व्यापारिक क्रांति
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ तक यूरोप के अधिकांश देश अपने-अपने क्षेत्रीय हितों तक सीमित थे। उस समय विश्व-एकता अथवा वैश्विक अर्थव्यवस्था जैसी कोई स्पष्ट अवधारणा विकसित नहीं हुई थी। मध्ययुगीन आर्थिक व्यवस्था मुख्यतः स्थानीय उत्पादन, सीमित व्यापार तथा पारंपरिक व्यापारिक मार्गों पर आधारित थी। किंतु पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में नौवहन कला, मानचित्र निर्माण, जहाज निर्माण तथा समुद्री कंपास जैसे आविष्कारों एवं तकनीकी प्रगति ने दूरस्थ देशों तक पहुँच को संभव बना दिया। परिणामस्वरूप यूरोपीय देशों ने नए समुद्री व्यापारिक मार्गों की खोज प्रारंभ की। यद्यपि इन भौगोलिक खोजों के पीछे आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक कारण समान रूप से उत्तरदायी थे, तथापि नए व्यापारिक मार्गों की खोज ने यूरोप की आर्थिक संरचना में व्यापक परिवर्तन उत्पन्न किए। इन परिवर्तनों ने व्यापार, उद्योग, बैंकिंग, पूँजी निवेश तथा उपनिवेशवाद को नई दिशा प्रदान की। इतिहास में इसी व्यापक आर्थिक परिवर्तन को व्यापारिक क्रांति कहा जाता है।
व्यापारिक क्रांति से पूर्व की आर्थिक स्थिति
व्यापारिक क्रांति से पूर्व यूरोप की आर्थिक व्यवस्था का आधार गिल्ड नामक व्यापारिक एवं शिल्पकार संस्थाएँ थीं। ये संस्थाएँ उत्पादन, मूल्य निर्धारण, गुणवत्ता नियंत्रण तथा व्यापारिक गतिविधियों का संचालन करती थीं। प्रत्येक व्यवसाय की अपनी पृथक गिल्ड होती थी, जिसके सदस्य सीमित क्षेत्र में ही कार्य करते थे। गिल्ड व्यवस्था ने प्रारंभिक काल में आर्थिक स्थिरता प्रदान की, किंतु समय के साथ यह रूढ़िवादी तथा परिवर्तन-विरोधी बन गई। उत्पादन सीमित था, प्रतिस्पर्धा का अभाव था और नवीन तकनीकों को अपनाने में भी गिल्डों की अनिच्छा स्पष्ट दिखाई देती थी। परिणामस्वरूप इन संस्थाओं की कार्यक्षमता घटने लगी और वे धीरे-धीरे पतनोन्मुख हो गईं।
पूर्वी व्यापार और इटली का प्रभुत्व
मध्ययुग में यूरोप तथा पूर्वी देशों के मध्य व्यापार का संचालन मुख्यतः इटली के नगर-राज्यों—वेनिस, जेनोआ (जेनेवा नहीं) और पीसा के माध्यम से होता था। पूर्व से आने वाले बहुमूल्य मसाले, रेशम, सुगंधित पदार्थ, औषधियाँ, चीनी, बहुमूल्य रत्न तथा विलासिता की वस्तुएँ इन्हीं नगरों के माध्यम से यूरोप के अन्य देशों तक पहुँचती थीं। इस व्यापार के कारण इटली यूरोप का सबसे समृद्ध व्यापारिक क्षेत्र बन गया। विशेष रूप से धर्मयुद्धों के पश्चात् वेनिस ने भूमध्यसागरीय व्यापार पर लगभग एकाधिकार स्थापित कर लिया था, जिससे उसकी आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
कुस्तुंतुनिया का महत्त्व
महान् भौगोलिक खोजों से पूर्व यूरोप और एशिया के मध्य व्यापार का प्रमुख केंद्र कुस्तुंतुनिया (कॉन्स्टेंटिनोपल) था। भारत, चीन तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया से वस्तुएँ समुद्री मार्ग द्वारा फारस की खाड़ी तक लाई जाती थीं। वहाँ से वे स्थल मार्ग द्वारा कुस्तुंतुनिया पहुँचती थीं और फिर यूरोप के विभिन्न देशों में वितरित की जाती थीं। इसी अवधि में फ्रांस, इंग्लैंड तथा इटली के व्यापारियों का उत्तरी अफ्रीका के अरब व्यापारियों से भी व्यापारिक सम्पर्क स्थापित हो गया था। किंतु 1453 ई. में ऑटोमन तुर्कों द्वारा कुस्तुंतुनिया पर अधिकार कर लेने के बाद यह पारंपरिक व्यापारिक मार्ग बाधित हो गया। तुर्कों द्वारा लगाए गए करों तथा राजनीतिक अस्थिरता के कारण यूरोप के व्यापारियों को अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। परिणामस्वरूप उन्होंने भारत एवं पूर्वी देशों तक पहुँचने के लिए नए समुद्री मार्गों की खोज का अभियान प्रारंभ किया, जिसने आगे चलकर व्यापारिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया।
व्यापारिक क्रांति और आर्थिक परिवर्तन
भौगोलिक खोजों का सबसे व्यापक प्रभाव यूरोप की आर्थिक व्यवस्था पर पड़ा। नए समुद्री मार्गों के खुलने से भूमध्यसागरीय व्यापार का महत्त्व घटने लगा और अटलांटिक महासागर व्यापार का प्रमुख केंद्र बन गया। वेनिस तथा अन्य इटालवी नगरों का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त होने लगा। भारत के समुद्री मार्ग की खोज के बाद पूर्वी व्यापार पर पुर्तगाल का प्रभाव बढ़ा, जबकि अमेरिका की खोज के परिणामस्वरूप स्पेन ने अटलांटिक व्यापार में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। व्यापार की मात्रा में तीव्र वृद्धि हुई तथा यूरोप के विभिन्न देशों में आर्थिक गतिविधियाँ अभूतपूर्व रूप से विस्तृत हो गईं।
पूँजीवाद और संयुक्त स्टॉक कंपनियों का विकास
व्यापारिक क्रांति ने पूँजी संचय की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान की। दूरस्थ व्यापार में अधिक पूँजी की आवश्यकता के कारण व्यक्तिगत व्यापार की अपेक्षा सामूहिक निवेश की प्रवृत्ति विकसित हुई। परिणामस्वरूप संयुक्त स्टॉक कंपनियों का उदय हुआ, जिनमें अनेक निवेशक मिलकर व्यापार में पूँजी लगाते थे और लाभ-हानि में सहभागी बनते थे। इसी काल में आधुनिक बैंकिंग प्रणाली का भी विकास हुआ। बैंकों ने व्यापारियों को ऋण, विनिमय-पत्र तथा अन्य वित्तीय सुविधाएँ उपलब्ध कराईं, जिससे व्यापार अधिक संगठित और सुरक्षित बन गया। इस प्रकार व्यापारिक क्रांति ने आधुनिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की आधारशिला रखी।
वाणिज्यवाद, उपनिवेशवाद और मध्यम वर्ग का उदय
व्यापारिक क्रांति के साथ ही यूरोप में वाणिज्यवाद की नीति का विकास हुआ। इस नीति के अनुसार किसी राष्ट्र की समृद्धि का आधार बहुमूल्य धातुओं का संचय, निर्यात में वृद्धि तथा आयात में कमी माना गया। इसलिए यूरोपीय राज्यों ने व्यापार को प्रोत्साहित करने, उद्योगों के विकास तथा विदेशी उपनिवेशों की स्थापना के लिए अनेक कानून बनाए। उपनिवेशों को कच्चे माल के स्रोत तथा तैयार माल के बाजार के रूप में विकसित किया गया। यही नीति आगे चलकर साम्राज्यवाद का आधार बनी।
