सल्तनतकालीन केंद्रीय शासन व्यवस्था
केंद्रीय शासन व्यवस्था का स्वरूप
दिल्ली सल्तनत (1206–1526 ई.) की शासन-व्यवस्था मूलतः निरंकुश राजतंत्र पर आधारित थी। शासन का सर्वोच्च अधिकारी सुल्तान होता था, जिसकी सत्ता सैद्धांतिक रूप से सर्वोपरि मानी जाती थी। उसकी आज्ञा ही राज्य का सर्वोच्च आदेश समझी जाती थी और प्रशासन का संपूर्ण ढाँचा उसी के अधिकार से संचालित होता था। यद्यपि सिद्धांततः सुल्तान को सार्वभौम शासक माना जाता था, परंतु व्यवहार में विशाल साम्राज्य का संचालन अकेले उसके लिए संभव नहीं था। उसकी शक्ति का वास्तविक आधार एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र, सक्षम अधिकारियों, मंत्रियों तथा विभिन्न स्तरों के कर्मचारियों का सहयोग था।
सल्तनत काल में केंद्रीय, प्रांतीय तथा स्थानीय प्रशासन की सुदृढ़ व्यवस्था विकसित की गई थी। इन्हीं प्रशासनिक इकाइयों के माध्यम से सुल्तान की सत्ता संपूर्ण राज्य में प्रभावी होती थी। अतः यह स्पष्ट है कि सुल्तान यद्यपि राज्य का सर्वोच्च शासक था, फिर भी उसका शासन मंत्रियों, अमीरों, उलमा, सैन्य अधिकारियों तथा प्रशासनिक कर्मचारियों के सहयोग पर आधारित था। इसके अतिरिक्त ग्रामीण स्तर पर मुखिया, मुकद्दम, चौधरी, पटवारी तथा स्थानीय भू-स्वामियों का सहयोग भी शासन के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक था।
सल्तनत काल की प्रशासनिक व्यवस्था में केंद्रीय शासन का स्थान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था। प्रांतीय और स्थानीय प्रशासन की सफलता भी केंद्रीय शासन की शक्ति और दक्षता पर निर्भर करती थी। यदि केंद्र दुर्बल पड़ता, तो प्रांतों में विद्रोह, स्वायत्तता की प्रवृत्ति तथा प्रशासनिक अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती थी। इसलिए सभी प्रमुख विभागों का संचालन राजधानी से किया जाता था। दिल्ली सल्तनत की राजधानी समय-समय पर परिवर्तित होती रही। कुतुबुद्दीन ऐबक के समय लाहौर प्रमुख सत्ता-केंद्र था, जबकि इल्तुतमिश से लेकर बहलोल लोदी तक दिल्ली राजधानी रही। बाद में सिकंदर लोदी ने आगरा को राजधानी बनाया, जिसे उसके उत्तराधिकारी इब्राहिम लोदी ने भी बनाए रखा। केंद्रीय शासन के दो प्रमुख अंग थे—सार्वजनिक प्रशासन तथा राजमहल (घरेलू) विभाग। सार्वजनिक प्रशासन राज्य के विभिन्न विभागों का संचालन करता था, जबकि राजमहल विभाग सुल्तान के व्यक्तिगत, राजकीय तथा घरेलू कार्यों का प्रबंधन करता था।
मंत्रिपरिषद का संगठन
इस्लामी राजनीतिक परंपरा में योग्य मंत्रियों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान माना गया है। अरब की एक प्रसिद्ध उक्ति है कि वीर पुरुषों को अस्त्र-शस्त्र की आवश्यकता होती है, जबकि बुद्धिमान शासकों को योग्य मंत्रियों की। स्वयं मुहम्मद भी अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों पर अपने साथियों से परामर्श करते थे। इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए दिल्ली सल्तनत के सुल्तान भी मंत्रियों की सलाह से शासन चलाते थे।
केंद्रीय स्तर पर एक संगठित मंत्रिपरिषद कार्य करती थी। इसके प्रमुख विभाग थे—दीवान-ए-वजारत, दीवान-ए-अर्ज (आरिज-ए-ममालिक), दीवान-ए-इंशा तथा दीवान-ए-रसालत। आवश्यकता पड़ने पर नायब-ए-ममालिक की नियुक्ति भी की जाती थी। इसके अतिरिक्त सद्र-उस-सुदूर तथा दीवान-ए-कज़ा के प्रमुख भी मंत्री-स्तर के अधिकारी माने जाते थे। राजमहल विभाग का प्रधान अधिकारी भी अनेक अवसरों पर मंत्रिपरिषद के प्रभावशाली सदस्य के समान महत्त्व रखता था।
दीवान-ए-वजारत और वजीर का पद
केंद्रीय प्रशासन का सबसे महत्त्वपूर्ण विभाग दीवान-ए-वजारत था, जिसका अध्यक्ष वजीर कहलाता था। इस्लामी राजनीतिक चिंतन में वजीर के पद को अत्यंत प्रतिष्ठित माना गया है। मध्यकालीन लेखक इब्न अल-तिक्तका ने अपनी प्रसिद्ध कृति अल-फ़ख़री में वजीर को सुल्तान और प्रजा के मध्य की सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी बताया है। इसी प्रकार फ़ख़्र-ए-मुदब्बिर के अनुसार साम्राज्य की समृद्धि और स्थिरता योग्य वजीर पर निर्भर करती है। उनका मत था कि सुल्तान को प्रशासनिक कार्यों का अधिकांश भार अपने वजीर को सौंप देना चाहिए, क्योंकि उसी के परामर्श से राज्य में जनकल्याण और सुशासन संभव होता है।
इस्लामी विधिवेत्ताओं ने भी वजीर की वैधानिक स्थिति का विस्तृत विवेचन किया है। उनके अनुसार वजीर सुल्तान तथा औपचारिक रूप से खलीफा का प्रमुख प्रतिनिधि होता था, जिसे शासन संचालन के लिए आवश्यक अधिकार सौंपे जाते थे।
वजीरों के प्रकार
प्रसिद्ध इस्लामी विधिवेत्ता अल-मावरदी ने वजीरों को दो श्रेणियों में विभाजित किया है—वज़ीर-ए-तफ़वीज़ तथा वज़ीर-ए-तनफ़ीज़।
वज़ीर-ए-तफ़वीज़ को व्यापक प्रशासनिक अधिकार प्राप्त होते थे। वह सुल्तान की ओर से शासन-संबंधी अधिकांश कार्य संपन्न कर सकता था। अधिकारियों की नियुक्ति, पदोन्नति, पदच्युति, प्रशासनिक निरीक्षण तथा प्रजा की शिकायतों की सुनवाई जैसे महत्त्वपूर्ण अधिकार उसके अधीन होते थे। यदि किसी विषय पर सुल्तान और वजीर दोनों के आदेश अलग-अलग जारी हो जाते, तो सामान्यतः पहले जारी किया गया आदेश मान्य माना जाता था। फिर भी अंतिम निर्णय का अधिकार सुल्तान के पास ही सुरक्षित रहता था। वजीर अपने अधिकार किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं कर सकता था और न ही अपना उत्तराधिकारी स्वयं नियुक्त कर सकता था।
इसके विपरीत, वज़ीर-ए-तनफ़ीज़ के अधिकार अपेक्षाकृत सीमित होते थे। उसका मुख्य कार्य सुल्तान के आदेशों को लागू करना, प्रशासनिक समन्वय बनाए रखना तथा शासन के दैनिक कार्यों का संचालन करना था। वह सुल्तान का प्रमुख परामर्शदाता भी होता था और राजकीय निर्णयों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी उसी पर होती थी।
दिल्ली सल्तनत में दोनों प्रकार के वजीरों की नियुक्ति हुई। जब सुल्तान दुर्बल अथवा अनुभवहीन होता था, तब वज़ीर-ए-तफ़वीज़ की शक्ति बढ़ जाती थी। इसके विपरीत शक्तिशाली एवं सक्षम सुल्तानों के शासनकाल में वज़ीर-ए-तनफ़ीज़ की भूमिका प्रमुख रहती थी।
