चीन में नवयुग का आरंभ  (The Beginning of the New Era in China)

चीन में नवयुग का आरंभ  (The Beginning of the New Era in China)

चीन में नवयुग का आरंभ  (1890–1945 ई.)

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चीन के आधुनिक इतिहास में 1850 ई. से 1945 ई. का कालखंड व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक परिवर्तनों का युग रहा, जिसने आधुनिक चीन ई. के निर्माण की नींव  रखी। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में अफीम युद्धों, असमान संधियों तथा विदेशी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप ने किंग (चिंग) राजवंश की शक्ति को कमजोर कर दिया और चीन को गहरे राजनीतिक एवं आर्थिक संकट में धकेल दिया। 1850–1864 ई. के ताइपिंग विद्रोह तथा इसके बाद हुए अनेक जनआंदोलनों ने सामंती शासन की कमजोरियों को उजागर किया और परिवर्तन की आवश्यकता को बल दिया। 1911 ई. की शिंगहाई क्रांति ने लगभग दो हजार वर्ष पुराने राजशाही शासन का अंत कर चीन गणराज्य की स्थापना की, किंतु राजनीतिक अस्थिरता, सैन्य सरदारों का प्रभुत्व तथा विदेशी हस्तक्षेप के कारण देश स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित नहीं कर सका। इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रवादी दल (कुओमिंतांग) और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच संघर्ष तीव्र हुआ, जिसे जापानी आक्रमण और द्वितीय विश्वयुद्ध ने और जटिल बना दिया। अंततः 1949 ई. में माओत्से तुंग के नेतृत्व में जनवादी गणराज्य चीन की स्थापना हुई, जिसने समाजवादी राज्य व्यवस्था की नींव रखी और चीन के राजनीतिक पुनर्गठन की प्रक्रिया प्रारंभ की। इस प्रकार 1850 ई. से 1945 ई. तक का काल चीन के लिए साम्राज्यवादी पतन, राष्ट्रवाद, क्रांति और समाजवादी पुनर्निर्माण का संक्रमणकाल सिद्ध हुआ।

वर्तमान समय में चीन गणना विश्व के प्रमुख विकसित देशों में की जाती है, किंतु इस स्थिति तक पहुँचने के लिए उसे एक दीर्घ एवं जटिल ऐतिहासिक यात्रा से गुजरना पड़ा है। प्राचीन काल में चीन बाहरी संसार से लगभग पृथक रहने वाला देश था। उसकी अपनी विशिष्ट सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक मान्यताएँ तथा राजनीतिक परंपराएँ थीं। विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं की तुलना में चीनी सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका अद्भुत स्थायित्व और निरंतरता रही है। चीनी समाज में सामाजिक अनुशासन, लोककल्याण की भावना तथा परंपराओं के प्रति गहरा सम्मान विद्यमान था। इसी कारण अनेक राजवंशों के उत्थान-पतन के बावजूद चीनी समाज की सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय एकता बनी रही। यद्यपि चीन की सभ्यता भारत, मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं की तुलना में कुछ बाद में विकसित हुई, फिर भी भारत के पश्चात् निरंतर विकसित रहने वाली प्राचीन सभ्यताओं में चीन का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

राजवंशीय व्यवस्था और सांस्कृतिक एकरूपता

चीनी सभ्यता की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि उसने विभिन्न जातीय एवं सांस्कृतिक समूहों को अपने भीतर समाहित कर लिया। उत्तर और पश्चिम से आने वाले अनेक आक्रमणकारी समय के साथ चीनी समाज का अभिन्न अंग बन गए। सांस्कृतिक समन्वय, सामाजिक स्वीकार्यता तथा वैवाहिक संबंधों के माध्यम से उनका विदेशी स्वरूप समाप्त हो गया और वे चीनी संस्कृति में पूर्णतः घुल-मिल गए। परिणामस्वरूप अनेक राजवंशों और जनजातीय शासकों के शासन के बावजूद चीन की सांस्कृतिक एकता अक्षुण्ण बनी रही।

चीन का राजनीतिक इतिहास सामान्यतः ईसा पूर्व सोलहवीं शताब्दी में शांग राजवंश से प्रारंभ माना जाता है। इसके बाद अनेक राजवंशों ने शासन किया और 1644 ई. में मंचू (छिंग) राजवंश की स्थापना हुई। मंचू शासकों के शासनकाल में चीन का बाहरी शक्तियों से व्यापक संपर्क आरंभ हुआ, जिससे आगे चलकर देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन में व्यापक परिवर्तन हुए। यही परिवर्तन आधुनिक चीन के निर्माण की आधारभूमि सिद्ध हुए।

यूरोपीय संपर्क और परिवर्तन की शुरुआत

सत्रहवीं शताब्दी से यूरोपीय शक्तियों का ध्यान चीन की ओर आकर्षित होने लगा था। स्थल मार्ग से रूसियों का आगमन हुआ, जबकि समुद्री मार्ग से स्पेन, हॉलैंड, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, जर्मनी तथा बाद में अमेरिका ने चीन से व्यापारिक संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। इन देशों के आगमन से चीन की राजनीति और अर्थव्यवस्था में धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगे।

यद्यपि चीन लंबे समय तक आत्मनिर्भर और बाहरी प्रभावों से दूर रहा था, किंतु यूरोपीय शक्तियों के आगमन ने उसकी पारंपरिक व्यवस्था को चुनौती दी। विदेशी व्यापार, आधुनिक कूटनीति तथा औद्योगिक उत्पादों के प्रवेश ने चीन की आर्थिक संरचना को प्रभावित किया। कालांतर में इन्हीं परिवर्तनों ने बीसवीं शताब्दी में प्रजातांत्रिक क्रांति तथा समाजवादी व्यवस्था के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।

चीन की एकांतवादी नीति

आधुनिक युग से पूर्व चीन ने स्वयं को बाहरी संसार से लगभग अलग रखा था। उसके निवासी कृषि, हस्तशिल्प तथा स्थानीय उद्योगों में संलग्न रहते थे और विदेशी संपर्क को प्रोत्साहित नहीं करते थे। चीन की विदेश नीति का आधार आत्मनिर्भरता और सीमित संपर्क था। न तो उसके स्थायी राजनयिक प्रतिनिधि अन्य देशों में नियुक्त थे और न ही विदेशी राजदूतों को बीजिंग (पेकिंग) में स्थायी रूप से रहने की अनुमति थी।

किंतु उन्नीसवीं शताब्दी तक विश्व की परिस्थितियाँ बदल चुकी थीं। औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप यूरोपीय देशों को अपने निर्मित माल के लिए नए बाजारों और कच्चे माल के स्रोतों की आवश्यकता थी। ऐसी स्थिति में चीन का एकांतवादी दृष्टिकोण अधिक समय तक टिक नहीं सका और विदेशी शक्तियों का हस्तक्षेप बढ़ने लगा।

यूरोपीय व्यापारिक हस्तक्षेप

उन्नीसवीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के कारण यूरोप के औद्योगिक राष्ट्र एशिया के विशाल बाजारों की ओर आकर्षित हुए। चीन की विशाल जनसंख्या और समृद्ध अर्थव्यवस्था ने उन्हें विशेष रूप से आकर्षित किया। परिणामस्वरूप विदेशी शक्तियों ने व्यापारिक अधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से चीन पर दबाव डालना प्रारंभ किया।

यूरोप में सबसे पहले पुर्तगाल ने चीन के साथ व्यापारिक एवं राजनीतिक संबंध स्थापित किए। 1557 ई. तक पुर्तगाली मकाऊ में अपनी स्थायी व्यापारिक बस्ती स्थापित करने में सफल हो गए। उनकी सफलता से प्रेरित होकर ब्रिटेन, फ्रांस, हॉलैंड तथा अन्य यूरोपीय देशों ने भी चीन में व्यापारिक अधिकार प्राप्त करने का प्रयास किया। धीरे-धीरे विदेशी व्यापारिक प्रतिस्पर्धा तीव्र होती गई और चीन की आर्थिक एवं राजनीतिक संप्रभुता पर संकट उत्पन्न होने लगा।

अफीम व्यापार की पृष्ठभूमि

ब्रिटेन ने चीन के साथ व्यापारिक संबंधों को अपने आर्थिक हितों के अनुरूप विकसित करने का प्रयास किया। उस समय ब्रिटेन में औद्योगिक उत्पादन तेजी से बढ़ रहा था और उसे अपने उत्पादों की बिक्री के लिए नए बाजारों की आवश्यकता थी। दूसरी ओर, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत के विस्तृत क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर चुकी थी। कंपनी ने भारत में बड़े पैमाने पर अफीम की खेती को प्रोत्साहित किया और उसके लिए चीन को सबसे उपयुक्त बाजार माना।

चीन की सरकार ने अफीम को समाज और अर्थव्यवस्था के लिए घातक मानते हुए इसके आयात और व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बावजूद ब्रिटिश व्यापारी तस्करी के माध्यम से अफीम चीन पहुँचाते रहे। अनेक स्थानीय अधिकारियों को रिश्वत देकर यह अवैध व्यापार निरंतर चलता रहा। परिणामस्वरूप चीन से बड़ी मात्रा में सोना और चाँदी ब्रिटेन जाने लगा और चीनी समाज में नशे की समस्या गंभीर रूप धारण करने लगी।

प्रथम अफीम युद्ध (1839–1842 ई.)

मुख्य लेख : अफीम युद्ध

चीन की सरकार ने 1838–39 ई. में अफीम की तस्करी के विरुद्ध कठोर कदम उठाए। सम्राट ने अधिकारी लिन ज़ेश्यू को कैंटन भेजा, जहाँ उन्होंने भारी मात्रा में अफीम जब्त कर नष्ट कर दी। इस घटना से ब्रिटेन अत्यंत असंतुष्ट हुआ और दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया। अंततः 1839 ई. में प्रथम अफीम युद्ध प्रारंभ हुआ, जो 1842 ई. तक चला।

सैन्य दृष्टि से चीन ब्रिटेन की आधुनिक नौसैनिक शक्ति का सामना नहीं कर सका। ब्रिटिश सेना ने अपनी तकनीकी श्रेष्ठता और समुद्री शक्ति के बल पर चीन को पराजित कर दिया। इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि पारंपरिक चीनी सैन्य व्यवस्था आधुनिक यूरोपीय सैन्य शक्ति के सामने टिकने में सक्षम नहीं थी।

नानकिंग की संधि और उसके परिणाम

प्रथम अफीम युद्ध की समाप्ति पर 1842 ई. में चीन और ब्रिटेन के बीच नानकिंग की संधि हुई। यह चीन द्वारा किसी पश्चिमी शक्ति के साथ की गई पहली असमान संधि थी। इस संधि के अनुसार चीन को भारी युद्ध-क्षतिपूर्ति का भुगतान करना पड़ा। इसके अतिरिक्त कैंटन के साथ-साथ अमॉय (श्यामेन), फूझोउ, निंगबो तथा शंघाई सहित पाँच बंदरगाह विदेशी व्यापार के लिए खोलने पड़े। सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त यह थी कि हांगकांग द्वीप स्थायी रूप से ब्रिटेन को सौंप दिया गया। नानकिंग की संधि के बाद चीन को अमेरिका और फ्रांस के साथ भी समान प्रकार की संधियाँ करनी पड़ीं। इन संधियों ने चीन की संप्रभुता को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया तथा विदेशी शक्तियों के लिए उसके द्वार खोल दिए। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया कि चीन अब पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियों के राजनीतिक और आर्थिक हस्तक्षेप से स्वयं को सुरक्षित रखने में सक्षम नहीं रहा था।

ताइपिंग विद्रोह (1851–1864 ई.)

मुख्य लेख : ताइपिंग विद्रोह

प्रथम अफीम युद्ध और नानकिंग की संधि के बाद चीन की मंचू (छिंग) मंचू (छिंग) राजवंश (1644–1911) सरकार की प्रतिष्ठा और शक्ति दोनों कमजोर हो गई थीं। विदेशी हस्तक्षेप बढ़ने के साथ-साथ देश की आर्थिक स्थिति भी अत्यंत दयनीय हो गई। राजस्व की कमी को पूरा करने के लिए सरकार ने जनता पर नए-नए कर लगाए, जिससे किसानों, मजदूरों और निम्न वर्गों में व्यापक असंतोष फैल गया। प्रशासनिक भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता और सामाजिक अन्याय ने विद्रोही भावनाओं को और अधिक प्रबल बना दिया। इन्हीं परिस्थितियों में 1851 ई. में ताइपिंग विद्रोह का आरंभ हुआ, जो चीन के इतिहास का सबसे व्यापक और विनाशकारी जनविद्रोह माना जाता है।

चीन में नवयुग का आरंभ  (The Beginning of the New Era in China)
ताइपिंग विद्रोह
ताइपिंग राज्य की स्थापना

जनवरी 1851 ई. में विद्रोह के नेता होंग श्यूचुआन ने ‘ताइपिंग तियानगुओ’ (ताइपिंग स्वर्गीय साम्राज्य) की स्थापना की घोषणा की। इस आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य मंचू शासन का अंत कर एक नवीन और न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था स्थापित करना था। विद्रोहियों ने शीघ्र ही दक्षिणी चीन के विस्तृत क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया और 1853 ई. में नानकिंग (नानजिंग) पर कब्जा करके उसे अपनी राजधानी बना लिया। इस प्रकार ताइपिंग सरकार ने एक वैकल्पिक शासन व्यवस्था स्थापित कर दी, जिसने मंचू साम्राज्य को गंभीर चुनौती दी।

