हज़रत ख़्वाजा शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी (क़ुतुब-ए-दक्कन)
परिचय
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी (लगभग 1650–1730 ई.) सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और अठारहवीं शताब्दी के आरंभ के प्रसिद्ध चिश्ती सूफ़ी संत थे। उन्हें ‘क़ुतुब-ए-दक्कन’ (दक्षिण की धुरी), ‘क़ुतुब-उल-अक़ताब’, ‘शैख़-उल-इस्लाम’ और ‘मक़बूल-ए-इलाही’ जैसी उपाधियाँ मिलीं। वे दिल्ली के संत शाह कलीमुल्लाह जहानाबादी के मुरीद (शिष्य) और ख़लीफ़ा (उत्तराधिकारी) थे। उन्होंने दक्कन में चिश्ती परंपरा और सूफ़ी मत के प्रसार में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। प्रसिद्ध संत मौलाना फ़ख़रुद्दीन देहलवी (फ़ख़्र-ए-पाक) उनके पुत्र थे।
जन्म और वंश
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी के जन्म का स्पष्ट ब्योरा उपलब्ध नहीं है। निधन के समय उनकी आयु 82 वर्ष थी। इसके आधार पर उनका जन्म-वर्ष 1060 हिजरी (लगभग 1650 ई.) माना जाता है। ‘क़ज़ीन व बहार’ में जन्म-वर्ष 1070 हिजरी भी मिलता है। उनका वंश शेख़ शहाबुद्दीन सुहरवर्दी के माध्यम से पहले ख़लीफ़ा हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ से जुड़ता है।
कुछ स्रोतों, जैसे ‘मनाक़िब-ए-फ़ख़रिया’, ‘शजरा-ए-अनवार’, ‘तकमिला’, ‘सैरुल औलिया’, ‘ख़ज़ीनतुल असफ़िया’) में शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी का वतन केवल ‘पूरब’ बताया गया है। ‘मनाक़िबुल महबूबीन’ के अनुसार वे पूरब के कस्बे ईशियान, गाँव काकोरी और टकरौन से थे, जो लखनऊ के पास है। ख़्वाजा हसन निज़ामी और नवाब मुस्लिहुद्दीन ख़ान ने भी काकोरी बताया है। इस प्रकार काकोरी को ही उनका जन्म-स्थान माना जाता है। काकोरी शरीफ़ में उनके दादा या परदादा शेख़ सादी की क़ब्र भी है। ‘क़ज़ीन व बहार’ के लेखक ने गाँव का नाम टकरौन लिखा है।
शिक्षा और दिल्ली आगमन
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी ने आरंभिक शिक्षा अपने वतन में पाई। लगभग ग्यारह वर्ष की आयु में वे आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली गए। उस समय दिल्ली ज़ाहिरी (बाहरी) और बातिनी (आंतरिक) दोनों ज्ञान का प्रसिद्ध केंद्र थी। कुछ वर्षों में उन्होंने ज़ाहिरी ज्ञान पूरा किया, फिर उनकी रुचि बातिनी ज्ञान की ओर हुई। तब उन्होंने शाह कलीमुल्लाह की ख्याति सुनी और उनकी सेवा में पहुँचे।
शाह कलीमुल्लाह से पहली भेंट
जब वे शाह कलीमुल्लाह की ख़ानक़ाह पहुँचे, तब वहाँ ‘समा’ (भक्ति-संगीत सभा) चल रही थी। बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित था और दरवाज़ा बंद था। इस बात से अनजान उन्होंने दस्तक दी। शेख़ ने सेवक से देखने को कहा, फिर उन्हें भीतर बुलवाया और बड़े प्रेम से स्वागत किया। यह देखकर सभी शिष्य चकित रह गए। शेख़ ने कहा कि इस व्यक्ति और इसके नाम से मुझे अपनेपन की ख़ुशबू आ रही है, इसलिए यह अजनबी नहीं है। उन्होंने ज़ाहिरी ज्ञान की शिक्षा का दायित्व स्वयं ले लिया।