वजीर के कार्य एवं अधिकार
वजीर दिल्ली सल्तनत का प्रधान प्रशासनिक अधिकारी था। सुल्तान जब युद्ध-अभियानों, विजयों या राजकीय यात्राओं में व्यस्त रहता था, तब साम्राज्य का संपूर्ण प्रशासन वजीर के हाथों संचालित होता था। उसका प्रमुख कार्य राजस्व की व्यवस्था करना, करों की वसूली सुनिश्चित करना, विभिन्न विभागों का समन्वय करना तथा प्रशासनिक कर्मचारियों की नियुक्ति एवं नियंत्रण करना था।
केंद्रीय वित्त विभाग का संचालन भी उसी के अधीन होता था। वह भू-राजस्व तथा अन्य करों की वसूली पर नियंत्रण रखता था, राजकोष की आय-व्यय का परीक्षण करता था तथा विभिन्न विभागों द्वारा प्रस्तुत लेखों की जाँच करवाता था। उसके अधीन कार्यरत कर्मचारी सभी कार्यालयों के लेखे-जोखे का परीक्षण करते थे और विभागीय व्यय की स्वीकृति भी उसी के माध्यम से दी जाती थी।
वजीर कारखानों (कारख़ानों), अस्तबलों तथा शाही भंडारों का निरीक्षण करता था। घोड़ों, ऊँटों, खच्चरों और अन्य शाही पशुओं का अभिलेख सुरक्षित रखना, सैनिकों, अधिकारियों तथा शिल्पकारों के वेतन का भुगतान कराना तथा विभिन्न विभागों की आवश्यकताओं के लिए धन उपलब्ध कराना भी उसके दायित्वों में सम्मिलित था। सैनिक विभाग की आर्थिक आवश्यकताओं की समीक्षा करना तथा उनकी पूर्ति सुनिश्चित करना भी उसके महत्त्वपूर्ण कार्यों में था।
इसके अतिरिक्त वजीर निर्धनों, असहायों, धार्मिक विद्वानों तथा सूफी संतों को वजीफे और आर्थिक सहायता प्रदान करने की व्यवस्था करता था। इस प्रकार दीवान-ए-वजारत केवल वित्त विभाग तक सीमित न होकर संपूर्ण केंद्रीय प्रशासन का सबसे प्रभावशाली और उत्तरदायी विभाग था, जिसके माध्यम से दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन और समन्वय सुनिश्चित किया जाता था।
वजीर के सहयोगी अधिकारी
दिल्ली सल्तनत के केंद्रीय प्रशासन में वजीर का पद अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता था। शासन की सफलता काफी हद तक सुल्तान और वजीर के बीच पारस्परिक विश्वास, समन्वय तथा सहयोग पर निर्भर करती थी। यदि दोनों के मध्य मतभेद उत्पन्न हो जाते, तो प्रशासनिक एवं राजनीतिक संकट की स्थिति पैदा हो सकती थी। इसलिए सुल्तान प्रायः ऐसे व्यक्ति को वजीर नियुक्त करता था जो प्रशासनिक अनुभव से सम्पन्न, दूरदर्शी, न्यायप्रिय, साहसी, अनुशासनप्रिय, विनम्र, मृदुभाषी तथा कर्तव्यनिष्ठ हो। वजीर केवल वित्त एवं प्रशासन का प्रमुख अधिकारी ही नहीं था, बल्कि वह सुल्तान का मुख्य परामर्शदाता भी था और शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने में उसकी केंद्रीय भूमिका होती थी।
वजीर के कार्यों के संचालन में अनेक उच्चाधिकारी उसकी सहायता करते थे। इनमें नायब-ए-वजीर, मुशरिफ-ए-ममालिक तथा मुस्तौफी-ए-ममालिक विशेष रूप से उल्लेखनीय थे। नायब-ए-वजीर वजीर का प्रमुख सहायक होता था। मुशरिफ-ए-ममालिक आय-व्यय तथा लेखा-जोखा का संधारण करता था, जबकि मुस्तौफी-ए-ममालिक लेखों का परीक्षण एवं लेखा-परीक्षा (ऑडिट) करता था। इन अधिकारियों के सहयोग से वजीर राजस्व, व्यय तथा प्रशासनिक नियंत्रण को व्यवस्थित बनाए रखता था।
दीवान-ए-आरिज (सेना विभाग)
केंद्रीय मंत्रिपरिषद का दूसरा महत्त्वपूर्ण विभाग दीवान-ए-आरिज अथवा सेना विभाग था, जिसके अध्यक्ष को आरिज-ए-ममालिक कहा जाता था। यह विभाग सल्तनत की सैन्य व्यवस्था का प्रमुख केंद्र था। आरिज-ए-ममालिक का मुख्य कार्य सैनिकों की भर्ती, उनके नाम, हुलिए तथा सेवा-विवरण का अभिलेख तैयार करना, घोड़ों एवं अन्य सैन्य संसाधनों का पंजीकरण करना तथा सेना का नियमित निरीक्षण करना था। वह सैनिकों में अनुशासन बनाए रखने, उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था करने, वेतन निर्धारित करने और समय पर उसका वितरण सुनिश्चित करने का उत्तरदायी होता था। साथ ही हाथियों, घोड़ों तथा अन्य सैन्य सामग्री की व्यवस्था भी इसी विभाग के अधीन होती थी।
यह विभाग इतना महत्त्वपूर्ण था कि अनेक अवसरों पर सुल्तान स्वयं इसकी कार्यप्रणाली में विशेष रुचि लेता था। यद्यपि आरिज-ए-ममालिक सैन्य प्रशासन का प्रमुख अधिकारी था, तथापि वह सामान्यतः सेना का सर्वोच्च सेनानायक नहीं होता था। सल्तनत काल में सुल्तान ही प्रधान सेनापति माना जाता था और युद्ध के समय प्रायः स्वयं सेना का नेतृत्व करता था। केवल विशेष परिस्थितियों में ही आरिज-ए-ममालिक अथवा किसी प्रमुख अमीर को सेना का नेतृत्व सौंपा जाता था।
दीवान-ए-इंशा (पत्राचार विभाग)
दिल्ली सल्तनत के केंद्रीय प्रशासन में दीवान-ए-इंशा अत्यंत महत्त्वपूर्ण विभाग था। यह शाही पत्राचार तथा राजकीय अभिलेखों का प्रमुख कार्यालय था। इसका अध्यक्ष दबीर-ए-खास कहलाता था, जिसकी सहायता के लिए अनेक कुशल दबीर नियुक्त रहते थे। ये अधिकारी उत्कृष्ट लेखन-कला, भाषा-शैली तथा राजकीय पत्र-लेखन में दक्ष होते थे।
सुल्तान के नाम से जारी होने वाले सभी शाही फरमान, आदेश, नियुक्ति-पत्र, संधि-पत्र तथा अन्य राज्यों, अधीनस्थ शासकों एवं उच्च अधिकारियों को भेजे जाने वाले राजकीय पत्र इसी विभाग में तैयार किए जाते थे। इसके अतिरिक्त यह विभाग प्रशासनिक गतिविधियों से संबंधित गोपनीय सूचनाएँ भी एकत्र करता था और समय-समय पर उन्हें सुल्तान तक पहुँचाता था। अनुदान, जागीर तथा विशेष अधिकारों से संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों पर शाही मुहर भी इसी विभाग में लगाई जाती थी। सामान्य आदेशों पर विभागीय मुहर प्रयुक्त होती थी, जबकि विशेष महत्त्व के फरमानों पर सुल्तान स्वयं अपने हस्ताक्षर अथवा कुछ शब्द लिखकर उन्हें अधिक प्रतिष्ठित बनाता था। इन आदेशों को विभिन्न स्थानों तक पहुँचाने का कार्य खरीतादार नामक अधिकारी करते थे, जो दबीर-ए-खास के अधीन कार्यरत रहते थे। अपनी गोपनीय प्रकृति के कारण दीवान-ए-इंशा प्रशासन का अत्यंत प्रभावशाली विभाग माना जाता था।
दीवान-ए-रसालत