इस आर्थिक परिवर्तन का सामाजिक प्रभाव भी अत्यन्त व्यापक था। सामंती व्यवस्था का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा और नगरों में व्यापारी, उद्योगपति तथा बैंकरों का एक नया मध्यम वर्ग विकसित हुआ। इस वर्ग ने आर्थिक शक्ति के साथ-साथ राजनीतिक प्रभाव भी प्राप्त किया। इतिहासकार कोल के अनुसार यह नवोदित मध्यम वर्ग स्वयं को अभिजात वर्ग तथा सामान्य जनता दोनों से पृथक मानता था और अपने आर्थिक एवं राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए संगठित रूप से कार्य करता था। इस वर्ग ने आधुनिक पूँजीवादी समाज और राष्ट्र-राज्य के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
व्यापारिक क्रांति का व्यापक आर्थिक प्रभाव
व्यापारिक क्रांति के परिणामस्वरूप यूरोप में कृषि, उद्योग और व्यापार तीनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बाजार से सम्बन्ध मजबूत हुआ तथा व्यावसायिक कृषि को प्रोत्साहन मिला। उद्योगों में उत्पादन का विस्तार हुआ और शहरीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई। व्यापारिक नगरों का विकास हुआ, परिवहन एवं संचार के साधनों में सुधार आया तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार का स्वरूप अधिक संगठित और व्यापक बन गया। इस प्रकार व्यापारिक क्रांति ने मध्ययुगीन सीमित अर्थव्यवस्था का स्थान लेकर आधुनिक वैश्विक व्यापार, पूँजीवाद और औद्योगिक विकास की दिशा में यूरोप को अग्रसर किया।
वाणिज्यवाद का अभिप्राय
वाणिज्यवाद आधुनिक यूरोपीय आर्थिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक विचारधारा एवं राजकीय नीति थी, जिसका विकास मुख्यतः सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी के मध्य हुआ। इसका मूल उद्देश्य राज्य की आर्थिक शक्ति को सुदृढ़ बनाना तथा सोना-चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुओं का अधिकाधिक संचय करना था। वाणिज्यवाद के अनुसार किसी राष्ट्र की समृद्धि का माप उसके पास उपलब्ध बहुमूल्य धातुओं के भंडार से किया जाता था। इसलिए प्रत्येक राज्य ऐसी आर्थिक नीतियाँ अपनाता था जिनसे निर्यात अधिक और आयात कम हो, ताकि विदेशी व्यापार से सोना एवं चाँदी देश में आती रहे।
वाणिज्यवाद केवल एक आर्थिक सिद्धांत नहीं था, बल्कि यह राज्य, व्यापार, उद्योग तथा उपनिवेशों के परस्पर संबंधों पर आधारित व्यापक आर्थिक नीति थी। इस नीति के अंतर्गत सरकार व्यापार एवं उद्योग पर नियंत्रण रखती थी, देशी उद्योगों को संरक्षण देती थी, विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित करती थी तथा उपनिवेशों का उपयोग कच्चे माल के स्रोत और तैयार माल के बाजार के रूप में करती थी। इस प्रकार वाणिज्यवाद ने आधुनिक राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वाणिज्यवाद की परिभाषाएँ
वाणिज्यवाद की अवधारणा को विभिन्न इतिहासकारों एवं अर्थशास्त्रियों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से स्पष्ट किया है। इतिहासकार हेने के अनुसार वाणिज्यवाद वह आर्थिक विचारधारा थी, जो सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी के मध्य यूरोप के अधिकांश राजनीतिज्ञों तथा शासकों की प्रिय नीति रही। अर्थशास्त्री अलेक्जेंडर ग्रे ने इसके विकास का प्रारंभ पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से माना है, जबकि कुछ विद्वानों ने इसकी उत्पत्ति सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में स्वीकार की है। इतिहासकार हेज़ के अनुसार ‘वाणिज्यवाद एक आधुनिक शब्द है, जो सरकार की उस आर्थिक नीति का प्रतिनिधित्व करता है जिसके अंतर्गत व्यापार एवं वाणिज्य को राज्य के हित में नियंत्रित एवं नियमित किया जाता है।’
फ्रांस में इस नीति को कोलबर्टवाद, जर्मनी में कैमरालिज्म तथा इंग्लैंड में व्यापारवाद अथवा वणिकवाद के नाम से जाना जाता था। यद्यपि इन सभी रूपों में कुछ स्थानीय भिन्नताएँ थीं, फिर भी उनका मूल उद्देश्य राज्य की आर्थिक शक्ति में वृद्धि करना ही था।
वाणिज्यवाद की मूल अवधारणा
वाणिज्यवादियों का विश्वास था कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके पास संचित सोने एवं चाँदी पर निर्भर करती है। उस समय अंतरराष्ट्रीय व्यापार का भुगतान प्रायः बहुमूल्य धातुओं द्वारा किया जाता था। इसलिए प्रत्येक राष्ट्र यह प्रयास करता था कि उसके निर्यात का मूल्य आयात से अधिक रहे। इस नीति को अनुकूल व्यापार संतुलन कहा जाता है। यदि निर्यात अधिक होगा तो विदेशी देशों से सोना-चाँदी प्राप्त होगी और राष्ट्र अधिक समृद्ध तथा शक्तिशाली बनेगा। इसी उद्देश्य से सरकारें आयात पर नियंत्रण लगाती थीं, निर्यात को प्रोत्साहित करती थीं तथा घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान करती थीं।
वाणिज्यवाद के उदय के कारण
पुनर्जागरण का प्रभाव
वाणिज्यवाद के उदय में पुनर्जागरण का अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान था। पुनर्जागरण ने यूरोप में बौद्धिक, सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक चेतना का संचार किया। मध्ययुग में जीवन का केंद्र धर्म एवं आध्यात्मिकता थी, जबकि पुनर्जागरण ने मनुष्य को तर्क, विवेक तथा भौतिक जीवन की ओर प्रेरित किया। व्यक्तिवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा नवीन ज्ञान की भावना के कारण लोगों की आर्थिक आवश्यकताएँ बढ़ीं और व्यापार एवं उद्योग को नई दिशा मिली।
पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप लोगों में धन अर्जित करने, नए व्यापारिक अवसरों की खोज करने तथा आर्थिक उन्नति प्राप्त करने की प्रवृत्ति विकसित हुई। भौतिक समृद्धि को सम्मानजनक माना जाने लगा। इस प्रकार पुनर्जागरण ने आर्थिक गतिविधियों के विस्तार तथा वाणिज्यवाद के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया।
धर्म-सुधार आंदोलन का प्रभाव
धर्म-सुधार आंदोलन ने भी वाणिज्यवाद के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मध्ययुगीन कैथोलिक चर्च धन-संचय, ब्याज तथा अत्यधिक व्यापारिक लाभ को संदेह की दृष्टि से देखता था। परंतु चर्च में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं पोप की निरंकुशता के विरुद्ध जब प्रोटेस्टेंट आंदोलन प्रारंभ हुआ, तब आर्थिक दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आया।
