया। उस का प्रसिद्ध स्वप्न था- “रविवार के भोजन में प्रत्येक किसान की थाली में मुर्गा।” उसने स्पेन, इंग्लैंड, हॉलैंड और ओटोमन साम्राज्य के साथ व्यापारिक संधियाँ की, जिससे फ्रांस का विदेश व्यापार पुनर्जीवित हुआ।
विदेश नीति और हत्या
हेनरी चतुर्थ की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य हैब्सबर्ग वंश को, जो स्पेन और ऑस्ट्रिया दोनों में शासन करता था और जिसने फ्रांस को तीन दिशाओं से घेर रखा था, कमजोर करना था। उसने जर्मनी, हॉलैंड, इटली और स्वीडन के राज्यों को हैब्सबर्ग विरोधी गठबंधन में लाने का प्रयास किया। 1600 ई. में उसने मैरी डी मेडिसी से विवाह कर फ्रांस-इटली संबंधों को सुदृढ़ किया। इतिहासकारों के अनुसार उसने “ग्रैंड डिजाइन” की एक महत्त्वाकांक्षी योजना बनाई थी, जिसमें हैब्सबर्ग शक्ति को कुचलने के लिए एक व्यापक यूरोपीय गठबंधन का निर्माण शामिल था। परंतु 14 मई 1610 ई. को एक कट्टरपंथी कैथोलिक फ्रांकोइस रावैलाक ने हेनरी चतुर्थ की हत्या कर दी। उसकी मृत्यु फ्रांस के इतिहास का एक दुखद बिंदु था- एक ऐसे शासक का अंत जिसने अपनी प्रजा का प्रेम और विश्वास अर्जित किया था।
लुई तेरहवाँ (1610–1643 ई.) और कार्डिनल रिशल्यू
मैरी डी मेडिसी का संरक्षण और नीतिगत बदलाव
हेनरी चतुर्थ की हत्या के बाद उसका नौ वर्षीय पुत्र लुई तेरहवाँ (Louis XIII) गद्दी पर बैठा। उसकी माता मैरी डी मेडिसी संरक्षिका बनी। मैरी ने हेनरी चतुर्थ की राष्ट्रवादी और हैब्सबर्ग-विरोधी नीतियों को त्याग दिया। उसने सुली को पदच्युत किया और अपने इतालवी पसंदीदा कोंचिनो कोंचिनी को अत्यधिक शक्ति दी, जिससे फ्रांसीसी कुलीनों में व्यापक असंतोष फैला। 1615 ई. में ऑस्ट्रिया के साथ दोहरे वैवाहिक गठबंधन किए गए-ब लुई XIII का विवाह ऑस्ट्रिया की राजकुमारी ऐनी से और उसकी बहन का विवाह स्पेनिश राजकुमार से हुआ। यह हेनरी चतुर्थ की हैब्सबर्ग-विरोधी नीति का पूर्ण परित्याग था।
1617 ई. में लुई तेरहवाँ ने अपने पसंदीदा दरबारी लुइन्स की सहायता से शासन की बागडोर अपने हाथों में ली और कोंचिनी की हत्या करवा दी। परंतु उसमें स्वयं शासन करने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों की कमी थी।
कार्डिनल रिशल्यू का आगमन और महत्त्वपूर्ण प्रतिज्ञा
1624 ई. में लुई तेरहवाँ ने कार्डिनल आर्मांड जाँ दू प्लेसिस डी रिशल्यू (1585–1642 ई.) को अपना मुख्यमंत्री नियुक्त किया। रिशल्यू एक कुशाग्र बुद्धि, दृढ़ इच्छाशक्ति और असाधारण संगठन-क्षमता से संपन्न व्यक्ति था। उसने राजा के सामने चार सुस्पष्ट उद्देश्य रखे : ह्यूगनॉटों की राजनीतिक शक्ति को समाप्त करना; शक्तिशाली सामंतों को राजसत्ता के अधीन करना; समस्त प्रजा को राजाज्ञा का पालन करने के लिए बाध्य करना; और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर फ्रांस को यूरोप की सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित करना।
कार्डिनल रिशल्यू की उपलब्धियाँ (1624–1642 ई.)