दीवान-ए-रसालत के स्वरूप एवं कार्यों के संबंध में इतिहासकारों के मध्य मतभेद पाया जाता है। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार यह विभाग धार्मिक मामलों से संबंधित था। इसके अंतर्गत मस्जिदों, मदरसों, खानकाहों एवं दरगाहों को अनुदान प्रदान करना, धार्मिक विद्वानों, सूफी संतों, उलेमा तथा निर्धनों को सहायता देना और धार्मिक दान-संबंधी कार्यों का संचालन किया जाता था। इस विभाग का प्रधान अधिकारी सद्र-उस-सुदूर कहलाता था। कई बार काज़ी-ए-ममालिक (मुख्य काज़ी) न्याय विभाग के साथ-साथ इस विभाग का कार्यभार भी संभालता था।
कुछ इतिहासकारों ने इसके कार्यक्षेत्र की भिन्न व्याख्या की है। डॉ. ए. बी. हबीबुल्लाह के अनुसार दीवान-ए-रसालत वास्तव में विदेश विभाग के रूप में कार्य करता था, जो विदेशी राज्यों के साथ कूटनीतिक पत्राचार, दूतों के स्वागत तथा राजनयिक संबंधों का संचालन करता था। डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव ने भी इस मत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए लिखा है कि धार्मिक अनुदानों और दान-संबंधी कार्यों का संचालन मुख्यतः सद्र-उस-सुदूर के अधीन था, जबकि कूटनीतिक पत्राचार की व्यवस्था अलग रूप में विकसित हुई। इसके विपरीत डॉ. आई. एच. कुरैशी का मत है कि दीवान-ए-रसालत मूलतः धार्मिक मामलों का ही विभाग था और उसका प्रमुख दायित्व धार्मिक संस्थाओं तथा उलेमा से संबंधित कार्यों का संचालन करना था। इस प्रकार उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि दीवान-ए-रसालत के स्वरूप के विषय में विद्वानों में मतभेद अवश्य है, किंतु धार्मिक मामलों के संचालन में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्विवाद रूप से स्वीकार की जाती है।
गुप्तचर विभाग (बरीद-ए-मुमालिक)
दिल्ली सल्तनत के केंद्रीय प्रशासन में गुप्तचर विभाग का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान था। किसी भी विशाल साम्राज्य की स्थिरता के लिए केवल सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं होती थी, बल्कि प्रशासनिक गतिविधियों, प्रांतीय अधिकारियों तथा अमीरों की गतिविधियों पर निरंतर दृष्टि रखना भी आवश्यक था। इसी उद्देश्य से गुप्तचर विभाग का संगठन किया गया था। इस विभाग का प्रमुख बरीद-ए-मुमालिक कहलाता था। उसका प्रमुख दायित्व राज्य के विभिन्न भागों से राजनीतिक, प्रशासनिक तथा सैन्य सूचनाएँ एकत्र कर उन्हें सीधे सुल्तान तक पहुँचाना था। वह प्रांतीय अधिकारियों, अमीरों, सैनिक अधिकारियों तथा स्थानीय प्रशासन की गतिविधियों पर सतत निगरानी रखता था, जिससे किसी भी प्रकार के विद्रोह, षड्यंत्र अथवा प्रशासनिक अनियमितता का समय रहते पता चल सके।
बरीद-ए-मुमालिक के अधीन समूचे साम्राज्य में बरीद नामक अधिकारी नियुक्त रहते थे। ये नियमित रूप से अपने-अपने क्षेत्रों की घटनाओं का विवरण राजधानी भेजते थे। इनके अतिरिक्त अनेक गुप्तचर भी नियुक्त किए जाते थे, जो बिना अपनी पहचान प्रकट किए सूचनाएँ एकत्र करते थे। इस पद पर केवल विश्वसनीय, योग्य तथा निष्ठावान व्यक्तियों की नियुक्ति की जाती थी। यदि कोई अधिकारी किसी विद्रोह, भ्रष्टाचार, अत्याचार अथवा अन्य महत्त्वपूर्ण घटना की सूचना छिपाता या गलत सूचना देता था, तो उसे कठोर दंड दिया जाता था। इस प्रकार गुप्तचर विभाग सुल्तान की सत्ता को सुदृढ़ बनाए रखने का प्रभावी साधन था।
दीवान-ए-रियासत
दिल्ली सल्तनत के प्रमुख विभागों के अतिरिक्त समय-समय पर विशेष आवश्यकताओं के अनुसार नए विभाग भी स्थापित किए गए। इनमें दीवान-ए-रियासत विशेष उल्लेखनीय है, जिसकी स्थापना सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी प्रसिद्ध बाजार नियंत्रण व्यवस्था को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए की थी।
इस विभाग का मुख्य उद्देश्य बाजारों में निर्धारित मूल्य-सूची के अनुसार वस्तुओं की बिक्री सुनिश्चित करना तथा मूल्य-वृद्धि, जमाखोरी और कालाबाज़ारी पर नियंत्रण रखना था। प्रत्येक प्रमुख बाजार के लिए एक अलग अधिकारी नियुक्त किया जाता था, जिसे शहना-ए-मंडी कहा जाता था। यह अधिकारी बाजारों का निरीक्षण करता, व्यापारियों पर निगरानी रखता तथा मूल्य नियंत्रण संबंधी नियमों का पालन कराता था। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु और उसकी बाजार नियंत्रण नीति के समाप्त हो जाने के बाद इस विभाग का महत्त्व भी समाप्त हो गया और संभवतः इसका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रहा।
दीवान-ए-कोही एवं अन्य विभाग
सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषि सुधारों और उत्पादन वृद्धि के उद्देश्य से दीवान-ए-कोही अथवा कृषि विभाग की स्थापना की। इस विभाग का उद्देश्य कृषि योग्य भूमि का विकास करना, नई भूमि को खेती के अंतर्गत लाना तथा कृषकों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना था। इसका प्रधान अधिकारी अमीर-ए-कोही कहलाता था, जिसकी सहायता के लिए अनेक अधिकारी नियुक्त किए गए थे। यद्यपि यह योजना अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सकी, फिर भी यह कृषि विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक प्रयोग था।
मुहम्मद बिन तुगलक ने प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार अनेक अन्य विभागों की भी स्थापना की। इनमें दीवान-ए-सियासत (दंड एवं विशेष न्याय), दीवान-ए-इमारत (लोक निर्माण), दीवान-ए-मुस्तखराज (बकाया भू-राजस्व की वसूली), दीवान-ए-बंदगान (दास विभाग), डाक विभाग तथा दीवान-ए-नज़र उल्लेखनीय थे। दीवान-ए-नज़र का कार्य राजकोष से उपहार एवं अनुदान का वितरण करना था। हाजिब द्वारा लाभार्थी की पहचान सुनिश्चित किए जाने के बाद ही राजकोष से धन अथवा उपहार प्रदान किया जाता था।
दीवान-ए-इस्तिहक
दीवान-ए-इस्तिहक पेंशन तथा धार्मिक अनुदानों से संबंधित विभाग था। इसका कार्य खानकाहों एवं धार्मिक संस्थाओं को आर्थिक सहायता देना तथा आलिमों, हाफिजों, शेखों एवं अन्य धर्मविदों को वजीफे और पेंशन प्रदान करना था। फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल में यह विभाग विशेष रूप से सक्रिय था। समकालीन विवरणों के अनुसार उस समय लगभग 4,200 आलिमों को इस विभाग के माध्यम से नियमित भत्ते और पेंशन प्रदान किए जाते थे।
