कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता (Anglo-French Rivalry in Karnataka)

कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता (Anglo-French Rivalry in Karnataka)
कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता (1746–1763 ई.) दक्षिण भारत में यूरोपीय प्रतिस्पर्धा का उदय अठारहवीं शताब्दी […]

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कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता (1746–1763 ई.)

दक्षिण भारत में यूरोपीय प्रतिस्पर्धा का उदय

अठारहवीं शताब्दी के मध्य में भारत एक असाधारण ऐतिहासिक संक्रमण काल से गुजर रहा था। दिल्ली में मुगल सत्ता का सूर्य अस्त हो रहा था और उसके खंडहरों पर अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ अपना-अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए संघर्षरत थीं। इसी राजनीतिक शून्यता और अनिश्चितता का लाभ उठाने के लिए दो यूरोपीय शक्तियाँ- ब्रिटिश और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनियाँ परस्पर टकराने लगीं। दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक (कर्णाटक/कारनाटिक) का क्षेत्र, इस प्रतिद्वंद्विता का प्रमुख रंगमंच बना। 1746 से 1763 ई. के बीच तीन कर्नाटक युद्धों की श्रृंखला ने यह निर्धारित किया कि भारत पर अगले दो शताब्दियों तक किसका शासन रहेगा।

यह प्रतिद्वंद्विता केवल भारत तक सीमित नहीं थी- यह यूरोप में चल रही महाशक्तियों की उस वैश्विक प्रतिस्पर्धा का विस्तार थी जो ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्ध (1740-1748 ई.) और सप्तवर्षीय युद्ध (1756-1763 ई.) के रूप में प्रकट हो रही थी। भारत में होने वाले युद्ध उन यूरोपीय संघर्षों की छाया-प्रतियाँ थे। परंतु इन युद्धों के परिणाम भारत के भविष्य के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। इनका अंत फ्रांस की पराजय और ब्रिटेन की निर्णायक विजय के रूप में हुआ, जिसने भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य की नींव रखी।

ब्रिटिश और फ्रांसीसी कंपनियों की प्रकृति और स्थिति

फ्रांसीसी और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनियाँ यूरोप में उभर रहे व्यापारिक पूँजीवाद की प्रतिनिधि संस्थाएँ थीं। यह वह युग था जब एशिया और लैटिन अमेरिका से व्यापार करके पूँजी संचय की प्रक्रिया को ‘आद्य-पूँजी संचय का काल’ कहा जाता है। भारत में बने वस्त्र, मसाले और अन्य वस्तुओं की यूरोप में बड़ी माँग थी और ये कंपनियाँ उस व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए प्रतिस्पर्धारत थीं।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 31 दिसंबर 1600 ई. को हुई थी। 1613 ई. में मुगल सम्राट जहाँगीर से एक फरमान प्राप्त कर कंपनी को सूरत, अहमदाबाद, कैंबे और पश्चिमी तट पर व्यापार की अनुमति मिली। ब्रिटिश कंपनी एक बड़ी निजी व्यापारिक संस्था थी जो व्यक्तिगत उद्यम और निजी पूँजी पर आधारित थी। वास्तव में ब्रिटिश सरकार स्वयं कंपनी की ऋणग्रस्त थी। कंपनी के पास विशाल जहाजी बेड़ा था, पर्याप्त वित्तीय संसाधन थे और उसके जहाज शीघ्रता से आते-जाते थे। उसका प्रमुख आधार मद्रास, बंबई और कलकत्ता में था।

फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1664 ई. में फ्रांस के वित्तमंत्री जीन बैप्टिस्ट कोलबेयर के प्रयासों से हुई- अर्थात् ब्रिटिश कंपनी से 64 वर्ष बाद। यह कंपनी पूर्णतः फ्रांसीसी राज्य के संरक्षण और अनुदान पर निर्भर थी। उसका मुख्य राजस्व तंबाकू के व्यापार से आता था, जिस पर फ्रांसीसी सरकार का एकाधिकार था। इस संरचनात्मक अंतर के महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले- जब भी फ्रांसीसी सरकार की प्राथमिकताएँ बदलीं या वह यूरोप में किसी संकट में फँसी, भारत में फ्रांसीसी कंपनी को आवश्यक सहयोग नहीं मिला।

