सल्तनतकालीन प्रांतीय एवं स्थानीय प्रशासन  (Provincial and Local Administration during the Delhi Sultanate)

सल्तनतकालीन प्रांतीय एवं स्थानीय प्रशासन  (Provincial and Local Administration during the Delhi Sultanate)

सल्तनतकालीन प्रांतीय एवं स्थानीय प्रशासन

विलायत व्यवस्था का प्रारंभ

दिल्ली सल्तनत की प्रांतीय प्रशासनिक व्यवस्था का विकास गजनवी और ग़ोरी शासनकाल से प्रारंभ हुआ। इस काल में प्रांत के लिए ‘विलायत’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। पंजाब में गजनवियों के प्रभुत्व की स्थापना के साथ ही प्रांतीय प्रशासन का प्रारंभिक स्वरूप विकसित हुआ। भीरा, सियालकोट, लाहौर तथा मुल्तान उस समय की प्रमुख विलायतें थीं। सियालकोट की विलायत जम्मू राज्य की सीमा तक विस्तृत थी, जबकि लाहौर की विलायत रावी नदी से लेकर मुल्तान की सीमा तक फैली हुई थी। गजनवी शासनकाल में कोहराम, समाना, हाँसी तथा भटिण्डा जैसी अन्य विलायतों का भी उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रांतीय प्रशासन की आधारभूत संरचना गजनवी एवं ग़ोरी शासन के समय ही विकसित हो चुकी थी।

ग़ोरी के शासनकाल में विलायतों का विस्तार

जब मुहम्मद ग़ोरी ने उत्तरी भारत में अपने राज्य का विस्तार किया, तब उसने लखनौती तक के प्रमुख दुर्गों में मुस्लिम सैनिकों की नियुक्ति की। यद्यपि दिल्ली को छोड़कर अन्य क्षेत्रों की सीमाएँ स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं थीं, फिर भी दिल्ली की विलायत पूर्व में यमुना नदी, उत्तर में शिवालिक पर्वतमाला, दक्षिण में मेवात तथा पश्चिम में कोहराम और समाना तक विस्तृत थी।

1206 ई. तक गंगा-यमुना दोआब पर अधिकार स्थापित हो जाने के बावजूद वहाँ तत्काल स्वतंत्र विलायतों का गठन नहीं किया गया। मेरठ, बरन (बुलंद शहर), कोल (वर्तमान अलीगढ़), अवध, बनारस, कालिंजर, बयाना, ग्वालियर तथा अजमेर जैसे महत्त्वपूर्ण दुर्गों और नगरों में मुस्लिम अमीरों को सैनिक टुकड़ियों सहित नियुक्त किया गया। नागौर की विजय के बाद उसे विलायत का दर्जा प्रदान किया गया, जबकि बिहार और लखनौती को तत्काल यह दर्जा नहीं मिल सका क्योंकि उन क्षेत्रों पर तुर्कों का नियंत्रण पूर्णतः सुदृढ़ नहीं हुआ था।

इल्तुतमिश के समय प्रांतीय संगठन

कुतुबुद्दीन ऐबक के लाहौर में अधिक समय तक रहने के कारण अनेक हिंदू शासकों ने अपने पूर्ववर्ती क्षेत्रों पर पुनः अधिकार कर लिया था। इल्तुतमिश ने इन क्षेत्रों को पुनः विजित कर सल्तनत की प्रांतीय व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया। उसने नागौर, सांभर, ग्वालियर, बयाना, कालिंजर तथा महोबा को विलायत का दर्जा दिया। इसके अतिरिक्त बदायूँ, कन्नौज, बनारस तथा अवध को पुनः सल्तनत में सम्मिलित कर उन्हें भी प्रांत बनाया गया। बाद में बहराइच तथा उसके आसपास के प्रदेशों को भी विलायत के रूप में संगठित किया गया।

तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभ तक दिल्ली सल्तनत में लगभग इक्कीस प्रमुख विलायतें थीं। इनमें लाहौर, मुल्तान, कोहराम-समाना, हाँसी, दिल्ली, मेरठ, कोल, बरन, संभल, कन्नौज, कड़ा-मानिकपुर, बदायूँ, अवध, बहराइच, बिहार, लखनौती, बयाना, मेवात, ग्वालियर, अजमेर तथा नागौर प्रमुख थे। इल्तुतमिश द्वारा अमरोहा को भी विलायत का दर्जा दिए जाने के बाद इनकी संख्या बढ़कर बाईस हो गई।

खिलजी काल में प्रांतीय विस्तार

अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में दिल्ली सल्तनत का क्षेत्रफल अत्यधिक विस्तृत हुआ। गुजरात, मालवा, राजस्थान तथा मध्य भारत के अनेक प्रदेशों पर अधिकार स्थापित होने के परिणामस्वरूप नई विलायतों का गठन किया गया। धार एवं उज्जैन, चित्तौड़, चंदेरी तथा अन्य विजित प्रदेशों को प्रशासनिक दृष्टि से संगठित कर विलायतों में परिवर्तित किया गया। इस प्रकार सल्तनत की विलायतों की संख्या बढ़कर लगभग अट्ठाईस से उनतीस तक पहुँच गई।

तुगलक काल में विलायतों की स्थिति

गयासुद्दीन तुगलक ने बंगाल अभियान के दौरान तिरहुत के शासक हरिसिंह देव को पराजित कर तिरहुत को भी सल्तनत में सम्मिलित किया और उसे विलायत का दर्जा प्रदान किया। मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में साम्राज्य अपने सर्वाधिक विस्तार पर पहुँचा। समकालीन लेखक शिहाबुद्दीन अल-उमरी की कृति मसालिक-उल-अबसार के अनुसार उस समय सल्तनत में तेईस प्रमुख विलायतें थीं। इनमें दिल्ली, देवगिरि, मुल्तान, कोहराम, समाना, सिविस्तान, उच्च, हाँसी, सिरसौती, माबर, तेलंग, गुजरात, बदायूँ, अवध, कन्नौज, लखनौती, बिहार, कड़ा, मालवा, लाहौर, कालानौर, जाजनगर तथा द्वारसमुद्र प्रमुख थे। इसके विपरीत, समकालीन इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी ने केवल बारह प्रमुख प्रांतों का उल्लेख किया है, जिनमें दिल्ली, गुजरात, मालवा, देवगिरि, तेलंग, काम्पिला, द्वारसमुद्र, माबर, तिरहुत, लखनौती, सतगाँव तथा सुनारगाँव सम्मिलित हैं। अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि बरनी की सूची पूर्ण नहीं है, जबकि अल-उमरी का विवरण अपेक्षाकृत अधिक व्यापक और प्रशासनिक दृष्टि से विश्वसनीय माना जाता है।

फिरोजशाह तुगलक एवं उत्तरवर्ती काल

फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल तक साम्राज्य का क्षेत्रफल पहले की तुलना में काफी घट चुका था। फलस्वरूप प्रांतों की संख्या भी घटकर लगभग चौदह रह गई। इनमें मुल्तान, दीपालपुर, समाना, सरहिंद, लाहौर, बिहार, महोबा, अवध, जौनपुर, बदायूँ, कन्नौज, मालवा, खानदेश तथा गुजरात प्रमुख थे।

सैय्यद वंश के शासनकाल में बंगाल, जौनपुर, मालवा और गुजरात जैसे महत्त्वपूर्ण प्रदेश स्वतंत्र हो गए। परिणामस्वरूप दिल्ली सल्तनत का प्रभाव सीमित रह गया और केवल बयाना, लाहौर, कोल, इटावा, चंदवार तथा मुल्तान जैसी कुछ ही विलायतों का उल्लेख मिलता है।