बैअत (दीक्षा)
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी लंबे समय तक शेख़ की सेवा में रहे। एक बार शेख़ यहिया मदनी का कोई शिष्य शाह कलीमुल्लाह से मिलने आया। शेख़ को देखते ही वह भावविभोर होकर बेसुध हो गया। इस घटना से निज़ामुद्दीन बहुत प्रभावित हुए और उनकी श्रद्धा और बढ़ गई।
एक दिन शेख़ उठकर जाने लगे तो निज़ामुद्दीन ने आगे बढ़कर उनकी जूतियाँ अपने वस्त्र से साफ़ कीं और आदर से उनके सामने रख दीं। शेख़ ने पूछा, ‘निज़ामुद्दीन, तुम केवल ज्ञान के लिए आए हो या सुलूक (आध्यात्मिक मार्ग) की राह भी चाहते हो?’ उन्होंने फ़ारसी का एक शेर पढ़कर उत्तर दिया। उसका भाव है: ‘मैं स्वयं को आपके हवाले करता हूँ। आप जानते हैं कि मेरे लिए क्या कम है और क्या अधिक, यानी मेरे लिए क्या बेहतर है।’
यह सुनकर शाह कलीमुल्लाह को अपने पीर शेख़ यहिया मदनी की भविष्यवाणी याद आई। मदीना यात्रा के समय पीर ने उनसे कहा था कि तुम्हारे सिलसिले से ‘निज़ामुद्दीन’ नाम का एक क़ुतुब उठेगा। उसकी प्रतीक्षा करना, वह यही शेर पढ़ेगा। जब निज़ामुद्दीन ने वही शेर पढ़ा, तो शाह कलीमुल्लाह ने उन्हें अपने शिष्यों में सम्मिलित कर लिया और उनकी बैअत स्वीकार की। इस प्रकार वे चिश्ती कलीमी सिलसिले से जुड़े।
साधना और इबादत
बैअत के बाद शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी की साधना और बढ़ गई। गुरु ने उन्हें ज़िक्र-ए-जहरी (ऊँची आवाज़ में ईश्वर-स्मरण) की अनुमति दी। गर्मियों में वे यमुना के किनारे रेत पर बैठकर आधी रात से फ़ज्र (प्रातः) की नमाज़ तक ज़िक्र में लगे रहते थे। वे कहते थे कि उन्हें सबसे अधिक लाभ ज़िक्र-ए-जहरी से मिला।
ख़िलाफ़त और दक्कन की विलायत
कठोर साधना और प्रशिक्षण के बाद जब ज़ाहिरी और बातिनी ज्ञान पूरा हो गया, तब शाह कलीमुल्लाह ने उन्हें ख़िलाफ़त और संतों का वस्त्र प्रदान किया। अपने पीर शेख़ यहिया मदनी (कुतुब-ए-मदीना) के संकेत के अनुसार उन्होंने निज़ामुद्दीन को दक्कन जाने और वहाँ सूफ़ी केंद्र स्थापित करने का आदेश दिया। उस समय दक्कन की राजनीतिक स्थिति बहुत ख़राब थी और लोग उत्तर भारत की ओर पलायन कर रहे थे। शाह कलीमुल्लाह ने पत्र में लिखा: ‘अल्लाह की कृपा से तुम्हें दक्कन की विलायत दी गई है। इस काम को पूरे ध्यान से करना। पहले तुम्हें सेना में भर्ती होने को कहा गया था, अब तुम जहाँ भी रहो, इस्लाम के प्रचार और शिक्षण में लगे रहो और अपना जीवन और धन इसी में लगाओ।’
दक्कन में पहले भी कई चिश्ती संत हुए थे, जैसे अमीर हसन अला संजरी, शेख़ बुरहानुद्दीन ग़रीब, ख़्वाजा मुंतजिब ज़र ज़री बख़्श, ज़ैनुद्दीन शीराज़ी और ख़्वाजा बंदा नवाज़। इसी कठिन दौर में निज़ामुद्दीन चिश्ती निज़ामी सिलसिले के प्रसार के लिए दक्कन पहुँचे।