ह्यूगनॉटों की राजनीतिक शक्ति का दमन
जब रिशल्यू ने प्रधानमंत्री का पद संभाला, तब नांटेस के अध्यादेश के कारण ह्यूगनॉट समुदाय “राज्य के भीतर एक स्वतंत्र राज्य” बन चुका था। उनके पास 75 दुर्ग, स्वतंत्र सेना और राजनीतिक सभाएं थीं और ये सब बूर्बो राजवंश की सर्वोच्चता के लिए गंभीर चुनौती थे। रिशल्यू स्वयं ह्यूगनॉटों की धार्मिक स्वतंत्रता का विरोधी नहीं था, बल्कि उनकी राजनीतिक और सैन्य स्वायत्तता उसके लिए अस्वीकार्य थी।
1625 ई. में ह्यूगनॉटों ने पुनः विद्रोह किया। इंग्लैंड के राजा चार्ल्स I ने भी ला रोशेल के ह्यूगनॉटों की सहायता के लिए नौसेना भेजी। रिशल्यू ने ला रोशेल (ह्यूगनॉटों का सबसे बड़ा और सुरक्षित गढ़) की घेराबंदी का निर्णय लिया। 1627–1628 ई. की ला रोशेल की घेराबंदी एक असाधारण सैन्य अभियान था। रिशल्यू ने समुद्र में एक विशाल पत्थरों की दीवार बनवाई, जिसने बंदरगाह को अंग्रेजी सहायता से पूर्णतः काट दिया। 15 महीनों की घेराबंदी, अकाल और महामारी के बाद अक्टूबर 1628 ई. में ला रोशेल ने आत्मसमर्पण किया। नगर की जनसंख्या 27,000 से घटकर मात्र 5,000 रह गई थी- इस तथ्य से इस घेराबंदी की भीषणता का अनुमान लगाया जा सकता है।
1629 ई. में आलैस की संधि ने ह्यूगनॉटों की धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखा, परंतु उनके सभी सैन्य और राजनीतिक विशेषाधिकार समाप्त कर दिए। यह रिशल्यू की कुशाग्र राजनीतिक बुद्धिमत्ता का प्रमाण था। उसने ह्यूगनॉटों को धार्मिक रूप से चोट पहुँचाए बिना बूर्बो राजवंश के लिए सबसे बड़े आंतरिक खतरे को स्थायी रूप से समाप्त किया।
सामंती शक्ति का निर्णायक दमन
रिशल्यू के सामने दूसरी प्रमुख चुनौती सामंत वर्ग था, जो दशकों के धार्मिक गृहयुद्धों के कारण असाधारण शक्ति और स्वायत्तता अर्जित कर चुका था। 1626 ई. में रिशल्यू ने एक कठोर अध्यादेश जारी किया, जिसके अनुसार समस्त सामंती दुर्गों और किलों को ध्वस्त किया जाएगा, निजी सेनाएं रखने का अधिकार समाप्त होगा और सामंतों के बीच होने वाले द्वंद्वयुद्धों पर मृत्युदंड का दंड लागू होगा।
रिशल्यू ने इस आदेश को अत्यंत कठोरता से लागू किया। उसने अपने व्यक्तिगत मित्रों और संबंधियों को भी नहीं छोड़ा। काउंट डी बुटेविले और काउंट डेस शापेल्स, जो शक्तिशाली कुलीन परिवारों से थे, को द्वंद्वयुद्ध करने के अपराध में मृत्युदंड दिया गया। इससे पूरे फ्रांस में यह संदेश गया कि रिशल्यू राजाज्ञा का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति को दंडित करेगा। राजमाता मैरी डी मेडिसी और ड्यूक ऑफ आर्लेआं जैसे शक्तिशाली षड्यंत्रकारियों के प्रयास विफल हुए। 1630 ई. में “धोखे के दिन” पर रिशल्यू को पदच्युत करने का षड्यंत्र रचा गया, परंतु लुई तेरहवाँ ने रिशल्यू पर अपना विश्वास बनाए रखा और मैरी डी मेडिसी को निर्वासित किया।
प्रशासनिक केंद्रीकरण और इंटेंडेंट प्रणाली