लोदी काल में बहलोल लोदी ने संभल, जौनपुर तथा अन्य क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित कर प्रांतीय प्रशासन को संगठित करने का प्रयास किया। सिकंदर लोदी के शासनकाल में सरहिंद, बिहार तथा सारन जैसे क्षेत्रों को भी प्रशासनिक दृष्टि से सुदृढ़ किया गया। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत के विभिन्न शासकों ने अपने साम्राज्य के विस्तार और संकुचन के अनुसार विलायतों का पुनर्गठन किया, जिससे प्रांतीय प्रशासन समयानुकूल विकसित होता रहा।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि दिल्ली सल्तनत के काल में विलायतों (प्रांतों) की संख्या साम्राज्य की सीमाओं के विस्तार और संकुचन के अनुसार निरंतर बदलती रहती थी। जब किसी क्षेत्र का विस्तार होता था तो नई विलायतों का गठन किया जाता था, जबकि साम्राज्य के सिकुड़ने पर अनेक विलायतों का पुनर्गठन अथवा विलय कर दिया जाता था। प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से कभी एक बड़ी विलायत को कई भागों में विभाजित कर दिया जाता था, तो कभी अनेक छोटी प्रशासनिक इकाइयों को मिलाकर एक नई विलायत का निर्माण किया जाता था। इस प्रकार प्रांतीय प्रशासन स्थिर न होकर परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होता रहता था।

सल्तनतकालीन प्रांतीय एवं स्थानीय प्रशासन  (Provincial and Local Administration during the Delhi Sultanate)
सल्तनतकालीन प्रांतीय एवं स्थानीय प्रशासन
विलायत का प्रमुख अधिकारी और उसके दायित्व

प्रत्येक विलायत के प्रशासन के लिए सुल्तान द्वारा एक प्रमुख अधिकारी नियुक्त किया जाता था, जिसे विभिन्न कालों में मुक्ती (मुक़्ता), वली, नायब अथवा सुल्तान-वली जैसे नामों से संबोधित किया जाता था। वह सुल्तान का प्रतिनिधि माना जाता था और कार्यपालिका, सैन्य तथा न्यायिक अधिकारों का प्रयोग उसी के नाम पर करता था। उसकी नियुक्ति, स्थानान्तरण तथा पदच्युति का अधिकार केवल सुल्तान के पास होता था, जिससे प्रांतीय प्रशासन पर केंद्रीय नियंत्रण बना रहता था।

विलायत का प्रमुख अधिकारी अपने प्रांत में शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होता था। उसे निर्धारित संख्या में सैनिक सदैव तैयार रखने पड़ते थे ताकि आवश्यकता पड़ने पर वे सुल्तान की सहायता के लिए भेजे जा सकें। वह अपने अधीनस्थ सरदारों एवं सैन्य अधिकारियों की सेनाओं का निरीक्षण करता था तथा उनकी युद्ध-तत्परता पर दृष्टि रखता था। किसी विद्रोह, बाहरी आक्रमण अथवा आंतरिक अशांति की स्थिति में उसका प्रमुख दायित्व विद्रोह का दमन करना और प्रशासनिक व्यवस्था को पुनः स्थापित करना होता था।

विलायत का प्रमुख अधिकारी न्यायिक कार्यों का भी निर्वहन करता था। वह प्रांतीय न्यायालयों में न्यायाधीश के रूप में कार्य करता तथा स्थानीय विवादों का निपटारा कराता था। साथ ही, भू-राजस्व की वसूली, कर-संग्रह की व्यवस्था तथा राजस्व अधिकारियों की देख-रेख भी उसी के अधिकार क्षेत्र में आती थी। यद्यपि उसे प्रशासनिक उत्तरदायित्व प्राप्त थे, फिर भी वह अन्य उच्च अधिकारियों की नियुक्ति करने का अधिकार नहीं रखता था। उसका प्रमुख कर्तव्य सुल्तान के आदेशों का पालन करना और केंद्रीय शासन की नीतियों को प्रांत में लागू करना था।