फ्रांसीसियों ने 1668 ई. में सूरत में और 1669 ई. में मसुलीपट्टनम में अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किए। 1674 ई. में फ्रांकॉइस मार्टिन ने पांडिचेरी में एक कारखाना स्थापित किया जो आगे चलकर भारत में फ्रांसीसियों की राजधानी बनी। यह क्षेत्र मद्रास के प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरा और इसके आकार और शक्ति में वृद्धि हुई, परंतु वाणिज्य के मामले में पांडिचेरी मद्रास से सदैव पीछे रही। 1690-1692 ई. के बीच बंगाल में चंद्रनगर में एक और केंद्र खोला गया, किंतु यह कलकत्ता में स्थापित ब्रिटिश केंद्र को कभी चुनौती नहीं दे सका।

अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में फ्रांसीसी कंपनी को अस्थायी पतन का सामना करना पड़ा और उसे सूरत, बंटम तथा मसुलीपट्टनम स्थित अपने केंद्र छोड़ने पड़े। किंतु 1720 के दशक में कंपनी का पुनर्गठन किया गया और इसे नया नाम ‘परपेचुअल कंपनी ऑफ द इंडीज’ दिया गया। फ्रांसीसी नौसेना की शक्ति बढ़ी, मारीशस को उनका प्रमुख अड्डा बनाया गया और 1725 ई. में मलाबार तट पर माही तथा 1739 ई. में पूर्वी तट पर कारिकल पर उनका प्रभाव स्थापित हुआ। यूरोप में आंग्ल-फ्रांसीसी संबंध ऐतिहासिक रूप से प्रतिद्वंद्विता और शत्रुता से भरे थे- जैसे ही यूरोप में दोनों के बीच युद्ध छिड़ता, भारत सहित विश्व के प्रत्येक कोने में जहाँ ये दोनों कंपनियाँ सक्रिय थीं, संघर्ष की आग भड़क उठती थी।

कर्नाटक का प्रथम युद्ध (1746-1748 ई.) : मद्रास पर फ्रांसीसी अधिकार

प्रथम कर्नाटक युद्ध यूरोप में चल रहे ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्ध (1740-1748 ई.) का सीधा विस्तार था। इस युद्ध में इंग्लैंड ने ऑस्ट्रिया का और फ्रांस ने प्रशिया का पक्ष लिया था। भारत में भी दोनों कंपनियाँ इस यूरोपीय संघर्ष के प्रतिबिंब के रूप में एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ी हो गईं। ब्रिटिश नौसेना के एडमिरल बार्नेट ने कुछ फ्रांसीसी जलपोतों पर कब्जा किया, जिससे दोनों के बीच तनाव अत्यधिक बढ़ गया।

1741 ई. से पांडिचेरी के फ्रांसीसी गवर्नर जनरल जोसेफ फ्रांस्वा डूप्ले ने इस अवसर का लाभ उठाने का निर्णय किया। उसने मारीशस के गवर्नर एडमिरल ला बूर्डोने की नौसैनिक सहायता लेकर मद्रास को जल और स्थल दोनों ओर से घेर लिया। 21 सितंबर 1746 ई. को मद्रास ने आत्मसमर्पण कर दिया। यह एक ऐतिहासिक क्षण था- किसी भारतीय या यूरोपीय सत्ता ने पहली बार ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्र पर अधिकार किया था।

किंतु इसी समय एक आंतरिक विवाद उत्पन्न हुआ। एडमिरल ला बूर्डोने ने डूप्ले से परामर्श किए बिना ही अंग्रेजों से गुप्त रूप से एक समझौता कर लिया और रिश्वत लेकर मद्रास उन्हें वापस करने की योजना बनाई। डूप्ले किसी भी कीमत पर मद्रास का कब्जा नहीं छोड़ना चाहता था। ला बूर्डोने बरसात आने पर अपने बेड़े के साथ मॉरीशस लौट गया और डूप्ले ने अक्टूबर 1746 ई. में पुनः मद्रास पर पूरा अधिकार स्थापित कर लिया। अंग्रेज कैदियों को पांडिचेरी ले जाया गया।

कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता (Anglo-French Rivalry in Karnataka)
कर्नाटक युद्ध

