हिब्रू सभ्यता
पाश्चात्य सभ्यताओं में हिब्रू सभ्यता का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, परंतु इसका महत्त्व इसकी भौतिक या सांस्कृतिक उपलब्धियों से अधिक विश्व इतिहास और धार्मिक परंपराओं पर पड़े इसके गहरे प्रभाव के कारण है। एच. जी. वेल्स के अनुसार यह सभ्यता अपने लिए नहीं, बल्कि परवर्ती विश्व सभ्यता को प्रभावित करने के कारण अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसका उदय लगभग 1200 ईसा पूर्व कनान की भूमि (वर्तमान इज़राइल और फ़िलिस्तीन) में हुआ। यह क्षेत्र उर्वर अर्धचंद्राकार प्रदेश के दक्षिण-पश्चिमी भाग में लेवांत में स्थित था और एशिया, यूरोप तथा अफ्रीका के व्यापारिक मार्गों का संगम होने के कारण रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण था। प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से यह क्षेत्र समृद्ध नहीं था, क्योंकि पर्याप्त वर्षा और खनिज संपदा के अभाव में इसका अधिकांश भाग शुष्क और कम उपजाऊ था। फिर भी प्राचीन काल में यहाँ अपेक्षाकृत अधिक वर्षा होती थी और बाइबिल में इसे ‘दूध और मधु की भूमि’ कहा गया है। इस सभ्यता की शुरुआत पितृपुरुषों अब्राहम, इसहाक और याकूब से हुई। बाद में मूसा ने हिब्रू लोगों को मिस्र की दासता से बाहर निकाला और प्रसिद्ध ‘दस आज्ञाएँ’ स्थापित कीं। कनान में इन लोगों ने इज़राइल और यहूदा नामक राज्यों की स्थापना की, किंतु 586 ईसा पूर्व में बेबीलोन के आक्रमण और 70 ईस्वी में रोमन सेनापति टाइटस द्वारा यरूशलेम के विनाश के साथ इनका राजनीतिक पतन हो गया और बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। मिस्र, मेसोपोटामिया और यूनान जैसी सभ्यताओं में जहाँ अनेक देवी-देवताओं की पूजा होती थी, वहीं हिब्रू सभ्यता के लोग एकेश्वरवाद को मानते थे। इसका मुख्य धर्मग्रंथ ‘हिब्रू बाइबल’ (ओल्ड टेस्टामेंट) है, जिसमें ‘टोरा’ और अन्य ऐतिहासिक गाथाएँ सम्मिलित हैं। इस प्रकार हिब्रू सभ्यता विशाल सेनाओं या भव्य पिरामिडों के लिए नहीं, बल्कि अपने नैतिक, धार्मिक और कानूनी विचारों के लिए विश्व इतिहास में प्रसिद्ध है।
भौगोलिक स्थिति
फिलिस्तीन का उत्तरी भाग आज भी पर्वतीय घाटियों तथा उपजाऊ भूमि के कारण कृषि के लिए अनुकूल है। यहाँ गेहूँ, जौ, राई, अंजीर तथा अंगूर जैसी फसलों का उत्पादन होता था। यद्यपि इसके उत्तरी समुद्री तट पर कुछ उपयोगी बंदरगाह थे, परंतु उन पर फिनीशियनों का अधिकार होने के कारण हिब्रू उनका पूर्ण लाभ नहीं उठा सके। इसके बावजूद, फिलिस्तीन की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। यह मिस्र, मेसोपोटामिया, असीरिया, एशिया माइनर तथा फिनीशिया के मध्य स्थित होने के कारण एशिया और अफ्रीका को जोड़ने वाला प्रमुख स्थल-मार्ग बन गया था।
इस भौगोलिक स्थिति से हिब्रुओं को व्यापारिक और सांस्कृतिक दोनों प्रकार के लाभ हुए। वे विभिन्न सभ्यताओं के संपर्क में आए, जिससे उनकी संस्कृति में विविध तत्त्वों का समन्वय हुआ। दूसरी ओर यही स्थिति उनके लिए संकट का कारण भी बनी। मिस्र और मेसोपोटामिया जैसे शक्तिशाली साम्राज्यों के बीच स्थित होने के कारण उन्हें बार-बार विदेशी आक्रमणों, राजनीतिक संघर्षों और सत्ता-संघर्ष का सामना करना पड़ा। अपने अस्तित्व और सुरक्षा के लिए उन्हें समय-समय पर इन शक्तिशाली राज्यों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने पड़ते थे।
ऐतिहासिक स्रोत
हिब्रू सभ्यता के इतिहास की जानकारी साहित्यिक तथा पुरातात्त्विक दोनों प्रकार के स्रोतों से मिलती है। साहित्यिक स्रोतों में बाइबिल का ओल्ड टेस्टामेंट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। यह ग्रंथ 39 पुस्तकों (बुक्स) में विभाजित है और हिब्रू समाज, धर्म तथा राजनीतिक इतिहास का प्रमुख आधार है। यद्यपि इसकी ऐतिहासिकता को लेकर विद्वानों में मतभेद है, फिर भी इसे पूर्णतः असत्य नहीं माना जा सकता है। पारंपरिक हिब्रू और ईसाई इसमें वर्णित घटनाओं को ऐतिहासिक सत्य मानते हैं, जबकि अनेक आधुनिक इतिहासकार इन्हें पौराणिक, प्रतीकात्मक तथा अतिरंजित बताते हैं। सामान्यतः बाइबिल के सभी विवरण शाब्दिक रूप से ऐतिहासिक नहीं हैं, फिर भी इसकी मूल ऐतिहासिक परंपराएँ पर्याप्त विश्वसनीय हैं।
पुरातात्त्विक स्रोत भी हिब्रू इतिहास के पुनर्निर्माण में उपयोगी हैं, जिनमें 850 ईसा पूर्व का प्रसिद्ध मेशा शिलालेख तथा टेल एद-दुवैर (लाकीश) से प्राप्त उत्खनन सामग्री विशेष उल्लेखनीय हैं। इस स्थल पर 1932 ई. में उत्खनन प्रारंभ हुआ था, किंतु 1938 ई. में उत्खनन निदेशक जे. एल. स्टार्की की मृत्यु के बाद कार्य रोक दिया गया। इन उत्खननों से प्राप्त साक्ष्य ओल्ड टेस्टामेंट के बुक ऑफ किंग्स में वर्णित अनेक घटनाओं की ऐतिहासिक पुष्टि करते हैं तथा हिब्रू सभ्यता के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझने में सहायक हैं।
हिब्रुओं की प्रजाति एवं उनका नामकरण