दीवान-ए-खैरात
दीवान-ए-खैरात की स्थापना फिरोजशाह तुगलक ने जनकल्याण के उद्देश्य से की थी। इस विभाग का प्रमुख कार्य निर्धन मुस्लिम परिवारों की कन्याओं के विवाह हेतु आर्थिक सहायता प्रदान करना था। सहायता प्राप्त करने वाले परिवारों का विधिवत पंजीकरण किया जाता था तथा उनकी आवश्यकता के अनुसार 20, 30 अथवा 50 टंका की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती थी। यह विभाग सल्तनत काल में राज्य के सामाजिक उत्तरदायित्व का महत्त्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
दीवान-ए-बंदगान
फिरोजशाह तुगलक के समय दासों की संख्या अत्यधिक बढ़ जाने के कारण दीवान-ए-बंदगान की स्थापना की गई। फिरोजशाह ने दासों को केवल व्यक्तिगत सेवक के रूप में नहीं रखा, बल्कि उन्हें विभिन्न प्रशासनिक एवं आर्थिक कार्यों में नियोजित किया। इस विभाग का उद्देश्य दासों को प्रशिक्षण देना, उनकी योग्यता के अनुसार कार्य प्रदान करना तथा उनके वेतन, भोजन, वस्त्र और अन्य आवश्यकताओं की व्यवस्था करना था।
इस विभाग के प्रमुख अधिकारियों में चौश-ए-गूरी, नायब-ए-चौश-ए-गूरी तथा दीवान प्रमुख थे। इसके लिए पृथक राजकोष तथा अलग मजमुआदार (लेखा अधिकारी) की व्यवस्था भी की गई थी। यह विभाग फिरोजशाह की संगठित दास-प्रथा का महत्त्वपूर्ण अंग था।
न्याय व्यवस्था
दिल्ली सल्तनत के सुल्तान न्याय को शासन का पवित्र एवं अनिवार्य दायित्व मानते थे। इसलिए न्याय विभाग को प्रशासन की अन्य शाखाओं से पृथक और विशेष महत्त्व प्रदान किया गया। यद्यपि सद्र-उस-सुदूर धार्मिक मामलों का प्रमुख अधिकारी था, किंतु अधिकांश समय वही काज़ी-ए-ममालिक अथवा प्रधान न्यायाधीश का कार्य भी करता था। सैद्धांतिक रूप से सुल्तान सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी था तथा शरियत के अनुसार न्याय सुनिश्चित करना उसका कर्तव्य माना जाता था।
मुहम्मद बिन तुगलक न्यायिक मामलों में विशेष रुचि लेता था। मुकदमों की संख्या बढ़ जाने पर उसने दीवान-ए-सियासत नामक पृथक विभाग की स्थापना की। इस विभाग में अनेक विधिवेत्ता नियुक्त किए गए थे। सुल्तान किसी भी गंभीर मामले में न्यायाधीशों के निर्णय को तभी स्वीकार करता था, जब वह स्वयं शरियत के आधार पर उसका परीक्षण कर लेता था। दीवान-ए-कज़ा में मुख्यतः दो प्रकार के अधिकारी कार्यरत रहते थे—मुफ्ती, जो विधिक मत (फ़तवा) देते थे, तथा मुतसर्रिफ, जो तथ्यों की जाँच और विधिक तर्क प्रस्तुत करते थे।
दीवान-ए-मजालिम
समकालीन स्रोतों में दो प्रमुख न्यायालयों का उल्लेख मिलता है—दीवान-ए-मजालिम तथा दीवान-ए-कज़ा। दीवान-ए-मजालिम सुल्तान का सर्वोच्च न्यायालय था, जहाँ विशेष रूप से प्रशासनिक अत्याचारों, उच्च अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतों तथा अपीलों की सुनवाई होती थी।
इब्न बतूता के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक प्रत्येक सोमवार और गुरुवार को दीवान-ए-मजालिम में बैठकर न्याय करता था। प्रार्थी पहले अपनी अर्जी किसी हाजिब को प्रस्तुत करता था। यदि वहाँ से न्याय न मिलता, तो वह काज़ी-ए-ममालिक के समक्ष अपील कर सकता था और अंतिम उपाय के रूप में सीधे सुल्तान के समक्ष न्याय की गुहार लगा सकता था। न्यायालय में सुल्तान सिंहासन पर बैठता था, उसके समीप अंगरक्षक एवं उच्च अधिकारी उपस्थित रहते थे तथा काज़ी-ए-ममालिक विधिक परामर्श देता था। वादी और प्रतिवादी दोनों के तर्क सुनने के पश्चात ही निर्णय दिया जाता था। सिकंदर लोदी के समय इस न्यायालय की अध्यक्षता अनेक अवसरों पर वजीर करता था तथा उसके साथ काज़ी और अन्य विधिवेत्ता भी उपस्थित रहते थे।
दीवान-ए-कज़ा
दीवान-ए-कज़ा सामान्य न्यायालय था, जिसके प्रधान अधिकारी काज़ी-ए-ममालिक अथवा काज़ी-उल-कुज़ात होते थे। प्रारंभ में यही अधिकारी दिल्ली के मुख्य न्यायालय का भी संचालन करता था, किंतु बाद में राजधानी दिल्ली के लिए अलग काज़ी नियुक्त किया जाने लगा। उसकी सहायता के लिए अनेक काज़ी तथा अन्य न्यायिक अधिकारी नियुक्त रहते थे। समकालीन विवरणों के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक के समय काज़ी-ए-ममालिक को लगभग 60,000 टंका वार्षिक वेतन प्राप्त होता था।
अमीर-ए-दाद एवं न्यायिक प्रशासन
न्याय विभाग का एक अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारी अमीर-ए-दाद था। सुल्तान की अनुपस्थिति में वह दीवान-ए-मजालिम की अध्यक्षता करता था तथा सुल्तान की उपस्थिति में न्यायिक कार्यवाही के संचालन और प्रशासनिक व्यवस्था पर निगरानी रखता था। मुहम्मद बिन तुगलक के समय उसका वार्षिक वेतन लगभग 50,000 टंका था।
अमीर-ए-दाद का दायित्व केवल न्यायिक कार्यवाही तक सीमित नहीं था। वह काज़ियों के न्यायालयों के प्रशासन की देखरेख करता, यह सुनिश्चित करता कि किसी अभियुक्त को उचित न्यायिक प्रक्रिया के बिना दंड न दिया जाए तथा मस्जिदों, पुलों और अन्य सार्वजनिक भवनों की देखभाल भी उसके अधिकार क्षेत्र में आती थी। इसके अतिरिक्त वह कोतवाल, पुलिस तथा मुहतसिब जैसे अधिकारियों के कार्यों पर भी निगरानी रखता था।
न्याय व्यवस्था की विशेषताएँ
सल्तनतकालीन न्याय व्यवस्था का उद्देश्य न्याय की स्थापना तथा प्रशासनिक उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करना था। इस्लामी परंपरा में न्याय को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त था। इसी कारण न्याय विभाग को सुव्यवस्थित किया गया तथा योग्य, धर्मनिष्ठ और विद्वान विधिवेत्ताओं को न्यायिक पदों पर नियुक्त किया गया। अधिकांश दीवानी और फौजदारी मुकदमों का निर्णय शरियत तथा प्रचलित विधिक परंपराओं के आधार पर किया जाता था। मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के मध्य उत्पन्न विवादों का निपटारा भी न्याय के सिद्धांतों के अनुसार किया जाता था। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश हिंदू विवाद स्थानीय पंचायतों द्वारा ही सुलझा लिए जाते थे, इसलिए ऐसे मुकदमे अपेक्षाकृत कम संख्या में दीवान-ए-मजालिम अथवा दीवान-ए-कज़ा तक पहुँचते थे।