सेंट टोमे का युद्ध: यूरोपीय सैन्य श्रेष्ठता का पहला प्रमाण

इसी बीच एक महत्त्वपूर्ण घटना घटी जिसने भविष्य के भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। जब फ्रांसीसियों ने मद्रास जीत लिया तो अंग्रेजों ने कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन से सहायता माँगी। नवाब ने डूप्ले को मद्रास का घेरा उठाने का आग्रह किया। डूप्ले ने नवाब को मद्रास देने का लालच दिया, परंतु बाद में वादे से मुकर गया। नवाब ने अपनी सेना भेजी। कैप्टन पेराडॉ के अधीन एक छोटी-सी फ्रांसीसी सेना ने महफूज खाँ के नेतृत्व में नवाब की विशाल भारतीय सेना को अडयार नदी के किनारे सेंट टोमे के युद्ध (नवंबर 1746 ई.) में बुरी तरह पराजित कर दिया। इस युद्ध से एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सत्य उजागर हुआ जिसका भारतीय इतिहास पर सुदीर्घ प्रभाव पड़ा- एक छोटी-सी अनुशासित यूरोपीय सेना भी अत्याधुनिक हथियारों और युद्धनीति के बल पर अत्यंत बड़ी भारतीय सेना को पराजित कर सकती है।

डूप्ले ने मद्रास पर अधिकार के बाद फोर्ट सेंट डेविड किले पर भी आक्रमण किया जो पांडिचेरी से मात्र 18 मील दूर था, परंतु वह उसे जीत नहीं सका। उधर अंग्रेजों ने भी रियर एडमिरल बोस्कावेन के नेतृत्व में 1748 ई. में पांडिचेरी पर आक्रमण किया, किंतु वे भी असफल रहे। अंततः यूरोप में 1748 ई. में एक्स-ला-शापेल की संधि के द्वारा ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्ध समाप्त हुआ और उसके प्रभाव में प्रथम कर्नाटक युद्ध भी थम गया। दोनों कंपनियों ने एक-दूसरे के जीते हुए क्षेत्र वापस लौटा दिए और मद्रास पुनः अंग्रेजों को मिल गया।

प्रथम कर्नाटक युद्ध में कोई स्पष्ट विजेता नहीं रहा। परंतु इस युद्ध के कई महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले। नौसेना की शक्ति का निर्णायक महत्त्व स्पष्ट हुआ। दोनों यूरोपीय शक्तियों को भारतीय राजनीतिक दुर्बलता और खोखलेपन का पूरी तरह ज्ञान हो गया। इसके बाद से दोनों कंपनियों में भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करके अपना साम्राज्य स्थापित करने की महत्त्वाकांक्षा और बलवती होती गई।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749-1754 ई.): उत्तराधिकार संघर्षों में हस्तक्षेप

प्रथम कर्नाटक युद्ध के विपरीत द्वितीय कर्नाटक युद्ध मुख्यतः भारतीय परिस्थितियों का परिणाम था, न कि किसी यूरोपीय संघर्ष की छाया। यह युद्ध ब्रिटिश और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनियों के अस्तित्व से संबंधित था।

कर्नाटक राज्य हैदराबाद के निजाम के अधीन था। 1740 ई. में मराठों ने कर्नाटक पर आक्रमण कर नवाब दोस्त अली को मार डाला और उसके दामाद चंदासाहब को बंदी बनाकर सतारा ले गए। 1743 ई. में निजाम ने अनवरुद्दीन खाँ को कर्नाटक का नवाब नियुक्त किया। 21 मई 1748 ई. को हैदराबाद के निजाम आसफ जाह (निजामुल्मुल्क) की मृत्यु हो गई। उसका पुत्र नासिरजंग उत्तराधिकारी बना, परंतु उसके भांजे मुजफ्फरजंग ने इसे चुनौती दी। इसी प्रकार कर्नाटक में नवाब अनवरुद्दीन को उसके बहनोई चंदासाहब ने चुनौती दी। इस प्रकार हैदराबाद और कर्नाटक दोनों स्थानों पर एक साथ उत्तराधिकार के विवाद उत्पन्न हो गए।

डूप्ले की कूटनीतिक सफलता और फ्रांसीसी प्रभाव का चरमोत्कर्ष

डूप्ले ने इस राजनीतिक अनिश्चितता को फ्रांसीसी प्रभाव विस्तार के सुनहरे अवसर के रूप में देखा। उसने मुजफ्फरजंग और चंदासाहब के साथ गुप्त संधियाँ कीं और उन्हें अपना समर्थन देने का वादा किया। अगस्त 1749 ई. में अंबूर के युद्ध में मुजफ्फरजंग, चंदासाहब और फ्रांसीसी सेनाओं ने मिलकर नवाब अनवरुद्दीन को पराजित करके मार डाला। उसका पुत्र मुहम्मद अली भागकर त्रिचनापल्ली में शरण ली। 1751 ई. तक चंदासाहब कर्नाटक का नवाब बन गया। डूप्ले अपनी राजनीतिक सफलता के चरमोत्कर्ष पर था।