दक्कन की यात्रा
‘मक्तूबात-ए-कलीमी’ के अनुसार वे शाही सेना के साथ दक्कन आए और सेना के साथ ही घूमते रहे। इसी सेना के माध्यम से वे अपने गुरु को पत्र भेजते और उत्तर पाते थे। शाह कलीमुल्लाह ने एक पत्र में लिखा कि दक्कन की राजनीतिक स्थिति ठीक नहीं है, इसलिए सावधानी और ध्यान से कार्य करो। वे दक्कन के कई स्थानों पर रहे, जिनमें बुरहानपुर, बीजापुर और शोलापुर शामिल हैं। अंत में वे औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर, महाराष्ट्र) में स्थायी रूप से बस गए।
औरंगाबाद में निवास
औरंगाबाद में ख़्वाजा कामगार ख़ान ने उन्हें अपनी हवेली में ठहरने का प्रस्ताव दिया, जो उन्होंने स्वीकार कर लिया। शुरू में लोगों की भारी भीड़ देखकर वे परेशान हुए। फिर गुरु की सलाह पर, जिनका निर्देश था कि सभी पर कृपा की दृष्टि रखो, वे सबसे प्रेम और प्रसन्नता से मिलने लगे। उनका निवास दो मंज़िला था। ऊपरी मंज़िल पर वे इबादत करते और नीचे की मंज़िल पर लोगों को शिक्षा और उपदेश देते थे। नीचे की मंज़िल के एक छोटे ज़नाना कमरे में ही उनके पुत्र मौलाना फ़ख़रुद्दीन का जन्म हुआ।
दस दरवाज़ों वाली ख़ानक़ाह
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी की ख़ानक़ाह (सूफ़ी मठ) के दस दरवाज़े थे और हर दरवाज़े पर एक मुंशी (लेखक) बैठता था। जो भी अपनी ज़रूरत लेकर आता, मुंशी उसकी माँग काग़ज़ पर लिखकर उस पर शेख़ की मुहर लगा देता। काग़ज़ पर एक फ़ारसी शेर लिखा होता था, जिसका भाव है: ‘अल्लाह का स्मरण सबसे बड़ा है, मेरा दिल उसी में लगा है। निज़ामुद्दीन को इस दुनिया की कोई ख़बर नहीं।’ ज़रूरतमंद यह पर्ची लेकर अमीरों और शासकों के पास जाते। वे शेख़ के प्रति श्रद्धा के कारण उसे पूरा करना अपना सम्मान समझते थे। यह ख़ानक़ाह हर वर्ग के अमीर-ग़रीब के लिए खुली थी, और वहाँ बिना भेदभाव भोजन (लंगर) और आश्रय मिलता था।
यह व्यवस्था सूफ़ियों की उसी परंपरा को दिखाती है जो इस्लाम का प्रचार केवल शब्दों से नहीं, कर्म से करती थी। इसी कारण भारत के सूफ़ी अमीर-ग़रीब सभी के प्रिय बने।
दिनचर्या
औरंगाबाद आकर उन्होंने पुस्तकें पढ़ने का पुराना शौक़ छोड़ दिया और इबादत, रियाज़त (कठोर साधना), अज़कार (ज़िक्र) और अफ़कार (चिंतन) में लग गए। फ़ज्र की नमाज़ के बाद वे ज़ुहर तक अपने कमरे में इबादत करते थे। ज़ुहर के बाद कमरा बंद हो जाता और अस्र के समय खुलता। अस्र के समय ख़्वाजा नूरुद्दीन ‘अख़लाक़-ए-मिस्कवैह’ या कोई और पुस्तक पढ़ते थे। अस्र के बाद ख़्वाजा कामगार ख़ान संतों की जीवनियाँ पढ़ते और सभा के लोग चुपचाप सुनते थे। मग़रिब के बाद वे अपने कमरे में चले जाते, जहाँ केवल ख़ास लोगों को प्रवेश मिलता था। इशा की नमाज़ की जमाअत में वे बाहर आते, फिर कमरे में लौटकर पूरी रात इबादत में लगे रहते। हर नमाज़ के बाद वे ज़िक्र की सभा करते, जिसमें लगभग 300 से 500 लोग शामिल होते थे। वे सुन्नत के पालन में बहुत सख़्त थे।
