भारत में हिंद-यवन शासन
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद हिंद-यवन सत्ता का उदय
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बैक्ट्रिया के यूनानी शासकों ने उत्तर-पश्चिमी भारत में प्रवेश किया और हिंद-यवन (इंडो-ग्रीक) सत्ता की स्थापना की। डेमेट्रियस प्रथम प्रमुख प्रारंभिक शासक था, जिसने पंजाब और सिंध के क्षेत्रों तक अपना प्रभाव स्थापित किया। हिंद-यवन शासकों में मिनांडर (मिलिंद) सबसे प्रसिद्ध शासक था, जिसका राज्य उत्तर-पश्चिम भारत से लेकर मथुरा क्षेत्र तक विस्तृत माना जाता है। बौद्ध परंपरा के अनुसार मिनांडर ने भिक्षु नागसेन से गहन दार्शनिक संवाद किया, जो प्रश्नोत्तर मिलिंदपन्हो नामक ग्रंथ में संकलित है।
हिंद-यवन शासकों की सबसे महत्त्वपूर्ण देन उनकी उत्कृष्ट मुद्राएँ थीं, जिन पर यूनानी तथा खरोष्ठी अथवा ब्राह्मी लिपियों का प्रयोग मिलता है। उनके शासन ने भारतीय और यूनानी सांस्कृतिक परंपराओं के बीच संपर्क को व्यापक रूप से बढ़ावा दिया, जिसका प्रभाव आगे चलकर उत्तर-पश्चिम भारतीय कला, विशेषकर गांधार शैली, पर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। हेलियोडोरस, जो हिंद-यवन शासक एंटियालकिडस का राजदूत था, शुंग शासक भागभद्र के दरबार में विदिशा आया और वहाँ प्रसिद्ध गरुड़ स्तंभ स्थापित कराया, जो भारतीय-यूनानी सांस्कृतिक समन्वय का एक अद्भुत प्रतीक बना। पहली शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध तक हिंद-यवन सत्ता का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त हो गया और उत्तर-पश्चिम भारत में अन्य विदेशी शक्तियों, विशेषकर शकों, का प्रभुत्व स्थापित होने लगा।
हिंद-यवन इतिहास के ऐतिहासिक साधन
हिंद-यवन शासकों के इतिहास की पुनर्रचना में साहित्यिक स्रोतों, सिक्कों और पुरातात्विक खोजों से पर्याप्त सहायता मिलती है। पतंजलि के ‘महाभाष्य’ और ‘गार्गी संहिता’ में यवनों के आक्रमण का स्पष्ट उल्लेख है। कालिदासकृत ‘मालविकाग्निमित्र’ से भी पुष्यमित्रकालीन यवन आक्रमण के कुछ महत्त्वपूर्ण विवरण मिलते हैं। इसके साथ ही क्रमदीश्वर के ‘सिद्धांत-कौमुदी’ और बौद्ध ग्रंथों- ‘दिव्यावदान’, ‘ललितविस्तर’, ‘मंजुश्रीमूलकल्प’, ‘मिलिंदपन्हो’ आदि से भी हिंद-यवन शासकों के संबंध में महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। ‘मिलिंदपन्हो’ नामक ग्रंथ से विशेष रूप से मिनेंडर नामक यूनानी शासक के विषय में गहन जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त जस्टिन, स्ट्रैबो, प्लूटार्क आदि यूनानी-रोमन लेखकों के विवरणों और ‘पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ नामक ग्रंथ से भी हिंद-यवन इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।
हिंद-यवन शासकों का इतिहास लिखने में सिक्के अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। इसके पूर्व भारतीय सिक्कों पर केवल देवताओं के चित्र अंकित रहते थे, शासक का नाम या तिथि उत्कीर्ण नहीं की जाती थी। जब उत्तर-पश्चिमी भारत पर बैक्ट्रिया के यूनानी राजाओं का शासन प्रारंभ हुआ, तो सिक्कों पर राजाओं के नाम और उपाधियाँ उत्कीर्ण की जाने लगीं। वास्तव में सिक्कों के इतिहास की दृष्टि से यह काल अभूतपूर्व माना जाता है। सिक्कों की मात्रा से नहीं, अपितु विविध धातुओं और विविध इकाइयों में मिलने वाले सिक्कों से यह संकेत मिलता है कि मुद्रा-प्रणाली उस समय जन-जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुकी थी। इसके अलावा, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) से प्राप्त रेह अभिलेख, बजौर घाटी से प्राप्त एक धातुगर्भ-मंजूषा और खारवेल के हाथीगुम्फा शिलालेख जैसे स्रोतों से भी हिंद-यवन शासकों के इतिहास के पुनर्निर्माण में सहायता मिलती है।
सिकंदर और उसके बाद के साम्राज्य की पृष्ठभूमि