अंग्रेजों ने तत्काल नासिरजंग और मुहम्मद अली का पक्ष लिया। उन्होंने हैदराबाद के निजाम नासिरजंग से मैत्री की और उससे फ्रांसीसी समर्थकों का सफाया करने का अनुरोध किया। परंतु दिसंबर 1750 ई. में नासिरजंग भी एक छोटी लड़ाई में मारा गया। फ्रांसीसियों ने मुजफ्फरजंग को हैदराबाद का सूबेदार घोषित किया। नए निजाम ने डूप्ले को कृष्णा नदी के दक्षिण के समस्त मुगल प्रदेश का गवर्नर नियुक्त किया, उत्तरी सरकारों के कुछ जिले फ्रांसीसियों को दिए और पांडिचेरी के आसपास के क्षेत्र तथा उड़ीसा के तटीय क्षेत्र भी उन्हें प्रदान किए। मुजफ्फरजंग की प्रार्थना पर जनरल बुसी के नेतृत्व में एक फ्रांसीसी सेना हैदराबाद में तैनात की गई। 1751 ई. में मुजफ्फरजंग की मृत्यु के बाद बुसी ने सलाबत जंग को नया निजाम बनवाकर हैदराबाद में फ्रांसीसी प्रभाव को और सुदृढ़ किया। डूप्ले ने लगभग भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य का स्वप्न साकार होते हुए देखा।

अर्काट का घेरा और रॉबर्ट क्लाइव का उदय

परंतु अंग्रेजों ने परिस्थिति को अपने अनुकूल मोड़ने के लिए एक साहसी और चालाक कदम उठाया। एक युवा क्लर्क रॉबर्ट क्लाइव ने, जो बाद में भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का निर्माता बना, यह देखकर कि त्रिचनापल्ली में फ्रांसीसी घेरा तोड़ना कठिन है, एक अप्रत्याशित योजना बनाई। उसने सितंबर 1751 ई. में कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर आक्रमण कर उसे घेर लिया, ताकि चंदासाहब को त्रिचनापल्ली से सेना हटाने पर विवश किया जा सके। चंदासाहब ने 400 सैनिक भेजे, परंतु वे अर्काट को जीत नहीं सके। क्लाइव ने 53 दिनों तक इस घेरे का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया। यह घटना क्लाइव की सैनिक प्रतिभा का पहला उजागर था और फ्रांसीसियों की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा।

1751 ई. में मुजफ्फरजंग भी एक लड़ाई में मारा गया। 1752 ई. में लारेंस के नेतृत्व में एक अंग्रेजी सेना ने त्रिचनापल्ली का घेरा उठाने में सफलता पाई और घेरा डालने वाली फ्रांसीसी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। बाद में 1752 ई. में अंग्रेजों ने चंदासाहब को भी पराजित कर मार डाला।

पांडिचेरी की संधि (1754 ई.)

1754 ई. में पांडिचेरी की संधि के साथ द्वितीय कर्नाटक युद्ध समाप्त हुआ। दोनों कंपनियों ने भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा किया और विजित भू-भाग एक-दूसरे को लौटाए। फ्रांसीसी कंपनी के निदेशकों ने डूप्ले को इस युद्ध के भारी खर्च का जिम्मेदार मानते हुए 1754 ई. में वापस बुला लिया। उसके स्थान पर 1 अगस्त 1754 ई. को जनरल गोडेहू को नया गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया जिसने 1755 ई. में अंग्रेजों से संधि करके स्थिति सामान्य बनाने का प्रयास किया।

यद्यपि इस युद्ध का परिणाम भी पूरी तरह अनिश्चित रहा, किंतु यह निश्चित हो गया कि भारतीय राजनीति में स्थल पर अंग्रेजी शक्ति फ्रांसीसी शक्ति से अधिक प्रभावशाली है और अंग्रेजों का प्रत्याशी मुहम्मद अली कर्नाटक का नवाब बन गया। फ्रांसीसियों को गहरी चोट लगी, परंतु हैदराबाद में बुसी के नेतृत्व में उनकी सेना अभी भी तैनात थी और नए निजाम सालारजंग (सलाबत जंग) से उन्होंने और सुविधाएँ प्राप्त की थीं। पांडिचेरी की संधि से अंग्रेजों को जो भूमि मिली थी उसकी वार्षिक आय केवल एक लाख रुपये थी, जबकि फ्रांसीसियों के पास आठ लाख रुपये वार्षिक आय वाली भूमि थी। किंतु यह भी स्पष्ट हो गया था कि भारतीय राजनीति में कौन अंततः विजयी होगा।