वेशभूषा और स्वभाव
वे पहनावे की परवाह नहीं करते थे। जो मिल जाता, पहन लेते। उनके कपड़ों में हमेशा कई पैबंद होते थे और वे मिट्टी के रंग में रंगे कपड़े पसंद करते थे। जुमे की नमाज़ के लिए वे झालरदार चोग़ा और पगड़ी पहनते थे और घर में टोपी-पगड़ी पहनते थे। जुमे की नमाज़ के लिए वे हमेशा पैदल जाते थे, कभी-कभी किसी से घोड़ा माँग लेते थे।
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी का आचरण सभी के लिए सरल और विनम्र था, चाहे व्यक्ति जाना-पहचाना हो या अजनबी। हर आने वाले को वे कुछ खाने को देते, और घर में कुछ न होता तो इत्र दे देते। उनके पास से कोई ख़ाली हाथ नहीं लौटता था। वे दानशीलता और उदारता के लिए प्रसिद्ध थे। उन्हें कभी आलथी-पालथी मारकर बैठे नहीं देखा गया, वे हमेशा दो-ज़ानू (घुटने मोड़कर) बैठते थे। वे वाद-विवाद पसंद नहीं करते थे। कोई समस्या लेकर आता तो वे उसे किसी पुस्तक का अध्ययन करने को कहते। वे कभी अकेले भोजन नहीं करते थे।
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी की शिक्षाएँ
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी का जीवन सादगी की मिसाल था। उनकी नसीहतों का सार यह था कि किसी को कष्ट देना बड़ा पाप है और उससे बचना चाहिए। ख़ामोशी पसंद करनी चाहिए और ज़रूरत के अनुसार ही बोलना चाहिए। जीवन सादगी का नमूना होना चाहिए।
राजाओं से दूरी
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी राजाओं और शासकों से दूर रहते थे और उनसे मिलते नहीं थे। यदि कोई भेंट स्वीकार भी करते, तो उसे तुरंत ग़रीबों और ज़रूरतमंदों में बाँट देते और अपने या अपने रिश्तेदारों के पास कुछ नहीं रखते थे। एक परंपरा के अनुसार शाह कलीमुल्लाह का निर्देश था कि लोगों का दिल न टूटे, इसलिए यदि कोई सच्चे मन से भेंट लाए तो उसे स्वीकार करके ग़रीबों को दे देना।
समा की सभाएँ
समा के मामले में वे अपने गुरु के नियमों का पालन करते थे और समय, स्थान और शिष्यों का ध्यान रखते थे। सभा में आदर और सावधानी का विशेष ध्यान रहता था। हर जुमे की नमाज़ के बाद समा की सभा होती थी। उसमें कोई न कोई ज़रूरतमंद अवश्य उपस्थित रहता और उनकी कृपा से उसकी मुराद पूरी होती।
एक बार किसी संत के उर्स के अवसर पर समा की सभा हुई। एक पेशेवर गायक अरबी कविता सुनाने लगा तो एक मौलवी साहब उठकर आपत्ति करने लगे। शेख़ ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, पर वे संतुष्ट नहीं हुए। शेख़ ने आतिथ्य का व्यवहार करते हुए कहा कि यह समा का समय है, बहस का नहीं। उन्होंने मौलवी से नाम पूछा तो उसने ‘अब्दुल ग़नी’ बताया। शेख़ ने कहा कि दरवेश से झूठा नाम बताना अच्छा नहीं, तब उसने अपना नाम ‘अब्दुल्लाह’ बताया और चुप हो गया।