सिकंदर महान् ने अपने पीछे एक विशाल साम्राज्य छोड़ा था, जिसमें मैसेडोनिया, सीरिया, बैक्ट्रिया, पार्थिया, अफगानिस्तान और उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ भाग सम्मिलित थे। इस विशाल साम्राज्य का काफी बड़ा भाग सिकंदर के बाद सेल्यूकस निकेटर के अधीन रहा। यद्यपि अफगानिस्तान और भारत के उत्तर-पश्चिम के भाग उसे चंद्रगुप्त मौर्य को विवश होकर समर्पित करने पड़े, किंतु बैक्ट्रिया पर सेल्यूकस का आधिपत्य निरंतर बना रहा। एंटियोकस द्वितीय (ईसा पूर्व 261–246) के शासनकाल में लगभग ईसा पूर्व 250 के आसपास पार्थिया अर्सेस के नेतृत्व में और बैक्ट्रिया डायोडोटस के नेतृत्व में क्रमशः स्वतंत्र हो गए, जिससे सेल्यूकस साम्राज्य दो भागों में विभाजित हो गया।
एंटियोकस तृतीय का अभियान
सेल्यूकस वंश के शासक एंटियोकस तृतीय (ईसा पूर्व 223–187) ने पार्थिया और बैक्ट्रिया को पुनः अपने अधीन करने का प्रयास किया। उसने पार्थिया पर आक्रमण किया, परंतु इसमें पूर्णतः सफल नहीं हो सका। उसने पार्थियन राजा अर्सेस तृतीय के साथ संधि कर ली और फिर बैक्ट्रिया की ओर आक्रमण किया।
उस समय बैक्ट्रिया की राजगद्दी पर यूथीडेमस प्रथम विराजमान था, जो एक अत्यंत वीर और शक्तिशाली शासक था। लगभग दो वर्ष तक वह निरंतर एंटियोकस के साथ संघर्ष करता रहा और सीरियन सम्राट अंततः उसे पूरी तरह परास्त करने में असफल रहा। अंत में विवश होकर एंटियोकस ने यूथीडेमस के साथ संधि कर ली और इस संधि को सुदृढ़ करने के लिए अपनी पुत्री का विवाह यूथीडेमस के पुत्र डेमेट्रियस के साथ कर दिया, जिससे दोनों राजवंशों के बीच पारिवारिक संबंध भी स्थापित हो गए।
पार्थिया और बैक्ट्रिया के साथ संधि करने के बाद एंटियोकस तृतीय ने लगभग ईसा पूर्व 206 में भारत के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण अभियान का नेतृत्व किया। यह अभियान हिंदुकुश पर्वत को पारकर काबुल घाटी के एक शासक ‘सुभगसेन’ (सोफेगेसनस) के विरुद्ध किया गया था। सुभगसेन को यूनानी इतिहासकार पॉलिबियस ने ‘भारतीयों का राजा’ की उपाधि से संबोधित किया है। संभवतः सुभगसेन द्वारा सांकेतिक समर्पण करने के बाद एंटियोकस 500 हाथी और भारी-भरकम हर्जाने की धनराशि लेकर वापस लौट गया।
डेमेट्रियस: भारत में हिंद-यवन सत्ता का संस्थापक
मुख्य लेख : डेमेट्रियस
सीरियन सम्राट एंटियोकस के साथ संधि और वैवाहिक संबंध स्थापित हो जाने के बाद बैक्ट्रिया के राजवंश की बहुत अधिक उन्नति हुई। उसने आसपास के अनेक प्रदेशों को विजित करके अपने साम्राज्य का व्यापक विस्तार किया। बैक्ट्रिया के इस उत्कर्ष का प्रधान श्रेय डेमेट्रियस को दिया जाता है, जो सीरियन सम्राट एंटियोकस तृतीय का दामाद था। ग्रीक लेखक स्ट्रैबो के अनुसार डेमेट्रियस और मिनेंडर के समय बैक्ट्रिया के यवन राज्य की सीमाएँ अत्यंत दूर-दूर तक जा पहुँची थीं। उत्तर में चीन की सीमा से लेकर दक्षिण में सौराष्ट्र तक इन बैक्ट्रियन राजाओं का साम्राज्य विस्तृत था। बैक्ट्रिया के राजाओं के सिक्के बड़ी संख्या में भारत और अन्य पड़ोसी देशों में भी प्राप्त हुए हैं।
डेमेट्रियस, जिसकी सिक्कों पर गढ़ी हुई हाथी-टोपी भारत पर उसके अधिकार का प्रतीकात्मक सूचक मानी जाती है, हिंद-यूनानी शासक था, जो अपने पिता यूथीडेमस की मृत्यु के बाद बैक्ट्रिया के यवन राज्य का उत्तराधिकारी हुआ। सिकंदर के बाद डेमेट्रियस संभवतः पहला यूनानी शासक था, जिसकी सेना ने भारतीय सीमा में प्रवेश किया। उसने एक विशाल सेना के साथ लगभग ईसा पूर्व 183 के आसपास हिंदुकुश पर्वत को पारकर सिंधु और पंजाब पर अधिकार कर लिया। ग्रीक विवरणों में उसे भारत का राजा कहा गया है, और इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की विजय करते हुए वह दूर मध्यदेश तक चला आया था। इस समय भारत में संभवतः मौर्य वंश का ही शासन विद्यमान था। सिकंदर के आक्रमण के समय पंजाब में कठ, मालव, क्षुद्रक आदि जो शक्तिशाली गणराज्य विद्यमान थे, इस समय तक वे अपनी स्वतंत्रता खो चुके थे और उनकी सैन्य शक्ति भी लगभग नष्ट हो चुकी थी। यवनों के आक्रमण को रोकने का उत्तरदायित्व अब उन परवर्ती मौर्य सम्राटों पर था, जिन्हें भारतीय साहित्य में अधार्मिक और प्रज्ञादुर्बल कहा गया है। ये सम्राट यवनों का प्रभावी मुकाबला कर सकने में सर्वथा असमर्थ रहे।