गृह विभाग एवं राजमहल के कर्मचारी
दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था में गृह विभाग अथवा राजमहल का प्रशासन अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता था। यह केवल शाही परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि राजकीय गरिमा, अनुशासन तथा शासन की प्रतिष्ठा का प्रमुख आधार भी था। एक कर्तव्यनिष्ठ सुल्तान अपना अधिकांश समय राजकार्य में व्यतीत करता था। सामान्यतः वह प्रतिदिन लगभग दस घंटे प्रशासनिक कार्यों में लगाता था, जिनके बीच भोजन तथा नमाज़ के लिए भी समय निर्धारित रहता था। शेष समय वह मंत्रियों, विश्वस्त अमीरों, उलमा तथा अन्य प्रमुख व्यक्तियों से विचार-विमर्श, शिकार, संगीत, काव्य-श्रवण अथवा राजकीय समारोहों में व्यतीत करता था।
राजकीय अनुष्ठान, भव्य दरबार, जुलूस, उत्सव तथा भोज केवल मनोरंजन के साधन नहीं थे, बल्कि सुल्तान की शक्ति, वैभव और प्रतिष्ठा के सार्वजनिक प्रदर्शन के माध्यम भी थे। विदेशी राजदूतों, अधीनस्थ शासकों तथा सामन्तों पर इन समारोहों का गहरा प्रभाव पड़ता था और इससे सल्तनत की राजनीतिक प्रतिष्ठा सुदृढ़ होती थी।
दरबार की कार्यप्रणाली
जब सुल्तान सार्वजनिक रूप से दरबार में उपस्थित होता था, तब वह प्रजा की समस्याएँ सुनता, निर्धनों की सहायता करता तथा विभिन्न प्रशासनिक विषयों पर निर्णय देता था। इसके उपरान्त वह दरबार-ए-ख़ास में अपने विश्वस्त मंत्रियों और उच्च अधिकारियों के साथ गोपनीय विषयों पर विचार-विमर्श करता था। इसी सभा में राज्य की महत्त्वपूर्ण नीतियों का निर्धारण, उच्च अधिकारियों की नियुक्ति एवं पदोन्नति, दोषी अधिकारियों को दंड तथा विदेशों से आए राजदूतों और प्रतिनिधियों का स्वागत किया जाता था।
दरबार में विदेशी दूतों को सम्मानसूचक उपहार, खिलअत (सरोपा) तथा राजकीय सम्मान प्रदान किए जाते थे। इसी अवसर पर उनके द्वारा प्रस्तुत उपहारों का प्रदर्शन भी किया जाता था। इस प्रकार दरबार शासन संचालन के साथ-साथ राजकीय प्रतिष्ठा का भी प्रमुख केंद्र था। राजमहल के सुचारु संचालन के लिए अनेक उच्च एवं निम्न श्रेणी के अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। इनके अतिरिक्त अंगरक्षक, द्वारपाल, सेवक, सेविकाएँ तथा अन्य कर्मचारी भी महल के विभिन्न कार्यों का संचालन करते थे। महल से जुड़े अनेक विभागों के कारण प्रशासनिक व्यवस्था अत्यंत विस्तृत एवं सुव्यवस्थित थी। प्रत्येक अधिकारी के अधिकार और दायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित होते थे, जिससे समस्त कार्य निर्धारित समय एवं अनुशासन के साथ सम्पन्न हो सकें।
वकील-ए-दर
गृह विभाग का सर्वोच्च अधिकारी वकील-ए-दर कहलाता था। संपूर्ण राजमहल का प्रशासन उसके नियंत्रण में रहता था। वह शाही कर्मचारियों के वेतन एवं भत्तों का भुगतान करता था तथा राजभोजनालय, शाही शराबखाना, चिकित्सालय, राजकुमारों की देखरेख और महल की समस्त व्यवस्थाओं का निरीक्षण करता था। गृह विभाग से संबंधित सभी आदेश उसी के माध्यम से जारी किए जाते थे। वह प्रत्येक महत्त्वपूर्ण विषय सुल्तान के समक्ष प्रस्तुत कर उसकी स्वीकृति प्राप्त करता था। उसके अधीन एक पृथक सचिवालय कार्य करता था, जहाँ सभी आदेशों का अभिलेखीकरण, मुहर तथा अभिप्रमाणन किया जाता था।
राजकुमार, राजकुमारियाँ, हरम की महिलाएँ, दरबारी तथा नदीम (निकट सहयोगी) भी अपने प्रशासनिक कार्यों के लिए उसी पर निर्भर रहते थे। इस कारण वकील-ए-दर को अत्यंत विश्वसनीय तथा दक्ष अधिकारी माना जाता था। आवश्यकता पड़ने पर उसकी सहायता के लिए नायब-ए-वकील-ए-दर की भी नियुक्ति की जाती थी।
अमीर-ए-हाजिब (बारबक)
गृह विभाग का दूसरा महत्त्वपूर्ण अधिकारी अमीर-ए-हाजिब, जिसे बारबक भी कहा जाता था, दरबार की संपूर्ण व्यवस्था का प्रभारी होता था। उसका मुख्य कार्य दरबार में अमीरों, सरदारों तथा अधिकारियों को उनकी पदानुसार निर्धारित स्थान पर बैठाना तथा दरबारी अनुशासन बनाए रखना था। उसके अधीन कार्य करने वाले हाजिब सुल्तान और प्रजा के मध्य संपर्क-सूत्र का कार्य करते थे। कोई भी व्यक्ति हाजिब की अनुमति के बिना सुल्तान के सिंहासन तक नहीं पहुँच सकता था। यही अधिकारी प्रजा की अर्जियाँ सुल्तान तक पहुँचाते तथा उसके आदेश संबंधित अधिकारियों को सुनाते थे। इस प्रकार अमीर-ए-हाजिब दरबार की मर्यादा और अनुशासन का प्रमुख संरक्षक था।
नकीब एवं नकीब-ए-नुक़बा
राजकीय समारोहों तथा जुलूसों के संचालन के लिए नकीब नियुक्त किए जाते थे। ये अपेक्षाकृत निम्न श्रेणी के अधिकारी होते थे, किंतु राजकीय अनुष्ठानों में उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। वे शाही आदेशों की घोषणा सैनिकों और जनता के समक्ष करते तथा सुल्तान की सवारी के आगे-आगे चलकर उसके आगमन की सूचना देते थे। इनका प्रधान अधिकारी नकीब-ए-नुक़बा कहलाता था। वह दरबार के प्रवेश-द्वार पर स्थित चबूतरे पर बैठकर प्रत्येक आगन्तुक की पहचान और जाँच करता था तथा उचित अनुमति मिलने पर ही उसे दरबार में प्रवेश देता था। उसकी गदा पर स्वर्ण-मूठ तथा मोरपंख लगे होते थे, जो उसके पद की गरिमा का प्रतीक थे।
सर-ए-जानदार एवं शाही अंगरक्षक
सुल्तान की व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए विशेष रूप से चयनित सैनिकों को जानदार कहा जाता था। ये सुडौल, स्वस्थ तथा प्रशिक्षित सैनिक होते थे, जिनकी वेशभूषा और शस्त्रों पर विशेष ध्यान दिया जाता था। वे दरबार, जुलूस तथा अन्य सभी अवसरों पर सुल्तान के साथ रहते थे। सुल्तान ग़ियासुद्दीन बलबन ने विशेष रूप से सीस्तान के सैनिकों को अपना अंगरक्षक नियुक्त किया था। उन्हें पर्याप्त वेतन दिया जाता था और वे नंगी तलवार लेकर सुल्तान के समीप खड़े रहते थे, जिससे शाही वैभव और सुरक्षा दोनों का प्रदर्शन होता था। अधिकांश जानदार विश्वसनीय दास-वर्ग से चुने जाते थे। इन अंगरक्षकों का प्रधान अधिकारी सर-ए-जानदार कहलाता था। सामान्यतः दो सर-ए-जानदार नियुक्त किए जाते थे—एक सुल्तान के दाहिने और दूसरा बाएँ पक्ष की सुरक्षा का दायित्व निभाता था।