तीन दिन बाद मौलवी साहब उनसे मिलने आए। शेख़ ने कहा कि समा के समय बहस करना शिष्टाचार के विरुद्ध है, अब अपनी बात कहें तो मैं समझाऊँ। मौलवी ने कहा कि वे तो उसी समय बात समझ गए थे और अब क्षमा माँगने आए हैं। शेख़ ने मुस्कुराकर फिर नाम पूछा। जब उसने ‘अब्दुल्लाह’ बताया, तो शेख़ ने कहा कि आपका नाम न अब्दुल ग़नी है, न अब्दुल्लाह। फिर उन्होंने उनका असली नाम, घर और गली का पता और पढ़ाई का स्थान बता दिया। यह सुनकर मौलवी साहब उनके पैरों में गिर पड़े और सच्चे मन से उनके मुरीद बन गए।
शिष्यों का प्रशिक्षण
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी अपने गुरु के निर्देश पर शिष्यों का आध्यात्मिक प्रशिक्षण करते थे। उनका कहना था कि मनुष्य की सृष्टि का उद्देश्य केवल इबादत है। वे शिष्यों के दैनिक वज़ीफ़ों (नियमित पाठ) पर बहुत ध्यान देते, आधी रात को शिष्यों को देखने जाते और सोने वालों को जगाते थे। प्रशिक्षण में वे आत्मा की शुद्धि और ज़िक्र-ए-जहरी पर बहुत ज़ोर देते थे। उनका कहना था कि इन्हीं से बातिन (आंतरिक) की तालीम संभव है। वे शिष्यों को पीर का अनुसरण और अदब (शिष्टाचार) भी सिखाते थे।
वे कहते थे कि नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी अपने शिष्यों को प्रशिक्षण के लिए मारते थे, फिर भी शिष्य उन्हें छोड़कर नहीं जाते थे। अब ऐसा समय आ गया है कि पीर कुछ कह दे तो शिष्य नाराज़ होकर उसे छोड़ देता है। वे अहंकार पसंद नहीं करते थे और तसबीह नहीं रखते थे। उनका कहना था कि तसबीह उनके भीतर ही है। जिसके पास बातिन की तसबीह हो, वह ज़ाहिरी तसबीह नहीं थामता।
मुरीद और ख़लीफ़ा
इतिहासकारों के अनुसार उनके लगभग एक लाख मुरीद थे। इनमें से लगभग 300 को उन्होंने अपनी कृपा से साहिब-ए-हाल व कमाल (आध्यात्मिक अवस्था और पूर्णता वाला) बना दिया। उनके तेरह ख़लीफ़ा थे, जिनमें सबसे प्रमुख उनके पुत्र मौलाना फ़ख़रुद्दीन मुहिब्बुन नबी देहलवी थे। अन्य प्रसिद्ध ख़लीफ़ाओं में ये नाम आते हैं, जिनकी क़ब्रें औरंगाबाद में हैं: ख़्वाजा कामगार ख़ान, मुहम्मद अली, ख़्वाजा नूरुद्दीन, सैयद शाह शरीफ़, शाह ग़रीबुल्लाह, शाह इसहाक़ुल्लाह, ग़ुलाम क़ादिर ख़ान, मुहम्मद जाफ़र, मुहम्मद यार बेग, शेर मुहम्मद, करम अली शाह, इमामुद्दीन, शेख़ महमूद और हाफ़िज़ मौदूद।
करामात (चमत्कारों की परंपरागत कथाएँ)
परंपरा में उनके कई करामात बताए जाते हैं। ये कथाएँ श्रद्धा पर आधारित हैं, इतिहास-ग्रंथों में इनके प्रमाण की जाँच आवश्यक है।
कुष्ठ रोग का उपचार
उनके एक मुरीद की पत्नी को कुष्ठ रोग था, जिसे हकीमों ने असाध्य बताया था। वह व्यक्ति दुआ के लिए आया। शेख़ उस समय वुज़ू कर रहे थे। उन्होंने वुज़ू का बचा पानी रोज़ पिलाने और वुज़ू की जगह की भीगी रेत घावों पर लगाने को कहा। उसने ऐसा किया और एक सप्ताह में उसकी पत्नी पूरी तरह स्वस्थ हो गई। कहा जाता है कि कमज़ोर नज़र वालों की आँखों में वे अपना थूक लगा देते तो अल्लाह की कृपा से रोशनी ठीक हो जाती थी।
शोलापुर में वर्षा