डेमेट्रियस के भारतीय अभियान की पुष्टि पतंजलि के महाभाष्य, गार्गी संहिता और ‘मालविकाग्निमित्रम्’ से पर्याप्त रूप से होती है। पतंजलि ने महाभाष्य में ‘अरुणद् यवनः साकेतम्, अरुणद् यवनः माध्यमिकाम्’ लिखकर जिस यवन आक्रमण का संकेत किया है, वह संभवतः डेमेट्रियस का ही आक्रमण था, जो उस समय (ईसा पूर्व 185 के आसपास) हुआ, जबकि अंतिम मौर्य राजा बृहद्रथ मगध के राजसिंहासन पर आरूढ़ था। ऐसा माना जाता है कि सेनानी पुष्यमित्र ने सेना के समक्ष ही उसकी हत्या करके स्वयं राज्य प्राप्त कर लिया, जिसका एक संभावित कारण यह भी था कि यवन आक्रमण का प्रभावी मुकाबला न कर सकने के कारण सेना और जनता, दोनों ही, बृहद्रथ के विरुद्ध होती जा रही थीं।
काशीप्रसाद जायसवाल जैसे कुछ इतिहासकारों के अनुसार कलिंगराज खारवेल के हाथीगुम्फा शिलालेख में भी डेमेट्रियस के आक्रमण का उल्लेख मिलता है। लेख में दिमित (डेमेट्रियस) की सेना सहित उपस्थिति पाटलिपुत्र से लगभग 70 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित राजगृह में बताई गई है। यद्यपि अनेक इतिहासकार इस पाठ को अत्यंत संदिग्ध मानते हैं, किंतु हाथीगुम्फा लेख में एक ऐसे यवन राजा का उल्लेख है, जो खारवेल के आक्रमण की सूचना पाकर घबराकर मथुरा की दिशा में भाग गया था। यह संभव है कि यह यवन राजा डेमेट्रियस ही रहा हो। किंतु डेमेट्रियस के आक्रमण की सटीक तिथि और खारवेल के काल-निर्धारण जैसे विषयों पर इतिहासकारों में आज भी पर्याप्त मतभेद बना हुआ है।
अनेक इतिहासकारों का यह भी मत है कि गार्गी संहिता के युगपुराण खंड में जिस यवन राजा के आक्रमण का उल्लेख है, और जो मथुरा, पांचाल और साकेत की विजय करता हुआ पाटलिपुत्र तक जा पहुँचा था, वह यही दिमित अथवा डेमेट्रियस था। यद्यपि गार्गी संहिता में इस यवन आक्रमण का उल्लेख मौर्य राजा शालिशुक के वृत्तांत के साथ किया गया है, परंतु यह भी संभव है कि यह डेमेट्रियस के ही आक्रमण का संकेत करता हो। डेमेट्रियस शायद मगध अथवा मध्य देश में कलिंग नरेश खारवेल की बढ़ती सैन्य-शक्ति के कारण स्थायी रूप से नहीं टिक सका।
डेमेट्रियस के भारतीय आक्रमण के संबंध में कतिपय अन्य महत्त्वपूर्ण निर्देश भी उपलब्ध हैं। क्रमदीश्वर के सिद्धांत-कौमुदी में ‘दत्तमित्री’ नामक एक नगर का उल्लेख मिलता है, जो सिंधु-सौवीर घाटी में स्थित था। संभवतः यह दत्तमित्री नगरी डेमेट्रियस के द्वारा ही बसाई गई थी। काशीप्रसाद जायसवाल गार्गी संहिता के युगपुराण में उल्लिखित धर्मगीत नामक एक यवन राजा की पहचान डेमेट्रियस अथवा दिमित्र से करते हैं। इस प्रकार डेमेट्रियस ने पश्चिमोत्तर भारत में हिंद-यूनानी सत्ता की सुदृढ़ स्थापना की और साकल को अपनी राजधानी बनाया। उसने भारतीय राजाओं की परंपरागत उपाधि धारण करते हुए यूनानी और खरोष्ठी लिपि, दोनों में सिक्के भी चलवाए, जो उसकी द्विसांस्कृतिक प्रशासनिक नीति का स्पष्ट परिचायक है।
यूनानी लेखक स्ट्रैबो के विवरणों से पता चलता है कि डेमेट्रियस के भारत आक्रमण में मिनेंडर (मिलिंद) उसका महत्त्वपूर्ण सहयोगी था। स्ट्रैबो के अनुसार इन विजयों का लाभ कुछ मिनेंडर ने और कुछ डेमेट्रियस ने प्राप्त किया था। इससे डब्ल्यू.डब्ल्यू. टार्न जैसे इतिहासकारों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि मिनेंडर और डेमेट्रियस ने एक ही समय में सम्मिलित रूप से भारत पर आक्रमण किया था और मिनेंडर आरंभ में डेमेट्रियस का ही सेनापति था। कालांतर में मिनेंडर ने भी अपना पृथक और पूर्णतः स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया।
युक्रेटाइडीज और बैक्ट्रिया में सत्ता-परिवर्तन
मुख्य लेख : युक्रेटाइडीज
जिस समय डेमेट्रियस और मिनेंडर भारत विजय में सक्रिय रूप से संलग्न थे, ठीक उसी समय उनके अपने मूल देश बैक्ट्रिया में उनके विरुद्ध एक बड़ी क्रांति हो गई और युक्रेटाइडीज नामक एक महत्वाकांक्षी सेनापति ने लगभग ईसा पूर्व 171 के आसपास बैक्ट्रिया के राजसिंहासन पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया। टार्न के अनुसार यह युक्रेटाइडीज संभवतः सीरियन सम्राट एंटियोकस चतुर्थ का भाई था। इस विद्रोह की सूचना मिलते ही डेमेट्रियस तुरंत भारत से बैक्ट्रिया की ओर वापस गया और लगभग चार महीने के दीर्घकालिक घेरे के बावजूद उसे युक्रेटाइडीज के विरुद्ध युद्ध में कोई निर्णायक सफलता नहीं मिल सकी।