प्रांतीय अधिकारी पूर्णतः सुल्तान के प्रति उत्तरदायी होता था। जब सुल्तान उसकी नियुक्ति अथवा सम्मान के प्रतीक के रूप में खिलअत (सम्मानसूचक वस्त्र) भेजता था, तब वह नगर से बाहर जाकर उसका सम्मानपूर्वक स्वागत करता और राजधानी की दिशा की ओर मुख करके सुल्तान के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करता था। किसी भी अधिकारी को एक ही प्रांत में लम्बे समय तक नहीं रहने दिया जाता था। समय-समय पर उसका स्थानांतरण किया जाता था ताकि वह स्थानीय स्तर पर अत्यधिक शक्तिशाली न बन सके। प्रांतीय आय में से अपने प्रशासनिक प्रतिष्ठान का व्यय निकालकर शेष धन राजकोष में भेजना भी उसका अनिवार्य दायित्व था। वह प्रतिवर्ष सुल्तान को उपहार भी प्रेषित करता था। उसके प्रशासनिक कार्यों में साहिब-ए-दीवान (ख्वाजा) तथा अन्य राजस्व एवं लिपिक अधिकारी सहायता प्रदान करते थे।

शिक व्यवस्था का विकास

विलायतों के सुचारु प्रशासन के लिए उन्हें आगे ‘शिक’ नामक प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया। सामान्यतः माना जाता है कि इस व्यवस्था को व्यवस्थित रूप से विकसित करने का श्रेय बलबन के शासनकाल को दिया जाता है। उसके बाद के सुल्तानों ने भी प्रशासनिक सुविधा के लिए विलायतों को अनेक शिकों में विभाजित किया। खिलजी तथा तुगलक काल तक दोआब और पूर्वी प्रदेशों सहित अधिकांश क्षेत्रों में यह व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी।

फिरोजशाह तुगलक के समय प्रमुख शिकों में समाना, हिसार फिरोजा, हाँसी, सरहिंद, कोल, बदायूँ, बयाना, ग्वालियर, मेवात, धार, सण्डीला, डलमऊ, दीपालपुर, बहराइच तथा महोबा-कालपी आदि सम्मिलित थे। उदाहरण के लिए, शिक-ए-बदायूँ के अधिकार क्षेत्र में वर्तमान बदायूँ, बरेली तथा शाहजहाँपुर के क्षेत्र आते थे। सैय्यद वंश के समय भी हिसार फिरोजा, मुल्तान, दीपालपुर, समाना, सहारनपुर, मियाँ-दोआब, दारुल-मुल्क दिल्ली, संभल तथा अलवर जैसे अनेक शिक विद्यमान थे।

लोदीकालीन सरकार व्यवस्था

लोदी वंश के शासनकाल में ‘शिक’ शब्द का प्रयोग क्रमशः कम होने लगा और उसके स्थान पर ‘सरकार’ शब्द प्रचलित हुआ। सरकारें आकार और आय की दृष्टि से भिन्न-भिन्न थीं। कुछ सरकारों के अंतर्गत अनेक परगने थे, जबकि कुछ में अपेक्षाकृत कम परगने सम्मिलित थे। जैसे सरकार बयाना के अधीन लगभग 52 परगने थे, जबकि सरकार आगरा के अंतर्गत केवल 9 परगने आते थे। दोनों सरकारों की वार्षिक आय में भी पर्याप्त अंतर था, जिससे स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक इकाइयों का आकार समान नहीं था।