सामाजिक एवं आर्थिक सुधार

ताइपिंग सरकार को किसानों, मजदूरों तथा निम्न वर्गों का व्यापक समर्थन प्राप्त था। इस समर्थन को सुदृढ़ बनाने के लिए उसने अनेक सामाजिक एवं आर्थिक सुधार लागू किए। भूमि के अधिक समान वितरण का प्रयास किया गया ताकि किसानों को खेती के लिए पर्याप्त भूमि मिल सके। स्त्री और पुरुष को समान अधिकार प्रदान करने की घोषणा की गई तथा महिलाओं की सामाजिक स्थिति सुधारने पर बल दिया गया। इसके अतिरिक्त सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने, प्रशासन में अनुशासन स्थापित करने तथा आर्थिक असमानता को कम करने के उद्देश्य से कई सुधारात्मक कदम उठाए गए। इन सुधारों का उद्देश्य केवल सामाजिक परिवर्तन ही नहीं, बल्कि जनता का विश्वास अर्जित कर मंचू शासन को पूर्णतः समाप्त करना भी था।

विद्रोह का दमन

प्रारंभिक वर्षों में ताइपिंग विद्रोहियों को उल्लेखनीय सफलता मिली और उन्होंने चीन के विशाल भूभाग पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। कुछ समय के लिए ऐसा प्रतीत होने लगा कि मंचू शासन का पतन निश्चित है। किंतु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही। इंग्लैंड और फ्रांस जैसी यूरोपीय शक्तियाँ मंचू शासन के पतन के पक्ष में नहीं थीं, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि ताइपिंग सरकार उनके व्यापारिक और साम्राज्यवादी हितों को स्वीकार नहीं करेगी। परिणामस्वरूप उन्होंने मंचू सरकार को सैन्य सहायता प्रदान की। विदेशी सहयोग और आधुनिक हथियारों के बल पर मंचू सेनाओं ने विद्रोह को दबाना प्रारंभ किया। अंततः 1864 ई. में नानकिंग पर पुनः अधिकार कर लिया गया और ताइपिंग आंदोलन का पूर्णतः दमन कर दिया गया। इसके साथ ही ताइपिंग सरकार द्वारा आरंभ किए गए अधिकांश सुधार भी समाप्त हो गए।

ताइपिंग विद्रोह का प्रभाव

ताइपिंग विद्रोह के दमन के बाद मंचू शासन तो बच गया, किंतु उसकी वास्तविक कमजोरी पूरी दुनिया के सामने उजागर हो चुकी थी। विदेशी शक्तियों को यह स्पष्ट हो गया कि चीन अब अपनी संप्रभुता और राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा करने में सक्षम नहीं है। फलस्वरूप यूरोपीय राष्ट्रों तथा जापान का हस्तक्षेप निरंतर बढ़ने लगा। चीन की आर्थिक और राजनीतिक निर्भरता विदेशी शक्तियों पर बढ़ती गई तथा साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनने लगा। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर चीन-जापान युद्ध का कारण बनीं।

चीन-जापान युद्ध (1894–1895 ई.)

मुख्य लेख : चीन-जापान युद्ध

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यूरोपीय साम्राज्यवाद अपने चरम पर था। औद्योगिक देशों को नए बाजारों और कच्चे माल के स्रोतों की आवश्यकता थी। भारत पहले ही ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ चुका था और अब चीन तथा पूर्वी एशिया के अन्य क्षेत्रों पर विदेशी शक्तियों की दृष्टि केंद्रित हो गई। इस समय कोरिया का राजनीतिक महत्त्व अत्यधिक बढ़ गया था। यद्यपि कोरिया औपचारिक रूप से चीन का अधीनस्थ राज्य था, फिर भी उसके आंतरिक प्रशासन में चीन का हस्तक्षेप सीमित था। दूसरी ओर, तीव्र गति से आधुनिक बन रहे जापान ने कोरिया को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने का प्रयास प्रारंभ कर दिया। कोरिया पर प्रभुत्व स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा ने चीन और जापान के बीच तनाव उत्पन्न कर दिया। अंततः 1894–95 ई. में दोनों देशों के मध्य युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में चीन की पराजय ने उसकी सैन्य और राजनीतिक दुर्बलता को और अधिक स्पष्ट कर दिया। इसके बाद चीन पर यूरोपीय शक्तियों और जापान का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा तथा विदेशी हस्तक्षेप का एक नया युग प्रारंभ हुआ, जिसने आधुनिक चीन के राजनीतिक इतिहास की दिशा को गहराई से प्रभावित किया।

चीन में नवयुग का आरंभ  (The Beginning of the New Era in China)
प्रथम चीन जापान युद्ध
कोरिया में विदेशी हस्तक्षेप

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पूर्वी एशिया साम्राज्यवादी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बन गया। यूरोपीय देशों ने एशिया के अनेक क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था और अब उनकी दृष्टि कोरिया पर केंद्रित हो गई। फ्रांस तथा अमेरिका के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए जापान ने भी 1875 ई. में अपना एक युद्धपोत कोरिया भेजा। कोरियाई तट रक्षकों ने उस पर गोलाबारी की, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव उत्पन्न हो गया। यद्यपि बाद में दोनों के मध्य एक समझौता हो गया, फिर भी जापान ने कोरिया में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास जारी रखा।

1882 ई. में स्थिति पुनः गंभीर हो गई, जब सियोल में जापानी शिष्टमंडल पर आक्रमण कर दिया गया और कई जापानी नागरिक मारे गए। इस घटना के बाद कोरिया की सरकार ने क्षतिपूर्ति के रूप में जापान को सियोल में अपनी सेना रखने की अनुमति दे दी। इस व्यवस्था ने कोरिया में जापानी प्रभाव को स्थायी आधार प्रदान किया और भविष्य के संघर्ष की भूमिका तैयार कर दी।

कोरिया की आंतरिक राजनीति

कोरिया के भीतर भी राजनीतिक मतभेद विद्यमान थे। एक वर्ग का विश्वास था कि देश का आधुनिकीकरण चीन के बजाय जापान के नेतृत्व में अधिक प्रभावी ढंग से हो सकता है। यह प्रगतिशील वर्ग जापान का समर्थक था और उसके माध्यम से प्रशासनिक तथा आर्थिक सुधारों की अपेक्षा करता था।

दूसरी ओर, चीन स्वयं को कोरिया का अधिराज्य मानता था और उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार अपने पास सुरक्षित समझता था। जब कोरिया में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी, तब चीन ने वहाँ अपनी सेना भेज दी। जापान ने भी अपने हितों की रक्षा के लिए सैनिक हस्तक्षेप किया। यद्यपि दोनों देशों के बीच अस्थायी समझौते हुए, किंतु कोरिया पर प्रभुत्व स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं हुई। परिणामस्वरूप दोनों शक्तियों के बीच युद्ध की परिस्थितियाँ निरंतर प्रबल होती गईं।

जापान की साम्राज्यवादी नीति

मेइजी पुनर्स्थापना (1868 ई.) के बाद जापान तीव्र गति से आधुनिक और औद्योगिक राष्ट्र के रूप में विकसित हुआ। औद्योगिक विकास के कारण उसे नए बाजारों, कच्चे माल के स्रोतों तथा सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों की आवश्यकता थी। कोरिया भौगोलिक रूप से जापान का निकटतम पड़ोसी था और उसकी सामरिक स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। जापान का विश्वास था कि यदि कोई शक्तिशाली विदेशी राष्ट्र कोरिया पर अधिकार कर लेता है, तो उसकी सुरक्षा संकट में पड़ सकती है। इसलिए वह कोरिया को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना चाहता था। इसके अतिरिक्त, जापान को कोरिया में अपने औद्योगिक उत्पादों के लिए एक संभावित बाजार भी दिखाई देता था। इस प्रकार आर्थिक हित, राष्ट्रीय सुरक्षा और साम्राज्यवादी विस्तार की नीति—ये सभी कारण जापान को चीन के साथ संघर्ष की ओर ले गए।

चीन की नीति और संघर्ष की अनिवार्यता

चीन पारंपरिक रूप से कोरिया को अपना अधीनस्थ राज्य मानता था और वहाँ अपने राजनीतिक अधिकार बनाए रखना चाहता था। इसलिए उसने जापान की बढ़ती गतिविधियों का विरोध किया। चीन का प्रयास था कि जापान भी कोरिया पर उसके अधिराजत्व को स्वीकार करे, जबकि जापान किसी भी प्रकार के चीनी प्रभुत्व को समाप्त करना चाहता था।

इस प्रकार एक ओर चीन अपने पारंपरिक अधिकारों की रक्षा कर रहा था, वहीं दूसरी ओर जापान कोरिया में अपना प्रभाव स्थापित करने के लिए दृढ़ संकल्पित था। दोनों देशों की परस्पर विरोधी नीतियों ने संघर्ष को अपरिहार्य बना दिया। साथ ही जापान अपनी आधुनिक सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर पश्चिमी देशों को यह भी सिद्ध करना चाहता था कि वह एक सक्षम एवं शक्तिशाली आधुनिक राष्ट्र बन चुका है, जो अपने प्रशासन और विदेशी नीति का संचालन स्वतंत्र रूप से कर सकता है।

युद्ध का प्रारंभ और चीन की पराजय

चीन के अधिकांश राजनीतिज्ञ और अधिकारी यह मानते थे कि युद्ध की स्थिति में जापान को आसानी से पराजित किया जा सकेगा। किंतु वास्तविकता इसके विपरीत थी। मेइजी काल में जापान ने अपनी सेना और नौसेना का व्यापक आधुनिकीकरण कर लिया था तथा उन्हें आधुनिक यूरोपीय सैन्य प्रशिक्षण और हथियारों से सुसज्जित किया था। इसके विपरीत चीन की सेना पारंपरिक संगठन, पुराने हथियारों और कमजोर नेतृत्व से ग्रस्त थी।

1894 ई. में युद्ध प्रारंभ होते ही जापानी सेना ने अपनी सैन्य दक्षता का परिचय दिया और चीन को लगातार पराजित किया। जापान ने कोरिया से चीनी सेनाओं को बाहर निकाल दिया तथा मंचूरिया में प्रवेश कर सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण पोर्ट आर्थर पर अधिकार कर लिया। जापानी सेना की तीव्र प्रगति ने मंचू सरकार को भयभीत कर दिया और जब जापानी सेनाएँ बीजिंग की ओर बढ़ने लगीं, तब चीन ने शांति वार्ता का निर्णय लिया।

लगातार सैन्य पराजयों और भारी क्षति के कारण चीन के सम्राट ने प्रसिद्ध राजनेता ली होंगझांग को जापान के साथ शांति वार्ता का दायित्व सौंपा। युद्ध के प्रारंभिक चरण में असफलताओं के कारण उसे पदावनत कर दिया गया था और उसके सम्मानसूचक अलंकरण भी वापस ले लिए गए थे, किंतु उसकी कूटनीतिक क्षमता और प्रशासनिक अनुभव को देखते हुए पुनः उसे ही वार्ता तथा शांति समझौते का नेतृत्व सौंपा गया। इसी पहल के परिणामस्वरूप आगे चलकर दोनों देशों के बीच शिमोनोसेकी की संधि संपन्न हुई, जिसने पूर्वी एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को मूलतः बदल दिया।

शिमोनोसेकी की संधि (1895 ई.)

1894–95 ई. के चीन-जापान युद्ध में चीन की करारी पराजय ने पूर्वी एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को बदल दिया। जापान की आधुनिक सैन्य शक्ति के सामने मंचू (छिंग) शासन टिक नहीं सका और उसे शांति वार्ता के लिए विवश होना पड़ा। चीन की ओर से वरिष्ठ राजनेता ली होंगझांग ने वार्ता का नेतृत्व किया। परिणामस्वरूप 17 अप्रैल 1895 ई. को जापान के शिमोनोसेकी नगर में दोनों देशों के बीच शिमोनोसेकी की संधि संपन्न हुई। यह संधि चीन के लिए अत्यंत अपमानजनक तथा जापान के लिए एक महत्त्वपूर्ण कूटनीतिक और सामरिक विजय सिद्ध हुई।

संधि की प्रमुख शर्तें

शिमोनोसेकी की संधि के अनुसार चीन ने कोरिया की पूर्ण स्वतंत्रता और उसकी सर्वोच्च संप्रभुता को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही कोरिया पर चीन का सदियों पुराना अधिराजत्व समाप्त हो गया। यद्यपि कोरिया औपचारिक रूप से स्वतंत्र घोषित हुआ, परंतु वस्तुतः वह जापान के प्रभाव क्षेत्र में आ गया। संधि के अंतर्गत चीन ने जापान को कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्र भी सौंप दिए। इनमें लियाओदोंग प्रायद्वीप, फॉर्मोसा (ताइवान) तथा पेस्काडोर (पेंगहू) द्वीपसमूह प्रमुख थे। इन क्षेत्रों पर जापान को पूर्ण प्रभुसत्ता प्रदान की गई। इन क्षेत्रों का सामरिक और आर्थिक महत्त्व अत्यधिक था, जिससे जापान की स्थिति पूर्वी एशिया में और अधिक सुदृढ़ हो गई।

इसके अतिरिक्त, चीन ने जापान को 20 करोड़ कुपिंग तायल की भारी युद्ध-क्षतिपूर्ति देने पर सहमति व्यक्त की। जब तक यह राशि पूरी तरह अदा न हो जाए, तब तक वेईहाईवेई बंदरगाह पर जापानी अधिकार स्वीकार किया गया। यह प्रावधान चीन की आर्थिक निर्भरता और राजनीतिक विवशता का स्पष्ट प्रमाण था।