विशेषकर जॉन कैल्विन के विचारों ने परिश्रम, मितव्ययिता, अनुशासन, समय के सदुपयोग तथा वैध लाभार्जन को नैतिक मान्यता प्रदान की। ब्याज पर धन देना भी धीरे-धीरे स्वीकार्य हो गया। परिणामस्वरूप पूँजी संचय को प्रोत्साहन मिला तथा व्यापार एवं उद्योग के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार धर्म-सुधार आंदोलन ने पूँजीवाद एवं वाणिज्यवाद दोनों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
आर्थिक परिस्थितियों में परिवर्तन
वाणिज्यवाद के उदय का एक प्रमुख कारण यूरोप की बदलती आर्थिक परिस्थितियाँ थीं। पंद्रहवीं एवं सोलहवीं शताब्दी में महान भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप नए समुद्री मार्गों का उद्घाटन हुआ। भारत, चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा अमेरिका के साथ यूरोप का व्यापार तेजी से बढ़ा। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विस्तार से वस्तुओं की माँग में वृद्धि हुई तथा बड़े पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी।
इसी काल में मुद्रा-प्रणाली का व्यापक विकास हुआ। वस्तु-विनिमय प्रणाली का स्थान धीरे-धीरे मुद्रा आधारित अर्थव्यवस्था ने ले लिया। बैंकों की स्थापना हुई, ऋण व्यवस्था विकसित हुई तथा विनिमय-पत्रों का प्रयोग बढ़ा। अमेरिका से प्राप्त विशाल मात्रा में सोना एवं चाँदी यूरोप पहुँचा, जिससे व्यापार और पूँजी निवेश को नई गति मिली। इन परिवर्तनों ने वाणिज्यवाद की आर्थिक आधारभूमि तैयार की।
राजनीतिक परिस्थितियाँ
वाणिज्यवाद के उदय में राजनीतिक परिवर्तनों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। मध्ययुग में यूरोप की राजनीति पर पोप एवं चर्च का व्यापक प्रभाव था। अनेक राज्यों में धार्मिक तथा राजनीतिक सत्ता के बीच संघर्ष की स्थिति बनी रहती थी। किंतु आधुनिक युग के आरंभ में शक्तिशाली राष्ट्रीय राज्यों तथा निरंकुश राजतंत्रों का उदय हुआ। अब राजा स्वयं को राज्य का सर्वोच्च अधिकारी मानने लगे।
इटली के प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक निकोलो मैकियावेली ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘दि प्रिंस’ में राज्य की सर्वोच्चता तथा शक्तिशाली शासन का समर्थन किया। उनके अनुसार राज्य के हित सर्वोपरि हैं और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए शासक को आवश्यक सभी उपाय अपनाने चाहिए। इस विचारधारा ने राजाओं को आर्थिक मामलों में सक्रिय हस्तक्षेप करने तथा व्यापार को राष्ट्रीय शक्ति का आधार मानने के लिए प्रेरित किया।
राष्ट्रीय राज्यों की आर्थिक आवश्यकताएँ
निरंकुश राजाओं को विशाल प्रशासन, स्थायी सेना तथा आधुनिक नौसेना के संचालन के लिए पर्याप्त राजस्व की आवश्यकता थी। सामंती कृषि व्यवस्था से इतनी आय प्राप्त नहीं हो सकती थी कि राज्य की बढ़ती आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। इसलिए शासकों ने व्यापार एवं उद्योग को राजस्व प्राप्ति का प्रमुख साधन बनाया।
राजाओं ने देशी उद्योगों को संरक्षण दिया, विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित किया, बंदरगाहों का विकास कराया तथा जहाज निर्माण को बढ़ावा दिया। साथ ही उन्होंने उपनिवेशों की स्थापना को भी प्रोत्साहित किया, जिससे कच्चा माल सस्ते मूल्य पर प्राप्त हो तथा तैयार माल के लिए सुनिश्चित बाजार उपलब्ध हो सके। इस प्रकार राज्य की आर्थिक आवश्यकताओं ने वाणिज्यवाद को सरकारी नीति का रूप प्रदान किया।
भौगोलिक खोजों का प्रभाव
भौगोलिक खोजों ने वाणिज्यवाद के विकास को निर्णायक गति प्रदान की। क्रिस्टोफर कोलंबस द्वारा 12 अक्टूबर 1492 ईस्वी को अमेरिका महाद्वीप की खोज और 1498 ईस्वी में वास्को द गामा द्वारा भारत के समुद्री मार्ग की खोज तथा पुर्तगाली नाविक वास्को द गामा ने 20 मई 1498 ईस्वी को केरल के कालीकट (कोझिकोड) बंदरगाह पर पहुँचकर यूरोप से भारत तक के नए समुद्री मार्ग की खोज के बाद यूरोप के व्यापार का स्वरूप पूर्णतः बदल गया। पुर्तगाल, स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस तथा नीदरलैंड ने एशिया, अफ्रीका एवं अमेरिका में अपने व्यापारिक केंद्र तथा उपनिवेश स्थापित किए।
इन उपनिवेशों से मसाले, कपास, चीनी, तम्बाकू, कॉफी, चाय तथा बहुमूल्य धातुएँ यूरोप लाई जाने लगीं। इसके बदले यूरोप के निर्मित वस्त्र, धातु उत्पाद तथा अन्य औद्योगिक वस्तुएँ उपनिवेशों में भेजी जाती थीं। इस व्यापार से यूरोपीय देशों की आय में अभूतपूर्व वृद्धि हुई तथा वाणिज्यवाद को व्यावहारिक सफलता प्राप्त हुई।
व्यापारिक क्रांति और पूँजीवाद का विकास
व्यापारिक क्रांति तथा वाणिज्यवाद ने मिलकर आधुनिक पूँजीवाद की नींव रखी। बड़े पैमाने पर व्यापार के संचालन के लिए संयुक्त स्टॉक कंपनियों की स्थापना हुई, जिनमें अनेक निवेशक मिलकर पूँजी लगाते थे। इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी (31 दिसंबर 1600 ईस्वी), डच ईस्ट इंडिया कंपनी (20 मार्च 1602 ईस्वी) तथा फ्रांसीसी व्यापारिक कंपनियाँ (1664 ईस्वी) इसी नीति की उपज थीं। बैंकिंग प्रणाली, बीमा व्यवस्था तथा आधुनिक वित्तीय संस्थाओं का भी इसी काल में विकास हुआ।
इस आर्थिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप व्यापारी, उद्योगपति तथा बैंकरों का एक शक्तिशाली मध्यम वर्ग विकसित हुआ, जिसने यूरोप की आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया। इस प्रकार वाणिज्यवाद केवल व्यापारिक नीति न होकर आधुनिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय राज्यों तथा यूरोपीय साम्राज्यवाद के विकास का आधार सिद्ध हुआ।
प्रमुख वाणिज्यवादी विचारक
सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक का काल यूरोपीय आर्थिक इतिहास में वाणिज्यवाद का युग माना जाता है। इस अवधि में अनेक अर्थशास्त्रियों, व्यापारियों तथा राजनेताओं ने ऐसी आर्थिक नीतियों का प्रतिपादन किया, जिनका उद्देश्य राज्य की आर्थिक शक्ति को सुदृढ़ बनाना तथा विदेशी व्यापार के माध्यम से सोना एवं चाँदी का अधिकाधिक संचय करना था। यद्यपि इन विचारकों के दृष्टिकोण में कुछ भिन्नताएँ थीं, तथापि सभी इस बात से सहमत थे कि राष्ट्र की समृद्धि का आधार सुदृढ़ व्यापार, विकसित उद्योग तथा सक्रिय सरकारी हस्तक्षेप है। सर थॉमस मुन, एंटोनियो सेरा, जीन-बैप्टिस्ट कोलबर्ट तथा सर विलियम पेटी इस विचारधारा के प्रमुख प्रतिनिधि थे।
सर थॉमस मुन (1571–1641 ई.)