बहलोल लोदी के समय पंजाब में सियालकोट, लाहौर, दीपालपुर, समाना, सरहिंद तथा हिसार फिरोजा प्रमुख सरकारें थीं। दिल्ली के आसपास दारुल-मुल्क दिल्ली, मेवात, बयाना, मियाँ-दोआब, बरन, कोल, संभल तथा बदायूँ की सरकारें स्थापित थीं। बहलोल ने बदायूँ से लेकर अवध और जौनपुर तक अनेक सरकारों में अधिकारियों की नियुक्ति की। सिकंदर लोदी ने अपने साम्राज्य के विस्तार के साथ भीरा, नगरकोट, बहराइच, चुनार, गाजीपुर, सरवर, सारन, चंपारण, तिरहुत, चन्देरी, नागौर, शिवपुर तथा ग्वालियर जैसी नई सरकारों का गठन किया। ग्वालियर सरकार उस समय अत्यधिक समृद्ध मानी जाती थी और उससे पर्याप्त भू-राजस्व प्राप्त होता था। स्पष्ट है कि सरकारों की संख्या भी साम्राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती थी।

शिकदार एवं उसके सहयोगी

प्रत्येक शिक के प्रशासन के लिए शिकदार की नियुक्ति की जाती थी। वह उस क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखने, विद्रोहों का दमन करने तथा सैन्य शक्ति का संचालन करने के लिए उत्तरदायी होता था। भू-राजस्व की वसूली में भी वह राजस्व अधिकारियों की सहायता करता था। उसके सहयोग के लिए आमिल, मुतसर्रिफ तथा अन्य राजस्व कर्मचारी नियुक्त किए जाते थे, जो कर-संग्रह, अभिलेख-रक्षा तथा लेखा-व्यवस्था का कार्य करते थे।

इक्ता व्यवस्था

सल्तनतकालीन प्रशासन की एक अन्य महत्त्वपूर्ण इकाई इक्ता थी। इसका आकार परिस्थितियों के अनुसार किसी शिक के बराबर अथवा उससे छोटा हो सकता था। तेरहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कोल, संभल, कन्नौज और बिहार जैसी इक्ताओं का उल्लेख मिलता है। बरनी के विवरण से ज्ञात होता है कि बलबन ने अनेक विलायतों को शिकों और इक्ताओं में विभाजित कर उनके प्रशासन की जिम्मेदारी योग्य अमीरों को सौंपी। अमरोहा की विलायत में भी उसने अनेक इक्ताओं का गठन किया तथा उनके अधीन सैनिक टुकड़ियाँ नियुक्त कीं।

बाद के काल में रापरी, चंदेरी, धार, सण्डीला, कन्नौज, अवध, जौनपुर, जफराबाद, बिहार तथा तिरहुत जैसी अनेक इक्ताओं का उल्लेख मिलता है। प्रत्येक इक्ता का प्रमुख अधिकारी इक्तादार कहलाता था। उसका मुख्य दायित्व अपने क्षेत्र में शांति एवं व्यवस्था बनाए रखना, विद्रोहों का दमन करना, भू-राजस्व की वसूली में सहायता देना तथा निर्धारित व्यय निकालने के पश्चात शेष राजस्व राजकोष में भेजना था। इन उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए उसे सैनिक बल रखने की अनुमति होती थी। इक्तादार की नियुक्ति सीधे सुल्तान द्वारा की जाती थी और वह अपने सभी कार्यों के लिए उसी के प्रति उत्तरदायी रहता था। सुल्तान को आवश्यकता पड़ने पर उसका स्थानांतरण, पदच्युति, पदोन्नति अथवा दंड देने का पूर्ण अधिकार प्राप्त था।

परगना प्रशासन

सल्तनतकालीन प्रशासन में विलायत (प्रांत) के बाद दूसरी प्रमुख प्रशासनिक इकाई ‘परगना’ थी। प्रत्येक परगने का एक प्रमुख अधिकारी होता था, जिसे सामान्यतः चौधरी कहा जाता था। यह पद प्रायः वंशानुगत होता था और स्थानीय समाज में उसका विशेष प्रभाव रहता था। चौधरी का मुख्य दायित्व परगने में शांति एवं व्यवस्था बनाए रखना, स्थानीय निवासियों के हितों की रक्षा करना तथा प्रशासनिक अधिकारियों को उनके कार्यों में सहयोग प्रदान करना था। वह राज्य और स्थानीय समाज के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता था।