व्यापारिक सुविधाओं के अंतर्गत चीन को विदेशी व्यापार के लिए अनेक नए बंदरगाह खोलने पड़े। शाशी, चोंगछिंग, सूझोउ तथा हांगझोउ के बंदरगाह विदेशी व्यापार के लिए खोल दिए गए। साथ ही इन बंदरगाहों तक पहुँचने वाले जलमार्ग भी विदेशी जहाजों के आवागमन के लिए उपलब्ध करा दिए गए। इससे विदेशी शक्तियों का चीन के आंतरिक व्यापार पर प्रभाव और अधिक बढ़ गया।

संधि का प्रभाव

शिमोनोसेकी की संधि ने चीन की राजनीतिक और सैन्य कमजोरी को पूरे विश्व के सामने उजागर कर दिया। इसके विपरीत जापान की प्रतिष्ठा एक आधुनिक और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में अत्यधिक बढ़ गई। इस युद्ध ने सिद्ध कर दिया कि एशिया में अब जापान एक नई साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में उभर चुका है। चीन की पराजय ने न केवल उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति को कमजोर किया, बल्कि विदेशी शक्तियों के हस्तक्षेप के लिए भी नए द्वार खोल दिए।

यद्यपि जापान युद्ध में विजयी हुआ था, फिर भी वह अपनी सभी उपलब्धियों का लाभ लंबे समय तक नहीं उठा सका। शिमोनोसेकी की संधि के तुरंत बाद रूस ने यह अनुभव किया कि यदि जापान को लियाओतुंग प्रायद्वीप पर अधिकार मिल गया, तो सुदूर पूर्व में उसकी विस्तारवादी नीति बाधित हो जाएगी। इसलिए रूस ने फ्रांस और जर्मनी के सहयोग से जापान पर दबाव डाला। इतिहास में यह घटना ‘त्रि-शक्ति हस्तक्षेप’ के नाम से प्रसिद्ध है।

रूस, फ्रांस और जर्मनी का तर्क था कि जापान के अधिकार में पोर्ट आर्थर (ल्यूशुन) का चले जाना बीजिंग की सुरक्षा तथा सुदूर पूर्व की शांति के लिए खतरा बन सकता है। इन शक्तियों के संयुक्त दबाव के कारण जापान को लियाओतुंग प्रायद्वीप चीन को वापस करना पड़ा। इसके बदले चीन ने जापान को अतिरिक्त तीन करोड़ कुपिंग तायल क्षतिपूर्ति देने पर सहमति व्यक्त की। यद्यपि यह जापान की तत्कालीन कूटनीतिक पराजय थी, फिर भी उसने महाद्वीपीय विस्तार की अपनी नीति का परित्याग नहीं किया। इसके विपरीत, इस घटना ने जापानी साम्राज्यवाद को और अधिक आक्रामक बना दिया।

चीन-जापान युद्ध का ऐतिहासिक महत्त्व

1894–95 ई. का युद्ध पूर्वी एशिया के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इस युद्ध के साथ चीन की पारंपरिक प्रभुत्व व्यवस्था का अंत हो गया और जापान एक आधुनिक साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में स्थापित हो गया। दूसरी ओर, यूरोपीय शक्तियों ने यह अनुभव किया कि कमजोर मंचू शासन को बनाए रखना उनके आर्थिक और राजनीतिक हितों के लिए अधिक लाभकारी है। इसलिए उन्होंने चीन में अपने प्रभाव और हस्तक्षेप को और अधिक बढ़ा दिया।

चीन में सुधारवादी चेतना का विकास

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों से लेकर 1911 ई. की क्रांति तक का काल चीन के इतिहास में नवजागरण और परिवर्तन का युग माना जाता है। यद्यपि यह अवधि बहुत लंबी नहीं थी, फिर भी इसने चीन की पारंपरिक सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की नींव को हिला दिया। चीन की जनता यह अनुभव करने लगी थी कि केवल परंपराओं के सहारे राष्ट्र की रक्षा संभव नहीं है। जापान के हाथों मिली पराजय और यूरोपीय शक्तियों के निरंतर हस्तक्षेप ने मंचू शासन की अक्षमता को स्पष्ट कर दिया था। परिणामस्वरूप समाज के विभिन्न वर्गों में व्यापक सुधारों की मांग तेज होने लगी।

पाश्चात्य प्रभाव और संवैधानिक आंदोलन

इस समय चीन के शिक्षित वर्ग पर यूरोप और जापान के आधुनिक विचारों का गहरा प्रभाव पड़ रहा था। जापान ने मेइजी पुनर्स्थापना के बाद आधुनिक संविधान, शिक्षा प्रणाली, उद्योग तथा प्रशासनिक सुधारों को अपनाकर उल्लेखनीय प्रगति की थी। आगे चलकर रूस-जापान युद्ध (1904–05 ई.) में जापान की विजय ने एशिया के देशों को यह विश्वास दिलाया कि आधुनिक संस्थाओं और वैज्ञानिक प्रगति के माध्यम से पश्चिमी शक्तियों का सफलतापूर्वक सामना किया जा सकता है। इसी कारण चीन में भी संवैधानिक शासन, आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, विधि व्यवस्था तथा प्रशासनिक सुधारों की मांग तीव्र होने लगी। शिक्षित वर्ग का मत था कि यदि चीन को विदेशी प्रभुत्व से मुक्त होना है, तो उसे पश्चिमी विज्ञान और आधुनिक शासन-पद्धति का अनुसरण करना होगा। इन विचारों ने धीरे-धीरे एक सशक्त सुधारवादी आंदोलन का रूप धारण कर लिया।

डॉ. सन यात-सेन और क्रांतिकारी आंदोलन

मुख्य लेख : डॉ. सन यात-सेन

इस सुधारवादी और राष्ट्रवादी आंदोलन के सबसे प्रमुख नेता डॉ. सन यात-सेन थे। वे मंचू राजवंश के कट्टर विरोधी तथा गणतांत्रिक शासन के समर्थक थे। 1905 ई. में उन्होंने विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों को एकजुट कर तोंगमेंगहुई (चीनी संयुक्त लीग) नामक संगठन की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य मंचू शासन का अंत करके चीन में एक आधुनिक, स्वतंत्र और गणतांत्रिक राज्य की स्थापना करना था।

1905 ई., 1906 ई., 1907 ई. और 1910 ई. के दौरान इस संगठन ने अनेक असफल विद्रोहों का नेतृत्व किया, किंतु इन प्रयासों ने जनता में क्रांतिकारी चेतना का व्यापक प्रसार किया। अंततः यही संगठन 1911 ई. की शिनहाई क्रांति का प्रमुख आधार बना। इस समय तक सुधारवादी आंदोलन को रोकना लगभग असंभव हो चुका था और चीन में राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया निर्णायक चरण में पहुँच गई थी।

चीन में नवयुग का आरंभ  (The Beginning of the New Era in China)
डॉ. सन यात-सेन
विदेशी शिक्षा और नए विचारों का प्रसार

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में बड़ी संख्या में चीनी विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने लगे। इनमें अधिकांश छात्र जापान के विश्वविद्यालयों में अध्ययन करते थे, जहाँ वे आधुनिक राजनीति, विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से परिचित हुए। शिक्षा पूर्ण करने के बाद जब वे चीन लौटे, तो उन्हें सरकारी सेवाओं में पर्याप्त अवसर नहीं मिले, किंतु वे आधुनिक और क्रांतिकारी विचारों के प्रभाव से पूर्णतः प्रेरित थे। इन शिक्षित युवाओं ने चीन में राष्ट्रीय चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश में आधुनिक परिवर्तन की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान की।

कुआंगश्यू के सुधार प्रयास और उनका दमन

1889 ई. में सम्राट कुआंगश्यू और राजमाता साम्राज्ञी सिशी के संरक्षण से मुक्त होकर शासन की बागडोर अपने हाथों में संभाली। उस समय चीन विदेशी हस्तक्षेप, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सैन्य दुर्बलता जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा था। सम्राट कुआंगश्यू यह समझ चुके थे कि यदि चीन को आधुनिक राष्ट्रों की श्रेणी में स्थान प्राप्त करना है, तो व्यापक सुधार अनिवार्य हैं। इसलिए उन्होंने प्रशासन, शिक्षा, विज्ञान, उद्योग, सेना तथा शासन व्यवस्था के आधुनिकीकरण के उद्देश्य से अनेक सुधारात्मक आदेश जारी किए। उनका प्रयास था कि चीन पश्चिमी देशों और आधुनिक जापान की भाँति एक सशक्त एवं प्रगतिशील राष्ट्र बने। इन सुधारों को इतिहास में ‘शत-दिवसीय सुधार’ के नाम से जाना जाता है। इनका उद्देश्य आधुनिक शिक्षा का प्रसार, प्रशासनिक दक्षता, वैज्ञानिक प्रगति तथा आधुनिक सैन्य व्यवस्था की स्थापना था। किंतु ये सुधार अधिक समय तक लागू नहीं रह सके।

साम्राज्ञी सिशी का विरोध

सम्राट कुआंगश्यू के सुधारों का सबसे तीव्र विरोध साम्राज्ञी डाउजर सिशी ने किया। वह पारंपरिक चीनी व्यवस्था की समर्थक थीं और उनका विश्वास था कि पश्चिमी शैली के सुधार चीन की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परंपराओं के लिए घातक सिद्ध होंगे। इसलिए उन्होंने उन सभी रूढ़िवादी अधिकारियों और नेताओं को संरक्षण दिया, जो किसी भी प्रकार के आधुनिकीकरण का विरोध कर रहे थे।

1898 ई. में सिशी ने राजमहल में तख्तापलट कर पुनः सत्ता अपने हाथों में ले ली। सम्राट कुआंगश्यू को नज़रबंद कर दिया गया और उनके द्वारा जारी सभी सुधारात्मक आदेश निरस्त कर दिए गए। सुधारवादी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया तथा अनेक को मृत्युदंड दिया गया। प्रमुख सुधारवादी नेता कांग योवेई और लियांग छीचाओ को देश छोड़कर जापान में शरण लेनी पड़ी। इस प्रकार चीन में शांतिपूर्ण सुधारों की संभावनाएँ समाप्त हो गईं और देश धीरे-धीरे व्यापक क्रांति की ओर बढ़ने लगा।

बॉक्सर विद्रोह (1899–1901 ई.)

मुख्य लेख : बॉक्सर विद्रोह

चीन-जापान युद्ध (1894–95 ई.) में चीन की पराजय के बाद देश में विदेशी शक्तियों का हस्तक्षेप अत्यधिक बढ़ गया। यूरोपीय देशों, रूस, जापान तथा अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों ने चीन में विशेष व्यापारिक अधिकार, रेलमार्ग, खनन क्षेत्र तथा प्रभाव-क्षेत्र स्थापित कर लिए थे। विदेशी मिशनरियों और ईसाई संस्थाओं की गतिविधियाँ भी निरंतर बढ़ रही थीं, जिससे जनता में असंतोष फैलने लगा। दूसरी ओर, सम्राट कुआंगश्यू के सुधारों को रोक दिए जाने के कारण शिक्षित वर्ग और सुधारवादी भी निराश थे। इन्हीं परिस्थितियों में विदेशी प्रभाव और ईसाई मिशनरियों के विरोध में एक उग्र राष्ट्रवादी संगठन का उदय हुआ, जिसे ‘यीहेछुआन’ या पश्चिमी देशों द्वारा ‘बॉक्सर’ कहा गया। इस संगठन का उद्देश्य विदेशी शक्तियों और उनके समर्थकों को चीन से बाहर निकालना था।

चीन में नवयुग का आरंभ  (The Beginning of the New Era in China)
बॉक्सर विद्रोह
विद्रोह के प्रमुख कारण

बॉक्सर विद्रोह के पीछे अनेक कारण थे। चीन-जापान युद्ध में मिली अपमानजनक पराजय ने राष्ट्रीय स्वाभिमान को गहरी ठेस पहुँचाई थी। यूरोपीय शक्तियों द्वारा लगातार नए विशेषाधिकारों और रियायतों की माँग से जनता में आक्रोश बढ़ रहा था। साथ ही पश्चिमीकरण की नीति और विदेशी मिशनरियों की बढ़ती गतिविधियों के कारण परंपरावादी वर्ग भी असंतुष्ट था। आर्थिक कठिनाइयों, प्राकृतिक आपदाओं तथा बेरोजगारी ने भी जनता के असंतोष को और अधिक तीव्र बना दिया। इन सभी परिस्थितियों ने मिलकर बॉक्सर आंदोलन को जन्म दिया।

विद्रोह का विस्तार

1899 ई. से बॉक्सर संगठन ने विदेशी मिशनरियों, ईसाई धर्म अपनाने वाले चीनी नागरिकों तथा विदेशी प्रतिष्ठानों पर हमले प्रारंभ कर दिए। अनेक गिरजाघरों को नष्ट कर दिया गया और कई मिशनरियों की हत्या कर दी गई। शीघ्र ही आंदोलन उत्तरी चीन के बड़े भाग में फैल गया। विद्रोहियों ने बीजिंग (पेकिंग) स्थित विदेशी दूतावासों को घेर लिया और वहाँ तैनात विदेशी अधिकारियों तथा कर्मचारियों पर भी आक्रमण किए।

चीन की सरकार इस विद्रोह को नियंत्रित करने में असमर्थ सिद्ध हुई। प्रारंभ में साम्राज्ञी सिशी ने बॉक्सरों के प्रति सहानुभूति दिखाई, क्योंकि उनका आंदोलन विदेशी शक्तियों के विरुद्ध था। किंतु जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई, तब विदेशी देशों ने सीधे हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया।

विदेशी शक्तियों का हस्तक्षेप

विदेशी नागरिकों और दूतावासों की सुरक्षा के नाम पर आठ राष्ट्रों के गठबंधन—ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, जापान, अमेरिका, इटली और ऑस्ट्रिया-हंगरी ने संयुक्त सैन्य अभियान चलाया। इस संयुक्त सेना ने बीजिंग पर अधिकार कर लिया और बॉक्सर विद्रोह को अत्यंत कठोरता से दबा दिया।

विद्रोह के दमन के दौरान हजारों विद्रोहियों को मार दिया गया। अनेक गाँवों और बस्तियों को नष्ट कर दिया गया तथा व्यापक लूटपाट और दमन किया गया। इस प्रकार एक बार फिर चीन की आंतरिक समस्याओं में विदेशी शक्तियों का प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप हुआ।

मुक्त द्वार नीति और चीन की प्रादेशिक अखंडता

बॉक्सर विद्रोह के समय यह आशंका उत्पन्न हो गई थी कि विदेशी शक्तियाँ चीन का पूर्ण विभाजन कर लेंगी। किंतु संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन हे ने 1900 ई. में पुनः ‘मुक्त द्वार नीति’ की पुष्टि की। इस नीति का उद्देश्य चीन की प्रादेशिक अखंडता बनाए रखते हुए सभी देशों के लिए समान व्यापारिक अवसर सुनिश्चित करना था।

ब्रिटेन और जर्मनी ने भी यह घोषणा की कि वे चीन के किसी भाग को अपने अधिकार में लेने के इच्छुक नहीं हैं तथा यदि कोई अन्य शक्ति चीन की प्रादेशिक अखंडता का उल्लंघन करेगी, तो उसका विरोध किया जाएगा। यद्यपि व्यवहार में सभी साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपने-अपने आर्थिक हितों की रक्षा कर रही थीं, फिर भी इस नीति ने चीन के औपचारिक विभाजन को टाल दिया।

बॉक्सर प्रोटोकॉल (1901 ई.)