इसके बाद डेमेट्रियस और मिनेंडर दोनों का ही बैक्ट्रिया के साथ कोई सीधा राजनीतिक संबंध नहीं रह गया, और वे उत्तर-पश्चिमी भारत में ही दो पृथक स्वतंत्र राजाओं की भाँति शासन करने लगे। इन दोनों यवन राजाओं के राज्यों में कौन-कौन से प्रदेश उनके प्रत्यक्ष अधीन थे, इसका आज भी निश्चित रूप से निर्धारण करना अत्यंत कठिन है।
डेमेट्रियस के समान ही बैक्ट्रिया के इस नए यवन राजा युक्रेटाइडीज ने भी भारत पर आक्रमण किए। ग्रीक लेखकों के विवरणों के अनुसार उसने भारत में लगभग 1,500 नगरों को जीतकर अपने अधीन कर लिया था। जस्टिन के अनुसार भी उसने भारत (सिंधु प्रदेश) की सफल विजय की थी। स्ट्रैबो के अनुसार युक्रेटाइडीज झेलम नदी तक आगे बढ़ आया था। संभवतः युक्रेटाइडीज ने उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ प्रदेशों को जीत लिया था और उसके आक्रमणों के कारण ही डेमेट्रियस और मिनेंडर के हाथ से पश्चिमी पंजाब और गंधार के प्रदेश निकल गए थे। युक्रेटाइडीज के सिक्के पश्चिमी पंजाब से बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं, जिन पर यूनानी और खरोष्ठी, दोनों लिपियों में लेख अंकित मिलते हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि ये सिक्के विशेष रूप से पश्चिमोत्तर प्रदेश में प्रचलन के उद्देश्य से ही ढाले गए थे।
युक्रेटाइडीज की भारतीय क्षेत्रों की विजयों के परिणामस्वरूप पश्चिमोत्तर भारत में दो पृथक यवन-राज्य स्थापित हो गए—एक तो युक्रेटाइडीज और उसके वंशजों का राज्य, जो बैक्ट्रिया से झेलम तक फैला था और जिसकी राजधानी तक्षशिला थी, और दूसरा यूथीडेमस के वंशजों का राज्य, जो झेलम से मथुरा तक विस्तृत था और जिसकी राजधानी साकल (स्यालकोट) थी।
युक्रेटाइडीज बहुत दिनों तक अपने विजित राज्य का सुख नहीं भोग सका। कहा जाता है कि अपोलोडोटस (ईसा पूर्व लगभग 175–156) युक्रेटाइडीज का पुत्र था, जिसने अपने ही पिता की क्रूरतापूर्वक हत्या करके उसके रक्त पर अपना रथ चलाया और उसके शव का विधिवत अंतिम संस्कार भी नहीं करने दिया। अपोलोडोटस ने बाद में अपने नाम के स्वतंत्र सिक्के भी चलाए। कुछ इतिहासकारों के अनुसार अपोलोडोटस युक्रेटाइडीज का पुत्र नहीं, बल्कि उसका राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी था।
जस्टिन के अनुसार युक्रेटाइडीज के पुत्र हेलियोक्लीज ने बैक्ट्रिया लौटते समय उसकी हत्या की थी। हेलियोक्लीज बैक्ट्रिया का अंतिम यवन राजा सिद्ध हुआ। उसके शासनकाल में मध्य एशिया से आए शकों ने बैक्ट्रिया पर आक्रमण करके वहाँ से यवन-सत्ता का पूर्णतः अंत कर दिया। यद्यपि शकों के इन आक्रमणों के कारण बैक्ट्रिया से युक्रेटाइडीज के राजवंश का उन्मूलन हो गया था, किंतु उसके साम्राज्य के भारतीय प्रदेश बाद में भी हेलियोक्लीज की अधीनता में बने रहे और वे स्वतंत्र राजा के रूप में शासन करते रहे। बैक्ट्रिया हाथ से पूर्णतः निकल जाने के बाद भी कम से कम 35 यवन राजाओं के सिक्के इस भारतीय प्रदेश से प्राप्त हुए हैं, जो यह दर्शाता है कि यहाँ यवन राज्य विखंडित रूप में लंबे समय तक बना रहा। प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में अंततः कुषाण आक्रांताओं ने इन सभी छोटे-छोटे यवन राज्यों को अपने अधीन कर लिया।
मिनेंडर (मिलिंद) : प्रसिद्ध हिंद-यवन शासक
हिंद-यवन शासकों में सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे प्रसिद्ध शासक मिनेंडर (लगभग ईसा पूर्व 165–130) था, जो बौद्ध साहित्य में ‘मिलिंद’ के नाम से विख्यात हुआ। यह संभवतः डेमेट्रियस के ही वंश से संबंधित था। क्लासिकल लेखकों ने मिनेंडर के साथ-साथ अपोलोडोटस का भी नामोल्लेख किया है, जो डेमेट्रियस का छोटा भाई था और उसके साथ भारत पर आक्रमण में सक्रिय रूप से भाग लिया था। यह भी संभव है कि डेमेट्रियस के बाद उसने कुछ समय के लिए स्वतंत्र शासन भी किया हो, किंतु उसके शासनकाल के विषय में अधिक विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।
