ताम्रपाषाण अथवा ताम्रकाल (Chalcolithic or Copper Age)

ताम्रपाषाण अथवा ताम्रकाल (Chalcolithic or Copper Age)

ताम्रपाषाण अथवा ताम्रकाल

ताम्रपाषाणकाल मानव सभ्यता के विकास का वह महत्त्वपूर्ण संक्रमणकाल था, जिसमें मनुष्य ने पहली बार पत्थर के साथ-साथ धातु, विशेषतः ताँबे का सुनियोजित उपयोग प्रारंभ किया। इसी कारण इसे ताम्रपाषाणकाल कहा जाता है, क्योंकि इस समय पत्थर के उपकरण पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे, बल्कि पत्थर और ताँबे दोनों का समानांतर प्रयोग होता था। आधुनिक पुरातत्त्व के अनुसार यह काल नवपाषाण और कांस्य युग के मध्य की कड़ी है। इस युग में कृषि, पशुपालन, ग्राम-जीवन, शिल्प, व्यापार तथा धातुकर्म के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई, जिसने आगे चलकर नगरीय सभ्यताओं के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।

विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में ताम्रपाषाणकाल का कालक्रम एक समान नहीं था। पश्चिमी एशिया, अनातोलिया और दक्षिण-पूर्वी यूरोप में इसका प्रारंभ लगभग पाँचवीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व से माना जाता है, जबकि भारतीय उपमहाद्वीप में इसका विकास मुख्यतः लगभग 3000 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के मध्य विभिन्न क्षेत्रीय संस्कृतियों के रूप में हुआ। इसलिए आधुनिक इतिहासकार ताम्रपाषाणकाल को किसी निश्चित तिथि के बजाय उसकी सांस्कृतिक विशेषताओं के आधार पर परिभाषित करते हैं।

ताँबे का आविष्कार और धातुकर्म का विकास

मानव इतिहास में ताँबे का उपयोग एक महान तकनीकी उपलब्धि थी। प्रारंभ में मनुष्य को प्राकृतिक अवस्था में मिलने वाले ताँबे के छोटे-छोटे टुकड़े प्राप्त हुए, जिन्हें ठोक-पीटकर सरल उपकरणों और आभूषणों का रूप दिया जाता था। धीरे-धीरे उसने यह अनुभव किया कि ताँबे के अयस्क को अग्नि में गर्म करने पर धातु प्राप्त की जा सकती है। यही धातुकर्म की शुरुआत थी।

अधिकांश पुरातात्त्विक प्रमाण अनातोलिया (वर्तमान तुर्की), ईरान तथा मेसोपोटामिया को ताँबे के प्रारंभिक उपयोग का प्रमुख क्षेत्र मानते हैं। अनातोलिया के चायोनू तथा चातालहोयूक जैसे स्थलों से ताँबे के प्रारंभिक उपयोग के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक सुमेर और उसके आसपास के क्षेत्रों में ताँबे के उपकरणों का व्यापक प्रयोग होने लगा था।

धातु गलाने, साँचे में ढालने तथा हथौड़े से आकार देने की तकनीकों ने मानव की उत्पादन क्षमता को अत्यधिक बढ़ा दिया। ताँबे से कुल्हाड़ियाँ, छुरियाँ, भाले, तीरों के अग्रभाग, छेनी, मछली पकड़ने के काँटे, सुइयाँ तथा विभिन्न प्रकार के आभूषण बनाए जाने लगे। यद्यपि ताँबा अपेक्षाकृत मुलायम धातु था, फिर भी यह पत्थर की तुलना में अधिक उपयोगी और टिकाऊ सिद्ध हुआ।

कृषि का विकास और उत्पादन में वृद्धि

ताम्रपाषाणकाल में कृषि तकनीक पहले की अपेक्षा अधिक विकसित हो गई। नवपाषाणकाल की कुदाल-आधारित कृषि के स्थान पर अब बैलों की सहायता से हल चलाने की परंपरा विकसित होने लगी। हल द्वारा भूमि की गहरी जुताई संभव हुई, जिससे अधिक क्षेत्र में खेती करना संभव हुआ और कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