सर थॉमस मुन इंग्लैंड के प्रसिद्ध व्यापारी, अर्थचिंतक तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक थे। उनका जन्म 1571 ई. में हुआ तथा 1641 ई. में उनका निधन हुआ। वे अंग्रेज़ी वाणिज्यवाद के सर्वाधिक प्रभावशाली विचारक माने जाते हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘इंग्लैंड्स ट्रेज़र बाय फ़ॉरेन ट्रेड’ (विदेशी व्यापार द्वारा इंग्लैंड की समृद्धि) उनकी मृत्यु के बाद 1664 ई. में प्रकाशित हुई। यह ग्रंथ अंग्रेज़ी वाणिज्यवाद का सर्वाधिक प्रामाणिक प्रतिपादन माना जाता है और इसे वाणिज्यवाद की ‘गीता’ भी कहा जाता है।
थॉमस मुन का मूल सिद्धांत था कि किसी राष्ट्र की समृद्धि विदेशी व्यापार पर निर्भर करती है। उनके अनुसार यदि कोई देश अपने आयात की अपेक्षा अधिक निर्यात करता है, तो व्यापार संतुलन उसके पक्ष में रहेगा और विदेशी देशों से सोना-चाँदी उसके पास आएगा। इसलिए उन्होंने अनुकूल व्यापार संतुलन को राष्ट्रीय समृद्धि का आधार माना। उन्होंने विलासिता की विदेशी वस्तुओं के आयात को सीमित करने तथा देशी उद्योगों को प्रोत्साहित करने का समर्थन किया। साथ ही उन्होंने आयातित वस्तुओं पर उचित सीमा तक कर लगाने की वकालत की, जिससे देशी उत्पादन को संरक्षण मिल सके। यद्यपि वे बहुमूल्य धातुओं के संचय के समर्थक थे, किंतु उन्होंने व्यापार के लिए आवश्यक सीमा तक मुद्रा के विदेश जाने का विरोध नहीं किया। उनके अनुसार यदि विदेशी व्यापार से अधिक लाभ प्राप्त होता है, तो मुद्रा का सीमित निर्यात भी राष्ट्रहित में हो सकता है।
एंटोनियो सेरा (लगभग 1580–1650 ई.)
एंटोनियो सेरा इटली के प्रमुख वाणिज्यवादी अर्थशास्त्री थे। उनका जन्म लगभग 1580 ई. में कैलाब्रिया के कोसेंजा शहर में हुआ था, जो उस समय नेपल्स साम्राज्य का हिस्सा था। उनकी 1613 ई. में प्रकाशित प्रसिद्ध कृति ‘ए शॉर्ट ट्रीटाइज़ ऑन द वेल्थ एंड पॉवर्टी ऑफ नेशन्स’ (राष्ट्रों की समृद्धि और गरीबी पर एक संक्षिप्त विवेचन) वाणिज्यवाद के प्रारंभिक एवं महत्त्वपूर्ण कृतियों में गिनी जाती है।
सेरा का मत था कि किसी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति केवल कृषि पर आधारित नहीं हो सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि कृषि उत्पादन प्राकृतिक परिस्थितियों, विशेषकर वर्षा एवं मौसम पर निर्भर करता है, इसलिए उसमें लाभ की निश्चितता नहीं होती। इसके विपरीत उद्योग एवं हस्तशिल्प उत्पादन में निरन्तर वृद्धि की संभावना रहती है। अतः उन्होंने उद्योगों के विकास, शिल्प उत्पादन के विस्तार तथा विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया। सेरा ने यह भी प्रतिपादित किया कि यदि किसी देश में विकसित उद्योग, कुशल श्रमिक तथा सक्रिय व्यापारिक व्यवस्था हो, तो वह बिना स्वर्ण एवं रजत की खानों के भी समृद्ध बन सकता है। इस प्रकार उन्होंने औद्योगिक विकास को राष्ट्रीय समृद्धि का महत्त्वपूर्ण आधार माना।
जीन-बैप्टिस्ट कोलबर्ट (1619–1683 ई.)
जीन-बैप्टिस्ट कोलबर्ट फ्रांस के राजा लुई चौदहवें के वित्त मंत्री और नौसेना सचिव थे। उनका जन्म 29 अगस्त 1619 को फ्रांस रीम्स में एक कपड़ा व्यापारी के परिवार में हुआ था। कोलबर्ट व्यापारवाद के प्रबल समर्थक थे और फ्रांस में वाणिज्यवाद के सबसे प्रभावशाली प्रवर्तक माने जाते हैं। उनके आर्थिक नियंत्रण के सिद्धांत को ‘कोलबर्टवाद’ कहा जाता है, जिसका उद्देश्य देश के निर्यात को बढ़ाना और आयात को कम करना था।
कोलबर्ट का विश्वास था कि किसी राष्ट्र की आर्थिक उन्नति के लिए सरकार की सक्रिय भूमिका आवश्यक है। उन्होंने सड़कों, नहरों, बंदरगाहों तथा परिवहन के साधनों के विकास पर विशेष बल दिया, जिससे आंतरिक एवं बाह्य व्यापार को सुविधा मिल सके। उन्होंने देशी उद्योगों को राजकीय संरक्षण प्रदान किया तथा उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों के निर्माण को प्रोत्साहित किया। विदेशी विलासिता की वस्तुओं के आयात पर नियंत्रण लगाया गया तथा देशी निर्मित वस्तुओं के निर्यात को बढ़ावा दिया गया।
कोलबर्ट ने व्यापारिक कंपनियों की स्थापना, जहाज निर्माण, शक्तिशाली नौसेना के विकास तथा विदेशी उपनिवेशों के विस्तार को भी राष्ट्रीय समृद्धि के लिए आवश्यक माना। उन्होंने गिल्डों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित किया तथा औद्योगिक उत्पादन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए अनेक नियम बनाए। उनके प्रयासों से फ्रांस की वित्तीय व्यवस्था अधिक संगठित हुई तथा उद्योग एवं व्यापार को नई गति मिली। इसलिए उन्हें यूरोपीय वाणिज्यवाद का सर्वाधिक सफल व्यावहारिक प्रवर्तक माना जाता है।
सर विलियम पेटी (1623–1687 ई.)
सर विलियम पेटी इंग्लैंड के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, चिकित्सक, वैज्ञानिक तथा सांख्यिकीविद् थे। उनका जन्म इंग्लैंड के रोम्सी नगर में हुआ था। उनके पिता और दादा कपड़े के व्यवसाय से जुड़े हुए थे। पेटी को आधुनिक आर्थिक सांख्यिकी का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने आर्थिक समस्याओं के अध्ययन में पहली बार व्यवस्थित रूप से सांख्यिकीय तथ्यों एवं गणनाओं का उपयोग किया। इसी कारण उन्हें राजनीतिक अंकगणित का प्रवर्तक भी कहा जाता है।
पेटी का मत था कि आर्थिक नीतियों का निर्माण केवल अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक आँकड़ों एवं तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रीय आय, जनसंख्या, श्रम तथा उत्पादन का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया। यद्यपि वे वाणिज्यवाद के समर्थक थे, फिर भी उन्होंने आर्थिक निर्णयों में व्यावहारिकता तथा वैज्ञानिक पद्धति को अधिक महत्त्व दिया। उनके विचारों ने आगे चलकर आधुनिक अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी के विकास को महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान किया।
अन्य प्रमुख वाणिज्यवादी विचारक
वाणिज्यवाद के विकास में अनेक विद्वानों और नीति-निर्माताओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। इंग्लैंड के प्रसिद्ध दार्शनिक, राजनीतिक विचारक एवं अर्थशास्त्री जॉन लॉक (1632–1704 ई.) ने मुद्रा, ब्याज तथा माँग–पूर्ति के सिद्धांतों पर उल्लेखनीय विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने मुद्रा की मात्रा और उसके मूल्य के संबंध को स्पष्ट करते हुए आगे चलकर विकसित हुए मुद्रा के परिमाण सिद्धांत की वैचारिक आधारभूमि तैयार की।