हिब्रू मूलतः सेमिटिक (सामी) जाति-समूह की एक शाखा थे। प्रारंभ में वे अरब के मरुस्थलीय क्षेत्रों में यायावर जीवन व्यतीत करते थे। माना जाता है कि द्वितीय सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान वे क्रमशः फिलिस्तीन (कैनान) में आकर बस गए। ‘हिब्रू’ शब्द की उत्पत्ति के संबंध में अनेक मत प्रचलित हैं। सामान्यतः इसका अर्थ ‘फरात नदी के उस पार रहने वाला’ माना जाता है। बाइबिल में कैनान के निवासी अब्राम को ‘इब्री’ कहा गया है। ‘इब्री’ शब्द का ही विकसित रूप आगे चलकर ‘हिब्रू’ बन गया। मेसोपोटामिया तथा मिस्र के टेल-एल-अमरना अभिलेखों में इन्हें ‘हबीरु’ या ‘हापिरु’ कहा गया है। इस शब्द का अर्थ सामान्यतः यायावर, सीमांतवासी अथवा घुमंतू समुदाय है। अभिलेखीय साक्ष्यों से भी यह स्पष्ट होता है कि प्रारंभ में यह शब्द किसी विशेष जाति के लिए नहीं, बल्कि भ्रमणशील समुदायों के लिए प्रयुक्त होता था। कालांतर में यही नाम फिलिस्तीन में बसने वाले हिब्रू समुदाय के लिए प्रचलित हो गया।
हिब्रुओं के लिए ‘ज्यू’ अथवा ‘यहूदी’ शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। ‘ज्यू’ शब्द लैटिन के ‘जूडेयुस’ से बना है, जिसका अर्थ ‘जूदा प्रदेश का निवासी’ है। प्रारंभ में यह संज्ञा मूलतः दक्षिणी यहूदा (जूडाह) राज्य के निवासियों के लिए प्रयुक्त होती थी। बाद में यह समस्त हिब्रू समुदाय का पर्याय बन गई और व्यापक रूप से इसी अर्थ में प्रयुक्त होती है।
राजनीतिक इतिहास
हिब्रुओं के प्रारंभिक इतिहास का मुख्य आधार बाइबिल की प्रथम पाँच पुस्तकें हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘पेंटाट्यूक’ कहा जाता है। इनमें उल्लिखित जेनिसिस (उत्पत्ति) के अनुसार हिब्रुओं के प्रमुख पूर्वज अब्राहम (इब्राहीम) थे, जिनका प्रारंभिक नाम अब्राम था। परंपरा के अनुसार वे मेसोपोटामिया के कैल्डिया प्रदेश स्थित उर नगर के निवासी थे तथा एक यायावर प्रधान थे। ईश्वर की आज्ञा से वे अपने परिवार सहित हरान होते हुए कैनान पहुँचे। उस समय इस क्षेत्र में कैनानी जातियाँ निवास करती थीं। बाइबिल के अनुसार ईश्वर ने अब्राहम से वादा किया कि जिस भूमि में वे रह रहे थे, वह एक दिन उनके वंशजों को दी जाएगी। इसी कारण हिब्रू लोग फिलिस्तीन को ईश्वर द्वारा प्रदत्त भूमि मानते हैं।
बाइबिल के अनुसार बाद में कैनान में भीषण अकाल पड़ गया। भोजन और आजीविका की खोज में अब्राहम का परिवार मिस्र के नील डेल्टा क्षेत्र की ओर चला गया। यद्यपि इस प्रव्रजन का स्पष्ट उल्लेख बाइबिल के अतिरिक्त अन्य समकालीन स्रोतों में नहीं मिलता है, फिर भी कुछ इतिहासकार इसे ऐतिहासिक परिस्थितियों के आधार पर संभावित मानते हैं। यह निश्चित नहीं है कि हिब्रू कब और किन परिस्थितियों में मिस्र पहुँचे तथा उन्हें वहाँ आश्रय क्यों मिला। एक मत के अनुसार उस समय मिस्र पर हिक्सोस शासकों का प्रभुत्व था। संभव है कि हिब्रुओं का एक समूह उन्हीं के साथ मिस्र पहुँचा हो तथा प्रशासनिक कार्यों में उनकी सहायता करता रहा हो।
कुछ विद्वानों ने ट्यूरिन राजसूची तथा अन्य मिस्री अभिलेखों में उल्लिखित नामों को हिब्रुओं से जोड़ने का प्रयास किया है, यद्यपि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है। मिस्र की एक समाधि के भित्तिचित्र में पश्चिमी एशिया से आए लोगों के एक समूह का चित्रण भी मिलता है, जिसे कुछ इतिहासकार हिब्रुओं अथवा उनसे मिलते-जुलते यायावर समुदायों से संबंधित मानते हैं। इसके अतिरिक्त, एक मिस्री सीमा अधिकारी के अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने एदोम क्षेत्र की बेदुइन जातियों को नील डेल्टा में बसने की अनुमति दी थी। इन साक्ष्यों से यह संकेत मिलता है कि प्राचीन मिस्र में पश्चिमी एशिया से आने वाले यायावर समुदायों का आगमन सामान्य घटना थी।
हिब्रुओं के मिस्र में निवास तथा वहाँ से उनके निष्क्रमण का विस्तृत वर्णन बाइबिल की ‘एक्सोडस’ (निर्गमन) पुस्तक में मिलता है। यद्यपि इसके सभी विवरणों की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं हो सकी है, फिर भी अधिकांश इतिहासकार यह स्वीकार करते हैं कि किसी समय सेमिटिक मूल के हिब्रू समुदाय का एक भाग मिस्र में निवास करता था। संभवतः वहाँ उन्हें पूर्ण नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं थे और वे श्रमजीवी अथवा दास-सदृश जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य थे। बाइबिल के अनुसार हिब्रू लगभग 430 वर्षों तक मिस्र में रहे। प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् फ्लिंडर्स पेट्री ने उनके मिस्र आगमन का समय लगभग 1650 ईसा पूर्व तथा वहाँ से निष्क्रमण का समय लगभग 1220 ईसा पूर्व बताया है। यद्यपि इन तिथियों पर सभी इतिहासकार एकमत नहीं हैं, फिर भी इन्हें प्राचीन परंपराओं के आधार पर महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
मूसा का आविर्भाव और प्रारंभिक जीवन