परगने के प्रशासन में चौधरी के अतिरिक्त अनेक अधिकारी नियुक्त होते थे, जिनमें आमिल (या मुतसर्रिफ), सरहंग, मुशरिफ, मुहस्सिल, गुमाश्ता तथा कानूनगो (कानून) प्रमुख थे। आमिल अथवा मुतसर्रिफ भू-राजस्व व्यवस्था का संचालन करता था। मुशरिफ का कार्य खेतों में खड़ी फसल का निरीक्षण कर राज्य के लिए लगान का निर्धारण करना था। मुहस्सिल किसानों से नकद अथवा उपज के रूप में लगान वसूल करता था। गुमाश्ते सरकारी आदेशों एवं निर्देशों को कृषकों तक पहुँचाते थे, जबकि कानूनगो भूमि, राजस्व तथा अन्य प्रशासनिक अभिलेखों का लेखा-जोखा सुरक्षित रखते थे। इन अधिकारियों के सामूहिक प्रयास से परगना प्रशासन सुचारु रूप से संचालित होता था।

ग्राम प्रशासन

परगने के नीचे ‘ग्राम’ प्रशासन की सबसे छोटी और आधारभूत इकाई था। गाँव का प्रमुख अधिकारी ‘मुकद्दम’ अथवा ‘खूत’ कहलाता था। सामान्यतः यह पद भी स्थानीय प्रभावशाली भूमिधर परिवारों के पास रहता था। मुकद्दम गाँव की प्रशासनिक व्यवस्था, राजस्व संग्रह तथा राज्य के आदेशों के पालन की देख-रेख करता था।

ग्राम प्रशासन का संचालन मुख्यतः स्थानीय अधिकारियों के हाथों में होता था। प्रत्येक गाँव में एक ग्राम पंचायत भी विद्यमान रहती थी, जो स्थानीय विवादों का निपटारा करती थी। भूमि, सिंचाई, पारिवारिक विवाद, सामाजिक मामलों तथा छोटे-मोटे अपराधों का समाधान प्रायः पंचायत द्वारा ही किया जाता था। इस प्रकार ग्राम स्तर पर न्याय एवं प्रशासन का अधिकांश कार्य स्थानीय परंपराओं और पंचायत व्यवस्था के माध्यम से सम्पन्न होता था।

अर्द्धस्वतंत्र स्थानीय शासक

सल्तनत काल में कुछ राजा, रावत, राय तथा जमींदार ऐसे भी थे, जिन्हें अर्द्धस्वतंत्र स्थिति प्राप्त थी। वे दिल्ली सल्तनत की अधीनता स्वीकार करते हुए नियमित रूप से वार्षिक कर अथवा कर-भेंट का भुगतान करते थे, परन्तु अपने क्षेत्रों के आंतरिक प्रशासन में पर्याप्त स्वायत्तता बनाए रखते थे। वे अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से कृषकों से भू-राजस्व की वसूली कराते थे तथा अपने क्षेत्रों में शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने के लिए निजी सैनिक बल भी रखते थे। आवश्यकता पड़ने पर वे सुल्तान की सैन्य सहायता भी करते थे।

शहरी प्रशासन

दिल्ली सल्तनत की स्थापना से पूर्व ही उत्तर भारत में अनेक विकसित नगर विद्यमान थे। सल्तनत काल में राजनीतिक स्थिरता, व्यापार, उद्योग तथा प्रशासनिक विस्तार के कारण अनेक नए नगर बसाए गए, जिससे नगरों की संख्या और महत्त्व दोनों में वृद्धि हुई। प्रत्येक नगर में कानून-व्यवस्था, व्यापार, सार्वजनिक जीवन तथा नैतिक अनुशासन बनाए रखने के लिए विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी। इनमें मुहतसिब और कोतवाल सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी थे।