सर जोशिया चाइल्ड (1630–1699 ई.), जो अंग्रेज़ व्यापारी, अर्थशास्त्री तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर थे, व्यापारवाद के प्रमुख समर्थक थे। उन्होंने व्यापार और उद्योग के विस्तार के लिए निम्न ब्याज दरों का समर्थन किया। उनके अनुसार सस्ती पूँजी की उपलब्धता से व्यापार, उद्योग तथा राष्ट्रीय समृद्धि को प्रोत्साहन मिलता है। वे नौवहन और समुद्री व्यापार के विकास को भी राष्ट्रीय शक्ति का आधार मानते थे।
जर्मनी के प्रमुख कैमरालिस्ट विचारक जोहान जोआखिम बेखर (1635–1682 ई.) ने औद्योगिक विकास, सरकारी संरक्षण तथा गिल्ड व्यवस्था में सुधार पर बल दिया। उन्होंने सट्टेबाजी और अनुत्पादक आर्थिक गतिविधियों का विरोध करते हुए उत्पादक उद्योगों को राष्ट्रीय समृद्धि का आधार माना।
रिचर्ड कैंटिलन (लगभग 1680–1734 ई.) आयरिश-फ्रांसीसी अर्थशास्त्री एवं वाणिज्यिक चिंतक थे। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘एस्से ऑन द नेचर ऑफ ट्रेड इन जनरल’ (व्यापार की प्रकृति पर निबंध) आधुनिक अर्थशास्त्र की आधारभूत कृतियों में गिनी जाती है। कैंटिलन ने उत्पादन, व्यापार और उद्यमिता के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कच्चे माल के प्रभावी उपयोग, विनिर्माण उद्योगों के विकास तथा तैयार माल के निर्यात को राष्ट्रीय आय और आर्थिक समृद्धि का प्रमुख आधार बताया। उनके विचारों ने आधुनिक आर्थिक सिद्धांतों के विकास को दिशा प्रदान की।
वाणिज्यवादी विचारकों की समान मान्यताएँ
यद्यपि वाणिज्यवादी विचारकों के विचारों में कुछ व्यावहारिक भिन्नताएँ थीं, तथापि उनके मूल आर्थिक सिद्धांत लगभग समान थे। सभी विचारकों का विश्वास था कि राज्य को व्यापार एवं उद्योग में सक्रिय हस्तक्षेप करना चाहिए। वे निर्यात को प्रोत्साहित करने, आयात को नियंत्रित करने, देशी उद्योगों को संरक्षण देने, जहाज निर्माण को बढ़ावा देने तथा विदेशी उपनिवेशों की स्थापना के पक्षधर थे। उनका उद्देश्य अनुकूल व्यापार संतुलन बनाए रखना तथा बहुमूल्य धातुओं का अधिकाधिक संचय करना था। इसके साथ ही उन्होंने संगठित बैंकिंग व्यवस्था, व्यापारिक कंपनियों की स्थापना, औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि तथा राष्ट्रीय आर्थिक शक्ति के विस्तार को भी आवश्यक माना। इन विचारों ने न केवल सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी की आर्थिक नीतियों को प्रभावित किया, बल्कि आधुनिक पूँजीवाद, औद्योगिक विकास तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के निर्माण की नींव भी रखी।
वाणिज्यवादियों के प्रमुख आर्थिक विचार
वाणिज्यवाद की आर्थिक विचारधारा
सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी के मध्य यूरोप में विकसित वाणिज्यवाद केवल एक आर्थिक सिद्धांत नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रीय शक्ति, व्यापार, उद्योग तथा राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था पर आधारित एक व्यापक आर्थिक नीति थी। मध्ययुग के उत्तरार्द्ध में सामन्तवाद के पतन, राष्ट्रीय राज्यों के उदय, व्यापारिक क्रांति तथा महान भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप यूरोप की आर्थिक संरचना में व्यापक परिवर्तन हुआ। इसी परिवर्तित परिस्थिति में वाणिज्यवादियों ने ऐसी आर्थिक नीतियों का प्रतिपादन किया, जिनका उद्देश्य राज्य को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाना तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार के माध्यम से राष्ट्रीय समृद्धि प्राप्त करना था। यद्यपि विभिन्न वाणिज्यवादी विचारकों के मतों में कुछ व्यावहारिक अंतर था, फिर भी उनके प्रमुख आर्थिक विचारों में पर्याप्त समानता दिखाई देती है।
शक्तिशाली राज्य एवं राजसत्ता का समर्थन
वाणिज्यवादियों का विश्वास था कि किसी राष्ट्र की आर्थिक उन्नति तभी संभव है, जब उसका शासन शक्तिशाली एवं संगठित हो। मध्ययुगीन यूरोप में चर्च तथा पोप का राजनीतिक प्रभाव अत्यधिक था, जिससे राजसत्ता की शक्ति सीमित हो जाती थी। इसके अतिरिक्त सामंतों की स्वायत्तता तथा आंतरिक अव्यवस्था भी राष्ट्रीय एकता में बाधक थी। इसलिए वाणिज्यवादियों ने शक्तिशाली राष्ट्रीय राज्य तथा निरंकुश राजतंत्र का समर्थन किया। उनका मत था कि राज्य को व्यापार, उद्योग, कर-व्यवस्था तथा विदेशी व्यापार पर प्रभावी नियंत्रण रखना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रीय एकता, राजनीतिक स्थिरता तथा सुदृढ़ प्रशासन को आर्थिक विकास का आधार माना। वाणिज्यवादियों ने राजाओं को आर्थिक सहयोग प्रदान करने तथा उनकी सैन्य एवं नौसैनिक शक्ति को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया, क्योंकि उनके अनुसार एक शक्तिशाली राज्य ही व्यापारिक हितों एवं उपनिवेशों की रक्षा कर सकता था।
सोना एवं चाँदी का महत्त्व
वाणिज्यवादियों का सबसे प्रमुख आर्थिक सिद्धांत यह था कि किसी राष्ट्र की समृद्धि एवं शक्ति का वास्तविक आधार उसके पास संचित सोना एवं चाँदी है। उनके अनुसार बहुमूल्य धातुएँ ही राष्ट्रीय सम्पत्ति का सबसे विश्वसनीय रूप थीं। इसलिए उन्होंने अधिकाधिक स्वर्ण एवं रजत के संचय को आर्थिक नीति का प्रमुख उद्देश्य बनाया।
वाणिज्यवादी विचारकों का प्रसिद्ध सिद्धांत था—‘अधिक स्वर्ण, अधिक धन और अधिक शक्ति।’ सर जोशिया चाइल्ड के अनुसार किसी भी देश की समृद्धि का आकलन इस आधार पर किया जा सकता है कि उसके पास सोने एवं चाँदी का कितना भंडार है। सर थॉमस मुन का मत था कि जिन देशों में स्वर्ण एवं रजत की खानें नहीं हैं, उन्हें विदेशी व्यापार के माध्यम से इन धातुओं को प्राप्त करना चाहिए। सर विलियम पेटी ने भी लिखा कि व्यापार का अंतिम उद्देश्य बहुमूल्य धातुओं की प्राप्ति है, क्योंकि ये नष्ट नहीं होतीं तथा प्रत्येक स्थान एवं प्रत्येक समय मूल्यवान बनी रहती हैं। इस प्रकार सभी वाणिज्यवादी विचारकों ने स्वर्ण एवं रजत को राष्ट्रीय शक्ति का प्रमुख आधार स्वीकार किया।
विदेशी व्यापार का प्रोत्साहन
वाणिज्यवादियों के अनुसार विदेशी व्यापार राष्ट्रीय समृद्धि प्राप्त करने का सर्वाधिक प्रभावी साधन था। उनका विश्वास था कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के माध्यम से ही किसी राष्ट्र में बहुमूल्य धातुओं का प्रवाह बढ़ सकता है। इसलिए उन्होंने विदेशी व्यापार को आत्मनिर्भरता, आर्थिक उन्नति तथा राष्ट्रीय शक्ति की कुंजी माना।
वाणिज्यवादियों ने विशेष रूप से ऐसे उद्योगों को प्रोत्साहित करने की अनुशंसा की, जिनसे निर्यात में वृद्धि हो सके। सर जोशिया चाइल्ड (1630–1699 ई.) ने समुद्री व्यापार एवं जहाजरानी के विकास को अत्यंत आवश्यक बताया। उनके अनुसार शक्तिशाली व्यापारिक नौसेना के बिना विदेशी व्यापार का विस्तार संभव नहीं है। उन्होंने कच्चे माल के आयात तथा तैयार माल के निर्यात को राष्ट्रीय हित में आवश्यक माना। इस नीति से उद्योगों का विकास, रोजगार में वृद्धि तथा विदेशी मुद्रा की प्राप्ति संभव होती थी।