बाइबिल के अनुसार मिस्र के शासकों को हिब्रुओं की बढ़ती जनसंख्या से भय उत्पन्न हो गया। इसलिए उन्होंने उनके पुरुष शिशुओं की हत्या करने का आदेश दिया, जबकि कन्याओं को जीवित रहने दिया जाता था। इसी काल में मूसा का जन्म हिब्रू परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम अम्राम तथा माता का नाम योकेबेद (योखेबेद) था। उनकी बड़ी बहन मरियम और भाई हारून (आरोन) भी थे।
माता ने तीन माह तक मूसा को गुप्त रूप से सुरक्षित रखा, परंतु जब यह संभव नहीं रहा तो उन्हें नरकुल की एक टोकरी में रखकर नील नदी के किनारे छोड़ दिया। बाइबिल के अनुसार मिस्र के फ़ाराओ की पुत्री ने उस बालक को देखा और उसे अपने संरक्षण में ले लिया। मरियम ने बुद्धिमानी से अपनी ही माता को ही शिशु की धाय के रूप में नियुक्त करा दिया। इस प्रकार मूसा का पालन-पोषण प्रारंभ में अपनी माता ने ही किया। बाद में वे राजमहल में पले-बढ़े और उन्हें मिस्र की राजकीय शिक्षा प्राप्त हुई।
हिब्रुओं की मुक्ति का संकल्प
यद्यपि मूसा का पालन-पोषण राजमहल में हुआ, फिर भी उनकी सहानुभूति अपने हिब्रू समुदाय के साथ बनी रही। एक दिन उन्होंने एक मिस्री अधिकारी को हिब्रू श्रमिक के साथ कठोर व्यवहार करते देखा। क्रोध में उन्होंने उस अधिकारी की हत्या कर दी। जब यह घटना फ़ाराओ को ज्ञात हुई तो मूसा को मृत्युदंड दिए जाने का आदेश हुआ। परिणामस्वरूप वे मिस्र छोड़कर मिद्यान प्रदेश चले गए।
मिद्यान में मूसा ने वहाँ के याजक यित्रो (जेथ्रो) की पुत्री सिप्पोरा से विवाह किया और लंबे समय तक पशुपालन करते हुए शांत जीवन बिताया। बाइबिल के अनुसार इसी अवधि में सीनै पर्वत के समीप जलती हुई झाड़ी के माध्यम से ईश्वर ने उन्हें दर्शन देकर आदेश दिया कि वे हिब्रुओं को मिस्र की दासता से मुक्त कराएँ। इसके बाद मूसा अपने भाई हारून के साथ मिस्र लौटे और फ़ाराओ से हिब्रुओं को स्वतंत्र करने की प्रार्थना की, किंतु फ़ाराओ ने इसे अस्वीकार कर दिया।
दस विपत्तियाँ और हिब्रुओं का निष्क्रमण
बाइबिल के अनुसार फ़ाराओ के हठ के कारण ईश्वर ने मिस्र पर क्रमशः दस विपत्तियाँ भेजीं। इन विपत्तियों में नील का जल रक्तवत् हो जाना, टिड्डियों का प्रकोप, महामारी, अंधकार तथा अंत में प्रथम पुत्रों की मृत्यु जैसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है। इन आपदाओं से भयभीत होकर अंततः फ़ाराओ ने हिब्रुओं को मिस्र छोड़ने की अनुमति दे दी।
हिब्रू समुदाय मूसा के नेतृत्व में मिस्र से निकल पड़ा, किंतु कुछ समय बाद फ़ाराओ ने अपना निर्णय बदल दिया और सेना को उनके पीछे भेज दिया। बाइबिल के अनुसार लाल सागर (सरकंडों के समुद्र) के तट पर ईश्वर की सहायता से हिब्रू सुरक्षित पार निकल गए, जबकि उनका पीछा कर रही मिस्री सेना जल में डूब गई। धार्मिक परंपरा में यह घटना ईश्वरीय चमत्कार के रूप में वर्णित है, किंतु आधुनिक इतिहासकार इसे प्रतीकात्मक अथवा प्राकृतिक परिस्थितियों से जुड़ी घटना मानते हैं।
मूसा का नेतृत्व
मूसा केवल हिब्रुओं को मिस्र की दासता से मुक्त कराने वाले नेता ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने विभिन्न हिब्रू कबीलों को संगठित कर एक धार्मिक और सांस्कृतिक समुदाय के रूप में स्थापित करने का भी प्रयास किया। परंपरा के अनुसार उन्होंने सीनै पर्वत पर ईश्वर से दस आज्ञाएँ प्राप्त कीं, जो आगे चलकर यहूदी धार्मिक और नैतिक जीवन का आधार बनीं। बाइबिल में उल्लेख है कि मूसा लगभग 120 वर्ष तक जीवित रहे, किंतु उन्हें प्रतिज्ञात भूमि में प्रवेश करने का अवसर नहीं मिला। कनान पहुँचने से पूर्व ही मोआब प्रदेश के निकट नेबो पर्वत (पिसगा की चोटी) पर उनकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार उन्होंने हिब्रुओं को स्वतंत्रता का मार्ग तो दिखाया, परंतु स्वयं प्रतिज्ञात भूमि का प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कर सके।
निष्क्रमण की ऐतिहासिकता
मूसा और निष्क्रमण की कथा केवल बाइबिल तक सीमित नहीं है। ताल्मुद, रब्बियों की परंपराएँ तथा यहूदी धार्मिक साहित्य भी इस घटना का उल्लेख करते हैं। फिर भी मिस्र के समकालीन अभिलेखों में इस घटना का स्पष्ट विवरण नहीं मिलता है, जिससे इसकी ऐतिहासिकता विवादित रही है।
कुछ विद्वानों का मत है कि मिस्री अभिलेख सामान्यतः राजाओं की विजयों का वर्णन करते थे, पराजयों या अपमानजनक घटनाओं का नहीं। इसलिए यदि हिब्रुओं का पलायन मिस्र के लिए अपमानजनक था, तो उसका उल्लेख न किया जाना स्वाभाविक है। दूसरी ओर अनेक आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि बाइबिल की कथा में ऐतिहासिक घटनाओं के साथ धार्मिक और प्रतीकात्मक तत्त्व भी सम्मिलित हो गए हैं।