स्ट्रैबो, जस्टिन और प्लूटार्क जैसे क्लासिकल यूनानी-रोमन लेखकों ने मिनेंडर की गणना महान यवन विजेताओं में की है। स्ट्रैबो लिखता है कि उसने स्वयं सिकंदर से भी अधिक प्रदेश जीते थे और हाइफेनस (व्यास) नदी पार करके ‘इसेमस’ (कालिंदी अथवा यमुना नदी, जिसे प्राचीन साहित्य में ‘इक्षुमती’ कहा गया है) तक जा पहुँचा था। शिवकोट (बजौर घाटी) से प्राप्त एक धातुगर्भ-मंजूषा पर मिनेंडर का नाम स्पष्ट रूप से अंकित है। मिनेंडर के सिक्के काबुल से लेकर मथुरा और बुंदेलखंड तक व्यापक रूप से मिले हैं। पेरिप्लस के अनुसार मिलिंद के सिक्के भड़ौच के बाजारों में भी उस समय बहुतायत से प्रचलित थे।
पतंजलि के महाभाष्य में उल्लेख है कि यूनानियों ने अवध में साकेत और राजस्थान में चित्तौड़ के निकट माध्यमिका का घेरा डाला। गार्गी संहिता के युगपुराण खंड से पता चलता है कि दुष्ट, वीर यवनों ने साकेत, पांचाल (गंगा-यमुना दोआब) और मथुरा को जीतकर पाटलिपुत्र तक धावा बोला, किंतु घरेलू युद्धों के कारण वे तुरंत वापस लौट आए। यह संभव है कि गार्गी संहिता में जिस दुरात्मा वीर यवन राजा द्वारा प्रयाग पर अधिकार करके कुसुमपुर अर्थात् पाटलिपुत्र में भय उत्पन्न करने का उल्लेख है, वह मिलिंद ही रहा हो। उसके विविध प्रकार के बहुत से सिक्के उत्तर भारत के विस्तृत क्षेत्रों में, यहाँ तक कि यमुना के दक्षिणी भाग से भी प्राप्त हुए हैं। मथुरा से उसके तथा उसके पुत्र स्ट्रैटो प्रथम के सिक्के भी मिले हैं, जो उसके वंश की दीर्घकालिक निरंतरता का प्रमाण है।
पुरातात्त्विक साक्ष्यों से भी इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि गंगा घाटी में ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के मध्य में एक बड़ा विध्वंस हुआ था। इसकी पुष्टि रेह (फतेहपुर) से प्राप्त एक संक्षिप्त अभिलेख से भी होती है, जिसमें मिनेंडर का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इससे यह स्पष्ट है कि मिनेंडर एक विस्तृत साम्राज्य का स्वामी था, जो झेलम से मथुरा तक फैला हुआ था। इसकी राजधानी साकल (स्यालकोट) थी, जो उस समय शिक्षा और व्यापार का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र थी और पाटलिपुत्र के समान ही समृद्ध मानी जाती थी। मिलिंदपन्हो के अनुसार ‘यह नगर अनेक आरामों, उद्यानों और तड़ागों से सुशोभित था, नगर के चारों ओर सुदृढ़ प्राचीर और परिखा (खाई) बनवाई गई थी।’
कुछ इतिहासकारों का विचार है कि मिनेंडर ने युक्रेटाइडीज के वंशजों से भी कुछ प्रदेशों को छीन लिया था, क्योंकि काबुल घाटी और सिंधु क्षेत्र से भी उसकी मुद्राएँ प्राप्त होती हैं। मिनेंडर के सिक्के गुजरात, काठियावाड़ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भी पाए गए हैं। उसके कुल पाँच प्रकार के चाँदी के सिक्के मिलते हैं, जिनकी तौल लगभग 32-35 रत्ती के बीच है। मुख भाग पर मुकुट धारण किए हुए राजा का सिर और यूनानी विरुद के साथ उसका नाम अंकित मिलता है, और पृष्ठ भाग पर खरोष्ठी लिपि में मुद्रालेख ‘महरजस पतरस मिलिंद्रस’ उत्कीर्ण है। मिनेंडर के कुछ ताँबे के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं, जिन पर यूनानी और प्राकृत भाषा में ‘महरजस ध्रामिकस मिनिंद्रस’, ‘बेसिलियस सोटेरस मिनिंद्राय’, ‘बेसिलियम डिकेआय मिनिंद्राय’ आदि विभिन्न विरुद अंकित हैं।
मिनेंडर का प्रशासन और बौद्ध धर्म से संबंध
मिनेंडर (मिलिंद) ने भारत में अपनी सीमाओं के निरंतर विस्तार के साथ-साथ प्रशासन को भी पर्याप्त स्थायित्व प्रदान किया। वह अपने विशाल साम्राज्य का शासन राज्यपालों की सक्षम सहायता से संचालित करता था। शिवकोट धातुगर्भ-मंजूषा लेख में वियकमित्र और विजयमित्र नामक उसके दो राज्यपालों का उल्लेख मिलता है, जो स्वात घाटी में शासन-संचालन करते थे।