अनुकूल व्यापार संतुलन पर बल
वाणिज्यवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धांत अनुकूल व्यापार संतुलन था। इसका अर्थ यह था कि किसी राष्ट्र का निर्यात उसके आयात से अधिक होना चाहिए। यदि किसी देश का निर्यात अधिक होगा, तो विदेशी राष्ट्र उसके बदले सोना एवं चाँदी का भुगतान करेंगे, जिससे राष्ट्रीय सम्पत्ति में वृद्धि होगी।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वाणिज्यवादियों ने विदेशी निर्मित वस्तुओं पर अधिक सीमा-शुल्क लगाने तथा अनावश्यक आयात को सीमित करने का समर्थन किया। उनका मत था कि विलासिता की वस्तुओं का आयात राष्ट्रहित के विरुद्ध है, क्योंकि इससे बहुमूल्य धातुएँ विदेश चली जाती हैं। इसके विपरीत तैयार माल का निर्यात अधिक से अधिक किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि जहाँ तक संभव हो, आयातित वस्तुओं का भुगतान वस्तुओं के विनिमय द्वारा किया जाए, न कि सोने एवं चाँदी द्वारा। इस प्रकार व्यापार संतुलन को राष्ट्र के पक्ष में बनाए रखना वाणिज्यवाद की प्रमुख आर्थिक नीति थी।
उद्योग एवं व्यापार पर सरकारी नियंत्रण
वाणिज्यवादियों का विश्वास था कि व्यापार एवं उद्योग का विकास केवल निजी प्रयासों पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसलिए उन्होंने अर्थव्यवस्था में सरकार के सक्रिय हस्तक्षेप का समर्थन किया। उनके अनुसार राज्य को आयात-निर्यात, उद्योग, व्यापार, कर व्यवस्था तथा उत्पादन की गुणवत्ता पर नियंत्रण रखना चाहिए। उन्होंने आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहन देने, आयात पर नियंत्रण स्थापित करने तथा कुछ विशेष व्यापारिक कंपनियों को विदेशी व्यापार का अधिकार देने की नीति का समर्थन किया। इसी कारण इंग्लैंड, फ्रांस तथा नीदरलैंड में राजकीय संरक्षण प्राप्त संयुक्त स्टॉक कंपनियों की स्थापना हुई। वाणिज्यवादियों ने यह भी सुझाव दिया कि उद्योगों पर करों का बोझ कम रखा जाए, जिससे उत्पादन लागत घटे तथा निर्यात प्रतिस्पर्धी बन सके। साथ ही उन्होंने सड़कों, नहरों, बंदरगाहों तथा परिवहन के अन्य साधनों के विकास पर विशेष बल दिया, जिससे व्यापार अधिक सुगम एवं लाभदायक बन सके।
जनसंख्या वृद्धि और श्रम शक्ति
वाणिज्यवादियों के अनुसार अधिक जनसंख्या किसी राष्ट्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक शक्ति का स्रोत है। उनका मत था कि बड़ी जनसंख्या से पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध होंगे, जिससे उद्योगों एवं कृषि का उत्पादन बढ़ेगा। साथ ही बड़ी जनसंख्या सेना एवं नौसेना के लिए भी पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध कराएगी। उन्होंने श्रम को राष्ट्रीय उत्पादन का आधार माना तथा अधिकाधिक लोगों को उत्पादक कार्यों में लगाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार बेरोजगारी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति को कमजोर करती है, इसलिए सरकार को ऐसे उद्योगों एवं व्यापारिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना चाहिए, जिनसे अधिक रोजगार सृजित हो सके।
कृषि के प्रति दृष्टिकोण
वाणिज्यवादियों ने कृषि को अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग तो माना, किंतु उसे उद्योग एवं व्यापार की अपेक्षा द्वितीय स्थान दिया। उनके अनुसार कृषि का प्रमुख उद्देश्य उद्योगों के लिए पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल उपलब्ध कराना था। उन्होंने कृषि उत्पादन बढ़ाने, बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाने तथा भूमि के अधिकतम उपयोग पर बल दिया।
वाणिज्यवादियों का मत था कि यदि कच्चा माल देश के भीतर सस्ते मूल्य पर उपलब्ध होगा, तो उद्योगों की उत्पादन लागत कम होगी और तैयार माल का निर्यात अधिक लाभदायक सिद्ध होगा। इस प्रकार कृषि को उद्योग एवं व्यापार का सहायक क्षेत्र माना गया। यद्यपि उन्होंने कृषि की उपयोगिता स्वीकार की, फिर भी उनकी आर्थिक नीतियों का मुख्य केंद्र उद्योग, व्यापार, जहाजरानी तथा विदेशी वाणिज्य ही रहा।
उपनिवेशों और व्यापारिक कंपनियों का समर्थन
वाणिज्यवादियों का विचार था कि उपनिवेश किसी भी राष्ट्र की आर्थिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। उपनिवेशों से सस्ता कच्चा माल प्राप्त किया जा सकता था तथा वे तैयार माल के लिए सुरक्षित बाजार भी उपलब्ध कराते थे। इसलिए उन्होंने उपनिवेशों की स्थापना, व्यापारिक कंपनियों के गठन तथा समुद्री शक्ति के विस्तार का प्रबल समर्थन किया।
उनके अनुसार राज्य को व्यापारिक कंपनियों को विशेष अधिकार प्रदान करने चाहिए, जिससे वे विदेशी व्यापार का विस्तार कर सकें। इसी नीति के परिणामस्वरूप इंग्लैंड, फ्रांस तथा नीदरलैंड की व्यापारिक कंपनियाँ एशिया, अफ्रीका एवं अमेरिका में सक्रिय हुईं और आगे चलकर यूरोपीय साम्राज्यवाद के विस्तार का आधार बनीं।
वाणिज्यवाद का व्यावहारिक प्रयोग
वाणिज्यवाद के सिद्धांतों का सभी यूरोपीय देशों ने एक साथ और समान रूप से पालन नहीं किया, किंतु सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी के मध्य अधिकांश यूरोपीय राज्यों ने अपनी आवश्यकताओं के अनुसार इसकी प्रमुख नीतियों को अपनाया। राष्ट्रीय राज्यों के उदय, व्यापारिक क्रांति तथा महान भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप विभिन्न देशों ने व्यापार, उद्योग, कर-व्यवस्था तथा उपनिवेशों के विकास को राज्य की आर्थिक नीति का आधार बनाया। फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी तथा स्पेन में वाणिज्यवाद का व्यावहारिक स्वरूप विशेष रूप से विकसित हुआ।
फ्रांस
फ्रांस में वाणिज्यवाद का सर्वाधिक विकास जीन-बैप्टिस्ट कोलबर्ट (1619–1683 ई.) के नेतृत्व में हुआ। राजा लुई चौदहवें (1643-1715 ई.) के वित्तमंत्री के रूप में कोलबर्ट ने राज्य-नियंत्रित आर्थिक नीति अपनाई, जिसके कारण फ्रांस में वाणिज्यवाद को कोलबर्टवाद कहा गया। उन्होंने देशी उद्योगों को संरक्षण प्रदान किया, नए उद्योग स्थापित किए तथा उत्पादन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कठोर नियम बनाए। सड़कों, नहरों और बंदरगाहों का विकास किया गया तथा व्यापारिक कंपनियों को प्रोत्साहन दिया गया। विदेशी व्यापार के विस्तार और उपनिवेशों की स्थापना के लिए फ्रांस ने इंग्लैंड एवं अन्य यूरोपीय शक्तियों से प्रतिस्पर्धा भी की। इन प्रयासों से फ्रांस की आर्थिक एवं औद्योगिक शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
