सल्तनतकालीन न्याय-व्यवस्था
हिन्दू धर्मशास्त्रों तथा इस्लामी परंपरा दोनों में न्याय को शासन का मूल आधार माना गया है। दोनों के अनुसार राज्य की स्थिरता और प्रजा का कल्याण न्याय पर निर्भर करता है। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने अपनी न्याय-व्यवस्था का निर्माण मुख्यतः अब्बासी ख़िलाफ़त की न्यायिक परंपरा के आधार पर किया, जिसमें दीवानी (नागरिक) और फौजदारी (आपराधिक) न्यायालय पृथक्-पृथक् संगठित थे। प्रत्येक न्यायालय में काज़ी के अतिरिक्त लिपिक, हाजिब (न्यायालय अधिकारी), न्यायालय के अधीक्षक तथा पुलिस अधिकारी न्यायिक कार्यों में सहयोग करते थे। न्यायालयों के अभिलेख सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी थी। बाद में दारुल-अदल (न्याय भवन) की स्थापना की गई, जहाँ विभिन्न न्यायालयों के कार्यालय संचालित होते थे।
सल्तनतकालीन न्याय-व्यवस्था मुख्यतः इस्लामी कानून (शरीयत) पर आधारित थी। सुल्तान सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी था और अपील के अंतिम मामलों का निर्णय उसी के द्वारा किया जाता था। मृत्युदंड जैसे गंभीर मामलों में सुल्तान की स्वीकृति आवश्यक होती थी। राजधानी में काज़ी-उल-कुज़ात (मुख्य न्यायाधीश) सर्वोच्च न्यायिक पद पर नियुक्त होता था, जबकि प्रांतों में गवर्नर (मुक्ती अथवा नाज़िम) तथा प्रांतीय काज़ी न्याय-प्रशासन का संचालन करते थे। इनके अधीन ज़िला, परगना और ग्राम स्तर पर भी न्यायिक व्यवस्था कार्यरत थी।
न्याय के प्रमुख स्रोत कुरान, हदीस, इज्मा (विद्वानों की सर्वसम्मति) तथा कियास (तर्काधारित व्याख्या) थे। मुस्लिमों के मामलों का निर्णय शरीयत के अनुसार किया जाता था, जबकि हिन्दुओं एवं अन्य गैर-मुस्लिम समुदायों के पारिवारिक और सामाजिक विवाद प्रायः उनके धार्मिक रीति-रिवाजों तथा पंचायतों के अनुसार निपटाए जाते थे। यद्यपि आपराधिक मामलों में सुल्तान का कानून सभी प्रजा पर समान रूप से लागू होता था।
गजनवी एवं प्रारंभिक सल्तनतकालीन न्यायिक व्यवस्था
गजनवी शासनकाल में काज़ी ही मुख्य न्यायाधीश होता था। प्रत्येक प्रांत तथा प्रमुख नगर में न्याय प्रदान करने के लिए एक मुख्य काज़ी नियुक्त किया जाता था। काज़ियों के अतिरिक्त प्रांतीय सेनानायक, उच्च अधिकारी, वज़ीर तथा राजकुमार भी अपने-अपने अधिकार क्षेत्र से संबंधित विवादों का निपटारा करते थे। तथापि प्रांतीय स्तर पर काज़ी-उल-कुज़ात (मुख्य काज़ी) सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी माना जाता था। वह अन्य न्यायिक अधिकारियों के कार्यों की देखरेख करता था तथा न्याय-व्यवस्था की नियमितता बनाए रखता था।
दिल्ली सल्तनत की स्थापना के समय यह न्यायिक परंपरा उत्तर भारत में भी प्रचलित हुई और क्रमशः इसका विस्तार हुआ। प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार न्यायिक संस्थाओं का विकास किया गया तथा काज़ियों की नियुक्ति विभिन्न स्तरों पर की जाने लगी।
इस्लामी विधि के प्रमुख स्रोत
दिल्ली सल्तनत की न्याय-व्यवस्था का आधार इस्लामी विधि (शरीअत) थी। इस्लामी कानून के चार प्रमुख स्रोत स्वीकार किए जाते थे—कुरआन, हदीस, इज्मा और क़ियास।