मिस्र के शासक रामेसेस द्वितीय के अभिलेखों में डेल्टा क्षेत्र में कुछ सेमिटिक समुदायों को बसाने का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार मेरनेप्ताह (लगभग 1213-1203 ई.पू.) के प्रसिद्ध शिलालेख (लगभग 1208 ई.पू.) में पहली बार ‘इज़राइल’ का उल्लेख प्राप्त होता है। यही कारण है कि अनेक इतिहासकार हिब्रुओं के निष्क्रमण का समय मेरनेप्ताह के शासनकाल के आसपास मानते हैं। यद्यपि यह निश्चित नहीं है कि यह घटना रामेसेस द्वितीय और मेरनेप्ताह में से किसके शासनकाल में हुई, फिर भी अधिकांश विद्वान इसे तेरहवीं शताब्दी ईसा पूर्व की घटना मानते हैं।
यहूदी इतिहासकार जोसेफस ने मिस्री इतिहासकार मनेथो के आधार पर लिखा है कि मिस्र से कुछ लोगों का निष्क्रमण महामारी और सामाजिक परिस्थितियों के कारण हुआ था तथा मूसा का संबंध मिस्र के पुरोहित वर्ग से था। यद्यपि मनेथो का विवरण बाइबिल से पूर्णतः मेल नहीं खाता है, फिर भी उससे यह संकेत मिलता है कि मिस्र से किसी सेमिटिक समुदाय के प्रस्थान की परंपरा प्रचलित थी।
कनान की ओर प्रस्थान और प्रारंभिक संघर्ष
मूसा की मृत्यु के बाद हिब्रुओं का नेतृत्व उनके उत्तराधिकारी यहोशू (जोशुआ) तथा अन्य प्रमुख नेताओं ने संभाला। बाइबिल की नंबर्स (गिनती) और जोशुआ पुस्तकों में कनान की ओर उनके अभियान का वर्णन मिलता है। उस समय कनान में कैनानी जातियाँ निवास करती थीं, जिन्होंने बेबिलोनिया, हित्ती तथा मिस्री सभ्यताओं के संपर्क से विकसित नगरीय संस्कृति स्थापित कर ली थी। उनके नगर मजबूत प्राचीरों से सुरक्षित थे और व्यापारिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र थे। लौह उपकरणों का प्रयोग, विकसित लेखन प्रणाली तथा हम्मूराबी की विधिक परंपराओं के प्रभाव से उनका सामाजिक और आर्थिक जीवन संगठित था।
धार्मिक दृष्टि से कैनानी समाज में अनेक देवी-देवताओं की पूजा होती थी। कुछ क्षेत्रों में नरबलि, मंदिर-आधारित वेश्यावृत्ति तथा अन्य ऐसी प्रथाओं का उल्लेख मिलता है, जिन्हें हिब्रू धार्मिक परंपरा ने अनुचित माना। इसी कारण हिब्रुओं और कैनानियों के बीच केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक संघर्ष भी हुए।
कनान पर अधिकार स्थापित करना हिब्रुओं के लिए सरल नहीं था। वे प्रारंभ में केवल छोटे और अपेक्षाकृत असुरक्षित नगरों पर ही अधिकार कर सके। यरूशलेम जैसे महत्त्वपूर्ण नगर पर उनका नियंत्रण कई शताब्दियों बाद स्थापित हुआ। इसी समय भूमध्यसागर के तटीय क्षेत्रों में फिलिस्तीनी (पलिश्ती) समुदाय भी आकर बस गया, जिन्हें मिस्री अभिलेखों में ‘पेलसेत’ कहा गया है। इन्हीं के नाम पर आगे चलकर इस प्रदेश का नाम ‘फिलिस्तीन’ पड़ा। फिलिस्तीनियों के आगमन से हिब्रुओं के विस्तार में नई बाधाएँ उत्पन्न हुईं और उन्हें समय-समय पर कैनानियों तथा फिलिस्तीनियों दोनों से संघर्ष करना पड़ा।
प्रारंभिक काल में हिब्रू समाज का नेतृत्व स्थानीय न्यायाधीशों (जजेज़) के हाथों में था, जो केवल राजनीतिक प्रमुख नहीं, बल्कि धार्मिक और सामाजिक नेता भी थे। निरंतर बाहरी आक्रमणों तथा आंतरिक संगठन की आवश्यकता को देखते हुए अंततः अंतिम न्यायाधीश सैमुएल ने हिब्रुओं के लिए राजतंत्र की स्थापना का समर्थन किया और सॉल (शाऊल) को उनका राजा अभिषिक्त किया। इसके साथ ही हिब्रू इतिहास में संगठित राजसत्ता का प्रारंभ हुआ।
सॉल (लगभग 1020–1000 ई.पू.)
हिब्रू राज्य के प्रारंभिक इतिहास में सॉल (शाऊल) को प्रथम राजा माना जाता है। उसका शासनकाल सामान्यतः लगभग 1020–1000 ईसा पूर्व माना जाता है। उस समय हिब्रुओं के प्रमुख शत्रु भूमध्यसागरीय मूल के फिलिस्तीनी (पलिश्ती) थे, जिन्होंने कनान के तटीय भागों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। वे सैन्य संगठन, लौह अस्त्र-शस्त्र तथा युद्ध-कौशल में हिब्रुओं से अधिक शक्तिशाली थे। इसके कारण हिब्रू जनजातियों के लिए उनका सामना करना कठिन था।
अंतिम न्यायाधीश सैमुएल द्वारा अभिषिक्त किए जाने के बाद सॉल ने बिखरी हुई हिब्रू जनजातियों को संगठित किया और एक सुदृढ़ सैन्य शक्ति का निर्माण किया। उसके नेतृत्व में हिब्रुओं ने प्रारंभिक चरण में फिलिस्तीनियों के विरुद्ध अनेक सफल अभियान चलाए और अपने राज्य की सुरक्षा को सुदृढ़ किया। सॉल के प्रयासों से हिब्रुओं में राजनीतिक एकता की भावना विकसित हुई और राजतंत्र की नींव मजबूत हुई।
किंतु शासन के उत्तरार्ध में सॉल के संबंध सैमुएल तथा उसके उत्तराधिकारी के रूप में उभर रहे डेविड से तनावपूर्ण हो गए। आंतरिक मतभेदों और राजनीतिक संघर्षों के कारण उनकी स्थिति कमजोर पड़ने लगी। अंततः फिलिस्तीनियों के विरुद्ध गिल्बोआ पर्वत के युद्ध (लगभग 1000-970 ई.पू.) में हिब्रू सेना को पराजय का सामना करना पड़ा, जिसमें सॉल स्वयं गंभीर रूप से घायल हो गया तथा उसके पुत्र मारे गए। बाइबिल के अनुसार उसने अपने शस्त्रवाहक से अपनी हत्या करने को कहा, परंतु उसके इनकार करने पर उसने अपनी तलवार पर गिरकर आत्महत्या कर ली। इस प्रकार उसके शासन का दुखद अंत हो गया और जॉर्डन के पश्चिम और यिज़्रेल घाटी के कई इज़राइली क्षेत्र पलिश्तियों के प्रभाव में चले गए।
डेविड या दाऊद (लगभग 1000-970 ई.पू.)