इस काल में गेहूँ, जौ, बाजरा, दालें तथा अनेक स्थानीय फसलों की खेती की जाती थी। कुछ क्षेत्रों में सिंचाई के प्रारंभिक साधनों का भी विकास हुआ। खेतों की नियमित जुताई, बीज चयन तथा कृषि के अनुभव ने उत्पादन को अधिक स्थिर बनाया। कृषि उत्पादन में वृद्धि से अधिशेष उत्पन्न होने लगा। यही अधिशेष आगे चलकर व्यापार, शिल्प और नगरीकरण का आधार बना। अनाज के भंडारण के लिए बड़े पात्र तथा सामुदायिक भंडारगृह बनाए जाने लगे, जिससे खाद्य-सुरक्षा भी बढ़ी।

पशुपालन और मिश्रित अर्थव्यवस्था

ताम्रपाषाणकाल में कृषि और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक बन गए। गाय, बैल, भेड़, बकरी तथा सूअर जैसे पालतू पशुओं का पालन बड़े पैमाने पर किया जाने लगा। बैलों का उपयोग हल चलाने और परिवहन में किया जाता था, जबकि गाय, भेड़ और बकरियाँ दूध, मांस, ऊन तथा चमड़े के प्रमुख स्रोत थीं। मानव ने यह भी अनुभव किया कि पशुओं का गोबर भूमि की उर्वरता बढ़ाता है। परिणामस्वरूप कृषि और पशुपालन का सम्मिलित स्वरूप विकसित हुआ, जिसे आधुनिक इतिहासकार मिश्रित कृषि कहते हैं। इस व्यवस्था ने उत्पादन को अधिक स्थायी और सुरक्षित बनाया।

परिवहन और पहिए का विकास

ताम्रपाषाणकाल की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि परिवहन साधनों का विकास था। पहिए का उपयोग अब केवल कुम्हार के चाक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बैलगाड़ियों के निर्माण में भी होने लगा। बैलगाड़ियों द्वारा कृषि उत्पाद, पत्थर, लकड़ी तथा अन्य वस्तुओं का परिवहन सरल हो गया। मेसोपोटामिया से तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व की दो तथा चार पहियों वाली गाड़ियों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। परिवहन की सुविधा ने दूर-दूर तक व्यापारिक संपर्क स्थापित करने में सहायता की। नदी-घाटियों में लकड़ी तथा सरकंडों से बनी नौकाओं का उपयोग पहले से होता था, किंतु ताम्रपाषाणकाल में पालदार नौकाओं का विकास हुआ। मेसोपोटामिया के अल-उबैद तथा फारस की खाड़ी के क्षेत्रों से ऐसी नौकाओं के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। इन नौकाओं ने नदी और समुद्री व्यापार को नई गति प्रदान की।

मृद्भांड और शिल्पकला का विकास

ताम्रपाषाणकाल में कुम्हार-चाक अधिक परिष्कृत रूप में विकसित हुआ। इसके कारण पहले की अपेक्षा अधिक सुंदर, समान आकार तथा पतली दीवारों वाले मृद्भांड बनने लगे। अनेक पात्रों पर लाल, काले, भूरे तथा सफेद रंगों से चित्रकारी भी की जाती थी। मिट्टी के बर्तनों के अतिरिक्त पत्थर, हड्डी, सींग तथा ताँबे से भी अनेक उपयोगी वस्तुएँ बनाई जाती थीं। मनके, हार, कंगन, ताँबे के आभूषण तथा अर्द्ध-बहुमूल्य पत्थरों की मालाएँ इस काल की विकसित शिल्प परंपरा का प्रमाण हैं। इसी समय कताई-बुनाई का कार्य भी अधिक संगठित हुआ। तकली, करघा तथा धागा बनाने की तकनीकों का व्यापक उपयोग होने लगा। इससे वस्त्र निर्माण एक महत्त्वपूर्ण घरेलू उद्योग बन गया।

ग्राम-जीवन और सामाजिक संगठन

ताम्रपाषाणकाल में स्थायी ग्रामों का विकास अधिक व्यापक रूप से हुआ। गाँव सामान्यतः नदियों, जलस्रोतों और उपजाऊ भूमि के निकट बसाए जाते थे। घर मिट्टी, लकड़ी, बाँस तथा पत्थर से बनाए जाते थे। अनेक स्थानों पर आयताकार या गोलाकार मकान तथा अनाज भंडारण के लिए अलग संरचनाएँ भी मिली हैं।