बॉक्सर विद्रोह के दमन के बाद 1901 ई. में चीन को विदेशी शक्तियों के साथ बॉक्सर प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश होना पड़ा। इस समझौते के अनुसार चीन पर भारी क्षतिपूर्ति का बोझ डाला गया, विदेशी सेनाओं को बीजिंग और अन्य महत्त्वपूर्ण स्थानों पर स्थायी रूप से तैनात रहने का अधिकार दिया गया तथा विदेशी शक्तियों के विशेषाधिकारों का और अधिक विस्तार हुआ।

बॉक्सर विद्रोह और उसके दमन ने मंचू शासन की दुर्बलता तथा विदेशी शक्तियों के सामने उसकी असहाय स्थिति को पूरी तरह उजागर कर दिया। इससे जनता में शासन के प्रति असंतोष और अधिक बढ़ गया तथा क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी आंदोलनों को नई शक्ति मिली। परिणामस्वरूप चीन में मंचू राजवंश के विरुद्ध व्यापक जनक्रांति की परिस्थितियाँ तेजी से विकसित होने लगीं।

1911 की चीनी क्रांति

मुख्य लेख : 1911 की चीनी क्रांति

1900 ई. के बॉक्सर विद्रोह के दमन के बाद मंचू शासन को यह स्पष्ट हो गया कि केवल रूढ़िवादी नीतियों के आधार पर शासन चलाना संभव नहीं है। साम्राज्ञी डाउजर सिशी, जो पहले सुधारों की कट्टर विरोधी थी, बदलती परिस्थितियों के कारण सीमित सुधार लागू करने के लिए विवश हो गई। उसने एक शाही घोषणा जारी कर यह स्वीकार किया कि चीन को अपनी कमजोरियों को दूर करने के लिए विदेशों में प्रचलित श्रेष्ठ प्रशासनिक और शैक्षिक प्रणालियों से सीख लेनी चाहिए। इस घोषणा का उद्देश्य रूढ़िवादी अधिकारियों को यह विश्वास दिलाना था कि परिवर्तन मंचू शासन के नेतृत्व में ही किए जाएंगे और इससे राजसत्ता को कोई खतरा नहीं होगा। इसके बाद प्रशासन, शिक्षा, सेना और शासन व्यवस्था में कुछ सुधार आरंभ किए गए, किंतु ये सुधार न तो व्यापक थे और न ही समय पर लागू हो सके। 1908 ई. में साम्राज्ञी सिशी तथा सम्राट कुआंगश्यू की मृत्यु के बाद सुधारों की प्रक्रिया लगभग ठप पड़ गई। जनता का विश्वास मंचू शासन से उठ चुका था और यह स्पष्ट होने लगा कि चीन में वास्तविक परिवर्तन केवल क्रांति के माध्यम से ही संभव होगा।

चीन में नवयुग का आरंभ  (The Beginning of the New Era in China)
1911 की चीनी क्रांति
बढ़ती जनसंख्या और खाद्य संकट

1911 ई. की क्रांति का एक प्रमुख कारण चीन की तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या थी। जनसंख्या जिस अनुपात में बढ़ रही थी, कृषि उत्पादन उस गति से नहीं बढ़ पा रहा था। परिणामस्वरूप खाद्यान्नों की भारी कमी उत्पन्न हो गई और व्यापक स्तर पर अकाल तथा भुखमरी की स्थिति बनने लगी। इस स्थिति को प्राकृतिक आपदाओं ने और अधिक गंभीर बना दिया। मध्य चीन में भीषण बाढ़ आई, जिसे उस समय के सबसे विनाशकारी प्राकृतिक संकटों में गिना जाता है। लाखों लोग बेघर हो गए और विशाल कृषि क्षेत्र नष्ट हो गए। दूसरी ओर, कई प्रांतों में भीषण सूखा पड़ गया, जिससे लाखों लोग भोजन के अभाव में जीवन-यापन करने के लिए संघर्ष करने लगे। बेरोजगारी, गरीबी तथा अपराधों में वृद्धि ने सामाजिक असंतोष को और अधिक तीव्र कर दिया। 1911 ई. तक खाद्य संकट इतना गंभीर हो चुका था कि व्यापक जनविद्रोह को रोक पाना लगभग असंभव हो गया।

आर्थिक असंतोष

मंचू शासन गंभीर वित्तीय संकट से भी जूझ रहा था। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में चलाए गए प्रशासनिक और सैन्य सुधारों के लिए भारी धनराशि की आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त चीन-जापान युद्ध (1894–95 ई.) में पराजय तथा बॉक्सर विद्रोह (1900 ई.) के बाद विदेशी शक्तियों को दी जाने वाली भारी क्षतिपूर्ति ने राजकोष पर अत्यधिक बोझ डाल दिया।

सरकार ने इस वित्तीय संकट से उबरने के लिए जनता पर नए-नए कर लगाए। पहले से ही प्राकृतिक आपदाओं, महँगाई और आर्थिक कठिनाइयों से पीड़ित जनता के लिए ये कर असहनीय सिद्ध हुए। किसानों, व्यापारियों तथा सामान्य नागरिकों में शासन के प्रति असंतोष तेजी से बढ़ने लगा। आर्थिक संकट ने मंचू शासन की लोकप्रियता को समाप्त कर दिया और क्रांति के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर दिया।

क्रांतिकारी संगठनों और साहित्य का प्रभाव

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों से चीन में सुधारवादी और क्रांतिकारी विचारों का निरंतर प्रसार हो रहा था। विभिन्न सुधारवादी संगठनों ने जनता को यह समझाने का प्रयास किया कि देश की समस्याओं का समाधान केवल आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण में निहित है। इसी दबाव के कारण मंचू सरकार ने प्रांतीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर सीमित विधानसभाओं की स्थापना भी की, किंतु इससे जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाएँ संतुष्ट नहीं हुईं।

क्रांतिकारी साहित्य, समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं ने राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। चीनी भाषा में प्रकाशित लेखों और पुस्तकों में विदेशी शासन, मंचू प्रशासन की कमजोरियों तथा आधुनिक लोकतांत्रिक विचारों का व्यापक प्रचार किया गया। इस साहित्य ने जनता को पारंपरिक व्यवस्था की कमियों से परिचित कराया और उन्हें राष्ट्रीय पुनर्जागरण तथा राजनीतिक परिवर्तन के लिए प्रेरित किया।

विदेशों में रहने वाले चीनियों की भूमिका

क्रांति से पूर्व बड़ी संख्या में चीनी नागरिक रोजगार, व्यापार और शिक्षा के उद्देश्य से विदेशों में बस चुके थे। वे संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, रूस, फिलीपींस, मलाया तथा सिंगापुर जैसे देशों में रहते थे। इन देशों में उन्हें आधुनिक शिक्षा, लोकतंत्र, राष्ट्रवाद तथा संवैधानिक शासन की अवधारणाओं से परिचित होने का अवसर मिला।

विशेष रूप से अमेरिका और जापान में रहने वाले चीनी युवाओं पर आधुनिक राजनीतिक विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। वे लोकतंत्र, राष्ट्रीय स्वतंत्रता और गणतांत्रिक शासन के समर्थक बन गए। अनेक विद्यार्थी शिक्षा पूर्ण कर चीन लौटे और उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया। विदेशों में रहने वाले चीनी समुदाय ने आर्थिक सहायता, वैचारिक समर्थन तथा संगठनात्मक सहयोग प्रदान करके क्रांतिकारी आंदोलन को सुदृढ़ बनाया। पश्चिमी शिक्षा से प्रभावित इस नए नेतृत्व ने चीन में उदारवादी, राष्ट्रवादी और लोकतांत्रिक विचारों का व्यापक प्रचार किया तथा मंचू शासन के विरुद्ध जनमत तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1911 ई. की क्रांति का तात्कालिक कारण

1911 ई. की चीनी क्रांति के पीछे अनेक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक कारण कार्यरत थे, किंतु रेलमार्गों के निर्माण और उनके नियंत्रण का प्रश्न इसका तात्कालिक कारण बना। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में चीन में आधुनिक संचार और परिवहन के साधनों का तीव्र विकास हो रहा था। डाक, तार तथा रेलमार्गों ने न केवल आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया, बल्कि क्रांतिकारी विचारों के प्रसार और विभिन्न क्षेत्रों के क्रांतिकारियों के बीच संपर्क स्थापित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन साधनों के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ और विदेशी हस्तक्षेप के विरुद्ध जनमत संगठित होने लगा।

उसी समय चीन के विभिन्न प्रांतों में रेलमार्गों के निर्माण का कार्य भी चल रहा था। अनेक विदेशी शक्तियाँ चीन में पूँजी निवेश कर रेलमार्गों का निर्माण कर रही थीं। प्रांतीय गवर्नरों का मत था कि रेल परियोजनाओं का संचालन प्रांतीय सरकारों के नियंत्रण में होना चाहिए और उनके लिए स्थानीय पूँजी का उपयोग किया जाए। इसके विपरीत, पेकिंग स्थित केंद्रीय सरकार रेलमार्गों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें अपने नियंत्रण में रखना चाहती थी तथा विदेशी ऋण और निवेश के माध्यम से इनका विस्तार कर रही थी। इससे प्रांतीय नेताओं को आशंका हुई कि विदेशी शक्तियों का प्रभाव और अधिक बढ़ जाएगा। फलस्वरूप अनेक प्रांतों में रेलमार्ग संरक्षण आंदोलन प्रारंभ हुआ, जिसने शीघ्र ही राजनीतिक आंदोलन का रूप धारण कर लिया। यही विवाद आगे चलकर 1911 ई. की क्रांति का प्रत्यक्ष कारण बना।

वुचांग विद्रोह और क्रांति का आरंभ

10 अक्टूबर 1911 ई. को वुचांग में एक आकस्मिक विस्फोट ने घटनाओं को अप्रत्याशित रूप से तेज कर दिया। क्रांतिकारियों के गुप्त अड्डे पर बम फटने से पुलिस को उनके संगठन और योजनाओं की जानकारी मिल गई। जब पुलिस ने गिरफ्तारियाँ प्रारंभ कीं, तब वुचांग में तैनात नई सेना के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। यही घटना शिनहाई क्रांति की शुरुआत मानी जाती है।

विद्रोह शीघ्र ही यांग्त्सी नदी के तटीय क्षेत्रों तथा दक्षिणी चीन के अनेक प्रांतों में फैल गया। कुछ ही दिनों में अनेक प्रांतों ने मंचू शासन से अपनी निष्ठा समाप्त करने की घोषणा कर दी। क्रांतिकारियों ने शंघाई सहित कई प्रमुख नगरों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया और वहाँ अस्थायी सैन्य सरकारों का गठन किया। इन सरकारों ने स्वयं को समस्त क्रांतिकारी शक्तियों का प्रतिनिधि घोषित किया। क्रांतिकारी सेना के प्रमुख नेताओं में ली युआनहोंग का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिन्होंने आंदोलन को संगठित स्वरूप प्रदान किया।

राष्ट्रीय विधान सभा की भूमिका

जब एक ओर देश के अनेक भागों में क्रांति फैल रही थी, उसी समय राष्ट्रीय विधान सभा राजनीतिक सुधारों के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही थी। 22 अक्टूबर 1911 ई. को विधान सभा की बैठक बुलाई गई। इस बैठक में सबसे पहले रेलमार्गों के केंद्रीकरण की नीति के समर्थक मंत्री शेंग शुआनहुआई को पद से हटाने का निर्णय लिया गया। विधान सभा ने स्पष्ट रूप से प्रांतीय सरकारों की माँगों का समर्थन किया और विदेशी ऋण पर आधारित रेल नीति का विरोध किया।

इसके अतिरिक्त, विधान सभा ने सरकार के समक्ष तीन महत्त्वपूर्ण माँगें प्रस्तुत कीं। पहली, योग्य एवं ईमानदार व्यक्तियों की तत्काल नियुक्ति की जाए। दूसरी, एक उत्तरदायी मंत्रिपरिषद् का गठन किया जाए, जिसमें राजवंश के किसी सदस्य को स्थान न मिले। तीसरी, सभी राजनीतिक बंदियों को सामान्य क्षमादान दिया जाए। इन प्रस्तावों का उद्देश्य जनता का विश्वास पुनः प्राप्त करना तथा संवैधानिक शासन की स्थापना करना था।