रिशल्यू का सबसे दूरगामी और स्थायी संस्थागत योगदान था फ्रांस में “इंटेंडेंट” की प्रणाली का विकास और विस्तार। ये राज्य अधिकारी मध्यम वर्ग और कानून की शिक्षा प्राप्त लोगों में से चुने जाते थे- अर्थात् वे सामंत या कुलीन वर्ग के नहीं होते थे, इसलिए उनकी निष्ठा पूर्णतः राजा और केंद्र के प्रति होती थी। प्रत्येक इंटेंडेंट अपने क्षेत्र में न्याय, पुलिस, कर-संग्रह और सैन्य भर्ती के लिए उत्तरदायी होता था और सीधे मंत्री को रिपोर्ट करता था। जैसे-जैसे उनकी संख्या और शक्ति बढ़ी, उन्हें समकालीन आलोचकों ने “तीस निरंकुश शासक” कहा।
रिशल्यू ने स्टेट्स जनरल को 1614 ई. के बाद पुनः कभी नहीं बुलाया और पार्लेमां को राजकीय अध्यादेशों को बिना विरोध के स्वीकार करने पर बाध्य किया। इस प्रकार उसने समस्त शक्तियाँ राजपद में केंद्रित कर दीं और वह प्रशासनिक ढाँचा खड़ा किया जो लुई XIV के “सूर्य राजा” का आधार सिद्ध हुआ।
तीसवर्षीय युद्ध में हस्तक्षेप और राज्य-हित की अवधारणा
रिशल्यू की विदेश नीति का एकमात्र और सुस्पष्ट उद्देश्य था- हैब्सबर्ग वंश की यूरोपीय प्रधानता को समाप्त कर फ्रांस को सर्वोच्च शक्ति बनाना। तीसवर्षीय युद्ध (1618–1648 ई.) में एक कैथोलिक कार्डिनल होते हुए भी रिशल्यू ने प्रोटेस्टेंट राज्यों- डेनमार्क, स्वीडन, जिसके राजा गुस्तावस एडोल्फस को “उत्तर का शेर” कहा जाता था और जर्मन प्रोटेस्टेंट राजकुमारों को फ्रांसीसी धन और कूटनीतिक समर्थन प्रदान किया। 1635 ई. में फ्रांस ने स्पेन के विरुद्ध सीधे युद्ध में प्रवेश किया। इस निर्णय ने आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय राजनय में एक क्रांतिकारी सिद्धांत स्थापित किया- “रेजन डी एटात”, जिसके अनुसार राष्ट्रहित राज्य की विदेश नीति का मुख्य आधार है, न कि धर्म।
4 दिसंबर 1642 ई. को रिशल्यू की मृत्यु हो गई। उसके उत्तराधिकारी कार्डिनल मेजारिन ने उनकी नीति जारी रखी और 1648 ई. की वेस्टफेलिया की संधि से फ्रांस को ऐतिहासिक लाभ हुए- अल्सास का बड़ा भाग, लोरेन में महत्त्वपूर्ण नगर और राइन क्षेत्र में रणनीतिक स्थान फ्रांस को मिले; हैब्सबर्ग सम्राट की शक्ति पर गंभीर अंकुश लगा और जर्मन राजकुमारों की स्वायत्तता मान्यता प्राप्त हुई। वेस्टफेलिया की संधि आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली और राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता के सिद्धांत की आधारशिला मानी जाती है।
रिशल्यू का मूल्यांकन
रिशल्यू मात्र 57 वर्ष जीवित रहा, परंतु उसके 18 वर्षीय शासन ने फ्रांस के इतिहास पर शताब्दियों तक प्रभाव डालने वाली छाप छोड़ी। उसने ह्यूगनॉटों की राजनीतिक शक्ति को समाप्त किया, सामंती स्वायत्तता को कुचला, इंटेंडेंट प्रणाली से केंद्रीय प्रशासन को सुदृढ़ किया और विदेश नीति में फ्रांस को यूरोप की सर्वोच्च शक्ति बनाने की नींव रखी। उसके आलोचकों ने उसे क्रूर और तानाशाह कहा, जबकि समर्थकों ने उसे फ्रांस का वास्तविक राज्य-निर्माता माना। निर्विवाद रूप से वह आधुनिक यूरोपीय कूटनीति और राज्यशास्त्र का प्रणेता था। उल्लेखनीय है कि 1635 ई. में रिशल्यू ने “अकादेमी फ्रांसेज़” की स्थापना की, जो फ्रांसीसी भाषा का सर्वोच्च संरक्षक निकाय बनी और आज भी सक्रिय है।
कार्डिनल मेजारिन और फ्रोंडे विद्रोह (1643–1661 ई.)