सिलहदार एवं सर-ए-सिलहदार
जानदारों के अतिरिक्त शाही अस्त्र-शस्त्रों की देखरेख के लिए सिलहदार नियुक्त किए जाते थे। उनका मुख्य दायित्व शाही शस्त्रागार का संरक्षण, अस्त्र-शस्त्रों का रख-रखाव तथा आवश्यकता पड़ने पर उन्हें सुल्तान के लिए उपलब्ध कराना था। वे दरबार और राजकीय यात्राओं के समय भी सुल्तान के साथ रहते थे। इनका प्रधान अधिकारी सर-ए-सिलहदार कहलाता था। प्रायः दो सर-ए-सिलहदार नियुक्त किए जाते थे—एक सुल्तान के दाहिने तथा दूसरा बाएँ पक्ष में रहकर शाही सुरक्षा और शस्त्र-व्यवस्था का संचालन करता था। इनके कारण राजमहल की सुरक्षा, अनुशासन तथा शाही प्रतिष्ठा को निरंतर सुदृढ़ता प्राप्त होती थी।
राजमहल के अन्य कर्मचारी
दिल्ली सल्तनत के राजमहल में प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए अनेक प्रकार के अधिकारी एवं कर्मचारी नियुक्त किए जाते थे। इनका कार्य केवल शाही परिवार की सेवा तक सीमित नहीं था, बल्कि महल की सुरक्षा, राजकीय अनुशासन, समारोहों की व्यवस्था तथा सुल्तान की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी इनके उत्तरदायित्वों में सम्मिलित थी। प्रत्येक कर्मचारी के कार्य स्पष्ट रूप से निर्धारित थे और वे अपने-अपने विभागों के अनुसार उत्तरदायित्व निभाते थे।
हरम की सुरक्षा व्यवस्था
शाही हरम की सुरक्षा का दायित्व मुख्यतः हिजड़ों (खोजों) के हाथों में होता था। उन्हें अत्यंत विश्वसनीय माना जाता था, इसलिए वे हरम की सुरक्षा के साथ-साथ हरम की महिलाओं और बाहरी संसार के बीच संदेशवाहक का कार्य भी करते थे। हरम के बाहरी भाग की रक्षा के लिए अलग से सुरक्षा-कर्मी नियुक्त रहते थे, जिन्हें सर-परदादारान-ए-ख़ास कहा जाता था। इनका नेतृत्व सामान्यतः कोई प्रतिष्ठित अमीर करता था।
महल का मुख्य द्वारपाल प्रतिदिन रात्रि होने से पूर्व सभी द्वारों को बंद कराने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी होता था कि प्रत्येक द्वार पर नियुक्त प्रहरी अपने स्थान पर उपस्थित है। इसके अतिरिक्त अनेक पैदल सैनिक, जिनमें अधिकांश दास होते थे, सुल्तान के शिकार, यात्राओं तथा राजकीय जुलूसों में उसके साथ चलते थे।
राजमहल के प्रमुख कर्मचारी
गृह विभाग में विभिन्न प्रकार के विशिष्ट अधिकारी कार्यरत रहते थे, जिनके दायित्व अलग-अलग थे। शाही पुस्तकालय का प्रभारी किताबदार कहलाता था। शाही भोजन तैयार होने के बाद उसे परोसने से पहले चखने का कार्य चाशनीगीर (चाशनीगीर/चश्नगीर) करता था, ताकि भोजन की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। भोजन परोसने की व्यवस्था ख़ासादार के अधीन होती थी।
शाही पेय पदार्थों एवं मदिरा की व्यवस्था शराबदार करता था, जबकि सुल्तान को पेय प्रस्तुत करने का कार्य साक़ी-ए-ख़ास के जिम्मे होता था। शाही तंबुओं, कालीनों, दरी, पर्दों, फर्नीचर तथा सैन्य अभियानों से संबंधित सामग्री का प्रबंध फर्राश करता था। तश्तदार अथवा तश्तार शाही हाथ धोने के पात्र एवं संबंधित सामग्री की व्यवस्था करता था तथा मशालदार महल और राजकीय समारोहों में प्रकाश की व्यवस्था का दायित्व निभाता था।
सुल्तान के निजी सेवक अगाची कहलाते थे। राजमहल के आंतरिक प्रशासन का संचालन दबीर-ए-सरा करता था। शाही कोष की देखरेख खजांची अथवा बहलोलदार के अधीन रहती थी। इसके अतिरिक्त छत्रदार शाही छत्र का वहन करता था, अमीर-ए-तुज़ुक राजकीय रीति-रिवाजों तथा शाही प्रतीकों का संरक्षक होता था, जबकि शाही पताकाओं की व्यवस्था कुर्वेग (संबंधित ध्वजाधिकारी) के अधीन रहती थी। शाही चिकित्सक को मालिक-उल-हुक़मा कहा जाता था।
शाही परिवार एवं हरम का राजनीतिक महत्त्व
गृह विभाग का एक प्रमुख कार्य शाही परिवार की देखभाल भी था। यद्यपि शाही परिवार के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से प्रशासन में भाग नहीं लेते थे, फिर भी उनका राजनीतिक महत्त्व पर्याप्त था। हरम की प्रधान रानी को मलिका-ए-जहाँ कहा जाता था, जबकि राजमाता को मखदूम-ए-जहाँ अथवा खुदाबंद-ज़ादा-ए-जहाँ की उपाधि प्राप्त होती थी।
सल्तनत काल में सामान्यतः हरम की महिलाओं का प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप सीमित रहा। इसका प्रमुख अपवाद रज़िया सुल्ताना थीं, जिन्होंने स्वयं अपने अधिकार से शासन किया। इल्तुतमिश की पत्नी तथा रुक्नुद्दीन फिरोज की माता शाह तुर्कान ने भी राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप किया। इसी प्रकार जलालुद्दीन फिरोज खिलजी की मृत्यु के पश्चात् उनकी पत्नी मलिका-ए-जहाँ ने अपने पुत्र रुक्नुद्दीन इब्राहीम को गद्दी पर बैठाने का प्रयास किया, किंतु अलाउद्दीन खिलजी के सत्ता ग्रहण के साथ उसका प्रभाव समाप्त हो गया।
मुहम्मद बिन तुगलक की माता अपनी उदारता और दानशीलता के लिए प्रसिद्ध थीं, किंतु उन्होंने राजनीतिक मामलों से स्वयं को दूर रखा।
राजकुमारों का पालन-पोषण
हरम में ही राजकुमारों का पालन-पोषण तथा प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा होती थी। उन्हें प्रशासन, सैन्य प्रशिक्षण तथा दरबारी आचार-विचार की शिक्षा दी जाती थी। जो राजकुमार उत्तराधिकार की दौड़ में सफल नहीं हो पाते थे, उनका भविष्य प्रायः संकटपूर्ण होता था। अनेक बार उन्हें कारागार में बंद कर दिया जाता था, अंधा बना दिया जाता था अथवा राजनीतिक कारणों से उनकी हत्या भी कर दी जाती थी। इससे उत्तराधिकार संघर्ष की कठोर वास्तविकता का पता चलता है।
सल्तनत काल में दास-प्रथा
दिल्ली सल्तनत के प्रशासन में दासों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान था। मध्यकालीन मुस्लिम शासक अपने योग्य एवं प्रशिक्षित दासों को अपनी सबसे मूल्यवान संपत्ति मानते थे। उन्हें सैनिक तथा प्रशासनिक शिक्षा देकर उच्च पदों तक पहुँचने का अवसर प्रदान किया जाता था। दास विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किए जाते थे, जिनमें युद्धबंदी, खरीद तथा उपहार के रूप में प्राप्त व्यक्ति प्रमुख थे।