30 अक्टूबर 1911 ई. को सरकार ने इन अधिकांश माँगों को स्वीकार कर लिया। इसके बाद “संविधान के सिद्धांत” नामक एक नए राजनीतिक कार्यक्रम को सम्राट की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया गया। 3 नवंबर 1911 ई. को सम्राट ने इसे स्वीकार कर लिया। इस व्यवस्था के अंतर्गत सम्राट के अधिकार सीमित कर संवैधानिक राजतंत्र स्थापित करने का प्रयास किया गया। किंतु तब तक क्रांतिकारी आंदोलन इतना व्यापक हो चुका था कि केवल संवैधानिक सुधारों के माध्यम से उसे रोकना संभव नहीं था।

नानजिंग में अस्थायी सरकार की स्थापना

क्रांति के विस्तार के साथ ही दक्षिणी प्रांतों के प्रतिनिधि नानजिंग (तत्कालीन नानकिंग) में एकत्र हुए और उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथों में ले लिया। इसी समय डॉ. सन यात-सेन विदेश से चीन लौटे। वे लंबे समय से मंचू शासन के विरोध में कार्य कर रहे थे तथा क्रांतिकारी संगठन तुंगमेंगहुई के प्रमुख नेता थे।

नानजिंग में एक अस्थायी परिषद् का गठन किया गया और डॉ. सन यात-सेन को उसका अस्थायी अध्यक्ष चुना गया। उनका उद्देश्य चीन में राजतंत्र का पूर्ण अंत कर एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना था। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाने तथा आधुनिक गणतांत्रिक शासन प्रणाली लागू करने की दिशा में कार्य प्रारंभ हुआ। उनके राजनीतिक विचारों ने क्रांति को स्पष्ट वैचारिक आधार प्रदान किया।

मंचू राजवंश का अंत और गणराज्य की स्थापना

क्रांतिकारियों और मंचू शासन के बीच समझौता कराने में उत्तरी सेना के सेनापति युआन शिखाई ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका उद्देश्य प्रारंभ में संवैधानिक राजतंत्र को बनाए रखना था, किंतु परिस्थितियों ने उन्हें गणतंत्र की स्थापना का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया। अंततः 12 फरवरी 1912 ई. को अंतिम मंचू सम्राट पुयी के नाम से पदत्याग की घोषणा जारी की गई। इस शाही आदेश में युआन शिखाई को अस्थायी गणतांत्रिक सरकार के गठन तथा राष्ट्रीय एकता स्थापित करने का दायित्व सौंपा गया। साथ ही यह भी घोषित किया गया कि मंचू, हान चीनी, मंगोल, मुस्लिम तथा तिब्बती—सभी जातियों को सम्मिलित कर एक संयुक्त चीनी गणराज्य की स्थापना की जाएगी।

इसके पश्चात् डॉ. सन यात-सेन चीन गणराज्य के प्रथम अस्थायी राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। किंतु राष्ट्रीय एकता बनाए रखने तथा उत्तर और दक्षिण के बीच समझौते को सफल बनाने के उद्देश्य से उन्होंने स्वेच्छा से राष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दिया और यह पद युआन शिखाई को सौंप दिया। उनका विश्वास था कि युआन शिखाई के नेतृत्व में नवगठित गणराज्य अधिक स्थिर रह सकेगा और देश गृहयुद्ध से बच जाएगा।

मंचू शासन का पतन

1644 ई. से शासन कर रहा मंचू (छिंग) राजवंश फरवरी 1912 ई. में औपचारिक रूप से समाप्त हो गया। इसके साथ ही चीन में लगभग दो हजार वर्षों से चली आ रही सम्राटीय शासन व्यवस्था का अंत हुआ और गणतांत्रिक शासन का नया युग प्रारंभ हुआ। 1911 ई. की क्रांति ने चीन के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक परिवर्तन लाते हुए आधुनिक राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त किया।

युवान शिखाई का शासनकाल (1912–1916 ई.)
सत्ता ग्रहण और अधिनायकवादी नीति

1912 ई. में चीन गणराज्य की स्थापना के बाद युआन शिखाई को राष्ट्रपति बनाया गया। डॉ. सन यात-सेन ने राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के उद्देश्य से स्वेच्छा से उन्हें सत्ता सौंपी थी। किंतु शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गया कि युआन शिखाई गणतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप शासन नहीं करना चाहते थे। उन्होंने धीरे-धीरे अपने हाथों में समस्त शक्तियाँ केंद्रित करनी प्रारंभ कर दीं और विदेशी शक्तियों के साथ समझौते की नीति अपनाई।

युआन ने विदेशी देशों को यह आश्वासन दिया कि चीन पूर्व में संपन्न सभी संधियों और विशेषाधिकारों का सम्मान करेगा। इस नीति से विदेशी शक्तियों का समर्थन तो मिला, किंतु राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी नेताओं में असंतोष बढ़ गया। डॉ. सन यात-सेन को भी राजनीतिक विरोध के कारण दक्षिणी चीन के कैंटन (ग्वांगझोउ) जाना पड़ा, जहाँ उन्होंने पुनः अपने समर्थकों को संगठित करना प्रारंभ किया।

प्रथम विश्व युद्ध और जापान की इक्कीस माँगें

मुख्य लेख : प्रथम विश्व युद्ध

1914 ई. में प्रथम विश्व युद्ध आरंभ होने के बाद पूर्वी एशिया की राजनीतिक परिस्थितियों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। युद्ध का लाभ उठाकर जापान ने 1915 ई. में चीन के सामने अपनी प्रसिद्ध ‘इक्कीस माँगें’ प्रस्तुत कीं। यदि ये सभी माँगें स्वीकार कर ली जातीं, तो चीन की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक स्वतंत्रता गंभीर रूप से प्रभावित हो जाती तथा वह लगभग जापान के संरक्षण-राज्य में परिवर्तित हो जाता।

युआन शिखाई ने प्रारंभ में इन माँगों का विरोध किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका व्यापक प्रचार किया। अमेरिका, ब्रिटेन तथा अन्य शक्तियों ने भी इन माँगों को अत्यधिक कठोर और अनुचित माना। किंतु जापान के निरंतर दबाव के कारण युआन अंततः अधिकांश माँगें स्वीकार करने के लिए विवश हो गए। उन्होंने पहले चार समूहों की माँगों को स्वीकार कर लिया, जिनके अंतर्गत जापान को शानदोंग में जर्मनी के पूर्व अधिकार तथा अनेक आर्थिक विशेषाधिकार प्राप्त हुए। तीव्र जनविरोध के कारण वे पाँचवें समूह की सबसे कठोर माँगों को स्वीकार नहीं कर सके।

कुओमिंतांग का विरोध और युआन की मृत्यु

इसी अवधि में डॉ. सन यात-सेन ने विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों को संगठित कर कुओमिंतांग को एक सशक्त राजनीतिक दल के रूप में विकसित किया। यह दल गणतांत्रिक शासन और राष्ट्रीय स्वतंत्रता का समर्थक था। युआन शिखाई ने इस संगठन को अपने शासन के लिए चुनौती मानते हुए उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कठोर दमनात्मक कार्रवाई की।

1915 ई. के अंत में युआन ने स्वयं को सम्राट घोषित कर चीन में राजतंत्र पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। इस निर्णय का देशभर में तीव्र विरोध हुआ और अनेक प्रांतों में विद्रोह प्रारंभ हो गए। राजनीतिक असफलता और बढ़ते विरोध के बीच उन्हें सम्राट की उपाधि त्यागनी पड़ी। कुछ ही समय बाद 6 जून 1916 ई. को उनकी मृत्यु हो गई, जिससे चीन में केंद्रीय सत्ता और अधिक कमजोर हो गई।

युआन के बाद की स्थिति

युआन शिखाई की मृत्यु के पश्चात चीन में केंद्रीय शासन लगभग निष्प्रभावी हो गया और विभिन्न सैन्य सरदारों (वॉरलॉर्ड्स) का प्रभाव बढ़ने लगा। उसी समय यूरोप प्रथम विश्व युद्ध में उलझा हुआ था, जिसके कारण पश्चिमी शक्तियों का ध्यान कुछ समय के लिए चीन से हट गया। विदेशी व्यापार में कमी आने से चीनी उद्योगपतियों ने स्वदेशी उद्योगों में निवेश बढ़ाया। शंघाई, नानजिंग और कैंटन जैसे नगरों में नए उद्योग एवं कारखाने स्थापित हुए, जिससे देश में औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन मिला।

विदेशी हस्तक्षेप में अस्थायी कमी आने से चीन में राष्ट्रीय चेतना भी अधिक प्रबल हुई। विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों ने जापान की इक्कीस माँगों के विरोध में व्यापक आंदोलन चलाया तथा जापानी वस्तुओं के बहिष्कार का अभियान प्रारंभ किया। इसी बीच मित्र राष्ट्रों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जापान से नौसैनिक सहायता प्राप्त की और बदले में शांति सम्मेलन में शानदोंग संबंधी उसके दावों का समर्थन करने का आश्वासन दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी शानदोंग में जापान के विशेष हितों को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रभाव से चीन को भी अंततः प्रथम विश्व युद्ध की परिस्थितियों में सक्रिय भूमिका निभानी पड़ी।

प्रथम विश्वयुद्ध में चीन का प्रवेश
चीन की तटस्थता की नीति

प्रथम विश्वयुद्ध के आरंभ (1914 ई.) के समय चीन की अधिकांश जनता युद्ध में भाग लेने के पक्ष में नहीं थी। देश अभी 1911 ई. की क्रांति के बाद उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट तथा आंतरिक संघर्षों से जूझ रहा था। ऐसे समय में विदेशी युद्ध में सम्मिलित होना अधिकांश चीनी नेताओं और जनता को अनुचित प्रतीत होता था। उनका मत था कि पहले देश की आंतरिक समस्याओं का समाधान किया जाए, उसके बाद ही अंतरराष्ट्रीय मामलों में सक्रिय भूमिका निभाई जाए। इसी कारण चीन ने प्रारंभ में तटस्थता की नीति अपनाई।

1911 ई. की क्रांति तथा कुओमिंतांग के राजनीतिक संघर्षों के परिणामस्वरूप देश में कुछ सुधार अवश्य हुए थे, किंतु केंद्रीय सत्ता अभी भी कमजोर थी। दूसरी ओर, यूरोप की प्रमुख शक्तियाँ प्रथम विश्वयुद्ध में व्यस्त थीं, जिसके कारण उनका ध्यान कुछ समय के लिए चीन से हट गया। इस परिस्थिति का सर्वाधिक लाभ जापान ने उठाया। उसने चीन की राजनीतिक दुर्बलता तथा यूरोपीय शक्तियों की व्यस्तता का लाभ उठाकर पूर्वी एशिया में अपने प्रभाव का विस्तार करना प्रारंभ कर दिया।

जापान की बढ़ती शक्ति

1914 से 1917 ई. तक चीन ने अपनी घोषित तटस्थता की नीति का पालन किया। यद्यपि यह नीति तत्कालीन परिस्थितियों में चीन के लिए व्यावहारिक थी, फिर भी इसके कारण जापान को अपने प्रभाव का विस्तार करने का अवसर मिल गया। जापान ने जर्मनी के अधिकार वाले शानदोंग  क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया और वहाँ अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली।

चीनी जनमत अब भी युद्ध में भाग लेने के विरुद्ध था, किंतु अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही थीं। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने तटस्थ देशों से मित्र राष्ट्रों का समर्थन करने की अपील की। साथ ही चीन के अनेक नेताओं का विचार था कि यदि वह मित्र राष्ट्रों के साथ युद्ध में सम्मिलित होगा, तो युद्ध के बाद होने वाले शांति सम्मेलन में उसे अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने का अवसर मिलेगा। इन परिस्थितियों में चीन ने 14 अगस्त 1917 ई. को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

युद्ध में प्रवेश के कारण और लाभ

चीन का युद्ध में प्रवेश केवल राजनीतिक दबाव का परिणाम नहीं था, बल्कि इसके पीछे कुछ व्यावहारिक लाभों की भी संभावना थी। मित्र राष्ट्रों, विशेषकर अमेरिका और ब्रिटेन, ने चीन के प्रति अपेक्षाकृत सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया। वे बॉक्सर विद्रोह (1900 ई.) के बाद चीन पर लगाए गए कुछ क्षतिपूर्ति दायित्वों में राहत देने तथा सीमा शुल्क संबंधी व्यवस्थाओं पर पुनर्विचार करने के इच्छुक थे। इससे चीन को आशा थी कि युद्ध के पश्चात विदेशी शक्तियों के विशेषाधिकारों में कमी आएगी।

युद्ध में सम्मिलित होने के बाद चीन को सीमा शुल्क में कुछ राहत प्राप्त हुई। आयात-निर्यात के मूल्यांकन की दरों में वृद्धि की गई, जिससे चीन को अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होने लगा। यह आर्थिक दृष्टि से उसके लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी।

मित्र राष्ट्रों को चीन का योगदान

चीन ने युद्ध के मोर्चे पर प्रत्यक्ष सैनिक भूमिका नहीं निभाई, किंतु उसने मित्र राष्ट्रों को अन्य महत्त्वपूर्ण प्रकार से सहायता प्रदान की। हजारों चीनी श्रमिकों को चीनी श्रमिक दल के अंतर्गत फ्रांस और अन्य यूरोपीय क्षेत्रों में भेजा गया, जहाँ उन्होंने सड़क निर्माण, गोला-बारूद की ढुलाई, बंदरगाहों के संचालन तथा युद्ध संबंधी अन्य सहायक कार्यों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसके अतिरिक्त, चीन के बंदरगाहों पर खड़े जर्मन जहाज मित्र राष्ट्रों के नियंत्रण में आ गए, जिनका उपयोग युद्ध संचालन में किया गया। इस प्रकार चीन का युद्ध में प्रवेश मित्र राष्ट्रों के लिए सामरिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से लाभदायक सिद्ध हुआ।