सॉल की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए उसके पुत्र ईशबोशेत (इश्बाल) ने उत्तर के हिब्रू प्रदेशों पर शासन किया, जबकि दक्षिण में यहूदा गोत्र ने डेविड को अपना राजा स्वीकार किया। कुछ वर्षों के राजनीतिक संघर्ष के बाद ईशबोशेत की हत्या हो गई और लगभग 1000 ईसा पूर्व में डेविड (दाऊद) संपूर्ण हिब्रू राज्य के शासक बन गया। दाऊद ने शाऊल और योनातान की मृत्यु पर प्रसिद्ध शोकगीत ‘धनुष का गीत’ रचा।
डेविड (दाऊद) का शासनकाल हिब्रू इतिहास का स्वर्णिम युग है। वह एक कुशल सेनानायक, दूरदर्शी शासक तथा सफल कूटनीतिज्ञ था। उसके नेतृत्व में हिब्रू राज्य का विस्तार पश्चिम में फिलिस्तीनी क्षेत्रों, पूर्व में मोआब और अम्मोन, दक्षिण में एदोम तथा उत्तर में सीरिया के कुछ भागों तक हुआ। उसने टायर तथा हमात जैसे पड़ोसी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किया, जिससे व्यापार और सामरिक सहयोग दोनों को बढ़ावा मिला।
डेविड की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यरूशलेम (जेरूसलम) पर अधिकार कर उसे राज्य की राजधानी बनाना थी। उसने इसे राजनीतिक तथा धार्मिक दोनों दृष्टियों से हिब्रू राज्य का प्रमुख केंद्र बनाया, जिससे विभिन्न जनजातियों के बीच एकता को बल मिला और राज्य का प्रशासन अधिक संगठित हुआ।
डेविड का व्यक्तित्व अनेक विरोधाभासों से युक्त था। एक ओर वह साहसी योद्धा, कुशल शासक, वीणा-वादक तथा उत्कृष्ट कवि माना जाता है, वहीं दूसरी ओर उसके जीवन से जुड़े कुछ विवादास्पद प्रसंग भी बाइबिल में वर्णित हैं। उरियाह और उसकी पत्नी बतशेबा से संबंधित घटना तथा उसकी कठोर सैन्य नीतियों की आलोचना भी की जाती है। इसके बावजूद धार्मिक परंपराओं में उसे ‘ईश्वर का प्रिय राजा’ और ‘आदर्श शासक’ बताया गया है।
अपने शासन के अंतिम वर्षों में डेविड को विशाल सेना, निर्माण कार्यों तथा प्रशासनिक व्यवस्था के संचालन के लिए करों में वृद्धि करनी पड़ी, जिससे राज्य के विभिन्न भागों में असंतोष उत्पन्न हुआ और कुछ विद्रोह भी हुए। लगभग चालीस वर्ष तक शासन करने के बाद उसकी मृत्यु हो गई। उसके पश्चात उसके पुत्र सोलोमन (सुलैमान) ने सिंहासन ग्रहण किया और हिब्रू राज्य के समृद्धि तथा वैभव के नए युग की शुरुआत हुई।
सुलैमान या सोलोमन (लगभग 970–931 ई.पू.)
सुलैमान (सोलोमन) हिब्रू संयुक्त राज्य का अंतिम महान शासक था। उसका शासनकाल हिब्रू इतिहास में समृद्धि, वैभव और सांस्कृतिक उत्कर्ष का काल था। यहूदी, ईसाई तथा इस्लामी परंपराओं में सुलैमान को बुद्धिमान, न्यायप्रिय और वैभवशाली शासक के रूप में याद किया जाता है। भारतीय परंपरा में जिस प्रकार चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य को आदर्श सम्राट माना जाता है, उसी प्रकार पश्चिमी धार्मिक परंपराओं में सुलैमान का स्थान अत्यंत सम्मानित है।
सुलैमान ने शासन संभालने के बाद अपने सभी संभावित प्रतिद्वंद्वियों को या तो समाप्त कर दिया अथवा उन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया, जिससे उसकी सत्ता पूरी तरह सुरक्षित हो गई। उसके शासनकाल में हिब्रू राज्य की राजनीतिक स्थिरता बनी रही, यद्यपि कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों पर उसका प्रभाव पहले की अपेक्षा कम हो गया।
सुलैमान का प्रशासन और विदेश नीति
सुलैमान एक कुशल प्रशासक, दूरदर्शी राजनीतिज्ञ और प्रभावशाली कूटनीतिज्ञ था। उसने पड़ोसी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए और युद्ध की अपेक्षा कूटनीति तथा व्यापार को अधिक महत्त्व दिया। फ़ीनीक़िया के प्रमुख नगर-राज्य सूर (टायर) के शासक हीराम प्रथम के साथ उसके घनिष्ठ संबंध थे। हीराम ने भवन-निर्माण, समुद्री व्यापार और शिल्पकला के विकास में सुलैमान की भरपूर सहायता की। यरूशलेम के प्रथम मंदिर के निर्माण के लिए हीराम ने देवदार और सनोबर की लकड़ी तथा कुशल कारीगर उपलब्ध कराए, जिसके बदले में सुलैमान ने उन्हें गेहूँ और जैतून का तेल दिया। बाद में सुलैमान ने गलील के बीस नगर भी हीराम को दिए, किंतु वे हीराम को पसंद नहीं आए।
उस समय मिस्र, असीरिया और बेबिलोनिया जैसे शक्तिशाली राज्यों के राजदरबार अत्यंत वैभवपूर्ण थे, जिनसे प्रभावित होकर सुलैमान ने भी अपने राज्य को समृद्ध और भव्य बनाने का प्रयास किया। उसने कर व्यवस्था को संगठित किया, प्रशासनिक इकाइयों का पुनर्गठन किया तथा व्यापारिक गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया। उसके शासन में हिब्रू राज्य पश्चिमी एशिया के प्रमुख व्यापारिक मार्गों से जुड़ गया।
व्यापार और आर्थिक समृद्धि