कुरआन इस्लाम का सर्वोच्च धार्मिक ग्रंथ है, जिसमें पैग़म्बर मुहम्मद को प्राप्त ईश्वरीय आदेश एवं उपदेश संकलित हैं। इसे इस्लामी कानून का मूल एवं सर्वोच्च स्रोत माना जाता है। पैग़म्बर मुहम्मद के कथनों, आचरण तथा निर्णयों का संकलन हदीस कहलाता है, जो कुरआन की व्याख्या एवं व्यवहारिक अनुप्रयोग का आधार प्रदान करता है।
जब किसी विषय पर कुरआन एवं हदीस में स्पष्ट निर्देश उपलब्ध न होते थे, तब प्रतिष्ठित इस्लामी विधिवेत्ताओं की सर्वसम्मति से जो निर्णय दिए जाते थे, उन्हें इज्मा कहा जाता था। इसके अतिरिक्त, कुरआन, हदीस एवं इज्मा के आधार पर तर्कपूर्ण व्याख्या एवं समान परिस्थितियों में विधिक सिद्धांतों का प्रयोग क़ियास कहलाता था। विशेषतः हनफ़ी विधि-परंपरा में इसका व्यापक उपयोग हुआ। समय के साथ स्थानीय प्रथाओं एवं सामाजिक परंपराओं को भी, जहाँ वे शरीअत के प्रतिकूल न हों, न्यायिक निर्णयों में स्थान मिलने लगा।
इस्लामी कानून का स्वरूप एवं अनुप्रयोग
सैद्धांतिक रूप से इस्लामी कानून मुसलमानों के धार्मिक एवं व्यक्तिगत जीवन को नियंत्रित करता था। इसके धार्मिक प्रावधान केवल मुसलमानों पर लागू होते थे, जबकि इसके लौकिक अथवा धर्मनिरपेक्ष पक्ष का प्रयोग राज्य में रहने वाले सभी प्रजाजनों पर किया जाता था।
धर्मनिरपेक्ष कानूनों में व्यापार, क्रय-विक्रय, ऋण, संपत्ति तथा अन्य नागरिक मामलों से संबंधित दीवानी कानून सम्मिलित थे, जो मुसलमानों एवं गैर-मुसलमानों दोनों पर समान रूप से लागू होते थे। स्थानीय रीति-रिवाजों एवं प्रचलित प्रथाओं को भी अनेक मामलों में मान्यता प्राप्त थी। गैर-मुसलमानों के विवाह, उत्तराधिकार एवं धार्मिक मामलों में उनके अपने व्यक्तिगत कानूनों को मान्यता दी जाती थी।
आपराधिक कानून सभी प्रजाजनों पर समान रूप से लागू होता था। चोरी, डकैती, हत्या, राजद्रोह तथा अन्य गंभीर अपराधों के लिए दंड का प्रावधान था। इस प्रकार सल्तनतकालीन न्याय-व्यवस्था धार्मिक एवं लौकिक दोनों प्रकार के विधिक सिद्धांतों के समन्वय पर आधारित थी।
शासकों की न्याय-नीति
शरीअत के अनुसार न्याय प्रदान करना शासक का प्रमुख दायित्व माना गया था। दिल्ली सल्तनत के अधिकांश सुल्तानों ने न्याय-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखने का प्रयास किया। कुतुबुद्दीन ऐबक का अधिकांश समय नवस्थापित तुर्की राज्य को सुदृढ़ करने तथा उसके विस्तार में व्यतीत हुआ, फिर भी उसने न्यायिक व्यवस्था की उपेक्षा नहीं की। उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश को विशेष रूप से न्यायप्रिय शासक माना जाता है। प्रसिद्ध यात्री इब्न बतूता के अनुसार इल्तुतमिश ने अपने महल के बाहर एक घंटा लटकवा रखा था, जिसकी जंजीर खींचकर कोई भी फरियादी सीधे सुल्तान तक अपनी शिकायत पहुँचा सकता था। सुल्तान एवं उसके काज़ी तत्काल उसकी सुनवाई करते थे।
बलबन की कठोर न्याय-व्यवस्था
सुल्तान ग़ियासुद्दीन बलबन न्याय के विषय में अत्यंत कठोर एवं निष्पक्ष था। उसका विश्वास था कि राज्य की प्रतिष्ठा न्याय और अनुशासन पर निर्भर करती है। उसने विभिन्न अक्ताओं एवं विलायतों में बरीद (गुप्तचर) नियुक्त किए, जो अधिकारियों की गतिविधियों तथा जनता पर होने वाले अत्याचारों की सूचना सीधे सुल्तान तक पहुँचाते थे।