मेजारिन का शासन और बालक-राजा
रिशल्यू की मृत्यु के पश्चात् लुई तेरहवाँ ने कार्डिनल ज्यूल मेजारिन (1602–1661 ई.) को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। मेजारिन मूलतः इटालियन था और पोप के राजदूत के रूप में पेरिस आया था, जहाँ रिशल्यू ने उसकी असाधारण कूटनीतिक क्षमता को पहचाना था। मई 1643 ई. में लुई तेरहवाँ की मृत्यु के बाद उसका पाँच वर्षीय पुत्र लुई XIV गद्दी पर बैठा। उसकी माता ऐनी ऑफ ऑस्ट्रिया संरक्षिका बनी और मेजारिन वास्तविक शासक रहा।
मेजारिन ने रिशल्यू की नीतियाँ जारी रखीं और 1648 ई. में वेस्टफेलिया की संधि से फ्रांस के लिए महत्त्वपूर्ण लाभ अर्जित किए। परंतु उसमें रिशल्यू जैसी व्यक्तिगत क्षमता नहीं थी। तीसवर्षीय युद्ध के भारी व्यय, नए करों के बोझ और विदेशी मूल का होने के कारण वह अत्यंत अलोकप्रिय था।
प्रथम फ्रोंडे (1648–1649 ई.) : पार्लेमां का विद्रोह
1648 ई. में पेरिस की पार्लेमां ने मेजारिन के नए करों का विरोध करते हुए एक “कार्योग्य सुधारों की घोषणा” जारी की, जिसमें मनमाने कारावास पर रोक, नए करों के लिए पार्लेमां की सहमति की आवश्यकता और इंटेंडेंट प्रणाली की समाप्ति जैसी माँगें थीं। अगस्त 1648 ई. में प्रमुख ह्यूगनॉट और विद्रोही नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में पेरिस की जनता ने सड़कों पर बैरिकेड खड़े कर दिए। “बैरिकेड्स का दिन” एक महत्त्वपूर्ण जनांदोलन था। राजपरिवार को पेरिस छोड़कर सुरक्षित स्थान पर जाना पड़ा। अंततः मार्च 1649 ई. में रुयूईल की संधि से पार्लेमां को कुछ रियायतें दी गईं।
द्वितीय फ्रोंडे (1650–1652 ई.) : सामंती विद्रोह
प्रथम फ्रोंडे की शांति अल्पकालिक रही। जनवरी 1650 ई. में मेजारिन ने प्रिंस डी कोंदे और अन्य प्रमुख सामंती नेताओं को गिरफ्तार किया, किंतु यह कदम उल्टा पड़ गया। उसके गिरफ्तारी ने पूरे सामंती वर्ग को एकजुट कर दिया। कोंदे की बहन मादाम डी लोंगुआविले ने विद्रोह का नेतृत्व किया। कोंदे की रिहाई के बाद उसने 1651 ई. में खुला विद्रोह किया। दबाव के कारण मेजारिन को ब्रुसेल्स भागना पड़ा। परंतु सामंती विद्रोह में आंतरिक एकता का अभाव था। प्रत्येक सामंत केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की रक्षा में था। 1652 ई. में तुरेन के विस्काउंट ने राजकीय सेना का नेतृत्व करते हुए कोंदे को पराजित किया। लुई XIV विजेता के रूप में पेरिस लौटा और मेजारिन की भी वापसी हुई।
फ्रोंडे की असफलता और उसके परिणाम
फ्रोंडे की असफलता के कारण और परिणाम दोनों अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे। असफलता के कारणों में शामिल थे- पार्लेमां का संकीर्ण स्वार्थ और जनता का सीमित समर्थन; सामंतों में पारस्परिक फूट, अवसरवादिता और साझे कार्यक्रम का अभाव और मेजारिन की कूटनीतिक चतुराई, जिसने विद्रोहियों को बार-बार बाँटा। परिणाम यह हुआ कि फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र और भी मजबूत हो गया। सामंती शक्ति की विश्वसनीयता समाप्त हुई और युवा लुई XIV के मन में राजसत्ता को हर कीमत पर सुरक्षित रखने और सामंतों को नियंत्रित करने का दृढ़ संकल्प पक्का हो गया। फ्रोंडे का अनुभव लुई XIV के शासन-दर्शन पर सबसे गहरा प्रभाव डालने वाला था।
लुई XIV (1643–1715 ई.) : “सूर्य राजा”