ग्रामों में परिवार सामाजिक जीवन की मूल इकाई था। कृषि, पशुपालन तथा शिल्प कार्यों के कारण श्रम-विभाजन पहले की अपेक्षा अधिक स्पष्ट हो गया। कृषक, पशुपालक, कुम्हार, बढ़ई, धातुकार तथा अन्य शिल्पकार समाज में विशिष्ट भूमिका निभाने लगे। यद्यपि इस समय तक पूर्ण विकसित राज्य व्यवस्था का उदय नहीं हुआ था, फिर भी ग्राम स्तर पर नेतृत्व तथा सामुदायिक संगठन के संकेत मिलने लगते हैं।

व्यापार और विनिमय प्रणाली

उत्पादन में वृद्धि के साथ वस्तुओं का आदान-प्रदान भी बढ़ा। प्रारंभ में व्यापार विनिमय प्रणाली पर आधारित था, जिसमें अनाज, पशु, उपकरण, मिट्टी के बर्तन तथा आभूषणों का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता था। ताँबा, अर्द्ध-बहुमूल्य पत्थर, शंख, सीप तथा अन्य दुर्लभ वस्तुएँ दूरस्थ क्षेत्रों से लाई जाती थीं। इससे स्पष्ट होता है कि विभिन्न समुदायों के बीच व्यापारिक संपर्क स्थापित हो चुके थे। भारतीय ताम्रपाषाण संस्कृतियों में भी लंबी दूरी के व्यापार के प्रमाण मिलते हैं। राजस्थान के अहार क्षेत्र से प्राप्त ताँबा, गुजरात के समुद्री शंख तथा दक्कन के अर्द्ध-बहुमूल्य पत्थर इस व्यापक व्यापारिक नेटवर्क की पुष्टि करते हैं।

भारतीय ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ

भारतीय उपमहाद्वीप में ताम्रपाषाण संस्कृति अनेक क्षेत्रीय परंपराओं के रूप में विकसित हुई। प्रत्येक संस्कृति की अपनी विशिष्ट विशेषताएँ थीं, किंतु सभी में कृषि, पशुपालन, मृद्भांड, ताँबे के उपकरण तथा स्थायी ग्रामों की समान विशेषताएँ दिखाई देती हैं।

कायथा संस्कृति (मध्य प्रदेश) भारतीय ताम्रपाषाणकाल की प्रारंभिक संस्कृतियों में गिनी जाती है। यहाँ से ताँबे के उपकरण, चित्रित मृद्भांड तथा कृषि के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। अहार-बनास संस्कृति (राजस्थान) ताँबे के व्यापक उपयोग के लिए प्रसिद्ध थी। उदयपुर के निकट स्थित अहार से बड़ी मात्रा में ताँबे के उपकरण तथा विशिष्ट काले-और-लाल मृद्भांड प्राप्त हुए हैं। मालवा संस्कृति मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के अनेक क्षेत्रों में विकसित हुई। नवदाटोली, एरण तथा इनामगाँव जैसे स्थलों से विकसित कृषि, पशुपालन और नियोजित ग्राम-जीवन के प्रमाण मिले हैं। जोर्वे संस्कृति (महाराष्ट्र) ताम्रपाषाणकाल की सबसे विकसित संस्कृतियों में मानी जाती है। यहाँ से अनाज भंडारण, नियोजित मकान, ताँबे के उपकरण तथा विकसित कृषि व्यवस्था के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त सावलदा, प्रभास, गणेश्वर-जोधपुरा तथा ओचर रंगित मृद्भांड संस्कृति भी भारतीय ताम्रपाषाण परंपरा के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। राजस्थान के गणेश्वर-जोधपुरा क्षेत्र से बड़ी संख्या में ताँबे के उपकरण मिले हैं, जो इसे भारतीय उपमहाद्वीप का एक प्रमुख ताम्र धातुकर्म केंद्र सिद्ध करते हैं।

ताम्रपाषाणकालीन धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन

ताम्रपाषाणकालीन समाज में प्रकृति-पूजा, पूर्वज-पूजा तथा उर्वरता संबंधी विश्वासों का महत्त्व बना रहा। अनेक स्थलों से मातृदेवी की मिट्टी की प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं, जो कृषि, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं। मृतकों को दफनाने की परंपरा भी जारी रही। कई स्थानों पर शवों के साथ मिट्टी के बर्तन, आभूषण तथा दैनिक उपयोग की वस्तुएँ रखी गई हैं। इससे मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास तथा धार्मिक आस्थाओं का संकेत मिलता है। चित्रित मृद्भांडों पर ज्यामितीय आकृतियाँ, पशु-पक्षियों के चित्र तथा प्रतीकात्मक चिह्न अंकित किए जाते थे। इससे स्पष्ट होता है कि ताम्रपाषाणकालीन समाज में कलात्मक अभिरुचि भी निरंतर विकसित हो रही थी।