मुहम्मद गोरी की कोई संतान नहीं थी। जब उससे उसके उत्तराधिकारी के विषय में पूछा गया, तब उसने उत्तर दिया कि उसके तुर्क दास ही उसके वास्तविक पुत्र हैं और वही उसके साम्राज्य के उत्तराधिकारी होंगे। यह कथन मध्यकालीन दास-प्रथा के महत्त्व को स्पष्ट करता है।
प्रशासन में दासों की भूमिका
दासों की नियुक्ति प्रारंभ में गृह विभाग में की जाती थी। निष्ठा, योग्यता तथा प्रशासनिक क्षमता सिद्ध करने के बाद उन्हें क्रमशः उच्च सैनिक एवं प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया जाता था। अनेक दास आगे चलकर साम्राज्य के सर्वाधिक प्रभावशाली अधिकारी बने। इल्तुतमिश और बलबन जैसे शासकों को भी महत्वाकांक्षी दास-अधिकारियों से अनेक बार चुनौती का सामना करना पड़ा।
अलाउद्दीन खिलजी के पास लगभग 50,000 दास थे, जिनका उपयोग मुख्यतः सैनिकों और अंगरक्षकों के रूप में किया जाता था। मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में भी दासों की संख्या बढ़ी, किंतु फिरोज शाह तुगलक के समय यह संख्या लगभग 1,80,000 तक पहुँच गई। इनमें से लगभग 40,000 दास शाही महल की सेवा में नियुक्त थे।
दीवान-ए-बंदगान और दासों का प्रबंध
दासों की विशाल संख्या के कारण फिरोज शाह तुगलक ने दीवान-ए-बंदगान नामक पृथक विभाग की स्थापना की। इस विभाग का उद्देश्य दासों के पालन-पोषण, प्रशिक्षण, नियुक्ति तथा वेतन-व्यवस्था का संचालन करना था। विभाग के प्रमुख अधिकारी की सहायता के लिए चौश-ए-घूरी, नायब-ए-चौश-ए-घूरी तथा अन्य कर्मचारी नियुक्त किए जाते थे। इसके लिए एक पृथक राजकोष की व्यवस्था भी की गई थी।
फिरोज शाह ने प्रांतीय अधिकारियों तथा इक्तादारों को आदेश दिया कि युद्धबंदियों और अन्य दासों को राजधानी भेजा जाए। अनेक दासों को दीपालपुर, मुल्तान, हिसार-ए-फिरोज़ा, समाना तथा गुजरात जैसे प्रांतों में विभिन्न कार्यों के लिए नियुक्त किया गया।
दासों का प्रशिक्षण एवं उपयोग
फिरोज शाह तुगलक ने दासों को उनकी योग्यता के अनुसार प्रशिक्षण प्रदान करने की नीति अपनाई। लगभग बारह हजार दासों को तकनीकी शिक्षा देकर शाही कारखानों में नियुक्त किया गया। साहित्य एवं धर्म में रुचि रखने वालों को धार्मिक शिक्षा दी गई तथा कुछ को मक्का भेजा गया, जहाँ वे धार्मिक अध्ययन और उपासना में जीवन व्यतीत कर सकें।
प्रांतों में नियुक्त दासों को व्यावसायिक प्रशिक्षण देने, उनकी वार्षिक प्रगति का विवरण प्रस्तुत करने तथा स्थानीय उद्योगों और कारखानों में उनकी सेवाओं का उपयोग करने के निर्देश दिए गए। स्वस्थ एवं सक्षम दासों को सैनिक प्रशिक्षण देकर सेना तथा शाही अंगरक्षक दल में सम्मिलित किया गया। अनेक दासों को आबदार, जामादार, परदादार, शराबदार, शमादार तथा इत्रदार जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया गया।
गृह विभाग में कार्यरत दासों को सामान्यतः 20 से 125 टंका तक वेतन दिया जाता था। इसके अतिरिक्त उन्हें भोजन, वस्त्र तथा अन्य आवश्यक सुविधाएँ भी निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती थीं। इस प्रकार फिरोज शाह तुगलक ने दास-प्रथा को केवल श्रम-व्यवस्था तक सीमित न रखकर उसे प्रशासन, सैन्य संगठन, शिल्प, उद्योग तथा लोककल्याण से जोड़ दिया।
शाही कारखानों का संगठन एवं महत्त्व
दिल्ली सल्तनत के गृह विभाग के अंतर्गत शाही कारखानों (कारख़ाना) का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान था। इन कारखानों का उद्देश्य राजमहल, सेना तथा शाही परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति करना था। वस्त्र, अस्त्र-शस्त्र, आभूषण, तंबू, फर्नीचर, शाही परिधान, खाद्य सामग्री तथा दैनिक उपयोग की अनेक वस्तुओं का निर्माण इन्हीं कारखानों में किया जाता था। यद्यपि शाही कारखानों का विकास विभिन्न सुल्तानों के काल में हुआ, परंतु फिरोजशाह तुगलक के समय इनका सर्वाधिक विस्तार और सुव्यवस्थित संगठन देखने को मिलता है।
मुहम्मद बिन तुगलक के काल में भी शाही कारखानों का व्यापक विकास हुआ था। समकालीन विवरणों के अनुसार केवल जरीदार वस्त्रों के निर्माण के लिए लगभग पाँच सौ कारीगर नियुक्त थे, जबकि रेशमी वस्त्रों तथा खिलअत (सम्मानस्वरूप प्रदान किए जाने वाले शाही परिधान) के निर्माण हेतु लगभग चार हजार शिल्पकार कार्यरत थे। सुल्तान प्रतिवर्ष हजारों खिलअतें उच्च अधिकारियों, अमीरों तथा विशिष्ट व्यक्तियों को सम्मानस्वरूप प्रदान करता था। इसके अतिरिक्त अस्त्र-शस्त्र, कवच, शाही उपकरण तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं के निर्माण पर भी विशेष ध्यान दिया जाता था।
फिरोजशाह तुगलक के समय कारखानों का संगठन
फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल में शाही कारखानों की संख्या लगभग छत्तीस बताई जाती है। प्रशासनिक सुविधा के लिए इन्हें दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया था— रातबी तथा गैर-रातबी कारखाने।
रातबी कारखाने वे थे जो नियमित रूप से भोजन, खाद्यान्न, पशुओं के चारे, शाही अस्तबल तथा राजभवन की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। शाही बावर्चीखाना तथा प्रकाश व्यवस्था से संबंधित शमाखाना भी इसी श्रेणी में सम्मिलित थे, जहाँ दीपक, चिराग तथा उनके लिए आवश्यक तेल की व्यवस्था की जाती थी।
इसके विपरीत, गैर-रातबी कारखानों में शाही वस्त्र, रेशमी परिधान, फर्नीचर, तंबू, शामियाने, कालीन, पर्दे, अस्त्र-शस्त्र तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं का निर्माण किया जाता था। इन कारखानों में कुशल कारीगर, शिल्पकार तथा विशेषज्ञ बड़ी संख्या में कार्य करते थे, जिससे शाही आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ उत्कृष्ट शिल्पकला का भी विकास हुआ।
कारखानों का प्रशासन
प्रत्येक शाही कारखाने के संचालन हेतु किसी अनुभवी मलिक अथवा खान को प्रधान अधिकारी नियुक्त किया जाता था। उसकी सहायता के लिए मुतसर्रिफ नियुक्त होते थे, जिनका कार्य आय-व्यय का लेखा-जोखा रखना तथा उत्पादन संबंधी अभिलेखों का संधारण करना था। प्रत्येक कारखाने में एक मुख्य अमीर भी होता था, जो निर्माण कार्य तथा कर्मचारियों के संचालन की देखरेख करता था।