एक प्रसिद्ध घटना के अनुसार बदायूँ के मुक्ता मलिक बकबक ने नशे की अवस्था में अपने एक सेवक की हत्या कर दी। बलबन ने विधवा की शिकायत सुनने के बाद मलिक बकबक को कठोर दंड दिया। साथ ही उन बरीदों को भी दंडित किया, जिन्होंने समय पर घटना की सूचना नहीं दी थी। इसी प्रकार हैबत ख़ाँ द्वारा अपने सेवक की हत्या किए जाने पर उसे मृतक के परिवार को भारी क्षतिपूर्ति देनी पड़ी। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि बलबन न्याय करते समय किसी प्रकार का पक्षपात स्वीकार नहीं करता था।
जलालुद्दीन खिलजी की उदार नीति
सुल्तान जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी स्वभाव से उदार एवं क्षमाशील था। वृद्धावस्था में वह कठोर दंड देने के पक्ष में नहीं था। उसके समक्ष जब चोर अथवा ठग प्रस्तुत किए जाते थे, तब अनेक अवसरों पर वह उन्हें चेतावनी देकर छोड़ देता था। उसका विश्वास था कि सुधारात्मक नीति अनेक अपराधियों को पुनः अपराध करने से रोक सकती है। इसलिए उसके शासनकाल में दंड की अपेक्षा सुधार पर अधिक बल दिया गया।
अलाउद्दीन खिलजी की न्याय-नीति
अलाउद्दीन खिलजी ने न्याय-व्यवस्था को राज्य की सुरक्षा तथा प्रशासनिक सुदृढ़ता का प्रमुख साधन बनाया। वह अत्यंत कठोर, कर्मठ तथा दृढ़ इच्छाशक्ति वाला शासक था। अपराधियों को कठोर दंड देकर उसने राज्य में अनुशासन स्थापित किया। उसके शासनकाल में गुप्तचर व्यवस्था अत्यंत प्रभावी थी तथा प्रत्येक क्षेत्र में नियुक्त बरीद अन्याय, भ्रष्टाचार एवं विद्रोह की सूचनाएँ सीधे सुल्तान तक पहुँचाते थे।
अलाउद्दीन मुसलमानों के व्यक्तिगत एवं धार्मिक मामलों में काज़ियों तथा मुफ़्तियों को शरीअत के अनुसार निर्णय देने की अनुमति देता था, किंतु शासन एवं राज्य-हित से संबंधित विषयों में वह स्वयं को धार्मिक बंधनों से स्वतंत्र मानता था। बयाना के काज़ी मुगीसुद्दीन के साथ हुई प्रसिद्ध वार्ता में उसने स्पष्ट कहा था कि राज्य की सुरक्षा एवं राजनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह वही नीति अपनाएगा जिसे वह उपयुक्त समझे, चाहे वह शरीअत के अनुरूप हो या न हो।
इसी कारण उसके शासनकाल में अनेक ऐसे प्रशासनिक एवं न्यायिक नियम बनाए गए जो तत्कालीन राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों की आवश्यकताओं पर आधारित थे। इन नियमों के निर्माण में उसने उलेमा की स्वीकृति को अनिवार्य नहीं माना। कठोर दंड-विधान तथा प्रभावी गुप्तचर व्यवस्था के कारण उसके शासनकाल में अपराधों में उल्लेखनीय कमी आई। उसकी मृत्यु के उपरांत उसके अनेक प्रशासनिक एवं न्यायिक नियम समाप्त कर दिए गए, किंतु उसकी न्याय-नीति ने दिल्ली सल्तनत की शासन-व्यवस्था पर स्थायी प्रभाव छोड़ा।
गयासुद्दीन तुगलक की न्याय नीति
1320 ई. में गयासुद्दीन तुगलक के सिंहासनारोहण के समय दिल्ली सल्तनत अनेक राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियों से घिरी हुई थी। उसने अपने पूर्ववर्ती शासक अलाउद्दीन खिलजी की कठोर दंड-नीति को आवश्यक नहीं माना और न्याय-व्यवस्था को पुनः इस्लामी विधि (शरियत) तथा प्रचलित मुस्लिम परंपराओं के अनुरूप संचालित करने का प्रयास किया। उसका उद्देश्य न्याय को अधिक संतुलित, विधिसम्मत तथा व्यवस्थित बनाना था। उसने न्यायिक अधिकारियों को शरियत के सिद्धांतों के अनुसार निर्णय देने के निर्देश दिए और अनावश्यक कठोरता से बचने पर बल दिया। उसके शासन में न्यायिक प्रक्रिया अपेक्षाकृत संयमित तथा विधि-आधारित रही।