लुई XIV फ्रांसीसी और यूरोपीय इतिहास के सबसे महान और सबसे विवादास्पद शासकों में से एक हैं। 5 सितंबर 1638 ई. को जन्मे लुई ने मात्र चार वर्ष की आयु में सिंहासन ग्रहण किया। फ्रोंडे के विद्रोह ने उनके बालमन पर एक अमिट छाप छोड़ी। उसने प्रत्यक्ष देखा कि अनियंत्रित सामंती शक्ति और पार्लेमां किस प्रकार राजसत्ता को चुनौती दे सकती है। 1661 ई. में कार्डिनल मेजारिन की मृत्यु के बाद 22 वर्षीय लुई XIV ने घोषित किया कि वह स्वयं शासन करेंगा और कोई प्रधानमंत्री नियुक्त नहीं करेंगा। उसका प्रसिद्ध कथन “L’état, c’est moi” (“राज्य ही मैं हूँ”) उसकी शासन-दृष्टि का सार था। लुई XIV ने 1643 से 1715 ई. तक 72 वर्षों तक शासन किया, जो यूरोपीय इतिहास में किसी भी प्रमुख संप्रभु राजा का सबसे लंबा शासनकाल था।

प्रशासनिक केंद्रीकरण : निरंकुश राजतंत्र की पूर्णता
लुई XIV ने रिशल्यू और मेजारिन द्वारा आरंभ की गई केंद्रीकरण की प्रक्रिया को उसकी तार्किक पूर्णता तक पहुँचाया। इंटेंडेंट व्यवस्था को और अधिक विस्तृत, संगठित और कुशल बनाया गया। पूरे फ्रांस को 30 से अधिक “जनरेलिटी” में बाँटा गया, जिनमें प्रत्येक में एक इंटेंडेंट नियुक्त था। ये इंटेंडेंट कर-संग्रह, न्याय, सैन्य भर्ती और सार्वजनिक निर्माण कार्यों की देखरेख करते थे और सीधे राजा और उसके मंत्रियों के प्रति उत्तरदायी थे। पार्लेमां को राजकीय आदेशों पर बहस करने का अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिया गया। एस्टेट्स जनरल को, जो पहले ही 1614 ई. में अंतिम बार बुलाया गया था, लुई XIV ने अपने पूरे शासनकाल में एक बार भी नहीं बुलाया।
सामंतों को नियंत्रित करने की लुई की सबसे चतुर चाल थी उन्हें वर्साय दरबार में एकत्र करना। उसने अपने महल में एक जटिल दरबारी शिष्टाचार-व्यवस्था बनाई, जिसमें भाग लेना राजकीय कृपा के लिए आवश्यक था। जो सामंत वर्साय में उपस्थित नहीं रहता, वह राजकीय पद, पेंशन और संरक्षण से वंचित हो जाता था। इस प्रकार सामंतों को अपनी भूमि और प्रजा से दूर रखकर उनकी स्थानीय शक्ति समाप्त कर दी गई।
आर्थिक नीति : कोल्बर्ट और मर्केंटाइलिज्म
1661 ई. में लुई XIV ने जीन-बैप्टिस्ट कोल्बर्ट को वित्त नियंत्रक और बाद में नौसेना मंत्री के पद पर नियुक्त किया। कोल्बर्ट 1683 ई. तक इस पद पर रहा और उसने फ्रांसीसी अर्थव्यवस्था को मर्केंटाइलिस्ट सिद्धांतों पर व्यवस्थित किया।
कोल्बर्ट ने विलासिता की वस्तुओं- रेशम, दर्पण, टैपेस्ट्री, फीते और लेस के उद्योगों को सरकारी संरक्षण दिया, ताकि फ्रांस इन्हें स्वयं उत्पन्न करे और इटली तथा नीदरलैंड से महँगे आयात की निर्भरता समाप्त हो। विदेशी वस्तुओं पर भारी आयात शुल्क लगाए गए। घरेलू उद्योगों को राजकीय आर्थिक सहायता दी गई। “गॉबेलिन” जैसी शाही कारखाने स्थापित किए गए, जो विश्व-प्रसिद्ध टैपेस्ट्री और फर्नीचर बनाते थे। 1664 ई. में फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी और फ्रेंच वेस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई। नहरों का व्यापक निर्माण हुआ, विशेषतः “कनाल डू मिडी” (1681 ई.) जो भूमध्य सागर को अटलांटिक से जोड़ती थी। यह उस युग की सबसे महत्त्वाकांक्षी इंजीनियरिंग परियोजनाओं में से एक थी। कोल्बर्ट ने नौसेना को भी विकसित किया- फ्रांसीसी नौसेना की संख्या 1661 ई. के 18 जहाजों से बढ़कर 1683 ई. तक 270 जहाजों तक पहुँच गई।
धार्मिक नीति : नांटेस के अध्यादेश की समाप्ति (1685 ई.)