मिनेंडर प्रथम हिंद-यूनानी शासक था, जिसने बौद्ध धर्म को व्यक्तिगत रूप से अपनाया और उसे राजकीय संरक्षण भी प्रदान किया। मिनेंडर का समीकरण मिलिंद से किया जाता है, जिसका विस्तृत उल्लेख आचार्य नागसेन ने मिलिंदपन्हो में किया है। मिलिंदपन्हो के अनुसार मिनेंडर का जन्म अलसंद (काबुल के समीप स्थित सिकंदरिया) के कलसी नामक ग्राम में हुआ था। बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार भारत में राज्य करते हुए वह बौद्ध श्रमणों के निकट संपर्क में आया और आचार्य नागसेन से उसने बौद्ध धर्म की विधिवत दीक्षा ग्रहण की। मिलिंदपन्हो में उसके बौद्ध धर्म को स्वीकार करने और भिक्षु नागसेन के साथ हुए गहन संवादात्मक प्रश्नोत्तर का विस्तृत विवरण मिलता है। कहा जाता है कि अपने जीवन के अंतिम चरण में मिनेंडर अपने पुत्र के पक्ष में सिंहासन त्यागकर स्वयं अर्हत् पद को प्राप्त हो गया था।
क्षेमेंद्रकृत अवदानकल्पलता से यह पता चलता है कि मिनेंडर ने अनेक बौद्ध स्तूपों का निर्माण भी करवाया था। प्लूटार्क के अनुसार उसकी मृत्यु के बाद विभिन्न नगरों ने उसके अस्थि-अवशेषों को प्राप्त करने के लिए होड़ लगाई और उन पर बड़े-बड़े स्तूप बनवाए गए, जो एक बौद्ध सम्राट को दी जाने वाली सम्मानजनक अंत्येष्टि-परंपरा से मेल खाता है। उसके अनेक सिक्कों पर बौद्ध धर्म के धर्मचक्रप्रवर्तन के प्रतीक ‘धर्मचक्र’ और ‘महरजत ध्रामिकस’ जैसे शब्द अंकित हैं, जो उसके धर्मनिष्ठ बौद्ध होने के सबल प्रमाण माने जाते हैं। टार्न के अनुसार मिनेंडर का बौद्ध धर्म की ओर झुकाव मुख्यतः राजनीतिक कारणों से भी प्रेरित था, ताकि वह अपनी विजित भारतीय प्रजा के बीच स्वीकार्यता प्राप्त कर सके। गोवर्धन राय शर्मा के अनुसार मिनेंडर के नाम का उल्लेख रामायण में ‘कर्दम’, भागवत पुराण में ‘पुष्पनिंद्र’, विष्णु पुराण में ‘अलिंदिभ’, दिव्यावदान में ‘यक्षकृमिश’, आर्यमंजुश्रीमूलकल्प में ‘महायक्ष’ और तारानाथ के विवरण में ‘मिनार’ के रूप में विभिन्न प्रकार से हुआ है।
प्लूटार्क अपने विवरण में लिखता है कि मिलिंद अत्यंत न्यायप्रिय, विद्वान और जनप्रिय शासक था। वह विद्वानों का उदार संरक्षक और विद्या तथा कला का सच्चा प्रेमी था। मिलिंदपन्हो के अनुसार उसे इतिहास, पुराण, ज्योतिष, न्याय-वैशेषिक, दर्शन, तर्कशास्त्र, सांख्य, योग, संगीत, गणित, काव्य आदि विभिन्न विद्याओं का गहन ज्ञान प्राप्त था। उसकी राजधानी ‘साकल’ सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ-साथ व्यापार-वाणिज्य का भी एक प्रमुख केंद्र थी। इस प्रकार मिनेंडर ने विदेशी होकर भी भारतीय धर्म को सहर्ष स्वीकार किया, जो उसकी असाधारण सहिष्णुता और सांस्कृतिक खुलेपन का सुंदर परिचायक है।
मिनेंडर की मृत्यु के समय उसका पुत्र स्ट्रैटो प्रथम अभी अवयस्क ही था, इसलिए उसकी पत्नी एगथोक्लिया (एगथोल्किया) ने कुछ समय तक शासन-सूत्र अपने हाथों में संभाला और पुत्र के साथ मिलकर संयुक्त रूप से सिक्के भी प्रचलित करवाए। स्ट्रैटो प्रथम का उत्तराधिकारी स्ट्रैटो द्वितीय हुआ। इन दोनों के शासनकाल में ही यूथीडेमस साम्राज्य का धीरे-धीरे पतन होता चला गया।
भारत में यवन राज्य का पतन और अंत
भारत में यवन राज्य दीर्घकाल तक स्थिर रूप से नहीं टिक सका, क्योंकि राजनीतिक और भौगोलिक, दोनों ही कारणों से मध्य एशिया के खानाबदोश कबीलों ने, जिनमें सीथियन लोग (शक) भी सम्मिलित थे, बैक्ट्रिया पर आक्रमण बोल दिया। आगे बढ़ते हुए इन सीथियनों ने पहले पार्थिया पर अधिकार किया और फिर प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य तक भारत के हिंद-यवन राज्यों पर भी अपना अधिकार जमा लिया। इस प्रकार क्रमशः भारत के अधिकांश हिंद-यवन क्षेत्रों पर सीथियनों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। इन्हीं सीथियनों को भारतीय साहित्य में ‘शक’ की संज्ञा दी गई है।
हिंद-यवन आक्रमण का भारतीय सभ्यता पर प्रभाव