इंग्लैंड
इंग्लैंड में वाणिज्यवाद का प्रभाव विशेष रूप से महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम (1558–1603 ई.) के शासनकाल में दिखाई देता है। इस काल में देशी उद्योगों को संरक्षण दिया गया, कुशल श्रमिकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई तथा विदेशी व्यापार को व्यापक प्रोत्साहन प्रदान किया गया। श्रमिकों एवं निर्धन वर्ग के हितों की रक्षा के लिए निर्धन कानून लागू किए गए। इंग्लैंड ने शक्तिशाली नौसेना का निर्माण किया, व्यापारिक कंपनियों की स्थापना की तथा एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में अपने उपनिवेशों का विस्तार किया। इन नीतियों ने इंग्लैंड को आगे चलकर विश्व की प्रमुख व्यापारिक एवं औपनिवेशिक शक्ति बनने में महत्त्वपूर्ण सहायता प्रदान की।
जर्मनी
जर्मनी में वाणिज्यवाद का विकास कैमरालिज्म के रूप में हुआ। जर्मन शासकों ने औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक योजनाएँ लागू कीं। कुशल कारीगरों और शिल्पकारों को देश में बसने के लिए प्रोत्साहित किया गया तथा नए उद्योगों की स्थापना में सरकारी सहायता प्रदान की गई। निजी निवेश को बढ़ावा दिया गया और मुद्रा तथा साख व्यवस्था को अधिक संगठित बनाया गया। इन नीतियों के परिणामस्वरूप जर्मनी में उत्पादन क्षमता और आर्थिक संगठन में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
स्पेन
स्पेन के वाणिज्यवाद का मुख्य उद्देश्य अमेरिका से अधिकाधिक सोना एवं चाँदी प्राप्त करना था। उसने विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना की तथा उपनिवेशों के प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक दोहन किया। यद्यपि इससे स्पेन के पास बहुमूल्य धातुओं का विशाल भंडार एकत्र हुआ, किंतु उसने देश के उद्योगों और विनिर्माण क्षेत्र के विकास पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। परिणामस्वरूप विदेशी निर्मित वस्तुओं पर उसकी निर्भरता बढ़ती गई और वह अपनी आर्थिक शक्ति को दीर्घकाल तक बनाए रखने में सफल नहीं हो सका।
वाणिज्यवाद का महत्त्व
वाणिज्यवाद ने यूरोप की आर्थिक, राजनीतिक तथा औद्योगिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया। इस नीति के कारण देशी उद्योगों को संरक्षण मिला, विदेशी व्यापार का विस्तार हुआ तथा जहाजरानी और समुद्री शक्ति का विकास हुआ। आयात नियंत्रण और निर्यात प्रोत्साहन की नीति ने विशेष रूप से इंग्लैंड तथा फ्रांस के औद्योगिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वाणिज्यवाद ने आधुनिक राष्ट्रीय राज्यों की आर्थिक नींव को सुदृढ़ किया तथा संगठित वित्तीय व्यवस्था, व्यापारिक कंपनियों और आधुनिक बैंकिंग प्रणाली के विकास को प्रोत्साहित किया।
इस नीति ने मुद्रा को केवल विनिमय का माध्यम न मानकर राष्ट्रीय सम्पत्ति और आर्थिक शक्ति का प्रतीक बनाया। साथ ही इसने उपनिवेशवाद, अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा आधुनिक पूँजीवाद के विकास की आधारभूमि तैयार की। इसी कारण इतिहासकार विलियम आर. स्कॉट का मत है कि यदि वाणिज्यवाद का मूल्यांकन उसके समकालीन राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश को ध्यान में रखकर किया जाए, तो उसकी उपयोगिता और ऐतिहासिक महत्ता को सहज ही स्वीकार किया जा सकता है।
वाणिज्यवाद की आलोचना
वाणिज्यवाद ने सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी के मध्य यूरोप की आर्थिक, राजनीतिक एवं व्यापारिक नीतियों को गहराई से प्रभावित किया। इसने राष्ट्रीय राज्यों के निर्माण, व्यापार के विस्तार, उद्योगों के विकास तथा उपनिवेशवाद को प्रोत्साहन दिया। तथापि इसके अनेक सिद्धांत समय के साथ विवादास्पद सिद्ध हुए और सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से ही इसकी आलोचना प्रारंभ हो गई। जैसे-जैसे आर्थिक विचारधारा का विकास हुआ, अनेक अर्थशास्त्रियों एवं दार्शनिकों ने वाणिज्यवाद के मूल सिद्धांतों को अव्यावहारिक, संकीर्ण तथा दीर्घकालीन आर्थिक विकास के लिए अनुपयुक्त बताया। विशेष रूप से जॉन लॉक, डडली नॉर्थ, फ्रांसीसी प्रकृतिवादी तथा एडम स्मिथ ने इसके विरुद्ध सशक्त तर्क प्रस्तुत किए।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं आर्थिक हस्तक्षेप
वाणिज्यवाद की सबसे प्रमुख आलोचना इस आधार पर की गई कि यह राज्य को आर्थिक गतिविधियों में अत्यधिक हस्तक्षेप का अधिकार प्रदान करता था। वाणिज्यवादियों के अनुसार सरकार को व्यापार, उद्योग, आयात-निर्यात, उत्पादन तथा मूल्य-निर्धारण पर नियंत्रण रखना चाहिए। इसके विपरीत अंग्रेज़ दार्शनिक जॉन लॉक ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा निजी संपत्ति के अधिकार का समर्थन किया। उनका मत था कि व्यक्ति को आर्थिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए।
आलोचकों ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक सरकारी नियंत्रण से प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाती है, उद्योगों की कार्यक्षमता घटती है तथा व्यापारिक नवाचारों में बाधा उत्पन्न होती है। परिणामस्वरूप उत्पादन क्षमता और आर्थिक विकास दोनों प्रभावित होते हैं। इस प्रकार वाणिज्यवाद की नियंत्रित अर्थव्यवस्था की अवधारणा को उदारवादी अर्थशास्त्रियों ने अव्यावहारिक माना।
स्वर्ण एवं रजत संचय की नीति
वाणिज्यवादियों का विश्वास था कि किसी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि उसके पास संचित सोने एवं चाँदी की मात्रा पर निर्भर करती है। इस सिद्धांत की सबसे अधिक आलोचना एडम स्मिथ तथा अन्य उदारवादी अर्थशास्त्रियों ने की। उनका तर्क था कि बहुमूल्य धातुएँ स्वयं किसी राष्ट्र की समृद्धि का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे केवल विनिमय का माध्यम हैं।
एडम स्मिथ ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘एन इन्क्वायरी इंटू द नेचर एंड कॉज़ेज़ ऑफ द वेल्थ ऑफ नेशन्स’ (1776 ई.) में स्पष्ट किया कि किसी देश की वास्तविक संपत्ति उसके उत्पादन, श्रम, उद्योग तथा प्राकृतिक संसाधनों में निहित होती है। उनके अनुसार सस्ती, उपयोगी एवं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध वस्तुओं का उत्पादन ही किसी राष्ट्र की समृद्धि का वास्तविक आधार है। केवल सोना एवं चाँदी एकत्र करने से जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो सकती। आलोचकों ने यह भी कहा कि यदि किसी राष्ट्र के पास पर्याप्त अन्न, वस्त्र, औद्योगिक उत्पादन तथा रोजगार उपलब्ध नहीं हैं, तो केवल बहुमूल्य धातुओं का विशाल भंडार भी उसे समृद्ध नहीं बना सकता।