लुई XIV की सबसे विवादास्पद और दीर्घकालिक दुष्परिणाम वाली नीति थी 1685 ई. में नांटेस के अध्यादेश को रद्द करना। “फोंटेनब्लू के अध्यादेश” के द्वारा उसने ह्यूगनॉटों के समस्त धार्मिक और नागरिक अधिकार समाप्त कर दिए। उनके गिरजाघर तोड़े गए, स्कूल बंद हुए और उन्हें कैथोलिक धर्म अपनाने पर विवश किया गया। यह नीति लुई XIV की उस मान्यता पर आधारित थी कि “एक राजा, एक कानून, एक धर्म” ही राष्ट्रीय एकता की गारंटी है।
परिणामस्वरूप लगभग 2,00,000 (दो लाख) ह्यूगनॉट फ्रांस छोड़कर इंग्लैंड, नीदरलैंड, प्रशिया, स्विट्जरलैंड और केप कॉलोनी (दक्षिण अफ्रीका) चले गए। इनमें से अधिकांश कुशल कारीगर, व्यापारी, उद्योगपति, नाविक और सैनिक थे। उनके प्रस्थान ने फ्रांस के रेशम, काँच, घड़ी-निर्माण और कपड़ा उद्योग को भारी नुकसान पहुँचाया, जबकि उन देशों को जिन्होंने उन्हें शरण दी, विशेषतः प्रशिया के फ्रेडरिक विलियम I ने उनका उत्साहपूर्वक स्वागत किया। लुई XIV की यह धार्मिक नीति आर्थिक दृष्टि से एक गंभीर भूल सिद्ध हुई।
सैन्य विस्तार : चार महायुद्ध और यूरोपीय शक्ति-संतुलन
डेवोल्यूशन युद्ध (1667–1668 ई.)
लुई XIV ने स्पेनिश नीदरलैंड (बेल्जियम) पर अपनी पत्नी मेरी थेरेसे के उत्तराधिकार-अधिकार के नाम पर आक्रमण किया। फ्लैंडर्स के कुछ क्षेत्र प्राप्त हुए, परंतु इंग्लैंड, नीदरलैंड और स्वीडन की “ट्रिपल एलायंस” के दबाव में एक्स-ला-शापेल की संधि (1668 ई.) स्वीकार करनी पड़ी।
डच युद्ध (1672–1678 ई.)
लुई ने नीदरलैंड पर आक्रमण किया और आमस्टर्डम के दरवाजे तक पहुँचे। नीदरलैंड ने अपनी रक्षा के लिए समुद्री बाँध (dikes) तोड़ दिए। विलियम ऑफ ऑरेंज के नेतृत्व में यूरोपीय गठबंधन ने फ्रांस का प्रतिरोध किया। निमवेगन की संधि (1678 ई.) में फ्रांस को फ्रांच-कॉम्टे और फ्लैंडर्स के कुछ नगर प्राप्त हुए। यह लुई XIV की सर्वाधिक सफल विदेश नीतिगत उपलब्धि थी।
नाइन ईयर्स वॉर (1688–1697 ई.)
1688 ई. में लुई XIV ने पफाल्ज पर आक्रमण किया। इस बार “ऑग्स्बर्ग लीग”, जिसमें पवित्र रोमन साम्राज्य, स्पेन, नीदरलैंड, स्वीडन, इंग्लैंड और सेवॉय शामिल थे, ने संयुक्त रूप से फ्रांस का सामना किया। यह युद्ध नौ वर्षों तक चला और फ्रांस के लिए अत्यंत कठिन सिद्ध हुआ। रिसविक की संधि (1697 ई.) में फ्रांस को पहले के कुछ क्षेत्र लौटाने पड़े।
स्पेनिश उत्तराधिकार युद्ध (1701–1714 ई.)