सुलैमान ने समुद्री और स्थलीय, दोनों प्रकार के व्यापार का विस्तार किया। दाऊद के समय से चले आ रहे सूर के साथ व्यापारिक संबंधों को उसने और सुदृढ़ किया। फ़ीनीक़ी नाविकों और व्यापारियों की सहायता से लाल सागर के तट पर स्थित एज़ियोन-गेबेर बंदरगाह से जहाज़ी बेड़े भेजे गए। बाइबिल के अनुसार ये जहाज़ ओफ़ीर नामक स्थान तक जाते थे और वहाँ से सोना, हाथीदाँत, बहुमूल्य लकड़ियाँ, बंदर और मोर जैसी वस्तुएँ लेकर लौटते थे। कुछ विद्वानों का मत है कि ओफ़ीर का संबंध भारतीय उपमहाद्वीप या हिंद महासागर के व्यापारिक क्षेत्रों से था, यद्यपि इसकी निश्चित पहचान आज भी विवादास्पद है।
कृषि उत्पादों, धातुओं तथा विलासिता की वस्तुओं के व्यापार से राज्य की आय में पर्याप्त वृद्धि हुई। इस समृद्धि के कारण यरूशलेम की गणना पश्चिमी एशिया के महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और व्यापारिक केंद्रों में होने लगी।
निर्माण कार्य और सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
सुलैमान ने निर्माण कार्यों का विशेष प्रोत्साहन दिया। उसने यरूशलेम के दुर्ग को सुदृढ़ करवाया, भव्य राजमहल का निर्माण कराया तथा यहूदी धर्म का प्रथम महान मंदिर (सोलोमन का मंदिर) बनवाया, जो कालांतर में यहूदी धार्मिक जीवन का प्रमुख केंद्र बन गया। इसके अतिरिक्त, उसने प्रशासनिक भवनों, किलों, भंडारगृहों, नगर-प्राचीरों तथा विशाल अश्वशालाओं का भी निर्माण कराया।
फिलिस्तीन में पर्याप्त पत्थर, उत्तम लकड़ी तथा अन्य निर्माण सामग्री उपलब्ध नहीं थी। इसलिए देवदार की लकड़ी, धातुएँ तथा कुशल शिल्पकार टायर और अन्य क्षेत्रों से लाए गए। इन निर्माण कार्यों से राज्य की प्रतिष्ठा तो बढ़ गई, किंतु राजकोष पर भारी आर्थिक बोझ भी पड़ा।
आर्थिक नीतियाँ और जन-असंतोष
विशाल निर्माण योजनाओं तथा राजकीय वैभव को बनाए रखने के लिए सुलैमान ने करों में वृद्धि की और बेगार (अनिवार्य श्रम) की व्यवस्था को व्यापक रूप दिया। बड़ी संख्या में लोगों को निर्माण कार्यों, खदानों तथा जंगलों में काम करने के लिए बाध्य किया गया। बाइबिल के अनुसार प्रत्येक तीसरे महीने लगभग तीस हजार श्रमिक टायर के शासक हिराम के लिए लकड़ी काटने और अन्य कार्यों में लगाए जाते थे।
निर्माण सामग्री और विदेशी वस्तुओं के आयात पर अत्यधिक व्यय होने के कारण राजकोष पर दबाव बढ़ता गया। एक अवसर पर हिराम को भुगतान के बदले सुलैमान को गलील क्षेत्र के बीस नगर सौंपने पड़े। इससे स्पष्ट होता है कि उसकी आर्थिक नीतियाँ राज्य के लिए अत्यधिक महँगी सिद्ध हुईं।
भारी करों, बेगार तथा अनिवार्य श्रम के कारण सामान्य जनता में असंतोष फैलने लगा। जहाँ राजदरबार और उच्च वर्ग विलासिता का जीवन व्यतीत कर रहे थे, वहीं किसान और श्रमिक आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे थे। इससे सामाजिक असमानता बढ़ी और धनी तथा निर्धन वर्ग के बीच तनाव बढ़ता गया।
सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव
सुलैमान के शासनकाल में यरूशलेम अभूतपूर्व समृद्धि और सांस्कृतिक विकास का केंद्र बन गया, किंतु यह समृद्धि पूरे राज्य में समान रूप से नहीं थी। शहरी क्षेत्रों में व्यापार और संपन्नता बढ़ी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों पर करों और श्रम का बोझ बढ़ता गया, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक असंतोष और वर्गीय तनाव बढ़ने लगे।
हिब्रू राज्य की जनजातीय संरचना भी इस असंतोष का एक प्रमुख कारण थी। उत्तरी जनजातियाँ व्यापारिक मार्गों के निकट होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध और बाहरी संस्कृतियों से प्रभावित थीं। इसके विपरीत, दक्षिणी जनजातियाँ मुख्यतः कृषि पर आधारित थीं और पारंपरिक हिब्रू धार्मिक तथा सामाजिक मान्यताओं का पालन करती थीं। दोनों क्षेत्रों की आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों में बढ़ते अंतर ने राजनीतिक मतभेदों को जन्म दिया।
संयुक्त राज्य का विभाजन
लगभग 931 ईसा पूर्व में सुलैमान की मृत्यु के बाद उसका पुत्र रहबाम (रेहोबोआम) सिंहासन पर बैठा। उसने अपने पिता की कठोर आर्थिक नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं किया। जब उत्तरी जनजातियों ने करों और बेगार में कमी की माँग की, तब रेहोबोआम ने उनकी उपेक्षा की, जिसके परिणामस्वरूप व्यापक विद्रोह हुए और संयुक्त हिब्रू राज्य दो भागों में विभाजित हो गया।
इज़रायल और यहूदा
उत्तरी दस जनजातियों ने अलग होकर लगभग 931 ईसा पूर्व में इज़रायल नामक राज्य की स्थापना की, जिसकी राजधानी आगे चलकर समरिया बनी। इसलिए इसे समरिया का राज्य भी कहा गया। दक्षिण की दो प्रमुख जनजातियों ने यहूदा (जूडा) राज्य का गठन किया, जिसकी राजधानी यरूशलेम थी। इसके बाद लगभग दो शताब्दियों तक दोनों राज्यों का स्वतंत्र अस्तित्व बना रहा और हिब्रू इतिहास दो समानांतर राजनीतिक धाराओं में विकसित हुआ।
इज़रायल राज्य की स्थापना (लगभग 931 ई.पू.)
