पैगंबर मुहम्मद
पैगंबर मुहम्मद इस्लामी इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली व्यक्तित्व हैं। इस्लामी इतिहास में पैगंबर मुहम्मद को केवल एक धार्मिक नेता ही नहीं, बल्कि एक महान समाज-सुधारक, कुशल राजनीतिज्ञ और आदर्श नैतिक व्यक्तित्व के रूप में भी देखा जाता है। उनके नेतृत्व में अरब के बिखरे हुए कबीले संगठित हुए और एक ऐसी धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्था का विकास हुआ, जिसने आगे चलकर पश्चिम में मोरक्को से लेकर पूर्व में मध्य एवं दक्षिण एशिया तक विस्तृत इस्लामी सभ्यता के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके विचारों और शिक्षाओं ने एशिया, अफ्रीका और यूरोप के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा बौद्धिक जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया।
अरब की भौगोलिक एवं सामाजिक स्थिति
इस्लाम के उदय से पूर्व अरब प्रायद्वीप का अधिकांश भाग शुष्क मरुस्थलीय क्षेत्र था, जहाँ कृषि केवल जलस्रोतों के निकट ही संभव थी। मक्का और मदीना उस समय के प्रमुख नगर थे। मक्का व्यापार, तीर्थयात्रा और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्त्वपूर्ण केंद्र था, जबकि मदीना एक समृद्ध कृषि-प्रधान बस्ती के रूप में विकसित था। कठोर प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण जनजातीय संगठन सामाजिक जीवन की आधारशिला था। अधिकांश अरब कबीले पशुपालन और घुमंतू जीवन व्यतीत करते थे, जबकि कुछ समुदाय व्यापार और कृषि से जुड़े थे। कारवाँ व्यापार उस समय की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार था और अनेक जनजातियाँ व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा तथा नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।
धार्मिक एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि
पूर्व-इस्लामी अरब में बहुदेववाद व्यापक रूप से प्रचलित था। मक्का स्थित काबा उस समय भी एक प्रमुख धार्मिक केंद्र था, जहाँ विभिन्न अरब जनजातियों के अनेक देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित थीं। इनमें अल-लात, अल-उज़्ज़ा और मनात प्रमुख देवियाँ मानी जाती थीं। साथ ही अरब में यहूदी, ईसाई तथा एकेश्वरवाद में विश्वास रखने वाले हनीफ़ समुदाय भी विद्यमान थे, जो इब्राहीमी परंपरा से प्रभावित थे। छठी शताब्दी ईस्वी में धार्मिक मतभेदों और राजनीतिक अस्थिरता के कारण अरब समाज परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था।
इसी काल में कुरैश जनजाति का पश्चिमी अरब की सबसे प्रभावशाली शक्ति के रूप में उदय हुआ। काबा के संरक्षक होने के कारण उसे विशेष धार्मिक और आर्थिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी। कुरैश ने पवित्र महीनों की परंपरा को बनाए रखा, जिनमें युद्ध और हिंसा निषिद्ध माने जाते थे। इन महीनों में तीर्थयात्री और व्यापारी निर्भय होकर मक्का आते थे, जिससे धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ व्यापार और आर्थिक समृद्धि को भी बढ़ावा मिलता था। इसी सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक वातावरण में आगे चलकर इस्लाम के उदय की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
पैगंबर मुहम्मद का परिचय
पैगंबर मुहम्मद का पूरा नाम ‘अबू अल-क़ासिम मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाह इब्न अब्दुल मुत्तलिब इब्न हाशिम’ था। अरबी परंपरा में ‘अबू अल-क़ासिम’ उनका सम्मानसूचक संबोधन था, जिसका अर्थ है—‘क़ासिम के पिता’। अरब समाज में किसी व्यक्ति को उसके पुत्र के नाम से संबोधित करना सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था, इसलिए मुहम्मद को अबू अल-क़ासिम के नाम से भी पुकारा जाता था।
मुहम्मद नाम का अर्थ और उपाधियाँ
‘मुहम्मद’ शब्द का अर्थ है—‘अत्यधिक प्रशंसित’ अथवा ‘जिसकी बहुत प्रशंसा की गई हो’। इस्लामी मान्यता के अनुसार क़ुरआन में मुहम्मद नाम का उल्लेख चार स्थानों पर मिलता है, जबकि एक स्थान पर उन्हें ‘अहमद’ नाम से संबोधित किया गया है। ‘अहमद’ का अर्थ भी ‘सबसे अधिक प्रशंसनीय’ होता है। क़ुरआन में पैगंबर मुहम्मद के लिए अनेक सम्मानसूचक उपाधियाँ प्रयुक्त की गईं हैं, जिनमें नबी (पैगंबर), रसूल (संदेशवाहक), अब्दुल्लाह (अल्लाह का बंदा), बशीर (शुभ समाचार देने वाले), नज़ीर (चेतावनी देने वाले), शाहिद (साक्षी), दाई इलल्लाह (अल्लाह की ओर बुलाने वाले), नूर (प्रकाश) तथा सिराज मुनीर (प्रकाशमान दीपक) प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त, क़ुरआन में उन्हें ‘अल-मुज़म्मिल’ (चादर ओढ़ने वाले) और ‘अल-मुद्दस्सिर’ (वस्त्र ओढ़ने वाले) जैसे संबोधनों से भी पुकारा गया है। इस्लामी परंपरा के अनुसार मुहम्मद ख़ातम अन-नबिय्यीन (अंतिम पैगंबर) हैं, अर्थात उनके बाद कोई नया पैगंबर नहीं आएगा।
पैगंबर मुहम्मद का जन्म और प्रारंभिक जीवन
इस्लामी परंपरा के अनुसार पैगंबर मुहम्मद का जन्म लगभग 570 ईस्वी में अरब प्रायद्वीप के प्रमुख नगर मक्का में हुआ था। इस वर्ष को इस्लामी परंपरा में ‘आम अल-फ़ील’ (हाथी का वर्ष) कहा जाता है, जिसका संबंध यमन के शासक अब्रहा द्वारा हाथियों के साथ मक्का पर किए गए असफल आक्रमण की घटना से है। उनका जन्म रबीउल अव्वल महीने में हुआ था और वे कुरैश जनजाति के प्रतिष्ठित बनू हाशिम कबीले से संबंधित थे। यद्यपि इस कबीले को मक्का में सम्मान प्राप्त था, किंतु मुहम्मद के जन्म के समय परिवार की आर्थिक स्थिति समृद्ध नहीं थी।

मुहम्मद के जन्म से कुछ समय पूर्व ही उनके पिता अब्दुल्लाह इब्न अब्दुल मुत्तलिब का निधन हो गया था। उनकी माता का नाम आमिना बिंत वहब था। तत्कालीन अरब समाज की परंपरा के अनुसार जन्म के बाद उन्हें कुछ समय के लिए मरुस्थलीय क्षेत्र में रहने वाले बनू सअद कबीले की धाय माता हलीमा बिंत अबी ज़ुआयब के संरक्षण में भेजा गया। उस समय यह मान्यता थी कि रेगिस्तानी वातावरण बच्चों के स्वास्थ्य, भाषा और व्यक्तित्व के विकास के लिए अधिक अनुकूल होता है। मुहम्मद लगभग दो वर्ष तक हलीमा के परिवार के साथ रहे।
जब वे छह वर्ष के थे, तब उनकी माता आमिना का भी निधन हो गया और वे अनाथ हो गए। इसके बाद उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने उनका पालन-पोषण किया। लगभग दो वर्ष बाद दादा की मृत्यु होने पर उनके चाचा अबू तालिब ने उनकी जिम्मेदारी संभाली। अबू तालिब बनू हाशिम के प्रमुख थे। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद उन्होंने मुहम्मद का पालन-पोषण किया और जीवन के कठिन समय में उन्हें संरक्षण प्रदान किया। इस प्रकार मुहम्मद का प्रारंभिक जीवन पारिवारिक कठिनाइयों, संघर्षों और सामाजिक अनुभवों के बीच विकसित हुआ।
पैगंबर मुहम्मद का व्यक्तित्व और शारीरिक सौष्ठव
पैगंबर मुहम्मद के व्यक्तित्व और शारीरिक स्वरूप का वर्णन अनेक हदीस-संग्रहों तथा इस्लामी साहित्य में मिलता है। इन विवरणों का प्रमुख उद्देश्य उनके बाहरी स्वरूप के साथ-साथ उनके नैतिक गुणों, व्यवहार और आध्यात्मिक व्यक्तित्व को प्रस्तुत करना है। सहीह अल-बुख़ारी और अन्य हदीस ग्रंथों में वर्णित परंपराओं के अनुसार उनका कद न अत्यधिक लंबा था और न ही छोटा। उनका रंग न बहुत अधिक गोरा था और न गहरा साँवला। उनके बाल न अत्यधिक घुँघराले थे और न बिल्कुल सीधे, बल्कि सामान्य रूप से लहरदार बताए गए हैं। इस्लामी परंपरा के अनुसार उन्हें लगभग चालीस वर्ष की आयु में पैगंबरी प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने लगभग तेरह वर्ष मक्का में और दस वर्ष मदीना में इस्लाम के संदेश का प्रचार किया। जीवन के अंतिम समय तक उनके सिर और दाढ़ी में बहुत कम सफेद बाल होने का उल्लेख मिलता है।
सहाबी अनस इब्न मालिक के अनुसार पैगंबर मुहम्मद का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली, संतुलित और आकर्षक था। अल-बरा इब्न आज़िब के वर्णन में उनके चौड़े कंधों, संतुलित शरीर और सुंदर मुखाकृति का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार लाल वस्त्रों में उनका व्यक्तित्व विशेष रूप से प्रभावशाली दिखाई देता था।
इमाम तिर्मिज़ी की प्रसिद्ध कृति ‘अश-शमाइल अल-मुहम्मदिय्यह’ में पैगंबर मुहम्मद के शारीरिक स्वरूप का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसके अनुसार उनका कद मध्यम, शरीर संतुलित और सुडौल था। उनका चेहरा उज्ज्वल और तेजस्वी बताया गया है। उनकी आँखें बड़ी और काली थीं, जिनकी पलकें लंबी थीं। उनकी भौंहें सुंदर और धनुषाकार थीं। उनकी नाक सुडौल, दाढ़ी घनी और मुखाकृति आकर्षक बताई गई है। उनके दाँतों के बीच हल्का अंतर था, जो मुस्कुराने पर दिखाई देता था। उनका वक्ष चौड़ा, कंधे मजबूत और शरीर संतुलित था। उनके चलने की शैली दृढ़ और आत्मविश्वासपूर्ण बताई गई है।
इस्लामी परंपरा में पैगंबर मुहम्मद के दोनों कंधों के बीच एक विशेष चिन्ह का भी उल्लेख मिलता है, जिसे ‘मुहर-ए-नबुव्वत’ (पैगंबरी की मुहर) कहा जाता है। अनेक हदीसों में इसे एक उभरे हुए तिल या विशेष चिह्न के रूप में वर्णित किया गया है। मुस्लिम परंपरा में इसे उनकी पैगंबरी की विशिष्ट पहचान माना जाता है।
मदीना की यात्रा के दौरान उम्म मअबद नामक महिला द्वारा किया गया वर्णन भी उनके व्यक्तित्व को समझने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। उनके अनुसार मुहम्मद का चेहरा सुंदर, स्वच्छ और तेजस्वी था। उनका शरीर संतुलित, आँखें बड़ी और काली तथा आवाज़ गंभीर एवं प्रभावशाली थी। वे मौन रहते तो उनके व्यक्तित्व में गंभीरता और गरिमा दिखाई देती थी और जब बोलते तो उनकी वाणी मधुर, स्पष्ट और संतुलित होती थी। उनके भाषण स्पष्ट और प्रभावशील होते थे, जिससे लोग ध्यानपूर्वक उन्हें सुनते थे।
पैगंबर मुहम्मद के व्यक्तित्व और स्वरूप से संबंधित इन विवरणों को इस्लामी साहित्य में विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ। बाद के काल में, विशेषकर उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य में इन वर्णनों को ‘हिल्या’ नामक सुलेख कला के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा। यह परंपरा सत्रहवीं शताब्दी के बाद अधिक लोकप्रिय हुई और मुस्लिम समाज में पैगंबर के गुणों, व्यक्तित्व तथा आध्यात्मिक महत्त्व के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का एक विशिष्ट माध्यम बन गई।
पैगंबर मुहम्मद का सार्वजनिक जीवन
पैगंबर मुहम्मद के जीवन को सामान्यतः दो प्रमुख चरणों में विभाजित किया जाता है—मक्का काल (570–622 ई.) और मदीना काल (622–632 ई.)। मक्का काल में उनका जीवन मुख्य रूप से पारिवार, व्यापारिक गतिविधियों तथा धार्मिक संदेश के प्रचार से उत्पन्न सामाजिक और धार्मिक विरोधों से संबंधित रहा। इसी अवधि में उन्होंने एकेश्वरवाद, नैतिकता और सामाजिक सुधार का संदेश दिया, जिसके कारण उन्हें और उनके अनुयायियों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
622 ईस्वी में हिजरत के बाद प्रारंभ हुए मदीना काल में उनका व्यक्तित्व केवल धार्मिक नेता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वे एक सामाजिक और राजनीतिक मार्गदर्शक के रूप में भी स्थापित हुए। इस काल में उन्होंने मुस्लिम समुदाय के संगठन, विभिन्न समूहों के बीच सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने तथा धार्मिक और राजनीतिक संस्थाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अधिकांश विवाह हिजरत के बाद मदीना काल में हुए। इस प्रकार मक्का काल धार्मिक संदेश और संघर्ष का, जबकि मदीना काल समुदाय निर्माण, नेतृत्व और संस्थागत विकास का काल था।
मक्का काल (570–622 ईस्वी)
पैगंबर मुहम्मद का व्यापारिक जीवन और विवाह
सीरिया की व्यापारिक यात्राएँ
मुहम्मद अपने चाचा अबू तालिब के साथ व्यापारिक कारवाँ में सम्मिलित होकर सीरिया (शाम) की यात्राओं पर गए। वे मक्का से उत्तर दिशा में सीरिया तथा दक्षिण दिशा के अन्य व्यापारिक क्षेत्रों की ओर जाने वाले कारवाँ में भाग लेते थे। इन यात्राओं के माध्यम से उन्हें व्यापारिक गतिविधियों, विभिन्न संस्कृतियों और सामाजिक जीवन का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ।