1700 ई. में स्पेन के राजा चार्ल्स II की निःसंतान मृत्यु हुई। उन्होंने अपनी वसीयत में लुई XIV के पोते फिलिप ऑफ अंजु को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। लुई XIV ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए फिलिप को स्पेन का राजा घोषित किया, जिससे फ्रांस और स्पेन में बूर्बो वंश की संयुक्त सत्ता का भय यूरोप में व्याप्त हो गया। इंग्लैंड, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड और पुर्तगाल ने मिलकर “ग्रैंड एलायंस” का गठन किया। यह युद्ध 13 वर्षों तक चला। इंग्लिश-ऑस्ट्रियन संयुक्त सेना के सेनापति मार्लबरो के ड्यूक ने ब्लेनहाइम (1704 ई.) में फ्रांसीसी सेना को भीषण पराजय दी। यूट्रेक्ट की संधि (1713 ई.) और रस्टाट की संधि (1714 ई.) से फिलिप V स्पेन का राजा बना रहा, परंतु फ्रांस-स्पेन एकीकरण निषिद्ध हुआ। फ्रांस को न्यूफाउंडलैंड, नोवा स्कोशिया और हडसन बे के क्षेत्र इंग्लैंड को देने पड़े। इस युद्ध ने फ्रांस को आर्थिक रूप से जर्जर कर दिया।
सांस्कृतिक गौरव : फ्रांस- यूरोप का सांस्कृतिक केंद्र
लुई XIV की उपलब्धियों में सबसे दीर्घस्थायी प्रभाव उनका सांस्कृतिक योगदान था। उन्होंने संस्कृति को राजनीतिक शक्ति का एक प्रमुख साधन मानते हुए अभूतपूर्व उदारता से कला, साहित्य, संगीत और वास्तुकला को संरक्षण दिया।
वर्साय महल
1661 ई. में निर्माण आरंभ होकर 1682 ई. में पूर्ण हुए वर्साय महल का निर्माण उस युग की सबसे महत्वाकांक्षी वास्तुकला परियोजना थी। वास्तुकार लुई लेवो और जूल हार्दुआं-मान्सार, उद्यान-डिजाइनर आंद्रे ले नॉत्र और चित्रकार चार्ल्स ले ब्रं के संयुक्त प्रयास से यह विश्व-प्रसिद्ध संरचना निर्मित हुई। महल में 700 कमरे, “हॉल ऑफ मिरर्स”, रॉयल चैपल, 1,900 एकड़ के विशाल उद्यान और प्रसिद्ध फव्वारे थे। 1682 ई. में लुई XIV ने वर्साय को फ्रांस की राजधानी बनाया। उसने समस्त प्रमुख सामंतों को वर्साय में रहने के लिए बाध्य किया। यह एक अत्यंत चतुर राजनीतिक चाल थी, क्योंकि इससे सामंत अपनी भूमि से दूर, राजा की दृष्टि में रहे और उनकी स्थानीय शक्ति स्वतः कमजोर होती गई।
साहित्य और भाषा
उनके दरबार में महान नाटककार मोलियर (1622–1673 ई.), त्रासदी के महाकवि जाँ रेसिन, पियर कॉर्नेय, साहित्य-समीक्षक निकोला बोआलो और दंतकथा-लेखक जाँ द ला फोंटेन को राजकीय संरक्षण मिला। अकादेमी फ्रांसेज़ (1635 ई. में रिशल्यू द्वारा स्थापित) को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया और फ्रांसीसी भाषा का पहला व्यापक शब्दकोश 1694 ई. में प्रकाशित हुआ। इस काल में फ्रांसीसी भाषा यूरोपीय कूटनीति, साहित्य और दरबारी संस्कृति की सर्वोच्च भाषा बन गई, जो स्थिति बीसवीं शताब्दी तक बनी रही।
संगीत, बैले और ओपेरा
जाँ-बैप्टिस्ट लुल्ली को फ्रांसीसी ओपेरा का जनक माना जाता है। लुई XIV स्वयं बैले के उत्साही प्रेमी थे- “सूर्य राजा” की उपाधि उसे 1653 ई. के एक दरबारी बैले “बैले दे ला नुई” में सूर्य की भूमिका निभाने के बाद मिली थी। “पेरिस ओपेरा” की स्थापना 1669 ई. में हुई। कला की “रॉयल अकादमी” (1648 ई.) को पुनर्जीवित किया गया।
लुई XIV का मूल्यांकन