कृषि की उपेक्षा
वाणिज्यवादियों ने उद्योग एवं व्यापार को अत्यधिक महत्त्व दिया, जबकि कृषि को अपेक्षाकृत द्वितीय स्थान दिया। उन्होंने कृषि को मुख्यतः उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराने वाला क्षेत्र माना। इस नीति के कारण अनेक देशों में कृषि सुधार की उपेक्षा हुई तथा कृषकों की स्थिति दयनीय होती चली गई।
अठारहवीं शताब्दी में फ्रांस के प्रकृतिवादी विचारकों, विशेषकर फ़्रांस्वा केने ने कृषि को राष्ट्रीय समृद्धि का मूल आधार घोषित किया। उनका मत था कि वास्तविक उत्पादन केवल कृषि से प्राप्त होता है, जबकि उद्योग एवं व्यापार केवल वस्तुओं का रूपांतरण एवं वितरण करते हैं। आलोचकों ने यह भी स्पष्ट किया कि कृषि की उपेक्षा से खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा, जिससे आर्थिक संकट उत्पन्न हो सकता है। इसलिए कृषि एवं उद्योग के मध्य संतुलन आवश्यक है।
विदेशी व्यापार एवं व्यापाराधिक्य
वाणिज्यवादियों ने निर्यात को अधिक तथा आयात को कम रखने की नीति अपनाने पर बल दिया। उनके अनुसार अनुकूल व्यापार संतुलन से देश में सोना एवं चाँदी का संचय होता है। आलोचकों ने इस सिद्धांत को व्यावहारिक दृष्टि से असंभव बताया।
उन्होंने तर्क दिया कि यदि प्रत्येक देश केवल निर्यात बढ़ाना चाहता है और आयात को न्यूनतम रखना चाहता है, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार का संतुलन कैसे बना रहेगा। प्रत्येक राष्ट्र अपनी वस्तुओं का निर्यात करना चाहता है, किंतु उसके लिए अन्य देशों का आयात करना भी आवश्यक है। यदि सभी राष्ट्र समान नीति अपनाएँ, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार बाधित हो जाएगा। डडली नॉर्थ ने स्पष्ट किया कि विदेशी व्यापार की वास्तविक आधारशिला आंतरिक व्यापार, उत्पादन तथा कृषि की उन्नति है। इसलिए केवल निर्यात बढ़ाने की नीति दीर्घकाल तक सफल नहीं हो सकती।
उपनिवेशवाद एवं आर्थिक शोषण की आलोचना
वाणिज्यवाद की एक प्रमुख विशेषता उपनिवेशों की स्थापना तथा उनके आर्थिक शोषण की नीति थी। यूरोपीय शक्तियाँ उपनिवेशों से कच्चा माल प्राप्त करती थीं तथा उन्हें अपने तैयार माल के बाजार के रूप में उपयोग करती थीं। आलोचकों ने इस नीति को अन्यायपूर्ण एवं अमानवीय बताया।
उन्होंने कहा कि उपनिवेशों का निरंतर आर्थिक शोषण अंततः राजनीतिक असंतोष को जन्म देगा। इतिहास ने भी इसे सत्य सिद्ध किया। ब्रिटेन की कठोर वाणिज्यवादी नीतियों तथा व्यापारिक प्रतिबंधों के कारण उसके अमेरिकी उपनिवेशों में असंतोष उत्पन्न हुआ, जिसका परिणाम अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1775–1783 ई.) के रूप में सामने आया। इससे स्पष्ट हुआ कि आर्थिक शोषण पर आधारित नीति स्थायी नहीं हो सकती।
वाणिज्यवाद के पतन के कारण
एडम स्मिथ और उदारवादी अर्थशास्त्र का प्रभाव
वाणिज्यवाद के पतन का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण एडम स्मिथ के विचार थे। उन्होंने 1776 ई. में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द वेल्थ ऑफ नेशन्स’ में वाणिज्यवाद के लगभग सभी प्रमुख सिद्धांतों का व्यवस्थित खंडन किया। उन्होंने लेसेज़-फेयर अर्थात् आर्थिक मामलों में न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप तथा स्वतंत्र व्यापार का समर्थन किया।
एडम स्मिथ के अनुसार प्रतिस्पर्धा, श्रम-विभाजन, मुक्त व्यापार तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता आर्थिक विकास के वास्तविक आधार हैं। उनके विचारों ने शास्त्रीय अर्थशास्त्र की नींव रखी और वाणिज्यवाद की वैचारिक प्रतिष्ठा को गंभीर आघात पहुँचाया।
फ्रांस में कोलबर्टवाद का विरोध
फ्रांस में कोलबर्ट द्वारा अपनाई गई कठोर वाणिज्यवादी नीतियों का समय के साथ व्यापक विरोध होने लगा। अत्यधिक कराधान, सरकारी नियंत्रण तथा कृषि की उपेक्षा के कारण जनता असंतुष्ट हो गई। उद्योगों के विकास के बावजूद कृषकों की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती गई। परिणामस्वरूप फ्रांस में स्वतंत्र व्यापार तथा आर्थिक उदारीकरण की माँग बढ़ने लगी।
प्रकृतिवादी विचारकों ने राज्य के अत्यधिक हस्तक्षेप का विरोध करते हुए प्राकृतिक आर्थिक व्यवस्था की वकालत की। इन विचारों का प्रभाव धीरे-धीरे अन्य यूरोपीय देशों पर भी पड़ा और वाणिज्यवाद की लोकप्रियता कम होने लगी।
कृषि का पतन
वाणिज्यवाद के अंतर्गत व्यापार एवं उद्योग को प्राथमिकता मिलने के कारण कृषि क्षेत्र की उपेक्षा हुई। अनेक देशों में किसानों पर भारी कर लगाए गए तथा कृषि सुधारों की अनदेखी की गई। उत्पादन लागत बढ़ी और कृषकों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई।
इसी समय प्रकृतिवादी अर्थशास्त्रियों ने कृषि को राष्ट्रीय समृद्धि का मूल आधार घोषित किया। उन्होंने सिद्ध किया कि यदि कृषि उत्पादन सुदृढ़ नहीं होगा, तो उद्योग एवं व्यापार भी दीर्घकाल तक विकसित नहीं हो सकते। इस विचारधारा ने वाणिज्यवाद की आधारभूत मान्यताओं को चुनौती दी।
स्वर्ण एवं रजत पर अत्यधिक निर्भरता
वाणिज्यवादियों ने बहुमूल्य धातुओं के संचय को आर्थिक समृद्धि का प्रमुख साधन माना, किंतु व्यवहार में यह नीति सीमित सिद्ध हुई। केवल सोना एवं चाँदी एकत्र करने से उत्पादन, रोजगार तथा उपभोग में वृद्धि नहीं होती। जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति उपयोगी वस्तुओं, कृषि उत्पादन तथा औद्योगिक विकास से होती है।
जैसे-जैसे आर्थिक चिंतन विकसित हुआ, यह स्पष्ट होता गया कि राष्ट्रीय संपत्ति का वास्तविक आधार उत्पादन, पूँजी, श्रम एवं तकनीकी प्रगति है, न कि केवल बहुमूल्य धातुओं का संग्रह। इस कारण वाणिज्यवाद का यह मूल सिद्धांत भी अप्रासंगिक सिद्ध होने लगा।
स्वतंत्र व्यापार की आवश्यकता
अठारहवीं शताब्दी में औद्योगिक विकास, वैज्ञानिक प्रगति तथा उत्पादन तकनीकों में सुधार के कारण व्यापक बाजारों की आवश्यकता बढ़ी। वाणिज्यवाद के अंतर्गत लागू व्यापारिक प्रतिबंध, एकाधिकार तथा सरकारी नियंत्रण औद्योगिक विकास में बाधा बनने लगे। उद्योगपतियों एवं व्यापारियों ने स्वतंत्र व्यापार, प्रतिस्पर्धा तथा खुले बाजार की माँग प्रारंभ कर दी।
ब्रिटेन सहित अनेक देशों में धीरे-धीरे आयात-निर्यात पर लगे प्रतिबंध कम किए जाने लगे और व्यापारिक एकाधिकार समाप्त होने लगे। इस परिवर्तन ने मुक्त व्यापार की अवधारणा को सुदृढ़ किया तथा वाणिज्यवाद की नियंत्रित आर्थिक व्यवस्था को पीछे छोड़ दिया। परिणामस्वरूप अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक वाणिज्यवाद की प्रभावशीलता तेजी से समाप्त होने लगी और उसके स्थान पर शास्त्रीय उदारवादी आर्थिक विचारधारा का प्रभुत्व स्थापित हो गया।