पेरिस शांति सम्मेलन और चीन की निराशा

मुख्य लेख : पेरिस शांति सम्मेलन

शानदोंग विवाद

प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1919 ई. में आयोजित पेरिस शांति सम्मेलन में चीन को आशा थी कि मित्र राष्ट्र उसकी राष्ट्रीय आकांक्षाओं का सम्मान करेंगे। चीनी प्रतिनिधियों ने सम्मेलन में माँग की कि शानदोंग प्रांत, जिस पर युद्ध के दौरान जापान ने अधिकार कर लिया था, उसे पुनः चीन को लौटा दिया जाए। साथ ही उन्होंने विदेशी सेनाओं की वापसी, विदेशी विशेषाधिकारों की समाप्ति तथा सीमा शुल्क पर चीन के पूर्ण नियंत्रण की भी माँग की। किंतु सम्मेलन में चीन की अपेक्षाओं को गंभीर निराशा का सामना करना पड़ा। जापान ने शानदोंग पर अपने अधिकार का दावा प्रस्तुत किया और अमेरिका, ब्रिटेन तथा अन्य प्रमुख मित्र राष्ट्रों ने अंततः जापान के पक्ष का समर्थन किया। चीन की अन्य माँगों पर भी कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।

वर्साय संधि का विरोध

पेरिस शांति सम्मेलन के निर्णयों को वर्साय की संधि (1919 ई.) में सम्मिलित किया गया। चूँकि इस संधि में शानदोंग को चीन को लौटाने के स्थान पर जापान के अधिकार में रहने दिया गया, इसलिए चीनी प्रतिनिधिमंडल ने इसका विरोध किया और संधि पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। यह निर्णय चीन के राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए गहरा आघात था।

इस घटना ने चीन में व्यापक जनाक्रोश उत्पन्न किया। जनता को यह अनुभव हुआ कि पश्चिमी शक्तियाँ आत्मनिर्णय और न्याय की बात तो करती हैं, किंतु व्यवहार में साम्राज्यवादी हितों को ही प्राथमिकता देती हैं। परिणामस्वरूप चीन में राष्ट्रवादी भावना पहले की अपेक्षा कहीं अधिक प्रबल हो गई।

राष्ट्रवादी आंदोलन का विस्तार

पेरिस शांति सम्मेलन के बाद चीन में राष्ट्रीय आंदोलन ने नया स्वरूप ग्रहण किया। शिक्षित युवाओं, विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों तथा राष्ट्रवादी नेताओं ने विदेशी हस्तक्षेप और असमान संधियों के विरुद्ध व्यापक जनजागरण प्रारंभ किया। विशेष रूप से ब्रिटेन और जापान के प्रति असंतोष तेजी से बढ़ा। यद्यपि चीनी सरकार विदेशी शक्तियों का प्रभाव समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध थी, किंतु आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य कमजोरी के कारण वह तत्काल कोई प्रभावी कदम उठाने में सक्षम नहीं थी।

इस समय डॉ. सन यात-सेन और उनकी कुओमिंतांग पार्टी ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने राष्ट्रीय एकता, विदेशी प्रभुत्व के अंत तथा आधुनिक लोकतांत्रिक शासन की स्थापना का समर्थन किया। दूसरी ओर, शिक्षित युवा वर्ग विदेशी विशेषाधिकारों और आर्थिक शोषण का लगातार विरोध कर रहा था। इन परिस्थितियों ने चीन में राष्ट्रवाद को एक सशक्त राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया।

1920 ई. के बाद की बदलती परिस्थितियाँ

1920 ई. के बाद अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में कुछ परिवर्तन दिखाई देने लगे। प्रमुख शक्तियों ने चीन के प्रश्न पर परस्पर सहयोग की आवश्यकता को स्वीकार किया और पूर्वी एशिया में स्थिरता बनाए रखने के उद्देश्य से सामूहिक विचार-विमर्श प्रारंभ किया। यद्यपि विदेशी हस्तक्षेप पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, फिर भी चीन के हितों और उसकी प्रादेशिक अखंडता के विषय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षाकृत अधिक गंभीरता से विचार किया जाने लगा। इसी वातावरण ने आगे चलकर चीन के राष्ट्रीय पुनर्जागरण और आधुनिक राजनीतिक विकास की प्रक्रिया को नई गति प्रदान की।

चार शक्तियों का आर्थिक साहचर्य

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद चीन आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता तथा विदेशी हस्तक्षेप से जूझ रहा था। ऐसी परिस्थितियों में 1920 ई. के बाद ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस और जापान ने मिलकर चीन को ऋण एवं वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से चार शक्तियों का आर्थिक साहचर्य स्थापित किया। बाद में इस व्यवस्था में अन्य देशों का भी सहयोग प्राप्त हुआ। इस साहचर्य को संबंधित देशों की सरकारों का समर्थन प्राप्त था और इसका उद्देश्य चीन के आर्थिक पुनर्निर्माण में सहायता करना था।

ब्रिटिश विद्वान सर फ्रेडरिक व्हाइट के अनुसार, इस साहचर्य का मूल उद्देश्य चीन की आर्थिक स्थिरता बनाए रखना तथा उसे निजी विदेशी साहूकारों के अत्यधिक शोषण से बचाना था। यदि यह व्यवस्था न बनाई जाती, तो चीन को अत्यधिक ब्याज दरों पर निजी स्रोतों से ऋण लेना पड़ता, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति और अधिक संकटग्रस्त हो जाती। यद्यपि इस व्यवस्था के पीछे विदेशी शक्तियों के अपने आर्थिक हित भी निहित थे, फिर भी इससे चीन को वित्तीय पुनर्गठन में कुछ सहायता अवश्य मिली।

वाशिंगटन सम्मेलन और चीन

1921–22 ई. में आयोजित वाशिंगटन सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य नौसैनिक शस्त्रों की सीमा निर्धारित करना था, किंतु इसमें चीन से संबंधित अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर भी विचार किया गया। सम्मेलन में चीन की सीमा शुल्क  व्यवस्था, असमान संधियों तथा विदेशियों को प्राप्त राज्यक्षेत्रातीत अधिकार पर विशेष चर्चा हुई।

सम्मेलन में भाग लेने वाले अधिकांश देशों ने सिद्धांततः यह स्वीकार किया कि चीन की संप्रभुता का सम्मान किया जाना चाहिए तथा असमान संधियों में सुधार होना चाहिए। किंतु व्यवहार में वे विदेशी नागरिकों के विशेषाधिकार समाप्त करने के पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि चीन की न्यायिक व्यवस्था अभी पर्याप्त विकसित नहीं है, इसलिए विदेशियों की सुरक्षा के लिए इन अधिकारों का बने रहना आवश्यक है।

इसके बाद पेकिंग में हुए विचार-विमर्श में विदेशियों को व्यापार तथा नागरिक अधिकारों की कुछ सुविधाएँ बनाए रखने की बात स्वीकार की गई, किंतु राज्यक्षेत्रातीत अधिकारों को समाप्त करने की दिशा में भी सहमति व्यक्त की गई। कुछ वर्षों बाद संयुक्त राज्य अमेरिका ने चीन को सीमा शुल्क निर्धारण में अधिक स्वतंत्रता प्रदान की। फिर भी इन निर्णयों को व्यवहार में लागू होने में काफी समय लगा और चीन की संप्रभुता तत्काल पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हो सकी।

चीन की विदेश नीति में परिवर्तन

वाशिंगटन सम्मेलन के बाद चीन को यह अनुभव होने लगा कि ब्रिटेन और अमेरिका उसकी राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के प्रति अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं। इसलिए चीन ने सोवियत रूस के साथ अपने संबंधों को सुदृढ़ करना प्रारंभ किया। सोवियत संघ भी पूर्वी एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था, इसलिए दोनों देशों के हित कुछ समय के लिए एक-दूसरे के अनुकूल हो गए।

1923 ई. में डॉ. सन यात-सेन और सोवियत प्रतिनिधियों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत सोवियत सलाहकारों को चीन में कार्य करने की अनुमति दी गई। इसी प्रकार उत्तरी चीन की सरकार ने भी सोवियत संघ के साथ समझौते किए। इन समझौतों का उद्देश्य चीन के राष्ट्रीय पुनर्गठन तथा विदेशी साम्राज्यवाद का मुकाबला करना था।

कुओमिंतांग और साम्यवादी प्रभाव

सोवियत सलाहकार मिखाइल बोरोडिन चीन पहुँचे और उन्होंने कुओमिंतांग के संगठन का पुनर्गठन आधुनिक राजनीतिक दल के रूप में किया। उनके मार्गदर्शन में राष्ट्रीय आंदोलन को संगठित करने का प्रयास किया गया तथा साम्राज्यवाद के विरुद्ध व्यापक जनसमर्थन जुटाया गया। इसी अवधि में चीनी साम्यवादी दल का भी विकास होने लगा और दोनों दलों ने प्रारंभिक वर्षों में सहयोग की नीति अपनाई।

किंतु 1927 ई. तक पहुँचते-पहुँचते परिस्थितियाँ बदल गईं। साम्यवादी प्रभाव बढ़ने के साथ-साथ दोनों दलों के बीच वैचारिक मतभेद तीव्र हो गए। कुओमिंतांग के नए नेता च्यांग काई-शेक साम्यवाद के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने साम्यवादी नेताओं के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया, जिसके परिणामस्वरूप कुओमिंतांग और साम्यवादी दल के बीच संघर्ष प्रारंभ हो गया। इससे चीन में गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई।

गृहयुद्ध और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण

1927 से 1936 ई. तक चीन गृहयुद्ध की विभीषिका से गुजरता रहा। एक ओर कुओमिंतांग की राष्ट्रीय सरकार थी, जबकि दूसरी ओर साम्यवादी शक्तियाँ अपने प्रभाव का विस्तार कर रही थीं। इस संघर्ष के बावजूद राष्ट्रीय सरकार ने देश के आर्थिक और प्रशासनिक पुनर्गठन के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाए।

इस अवधि में रेलमार्गों का विस्तार किया गया, सड़कों और हवाई परिवहन का विकास हुआ तथा संचार व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ बनाया गया। राष्ट्रसंघ के विशेषज्ञों ने सिंचाई तथा कृषि विकास के संबंध में तकनीकी परामर्श प्रदान किया। ब्रिटिश वित्तीय विशेषज्ञ सर फ्रेडरिक लीथ-रॉस ने चीन की वित्तीय व्यवस्था को व्यवस्थित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 1935–36 ई. में नई मुद्रा व्यवस्था लागू की गई, जिससे देश की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ और विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिला।

जापानी आक्रमण की चुनौती

जब चीन राष्ट्रीय एकीकरण, आर्थिक पुनर्निर्माण और प्रशासनिक सुधारों की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा था, तभी जापान ने उसकी बढ़ती शक्ति को अपने साम्राज्यवादी हितों के लिए चुनौती माना। मंचूरिया पर पहले से अधिकार स्थापित करने के बाद जापान ने चीन पर अपना दबाव लगातार बढ़ाया। अंततः 1937 ई. में जापान ने चीन पर व्यापक आक्रमण कर दिया, जिससे दूसरा चीन-जापान युद्ध प्रारंभ हुआ। इस आक्रमण ने चीन के राष्ट्रीय विकास और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को गंभीर रूप से बाधित कर दिया तथा देश एक बार फिर दीर्घकालीन संघर्ष और विनाश के दौर में प्रवेश कर गया।

चीन–जापान युद्ध (1937 ई.)