मुहम्मद बिन तुगलक की न्याय व्यवस्था
गयासुद्दीन तुगलक के उत्तराधिकारी मुहम्मद बिन तुगलक (1325–1351 ई.) को समकालीन लेखकों ने न्यायप्रिय शासक माना है। यद्यपि उसकी अनेक प्रशासनिक योजनाएँ असफल रहीं, फिर भी न्यायिक मामलों में वह अत्यंत सतर्क और विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाने का प्रयास करता था। इतिहासकार बदायूँनी के अनुसार उसके दरबार में चार प्रमुख मुफ़्ती सदैव उपस्थित रहते थे, जो न्यायिक मामलों में सुल्तान को परामर्श देते थे।
मुकदमों के निर्णय से पूर्व मुफ़्ती अभियुक्त तथा वादी—दोनों पक्षों की विस्तृत पूछताछ करते थे और साक्ष्यों के आधार पर अपनी राय प्रस्तुत करते थे। मुहम्मद बिन तुगलक ने उन्हें स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे किसी भी मुकदमे की पूर्ण जाँच-पड़ताल करें, क्योंकि यदि उनकी त्रुटि के कारण किसी निर्दोष व्यक्ति को मृत्युदंड दिया गया, तो उसका उत्तरदायित्व उन्हीं पर होगा। इस प्रकार न्यायिक प्रक्रिया में उत्तरदायित्व और सावधानी दोनों पर विशेष बल दिया गया।
यद्यपि शासन के उत्तरार्द्ध में निरंतर विद्रोहों और असफलताओं के कारण उसका स्वभाव कठोर हो गया था, फिर भी वह बिना पर्याप्त प्रमाण के किसी को दंडित नहीं करता था। उसके शासन में सिद्धांततः कानून सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होता था, चाहे वे उच्च पदाधिकारी हों अथवा सामान्य प्रजा। यही कारण है कि अनेक इतिहासकार उसकी न्यायप्रियता की प्रशंसा करते हैं, यद्यपि उसकी दंड-नीति कई अवसरों पर अत्यधिक कठोर भी सिद्ध हुई।
फिरोजशाह तुगलक की उदार न्याय नीति
मुहम्मद बिन तुगलक के उत्तराधिकारी फिरोजशाह तुगलक (1351–1388 ई.) का स्वभाव अपने पूर्ववर्ती शासक से भिन्न था। उसने न्याय-व्यवस्था को पूर्णतः शरियत के सिद्धांतों के अनुरूप संचालित करने का प्रयास किया। उसने ऐसे अनेक दंड समाप्त कर दिए जिन्हें वह इस्लामी विधि के अनुकूल नहीं मानता था। अंग-भंग, नाक या कान काटने तथा शरीर को स्थायी रूप से विकृत करने जैसे दंडों का प्रयोग उसने काफी सीमा तक बंद कर दिया।
फिरोजशाह का दंड-विधान अपेक्षाकृत उदार था। उसका विश्वास था कि न्याय का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक मर्यादा की रक्षा करना भी है। इसलिए उसके शासनकाल में न्यायिक प्रक्रिया अधिक मानवीय तथा विधिसम्मत स्वरूप में दिखाई देती है।
लोदी शासकों की न्याय व्यवस्था
लोदी वंश के शासकों ने भी न्याय-व्यवस्था को महत्त्व दिया। विशेष रूप से सिकंदर लोदी (1489–1517 ई.) न्यायप्रिय शासक माना जाता है। वह खुले दरबार में प्रजा की शिकायतें सुनता था और अनेक जटिल मुकदमों का निर्णय स्वयं करता था। न्यायिक कार्यों में काज़ी तथा मुफ़्ती उसकी सहायता करते थे। उसके शासनकाल में न्यायिक अधिकारियों को विधि और शरियत के अनुसार निर्णय देने के निर्देश दिए जाते थे। इस प्रकार लोदी शासन में भी न्याय-व्यवस्था सुल्तान के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रही।