इस्लामी परंपरा के अनुसार ऐसी ही एक यात्रा के दौरान उनकी भेंट बह़ीरा नामक ईसाई भिक्षु से हुई, जिसने उनके व्यक्तित्व में विशेष गुणों को देखकर उनके भविष्य में पैगंबर बनने की संभावना व्यक्त की। यद्यपि आधुनिक इतिहासकारों में इस घटना की ऐतिहासिक प्रमाणिकता को लेकर मतभेद है, फिर भी इस्लामी साहित्य में इसका उल्लेख मिलता है।
व्यापारिक जीवन के दौरान मुहम्मद ने अपनी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और निष्पक्ष व्यवहार के कारण समाज में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त की। उनके चरित्र और विश्वसनीयता के कारण उन्हें ‘अल-अमीन’ (विश्वसनीय) और ‘अस-सादिक’ (सत्यवादी) की उपाधियाँ दी गईं। लोग सामाजिक विवादों के समाधान के लिए भी उन पर विश्वास करते थे और उन्हें निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में सम्मान देते थे।
ख़दीजा बिंत ख़ुवैलिद से विवाह
पैगंबर मुहम्मद का लगभग 595 ईस्वी में मक्का की प्रतिष्ठित और धनी व्यापारी महिला ख़दीजा बिंत ख़ुवैलिद से पहला विवाह हुआ। मुहम्मद की व्यापारिक दक्षता, सत्यनिष्ठा और ईमानदारी से प्रभावित होकर ख़दीजा ने उन्हें अपने व्यापार का प्रबंधन सौंपा। उनके कुशल और विश्वसनीय कार्य से प्रभावित होकर उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा था। उस समय मुहम्मद की आयु लगभग 25 वर्ष और ख़दीजा की आयु लगभग 40 वर्ष बताई जाती है।
यह विवाह मुहम्मद के जीवन का अत्यंत स्थिर और सुखद काल रहा। ख़दीजा ने उनके जीवन के कठिन समय में उनका निरंतर सहयोग किया। इस्लामी परंपरा के अनुसार जब मुहम्मद को पहली वह्य (दैवीय प्रकाशना) प्राप्त हुई और वे चिंतित हुए, तब ख़दीजा ने उन्हें सांत्वना दी तथा उनके पैगंबरी मिशन में विश्वास व्यक्त किया। वे इस्लाम स्वीकार करने वाली प्रथम व्यक्तियों में शामिल थीं। ख़दीजा के जीवनकाल में मुहम्मद ने कोई दूसरा विवाह नहीं किया और दोनों का वैवाहिक जीवन लगभग 25 वर्षों तक चला।
काबा का पुनर्निर्माण
लगभग 605 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद ने मक्का स्थित काबा के पुनर्निर्माण के दौरान उत्पन्न एक महत्त्वपूर्ण विवाद का शांतिपूर्ण समाधान किया। इस घटना का उल्लेख प्रारंभिक मुस्लिम इतिहासकार इब्न इशाक सहित अनेक इस्लामी स्रोतों में मिलता है। काबा के जीर्णोद्धार के समय उसकी दीवार में स्थापित पवित्र ‘हजर-ए-अस्वद’ (काला पत्थर) को कुछ समय के लिए हटाया गया था। जब उसे पुनः स्थापित करने का अवसर आया, तो मक्का के विभिन्न कबीलों के बीच यह विवाद उत्पन्न हो गया कि इस सम्मान का अधिकार किसे मिलेगा। स्थिति धीरे-धीरे तनावपूर्ण होने लगी और संघर्ष की संभावना दिखाई देने लगी।
अंततः यह तय किया गया कि काबा के द्वार से सबसे पहले प्रवेश करने वाला व्यक्ति इस विवाद का निर्णय करेगा। संयोगवश सबसे पहले मुहम्मद वहाँ पहुँचे। उनकी सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता के कारण सभी कबीलों ने उनके निर्णय को स्वीकार कर लिया। मुहम्मद ने एक चादर बिछाई और उसके मध्य में हजर-ए-अस्वद रखवाया। उन्होंने सभी प्रमुख कबीलों के प्रतिनिधियों से चादर के कोनों को पकड़कर पत्थर को काबा की दीवार तक उठाने के लिए कहा। इसके बाद उन्होंने स्वयं पत्थर को उसके स्थान पर स्थापित कर दिया। इस प्रकार उन्होंने सभी कबीलों के सम्मान को बनाए रखते हुए संभावित संघर्ष को समाप्त कर दिया।
प्रथम वह्य (दैवीय प्रकाशना) और प्रारंभिक क़ुरआनी संदेश
मुहम्मद आध्यात्मिक चिंतन और एकांत साधना के लिए प्रतिवर्ष कुछ समय मक्का के निकट स्थित जबल अल-नूर पर्वत की ग़ार-ए-हिरा नामक गुफा में व्यतीत करते थे। लगभग चालीस वर्ष की आयु में 610 ईस्वी के आसपास इसी गुफा में उन्हें पहली वह्य (दैवीय प्रकाशना) प्राप्त हुई। इस्लामी परंपरा के अनुसार फ़रिश्ता जिब्रील (जिब्राईल) उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें ‘इक़रा’ (पढ़ो या सुनाओ) का आदेश दिया। इसके साथ ही क़ुरआन की सूरह अल-अलक़ की प्रारंभिक आयतें अवतरित हुईं। यही इस्लाम में पैग़ंबरी की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है। पहली वह्य के अनुभव से मुहम्मद अत्यंत व्याकुल और चिंतित हो गए। वे घर लौटे, जहाँ उनकी पत्नी ख़दीजा बिंत ख़ुवैलिद ने उन्हें सांत्वना दी और उनका मनोबल बढ़ाया। इसके बाद ख़दीजा उन्हें अपने संबंधी वरक़ा इब्न नवफ़ल, जो ईसाई धर्मग्रंथों के ज्ञाता थे, के पास ले गईं। वरक़ा ने इस घटना को ईश्वर की ओर से प्राप्त प्रकाशना बताया और कहा कि मुहम्मद वही पैगंबर हैं, जिनकी भविष्यवाणी पूर्ववर्ती धर्मग्रंथों में की गई थी।
प्रथम प्रकाशना के बाद कुछ समय तक वह्य का क्रम रुका रहा। इस अवधि को इस्लामी परंपरा में ‘फ़तरतुल-वह्य’ कहा जाता है। इस दौरान मुहम्मद निरंतर उपासना, चिंतन और आध्यात्मिक साधना में लगे रहे। जब पुनः वह्य का क्रम आरंभ हुआ, तब उन्हें लोगों तक अल्लाह का संदेश पहुँचाने और एकेश्वरवाद का प्रचार करने का आदेश दिया गया। इसके साथ ही उनका सार्वजनिक धार्मिक अभियान प्रारंभ हुआ। ‘सहीह अल-बुख़ारी’ में वर्णित है कि मुहम्मद ने वह्य के अनुभव की तुलना कभी-कभी घंटी की ध्वनि से की, जो उनके लिए सबसे अधिक प्रभावशाली रूप था। उनकी पत्नी आयशा के अनुसार अत्यंत ठंडे मौसम में भी वह्य प्राप्त होने के समय उनके माथे पर पसीना आ जाता था।
प्रारंभिक इस्लामी संदेश और शिक्षाएँ
पैगंबर मुहम्मद पर अवतरित होने वाली प्रारंभिक प्रकाशनाएँ आगे चलकर क़ुरआन के रूप में संकलित हुईं। उनके संदेश का मूल आधार एकेश्वरवाद (तौहीद), नैतिक जीवन, सामाजिक न्याय और मानव समानता था। उन्होंने स्वयं को पूर्ववर्ती पैगंबरों—जैसे इब्राहीम, मूसा और ईसा—की परंपरा को पूर्ण करने वाला अंतिम दूत बताया। इस्लामी मान्यता के अनुसार, उनका उद्देश्य मानव को उसके सृष्टिकर्ता के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराना और उसे सत्य, सदाचार तथा धार्मिक जीवन की ओर मार्गदर्शन प्रदान करना था।
पैगंबर मुहम्मद का प्रारंभिक संदेश मुख्य रूप से अल्लाह की एकता पर आधारित था। उन्होंने घोषणा की कि केवल अल्लाह ही उपासना के योग्य है और मूर्तिपूजा तथा बहुदेववाद का त्याग किया जाना चाहिए। क़ुरआन में उन्हें ईश्वर की महानता का प्रचार करने, मनुष्यों को नैतिक जीवन अपनाने तथा अंतिम न्याय के दिन के प्रति सचेत करने का निर्देश दिया गया। उन्होंने उन लोगों को चेतावनी दी जो ईश्वरीय संदेश को अस्वीकार करते थे, जबकि सत्य, धर्मपरायणता और ईश्वर-भक्ति का मार्ग अपनाने वालों को शुभ समाचार सुनाया।
प्रथम अवतरित आयतों में ज्ञान, शिक्षा और सृष्टि के महत्त्व पर विशेष बल दिया गया है। क़ुरआन की प्रारंभिक आयतों में कहा गया—“पढ़ो अपने उस पालनहार के नाम से जिसने सृष्टि की। उसने मनुष्य को रक्तपिंड से उत्पन्न किया। पढ़ो और तुम्हारा पालनहार अत्यंत उदार है, जिसने कलम के माध्यम से शिक्षा दी और मनुष्य को वह ज्ञान प्रदान किया जिसे वह नहीं जानता था।” इन आयतों से स्पष्ट होता है कि इस्लामी संदेश में ज्ञान, चिंतन और शिक्षा को विशेष स्थान दिया गया।
प्रारंभिक क़ुरआनी संदेशों में अल्लाह की एकता, आत्मशुद्धि, नैतिक आचरण और परलोक की अवधारणा पर विशेष बल दिया गया। क़ुरआन के अनुसार मनुष्य को मृत्यु के बाद पुनर्जीवित किया जाएगा और अंतिम न्याय के दिन उसके कर्मों के आधार पर निर्णय होगा। धर्मपरायण लोगों के लिए स्वर्ग (जन्नत) के सुखों तथा दुष्कर्मियों के लिए नरक (जहन्नम) की चेतावनी देकर लोगों को सदाचार और धार्मिक जीवन अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।
इन प्रारंभिक संदेशों में प्रकृति और सृष्टि की विभिन्न घटनाओं को अल्लाह की शक्ति और उसके अस्तित्व के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया। मनुष्य को सत्य, न्याय, करुणा, संयम और ईमानदारी का पालन करने की शिक्षा दी गई। इस प्रकार इस्लामी संदेश केवल धार्मिक विश्वासों तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यक्ति के नैतिक चरित्र और सामाजिक व्यवहार में सुधार लाने का भी प्रयास करता था।
इस्लाम के प्रारंभिक काल में धार्मिक कर्तव्यों का स्वरूप अपेक्षाकृत सीमित था। विश्वासियों के लिए सबसे प्रमुख दायित्व एकेश्वरवाद में विश्वास करना और अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की उपासना न करना था। इसके अतिरिक्त पापों के लिए क्षमा माँगना, नियमित प्रार्थना (नमाज़) करना और सदाचारी जीवन व्यतीत करने पर बल दिया गया।
क़ुरआन ने सामाजिक न्याय और मानव कल्याण को भी विशेष महत्त्व दिया। निर्धनों, अनाथों, विधवाओं और समाज के कमजोर वर्गों की सहायता को धार्मिक दायित्व माना गया। व्यापार में ईमानदारी, धोखाधड़ी से बचना, धन के प्रति अत्यधिक आसक्ति का त्याग, संयमित जीवन तथा कन्या-वध जैसी अमानवीय प्रथाओं का विरोध प्रारंभिक इस्लामी शिक्षाओं के प्रमुख तत्व थे। इन शिक्षाओं का उद्देश्य तत्कालीन अरब समाज में नैतिक और सामाजिक सुधार स्थापित करना था। इस प्रकार प्रारंभिक क़ुरआनी संदेशों ने एक नए धार्मिक और नैतिक आंदोलन की नींव रखी, जिसने आगे चलकर अरब समाज के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक स्वरूप को व्यापक रूप से प्रभावित किया।
इस्लामी परंपरा के अनुसार पैगंबर मुहम्मद की पत्नी ख़दीजा बिंत ख़ुवैलिद इस्लाम स्वीकार करने वाली प्रथम व्यक्ति थीं। उनके बाद अली इब्न अबी तालिब, अबू बक्र और ज़ैद इब्न हारिसा प्रारंभिक मुसलमानों में सम्मिलित हुए। लगभग 613 ईस्वी से मुहम्मद ने सार्वजनिक रूप से इस्लाम का प्रचार आरंभ किया।
मक्का में इस्लाम का प्रचार और विरोध
प्रारंभ में मक्का के अधिकांश लोगों ने उनके संदेश को स्वीकार नहीं किया और कई लोगों ने उनका विरोध तथा उपहास भी किया। किंतु धीरे-धीरे विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोग उनके अनुयायी बनने लगे। इनमें युवा वर्ग, सामाजिक रूप से उपेक्षित लोग, आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति तथा वे लोग प्रमुख थे जो तत्कालीन जनजातीय व्यवस्था और सामाजिक असमानताओं से असंतुष्ट थे।
मक्का में इस्लाम के प्रचार के प्रारंभिक चरण में पैगंबर मुहम्मद और उनके अनुयायियों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जब उन्होंने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और सामाजिक कुरीतियों की आलोचना करते हुए एकेश्वरवाद (तौहीद), नैतिकता और सामाजिक न्याय का संदेश दिया, तो मक्का के प्रभावशाली कुरैश नेताओं ने इसका विरोध करना आरंभ कर दिया। उन्हें आशंका थी कि इस नए धार्मिक संदेश से काबा से जुड़ी पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था, उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक हित प्रभावित होंगे।
कुरैश के कुछ प्रमुख नेताओं ने मुहम्मद को अपना संदेश रोकने के लिए धन, प्रतिष्ठा और नेतृत्व का प्रस्ताव दिया, किंतु उन्होंने इन्हें अस्वीकार कर दिया और अपने धार्मिक मिशन को जारी रखा। जैसे-जैसे इस्लाम स्वीकार करने वालों की संख्या बढ़ी, वैसे-वैसे मुसलमानों के विरुद्ध विरोध और उत्पीड़न भी तीव्र होता गया। उन्हें सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक प्रतिबंध और शारीरिक यातनाओं का सामना करना पड़ा।
इस्लामी परंपरा के अनुसार सुमय्या बिंत ख़य्यात इस्लाम की पहली शहीद मानी जाती हैं। उन्होंने अपने विश्वास को त्यागने से इनकार किया, जिसके कारण उनकी हत्या कर दी गई। इसी प्रकार दास बिलाल इब्न रबाह को उनके स्वामी उमय्या इब्न ख़लफ़ ने कठोर यातनाएँ दीं। उन्हें तपती रेत पर लिटाकर इस्लाम छोड़ने के लिए बाध्य किया जाता था, किंतु वे अपने विश्वास पर अडिग रहे और ‘अहद, अहद’ (ईश्वर एक है) का उद्घोष करते रहे।
प्रारंभिक मुसलमानों का यह धैर्य और आस्था इस्लामी इतिहास का महत्त्वपूर्ण अध्याय है। मक्का में बढ़ते उत्पीड़न और असुरक्षित परिस्थितियों के कारण अंततः 622 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद और उनके अनुयायियों ने मक्का से मदीना की ओर हिजरत की। यह प्रवास इस्लामी इतिहास की निर्णायक घटना है और इसी से हिजरी संवत का प्रारंभ हुआ।
प्रथम हिजरत: अबीसीनिया की यात्रा (615 ई.)