शोलापुर में ठहरने के दौरान अकाल पड़ा। वहाँ के गवर्नर मेहदी ख़ान की प्रार्थना पर उन्होंने दुआ की और बारिश हुई। एक और कथा में किसी वर्ष वर्षा न होने से पशु मरणासन्न हो गए थे और उनकी दुआ से भारी वर्षा हुई।
आईने और कीमिया की कथा
एक व्यक्ति ने फ़क़्र (दरवेशी) के बारे में पूछा तो शेख़ ने उत्तर नहीं दिया। उसके आग्रह पर उन्होंने आईना मँगवाकर उसे देखने को कहा। उस व्यक्ति को अपना चेहरा जंगली जानवर जैसा दिखा। शेख़ ने कहा कि जैसा तुम्हारा बातिन है, वैसे ही तुम आईने में दिखते हो। तब उसने कहा कि उसके पास कीमिया है, जिससे तांबे को सोना बनाया जा सकता है। उसने 52 तोले के एक नारियल से राख निकालकर पिघले तांबे पर डाली तो वह सोना बन गया। शेख़ ने कहा कि यह मुश्किल रास्ता है, तांबे का एक टुकड़ा दो, मैं आसान तरीक़ा दिखाता हूँ। उन्होंने उस पर अपना थूक डाला तो वह सोना बन गया। उसने रहस्य पूछा तो उन्होंने कहा कि यह अल्लाह के नाम की बरकत है। वह व्यक्ति उनका मुरीद बन गया।
एक वर्ष बाद उसने कहा कि इबादत के बावजूद उसे इल्म-ए-बातिन नहीं मिला। शेख़ ने कहा कि तुमने अब तक वह नारियल अपने पास रखा है, इसी कारण तुम्हें फ़ैज़ नहीं मिल रहा। दरवेश को सदा ख़ुदा पर भरोसा रखना चाहिए। यह सुनकर उसने नारियल कुएँ में फेंक दिया और उसी रात अल्लाह ने उसे अपनी कृपा से नवाज़ दिया।
आसफ़ जाह प्रथम से संबंध
मुबारिज़ ख़ान पर विजय की दुआ
जब नवाब क़मरुद्दीन अली ख़ान निज़ामुल मुल्क आसफ़ जाह प्रथम दक्कन आए, तो उन्हें सूबेदार मुबारिज़ ख़ान की विशाल सेना का सामना करना पड़ा, जबकि उनकी सेना बहुत छोटी थी। वे विजय की दुआ के लिए शेख़ के पास आए और कोई निशानी माँगी। शेख़ ने कहा कि जुमेरात (बृहस्पतिवार) को तुम्हारे सभी खेमों पर चंदन के रंग के खुले हाथ के निशान दिखेंगे, वही तुम्हारी विजय की निशानी होगी। उस दिन सचमुच सभी खेमों पर ऐसे निशान प्रकट हुए और नवाब ने मुबारिज़ ख़ान पर विजय पाई। इसका विवरण ‘तज़किरा-ए-सलातीन’ (भाग 3) में मिलता है।
आधे राज्य का प्रस्ताव
विजय के बाद नवाब ने शेख़ को एक काग़ज़ दिया, जो आधा राज्य देने का प्रमाणपत्र था। शेख़ ने उसे लौटा दिया और कहा कि जब दरवेश पूरे को स्वीकार नहीं करता तो आधे का क्या करे। उन्होंने कहा कि वे रोज़ नए दिन के लिए नया रिज़्क़ अल्लाह पर भरोसे से पाते हैं, और इसी भरोसे के कारण तुम दक्कन के शासक बने।
मुहर की कथा
जब नवाब औरंगाबाद में रहने लगे तो शेख़ ने कहा कि तुम्हारे यहाँ रहने से दरवेश को कठिनाई होगी, क्योंकि लोग सिफ़ारिश के लिए आएँगे। इसलिए बेहतर है कि तुम दक्कन के दूसरे हिस्से में चले जाओ। नवाब ने कहा, ‘मेरा तख़्त आपके चरणों में है।’ फिर उसने शेख़ को एक मुहर भेंट की, ताकि ज़रूरतमंद आएँ तो उनके काग़ज़ पर मुहर लगा दी जाए। शेख़ ने कहा कि उनके पास मुहर लगाने का समय नहीं है। जो ग़ैब से पाता है, वह इसका क्या करेगा। तब नवाब ने कामगार ख़ान को आदेश दिया कि मुहर शेख़ के घर के दरवाज़े पर टाँग दी जाए।