प्रायः यह कहा जाता है कि भारत पर यूनानी सभ्यता का व्यापक प्रभाव जमाने का जो कार्य स्वयं सिकंदर नहीं कर सका, वह भारत में हिंद-यवन साम्राज्य के स्थापित होने से काफी हद तक पूर्ण हो गया। स्मिथ और टार्न जैसे प्रसिद्ध इतिहासकारों ने भारत पर यूनानी प्रभाव को अपेक्षाकृत नगण्य माना है। उनके अनुसार देश के अंदरूनी भागों पर डेमेट्रियस, युक्रेटाइडीज, मिनेंडर आदि के आक्रमण मूलतः अल्पकालिक थे, और उनसे भारत की मूल संस्कृति पर कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ा। उनके अनुसार भारतीय जनसाधारण विजेताओं के रूप में सिकंदर, मिनेंडर आदि से आतंकित अथवा प्रभावित अवश्य थे, किंतु सांस्कृतिक दृष्टि से वे उनके लिए कदापि अनुकरणीय नहीं थे।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि यवन विजेताओं ने अनेक क्षेत्रों में भारत पर अपनी विशिष्ट छाप अवश्य छोड़ी थी। मुस्लिम आक्रमणों से पूर्व के अन्य सभी आक्रांताओं की भाँति यवन भी अंततः भारतीय समाज में समाविष्ट हो गए, किंतु ईसवी सन् के प्रारंभिक काल में भारत पर उनका पर्याप्त सांस्कृतिक प्रभाव विद्यमान था। उन्हें ‘सर्वज्ञ यवन’ (जैसा कि महाभारत में उल्लिखित है) कहकर विशेष सम्मान दिया जाता था। यूनानी चिकित्सकों को अत्यंत ज्ञानी मानकर उनका पर्याप्त आदर किया जाता था। व्यूह-रचना के विशेषज्ञ और युद्ध-मशीनों के डिजाइन बनाने वालों के रूप में यवन इंजीनियरों का संपूर्ण भारत में विशेष सम्मान था। एक ओर जहाँ यूनानी लोगों ने भारतीय धर्म और दर्शन से बहुत कुछ ग्रहण किया, वहीं दूसरी ओर भारतीयों ने भी कला, विज्ञान, मुद्रा-निर्माण, ज्योतिष आदि विभिन्न क्षेत्रों में यूनानियों से महत्त्वपूर्ण प्रेरणा ग्रहण की।
धर्म और दर्शन पर पारस्परिक प्रभाव
धर्म और दर्शन के क्षेत्र में यूनान भारत का विशेष रूप से ऋणी रहा। कई यूनानी राजाओं ने भारतीय धर्म और दर्शन को सहर्ष अपनाया। तक्षशिला के एक यवन राजा एंटियालकिड्स ने हेलियोडोरस नामक अपने राजदूत को काशीपुत्र भागभद्र के दरबार में भेजा था। हेलियोडोरस स्वयं को ‘भागवत’ कहता था और उसने देवों के देव वासुदेव के सम्मान में बेसनगर (विदिशा) में गरुड़ध्वज की स्थापना की थी, जो भागवत धर्म से जुड़े सबसे प्राचीन ज्ञात अभिलेखों में से एक माना जाता है। मिनेंडर स्वयं बौद्ध धर्म का समर्पित अनुयायी बन गया। संभवतः तपस्या और योग की विभिन्न क्रियाएँ यूनानियों ने भारतीयों से ही सीखीं, जो प्राचीन भारतीय अध्यात्म-परंपरा के व्यापक प्रभाव का परिचायक है।
विज्ञान और ज्योतिष पर प्रभाव
भारत भी यवन प्रभाव से पूर्णतः मुक्त नहीं रह सका। विज्ञान के क्षेत्र में भारत स्पष्टतः यूनानियों से प्रभावित रहा है। विज्ञान के क्षेत्र में भारतीयों ने मुक्त भाव से यवनों से शिक्षा ग्रहण की थी। भारतीयों का ध्यान ज्योतिष शास्त्र ने विशेष रूप से आकर्षित किया था। गार्गी संहिता में स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया गया है कि ज्योतिष के क्षेत्र में भारत यूनान का ऋणी है। उसमें लिखा है कि यद्यपि यवन बर्बर हैं, किंतु ज्योतिष के मूल निर्माता होने के कारण वे वंदनीय माने जाने योग्य हैं। प्रसिद्ध खगोलशास्त्री वराहमिहिर ने भी लिखा है कि यद्यपि यूनानी म्लेच्छ हैं, किंतु वे ज्योतिष के गहन विद्वान हैं और इसलिए प्राचीन ऋषियों के समान ही पूज्य हैं।
फलित ज्योतिष का कुछ प्रारंभिक ज्ञान भारतीयों को पहले से ही उपलब्ध था, किंतु नक्षत्रों को देखकर भविष्य बताने की परिष्कृत कला भारतीयों ने यूनानियों से ही सीखी। टार्न के अनुसार भारतीयों ने यूनानियों से ही कैलेंडर प्राप्त किया और निश्चित तिथि से काल-गणना की प्रथा, संवतों का प्रयोग, सप्ताह के सात दिनों का विभाजन, तथा विभिन्न ग्रहों के नाम आदि का ज्ञान भी प्राप्त किया। भारतीय ग्रंथों में ज्योतिष के पाँच प्रमुख सिद्धांतों का वर्णन मिलता है—1. पितामह, 2. वशिष्ठ, 3. सूर्य, 4. पौलिश, 5. रोमक। इनमें अंतिम दो सिद्धांतों का जन्म यूनानी संपर्क से ही हुआ माना जाता है।
पौलिश सिद्धांत मूलतः सिकंदरिया के प्रसिद्ध गणितज्ञ पॉल की खगोलीय खोजों पर आधारित है। रोमक सिद्धांत के संबंध में वराहमिहिर ने जिन नक्षत्रों के नाम गिनाए हैं, वे भी यूनान से ग्रहण किए गए प्रतीत होते हैं।