मक्का में बढ़ते अत्याचार और उत्पीड़न के कारण 615 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद ने अपने कुछ अनुयायियों को सुरक्षित आश्रय की खोज में अबीसीनिया (इथियोपिया) की ओर हिजरत करने की अनुमति दी। उस समय अबीसीनिया पर अक्सुम साम्राज्य का शासन था, जिसके ईसाई शासक नजाशी (अशहमा इब्न अबजर) अपनी न्यायप्रियता और धार्मिक सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने मुस्लिम प्रवासियों को संरक्षण प्रदान किया और उन्हें स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करने की अनुमति दी।
प्रारंभिक इस्लामी स्रोतों में इस हिजरत का उल्लेख मिलता है। इतिहासकार इब्न सअद के अनुसार अबीसीनिया की ओर प्रवासन दो चरणों में हुआ। पहला समूह कुछ समय बाद मक्का लौट आया, जबकि दूसरा समूह बाद में मदीना जाकर पैगंबर मुहम्मद से पुनः मिला। दूसरी ओर, इब्न हिशाम और अल-तबरी जैसे इतिहासकार मुख्य रूप से एक प्रमुख हिजरत का वर्णन करते हैं। कुछ परंपराओं के अनुसार जब यह समाचार फैला कि मक्का में मुसलमानों के प्रति विरोध कम हो गया है और उमर इब्न अल-ख़त्ताब तथा हमज़ा इब्न अब्दुल मुत्तलिब जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया है, तब कुछ प्रवासी मक्का लौट आए। किंतु वहाँ पहुँचने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि कुरैश का विरोध अभी भी जारी था।

शैतानी आयतों की कथित परंपरा
‘शैतानी आयतों’ की कथा कुछ प्रारंभिक इस्लामी ऐतिहासिक ग्रंथों, जैसे अल-वाक़िदी, इब्न सअद और अल-तबरी के विवरणों में मिलती है। इस कथानक के अनुसार, एक अवसर पर पैगंबर मुहम्मद द्वारा मक्का की कुछ देवियों के संबंध में कुछ शब्द कहे जाने का उल्लेख मिलता है, जिन्हें बाद में उन्होंने दैवीय प्रकाशना (वह्य) का भाग न मानते हुए अस्वीकार कर दिया। इस्लामी परंपरा के अनुसार इन शब्दों को बाद में ईश्वरीय आदेश द्वारा निरस्त कर दिया गया।
किंतु इस घटना की ऐतिहासिक प्रामाणिकता के संबंध में विवाद है। अधिकांश मुस्लिम विद्वान इसे अस्वीकार करते हैं और इसे अविश्वसनीय मानते हैं, क्योंकि यह विवरण प्रमाणिक धार्मिक स्रोतों और विश्वसनीय परंपराओं द्वारा समर्थित नहीं है। आधुनिक इतिहासकारों में भी इस विषय पर मतभेद है। इस प्रकार ‘शैतानी आयतों’ की कथा इस्लामी इतिहासलेखन का एक विवादित विषय है।
सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार
617 ईस्वी में मक्का के प्रभावशाली कुरैश नेताओं, विशेषकर बनू मख़ज़ूम और बनू अब्द शम्स ने पैगंबर मुहम्मद और उनके संरक्षक बनू हाशिम पर दबाव बनाने के लिए सामाजिक तथा आर्थिक बहिष्कार की नीति अपनाई। इस बहिष्कार के अंतर्गत बनू हाशिम के साथ व्यापारिक संबंध, वैवाहिक संबंध और सामान्य सामाजिक संपर्क समाप्त कर दिए गए। इसका उद्देश्य मुहम्मद को जनजातीय संरक्षण से वंचित करना और उनके धार्मिक संदेश के प्रसार को रोकना था।
यह बहिष्कार लगभग तीन वर्षों तक चलता रहा। इस अवधि में बनू हाशिम को गंभीर आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ा। अंततः कुरैश के कुछ न्यायप्रिय व्यक्तियों के प्रयासों से यह बहिष्कार समाप्त हुआ, क्योंकि यह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। इस समय मुहम्मद को मुख्य रूप से पवित्र महीनों में ही प्रचार करने का अवसर मिलता था, क्योंकि अरब परंपरा के अनुसार इन महीनों में युद्ध और संघर्ष पर रोक रहती थी।
दुःख का वर्ष (आम अल-हुज़्न)
619 ईस्वी पैगंबर मुहम्मद के जीवन का अत्यंत कठिन वर्ष था। इसी वर्ष उनकी पत्नी ख़दीजा बिंत ख़ुवैलिद और उनके संरक्षक एवं चाचा अबू तालिब का निधन हो गया। इन दोनों के निधन से उन्हें व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर गहरा आघात पहुँचा। इसी कारण इस वर्ष को इस्लामी इतिहास में ‘आम अल-हुज़्न’ अर्थात् ‘दुःख का वर्ष’ कहा जाता है।
अबू तालिब की मृत्यु के बाद बनू हाशिम कबीले का नेतृत्व अबू लहब ने संभाला, जो मुहम्मद के विरोधियों में से था। उसने उन्हें प्राप्त जनजातीय संरक्षण समाप्त कर दिया। उस समय अरब समाज में जनजातीय संरक्षण व्यक्ति की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता था, इसलिए इसके समाप्त होने से मुहम्मद की स्थिति और अधिक कठिन हो गई।
ताइफ़ की यात्रा और विरोध
मक्का में बढ़ते विरोध और संरक्षण की कमी के कारण मुहम्मद ने समर्थन प्राप्त करने तथा इस्लाम के संदेश के प्रचार के उद्देश्य से ताइफ़ की यात्रा की। ताइफ़ हिजाज़ क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण नगर था। उन्होंने वहाँ के प्रभावशाली लोगों से भेंट कर इस्लाम स्वीकार करने और अपने मिशन में सहयोग देने का आग्रह किया, किंतु ताइफ़ के लोगों ने उनके संदेश को अस्वीकार कर दिया। स्थानीय लोगों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और उन्हें पत्थर मारकर नगर से बाहर निकाल दिया। अंततः वे मुतइम इब्न अदी के संरक्षण में मक्का लौट सके।
इस घटना के बाद मुहम्मद ने एक सुरक्षित स्थान की खोज प्रारंभ की। वे हज के अवसर पर मक्का आने वाले विभिन्न कबीलों से मिलते और उन्हें इस्लाम का संदेश देते थे। इसी क्रम में उनकी भेंट यसरिब (मदीना) के लोगों से हुई। यसरिब में औस और ख़ज़राज कबीलों के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा था और लोग ऐसे नेतृत्व की तलाश में थे, जो शांति और व्यवस्था स्थापित कर सके।
यसरिब के लोगों ने मुहम्मद के संदेश को स्वीकार किया और उन्हें अपने नगर में आने का निमंत्रण दिया। दूसरी अक़बा प्रतिज्ञा में उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने, मुहम्मद की रक्षा करने और आवश्यकता पड़ने पर उनका साथ देने का वचन दिया। इसके बाद मुहम्मद ने अपने अनुयायियों को धीरे-धीरे यसरिब की ओर प्रवास करने का निर्देश दिया। कुरैश के विरोध के बावजूद अधिकांश मुसलमान सुरक्षित रूप से वहाँ पहुँच गए, जिससे आगे चलकर हिजरत और इस्लामी समुदाय के नए चरण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
इस्रा और मेराज
इस्लामी परंपरा के अनुसार लगभग 620 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद को ‘इस्रा और मेराज’ नामक आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हुआ। इसका उल्लेख क़ुरआन की सूरह अल-इस्रा तथा अनेक हदीसों में मिलता है। ‘इस्रा’ उस रात्रि-यात्रा को कहा जाता है, जिसमें अल्लाह के आदेश से फ़रिश्ता जिब्रील (जिब्राईल) पैगंबर मुहम्मद को बुराक़ नामक सवारी पर मक्का की मस्जिद अल-हराम से यरूशलेम स्थित मस्जिद अल-अक्सा तक ले गए। इसके बाद मेराज के दौरान उनके स्वर्गारोहण का वर्णन मिलता है।
इस्लामी मान्यता के अनुसार इस यात्रा में उनकी भेंट आदम, इब्राहीम, मूसा, ईसा सहित पूर्ववर्ती पैगंबरों से हुई। इसी अवसर पर पाँच समय की नमाज़ का आदेश प्राप्त होने की परंपरा भी जुड़ी है। प्रारंभिक जीवनीकार इब्न इशाक ने इसे मुख्य रूप से आध्यात्मिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया है, जबकि अल-तबरी और इब्न कसीर जैसे विद्वानों ने इसे शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की यात्रा माना है। आधुनिक विद्वानों में इसकी व्याख्या को लेकर विभिन्न मत हैं, किंतु इस्लामी परंपरा में इसे एक महान चमत्कारी घटना माना जाता है।
हिजरत: मक्का से मदीना की ऐतिहासिक यात्रा
622 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद ने अपने अनुयायियों के साथ मक्का से यसरिब (मदीना) की ओर ऐतिहासिक प्रवास किया, जिसे ‘हिजरत’ कहा जाता है। यह घटना इस्लामी इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसी के आधार पर हिजरी संवत (इस्लामी कैलेंडर) का प्रारंभ हुआ। हिजरत केवल भौगोलिक स्थान परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह एक संगठित धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक समुदाय के निर्माण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम था।
622 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद और उनके अनुयायियों द्वारा मक्का से मदीना की ओर की गई हिजरत के पीछे कई धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण थे। मक्का में कुरैश के प्रभावशाली नेताओं द्वारा इस्लाम के अनुयायियों का विरोध, सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक प्रतिबंध और शारीरिक उत्पीड़न बढ़ता जा रहा था। इसके अतिरिक्त, इस्लामी परंपरा के अनुसार कुरैश के नेताओं ने मुहम्मद की हत्या की योजना बनाई थी और इस खतरे से बचने के लिए उन्होंने गुप्त रूप से मक्का छोड़ने का निर्णय लिया। दूसरी ओर, यसरिब (मदीना) के लोगों ने उन्हें शांति स्थापित करने और नेतृत्व प्रदान करने के लिए आमंत्रित किया था।
परंपरा के अनुसार प्रस्थान की रात अली इब्न अबी तालिब उनके बिस्तर पर सोए, जिससे षड्यंत्रकारी भ्रमित हो गए और मुहम्मद सुरक्षित रूप से निकल गए। इसके बाद वे अपने निकटतम साथी अबू बक्र के साथ मक्का से रवाना हुए और लगभग 450 किलोमीटर दूर स्थित यसरिब (मदीना) पहुँचे। मक्का से प्रवास करने वाले मुसलमानों को ‘मुहाजिरून’ कहा गया है।
मदीना काल (622–632 ई.)