मुहतसिब के कार्य एवं अधिकार

मुहतसिब नगर का नैतिक एवं सार्वजनिक अनुशासन बनाए रखने वाला अधिकारी था। उसका प्रमुख दायित्व सार्वजनिक जीवन में शालीनता स्थापित करना तथा सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्था की रक्षा करना था। वह अनैतिक गतिविधियों, जुआ, मद्यपान, सार्वजनिक उपद्रव तथा समाज-विरोधी कार्यों पर नियंत्रण रखता था। साथ ही वह यह भी देखता था कि धार्मिक आचरण एवं सार्वजनिक अनुशासन का पालन हो रहा है या नहीं।

मुहतसिब का एक महत्त्वपूर्ण कार्य बाजारों की देख-रेख करना भी था। वह समय-समय पर नाप-तौल के बाटों की जाँच करता, कम तौलने वाले व्यापारियों तथा वस्तुओं में मिलावट करने वालों को दण्डित करता था। वह व्यापार में ईमानदारी एवं उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा सुनिश्चित करता था।

विधिवेत्ताओं ने उसके अधिकारों की स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित की थीं। उदाहरणतः ऋण अथवा संपत्ति से संबंधित विवादों का अंतिम निर्णय काजी द्वारा किया जाता था। मुहतसिब केवल उन मामलों में हस्तक्षेप करता था जहाँ सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिक अनुशासन अथवा व्यापारिक अनियमितता का प्रश्न होता था। वह सेवकों एवं दासों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार को रोकता, पशुओं पर अत्यधिक भार लादने जैसी अमानवीय प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखता तथा सार्वजनिक सुविधाओं की देख-रेख भी करता था।

नगर की जलापूर्ति, सड़कों, नगर-दीवारों, सार्वजनिक भवनों तथा यात्रियों की सुविधाओं पर ध्यान देना भी उसके दायित्वों में सम्मिलित था। जो भवन जर्जर होकर जनसुरक्षा के लिए खतरा बन जाते थे, उन्हें हटाने अथवा ध्वस्त कराने का आदेश भी वही देता था। इस प्रकार मुहतसिब केवल धार्मिक अधिकारी ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन की व्यवस्था बनाए रखने वाला महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकारी भी था।

कोतवाल

प्रत्येक नगर में कोतवाल की नियुक्ति की जाती थी, जो नगर की शांति एवं सुरक्षा का सर्वोच्च अधिकारी होता था। उसके अधीन अश्वारोही एवं पैदल सैनिकों का पुलिस बल कार्य करता था, जो दिन-रात नगर में गश्त लगाकर अपराधों की रोकथाम करता था। कोतवाल नगरवासियों के सहयोग से कानून-व्यवस्था बनाए रखता था तथा प्रत्येक मोहल्ले के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को स्थानीय निगरानी का उत्तरदायित्व सौंपता था।

कोतवाल नगर के प्रत्येक निवासी का अभिलेख रखता था। वह नवागन्तुक व्यक्तियों, नगर छोड़ने वालों तथा संदिग्ध गतिविधियों पर निरंतर दृष्टि रखता था। वह अपराधियों की खोज, हत्या अथवा चोरी जैसे अपराधों की जाँच, कारागारों की व्यवस्था तथा न्यायालय द्वारा दिए गए दण्डों के क्रियान्वयन की देख-रेख करता था। इसके अतिरिक्त वह बेरोजगार व्यक्तियों का विवरण तैयार कर उन्हें रोजगार उपलब्ध कराने का भी प्रयास करता था। नगर की सुरक्षा, प्रशासनिक व्यवस्था तथा महत्त्वपूर्ण घटनाओं की नियमित सूचना वह सुल्तान अथवा केंद्रीय प्रशासन को भेजता रहता था। इस प्रकार कोतवाल नगर प्रशासन का सबसे प्रभावशाली कार्यकारी अधिकारी था।

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