कांस्य युग

ताम्रपाषाणकाल के पश्चात मानव सभ्यता ने विकास के एक नए चरण में प्रवेश किया, जिसे कांस्य युग कहा जाता है। सामान्यतः इसका प्रारंभ विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में लगभग 3300 ईसा पूर्व से माना जाता है, यद्यपि विभिन्न सभ्यताओं में इसकी समय-सीमा भिन्न-भिन्न रही। इस युग की प्रमुख विशेषता ताँबे और टिन की मिश्रधातु कांस्य का व्यापक उपयोग था। प्रायः 8 से 12 प्रतिशत टिन को ताँबे में मिलाकर उच्च गुणवत्ता का कांस्य बनाया जाता था। यह धातु ताँबे की अपेक्षा अधिक कठोर, टिकाऊ तथा धारदार होती थी, जिससे उपकरणों और हथियारों की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

ताम्रपाषाण अथवा ताम्रकाल (Chalcolithic or Copper Age)
कांस्य युग

कांस्य के प्रयोग ने कृषि, शिल्प, निर्माण तथा युद्ध-कला में व्यापक परिवर्तन किए। कांस्य से निर्मित कुल्हाड़ियाँ, तलवारें, भाले, छेनी, हंसिए, चाकू तथा अन्य औजार अधिक मजबूत और टिकाऊ थे। इनके उपयोग से कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई, भवन निर्माण अधिक सुदृढ़ हुआ तथा धातु-शिल्प और अन्य उद्योगों का विकास हुआ। इस प्रकार कांस्य प्रौद्योगिकी ने आर्थिक उत्पादन और सामाजिक संगठन को नई गति प्रदान की।

व्यापार और आर्थिक विकास

कांस्य निर्माण के लिए आवश्यक टिन अधिकांश क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं था, इसलिए इसका दूर-दराज़ के क्षेत्रों से आयात किया जाता था। मध्य एशिया, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान तथा अनातोलिया (एशिया माइनर) के खनिज क्षेत्रों से टिन और अन्य धातुएँ मेसोपोटामिया, मिस्र तथा सिंधु घाटी जैसी सभ्यताओं तक पहुँचाई जाती थीं। इससे अंतर-क्षेत्रीय व्यापार मार्गों का विकास हुआ और विभिन्न सभ्यताओं के बीच आर्थिक एवं सांस्कृतिक संपर्क सुदृढ़ हुए। व्यापार के विस्तार ने विनिमय प्रणाली, परिवहन, लेखा-जोखा तथा कर-व्यवस्था को भी अधिक संगठित बनाया।

नगरीय सभ्यताओं का विकास

कांस्य युग की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि विश्व की प्रारम्भिक महान नगरीय सभ्यताओं का उदय था। मेसोपोटामिया की दजला-फरात घाटी, मिस्र की नील घाटी, सिंधु घाटी तथा चीन की ह्वांगहो घाटी में सुव्यवस्थित नगरों का विकास हुआ। इन नगरों में नियोजित सड़कें, विशाल भवन, मंदिर, प्रशासनिक केंद्र, शिल्प कार्यशालाएँ, भंडारगृह तथा उन्नत जल-प्रबंधन प्रणाली विकसित हुई। कृषि अधिशेष के कारण बड़ी जनसंख्या का पालन-पोषण संभव हुआ और समाज में श्रम-विभाजन तथा व्यवसायों का विशेषीकरण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। इसी काल में लेखन-पद्धति, गणित, पंचांग, खगोल-विज्ञान तथा संगठित प्रशासन का विकास हुआ। राज्य व्यवस्था अधिक सुदृढ़ हुई और शासकों द्वारा कर-संग्रह, न्याय तथा सार्वजनिक कार्यों का संचालन व्यवस्थित रूप से किया जाने लगा। मंदिर और राजमहल राजनीतिक तथा धार्मिक जीवन के प्रमुख केंद्र बन गए।

इस प्रकार ताम्रपाषाणकाल और उसके पश्चात विकसित कांस्य युग ने मानव समाज को तकनीकी, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से अभूतपूर्व प्रगति प्रदान की। यह युग प्रागैतिहासिक जीवन से विकसित नगरीय सभ्यताओं और ऐतिहासिक युग की ओर संक्रमण का एक निर्णायक चरण सिद्ध हुआ।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Scroll to Top