मदीना में इस्लामी समुदाय की स्थापना
622 ईस्वी में हिजरत के बाद पैगंबर मुहम्मद के नेतृत्व में मदीना (यसरिब) में इस्लामी समुदाय का एक नए रूप में संगठन प्रारंभ हुआ। मदीना के लोगों ने ना केवल उनका स्वागत किया, बल्कि उन्हें अपने समुदाय के नेता के रूप में स्वीकार किया। वसातब में, हिजरत से पूर्व मदीना में औस और ख़ज़राज जैसे प्रमुख अरब कबीलों के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा था। राजनीतिक अस्थिरता और आपसी विवादों के कारण वहाँ के अनेक लोग ऐसे नेतृत्व की तलाश में थे, जो नगर में शांति, न्याय और व्यवस्था स्थापित कर सके। इसी परिस्थिति में उन्होंने मुहम्मद को एक निष्पक्ष मध्यस्थ और नेता के रूप में स्वीकार किया।
मदीना में प्रारंभिक रूप से ऐसे लोग इस्लाम से जुड़े जिनका स्थानीय राजनीति में प्रभाव अपेक्षाकृत कम था और जो शक्तिशाली कबीलों के प्रभुत्व से असंतुष्ट थे। धीरे-धीरे नगर के अन्य लोगों ने भी इस्लाम स्वीकार करना आरंभ किया। पारंपरिक इस्लामी स्रोतों के अनुसार प्रमुख नेता सअद इब्न मुआज़ के इस्लाम स्वीकार करने के बाद मदीना में इस्लाम के अनुयायियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इस प्रकार मदीना इस्लामी आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन गया।
प्रारंभिक इस्लामी राज्य और सामाजिक व्यवस्था
हिजरत के बाद मदीना में पैगंबर मुहम्मद के नेतृत्व में एक नई सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था का विकास हुआ। यह व्यवस्था केवल धार्मिक अनुयायियों के संगठन तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका उद्देश्य विभिन्न जनजातियों, धार्मिक समूहों और सामाजिक वर्गों के बीच शांति, सहयोग और सामूहिक सुरक्षा स्थापित करना था। मदीना में विकसित यह प्रारंभिक इस्लामी व्यवस्था तत्कालीन अरब की पारंपरिक जनजातीय प्रणाली से भिन्न थी, क्योंकि इसमें केवल रक्त संबंधों के स्थान पर धार्मिक आस्था, नैतिक उत्तरदायित्व और सामुदायिक हित को महत्त्व दिया गया।
धार्मिक सह-अस्तित्व
मदीना में पैगंबर मुहम्मद के सामने सबसे बड़ी चुनौती विभिन्न कबीलों और समुदायों के बीच शांति, सहयोग और राजनीतिक एकता स्थापित करना थी। हिजरत के समय मदीना में मुसलमानों के अतिरिक्त यहूदी जनजातियाँ और अन्य अरब समुदाय भी निवास करते थे। इन समुदायों के बीच लंबे समय से राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक तनाव विद्यमान थे। इन परिस्थितियों में पैगंबर मुहम्मद ने विभिन्न समूहों के बीच शांति और सहयोग स्थापित करने के उद्देश्य से एक समझौता तैयार कराया, जिसे ‘मदीना का संविधान’ (सहीफ़ा-ए-मदीना) कहा जाता है।
मदीना के संविधान में मुस्लिम, यहूदी और अन्य समुदायों के अधिकार तथा कर्तव्य निर्धारित किए गए। इसमें सभी समुदायों को धार्मिक स्वतंत्रता, पारस्परिक सुरक्षा, न्याय और बाहरी आक्रमण की स्थिति में संयुक्त रक्षा का दायित्व दिया गया। इस व्यवस्था का उद्देश्य विभिन्न जनजातियों को एक व्यापक राजनीतिक समुदाय (उम्मा) के रूप में संगठित करना था।
यद्यपि इस संविधान में तत्कालीन अरब जनजातीय परंपराओं का प्रभाव दिखाई देता है, फिर भी इसने सहयोग, न्याय और सामूहिक उत्तरदायित्व पर आधारित एक नई राजनीतिक व्यवस्था की नींव रखी। इस प्रकार मदीना केवल धार्मिक केंद्र नहीं रहा, बल्कि एक संगठित राजनीतिक समुदाय के रूप में भी विकसित हुआ।
राजनीतिक संगठन
मदीना में पैगंबर मुहम्मद ने एक संगठित राजनीतिक नेतृत्व की स्थापना की। वे धार्मिक नेता के साथ-साथ प्रशासक, न्यायाधीश और सैन्य प्रमुख भी थे। उन्होंने मदीना के संविधान के माध्यम से विभिन्न कबीलों और समुदायों को एक व्यापक राजनीतिक इकाई के रूप में संगठित किया, जिसे ‘उम्मा’ कहा गया है। उम्मा की अवधारणा ने पारंपरिक जनजातीय पहचान से ऊपर उठकर एक व्यापक सामुदायिक भावना को जन्म दिया। इसमें मुसलमानों के साथ-साथ वे सहयोगी समुदाय भी सम्मिलित थे, जो मदीना की सुरक्षा और व्यवस्था में भागीदार थे। इस प्रकार राजनीतिक संगठन का आधार केवल वंश या जनजाति नहीं, बल्कि साझा उत्तरदायित्व और सामूहिक हित बन गया।
मुहम्मद ने न्याय व्यवस्था को मजबूत किया और समाज में नैतिक तथा आर्थिक जिम्मेदारी की भावना विकसित की। उन्होंने निर्धनों, अनाथों और कमजोर वर्गों की सहायता पर विशेष बल दिया। ज़कात जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से आर्थिक सहयोग और सामाजिक कल्याण की भावना को बढ़ावा दिया गया। मदीना की सुरक्षा के लिए सैन्य संगठन भी विकसित किया गया। बाहरी खतरों से रक्षा के लिए विभिन्न कबीलों के साथ संधियाँ और समझौते किए गए। इस प्रकार मदीना केवल धार्मिक केंद्र नहीं रहा, बल्कि एक संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में विकसित हुआ।
जनजातीय संबंध
पूर्व-इस्लामी अरब समाज में जनजाति व्यक्ति की पहचान, सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रमुख आधार थी। हिजरत के बाद पैगंबर मुहम्मद ने जनजातीय व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उसे एक व्यापक सामुदायिक भावना से जोड़ने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य विभिन्न कबीलों के बीच संघर्ष को कम करना और सहयोग की भावना को विकसित करना था।
मक्का से हिजरत करके आने वाले मुसलमान ‘मुहाजिरून’ (प्रवासी) कहलाए, जबकि मदीना के वे निवासी जिन्होंने उन्हें आश्रय, सहायता और सहयोग प्रदान किया, ‘अंसार’ (सहायक) कहलाए। नवगठित मुस्लिम समुदाय में सामाजिक और आर्थिक एकता स्थापित करने के उद्देश्य से पैगंबर मुहम्मद ने मुहाजिरून और अंसार के बीच ‘भाईचारे की व्यवस्था’ (मुआख़ात) स्थापित की। इस व्यवस्था ने प्रवासी और स्थानीय मुसलमानों के बीच सहयोग को बढ़ाया तथा मुस्लिम समुदाय को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके अतिरिक्त, पैगंबर मुहम्मद ने आसपास की अरब जनजातियों के साथ संधियाँ और राजनीतिक समझौते किए। इनका उद्देश्य व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा, बाहरी शत्रुओं से रक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना था। उन्होंने जनजातीय प्रतिशोध की परंपरा को नियंत्रित कर कानून, न्याय और सामूहिक उत्तरदायित्व पर आधारित व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया।
इस प्रकार मदीना में स्थापित प्रारंभिक इस्लामी समुदाय धार्मिक सह-अस्तित्व, राजनीतिक संगठन और जनजातीय सहयोग के आधार पर विकसित हुआ। इस व्यवस्था ने अरब समाज में एक नई सामाजिक और राजनीतिक चेतना को जन्म दिया तथा आगे चलकर इस्लामी सभ्यता के विस्तार की आधारशिला रखी।
मक्का के साथ संघर्ष
हिजरत के बाद मक्का के कुरैश ने मक्का छोड़कर जाने वाले मुसलमानों की संपत्ति जब्त कर ली। इससे दोनों पक्षों के बीच तनाव और अधिक बढ़ गया तथा अंततः सैन्य संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई। इसी संदर्भ में कुरआन की सूरह अल-हज्ज में उन लोगों को आत्मरक्षा के लिए युद्ध की अनुमति दी गई, जिन पर अत्याचार किया गया था और जिन्हें उनके घरों से निकाल दिया गया था।
इसी काल में इस्लामी परंपरा के अनुसार 624 ईस्वी में नमाज़ की दिशा (क़िबला) को यरूशलेम से बदलकर मक्का स्थित काबा की ओर कर दिया गया। इसके बाद काबा को मुस्लिम समुदाय की स्थायी प्रार्थना-दिशा के रूप में स्वीकार किया गया। यह परिवर्तन इस्लामी धार्मिक पहचान के विकास में एक महत्त्वपूर्ण घटना है।
बद्र का युद्ध (624 ई.)
मार्च 624 ईस्वी में मुसलमानों और मक्का के कुरैश के बीच पहला निर्णायक युद्ध बद्र के मैदान में हुआ। प्रारंभ में मुसलमानों का उद्देश्य मक्का के एक व्यापारिक कारवाँ को रोकना था, लेकिन परिस्थितियाँ बदलने के कारण उनका सामना कुरैश की संगठित सैन्य सेना से हो गया। लगभग 313 मुसलमानों ने संख्या में उनसे कहीं अधिक बड़ी मक्की सेना का सामना किया। युद्ध में मुसलमानों को महत्त्वपूर्ण विजय प्राप्त हुई। कुरैश के कई प्रमुख नेता, जिनमें अबू जहल भी शामिल था, मारे गए और अनेक सैनिक बंदी बनाए गए। मुस्लिम परंपरा में इस विजय को ईश्वरीय सहायता का परिणाम माना गया।
बद्र के युद्ध (624 ई.) में विजय के बाद मदीना में पैगंबर मुहम्मद का प्रभाव और राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ गई। इस विजय से मुस्लिम समुदाय का आत्मविश्वास मजबूत हुआ और अनेक लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया। यद्यपि कुछ विरोधियों ने कविता और सार्वजनिक वक्तव्यों के माध्यम से आलोचना जारी रखी, लेकिन धीरे-धीरे मूर्तिपूजक विरोध कमजोर पड़ने लगा और मुस्लिम समुदाय अधिक संगठित तथा प्रभावशाली बन गया।
मदीना की सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता को मजबूत करने के लिए पैगंबर मुहम्मद ने हिजाज़ के उत्तरी क्षेत्रों में रहने वाली कई बद्दू (बेदुईन) जनजातियों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए। इन संधियों का उद्देश्य बाहरी खतरों से सुरक्षा, व्यापारिक मार्गों की रक्षा और क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना था। इन गठबंधनों ने उभरते हुए इस्लामी राज्य को राजनीतिक स्थिरता और व्यापक मान्यता प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
624 ईस्वी में बद्र के युद्ध में पराजय के बाद मक्का के कुरैश अपनी प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने और मुसलमानों से बदला लेने के लिए सक्रिय हो गए। बद्र की हार ने न केवल उनकी सैन्य प्रतिष्ठा को प्रभावित किया, बल्कि मक्का के व्यापारिक और राजनीतिक प्रभाव को भी आघात पहुँचाया। इसके परिणामस्वरूप मक्का और मदीना के बीच तनाव और अधिक बढ़ गया। दोनों पक्षों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी रही। कुरैश ने समय-समय पर मदीना के विरुद्ध सैन्य अभियान चलाए, जबकि पैगंबर मुहम्मद ने भी मक्का के सहयोगी कबीलों और व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से अभियान संचालित किए।
बद्र की पराजय का बदला लेने के लिए अबू सुफ़ियान ने लगभग 3,000 सैनिकों की एक विशाल सेना तैयार की और मदीना की ओर प्रस्थान किया। इस सैन्य अभियान की सूचना एक गुप्तचर के माध्यम से पैगंबर मुहम्मद को मिली। इसके बाद मुस्लिम समुदाय में यह विचार-विमर्श प्रारंभ हुआ कि शत्रु का सामना मदीना के भीतर रहकर किया जाए या नगर से बाहर निकलकर खुले मैदान में युद्ध लड़ा जाए।
पैगंबर मुहम्मद और कुछ वरिष्ठ साथियों का मत था कि मदीना की सुरक्षित स्थिति का लाभ उठाते हुए रक्षात्मक रणनीति अपनाई जाए। उनका विचार था कि नगर के भीतर रहकर शत्रु का सामना करना अधिक प्रभावी होगा। दूसरी ओर, अनेक युवा मुसलमान खुले मैदान में जाकर युद्ध करने के पक्ष में थे। उनका मानना था कि इससे शत्रु को मदीना के आसपास की कृषि भूमि और बस्तियों को नुकसान पहुँचाने का अवसर नहीं मिलेगा। अंततः बहुमत की राय को स्वीकार करते हुए पैगंबर मुहम्मद ने मदीना से बाहर निकलकर युद्ध करने का निर्णय लिया।
उहुद का युद्ध (624–625 ई.)
23 मार्च 625 ईस्वी को मदीना के निकट उहुद पर्वत के क्षेत्र में मुसलमानों और कुरैश की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। प्रारंभिक चरण में मुसलमानों को सफलता मिली और मक्की सेना पीछे हटने लगी। पैगंबर मुहम्मद ने रणनीतिक दृष्टि से कुछ तीरंदाजों को एक महत्त्वपूर्ण स्थान पर नियुक्त किया था और उन्हें किसी भी परिस्थिति में अपना स्थान न छोड़ने का आदेश दिया था। किंतु युद्ध में प्रारंभिक सफलता देखकर कुछ तीरंदाजों ने अपने स्थान छोड़ दिए। इस अवसर का लाभ उठाकर कुरैश की घुड़सवार सेना ने पीछे से आक्रमण किया, जिससे युद्ध की स्थिति बदल गई।
इस युद्ध में लगभग 75 मुसलमान मारे गए। इनमें पैगंबर मुहम्मद के चाचा हमज़ा इब्न अब्दुल मुत्तलिब भी शामिल थे, जिन्हें इस्लामी परंपरा में महान शहीदों में स्थान प्राप्त है। स्वयं पैगंबर मुहम्मद भी युद्ध के दौरान घायल हुए। यद्यपि कुरैश ने इस संघर्ष को अपनी विजय के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन वे मदीना पर अधिकार करने या मुस्लिम समुदाय को समाप्त करने में सफल नहीं हुए। युद्ध के बाद मुसलमान अपने शहीदों को दफनाकर मदीना लौट आए।
उहुद के युद्ध के बाद मुस्लिम समुदाय ने इस पराजय के कारणों पर गंभीर विचार किया। कुरआन में इस घटना का उल्लेख करते हुए अनुशासन, धैर्य और नेतृत्व के महत्त्व पर बल दिया गया। इस पराजय को केवल सैन्य हार नहीं, बल्कि समुदाय के लिए एक परीक्षा के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस घटना ने मुसलमानों को संगठन, अनुशासन और आदेश पालन के महत्त्व का अनुभव कराया।
उहुद के बाद अबू सुफ़ियान ने मदीना के विरुद्ध एक व्यापक गठबंधन बनाने का प्रयास किया। उसने अरब की विभिन्न जनजातियों से संपर्क स्थापित किया और उन्हें राजनीतिक प्रभाव, आर्थिक हितों तथा बद्र की पराजय का बदला लेने की भावना के आधार पर अपने पक्ष में करने का प्रयास किया। इसके उत्तर में पैगंबर मुहम्मद ने कूटनीतिक नीति अपनाई। उन्होंने कई जनजातियों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए और संभावित शत्रु गठबंधनों को मजबूत होने से रोकने के लिए आवश्यक सैन्य और राजनीतिक कदम उठाए।
बनू नज़ीर का निष्कासन
उहुद के बाद मदीना की यहूदी जनजातियों और मुस्लिम समुदाय के संबंधों में भी तनाव बढ़ा। इस्लामी स्रोतों के अनुसार बनू नज़ीर पर मदीना समझौते का उल्लंघन करने और पैगंबर मुहम्मद के विरुद्ध षड्यंत्र करने का आरोप लगाया गया। वार्ता असफल होने के बाद उनकी बस्तियों का घेराव किया गया। अंततः उन्हें मदीना छोड़कर ख़ैबर और सीरिया की दिशा में जाने की अनुमति दी गई। उन्हें अपनी चल संपत्ति साथ ले जाने की अनुमति थी, जबकि उनकी कुछ अचल संपत्तियाँ मुस्लिम राज्य के नियंत्रण में आ गईं।
इस प्रकार उहुद के बाद पैगंबर मुहम्मद ने केवल सैन्य शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय कूटनीति, जनजातीय संबंधों और सामरिक योजनाओं पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने विभिन्न अरब कबीलों के साथ समझौते किए और विरोधी शक्तियों को संगठित होने से रोकने का प्रयास किया। इन नीतियों के परिणामस्वरूप मदीना की राजनीतिक स्थिति धीरे-धीरे मजबूत होती गई और मुस्लिम समुदाय एक संगठित शक्ति के रूप में उभरने लगा।
खंदक का युद्ध (627 ई.)