एक बार किसी ने एक लाख रुपये के क़र्ज़ का जाली काग़ज़ बनाया, जिसमें लिखा था कि शेख़ ने यह रक़म ली है और राजकोष से लौटाई जाए। उस पर मुहर लगाकर वह नवाब के पास पहुँचा। नवाब हाथ जोड़कर शेख़ के पास आए और बोले कि आपने मुझे सेवा के योग्य नहीं समझा और किसी अजनबी से क़र्ज़ ले लिया। शेख़ ने कहा कि क़र्ज़ मैंने नहीं लिया, मुहर तुम्हारी है। मैंने पहले ही कहा था कि मुहर की ज़रूरत नहीं, पर तुम नहीं माने। अब एक लाख रुपये दे दो और अपनी मुहर यहाँ से हटा लो। रक़म उस झूठे व्यक्ति को दे दी गई और मुहर हटा ली गई।
इमारत की कथा
कुछ दिन बाद नवाब ने शेख़ के लिए तीन लाख रुपये की लागत से इमारत बनवाने की इच्छा जताई। शेख़ ने कहा कि इतनी बड़ी रक़म उन्होंने कभी देखी नहीं, ज़रा सामने लाओ। ख़ज़ांची हज़ार-हज़ार सिक्कों की थैलियाँ लेकर आया और शेख़ ने सारी रक़म ग़रीबों और ज़रूरतमंदों में बाँट दी। नवाब चुप रहे। बाद में उन्होंने कहा कि आपने रक़म देखने को माँगी थी, पर बाँट दी। शेख़ ने पूछा कि इमारत कितने वर्ष में बनती। नवाब ने कहा तीन-चार साल में। शेख़ ने कहा कि मैंने तुम्हारा काम आसान किया, वह इमारत तीन घंटे में बन गई। तुम्हारी इच्छा भी पूरी हुई और मेरा उद्देश्य भी। वह इमारत वहीं बनी है जहाँ उसकी ज़रूरत थी और समय के प्रभाव से नष्ट नहीं होगी।
‘आसफ़ जाह’ उपाधि और निज़ाम सल्तनत की परंपरा
जब नवाब को दिल्ली के बादशाह से ‘आसफ़ जाह’ की उपाधि मिली, तो वे शेख़ के पास आए और उसे लौटाने की इच्छा जताई, क्योंकि शेख़ ने उनसे कभी कुछ स्वीकार नहीं किया था। शेख़ कुछ देर चुप रहे और बोले कि यह बात इतिहास में दर्ज न हो, इसकी ज़िम्मेदारी तुम पर है। नवाब ने वचन दिया और कहा कि जो राज्य शेख़ ने उन्हें दिया है, वह शेख़ के नाम से जाना जाएगा और उसका रंग शेख़ की दरगाह की तरह पीला होगा। इस प्रकार यह राज्य ‘निज़ाम सल्तनत’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ और पीला रंग उसका राजकीय रंग बना। (यह परंपरागत कथा है, इतिहास-ग्रंथों में इसके प्रमाण की जाँच ज़रूरी है।)
विवाह और संतान
दक्कन आने के समय शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी अविवाहित थे और औरंगाबाद में भी कुछ समय अविवाहित रहे, क्योंकि गुरु शाह कलीमुल्लाह का निर्देश था कि ज़रूरत न हो तो विवाह न करें। बाद में स्वास्थ्य को देखते हुए गुरु ने विवाह की अनुमति दे दी।
पहली पत्नी से उनके चार पुत्र और चार पुत्रियाँ हुईं। चारों पुत्रियों की क़ब्रें उनके मक़बरे के पायताने की ओर हैं। पुत्रों में से एक कलकत्ता चला गया और वहीं बस गया। कहा जाता है कि उसकी संतानें वहाँ मौजूद हैं।