लुई XIV का 72 वर्षीय शासनकाल फ्रांस के इतिहास का सबसे गौरवशाली, प्रभावशाली और साथ ही विरोधाभासों से भरा अध्याय माना जाता है। उसके शासनकाल में फ्रांस यूरोप की सर्वोच्च राजनीतिक, सैन्य और सांस्कृतिक शक्तियों में प्रमुख बनकर उभरा। प्रशासनिक केंद्रीकरण, आर्थिक सुधार, सैन्य संगठन, विदेश नीति तथा कला-संस्कृति के संरक्षण के क्षेत्र में उसकी उपलब्धियाँ उल्लेखनीय थीं। उसने राजसत्ता को अत्यधिक केंद्रीकृत किया और फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।
लुई XIV के काल में फ्रांस की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा अत्यधिक बढ़ी। फ्रांसीसी भाषा यूरोपीय कूटनीति और अभिजात वर्ग की प्रमुख भाषा बनी। वर्साय का महल उसकी सत्ता, वैभव और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रतीक बन गया तथा फ्रांस कला, साहित्य, वास्तुकला और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बना।
यद्यपि उसके शासन की कुछ नीतियों के दूरगामी दुष्परिणाम भी हुए। प्रोटेस्टेंटों के प्रति धार्मिक असहिष्णुता और नांतेस की राजाज्ञा को रद्द करने के कारण अनेक कुशल और प्रतिभाशाली लोग फ्रांस छोड़कर चले गए, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँची। इसी प्रकार, लगातार युद्धों और सैन्य विस्तार की नीति ने राजकोष पर भारी बोझ डाला। युद्धों के खर्च तथा करों के बढ़ते भार ने सामान्य जनता की आर्थिक स्थिति को कमजोर किया और सामाजिक असमानता को बढ़ाया।
अतः लुई XIV की विरासत दोहरी थी। एक ओर उसने फ्रांस को राजनीतिक, सैन्य और सांस्कृतिक दृष्टि से यूरोप की प्रमुख शक्ति बनाया, वहीं दूसरी ओर उसकी निरंकुशता, धार्मिक नीति, युद्धप्रियता और वित्तीय दबाव ने ऐसी संरचनात्मक समस्याएँ पैदा कीं जिनके प्रभाव आगे भी दिखाई दिए। इन परिस्थितियों ने प्रत्यक्ष रूप से 1789 ई. की फ्रांसीसी क्रांति को जन्म नहीं दिया, लेकिन उन्होंने फ्रांसीसी राजतंत्र की वित्तीय और सामाजिक कमजोरियों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस प्रकार लुई XIV इतिहास में एक ऐसे असाधारण शासक के रूप में स्मरण किया जाता है जिसने फ्रांस की शक्ति और प्रतिष्ठा को अभूतपूर्व ऊँचाई प्रदान की, किंतु जिसकी नीतियों की कीमत फ्रांसीसी समाज और राजकोष को लंबे समय तक चुकानी पड़ी।
फ्रांस के उत्थान का मूल्यांकन
फ्रांस का उत्थान पाँचवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी तक की एक निरंतर प्रक्रिया थी। क्लोविस से शुरू होकर कैपेटियन, वैलय और बूर्बो राजवंशों ने राजकीय सत्ता को मजबूत किया। सौ वर्षीय युद्ध ने राष्ट्रीय चेतना जागृत की। हेनरी चतुर्थ ने धार्मिक शांति स्थापित की। रिशल्यू और मेजारिन ने केंद्रीकरण और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा दी। लुई XIV ने फ्रांस को यूरोप का सर्वोच्च शक्ति-केंद्र बनाया।
फिर भी, निरंकुश राजतंत्र, धार्मिक असहिष्णुता, आर्थिक शोषण और सामाजिक असमानता ने अंततः 1789 ई. की क्रांति को जन्म दिया। फ्रांस का उत्थान और पतन दोनों ही आधुनिक यूरोपीय इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हैं। फ्रांसीसी क्रांति ने न केवल फ्रांस, बल्कि समूचे यूरोप और विश्व को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के नए आदर्श दिए। यही फ्रांस के उत्थान की सबसे बड़ी और स्थायी विरासत है।