627 ईस्वी में मक्का के कुरैश और उनके सहयोगी कबीलों ने मुस्लिम समुदाय को समाप्त करने के उद्देश्य से मदीना के विरुद्ध एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया। इस अभियान का नेतृत्व अबू सुफ़ियान ने किया। कुरैश और उनके सहयोगी कबीलों की संयुक्त सेना में लगभग 10,000 सैनिक शामिल थे। दूसरी ओर, पैगंबर मुहम्मद के नेतृत्व में लगभग 3,000 मुसलमान मदीना की रक्षा के लिए तैयार थे। निर्वासित बनू नज़ीर जनजाति के कुछ नेताओं ने भी कुरैश और उनके सहयोगियों को संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शत्रु सेना की विशाल संख्या को देखते हुए पैगंबर मुहम्मद ने मदीना की सुरक्षा के लिए एक नई रक्षात्मक रणनीति अपनाई। परंपरा के अनुसार फ़ारसी मूल के सहाबी सलमान अल-फ़ारसी के सुझाव पर मदीना के खुले भाग की ओर एक गहरी खंदक (खाई) खुदवाई गई। उस समय अरब युद्ध प्रणाली में इस प्रकार की रक्षा व्यवस्था सामान्य नहीं थी। इसी कारण यह रणनीति शत्रु सेना के लिए अप्रत्याशित सिद्ध हुई।
मदीना की घेराबंदी लगभग मार्च 627 ईस्वी के अंत में प्रारंभ हुई और लगभग दो सप्ताह तक चली। कुरैश और उनके सहयोगियों ने कई बार खंदक पार करने का प्रयास किया, किंतु वे निर्णायक आक्रमण करने में सफल नहीं हुए। लंबे समय तक चलने वाली घेराबंदी, खराब मौसम, रसद की कमी और गठबंधन में शामिल कबीलों के बीच उत्पन्न मतभेदों के कारण संयुक्त सेना को अंततः पीछे हटना पड़ा। इस घटना का उल्लेख कुरआन की ‘सूरह अल-अहज़ाब’ में भी मिलता है।
बनू कुरैज़ा का विवाद
खंदक के युद्ध के दौरान मदीना के दक्षिणी क्षेत्र में रहने वाली यहूदी जनजाति बनू कुरैज़ा की भूमिका विवाद का विषय रही है। मुस्लिम स्रोतों के अनुसार बनू कुरैज़ा पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने कुरैश और उनके सहयोगियों से संपर्क स्थापित किया तथा मदीना समझौते का उल्लंघन किया। यद्यपि इस घटना के विवरण, परिस्थितियों और परिणामों को लेकर आधुनिक इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है।
घेराबंदी समाप्त होने के बाद मुस्लिम सेना ने बनू कुरैज़ा के किलों का लगभग 25 दिनों तक घेराव किया। पारंपरिक इस्लामी स्रोतों के अनुसार अंततः उन्होंने आत्मसमर्पण किया और उनके मामले का निर्णय उनके पूर्व सहयोगी सअद इब्न मुआज़ द्वारा किया गया। इन स्रोतों में युद्ध में शामिल पुरुषों को दंडित किए जाने तथा महिलाओं और बच्चों को बंदी बनाए जाने का उल्लेख मिलता है।
खंदक के युद्ध में कुरैश की असफलता उनके लिए एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और सैन्य पराजय सिद्ध हुई। उन्होंने मुस्लिम समुदाय को समाप्त करने के लिए अपनी बड़ी सैन्य शक्ति का प्रयोग किया, लेकिन वे मदीना पर अधिकार प्राप्त करने में असफल रहे। इसके परिणामस्वरूप उनकी प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा और अरब में मुस्लिम समुदाय की स्थिति अधिक मजबूत हुई। दूसरी ओर, पैगंबर मुहम्मद का नेतृत्व और मदीना की राजनीतिक शक्ति पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली हो गई।
खंदक के युद्ध के बाद ‘हदीस-ए-इफ़्क़’ नामक घटना भी इस्लामी इतिहास में महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। इसमें पैगंबर मुहम्मद की पत्नी आयशा पर कुछ लोगों द्वारा अनुचित आरोप लगाए गए। मुस्लिम परंपरा के अनुसार बाद में कुरआन की ‘सूरह अन-नूर’ की आयतों के माध्यम से आयशा को निर्दोष घोषित किया गया और ऐसे गंभीर आरोपों के लिए चार प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों की आवश्यकता का सिद्धांत स्थापित किया गया।
हुदैबिया की संधि (628 ई.)
628 ईस्वी (6 हिजरी) में पैगंबर मुहम्मद ने लगभग 1,400 मुसलमानों के साथ उमरा (लघु तीर्थयात्रा) करने के उद्देश्य से मक्का की ओर प्रस्थान किया। यह यात्रा धार्मिक उद्देश्य से की जा रही थी, न कि युद्ध के लिए। मुसलमान अपने साथ केवल यात्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले सीमित शस्त्र लेकर चले थे। इस्लामी परंपरा के अनुसार मुहम्मद ने एक स्वप्न देखा था जिसमें वे और उनके साथी शांतिपूर्वक काबा की यात्रा कर रहे थे। इसी विश्वास के आधार पर उन्होंने मक्का की यात्रा का निर्णय लिया था।
जब कुरैश को मुसलमानों के मक्का की ओर आने का समाचार मिला, तो उन्होंने उन्हें नगर में प्रवेश करने से रोकने का प्रयास किया। इसके लिए कुरैश ने लगभग 200 घुड़सवारों का एक दल भेजा। मुहम्मद ने संघर्ष से बचने के उद्देश्य से मुख्य मार्ग छोड़कर वैकल्पिक मार्ग अपनाया और मक्का के निकट हुदैबिया नामक स्थान पर पड़ाव डाला। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच बातचीत और समझौते के प्रयास प्रारंभ हुए।
वार्ता के दौरान पैगंबर मुहम्मद ने उस्मान इब्न अफ़्फ़ान को अपना प्रतिनिधि बनाकर मक्का भेजा, ताकि कुरैश के नेताओं से बातचीत की जा सके। कुछ समय बाद यह अफ़वाह फैल गई कि उस्मान की हत्या कर दी गई है। इस सूचना के बाद मुसलमानों ने एक वृक्ष के नीचे पैगंबर के प्रति निष्ठा प्रकट करते हुए आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष करने की शपथ ली। इस घटना को ‘बैअत-उर-रिज़वान’ (रिज़वान की प्रतिज्ञा) या ‘वृक्ष के नीचे की प्रतिज्ञा’ कहा जाता है। बाद में ज्ञात हुआ कि उस्मान सुरक्षित हैं, जिसके बाद शांति वार्ता फिर से आरंभ हुई।
अंततः पैगंबर मुहम्मद और कुरैश के प्रतिनिधि सुहैल इब्न अम्र के बीच एक समझौता हुआ, जिसे ‘हुदैबिया की संधि’ कहा जाता है। इस संधि के अनुसार दोनों पक्षों के बीच दस वर्षों तक युद्धविराम रहेगा और अरब के अन्य कबीलों को यह स्वतंत्रता दी गई कि वे अपनी इच्छा के अनुसार मुसलमानों या कुरैश में से किसी एक के साथ संधि कर सकें। इसके अतिरिक्त, मुसलमान उस वर्ष बिना उमरा किए मदीना लौट जाएँगे, किंतु अगले वर्ष उन्हें तीन दिनों के लिए मक्का आकर उमरा करने की अनुमति दी जाएगी। संधि की एक शर्त यह भी थी कि यदि मक्का का कोई व्यक्ति अपने संरक्षक की अनुमति के बिना मदीना पहुँचता है, तो उसे कुरैश को वापस कर दिया जाएगा, जबकि यदि कोई मुसलमान मदीना छोड़कर मक्का चला जाता है, तो कुरैश उसे वापस करने के लिए बाध्य नहीं होंगे। यद्यपि कुछ शर्तें मुसलमानों के लिए कठिन थीं, फिर भी इस संधि ने दोनों पक्षों के बीच शांति स्थापित की और आगे चलकर इस्लाम के प्रसार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं।
संधि की कुछ शर्तें मुसलमानों के लिए कठिन थीं, विशेष रूप से मक्का से मदीना आने वाले लोगों को वापस भेजने के प्रावधान। किंतु इसी समय कुरआन की ‘सूरह अल-फ़त्ह’ अवतरित हुई, जिसमें इस समझौते को “स्पष्ट विजय” बताया गया। बाद की घटनाओं ने भी सिद्ध किया कि यह संधि मुस्लिम समुदाय के लिए लाभकारी सिद्ध हुई।
हुदैबिया की संधि का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह था कि कुरैश ने पहली बार मुस्लिम समुदाय और मदीना की राजनीतिक सत्ता को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। युद्धविराम के कारण मुसलमानों को अपनी सामाजिक और राजनीतिक स्थिति मजबूत करने तथा अरब के अन्य कबीलों के साथ शांतिपूर्ण संबंध स्थापित करने का अवसर मिला। इसके अतिरिक्त, इस यात्रा के माध्यम से यह संदेश भी गया कि इस्लाम काबा और उससे जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों का सम्मान करता है। पैगंबर मुहम्मद ने अरब से बाहर के अनेक शासकों को दूतों के माध्यम से पत्र भेजे। इन पत्रों में उन्हें इस्लाम का संदेश स्वीकार करने का निमंत्रण दिया गया। परंपरागत स्रोतों के अनुसार ऐसे पत्र बाइज़ेंटाइन सम्राट हेराक्लियस, सासानी सम्राट ख़ुसरो द्वितीय, मिस्र के शासक मुक़ौक़िस, अबीसीनिया (हब्शा) के नजाशी तथा अन्य क्षेत्रीय शासकों को भेजे गए। इन प्रयासों से इस्लाम का संदेश अरब प्रायद्वीप के बाहर भी पहुँचना प्रारंभ हुआ। इस प्रकार हुदैबिया की संधि इस्लाम के विस्तार और मदीना राज्य की सुदृढ़ता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक मोड़ सिद्ध हुई।
ख़ैबर अभियान और मुअता का युद्ध
हुदैबिया की संधि के कुछ समय बाद पैगंबर मुहम्मद ने ख़ैबर के यहूदी किलों के विरुद्ध अभियान चलाया, जिसे ‘ख़ैबर का युद्ध’ कहा जाता है। मुस्लिम स्रोतों के अनुसार इस अभियान का मुख्य कारण ख़ैबर के कुछ नेताओं द्वारा मदीना के विरुद्ध शत्रुतापूर्ण गतिविधियों और मुस्लिम विरोधी गठबंधनों को समर्थन देना था। इस अभियान के परिणामस्वरूप ख़ैबर मुस्लिम नियंत्रण में आ गया और वहाँ के निवासियों को निश्चित शर्तों के आधार पर अपनी भूमि पर कृषि कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई। ख़ैबर की विजय से मदीना स्थित मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति अधिक मजबूत हुई। इसके पश्चात मुस्लिम राज्य का प्रभाव अरब प्रायद्वीप के उत्तरी क्षेत्रों तक बढ़ने लगा। इसी क्रम में 629 ईस्वी में ट्रांसजॉर्डन क्षेत्र के मुअता नामक स्थान पर मुस्लिम सेना और बाइज़ेंटाइन साम्राज्य के सहयोगी अरब कबीलों के बीच संघर्ष हुआ, जिसे ‘मुअता का युद्ध’ कहा जाता है। यह युद्ध किसी निर्णायक विजय के बिना समाप्त हुआ, किंतु इसके माध्यम से मुस्लिम समुदाय का संपर्क बाइज़ेंटाइन प्रभाव क्षेत्र से स्थापित हुआ और आगे चलकर उत्तरी अरब तथा सीरिया क्षेत्र की राजनीतिक एवं सैन्य गतिविधियों के लिए आधार तैयार हुआ।
मक्का विजय (630 ई.)