पहली पत्नी के निधन के बाद उन्होंने हज़रत सैयदा बेगम साहिबा से विवाह किया, जो ख़्वाजा बंदा नवाज़ गेसूदराज़ की परपोती थीं। उनसे एक पुत्र हुए, मौलाना फ़ख़रुद्दीन मुहम्मद, जो आगे चलकर मुस्लिम समाज का गौरव बने। माता के निधन के समय वे बहुत छोटे थे और पिता के निधन के समय उनकी आयु पंद्रह वर्ष थी। मौलाना फ़ख़रुद्दीन का निधन 17 जमादिउस्सानी 1199 हिजरी को 73 वर्ष की आयु में हुआ और उन्हें दिल्ली में हज़रत बख़्तियार काकी की दरगाह के परिसर में दफ़नाया गया।
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी के ग्रंथ
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी ने ‘निज़ामुल क़ुलूब’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी, जो सूफ़ी साधना और प्राणायाम (साँसों के नियंत्रण) जैसी पद्धतियों पर आधारित है। इसमें ज़ोर दिया गया है कि इस्लाम का प्रचार शुरू करने से पहले मुसलमानों को आध्यात्मिक रूप से ऊँचा उठना चाहिए। सच्चा प्रतिनिधि वही है जिसमें आध्यात्मिक पूर्णता हो, ताकि वह धर्म को केवल शब्दों से नहीं, आचरण और सिद्धांतों से भी फैला सके।
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी की एक उक्ति है: ‘अगर तुम बुद्धिमान हो तो पास-ए-अनफ़ास का ज़िक्र करते रहो, यानी हर साँस के साथ अल्लाह का स्मरण। इससे दोनों जहान में सफलता मिलेगी। यह ज़िक्र अल्लाह वालों की तलवार है, जिससे वे शैतान की गर्दन काटते हैं।’
निज़ामुद्दीन औरंगाबादी के जीवन पर लिखे ग्रंथ
नवाब क़मरुद्दीन निज़ामुल मुल्क आसफ़ जाह ने सबसे पहले उनके जीवन की घटनाओं पर ‘रश्क-ए-इरम’ नामक पुस्तक लिखी। इसे मौलवी रहीम बख़्श ने देखा, जिन्होंने हाजी वासिल (मौलाना फ़ख़रुद्दीन के ख़लीफ़ा) के साथ ‘शजरतुल अनवार’ लिखी। ख़्वाजा कामगार ख़ान ने ‘अहसनुश शामिल’ लिखी। उनका जीवन-वृत्त ‘मनाक़िब-ए-फ़ख़रिया’, ‘मशायख़-ए-चिश्त’, ‘तज़किरा-ए-औलिया-ए-दक्कन’, ‘फ़ख़रुत तालिबीन’, ‘सैरुल औलिया’, ‘ख़ज़ीनतुल असफ़िया’ और ‘क़तीम सुलैमानी’ में भी मिलता है।
निधन और मज़ार
उनका निधन 12 ज़ीक़ादा 1142 हिजरी (28 जून 1730 ई.) को 82 वर्ष की आयु में औरंगाबाद में हुआ। उन्हें अपने मक़बरे के परिसर में दफ़नाया गया। उनका मज़ार औरंगाबाद (अब छत्रपति संभाजीनगर) के शाहगंज इलाक़े में है। नवाब मीर क़मरुद्दीन ख़ान निज़ामुल मुल्क आसफ़ जाह ने उनके मक़बरे और मस्जिद का निर्माण कराया। आसफ़ जाह प्रथम का निधन 1748 ई. में हुआ। हर वर्ष इस्लामी कैलेंडर के ज़ीक़ादा महीने में उनका उर्स बड़े पैमाने पर मनाया जाता है, जिसमें देश-विदेश से हर धर्म के लोग श्रद्धा के साथ शामिल होते हैं।
आध्यात्मिक वंश-परंपरा
शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया औरंगाबादी ‘चिश्ती कलीमी’ सिलसिले के शेख़ थे। शाह कलीमुल्लाह जहानाबादी के बाद की आध्यात्मिक वंशावली में उनका नाम कई शजरों (वंशवृक्षों) में मिलता है, जैसे फ़ख़री निज़ामी चिश्ती और फ़ख़री निज़ामी चिश्ती महरावी शजरे में। उनके नाम से जुड़ी शृंखला मौलाना फ़ख़रुद्दीन से आगे बढ़ी।