सुल्तान की अदालत
दिल्ली सल्तनत की न्यायिक व्यवस्था का सर्वोच्च केंद्र सुल्तान की अदालत थी। यह दीवानी तथा फौजदारी दोनों प्रकार के मामलों की सर्वोच्च अपीलीय अदालत थी। निचली अदालतों से अपीलें इसी न्यायालय में प्रस्तुत की जाती थीं तथा विशेष परिस्थितियों में नए मुकदमे भी सीधे सुल्तान के समक्ष लाए जा सकते थे। न्याय करते समय सुल्तान की सहायता सामान्यतः दो मुफ़्ती करते थे, जो विधिक प्रश्नों पर अपनी राय देते थे। अंतिम निर्णय सुल्तान का होता था।
काज़ी-उल-क़ुज़ात
सुल्तान की अदालत के बाद न्यायिक व्यवस्था में सबसे महत्त्वपूर्ण पद काज़ी-उल-क़ुज़ात (मुख्य काज़ी या प्रधान न्यायाधीश) का था। वह साम्राज्य का सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी माना जाता था तथा दीवानी और फौजदारी मामलों की सुनवाई करता था। प्रांतीय काज़ियों तथा अन्य न्यायालयों से आने वाली अपीलों का अंतिम निर्णय भी प्रायः उसी के समक्ष होता था।
काज़ी-उल-क़ुज़ात न्याय विभाग का प्रधान अधिकारी था। उसकी नियुक्ति सुल्तान करता था और वह सुल्तान के विश्वासपात्र रहने तक अपने पद पर बना रहता था। उसकी सहायता के लिए एक या दो अन्य काज़ी तथा अनेक मुफ़्ती नियुक्त किए जाते थे। वह प्रांतीय न्यायालयों से आने वाली अपीलों की सुनवाई करता था तथा दीवानी और फौजदारी दोनों प्रकार के मामलों में निर्णय देता था।
न्यायिक कार्यों के अतिरिक्त उसके अनेक औपचारिक और प्रशासनिक दायित्व भी थे। सुल्तान के राज्यारोहण के समय वही उसे शपथ दिलाता था। आवश्यकता पड़ने पर वह सुल्तान के साथ राजधानी से बाहर भी जाता था तथा विधिक विषयों पर परामर्श देकर नए नियमों के निर्माण में सहयोग करता था। इस पद पर वही व्यक्ति नियुक्त किया जाता था जो विधिशास्त्र का गहरा ज्ञान रखता हो, निष्पक्ष, न्यायप्रिय, चरित्रवान और निर्भीक हो तथा आवश्यकता पड़ने पर सुल्तान की इच्छा के विरुद्ध भी विधि के अनुसार निर्णय देने का साहस रखता हो।
सद्र-ए-जहाँ
लगभग 1248 ई. के बाद सद्र-ए-जहाँ के पद का महत्त्व बढ़ा। कई अवसरों पर उसे धार्मिक मामलों का सर्वोच्च अधिकारी तथा मुख्य न्यायिक पदाधिकारी भी माना गया। कभी-कभी सद्र-ए-जहाँ और काज़ी-उल-क़ुज़ात—दोनों पद एक ही व्यक्ति के पास होते थे। ऐसी स्थिति में वही धार्मिक, दीवानी और फौजदारी—तीनों प्रकार के मुकदमों का निर्णय करता था।
सद्र-ए-जहाँ केवल धार्मिक विवादों का निपटारा ही नहीं करता था, बल्कि शिक्षा संस्थानों की देखरेख, न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति, विद्वानों एवं निर्धनों को वजीफ़े तथा अनुदान प्रदान करना, जकात और सदक़ा का वितरण तथा विभिन्न प्रांतों में सद्र अधिकारियों की नियुक्ति जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण दायित्व भी निभाता था। इस प्रकार उसका कार्यक्षेत्र न्यायिक, धार्मिक और शैक्षिक—तीनों क्षेत्रों तक विस्तृत था।
मुफ़्ती एवं मुहतसिब