628 ई. में हुई हुदैबिया की संधि के बाद लगभग दो वर्षों तक मुसलमानों और कुरैश के बीच शांति बनी रही। इस संधि के अनुसार दोनों पक्षों तथा उनके सहयोगी कबीलों को एक-दूसरे पर आक्रमण न करने का वचन दिया गया था। मुहम्मद के सहयोगी बनू खुज़ाअ और कुरैश के सहयोगी बनू बक्र के बीच पुरानी शत्रुता विद्यमान थी। 630 ई. में बनू बक्र ने रात के समय बनू खुज़ाअ पर हमला कर दिया, जिसमें कुरैश के कुछ लोगों द्वारा भी सहायता दिए जाने का उल्लेख इस्लामी परंपराओं में मिलता है। इसे हुदैबिया की संधि का उल्लंघन माना गया।
इस घटना के बाद मुहम्मद ने कुरैश के समक्ष तीन विकल्प रखे—मृतकों के लिए क्षतिपूर्ति (रक्त-धन) का भुगतान, बनू बक्र से संबंध-विच्छेद अथवा संधि की समाप्ति स्वीकार करना। प्रारंभ में कुरैश ने संधि समाप्त करने का संकेत दिया, किंतु बाद में उन्होंने संधि को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। इसके लिए अबू सूफ़ियान को मदीना भेजा गया, परंतु यह प्रयास सफल नहीं हुआ।
इसके पश्चात मुहम्मद ने मक्का की ओर अभियान की तैयारी आरंभ की। रमज़ान 630 ई. (8 हिजरी) में लगभग 10,000 मुसलमानों की सेना के साथ उन्होंने मक्का की ओर प्रस्थान किया। अधिकांश मक्कावासियों ने बिना बड़े प्रतिरोध के आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार मक्का लगभग शांतिपूर्ण ढंग से मुसलमानों के नियंत्रण में आ गया। विजय के उपरांत मुहम्मद ने व्यापक क्षमादान की नीति अपनाई और अधिकांश विरोधियों को क्षमा कर दिया। उन्होंने काबा में स्थापित मूर्तियों को हटाकर उसे केवल एकेश्वरवादी उपासना का केंद्र घोषित किया। इस घटना ने अरब में इस्लाम की प्रतिष्ठा और राजनीतिक शक्ति को अत्यंत सुदृढ़ कर दिया।
अरब में इस्लाम का विस्तार
मक्का की विजय के बाद भी कुछ शक्तिशाली अरब कबीलों ने मुहम्मद के नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया। विशेष रूप से हवाज़िन और सकीफ़ (थक़ीफ़) जनजातियों ने मुसलमानों के विरुद्ध एक गठबंधन बनाया। इसके परिणामस्वरूप 630 ई. में ‘हुनैन का युद्ध’ हुआ। प्रारंभिक कठिनाइयों के बाद मुस्लिम सेना को विजय प्राप्त हुई। इसके पश्चात ताइफ़ नगर की घेराबंदी की गई। यद्यपि तत्काल विजय नहीं मिली, किंतु कुछ समय बाद सकीफ़ जनजाति ने इस्लाम स्वीकार कर लिया और ताइफ़ भी मुस्लिम प्रभाव में आ गया।
तबूक अभियान (630–631 ई.)
630–631 ई. के दौरान उत्तरी अरब में बाइज़ेंटाइन साम्राज्य की संभावित गतिविधियों की सूचना मिलने पर मुहम्मद ने तबूक की ओर एक विशाल अभियान का नेतृत्व किया। इस अभियान में लगभग 30,000 सैनिक सम्मिलित थे। यद्यपि बाइज़ेंटाइन सेना से प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ, फिर भी इस अभियान का महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव पड़ा। उत्तर अरब के अनेक स्थानीय शासकों और कबीलों ने मुस्लिम सत्ता के साथ संधियाँ कीं तथा मदीना की सर्वोच्चता को स्वीकार कर लिया। इससे इस्लामी राज्य की सीमाएँ और प्रभाव क्षेत्र दोनों विस्तृत हो गए।
अरब का राजनीतिक एकीकरण
मक्का की विजय, हुनैन के युद्ध तथा तबूक अभियान के पश्चात अधिकांश अरब कबीलों ने स्वेच्छा से अथवा संधियों के माध्यम से इस्लामी राज्य की अधीनता स्वीकार कर ली। अनेक कबीलों के प्रतिनिधिमंडल मदीना पहुँचे और उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने या राजनीतिक संधि करने की घोषणा की। इस काल को इस्लामी इतिहास में ‘आम अल-वुफ़ूद’ (प्रतिनिधिमंडलों का वर्ष) कहा जाता है।
मुहम्मद ने विभिन्न कबीलों के साथ ऐसे समझौते स्थापित किए, जिनके अंतर्गत वे मदीना की राजनीतिक सर्वोच्चता स्वीकार करते थे, मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध किसी शत्रु का साथ नहीं देते थे तथा निर्धारित धार्मिक एवं प्रशासनिक दायित्वों का पालन करते थे। इससे अरब में लंबे समय से चली आ रही जनजातीय प्रतिद्वंद्विता समाप्त हुई और एक संगठित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण हुआ।
धार्मिक एवं प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण
अपने अंतिम वर्षों में मुहम्मद ने अरब में शेष प्रमुख मूर्तिपूजक उपासना-स्थलों को समाप्त करने का निर्देश दिया और एकेश्वरवाद के सिद्धांत को सुदृढ़ किया। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में प्रशासनिक अधिकारियों तथा कर-संग्रहकर्ताओं की नियुक्ति की, जिससे इस्लामी शासन-व्यवस्था अधिक संगठित हुई। जकात और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं को व्यवस्थित रूप से लागू किया गया। इस प्रकार 632 ई. तक अधिकांश अरब प्रायद्वीप राजनीतिक रूप से मदीना के नेतृत्व में संगठित हो चुका था तथा इस्लाम एक प्रभावशाली धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गया।
विदाई हज और अंतिम उपदेश
632 ई. (10 हिजरी) में पैगंबर मुहम्मद ने अपने जीवन की पहली और अंतिम पूर्ण इस्लामी हज यात्रा संपन्न की, जिसे ‘हज्जतुल विदा’ (विदाई हज) कहा जाता है। इस अवसर पर अरब के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मुसलमान मक्का पहुँचे और मुहम्मद के साथ हज के अनुष्ठानों में सम्मिलित हुए। ‘धू-अल-हिज्जा’ की नौवीं तिथि को अराफात के मैदान में उन्होंने अपना प्रसिद्ध ‘खुत्बा-ए-हज्जतुल विदा’ (विदाई उपदेश) दिया, जिसे इस्लामी इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण भाषणों में गिना जाता है। इस उपदेश में उन्होंने मानव समानता, सामाजिक न्याय, नैतिक आचरण और धार्मिक कर्तव्यों के प्रमुख सिद्धांतों पर बल दिया।
विदाई उपदेश में मुहम्मद ने घोषणा की कि किसी अरब को गैर-अरब पर, किसी श्वेत को अश्वेत पर और किसी अश्वेत को श्वेत पर कोई श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है। उनके अनुसार मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार वंश, जाति, रंग या क्षेत्र नहीं, बल्कि धर्मनिष्ठा, सदाचार और अच्छे कर्म हैं। इस प्रकार उन्होंने नस्लीय और सामाजिक भेदभाव का विरोध करते हुए नैतिकता और समानता पर आधारित समाज की स्थापना का संदेश दिया।
मुहम्मद ने इस उपदेश में पूर्व-इस्लामी अरब समाज की रक्त-प्रतिशोध और जनजातीय वैमनस्य की परंपराओं को समाप्त करने की घोषणा की। उन्होंने मुसलमानों को आपसी भाईचारे, न्याय, क्षमा और शांति की भावना अपनाने का निर्देश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन, सम्मान और संपत्ति पवित्र है। उन्होंने इसे हज के पवित्र दिन और मक्का के पवित्र क्षेत्र की गरिमा के समान महत्त्वपूर्ण बताया। साथ ही उन्होंने सूद (रिबा) की प्रथा का निषेध किया और आर्थिक लेन-देन में ईमानदारी, न्याय तथा नैतिकता का पालन करने पर बल दिया।
विदाई उपदेश में मुहम्मद ने महिलाओं के अधिकारों और उनके साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार पर भी विशेष ध्यान दिया। उन्होंने पति-पत्नी के पारस्परिक अधिकारों और कर्तव्यों को स्पष्ट करते हुए कहा कि पारिवारिक जीवन प्रेम, सहयोग और जिम्मेदारी पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने विवाह को केवल सामाजिक संबंध नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक उत्तरदायित्व के रूप में प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने उत्तराधिकार और वंश संबंधी मामलों में स्पष्ट निर्देश दिए तथा झूठे पितृत्व दावों और वंश की गलत घोषणा को अनुचित बताया। उन्होंने इस्लामी परंपरा में चार पवित्र महीनों की मान्यता को भी बनाए रखा।
सुन्नी परंपरा के अनुसार विदाई हज के अवसर पर कुरआन की यह आयत अवतरित हुई—“आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को पूर्ण कर दिया, तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के रूप में पसंद किया।” इस आयत को इस्लामी धार्मिक व्यवस्था की पूर्णता और मुहम्मद के संदेश की अंतिम पुष्टि के रूप में देखा जाता है।
दूसरी ओर, शिया परंपरा के अनुसार विदाई हज से लौटते समय ग़दीर-ए-खुम नामक स्थान पर मुहम्मद ने अली इब्न अबी तालिब को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। शिया मत में इस घटना को अली के धार्मिक और आध्यात्मिक नेतृत्व की पुष्टि के रूप में विशेष महत्त्व प्राप्त है। इस प्रकार हज्जतुल विदा न केवल मुहम्मद के जीवन की अंतिम महत्त्वपूर्ण धार्मिक यात्रा थी, बल्कि इस्लामी नैतिक, सामाजिक और धार्मिक सिद्धांतों के प्रतिपादन का भी एक महत्त्वपूर्ण अवसर था।
पैगंबर मुहम्मद का निधन और और दफ़न
विदाई हज के कुछ महीनों बाद मुहम्मद अस्वस्थ हो गए। उन्हें तेज़ बुखार, सिरदर्द और शारीरिक दुर्बलता ने घेर लिया। लगभग दो सप्ताह तक बीमारी से पीड़ित रहने के बाद लगभग 62–63 वर्ष की आयु में 8 जून 632 ई. (12 रबीउल अव्वल, 11 हिजरी) को मदीना में पत्नी आयशा के कक्ष में उनका निधन हो गया। किंतु उनकी मृत्यु तक अरब प्रायद्वीप का अधिकांश भाग इस्लाम के प्रभाव में आ चुका था और एक संगठित इस्लामी समुदाय का निर्माण हो चुका था।
इस्लामी परंपरा के अनुसार अंतिम समय में मुहम्मद ने ईश्वर की ओर उन्मुख होकर प्रार्थना की और कहा : “ऐ अल्लाह! मुझे सर्वोच्च साथी (अर-रफ़ीक़ अल-आला) के साथ स्थान प्रदान कर।” मुस्लिम विद्वानों के अनुसार ‘अर-रफ़ीक़ अल-आला’ का अर्थ अल्लाह की निकटतम संगति अथवा स्वर्ग में सर्वोच्च स्थान से संबंधित माना जाता है।
मुहम्मद को उसी स्थान पर दफ़नाया गया जहाँ उनका निधन हुआ था, अर्थात् आयशा के कक्ष में। बाद में यह स्थान मदीना स्थित मस्जिद-ए-नबवी का हिस्सा बन गया। उमय्यद खलीफा अल-वालिद प्रथम के शासनकाल में मस्जिद के विस्तार के दौरान उनके मकबरे को इसके परिसर में सम्मिलित किया गया। उनकी कब्र के निकट प्रथम दो राशिदून खलीफा—अबू बक्र और उमर इब्न अल-खत्ताब की कब्रें भी स्थित हैं।
मकबरे के ऊपर स्थित प्रसिद्ध हरा गुंबद (ग्रीन डोम) बाद के काल में निर्मित हुआ और आज इस्लामी स्थापत्य का एक प्रमुख प्रतीक माना जाता है। मध्यकाल में इसका निर्माण हुआ तथा उस्मानी (ऑटोमन) काल में इसे हरे रंग से सजाया गया। वर्तमान में मस्जिद-ए-नबवी विश्वभर के मुसलमानों के लिए अत्यंत श्रद्धा, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक महत्त्व का प्रमुख केंद्र है।
मुहम्मद का उत्तराधिकार और सुन्नी-शिया विभाजन
632 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद के निधन के बाद मुस्लिम समुदाय के सामने सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न उनके उत्तराधिकारी के चयन का था। मुहम्मद के बाद धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व किसके हाथों में होगा, इस विषय पर प्रारंभिक मुस्लिम समाज में मतभेद उत्पन्न हुए। यही उत्तराधिकार का विवाद आगे चलकर इस्लाम में सुन्नी और शिया परंपराओं के विकास का प्रमुख आधार बना।
शिया परंपरा के अनुसार विदाई हज से लौटते समय ग़दीर-ए-खुम नामक स्थान पर पैगंबर मुहम्मद ने अली इब्न अबी तालिब को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। शिया मत में इस घटना को अली के धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व की स्पष्ट स्वीकृति माना जाता है। उनके अनुसार पैगंबर के बाद मुस्लिम समुदाय का नेतृत्व अली और उनके वंशजों को प्राप्त होना चाहिए था। शिया विचारधारा में इमामत की अवधारणा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जिसके अनुसार इमाम केवल राजनीतिक शासक नहीं, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी होते हैं।