मुख्य लेख : चीन–जापान युद्ध 

दो विश्वयुद्धों के मध्य का काल पूर्वी एशिया में जापानी साम्राज्यवाद के तीव्र विस्तार का युग था। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जापान ने अपनी सैन्य, औद्योगिक तथा आर्थिक शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि की और एशिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया। यद्यपि राष्ट्रसंघ का सदस्य बनने के कारण ऐसा प्रतीत होता था कि जापान अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करेगा, किंतु मंचूरिया पर अधिकार (1931 ई.) तथा 1937 ई. में चीन पर आक्रमण ने स्पष्ट कर दिया कि उसने अपनी विस्तारवादी नीति का परित्याग नहीं किया था। इस युद्ध के पीछे अनेक राजनीतिक, आर्थिक तथा सामरिक कारण उत्तरदायी थे।

चीन में नवयुग का आरंभ  (The Beginning of the New Era in China)
चीन–जापान युद्ध (1937 ई.)
उत्तरी चीन में जापानी दबाव

1933 से 1937 ई. के बीच उत्तरी चीन में जापान का प्रभाव निरंतर बढ़ता गया। इसका प्रमुख कारण चीन की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता तथा कुओमिंतांग और साम्यवादी शक्तियों के बीच चल रहा संघर्ष था। जापान ने इस कमजोरी का लाभ उठाकर चीन के उत्तरी क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारंभ किया।

वास्तव में दोनों देशों के संबंध 1931 ई. में मंचूरिया पर जापानी अधिकार के बाद से ही अत्यंत तनावपूर्ण हो चुके थे। इसके पश्चात जापान ने जेहोल क्षेत्र पर भी अधिकार कर लिया तथा उत्तरी चीन में अपनी सैन्य गतिविधियों का विस्तार किया। 1933 ई. के तांगगू युद्धविराम के बावजूद दोनों देशों के बीच अविश्वास और तनाव बना रहा। जापान लगातार चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता रहा, जिससे दोनों देशों के संबंध और अधिक बिगड़ते गए। अंततः यही तनाव 1937 ई.  में पूर्ण युद्ध का कारण बना।

जापान का आर्थिक संकट

1930 ई. के दशक में जापान गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा था। तीव्र जनसंख्या वृद्धि के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा था और उद्योगों के लिए कच्चे माल तथा नए बाजारों की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। दूसरी ओर, विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हुआ, जिससे जापान के निर्यात में भारी गिरावट आई।

जापान का प्रमुख निर्यात रेशम था, किंतु आर्थिक मंदी के कारण अनेक देशों में इसकी माँग कम हो गई। इसके अतिरिक्त संयुक्त राज्य अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने जापानी प्रवासियों पर प्रतिबंध लगाए, जिससे जापान की आर्थिक समस्याएँ और बढ़ गईं। ऐसी परिस्थिति में जापानी नीति-निर्माताओं ने चीन को अपने औद्योगिक उत्पादों के लिए विशाल बाजार तथा कच्चे माल के स्रोत के रूप में देखा।

जापान का उद्देश्य केवल आर्थिक प्रभुत्व स्थापित करना ही नहीं था, बल्कि चीन को राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से भी अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना था। वह नहीं चाहता था कि चीन औद्योगिक रूप से सशक्त होकर भविष्य में उसका प्रतिद्वंद्वी बने। चीन द्वारा जापानी आर्थिक विस्तार का विरोध किए जाने से दोनों देशों के बीच संघर्ष की संभावना और प्रबल हो गई।

‘एशिया एशियाइयों के लिए’ का सिद्धांत

जापान ने अपने साम्राज्यवादी विस्तार को वैचारिक आधार प्रदान करने के लिए ‘एशिया एशियाइयों के लिए’ का नारा दिया। यह विचार अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मुनरो के मुनरो सिद्धांत (1823 ई.) से प्रेरित था। जिस प्रकार मुनरो सिद्धांत के अनुसार यूरोपीय शक्तियों को अमेरिकी महाद्वीप के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, उसी प्रकार जापान ने दावा किया कि एशिया के मामलों में यूरोपीय शक्तियों का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

यद्यपि यह नारा देखने में एशियाई देशों की स्वतंत्रता का समर्थक प्रतीत होता था, किंतु वास्तविकता में इसका उद्देश्य एशिया से पश्चिमी शक्तियों के प्रभाव को हटाकर जापानी प्रभुत्व स्थापित करना था। जापानी सरकार ने इस विचार का व्यापक प्रचार किया, जिससे देश में उग्र राष्ट्रवाद और सैन्यवाद को बढ़ावा मिला। जनता को यह विश्वास दिलाया गया कि जापान एशिया का स्वाभाविक नेता है और उसे पूरे क्षेत्र का नेतृत्व करना चाहिए। इस प्रचार ने युद्ध की तैयारी के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया।

राष्ट्रसंघ से जापान का अलग होना

मुख्य लेख : राष्ट्रसंघ

1931 ई. में जापान ने मंचूरिया पर आक्रमण कर वहाँ मंचुकुओ नामक कठपुतली राज्य की स्थापना की। चीन ने इस आक्रमण की शिकायत राष्ट्रसंघ में की। जाँच के लिए नियुक्त लिटन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जापानी कार्रवाई की आलोचना की और मंचूरिया पर उसके अधिकार को वैध नहीं माना। राष्ट्रसंघ की इस आलोचना से असंतुष्ट होकर जापान ने 1933 ई. में राष्ट्रसंघ की सदस्यता छोड़ दी। इसके बाद वह अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण और नैतिक दबाव से काफी हद तक मुक्त हो गया। अब जापान ने एशिया में अपनी विस्तारवादी नीति को और अधिक आक्रामक रूप से लागू करना प्रारंभ कर दिया। इस बीच संयुक्त राज्य अमेरिका ने स्टिमसन के आधार पर घोषणा की कि बलपूर्वक प्राप्त किसी भी क्षेत्रीय परिवर्तन को वह मान्यता नहीं देगा। अमेरिका ने चीन की प्रादेशिक अखंडता के समर्थन की बात अवश्य कही, किंतु उसने जापान के विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई नहीं की। परिणामस्वरूप जापान निर्बाध रूप से अपनी विस्तारवादी नीति पर आगे बढ़ता रहा।

चीन की आंतरिक कमजोरी

चीन की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियाँ भी युद्ध का एक महत्त्वपूर्ण कारण थीं। कुओमिंतांग सरकार और चीनी साम्यवादी दल के बीच चल रहे गृहयुद्ध ने केंद्रीय शासन को कमजोर कर दिया था। विभिन्न प्रांतों में सैन्य सरदारों का प्रभाव बना हुआ था और राष्ट्रीय एकता पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी थी। जापान ने चीन की इसी राजनीतिक कमजोरी का लाभ उठाया और यह अनुमान लगाया कि चीन संगठित रूप से उसका सामना नहीं कर सकेगा। यही कारण था कि जुलाई 1937 ई. में मार्को पोलो ब्रिज की घटना के बाद जापान ने चीन पर व्यापक आक्रमण प्रारंभ कर दिया, जिससे दूसरा चीन–जापान युद्ध आरंभ हुआ।

चीन में राष्ट्रीयता की भावना का उदय

1930 ई. के दशक के मध्य तक चीन गंभीर राजनीतिक संकट से गुजर रहा था। एक ओर जापान अपनी साम्राज्यवादी नीति के अंतर्गत चीन पर आक्रमण की तैयारी कर रहा था, तो दूसरी ओर चीन के भीतर कुओमिंतांग और चीनी साम्यवादी दल के बीच गृहयुद्ध चल रहा था। राष्ट्रवादी सरकार के नेता च्यांग काई-शेक का मुख्य उद्देश्य साम्यवादियों का दमन करना था, जबकि साम्यवादी नेतृत्व जापानी आक्रमण को देश के लिए अधिक बड़ा खतरा मानता था और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पर बल देता था।

दिसंबर 1936 ई. की शीआन घटना ने इस स्थिति में निर्णायक परिवर्तन किया। च्यांग काई-शेक को उनके ही सेनानायक झांग शुएलियांग ने बंदी बना लिया और उन पर जापान के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्रीय मोर्चा बनाने का दबाव डाला। प्रारंभ में च्यांग ने इस प्रस्ताव का विरोध किया, किंतु व्यापक जनमत, राजनीतिक नेताओं और साम्यवादियों के आग्रह के परिणामस्वरूप उन्होंने अंततः समझौता स्वीकार कर लिया। इसके फलस्वरूप कुओमिंतांग और साम्यवादी दल के बीच द्वितीय संयुक्त मोर्चा का गठन हुआ तथा गृहयुद्ध अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया।

राष्ट्रीय एकता और जनजागरण

संयुक्त मोर्चे के गठन के बाद चीन में राष्ट्रीय चेतना का अभूतपूर्व विकास हुआ। सरकार ने प्रेस और सार्वजनिक सभाओं पर लगाए गए अनेक प्रतिबंधों में शिथिलता प्रदान की, जिससे जनता को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर मिला। राष्ट्र की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा का प्रश्न समस्त राजनीतिक दलों का साझा उद्देश्य बन गया।

इस राष्ट्रीय एकता ने जनता में नई ऊर्जा का संचार किया। विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों, श्रमिकों और किसानों ने जापानी साम्राज्यवाद के विरोध में व्यापक जनआंदोलन प्रारंभ किए। पूरे देश में जापानी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी उत्पादन तथा राष्ट्रीय रक्षा को सुदृढ़ बनाने के अभियान चलाए गए। इस प्रकार चीन में पहली बार व्यापक स्तर पर राष्ट्रवाद एक संगठित जनशक्ति के रूप में उभरकर सामने आया।

1934–1937 ई. के दौरान चीन–जापान संबंध

1934 से 1937 ई. के बीच चीन और जापान के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने रहे। यद्यपि च्यांग काई-शेक प्रारंभ में प्रत्यक्ष युद्ध से बचने तथा समय प्राप्त करने की नीति अपनाए हुए थे, फिर भी जापान निरंतर चीन पर राजनीतिक और सैन्य दबाव बढ़ाता रहा। जापानी सरकार चीन से लगातार नई रियायतों की माँग करती रही, जिससे चीनी जनता में उसके प्रति असंतोष और अधिक बढ़ गया।

इस अवधि में अनेक छोटी-छोटी घटनाओं ने दोनों देशों के संबंधों को और अधिक बिगाड़ दिया। शंघाई तथा उत्तरी चीन में जापानी सैनिकों और चीनी नागरिकों के बीच टकराव की घटनाएँ हुईं। जापान ने मंचुकुओ तथा आंतरिक मंगोलिया में अपने समर्थक प्रशासन को सैन्य सहायता प्रदान की, जिससे चीन की संप्रभुता पर प्रत्यक्ष चुनौती उत्पन्न हुई। परिणामस्वरूप नानजिंग स्थित राष्ट्रवादी सरकार ने जापान को और अधिक राजनीतिक रियायतें देने से इंकार कर दिया।

जापान की आर्थिक स्थिति भी इस समय युद्धोन्मुख होती जा रही थी। निरंतर सैन्य विस्तार के कारण उसकी अर्थव्यवस्था पर भारी व्यय का दबाव था, फिर भी सैन्यवादियों का प्रभाव इतना बढ़ चुका था कि सरकार ने विस्तारवादी नीति जारी रखी। विदेश मंत्री हिरोता कोकी और अन्य नेताओं द्वारा समय-समय पर समझौते की बातें अवश्य की गईं, किंतु व्यवहार में जापान अपनी सैन्य तैयारियों को निरंतर आगे बढ़ाता रहा। इस प्रकार दोनों देशों के बीच संघर्ष लगभग अपरिहार्य हो गया।

अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ और युद्ध की पृष्ठभूमि

1936 ई. में जापान, जर्मनी और इटली के बीच एंटी-कोमिन्टर्न संधि संपन्न हुई, जिसका घोषित उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद का विरोध करना था। इस संधि से जापान को राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन मिला तथा उसकी आक्रामक नीति को और अधिक बल प्राप्त हुआ।

उधर संयुक्त राज्य अमेरिका अभी भी तटस्थता की नीति का अनुसरण कर रहा था, जबकि यूरोपीय शक्तियाँ अपने आंतरिक संकटों और जर्मनी की बढ़ती शक्ति से चिंतित थीं। जापान को विश्वास था कि चीन पर आक्रमण की स्थिति में उसे किसी प्रभावी अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप का सामना नहीं करना पड़ेगा। दूसरी ओर, उसे यह भी आशा थी कि आंतरिक विभाजन के कारण चीन संगठित प्रतिरोध करने में असमर्थ रहेगा। इन परिस्थितियों ने जापानी नेतृत्व को व्यापक सैन्य अभियान प्रारंभ करने के लिए प्रेरित किया।

मार्को पोलो ब्रिज (लुगोउचियाओ) की घटना

चीन–जापान युद्ध का तात्कालिक कारण 7 जुलाई 1937 ई. को बीजिंग के निकट स्थित लुगोउचियाओ पर हुई घटना थी। जापान को पूर्ववर्ती संधियों के आधार पर चीन के कुछ क्षेत्रों में सीमित संख्या में सैनिक रखने का अधिकार प्राप्त था, किंतु लुगोउचियाओ का क्षेत्र इस अधिकार के अंतर्गत नहीं आता था। इसके बावजूद जापानी सेना वहाँ अपनी सैन्य गतिविधियाँ बढ़ा रही थी।

7 जुलाई की रात को जापानी सेना ने दावा किया कि चीनी सैनिकों ने उन पर गोली की है। चीन ने इस आरोप से इनकार किया और घटना की निष्पक्ष जाँच की माँग की। दोनों पक्षों के बीच वार्ता भी हुई, किंतु कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका। वास्तव में  जापानी सेना पहले से ही युद्ध की तैयारी कर चुकी थी और यह घटना सैन्य आक्रमण का बहाना बन गई।

युद्ध का आरंभ

मार्को पोलो ब्रिज की घटना के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य संघर्ष शुरू हो गया। अगस्त 1937 ई. में शंघाई क्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध प्रारंभ हुआ। 9 अगस्त के बाद तनाव अत्यधिक बढ़ गया और 13 अगस्त 1937 ई. को शंघाई में व्यापक सैन्य अभियान आरंभ हो गया। इसके साथ ही दूसरा चीन–जापान युद्ध पूर्ण रूप से प्रारंभ हो गया।

युद्ध के प्रारंभिक चरण में जापानी सेना ने अपनी आधुनिक सैन्य शक्ति के बल पर तीव्र गति से प्रगति की। 1937 ई. के अंत तक वह नानजिंग (नानकिंग) पर अधिकार करने में सफल रही। इसके बाद युद्ध का विस्तार दक्षिणी चीन तक हुआ, जहाँ जापान ने क्रमशः कैंटन (ग्वांगझोउ) तथा अन्य सामरिक क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया। आगे चलकर चीनी राष्ट्रवादी सरकार को अपनी राजधानी चोंगकिंग स्थानांतरित करनी पड़ी, जहाँ से उसने जापानी आक्रमण के विरुद्ध दीर्घकालीन प्रतिरोध का संचालन किया।

युद्ध का प्रथम चरण (अगस्त–दिसंबर 1937 ई.)