वराहमिहिर के होरा विषयक ज्ञान पर, जो जन्म-कुंडलियों से संबंधित है, यूनानी खगोलशास्त्र का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। भारतीय ज्योतिष में प्रचलित अनेक तकनीकी शब्द, जैसे—केंद्र, हारिज, लिप्त, द्रकन आदि, यूनानी भाषा से ही लिए गए प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार यूनानी चिकित्साशास्त्री हिप्पोक्रेट्स और भारतीय चिकित्साशास्त्री चरक के चिकित्सा-सिद्धांतों में भी अनेक उल्लेखनीय समानताएँ परिलक्षित होती हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि दोनों परंपराओं के बीच किसी-न-किसी स्तर पर ज्ञान का आदान-प्रदान अवश्य हुआ होगा।
मुद्रा-निर्माण की कला पर प्रभाव
मुद्रा-निर्माण की उन्नत कला में भारतीयों ने यूनानियों से बहुत कुछ ग्रहण किया। यूनानियों के संपर्क से पूर्व भारत में सामान्यतः पंचमार्क और आहत मुद्राएँ ही प्रचलन में लाई जाती थीं। उन पर सामान्यतः कोई मुद्रा-लेख अंकित नहीं होता था। यवनों ने भारत में ऐसी परिष्कृत मुद्राओं का प्रचलन आरंभ किया, जिन पर एक ओर राजा की सजीव आकृति और दूसरी ओर किसी देवता की मूर्ति अथवा कुछ अन्य विशिष्ट चिन्ह अंकित किए जाते थे। कालांतर में भारतीय शासकों ने भी मुद्रा-निर्माण की इस उन्नत प्रणाली को व्यापक रूप से अपनाया। यूनानियों के इस गहरे प्रभाव के कारण भारतीय मुद्राएँ अब सुडौल, लेखयुक्त और अधिक कलात्मक बनाई जाने लगीं। कुषाण सम्राट कनिष्क ने भी आगे चलकर बैक्ट्रिया के यूनानी राजाओं और रोम के सिक्कों की शैली के अनुरूप ही अपने भव्य सिक्के बनवाए।
कला के क्षेत्र में यूनानी प्रभाव
कला के क्षेत्र में यूनानी प्रभाव सर्वथा स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। भारतीय कला की प्रसिद्ध गांधार शैली की नींव इसी हिंद-यवन संपर्क के काल में पड़ी थी। गांधार और मथुरा में निर्मित बुद्ध तथा बोधिसत्वों की मूर्तियों पर यूनानी और रोमन कला का प्रभाव अत्यंत स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है, जिसे कला-इतिहासकार भारतीय-यूनानी शैलीगत समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण मानते हैं।
कुछ विद्वानों के अनुसार भारत के पारंपरिक संस्कृत सुखांत नाटकों पर भी प्राचीन एथेंस के नाटकों का आंशिक प्रभाव माना जाता है। संस्कृत नाटकों में पटाक्षेप (मंच के परदे) के लिए ‘यवनिका’ शब्द का प्रयोग होता है, जो संभवतः यूनानी भाषा से ही ग्रहण किया गया प्रतीत होता है। किंतु केवल ‘यवनिका’ शब्द के आधार पर संपूर्ण संस्कृत नाट्य-परंपरा पर यूनानी प्रभाव को पूर्णतः सिद्ध नहीं किया जा सकता। कुछ विद्वान शूद्रककृत ‘मृच्छकटिक’ की तुलना यूनान की ‘न्यू एटिक कॉमेडी’ शैली से भी करते हैं। संस्कृत शब्दकोश में स्याही, कलम, फलक आदि लेखन-सामग्री के लिए जो शब्द मिलते हैं, वे भी यूनानी भाषा से ही ग्रहण किए गए प्रतीत होते हैं। इस प्रकार सारांशतः यह कहा जा सकता है कि यद्यपि भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्त्व सर्वथा अप्रभावित और मूलतः अपरिवर्तित ही रहे, किंतु इस दीर्घकालिक पारस्परिक संपर्क से भारतीयों और यवनों, दोनों ने ही परस्पर एक-दूसरे से बहुत कुछ लिया और दिया।
हिंद-यवन शासन का समग्र ऐतिहासिक महत्त्व
हिंद-यवन शासन का ऐतिहासिक महत्त्व केवल राजनीतिक विजय-अभियानों तक ही सीमित नहीं था। यह काल भारतीय और यूनानी-हेलेनिस्टिक सभ्यताओं के बीच एक जीवंत सांस्कृतिक सेतु के रूप में भी कार्य करता रहा। यद्यपि हिंद-यवन राजनीतिक सत्ता अंततः क्षणभंगुर सिद्ध हुई और लगभग डेढ़ शताब्दी के भीतर ही यह शक, कुषाण जैसी अन्य विदेशी शक्तियों के समक्ष विलीन हो गई, किंतु इस अवधि में स्थापित हुए सांस्कृतिक, धार्मिक, कलात्मक और वैज्ञानिक आदान-प्रदान के सूत्र आगामी कई शताब्दियों तक भारतीय उपमहाद्वीप की सभ्यता को प्रभावित करते रहे। हेलियोडोरस स्तंभ जैसे अभिलेख इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि विदेशी शासक भी भारतीय धार्मिक परंपराओं के प्रति गहरा आकर्षण और श्रद्धा रखते थे, जबकि गांधार कला-शैली और भारतीय ज्योतिष-गणित पर पड़ा यूनानी प्रभाव इस बात का प्रमाण है कि यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान द्विपक्षीय और परस्पर समृद्धिदायक रहा।