इसके विपरीत, सुन्नी परंपरा ग़दीर-ए-खुम की घटना को अली के सम्मान, प्रतिष्ठा और पैगंबर मुहम्मद के साथ उनके घनिष्ठ संबंध की अभिव्यक्ति मानती है, न कि राजनीतिक उत्तराधिकार की औपचारिक घोषणा। सुन्नी मत के अनुसार पैगंबर ने अपने उत्तराधिकारी का स्पष्ट रूप से चयन नहीं किया था, इसलिए मुस्लिम समुदाय को आपसी परामर्श और सहमति के आधार पर अपना नेता चुनने का अधिकार था।
मुहम्मद की मृत्यु के तुरंत बाद मदीना में सकीफ़ा बनू साअिदा नामक स्थान पर प्रमुख मुस्लिम नेताओं की सभा आयोजित हुई। इस सभा में विभिन्न नेताओं के बीच विचार-विमर्श के बाद अबू बक्र को मुस्लिम समुदाय का प्रथम खलीफा चुना गया। उमर इब्न अल-खत्ताब सहित अनेक प्रमुख सहाबाओं ने उनका समर्थन किया। सुन्नी परंपरा इस चयन को मुस्लिम समुदाय की सहमति (इज्मा) पर आधारित मानती है, जबकि शिया परंपरा के अनुसार अली इब्न अबी तालिब पैगंबर के सबसे निकट संबंधी और योग्य उत्तराधिकारी थे।
अबू बक्र के बाद क्रमशः उमर इब्न अल-खत्ताब और उस्मान इब्न अफ्फान खलीफा बने। इन प्रारंभिक चार खलीफाओं को सुन्नी परंपरा में ‘खुलफ़ा-ए-राशिदून’ अर्थात् ‘सही मार्गदर्शक खलीफा’ कहा जाता है। 656 ईस्वी में उस्मान की हत्या के बाद अली इब्न अबी तालिब चौथे खलीफा बने। उनके शासनकाल में राजनीतिक संघर्ष बढ़ गए। जंग-ए-जमल और सिफ्फीन जैसे संघर्षों ने मुस्लिम समाज में राजनीतिक मतभेदों को और गहरा कर दिया।
661 ईस्वी में अली की मृत्यु के बाद उनके पुत्र हसन इब्न अली ने कुछ समय के लिए नेतृत्व संभाला। बाद में उन्होंने मुआविया इब्न अबी सुफ़ियान के साथ समझौता कर राजनीतिक सत्ता त्याग दी। इसके पश्चात मुआविया ने उमय्यद वंश की स्थापना की और अपने पुत्र यज़ीद को उत्तराधिकारी घोषित किया। इससे इस्लामी शासन में वंशानुगत उत्तराधिकार की परंपरा का प्रारंभ हुआ।
शिया परंपरा में हसन और उनके बाद हुसैन इब्न अली को मुस्लिम समुदाय का वैध इमाम माना गया। आगे चलकर विशेष रूप से इमामिया शिया मत में अली से लेकर उनके वंशजों तक बारह इमामों की परंपरा विकसित हुई। शिया विश्वास के अनुसार ये इमाम ईश्वरीय मार्गदर्शन प्राप्त धार्मिक नेता थे, भले ही उन्हें हमेशा राजनीतिक सत्ता प्राप्त नहीं हुई।
इस प्रकार मुहम्मद के उत्तराधिकार का प्रश्न केवल सत्ता संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने इस्लामी राजनीतिक विचार, धार्मिक सिद्धांत और सामुदायिक पहचान के विकास को भी प्रभावित किया। समय के साथ ख़ारिजी तथा अन्य विचारधाराएँ भी नेतृत्व के प्रश्न पर विकसित हुईं।
क़ुरआन और हदीस का संकलन
क़ुरआन
क़ुरआन इस्लाम का सर्वोच्च और केंद्रीय धर्मग्रंथ है। इस्लामी मान्यता के अनुसार यह अल्लाह का वचन है, जिसे फ़रिश्ता जिब्रील (जिब्राईल) के माध्यम से पैगंबर मुहम्मद पर लगभग 23 वर्षों (610–632 ई.) के दौरान क्रमशः अवतरित किया गया। मुसलमान इसे ईश्वर की अंतिम एवं पूर्ण प्रकाशना मानते हैं। क़ुरआन में आस्था, उपासना, नैतिकता, सामाजिक जीवन, न्याय, करुणा तथा मानव आचरण से संबंधित सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसका मुख्य उद्देश्य मनुष्य को सत्य, सदाचार, ईश्वर-भक्ति तथा न्यायपूर्ण जीवन का मार्ग दिखाना है। यद्यपि क़ुरआन में पैगंबर मुहम्मद के जीवन की कुछ घटनियों का उल्लेख मिलता है, फिर भी यह उनकी क्रमबद्ध जीवनी प्रस्तुत नहीं करता। इसका प्रमुख स्वरूप धार्मिक मार्गदर्शन और नैतिक शिक्षा प्रदान करना है।
हदीस
हदीस इस्लाम के प्रमुख धार्मिक स्रोतों में क़ुरआन के बाद दूसरा स्थान रखती है। हदीस से आशय पैगंबर मुहम्मद के कथनों, कार्यों, मौन स्वीकृतियों तथा जीवन-व्यवहार से है। इस्लामी परंपरा में इन्हें सुन्नत का अभिलेख माना जाता है, जो मुसलमानों के धार्मिक, नैतिक और सामाजिक जीवन के लिए मार्गदर्शक हैं। पैगंबर मुहम्मद के निधन के बाद उनके साथियों (सहाबा) तथा उनके उत्तराधिकारियों ने इन परंपराओं का संरक्षण किया और बाद में उनका व्यवस्थित संकलन किया गया। इस्लामी कानून (शरीअत), उपासना-पद्धति तथा नैतिक आचरण के निर्धारण में हदीस का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है।
आठवीं और नौवीं शताब्दी ईस्वी में अनेक विद्वानों ने हदीसों का संकलन एवं परीक्षण किया। इनमें इमाम अल-बुख़ारी द्वारा संकलित सहीह अल-बुख़ारी तथा इमाम मुस्लिम की सहीह मुस्लिम को सर्वाधिक प्रामाणिक संग्रह माना जाता है। इनके अतिरिक्त जामिअ अत-तिर्मिज़ी, सुनन अबू दाऊद, सुनन अन-नसाई, सुनन इब्न माजह, मुवत्ता इमाम मालिक तथा सुनन अल-दारक़ुतनी भी प्रमुख हदीस ग्रंथ हैं। इन संकलनों में प्रत्येक हदीस के साथ उसके कथनकर्ताओं की श्रृंखला (इस्नाद) का उल्लेख किया गया है, जिसके आधार पर उसकी प्रामाणिकता का परीक्षण किया जाता है। इस वैज्ञानिक पद्धति ने हदीस साहित्य को इस्लामी परंपरा में विशेष विश्वसनीयता प्रदान की।
पैगंबर मुहम्मद के सुधार
इतिहासकार विलियम मोंटगोमेरी वाट के अनुसार पैगंबर मुहम्मद के लिए धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं था, बल्कि वह तत्कालीन अरब समाज की धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं का व्यापक समाधान था। उन्होंने उस समय के अरब समाज में व्याप्त सामाजिक असमानता, जनजातीय संघर्ष, आर्थिक शोषण और नैतिक अव्यवस्था को दूर करने का प्रयास किया। उनका संदेश केवल धार्मिक विश्वासों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने समाज की संरचना, नैतिक मूल्यों और सामुदायिक जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया।
इतिहासकार बर्नार्ड लुईस के अनुसार इस्लाम के उदय ने अरब समाज में व्यापक सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन उत्पन्न किया। मुहम्मद ने एक ऐसे समुदाय (उम्मा) की स्थापना की, जिसकी नींव रक्त संबंध, वंश या जनजातीय पहचान के बजाय समान आस्था, नैतिक मूल्यों और धार्मिक प्रतिबद्धता पर आधारित थी। इस व्यवस्था ने पारंपरिक जनजातीय विभाजनों को चुनौती दी और अरब समाज को एक नई सामुदायिक पहचान प्रदान की।
मुहम्मद के नेतृत्व में इस्लाम ने सामाजिक न्याय को विशेष महत्त्व दिया। उस समय मक्का में आर्थिक विषमता बढ़ रही थी और निर्धन, अनाथ तथा कमजोर वर्गों की स्थिति चिंताजनक थी। इस समस्या के समाधान के लिए कुरआन में ज़कात (अनिवार्य दान) की व्यवस्था की गई, जिसके माध्यम से समाज के जरूरतमंद वर्गों की सहायता का प्रावधान किया गया। इस व्यवस्था ने धन के पुनर्वितरण और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को बढ़ावा दिया। इस्लामी समुदाय के विस्तार के साथ मुहम्मद ने अपने सहयोगी कबीलों को भी ज़कात व्यवस्था अपनाने के लिए प्रेरित किया।
इतिहासकारों के अनुसार इस्लाम ने सामाजिक सुरक्षा, पारिवारिक व्यवस्था, महिलाओं और बच्चों के अधिकारों तथा दासों के साथ व्यवहार से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण सुधार प्रस्तुत किए। इस्लाम ने जन्म, वंश और जनजातीय श्रेष्ठता के आधार पर विशेषाधिकारों का विरोध किया तथा नैतिकता, सदाचार और धार्मिक आचरण को सम्मान का आधार बनाया। इससे समाज में समानता, उत्तरदायित्व और पारस्परिक सहयोग की भावना को बल मिला।
मुहम्मद के जीवन से संबंधित परंपराओं में दास प्रथा का भी उल्लेख मिलता है। ज़ैद इब्न हारिसा इसका प्रमुख उदाहरण हैं। वे प्रारंभ में दास थे, जिन्हें मुहम्मद ने मुक्त किया और अपने परिवार के अत्यंत निकट स्थान दिया। ज़ैद बाद में मुहम्मद के प्रमुख सहयोगियों में शामिल हुए। कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद ने तत्कालीन अरब समाज में प्रचलित दास प्रथा को तत्काल समाप्त नहीं किया, किंतु उन्होंने दासों के प्रति मानवीय व्यवहार, उनके अधिकारों और सम्मान पर विशेष बल दिया। उन्होंने दासों को मुक्त करना पुण्य कार्य बताया और इस दिशा में सामाजिक परिवर्तन की भावना को प्रोत्साहित किया। इस प्रकार मुहम्मद के संदेश ने धार्मिक सुधारों के साथ-साथ अरब समाज के सामाजिक और नैतिक पुनर्गठन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पैगंबर मुहम्मद का पारिवारिक जीवन एवं पत्नियाँ
इस्लामी परंपरा में पैगंबर मुहम्मद के पारिवारिक जीवन को उनके सामाजिक, धार्मिक और मानवीय व्यक्तित्व का महत्त्वपूर्ण पक्ष माना जाता है। इस्लामी परंपरा में उनकी पत्नियों को ‘उम्महातुल मोमिनीन’ (विश्वासियों की माताएँ) कहा जाता है। यह सम्मानसूचक उपाधि क़ुरआन की ‘सूरह अल-अहज़ाब’ से संबंधित है।
पारंपरिक इस्लामी स्रोतों में पैगंबर मुहम्मद की पत्नियों की संख्या के संबंध में विभिन्न विवरण मिलते हैं। सामान्यतः ग्यारह पत्नियों का उल्लेख प्रमुख रूप से किया जाता है, जबकि कुछ स्रोतों में तेरह विवाहों का भी वर्णन मिलता है। रेहाना बिंत ज़ैद और मारिया अल-क़िब्तिया के संबंध में स्रोतों में मतभेद पाए जाते हैं कि वे उनकी पत्नियाँ थीं या अन्य प्रकार के संबंध में थीं। अधिकांश विवाह उनके मदीना काल में हुए, जब वे धार्मिक नेता के साथ-साथ एक संगठित समुदाय के प्रमुख भी थे।
पैगंबर मुहम्मद का पहला विवाह लगभग 595 ईस्वी में मक्का की धनी व्यापारी महिला ख़दीजा बिंत ख़ुवैलिद से हुआ था, जो इस्लाम स्वीकार करने वाली प्रथम व्यक्तियों में शामिल थीं। ख़दीजा के साथ मुहम्मद का वैवाहिक जीवन लगभग 25 वर्षों तक चला। ख़दीजा की मृत्यु के बाद मुहम्मद ने कई विवाह किए। इस्लामी परंपरा के अनुसार इन विवाहों के पीछे केवल व्यक्तिगत कारण नहीं थे, बल्कि सामाजिक, मानवीय और राजनीतिक उद्देश्य भी जुड़े हुए थे। इनमें से कई महिलाएँ विधवा थीं, जिन्हें सामाजिक संरक्षण और सुरक्षा की आवश्यकता थी। कुछ विवाहों के माध्यम से विभिन्न कबीलों और प्रभावशाली परिवारों के साथ संबंध मजबूत हुए, जिससे नवोदित मुस्लिम समुदाय की एकता और राजनीतिक स्थिरता को सहायता मिली।
ख़दीजा की मृत्यु के बाद ख़ौला बिंत हकीम के सुझाव पर मुहम्मद ने सौदा बिंत ज़मआ और आयशा बिंत अबू बक्र से विवाह किया। सौदा विधवा थीं और उन्होंने प्रारंभिक मुस्लिम समुदाय के कठिन समय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आयशा का विवाह इतिहासकारों और आधुनिक विद्वानों के बीच विशेष चर्चा का विषय रहा है। पारंपरिक इस्लामी स्रोतों में उनके विवाह की कम आयु का उल्लेख मिलता है, जबकि कुछ आधुनिक मुस्लिम विद्वानों और इतिहासकारों ने अन्य ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर उनकी आयु अधिक होने का तर्क प्रस्तुत किया है। यह विषय आज भी ऐतिहासिक विमर्श का हिस्सा है।
मदीना काल में मुहम्मद ने अपने पारिवारिक जीवन में सरलता, सहयोग और सम्मान की भावना बनाए रखी। परंपरागत विवरणों के अनुसार वे घरेलू कार्यों में सहायता करते थे, अपने वस्त्रों की मरम्मत करते थे और परिवार के दैनिक कार्यों में भाग लेते थे। वे अपनी पत्नियों के साथ संवाद करते, उनकी राय सुनते और पारिवारिक विषयों पर विचार-विमर्श करते थे। इससे उनके पारिवारिक जीवन में सहयोग, पारस्परिक सम्मान और समझ की भावना दिखाई देती है।
संतान और वंश परंपरा
मुहम्मद और ख़दीजा की संतानों में चार पुत्रियों—ज़ैनब, रुकय्या, उम्म कुलसूम और फ़ातिमा—का उल्लेख मिलता है। उनके पुत्र क़ासिम और अब्दुल्लाह का बचपन में ही निधन हो गया। मारिया अल-क़िब्तिया से उनके पुत्र इब्राहीम का जन्म हुआ, किंतु उनकी भी कम आयु में मृत्यु हो गई।
मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा ज़हरा का इस्लामी इतिहास में विशेष महत्त्व है। उनका विवाह अली इब्न अबी तालिब से हुआ। उनके वंश से आगे चलकर शरीफ़, सैयद या सादात कहलाने वाले वंशों की परंपरा विकसित हुई, जिन्हें मुस्लिम समाज में विशेष सम्मान प्राप्त हुआ। सुन्नी और शिया दोनों परंपराओं में फ़ातिमा को अत्यंत सम्मान दिया जाता है, यद्यपि शिया परंपरा में उनके वंश और आध्यात्मिक महत्त्व पर विशेष बल दिया जाता है।