चीन-जापान युद्ध का प्रथम चरण अगस्त 1937 ई. में शंघाई से आरंभ हुआ। इस समय चीन की राष्ट्रीय सरकार ने जापानी आक्रमण का दृढ़तापूर्वक सामना किया, किंतु उसकी सैन्य शक्ति जापान की तुलना में काफी कमजोर थी। विशेष रूप से वायुसेना और आधुनिक हथियारों की कमी चीन के लिए गंभीर बाधा सिद्ध हुई। यद्यपि च्यांग काई-शेक 1933 ई. से सेना के आधुनिकीकरण और वायुशक्ति के विकास का प्रयास कर रहे थे, फिर भी उनकी स्थल एवं वायु सेनाएँ जापानी सेना की बराबरी करने में सक्षम नहीं थीं।

जापानी सेना ने युद्ध के प्रारंभिक चरण में चीन के हवाई अड्डों, सैनिक ठिकानों, रेलवे लाइनों, संचार व्यवस्था तथा औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर तीव्र बमबारी की। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपेक्षाकृत कम महत्त्व वाले क्षेत्रों पर भी हवाई हमले कर आतंक फैला दिया और  चीनी जनता का मनोबल तोड़ने का प्रयास किया। आधुनिक हथियारों और संगठित सैन्य रणनीति के कारण जापानी सेना धीरे-धीरे शंघाई पर अपना नियंत्रण स्थापित करने में सफल हुई और नवंबर 1937 ई. तक चीनी सेना को वहाँ से पीछे हटना पड़ा।

शंघाई से पीछे हटने के बाद चीनी सेना ने अपनी राजधानी नानकिंग (नानजिंग) में रक्षा की व्यापक तैयारी की। नानकिंग की सुरक्षा व्यवस्था शंघाई की अपेक्षा अधिक संगठित थी, इसलिए जापानी सेना को यहाँ अपेक्षाकृत अधिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद आधुनिक सैन्य शक्ति, तोपखाने और वायु आक्रमणों के कारण अंततः जापानी सेना नानकिंग पर अधिकार करने में सफल रही। नानकिंग पर अधिकार के पश्चात जापानी सैनिकों द्वारा व्यापक लूटपाट, हत्या और अत्याचार किए गए, जिन्हें इतिहास में ‘नानकिंग नरसंहार’ के नाम से जाना जाता है। इन अमानवीय घटनाओं ने चीनी जनता में राष्ट्रीय चेतना और प्रतिरोध की भावना को और अधिक प्रबल बना दिया।

युद्ध के प्रथम चरण का समापन जापान द्वारा यांग्त्सी नदी के निचले क्षेत्र पर अधिकार स्थापित करने के साथ हुआ। इस सफलता के बाद जापानी सरकार ने घोषणा की कि युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक च्यांग काई-शेक की सरकार को समाप्त कर सुदूर पूर्व में जापान की इच्छानुसार व्यवस्था स्थापित नहीं कर दी जाती।

युद्ध का द्वितीय चरण (1938 ई.)

युद्ध के दूसरे चरण का प्रमुख उद्देश्य चीन की नई अस्थायी राजधानी हैंकाऊ (वुहान) पर अधिकार करना तथा चीनी सेना की पुनर्गठित सैन्य शक्ति को नष्ट करना था। जापान का विश्वास था कि यदि हैंकाऊ पर अधिकार कर लिया जाए तो चीन की राजनीतिक और सैन्य शक्ति निर्णायक रूप से कमजोर हो जाएगी।

इस चरण में चीनी सेना पहले की अपेक्षा अधिक संगठित और सतर्क थी। अप्रैल 1938 ई. में ताइअरझुआंग के युद्ध में चीनी सेना ने जापान को पराजित कर दिया। यह विजय चीन के लिए अत्यंत प्रेरणादायक सिद्ध हुई और सैनिकों का मनोबल बढ़ गया। इसी अवधि में उत्तरी चीन में सक्रिय छापामार दलों ने जापानी सेना की गतिविधियों को सीमित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने जापानी नियंत्रण को बड़े नगरों, रेलवे लाइनों और प्रमुख संचार मार्गों तक सीमित रखने का प्रयास किया।

यद्यपि चीन ने अनेक स्थानों पर कड़ा प्रतिरोध किया, फिर भी जापान अपनी सैन्य श्रेष्ठता के बल पर धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। भीषण संघर्षों के बाद 25 अक्टूबर 1938 ई. को हैंकाऊ जापान के अधिकार में आ गया। इसके कुछ दिन पूर्व, 21 अक्टूबर 1938 ई. को जापानी नौसेना के सहयोग से कैंटन (ग्वांगझोउ) पर भी लगभग बिना किसी बड़े प्रतिरोध के अधिकार कर लिया गया। हैंकाऊ और कैंटन पर विजय के साथ युद्ध का दूसरा चरण समाप्त हुआ तथा जापान ने चीन के अनेक सामरिक क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।

युद्ध का तृतीय चरण

युद्ध के तीसरे चरण तक पहुँचते-पहुँचते चीन दो भागों में विभाजित हो चुका था—एक स्वतंत्र चीन, जहाँ च्यांग काई-शेक की राष्ट्रीय सरकार का नियंत्रण था और दूसरा जापान द्वारा अधिकृत चीन। यद्यपि जापान ने अनेक प्रमुख नगरों और समुद्र तटीय क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था, फिर भी वह पूरे चीन पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित नहीं कर सका।

जापान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में भी उसकी सत्ता पूर्णतः सुरक्षित नहीं थी। अनेक स्थानों पर चीनी छापामार दल तथा साम्यवादी सेनाएँ निरंतर सक्रिय रहीं। उन्होंने जापानी संचार व्यवस्था, रेलवे मार्गों तथा सैनिक ठिकानों पर लगातार आक्रमण किए। विशेष रूप से उत्तरी, उत्तर-पूर्वी तथा मध्य चीन में साम्यवादी गुरिल्ला सेनाओं ने जापान के लिए गंभीर चुनौती उत्पन्न कर दी।

चीनी प्रतिरोध का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य यह था कि जापान अपने अधिकार वाले क्षेत्रों से आर्थिक लाभ प्राप्त न कर सके। इसके लिए अनेक स्थानों पर चीनी सेनाओं और स्थानीय जनता ने फसलें नष्ट कर दीं, पुलों तथा परिवहन साधनों को क्षति पहुँचाई और संसाधनों को शत्रु के उपयोग से दूर रखा। इस नीति के कारण जापान को अपने अधिकार वाले क्षेत्रों से अपेक्षित आर्थिक लाभ प्राप्त नहीं हो सका और युद्ध दीर्घकालीन गतिरोध में बदल गया।

चीन-जापान युद्ध के राजनीतिक परिणाम

1937 ई. के युद्ध के परिणामस्वरूप जापान ने उत्तरी चीन से लेकर पीकिंग (बीजिंग), शंघाई, नानकिंग, हैंकाऊ और कैंटन तक के विस्तृत समुद्र तटीय क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। उसने पीकिंग तथा नानकिंग में अपने प्रभावाधीन सहयोगी सरकारों की स्थापना की, जिनका उद्देश्य च्यांग काई-शेक की राष्ट्रीय सरकार के समानांतर एक वैकल्पिक शासन व्यवस्था विकसित करना था।

1938 ई. में हैंकाऊ के पतन के बाद भी च्यांग काई-शेक ने आत्मसमर्पण करने या शांति स्थापित करने से इनकार कर दिया। इस कारण जापान को अपेक्षित राजनीतिक सफलता नहीं मिल सकी। बाद में कुछ चीनी नेताओं ने जापान से सहयोग का मार्ग अपनाया। परिणामस्वरूप 30 मार्च 1940 ई. को वांग चिंग-वेई के नेतृत्व में नानकिंग में जापान समर्थित सरकार की स्थापना की गई। इस व्यवस्था के अंतर्गत उत्तरी चीन में जापान की सर्वोच्चता स्वीकार की गई तथा शेष चीन में भी उसके प्रभाव को बनाए रखने का प्रयास किया गया। इस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभ तक चीन पर जापान का राजनीतिक प्रभाव पर्याप्त रूप से स्थापित हो चुका था।

युद्ध के आर्थिक परिणाम

चीन की राष्ट्रीय सरकार और उसकी सेनाओं ने युद्ध के दौरान निरंतर यह प्रयास किया कि जापान को चीन के प्राकृतिक संसाधनों और आर्थिक साधनों का लाभ न मिल सके। फिर भी जापान के अधिकार में आए अनेक औद्योगिक एवं कृषि क्षेत्र उसे कुछ आर्थिक लाभ पहुँचाते रहे।

अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए जापान ने नई मुद्रा जारी की, परिवहन व्यवस्था का पुनर्गठन किया तथा विदेशी व्यापार और नौवहन पर अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया। इससे चीन और जापान के बीच सीमित व्यापारिक गतिविधियाँ जारी रहीं। इसके बावजूद जापान की अर्थव्यवस्था कच्चे माल के लिए विदेशों, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका पर निर्भर बनी रही। लोहा, इस्पात, कपास, मशीनों के पुर्जे तथा पेट्रोलियम उत्पादों के आयात के बिना उसकी औद्योगिक व्यवस्था सुचारु रूप से नहीं चल सकती थी। यदि शीघ्र ही द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ न हुआ होता, तो संभवतः जापान चीन के संसाधनों का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर अपनी आर्थिक स्थिति को और सुदृढ़ कर सकता था।

स्वतंत्र चीन पर सांस्कृतिक प्रभाव

चीन-जापान युद्ध के दौरान जापानी अधिकार वाले क्षेत्रों से बड़ी संख्या में चीनी नागरिकों को अपने घर-बार छोड़कर सुरक्षित क्षेत्रों की ओर पलायन करना पड़ा। ये लोग शरणार्थी बन गए और उन्हें अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। युद्ध के कारण उनके खेत उजड़ गए, कृषि कार्य ठप हो गया और आजीविका के साधन नष्ट हो गए। जापानी सेना के अत्याचारों और दमनकारी व्यवहार के कारण लोगों में भय और असुरक्षा का वातावरण व्याप्त था। इस व्यापक विस्थापन ने चीन के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया।

इन शरणार्थियों में केवल सामान्य नागरिक ही नहीं, बल्कि अनेक विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों तथा शैक्षणिक संस्थानों के विद्वान, वैज्ञानिक, साहित्यकार और कलाकार भी शामिल थे। उन्होंने युद्ध की विभीषिका, चीनी जनता के कष्टों तथा जापानी साम्राज्यवाद के अत्याचारों को साहित्य और कला के माध्यम से अभिव्यक्त किया। इस काल में ऐसे उपन्यास, कविताएँ, नाटक और लेख लिखे गए जिनमें राष्ट्रीय चेतना, देशभक्ति तथा स्वतंत्रता की भावना को प्रमुख स्थान मिला। प्रसिद्ध साहित्यकार लाओ शे ने अपने उपन्यास ‘रिक्शा बॉय’ के माध्यम से साधारण चीनी नागरिकों, विशेषकर श्रमिक वर्ग के संघर्षपूर्ण जीवन का सजीव चित्रण किया। इसी प्रकार गुओ मोरुओ की कविताओं और साहित्यिक कृतियों में तत्कालीन चीन की राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

यद्यपि यह साहित्यकार वर्ग प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में सम्मिलित नहीं था, फिर भी उसने अपनी लेखनी के माध्यम से जनता का मनोबल बढ़ाने, राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने तथा जापानी आक्रमण के विरुद्ध जनमत तैयार करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। साहित्य और संस्कृति इस काल में राष्ट्रीय प्रतिरोध के प्रभावशाली माध्यम बन गए।

छात्र आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना

युद्धकाल में विशेष रूप से उत्तरी चीन के छात्रों ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने ‘गृहयुद्ध समाप्त करो’ और ‘जापानी तुष्टीकरण की नीति का अंत करो’ जैसे नारों के साथ व्यापक जनजागरण अभियान चलाया। छात्रों की सक्रिय देशभक्ति और राजनीतिक चेतना के कारण अनेक विद्यालय तथा विश्वविद्यालय जापान-विरोधी आंदोलन के प्रमुख केंद्र बन गए। इन आंदोलनों ने युवाओं में राष्ट्रीय एकता, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के प्रति गहरी निष्ठा उत्पन्न की।

शैक्षणिक संस्थानों, साहित्यकारों और छात्र आंदोलनों के संयुक्त प्रभाव से चीन के भीतरी प्रांतों में आधुनिक, राष्ट्रवादी और प्रगतिशील विचारों का तीव्र प्रसार हुआ। इससे राष्ट्रीय मनोबल सुदृढ़ हुआ तथा विदेशी प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ।

द्वितीय विश्व युद्ध और चीन-जापान संघर्ष

मुख लेख : द्वितीय विश्व युद्ध

1939 ई. में द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ होने के साथ ही चीन-जापान युद्ध अंतरराष्ट्रीय संघर्ष का एक महत्त्वपूर्ण भाग बन गया। जापान ने धुरी राष्ट्रों-जर्मनी और इटली का साथ दिया, जबकि राष्ट्रसंघ प्रभावहीन सिद्ध हो चुका था और यूरोपीय शक्तियाँ अपने-अपने युद्धों में व्यस्त थीं। परिणामस्वरूप चीन को प्रारंभिक वर्षों में बाहरी सहायता बहुत कम मिली और जापानी सेनाएँ पूर्वी चीन के अधिकांश भाग पर अधिकार स्थापित करने में सफल रहीं।

इसके बावजूद चीनी जनता और सेना ने संघर्ष जारी रखा। चीन ने आत्मसमर्पण करने के बजाय दीर्घकालीन प्रतिरोध की नीति अपनाई, जिसके कारण जापान एक लंबे और महँगे युद्ध में उलझ गया। यह संघर्ष लगभग आठ वर्षों तक चलता रहा और अंततः द्वितीय विश्व युद्ध का अभिन्न अंग बन गया। इससे चीन में राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता की भावना और अधिक सुदृढ़ हुई।

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