काज़ी-उल-क़ुज़ात की अदालत में मुफ़्ती विधिक विशेषज्ञ के रूप में कार्य करते थे। वे इस्लामी विधि की व्याख्या करते, कानूनी प्रश्नों पर अपनी राय देते तथा न्यायिक निर्णयों में काज़ी की सहायता करते थे। यदि काज़ी और मुफ़्तियों के बीच किसी विधिक प्रश्न पर मतभेद उत्पन्न होता, तो अंतिम निर्णय सुल्तान द्वारा दिया जाता था।
न्यायिक व्यवस्था से संबद्ध एक अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारी मुहतसिब था। उसका कार्य सार्वजनिक नैतिकता तथा शरियत के नियमों का पालन कराना था। यदि कोई मुसलमान धार्मिक या सामाजिक नियमों का उल्लंघन करता, तो मुहतसिब उसे दंडित करता अथवा आवश्यक होने पर काज़ी-उल-क़ुज़ात की अदालत में प्रस्तुत करता था।
प्रांतीय न्यायालय
प्रांतों में न्याय-व्यवस्था चार प्रमुख स्तरों पर संगठित थी—(1) गवर्नर अथवा मुक्ता की अदालत, (2) प्रांतीय काज़ी की अदालत, (3) प्रांतीय दीवान की अदालत तथा (4) प्रांतीय सद्र-ए-जहाँ की अदालत।
प्रांतीय गवर्नर या मुक्ता सुल्तान का प्रतिनिधि होने के कारण प्रशासन और न्याय—दोनों का सर्वोच्च अधिकारी होता था। वह सभी प्रकार के दीवानी, फौजदारी तथा प्रशासनिक मामलों की सुनवाई करता था। निचली अदालतों से प्राप्त अपीलों का निर्णय भी उसकी अदालत में होता था। न्यायिक कार्यों में प्रांतीय काज़ी उसकी सहायता करता था। यदि किसी पक्ष को उसके निर्णय से असन्तोष होता, तो वह सुल्तान अथवा काज़ी-उल-क़ुज़ात की अदालत में अपील कर सकता था। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत की न्याय-व्यवस्था केंद्रीय नियंत्रण और प्रांतीय न्यायालयों के समन्वय पर आधारित थी।
प्रांतीय काज़ी की अदालत
दिल्ली सल्तनत की न्याय-व्यवस्था में प्रांतीय स्तर पर प्रांतीय काज़ी का महत्त्वपूर्ण स्थान था। यद्यपि प्रांत का सर्वोच्च अधिकारी मुक्ता (वली या गवर्नर) होता था, किंतु प्रशासनिक एवं सैन्य दायित्वों में व्यस्त रहने के कारण न्यायिक कार्यों का मुख्य भार प्रांतीय काज़ी पर ही रहता था। उसकी नियुक्ति सुल्तान द्वारा काज़ी-उल-क़ुज़ात (प्रधान काज़ी) की संस्तुति पर की जाती थी। सुल्तान को उसे पदच्युत करने अथवा स्थानान्तरित करने का अधिकार प्राप्त था।
यद्यपि प्रांतीय काज़ी की नियुक्ति केंद्र से होती थी, फिर भी वह अपने न्यायिक कार्यों में पर्याप्त स्वतंत्रता रखता था। उसके निर्णयों के विरुद्ध अपील प्रांतीय गवर्नर (मुक्ता) की अदालत में की जा सकती थी। वह दीवानी तथा फौजदारी मुकदमों की सुनवाई करता था तथा परगना काज़ियों के निर्णयों के विरुद्ध प्रस्तुत अपीलों का निपटारा भी करता था। वित्तीय एवं राजस्व संबंधी विवाद उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर थे, क्योंकि उनके लिए पृथक् न्यायिक व्यवस्था विद्यमान थी।
प्रांतीय काज़ी अपने अधीनस्थ समस्त काज़ियों के कार्यों का निरीक्षण करता था तथा परगनों में नियुक्त किए जाने वाले काज़ियों के नामों की संस्तुति भी करता था। इस प्रकार वह प्रांतीय न्यायिक प्रशासन का प्रमुख अधिकारी था।
प्रांतीय दीवान एवं सद्र की अदालतें
राजस्व तथा वित्तीय मामलों के निपटारे के लिए प्रत्येक प्रांत में प्रांतीय दीवान की पृथक् अदालत होती थी। भू-राजस्व, कर, लेखा तथा अन्य वित्तीय विवादों का निर्णय इसी न्यायालय में किया जाता था। इसके निर्णयों के विरुद्ध अपील प्रांतीय गवर्नर अथवा सुल्तान की सर्वोच्च अदालत में की जा सकती थी।