यारोबाम प्रथम (लगभग 931-910 ई.पू.)
हिब्रू संयुक्त राज्य के विभाजन के परिणामस्वरूप उत्तरी भाग में इज़रायल तथा दक्षिणी भाग में यहूदा (जूडा) राज्य की स्थापना हुई। इज़रायल राज्य का वास्तविक संस्थापक नबात (नेबत) का पुत्र यारोबाम प्रथम (लगभग 931-910 ई.पू.) था। उसने अपने राज्य की प्रारंभिक राजधानी शकेम (शेखेम) को बनाया। बाद में प्रशासनिक कारणों से राजधानी तिरज़ाह और अंततः समरिया स्थानांतरित की गई।
यारोबाम प्रथम ने राजनीतिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से धार्मिक नीति भी अपनाई। उसने उत्तरी सीमा पर दान में और दक्षिणी सीमा पर बेतेल में राजकीय पूजा-स्थलों की स्थापना की तथा वहाँ दो स्वर्ण-बछड़ों (वृषाकार प्रतीकों) की प्रतिष्ठा करवाई, जिससे उसके राज्य के लोगों को यरूशलेम स्थित मंदिर जाने की आवश्यकता न रहे। उसने गैर-लेवी लोगों को याजक भी बनाया और पर्व की तिथि भी बदल दी। इस नीति का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता के माध्यम से राजनीतिक एकता बनाए रखना था, यद्यपि बाइबिल के लेखकों ने इसकी कड़ी निंदा की है और इसे “यारोबाम का पाप” कहा है।
प्रारंभिक उत्तराधिकारी
यारोबाम प्रथम के बाद उसका पुत्र नादाब (लगभग 910–909 ई.पू.) उत्तरी राज्य इज़राइल का दूसरा राजा राजा बना, किंतु वह केवल दो वर्ष ही शासन कर सका। बाइबिल के अनुसार उसने अपने पिता की तरह बेतेल और दान की मूर्तिपूजा की परंपरा जारी रखी। लगभग 901-900 ई.पू.
नादाब पलिश्तियों के नगर गिब्बतोन का घेरा डाले हुए था, तभी इस्साकार गोत्र के बाशा नामक एक सेनानायक ने उसकी हत्या कर स्वयं सिंहासन पर अधिकार कर लिया। इससे इज़राइल में सत्ता-परिवर्तन के लिए हिंसक षड्यंत्रों की परंपरा आरंभ हुई। बाशा ने यारोबाम के पूरे घराने को समाप्त कर दिया, जिसे बाइबिल में शीलो के भविष्यवक्ता अहिय्याह की भविष्यवाणी की पूर्ति बताया गया है। इस प्रकार इज़राइल का पहला राजवंश दो राजाओं के बाद ही समाप्त हो गया। इसके बाद बाशा ने लगभग चौबीस वर्षों तक शासन किया। उसके शासनकाल में राजधानी तिरज़ाह रही तथा उसने राज्य को स्थिर करने का प्रयास किया।
बाशा के बाद उसका पुत्र एला (लगभग 886-885 ई.पू.) राजा बना, जिसकी राजधानी तिर्सा थी। परंतु दो वर्ष बाद ही उसके सेनापति जिम्री/ ज़िम्री ने उसकी हत्या कर दी और राजा बन गया। जिम्री ने बाशा के पूरे घराने का विनाश कर दिया, किंतु उसका शासन केवल सात दिन ही चल सका। सेना के प्रधान ओम्री ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। ज़िम्री ने पराजय निश्चित देखकर राजमहल में आग लगाकर आत्महत्या कर ली। इसके बाद ओम्री राजा बना और इज़राइल में एक प्रभावशाली राजवंश की नींव रखी।
ओम्री (लगभग 885–874 ई.पू.)
ओम्री (लगभग 885-874 ई.पू.) इज़राइल का छठा राजा और ओम्री राजवंश का संस्थापक था। गृहयुद्ध में उसका प्रतिद्वंद्वी तिबनी था, जिसे कई वर्षों के संघर्ष के बाद पराजित करके ओम्री पूरे राज्य का राजा बना। उसने शेमेर नामक व्यक्ति से दो टैलेंट चाँदी में पहाड़ी खरीदकर वहाँ नई राजधानी सामरिया (शोमरोन) बसाई, जो शीघ्र ही राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया।
ओम्री ने फ़ीनीक़िया के साथ गठबंधन सुदृढ़ किया और अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसने मोआब के कुछ क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित किया, जिसका उल्लेख मोआब के राजा मेशा के शिलालेख में मिलता है, यद्यपि वह दमिश्क के अरामी (अराम) राज्य को पराजित करने में सफल नहीं हो सका। अश्शूरी अभिलेखों में इज़राइल को “ओम्री का घराना” कहा गया है।
अहाब (लगभग 874–852 ई.पू.)