तृतीय कर्नाटक युद्ध (1756-1763 ई.): निर्णायक संघर्ष

तृतीय कर्नाटक युद्ध यूरोप के सप्तवर्षीय युद्ध (1756-1763 ई.) का भारतीय विस्तार था, जिसमें इंग्लैंड और फ्रांस पुनः परस्पर विरोधी खेमों में थे। पांडिचेरी की संधि के बाद दोनों कंपनियाँ अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे के विरुद्ध गतिविधियाँ संचालित करती रही थीं। जब 1756 ई. में यूरोप में युद्ध आरंभ हुआ तो भारत में भी शांति भंग हो गई। इस समय अंग्रेज बंगाल में सिराजुद्दौला को प्लासी के युद्ध (23 जून 1757 ई.) में पराजित कर चुके थे और उनका मनोबल असाधारण रूप से ऊँचा था।

फ्रांसीसी सरकार ने काउंट लाली को अप्रैल 1757 ई. में भारत के लिए रवाना किया। वह अप्रैल 1758 ई. में भारत पहुँचा। 2 जून 1758 ई. को उसने फोर्ट सेंट डेविड पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। इसी समय जनरल बुसी हैदराबाद से आगे बढ़कर उत्तरी सरकारों के अंग्रेजी इलाकों पर आक्रमण कर रहा था। उसने 24 जून 1758 ई. को विजयनगरम के किले पर भी अधिकार किया। अंग्रेजों को लगा कि उनका अस्तित्व ही संकट में आ गया है। इतिहासकार जेम्स मिल ने लिखा : “यदि दुश्मन के पास डूप्ले का नेतृत्व होता तो इस बात की पूरी संभावना थी कि अंग्रेज भारत से ही बाहर हो जाते।”

लाली की रणनीतिक भूल

लाली ने 1758 ई. में मद्रास का भी घेरा डाला, किंतु शक्तिशाली अंग्रेजी सेना के आ जाने से उसे घेरा उठाना पड़ा। अब लाली ने एक घातक भूल की। उसने युद्ध में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए बुसी को हैदराबाद से वापस बुला लिया। यह निर्णय फ्रांसीसियों के लिए आत्मघाती सिद्ध हुआ। बुसी के हटते ही हैदराबाद में फ्रांसीसी प्रभाव समाप्त हो गया। इस अवसर का लाभ उठाते हुए अंग्रेजों ने बंगाल से अपनी सेना उत्तरी सरकार की ओर भेजी, राजमुंदरी और मसुलीपट्टनम पर अधिकार किया और निजाम सलाबत जंग के साथ एक लाभदायक संधि कर ली। एडमिरल पोकॉक के नेतृत्व में अंग्रेजी नौसेना ने काउंट डआश (कॉम्ते द’आशे) के नेतृत्व वाले फ्रांसीसी बेड़े को तीन बार पराजित किया और उसे भारतीय समुद्र से भागने पर विवश किया। नौसेना पर अंग्रेजी नियंत्रण का यह परिणाम यह हुआ कि फ्रांसीसियों को समुद्र से कोई पुनर्आपूर्ति या सहायता नहीं मिल सकी।

वांडीवाश का निर्णायक युद्ध (22 जनवरी 1760 ई.)

तृतीय कर्नाटक युद्ध की सर्वाधिक निर्णायक लड़ाई 22 जनवरी 1760 ई. को वांडीवाश (जिसे वंदवासी भी कहते हैं) में हुई। अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर आयर कूट कर रहे थे और फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व काउंट लाली के हाथ में था। इस युद्ध में अंग्रेजी सेना ने फ्रांसीसी सेना को बुरी तरह पराजित किया। जनरल बुसी को अंग्रेजों ने बंदी बना लिया, यह फ्रांसीसियों के लिए अत्यंत बड़ी क्षति थी क्योंकि बुसी ही उनकी सबसे अनुभवी सैन्य प्रतिभा था।