धार्मिक मामलों के निपटारे के लिए प्रांतीय सद्र की पृथक् अदालत होती थी। यह धार्मिक विवादों का निर्णय करने के साथ-साथ शिक्षा संस्थानों की देखरेख, मदरसों के संचालन तथा विद्वानों, विद्यार्थियों, निर्धनों और धार्मिक व्यक्तियों को वजीफ़ा, अनुदान तथा पेंशन प्रदान करने की संस्तुति भी करती थी। जिन मामलों में इस्लामी विधि की व्याख्या आवश्यक होती थी, वहाँ प्रांतीय सद्र प्रांतीय काज़ी के साथ मिलकर निर्णय देता था। इससे स्पष्ट होता है कि न्यायिक और धार्मिक प्रशासन में दोनों अधिकारियों का घनिष्ठ समन्वय था।
प्रांतीय न्यायिक अधिकारी
प्रांतीय न्यायालयों से अनेक सहायक अधिकारी जुड़े रहते थे, जिनमें मुफ़्ती, मुहतसिब, पुरोहित (पंडित) तथा दादबक प्रमुख थे। मुफ़्ती इस्लामी विधि के विशेषज्ञ होते थे और न्यायिक निर्णयों में काज़ी की सहायता करते थे। मुहतसिब सार्वजनिक नैतिकता तथा शरियत के पालन की देखरेख करता था। हिन्दुओं के व्यक्तिगत एवं धार्मिक मामलों में पंडित अथवा पुरोहित धर्मशास्त्रों के अनुसार परामर्श देते थे। इन अधिकारियों में दादबक का विशेष महत्त्व था। उसका कार्य न्यायालय द्वारा बुलाए गए व्यक्तियों को अदालत में उपस्थित कराना, शिकायतें एवं अपीलें दर्ज कराना तथा न्यायिक आदेशों के पालन में सहायता करना था। इस प्रकार वह न्यायालय और जनता के मध्य एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता था।
परगना स्तर की न्याय-व्यवस्था
प्रांत के नीचे परगना न्यायिक प्रशासन की प्रमुख इकाई था। यहाँ काज़ी-ए-परगना, आमिल तथा दादबक न्यायिक कार्यों में संलग्न रहते थे। परगना काज़ियों की नियुक्ति प्रांतीय काज़ी की संस्तुति पर सद्र-ए-जहाँ अथवा संबंधित प्राधिकारी द्वारा की जाती थी। परगना का काज़ी दीवानी, फौजदारी तथा इस्लामी विधि से संबंधित मुकदमों की सुनवाई करता था। वह गाँवों और नगरों के अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध प्रस्तुत अपीलों का भी निपटारा करता था। कोतवाल तथा ग्राम पंचायतों के निर्णयों की अपील भी उसी के समक्ष प्रस्तुत की जाती थी। इस प्रकार परगना न्यायालय स्थानीय न्याय-व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण केंद्र था।
आमिल की न्यायिक भूमिका
परगनों में आमिल मुख्यतः राजस्व अधिकारी होता था, किंतु उसे राजस्व संबंधी विवादों के निपटारे का भी अधिकार प्राप्त था। भूमि, लगान तथा भू-राजस्व से संबंधित मामलों का निर्णय वही करता था। उसके निर्णय के विरुद्ध अपील प्रांतीय दीवान अथवा प्रांतीय गवर्नर के समक्ष की जा सकती थी। इस प्रकार वित्तीय मामलों को सामान्य न्यायिक मामलों से पृथक् रखा गया था।
नगरों में कोतवाल की अदालत
प्रत्येक प्रमुख नगर में कोतवाल कानून एवं व्यवस्था का प्रधान अधिकारी होता था। उसके दायित्व केवल पुलिस व्यवस्था तक सीमित नहीं थे, बल्कि वह अनेक फौजदारी मामलों का निर्णय भी करता था। चोरी, डकैती, मारपीट, सार्वजनिक शांति भंग करने तथा अन्य आपराधिक मामलों में वह अभियुक्तों को गिरफ्तार करता, जाँच कराता तथा निर्धारित अधिकारों के अंतर्गत दंड देता था।