मुहम्मद की कई पत्नियाँ उनके निधन के बाद तक जीवित रहीं। सुन्नी परंपरा में आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) को विशेष सम्मान प्राप्त है, क्योंकि उन्होंने मुहम्मद के जीवन, व्यवहार और शिक्षाओं से संबंधित अनेक हदीसों को संरक्षित किया, जो बाद में इस्लामी ज्ञान परंपरा के महत्त्वपूर्ण स्रोत सिद्ध हुए।
मुहम्मद की आलोचनाएँ
पैगंबर मुहम्मद की आलोचना उनके जीवनकाल से ही आरंभ हो गई थी। सातवीं शताब्दी के अरब समाज में उनके द्वारा प्रस्तुत एकेश्वरवाद (तौहीद) और नए धार्मिक संदेश का कुछ गैर-मुस्लिम समुदायों तथा कुरैश के विरोधी वर्गों ने विरोध किया। कुछ यहूदी समूहों ने उनके पैगंबरी दावे, धार्मिक शिक्षाओं और पूर्ववर्ती अब्राहमिक परंपराओं की उनकी व्याख्या पर प्रश्न उठाए। उनके कुछ विरोधियों ने उन्हें झूठा पैगंबर कहा और उनके संदेश को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इस विरोध का एक प्रमुख कारण यह था कि मुहम्मद स्वयं को पूर्ववर्ती पैगंबरों की परंपरा का अंतिम दूत बताते थे, जबकि आलोचकों के अनुसार उनकी शिक्षाएँ पारंपरिक यहूदी और ईसाई धार्मिक मान्यताओं से भिन्न थीं।
मध्यकालीन यूरोप और बाइज़ेंटाइन ईसाई लेखकों ने भी मुहम्मद के व्यक्तित्व और शिक्षाओं की आलोचना की। उन्होंने उन्हें कभी-कभी गलत धार्मिक शिक्षक, झूठा पैगंबर या ईसाई धर्म के विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया। हालांकि, इन आलोचनाओं पर तत्कालीन राजनीतिक, सैन्य और सांस्कृतिक परिस्थितियों का भी प्रभाव था, क्योंकि उस समय इस्लामी साम्राज्य और ईसाई जगत के बीच लंबे समय तक संघर्ष और प्रतिस्पर्धा चलती रही। बाद के कालों में मुहम्मद की आलोचना मुख्य रूप से उनके पैगंबरी दावे, व्यक्तिगत जीवन, विवाहों और धार्मिक नेतृत्व से जुड़े विषयों पर केंद्रित रही।
मुस्लिम विद्वानों ने इन आलोचनाओं का उत्तर देते हुए मुहम्मद के जीवन को आध्यात्मिकता, नैतिकता और सामाजिक सुधार के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार मुहम्मद ने अरब समाज में धार्मिक एकता स्थापित करने, सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने, कमजोर वर्गों की सहायता करने और नैतिक मूल्यों को मजबूत करने का प्रयास किया। इस्लामी परंपरा में उन्हें आदर्श धार्मिक नेता, समाज सुधारक और अंतिम पैगंबर के रूप में सम्मान दिया जाता है।
मुहम्मद और आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का विवाह इतिहासकारों तथा आधुनिक विद्वानों के बीच एक महत्त्वपूर्ण विमर्श का विषय रहा है। पारंपरिक इस्लामी स्रोतों, विशेषकर कुछ हदीसों और प्रारंभिक जीवनी ग्रंथों में, विवाह के समय आयशा की आयु छह या सात वर्ष तथा वैवाहिक जीवन के आरंभ के समय नौ वर्ष बताई गई है। हालांकि, कुछ आधुनिक मुस्लिम विद्वानों और इतिहासकारों ने अन्य ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर इन विवरणों की पुनः समीक्षा की है। उनका तर्क है कि आयशा की वास्तविक आयु इससे अधिक रही होगी।
आधुनिक इतिहासकार इस विषय को सातवीं शताब्दी के अरब समाज की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखते हैं। उस समय विवाह केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं था, बल्कि परिवारों और कबीलों के बीच सामाजिक एवं राजनीतिक संबंधों को मजबूत करने का माध्यम भी माना जाता था। कुछ विद्वानों के अनुसार उस काल में कम आयु में विवाह की परंपरा अरब समाज तक सीमित नहीं थी, बल्कि विश्व के अनेक समाजों में प्रचलित थी। इसलिए ऐतिहासिक व्यक्तियों और घटनाओं का मूल्यांकन करते समय तत्कालीन सामाजिक मान्यताओं, परिस्थितियों और सांस्कृतिक संदर्भों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
मुहम्मद का इस्लामी परंपरा में स्थान
इस्लामी विश्वास में अल्लाह की एकता (तौहीद) के बाद मुहम्मद की पैगंबरी पर विश्वास करना आस्था का दूसरा प्रमुख सिद्धांत माना जाता है। प्रत्येक मुसलमान शहादा (ईमान की घोषणा) में यह स्वीकार करता है—“मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के दूत हैं।” शहादा इस्लाम के मूल विश्वासों में से एक है और इसे मुस्लिम धार्मिक पहचान का आधार माना जाता है। इस्लामी परंपरा के अनुसार नवजात शिशु के कानों में सबसे पहले यही शब्द सुनाए जाते हैं और मृत्यु के समय भी इसका पाठ किया जाता है। नमाज़ और अज़ान में भी शहादा का उच्चारण किया जाता है। इस्लाम स्वीकार करने वाले व्यक्ति के लिए इन शब्दों पर विश्वास करना आवश्यक माना जाता है।
मुस्लिम मान्यता के अनुसार मुहम्मद अल्लाह द्वारा भेजे गए अंतिम पैगंबर (ख़ातिमुन्नबियीन) हैं। कुरआन में उन्हें पूर्ववर्ती पैगंबरों जैसे इब्राहीम, मूसा और ईसा की परंपरा को पूर्ण करने वाला बताया गया है। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार सभी पैगंबर ईश्वर के संदेशवाहक थे और मुसलमानों को उन सभी पर विश्वास करना चाहिए। कुरआन यह स्पष्ट करता है कि पैगंबरों के बीच भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। इस दृष्टिकोण से मुहम्मद की पैगंबरी को पूर्ववर्ती धार्मिक परंपराओं की निरंतरता और उनकी पूर्णता के रूप में देखा जाता है।
इस्लामी परंपरा में मुहम्मद से संबंधित अनेक चमत्कारों और अलौकिक घटनाओं का वर्णन मिलता है। कुछ मुस्लिम विद्वान कुरआन की सूरह अल-क़मर की आयतों को चंद्रमा के विभाजन की घटना से जोड़ते हैं। उनके अनुसार यह घटना मक्का के विरोधियों के सामने मुहम्मद की पैगंबरी का प्रमाण थी। हालांकि, कुछ पश्चिमी इतिहासकारों का मत है कि कुरआन में मुहम्मद द्वारा किए गए चमत्कारों का वर्णन सीमित है। इतिहासकार डेनिस ग्रिल के अनुसार इस्लामी परंपरा में मुहम्मद का सबसे बड़ा चमत्कार स्वयं कुरआन को माना गया है, जिसे ईश्वरीय संदेश और अद्वितीय ग्रंथ के रूप में देखा जाता है।
मुहम्मद के जीवन की कई घटनाएँ उनके नैतिक गुणों और मानवीय दृष्टिकोण के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। ताइफ़ की घटना इसका प्रमुख उदाहरण है। इस्लामी परंपरा के अनुसार जब मुहम्मद ताइफ़ गए, तो वहाँ के लोगों ने उनका विरोध किया और उन पर पत्थर फेंके, जिससे वे घायल हो गए। इस अवसर पर एक फ़रिश्ते ने प्रकट होकर ताइफ़ के लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की अनुमति माँगी, लेकिन मुहम्मद ने प्रतिशोध लेने से इनकार किया और उनके लिए मार्गदर्शन की प्रार्थना की। इस घटना को उनके धैर्य, क्षमा और करुणा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
पैगंबर मुहम्मद के जीवन और शिक्षाओं को समझने में सुन्नत और हदीस का विशेष महत्त्व है। सुन्नत का अर्थ है—मुहम्मद के कथनों, कार्यों, व्यवहार और शिक्षाओं की परंपरा। इस्लामी धर्म और कानून के विकास में सुन्नत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुहम्मद के जीवन को मुसलमानों के लिए आदर्श माना गया, इसलिए उनके आचरण का अनुसरण धार्मिक जीवन का महत्त्वपूर्ण भाग बन गया। इस्लाम की पहली शताब्दी के अंत तक सुन्नत धार्मिक, सामाजिक और नैतिक नियमों के निर्माण का प्रमुख आधार बन चुकी थी।
सुन्नत का ज्ञान मुख्य रूप से हदीसों के माध्यम से प्राप्त होता है। हदीसों में मुहम्मद के कथनों, कार्यों और अनुमोदनों का वर्णन मिलता है। कुरआन के साथ-साथ हदीस और सुन्नत ने इस्लामी जीवन-पद्धति को व्यवस्थित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सुन्नत धार्मिक अनुष्ठानों, व्यक्तिगत आचरण, सामाजिक व्यवहार और आध्यात्मिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में मार्गदर्शन प्रदान करती है। इसमें नमाज़ की विधि, रोज़े के नियम, हज की प्रक्रियाएँ, स्वच्छता, विवाह, मृत्यु संस्कार तथा मनुष्य और ईश्वर के संबंधों से जुड़े विषयों का विवरण मिलता है। कई दैनिक धार्मिक प्रथाओं का विस्तृत स्वरूप कुरआन की अपेक्षा सुन्नत में अधिक स्पष्ट रूप से मिलता है। मुहम्मद द्वारा सिखाया गया अभिवादन “अस्सलामु अलैकुम” (आप पर शांति हो) आज भी विश्वभर के मुसलमानों द्वारा प्रयोग किया जाता है।
इस्लामी परंपरा में मुहम्मद के नाम के बाद सम्मान व्यक्त करने के लिए “सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम” (अल्लाह उन पर कृपा और शांति प्रदान करे) कहा जाता है। यह वाक्यांश उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान की अभिव्यक्ति माना जाता है। सूफी परंपरा में मुहम्मद को केवल पैगंबर ही नहीं, बल्कि आदर्श और पूर्ण मानव के रूप में भी देखा गया है। सूफी साधक उनके आध्यात्मिक गुणों, नैतिक आदर्शों और जीवन-पद्धति को आत्मिक विकास का माध्यम मानते हैं। लगभग सभी प्रमुख सूफी सिलसिले अपनी आध्यात्मिक परंपरा को मुहम्मद से जोड़ते हैं और उन्हें आध्यात्मिक मार्गदर्शन का सर्वोच्च स्रोत मानते हैं।
मुस्लिम समाज में मुहम्मद के प्रति प्रेम और श्रद्धा साहित्य, कविता और लोक परंपराओं में भी दिखाई देती है। मिस्र के प्रसिद्ध सूफी कवि अल-बुसीरी (1211–1294 ई.) द्वारा रचित ‘क़सीदा अल-बुर्दा’ मुहम्मद की प्रशंसा में लिखी गई एक प्रसिद्ध रचना है, जिसे आज भी व्यापक रूप से पढ़ा जाता है। कुरआन में मुहम्मद को “रहमतुल्लिल-आलमीन” अर्थात “समस्त संसार के लिए दया” कहा गया है। इस अवधारणा ने उन्हें मुस्लिम साहित्य और संस्कृति में करुणा, दया और मानव कल्याण के प्रतीक के रूप में स्थापित किया।
पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिवस को इस्लामी दुनिया के अनेक क्षेत्रों में ‘मौलिदुन्नबी’ या ‘मिलाद-उन-नबी’ के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर धार्मिक सभाएँ, कविताएँ और उनके जीवन से संबंधित कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हालांकि, वहाबी विचारधारा से प्रभावित कुछ क्षेत्रों, विशेषकर सऊदी अरब में, इन सार्वजनिक आयोजनों को परंपरागत रूप से प्रोत्साहित नहीं किया जाता है। इस प्रकार मुहम्मद की पैगंबरी, उनकी शिक्षाएँ, सुन्नत, हदीस और उनसे जुड़ी धार्मिक परंपराएँ इस्लामी आस्था, संस्कृति और सामाजिक जीवन के महत्त्वपूर्ण आधार हैं।
हज़रत मुहम्मद का महत्त्व
पैगंबर मुहम्मद इस्लामी इतिहास के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों में से एक हैं, जिन्होंने सातवीं शताब्दी के अरब समाज में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन की एक नई दिशा प्रस्तुत की। उनका जीवन मक्का के एक प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार से आरंभ हुआ और आगे चलकर वे धार्मिक नेता, समाज सुधारक तथा एक संगठित राजनीतिक समुदाय के निर्माता के रूप में विकसित हुए। उन्होंने अरब समाज में व्याप्त जनजातीय संघर्ष, सामाजिक असमानता, कमजोर वर्गों के शोषण और नैतिक अव्यवस्था जैसी समस्याओं की आलोचना की तथा एकेश्वरवाद (तौहीद), न्याय, समानता और मानव कल्याण पर आधारित समाज की स्थापना का संदेश दिया।
मुहम्मद की शिक्षाएँ केवल धार्मिक विश्वासों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्होंने सामाजिक संबंधों, नैतिक आचरण और राजनीतिक संगठन को भी प्रभावित किया। मदीना में उन्होंने विभिन्न जनजातियों और समुदायों के बीच सहयोग, सुरक्षा और सह-अस्तित्व पर आधारित एक नई व्यवस्था विकसित की, जिसने प्रारंभिक इस्लामी समुदाय को संगठित स्वरूप प्रदान किया और जो आगे चलकर इस्लामी राज्य के विकास का आधार सिद्ध हुई।