जनवरी 1761 ई. में अंग्रेजों ने पांडिचेरी का भी घेरा डाला जो आठ महीनों तक चला। 16 जनवरी 1761 ई. को अंग्रेजों ने पांडिचेरी पर अधिकार कर लिया। विजयी अंग्रेजी सेना ने इस फले-फूले शहर को पूरी तरह बर्बाद कर दिया और उसकी समस्त किलेबंदी ध्वस्त कर दी। एक समकालीन विवरण के अनुसार “एक समय फले-फूले और भरे-पूरे इस शहर में एक भी छत सही सलामत नहीं रह गई।” इसके बाद मलाबार तट पर स्थित जिंजी और माही पर भी अंग्रेजों का अधिकार हो गया।

काउंट लाली को फ्रांस वापस भेजा गया, जहाँ उसे इस पराजय का उत्तरदायी ठहराते हुए राजद्रोह के आरोप में मुकदमा चलाया गया और 1766 ई. में उसे मृत्युदंड दे दिया गया। यह घटना फ्रांसीसी औपनिवेशिक इतिहास की सबसे दुखद और विवादास्पद घटनाओं में मानी जाती है।

पेरिस की संधि (1763 ई.)

1763 ई. में पेरिस की संधि के साथ तृतीय कर्नाटक युद्ध औपचारिक रूप से समाप्त हुआ। यह संधि केवल भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसने यूरोप के सप्तवर्षीय युद्ध को भी समाप्त किया और फ्रांस को उत्तरी अमेरिका (कनाडा) जैसे अन्य उपनिवेशों से भी हाथ धोना पड़ा। भारत के संदर्भ में, अंग्रेजों ने चंद्रनगर को छोड़कर शेष वे सभी क्षेत्र, जो फ्रांसीसियों के अधीन 1749 ई. तक थे, वापस कर दिए। ये फ्रांसीसी बस्तियाँ 1947 ई. तक उनके पास बनी रहीं। किंतु उनकी राजनीतिक शक्ति पूरी तरह समाप्त हो गई।

फ्रांसीसी पराजय के कारण

भारत में फ्रांसीसी पराजय के कारण केवल किसी एक कारक में नहीं, बल्कि कई संरचनात्मक और तात्कालिक कारणों के समुच्चय में खोजे जाने चाहिए। सबसे मूलभूत अंतर दोनों कंपनियों की संरचना में था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी एक स्वायत्त, निजी और वित्तीय दृष्टि से सशक्त संस्था थी जो राज्य पर निर्भर नहीं थी। फ्रांसीसी कंपनी पूर्णतः सरकारी संरक्षण पर निर्भर थी और जब भी फ्रांसीसी सरकार यूरोपीय युद्धों में उलझी, भारत में उनकी कंपनी को पर्याप्त सहयोग नहीं मिला।

फ्रांस यूरोप में अपनी स्थल-सीमाओं- इटली, बेल्जियम और जर्मनी की ओर विस्तार की महत्त्वाकांक्षा में उलझा हुआ था और भारत उसके लिए द्वितीयक प्राथमिकता थी। इंग्लैंड एक द्वीपीय राष्ट्र था जिसे यूरोपीय स्थल युद्धों में उतनी ऊर्जा नहीं लगानी पड़ती थी, वह अपनी सारी शक्ति नौसेना और व्यापारिक विस्तार पर केंद्रित कर सकता था।

नौसेना में अंतर निर्णायक था। ब्रिटेन के पास एक स्थायी, विशाल और अनुशासित नौसेना थी जो समुद्री व्यापार मार्गों पर नियंत्रण रखती थी। फ्रांसीसियों के पास कोई स्थायी नौसेना नहीं थी। मारीशस से आने वाले फ्रांसीसी बेड़े ने समस्याएँ पैदा कीं, सहायता नहीं दी। वांडीवाश के युद्ध से पहले ही अंग्रेजी नौसेना ने तीन बार फ्रांसीसी नौसेना को परास्त करके समुद्री मार्ग पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया था।

बंगाल पर अंग्रेजी अधिकार (1757 ई.) ने उन्हें एक अक्षय स्रोत प्रदान किया। बंगाल की असीमित संपदा और मानव संसाधन से लगातार धन और सैनिक मद्रास पहुँचाए जा सकते थे। फ्रांसीसियों के पास ऐसा कोई आधार नहीं था।