कोतवाल नगर की सुरक्षा, रात्रि गश्त, अपराधियों की निगरानी तथा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी उत्तरदायी था। इस प्रकार वह न्यायिक और पुलिस—दोनों प्रकार के कार्यों का निर्वहन करता था।
ग्राम पंचायतों की न्यायिक भूमिका
ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत न्याय-व्यवस्था की सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण संस्था थी। दिल्ली सल्तनत के शासनकाल में भी यह संस्था प्रभावी बनी रही। पंचायत ग्रामीण समाज के पारिवारिक, सामाजिक तथा स्थानीय विवादों का निपटारा करती थी। भूमि-विवाद, वैवाहिक विवाद, चोरी, छोटे-मोटे अपराध तथा सामाजिक अनुशासन से संबंधित मामलों का निर्णय सामान्यतः पंचायत द्वारा किया जाता था।
हिन्दुओं के व्यक्तिगत एवं धार्मिक मामलों में स्थानीय रीति-रिवाजों तथा धर्मशास्त्रों के अनुसार निर्णय दिए जाते थे। यदि कोई पक्ष पंचायत के निर्णय से असन्तुष्ट होता, तो वह परगना काज़ी की अदालत में अपील कर सकता था।
न्यायिक संरचना का क्रम
सल्तनत काल की न्याय-व्यवस्था बहुस्तरीय तथा संगठित थी। सर्वोच्च स्तर पर सुल्तान की अदालत थी, जिसके अधीन काज़ी-उल-क़ुज़ात, सद्र-ए-जहाँ तथा केंद्रीय दीवान की अदालतें कार्य करती थीं। प्रांतों में गवर्नर (मुक्ता), प्रांतीय काज़ी, प्रांतीय दीवान तथा प्रांतीय सद्र की अदालतें थीं। इनके नीचे परगना स्तर पर काज़ी तथा आमिल की अदालतें कार्यरत थीं। नगरों में काज़ी और कोतवाल न्यायिक दायित्व निभाते थे, जबकि ग्राम स्तर पर पंचायतें स्थानीय विवादों का निपटारा करती थीं। इस प्रकार ग्राम से लेकर केंद्र तक न्यायिक संस्थाओं का एक सुव्यवस्थित ढाँचा विकसित था।
सल्तनत काल का दंड-विधान
दिल्ली सल्तनत का दंड-विधान सामान्यतः कठोर था। इसका उद्देश्य अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना तथा राज्य की शांति और सुरक्षा बनाए रखना था। उस समय हत्या, चोरी, डकैती, व्यभिचार, विद्रोह, राजद्रोह, शासक के विरोधियों का समर्थन, राज्य के आदेशों की अवहेलना तथा धर्म-विरोधी गतिविधियाँ गंभीर अपराध मानी जाती थीं। इन अपराधों के लिए कोड़े लगाना, कारावास, देश-निकाला, अंग-भंग, नाक या कान काटना, अंधा या अपंग बना देना, हाथी से कुचलवाना, मृत्युदंड तथा अन्य कठोर दंड दिए जाते थे। यद्यपि आधुनिक दृष्टि से ये दंड अत्यंत कठोर प्रतीत होते हैं, किंतु मध्यकालीन शासन-व्यवस्था में इन्हें अपराध-नियंत्रण और राज्य की सत्ता बनाए रखने का प्रभावी साधन माना जाता था।
यद्यपि सल्तनत काल में कठोर दंड-प्रथा प्रचलित थी, तथापि सभी शासकों की नीति समान नहीं थी। जलालुद्दीन फिरोज खिलजी तथा फिरोजशाह तुगलक जैसे अपेक्षाकृत उदार शासकों ने अनेक अवसरों पर अपराधियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया। वे परिस्थितियों के अनुसार चेतावनी, आर्थिक दंड अथवा हल्के दंड देकर भी अपराधियों को सुधारने का प्रयास करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि सल्तनत काल की न्याय-व्यवस्था में कठोरता के साथ-साथ परिस्थितियों के अनुरूप उदारता का भी स्थान था।