फिरोजशाह तुगलक ने इन कारखानों के समुचित प्रबंधन के लिए एक पृथक दीवान नियुक्त किया। यह अधिकारी कारखानों की आय-व्यय व्यवस्था पर नियंत्रण रखता था तथा नियमित रूप से दीवान-ए-वजारत से संपर्क बनाए रखता था। प्रत्येक वर्ष के अंत में सभी कारखानों के अधिकारियों को केंद्रीय वित्त विभाग के समक्ष आय-व्यय का लेखा प्रस्तुत करना पड़ता था, जिसकी विस्तृत जाँच की जाती थी। शाही आवश्यकता से अतिरिक्त निर्मित वस्तुओं को कभी-कभी बाजार में भी विक्रय किया जाता था।
शाही अस्तबल की व्यवस्था
गृह विभाग के अंतर्गत शाही अस्तबल का भी विशेष महत्त्व था। मध्यकालीन सैन्य व्यवस्था में घोड़े सेना की प्रमुख शक्ति थे, इसलिए उनके पालन-पोषण, प्रशिक्षण तथा संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता था। फिरोजशाह तुगलक के समय दिल्ली के निकट पाँच प्रमुख अस्तबल स्थापित थे, जहाँ बड़ी संख्या में घोड़ों का पालन किया जाता था।
सल्तनत काल के अधिकांश शासक उत्कृष्ट नस्ल के अरबी तथा तुर्की घोड़ों का आयात करते थे अथवा उन्हें अंतरराष्ट्रीय घोड़ा-बाज़ारों से खरीदते थे। समकालीन स्रोतों के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक अनेक अवसरों पर अरबी घोड़े उपहारस्वरूप भी प्रदान करता था। घोड़ों की देखरेख का प्रमुख अधिकारी अमीर-ए-आख़ुर कहलाता था, जबकि हाथियों की व्यवस्था शहना-ए-पील के अधीन रहती थी। ऊँट, खच्चर, बैल तथा अन्य भारवाही पशुओं के लिए भी पृथक व्यवस्थाएँ थीं।
आखेट (शिकार) का महत्त्व
सल्तनत काल में शाही आखेट केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि सैन्य प्रशिक्षण का भी महत्त्वपूर्ण माध्यम था। शिकार अभियानों के माध्यम से सैनिकों में अनुशासन, त्वरित निर्णय क्षमता तथा युद्ध संबंधी कौशल का विकास होता था। यही कारण था कि बलबन जैसे शासकों की आखेट-प्रियता की समकालीन शासकों द्वारा भी प्रशंसा की गई।
शिकार अभियानों के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित शिकारी कुत्ते, बाज तथा अन्य पशु-पक्षी शाही कारखानों द्वारा तैयार किए जाते थे। लगभग एक हजार से बारह सौ बहेलिए सुल्तान के साथ रहते थे। उनके अतिरिक्त उच्च श्रेणी के अमीर, बड़ी संख्या में अश्वारोही, पैदल सैनिक, तीरंदाज तथा लगभग तीन हजार हाँका लगाने वाले कर्मचारी (हांकवे) भी साथ चलते थे, जो पशुओं को घेरकर शिकार के लिए प्रस्तुत करते थे।
शिकार किए गए पशुओं का मांस साथ चलने वाले सैनिकों तथा निर्धन लोगों में वितरित किया जाता था। राजधानी और प्रांतों में विशेष शिकारगाहें सुरक्षित रखी जाती थीं। शिकार व्यवस्था का संचालन अमीर-ए-शिकार तथा उसके सहायक नायब अमीर-ए-शिकार द्वारा किया जाता था।
अमीर-ए-मजलिस
गृह विभाग का एक अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारी अमीर-ए-मजलिस था। उसका कार्य शाही सभाओं, गोष्ठियों, भोजों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना था। इन सभाओं में सुल्तान अपने प्रमुख अमीरों, विद्वानों, साहित्यकारों, कवियों, कलाकारों तथा संगीतज्ञों से भेंट करता था। यहीं साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ आयोजित होती थीं। प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो ने भी अनेक अवसरों पर अपनी रचनाओं का पाठ इन्हीं शाही सभाओं में किया।
दरबारी शिष्टाचार एवं अभिवादन की परंपराएँ
दिल्ली सल्तनत में दरबारी अनुशासन तथा शिष्टाचार को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता था। केवल बहलोल लोदी के शासनकाल को छोड़कर, जब सुल्तान स्वयं को अफगान अमीरों के समकक्ष मानता था, अन्य सभी सुल्तानों ने राजकीय गरिमा और प्रतिष्ठा को सर्वोच्च स्थान दिया। दरबार में प्रत्येक अधिकारी का स्थान उसकी पदानुक्रम के अनुसार निश्चित रहता था और केवल विशिष्ट व्यक्तियों को ही सुल्तान के समीप बैठने का अधिकार प्राप्त था।
अब्बासी खलीफाओं द्वारा विकसित राजकीय अभिवादन की परंपराएँ बाद में गजनवी तथा दिल्ली सल्तनत के शासकों ने भी अपनाईं। बलबन ने ईरानी परंपरा से प्रेरित होकर सिजदा (भूमि तक झुककर अभिवादन) तथा पैबोस (सुल्तान के चरण अथवा सिंहासन को चूमना) की प्रथा को दरबार में लागू किया। यद्यपि कुछ धार्मिक विद्वानों ने इन परंपराओं को इस्लामी दृष्टि से उपयुक्त नहीं माना, फिर भी अधिकांश विधिवेत्ताओं ने इसका खुला विरोध नहीं किया। सुल्तान की अनुपस्थिति में भी दरबार में प्रवेश करते समय अधिकारी सिंहासन की ओर सम्मान प्रकट करते हुए नतमस्तक होते थे।
राजचिह्नों का महत्त्व
मध्यकालीन इस्लामी शासन व्यवस्था में राजचिह्न सार्वभौमिक सत्ता के प्रमुख प्रतीक माने जाते थे। इनमें खुत्बा, सिक्का, छत्र, पताका, राजदंड, तराज (शाही कढ़ाईयुक्त वस्त्र) तथा अन्य शाही प्रतीकों का विशेष महत्त्व था। इनका उपयोग केवल वैध शासक ही कर सकता था।
जुमे की नमाज़ तथा अन्य महत्त्वपूर्ण अवसरों पर पढ़े जाने वाले खुत्बा में खलीफा तथा वर्तमान सुल्तान का नाम लिया जाता था। यह किसी शासक की वैध सत्ता की सार्वजनिक स्वीकृति का प्रतीक माना जाता था। यदि किसी क्षेत्र में सुल्तान के नाम का खुत्बा पढ़ना बंद कर दिया जाता, तो उसे विद्रोह का संकेत माना जाता था।
प्रत्येक नए सुल्तान द्वारा अपने नाम के सिक्के जारी करना भी उसकी संप्रभुता की घोषणा का महत्त्वपूर्ण माध्यम था। इसके अतिरिक्त सोने-चाँदी की जरी से निर्मित रेशमी वस्त्रों पर सुल्तान का नाम अंकित कराना, जिसे तराज कहा जाता था, भी राजकीय विशेषाधिकार था।
समकालीन इतिहासकार शम्स-ए-सिराज अफीफ ने अनेक अन्य राजचिह्नों का भी उल्लेख किया है, जिनमें शाही ध्वज, छत्र, तुगरा, विशेष राजदंड, शाही हथियार, राजकीय दस्तावेज तथा अन्य प्रतीक सम्मिलित थे। खुत्बा को छोड़कर इन सभी राजचिह्नों की व्यवस्था गृह विभाग के अधीन होती थी, जो शाही प्रतिष्ठा, अनुशासन तथा राजसत्ता की गरिमा बनाए रखने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता था।