काउंट लाली की रणनीतिक भूल- बुसी को हैदराबाद से वापस बुलाना- ने एक ही झटके में हैदराबाद में फ्रांसीसी प्रभाव समाप्त कर दिया और अंग्रेजों के लिए वहाँ प्रभाव जमाने का रास्ता खोल दिया। व्यक्तिगत स्तर पर ला बूर्डोने और डूप्ले के बीच के मतभेद, गोडेहू की संधिवादी नीति और लाली की सामरिक असफलताएँ भी फ्रांसीसी पतन के लिए जिम्मेदार थीं।

डूप्ले : एक महान विफल स्वप्नदृष्टा

जोसेफ फ्रांस्वा डूप्ले का व्यक्तित्व भारत में कर्नाटक युद्धों की कहानी के केंद्र में है। वह 1731 ई. में चंद्रनगर का गवर्नर बना और 1741 ई. में पांडिचेरी का गवर्नर जनरल नियुक्त हुआ, जहाँ वह 1754 ई. तक रहा। वह एक युद्धनेता नहीं था, परंतु असाधारण राजनीतिक दूरदृष्टि और कूटनीतिक प्रतिभा का धनी था।

डूप्ले ने वह समझा जो उस समय किसी भी यूरोपीय ने नहीं समझा था कि आधुनिक यूरोपीय युद्धनीति, उन्नत तोपखाने और अनुशासित सिपाही-सेना के बल पर भारत की परंपरागत और बड़ी सेनाओं को पराजित किया जा सकता है, और भारतीय राजनीति में उत्तराधिकार विवादों में हस्तक्षेप करके यूरोपीय कंपनियाँ भारत में अपना राजनीतिक साम्राज्य स्थापित कर सकती हैं। यह विचार ही आगे चलकर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव बना।

डूप्ले ने 1749-1751 ई. के बीच लगभग असंभव लक्ष्य प्राप्त किया- हैदराबाद और कर्नाटक दोनों में अपने समर्थकों को गद्दी पर बैठाया और कृष्णा नदी के दक्षिण के समस्त मुगल प्रदेश का वस्तुतः स्वामी बन गया। परंतु जब फ्रांसीसी सरकार ने उसकी नीतियों के भारी खर्च से तंग आकर उसे 1754 ई. में वापस बुला लिया, तो डूप्ले का स्वप्न चकनाचूर हो गया। निराश और उपेक्षित डूप्ले की 10 जनवरी 1763 ई. में फ्रांस में अत्यंत दरिद्र अवस्था में मृत्यु हुई।

इतिहास की एक विडंबना यह है कि डूप्ले की दूरदर्शी रणनीति- उत्तराधिकार संघर्षों में हस्तक्षेप, सहायक सेना की नीति, भारतीय शासकों को सशुल्क सैनिक सहायता देना- इसी को अंग्रेजों ने आगे चलकर अपनाया और भारत में एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया। पट्टाभि सीतारमैया के शब्दों में कहें तो “यद्यपि फ्रांसीसी भारतीय साम्राज्य की स्थापना का डूप्ले का स्वप्न साकार नहीं हुआ, तथापि ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य की स्थापना मुख्यतः डूप्ले की दूरदृष्टि के ही आधार पर हुई।”

कर्नाटक युद्धों का ऐतिहासिक महत्त्व और परिणाम

तृतीय कर्नाटक युद्ध के बाद भारत में अंग्रेजों का वर्चस्व निर्विवाद रूप से स्थापित हो गया। उनके यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी समाप्त हो चुके थे। अब उनके सामने केवल भारतीय शक्तियाँ थीं- दक्षिण में मैसूर और उत्तर में मराठे, जो अगले तीन दशकों तक उनकी सबसे बड़ी चुनौती बने।

कर्नाटक युद्धों ने अनेक महत्त्वपूर्ण शिक्षाएँ दीं। सबसे पहले यह सिद्ध हुआ कि नौसेना की श्रेष्ठता भारत जैसे प्रायद्वीपीय देश में निर्णायक महत्त्व रखती है। दूसरे, यह स्पष्ट हुआ कि अनुशासित और आधुनिक हथियारों से लैस एक छोटी यूरोपीय सेना विशाल परंतु असंगठित भारतीय सेना को पराजित कर सकती है। तीसरे, भारतीय शासकों के आपसी विवादों में हस्तक्षेप करके यूरोपीय कंपनियाँ राजनीतिक लाभ उठा सकती हैं, यह नीति आगे चलकर ‘सहायक संधि व्यवस्था’ के रूप में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का मुख्य उपकरण बनी। और चौथी, सबसे महत्त्वपूर्ण शिक्षा यह थी कि किसी भी बाहरी शक्ति के लिए भारत में साम्राज्य स्थापित करना तभी संभव है जब उसके पास वित्तीय स्वायत्तता, स्थायी नौसेना, अनुशासित सेना और एक दीर्घकालीन रणनीतिक दृष्टि हो। अंग्रेजों के पास ये सभी तत्त्व थे; फ्रांसीसियों के पास नहीं। यही भारत में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता के अंत का और ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के आरंभ का वास्तविक रहस्य था।

कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. प्रश्न: कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता क्या थी?

कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता 1746–1763 ई. के बीच अंग्रेजी और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनियों के बीच भारत में राजनीतिक एवं व्यापारिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए हुआ संघर्ष था। इसे मुख्यतः तीन कर्नाटक युद्धों के रूप में जाना जाता है, जो यूरोप में चल रहे ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्ध और सप्तवर्षीय युद्ध के भारतीय विस्तार थे।

2. प्रश्न: प्रथम कर्नाटक युद्ध क्यों हुआ और इसका परिणाम क्या रहा?

प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746–1748 ई.) यूरोप के ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्ध का भारतीय विस्तार था। फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने मद्रास पर अधिकार कर लिया और सेंट टोमे के युद्ध में कर्नाटक के नवाब की सेना को भी पराजित किया। 1748 ई. की एक्स-ला-शापेल की संधि के बाद मद्रास अंग्रेजों को वापस कर दिया गया।

3. प्रश्न: द्वितीय कर्नाटक युद्ध का मुख्य कारण क्या था?

द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749–1754 ई.) मुख्यतः हैदराबाद और कर्नाटक के उत्तराधिकार विवादों में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के हस्तक्षेप के कारण हुआ। फ्रांसीसियों ने मुजफ्फरजंग और चंदासाहब का समर्थन किया, जबकि अंग्रेजों ने नासिरजंग और मुहम्मद अली का साथ दिया। रॉबर्ट क्लाइव द्वारा अर्काट का घेरा इस युद्ध की निर्णायक घटना थी। युद्ध का अंत 1754 ई. की पांडिचेरी की संधि से हुआ।

4. प्रश्न: तृतीय कर्नाटक युद्ध में वांडीवाश के युद्ध का क्या महत्त्व था?

तृतीय कर्नाटक युद्ध (1756–1763 ई.) के दौरान 22 जनवरी 1760 ई. को वांडीवाश का युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेजी सेना ने सर आयर कूट के नेतृत्व में फ्रांसीसी सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया और जनरल बुसी को बंदी बना लिया। इस विजय ने भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को लगभग समाप्त कर दिया।

5. प्रश्न: जोसेफ फ्रांस्वा डूप्ले कौन था और उसका क्या योगदान था?

डूप्ले (1741-1754 ई. तक पांडिचेरी का गवर्नर जनरल) भारत में फ्रांसीसी शक्ति का सबसे महत्त्वाकांक्षी और दूरदर्शी नेता था। उसने सबसे पहले यह समझा कि भारतीय उत्तराधिकार विवादों में हस्तक्षेप करके यूरोपीय कंपनियाँ राजनीतिक सत्ता प्राप्त कर सकती हैं। उसकी यही नीति बाद में अंग्रेजों ने अपनाकर भारत में अपना साम्राज्य स्थापित किया।

6. प्रश्न: कर्नाटक युद्धों में फ्रांस की पराजय के प्रमुख कारण क्या थे?

फ्रांसीसी कंपनी की सरकारी संरक्षण पर निर्भरता, स्थायी नौसेना का अभाव, बंगाल जैसे आर्थिक आधार की कमी, तथा काउंट लाली द्वारा बुसी को हैदराबाद से वापस बुलाने जैसी रणनीतिक भूलें फ्रांसीसी पराजय के प्रमुख कारण थे।

7. प्रश्न: कर्नाटक युद्धों के क्या परिणाम हुए?

1763 ई. की पेरिस की संधि के बाद फ्रांसीसी राजनीतिक शक्ति भारत में सीमित हो गई और उनका प्रभाव मुख्यतः व्यापारिक बस्तियों (जो 1947 ई. तक बनी रहीं) तक रह गया। दूसरी ओर, अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का राजनीतिक एवं सैन्य प्रभाव तेजी से बढ़ा और भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ, जिसके बाद अंग्रेजों का सामना केवल मैसूर और मराठों जैसी भारतीय शक्तियों से रह गया।
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