ओम्री के बाद उसका पुत्र अहाब (लगभग 874-852 ई.पू.) सिंहासन पर बैठा। उसका विवाह फ़ीनीक़िया के सीदोन नगर के शासक एतबाल की पुत्री ईज़ेबेल से हुआ था। अहाब और ईज़ेबेल ने इज़राइल में बाल देवता की पूजा को प्रोत्साहन दिया और सामरिया में बाल का मंदिर तथा वेदी बनवाई। इससे यहोवा (याहवे) के उपासकों और राजसत्ता के बीच धार्मिक संघर्ष उत्पन्न हुआ। इसी काल में प्रसिद्ध भविष्यवक्ता एलिय्याह और उनके उत्तराधिकारी एलीशा का उदय हुआ, जिन्होंने बाल-पूजा का विरोध किया और यहोवा की उपासना का समर्थन किया। अहाब ने दमिश्क के शासक बेन-हदद द्वितीय के साथ संघर्ष और संधि दोनों की। उसने अश्शूर के शक्तिशाली सम्राट शाल्मनेसेर तृतीय के विरुद्ध करकर के युद्ध (853 ई.पू.) में अन्य सीरियाई राज्यों के साथ भाग लिया। इसके कुछ समय बाद अराम के विरुद्ध रामोत-गिलाद के युद्ध में अहाब की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद मोआब ने विद्रोह कर दिया।
येहू वंश और इज़रायल का पतन
अहाब के उत्तराधिकारियों अहज्याह और योराम (जोरम) के शासनकाल में राजनीतिक अस्थिरता बनी रही। लगभग 842 ई.पू. में भविष्यवक्ता एलीशा द्वारा भेजे गए एक शिष्य ने सेनापति येहू का राज्याभिषेक किया और सेना ने उसे इज़राइल का राजा घोषित कर दिया। येहू ने योराम की हत्या कर ओम्री वंश का अंत कर दिया और बाल-पूजा के प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास किया। उसने अश्शूर के सम्राट शाल्मनेसेर तृतीय की अधीनता स्वीकार कर उसे कर और उपहार भेजे, जिसका प्रमाण प्रसिद्ध ब्लैक ओबेलिस्क से मिलता है। इसके बावजूद दमिश्क के शासक हजाएल ने इज़राइल के ट्रांसजॉर्डन क्षेत्र (यरदन के पूर्वी भाग) पर अधिकार कर लिया। येहू के उत्तराधिकारियों यहोआहाज़ और योआश (जोआश) के समय भी अरामियों का दबाव बना रहा।
यारोबाम द्वितीय (लगभग 786–746 ई.पू.)
इसके बाद यारोबाम द्वितीय (लगभग 793-753 ई.पू.) के शासनकाल में इज़राइल ने पुनः शक्ति प्राप्त की। उसने अनेक खोए हुए क्षेत्रों पर अधिकार किया और राज्य में आर्थिक समृद्धि आई। व्यापार और कृषि का विकास हुआ, किंतु इसी समय सामाजिक असमानता भी बढ़ी। इसी काल में महान भविष्यवक्ता आमोस और होशे का उदय हुआ। उन्होंने नैतिक पतन, सामाजिक अन्याय और धार्मिक आडंबर की कठोर आलोचना की और इज़राइल के विनाश की भविष्यवाणी की।
अश्शूर द्वारा इज़राइल का अंत
येहू वंश के अंतिम शासक जकर्याह की हत्या शल्लूम ने कर दी, जो केवल एक महीने ही शासन कर सका। गादी के पुत्र मनहेम (लगभग 752-742 ई.पू.) ने सामरिया में शल्लूम की हत्या कर दी और स्वयं राजा बन गया। इसके बाद पकह्याह (लगभग 742-740 ई.पू.), पेकह (लगभग 740-732 ई.पू.) और होशे (लगभग 732-722 ई.पू.) के शासनकाल में राजनीतिक अस्थिरता निरंतर बढ़ती गई। अश्शूर के शक्तिशाली सम्राट तिग्लत-पिलेसर तृतीय ने इज़राइल को कर देने के लिए विवश किया। बाद में राजा होशे ने मिस्र की सहायता के भरोसे अश्शूर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और कर देना बंद कर दिया।
यहूदा (जूडा) राज्य का इतिहास
इज़राइल के पतन (722 ई.पू.) के बाद भी दक्षिण का यहूदा राज्य 586 ई.पू. तक यानी लगभग सवा सौ से अधिक वर्षों तक अस्तित्व में रहा। प्रारंभ में यहूदा और उत्तरी इज़राइल के संबंध तनावपूर्ण थे, किंतु दाऊद वंश के राजा योराम (लगभग 848-841 ई.पू.) ने इज़राइल के राजा अहाब की पुत्री अथलियाह से विवाह कर दोनों राज्यों के राजनीतिक संबंधों को सुदृढ़ करने का प्रयास किया।
योराम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अहज्याह (लगभग 841 ई.पू.) अल्पकाल के लिए राजा बना, किंतु शीघ्र ही येहू के विद्रोह में मारा गया। इसके बाद उसकी माता अथलियाह (841-835 ई.पू.) ने सत्ता पर अधिकार कर लिया। अपने शासन को सुरक्षित रखने के लिए उसने राजपरिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या करा दी, किंतु शिशु राजकुमार योआश को उसकी बुआ यहोशेबा ने गुप्त रूप से बचाकर यरूशलेम के मंदिर में छिपा दिया। छह वर्षों तक महायाजक यहोयादा ने उसकी रक्षा की और अंत में अथलियाह को अपदस्थ करके उसका वध करवा दिया और योआश को सिंहासन पर बैठाया।
योआश (लगभग 835-796 ई.पू.) के प्रारंभिक शासनकाल में यहोयादा के मार्गदर्शन में धार्मिक सुधार किए गए, बाल-पूजा का दमन किया गया और यरूशलेम के मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। किंतु उत्तरार्ध में उसकी नीतियों से असंतुष्ट षड्यंत्रकारियों ने उसकी हत्या कर दी।
योआश के बाद अमस्याह (लगभग 796-767 ई.पू.) राजा बना। उसने एदोम पर विजय प्राप्त की, किंतु इज़राइल के येहू वंश के राजा योआश (लगभग 798-782 ई.पू.) से पराजित होने के कारण यरूशलेम की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा।
आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में भविष्यवक्ता यशायाह ने धार्मिक शुद्धता और विवेकपूर्ण विदेश नीति का संदेश दिया। बाद में राजा हिजकिय्याह (लगभग 715-686 ई.पू.) ने अश्शूर के विरुद्ध मिस्र का सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप अश्शूरी सम्राट सन्हेरीब ने यहूदा पर आक्रमण किया। अनेक नगरों के विनाश के बाद हिजकिय्याह को भारी कर देकर संधि करनी पड़ी। उसके उत्तराधिकारी मनश्शे ने अश्शूर की अधीनता स्वीकार कर ली और विदेशी देवी-देवताओं की पूजा को भी प्रोत्साहन दिया। अंततः योशियाह (640-609 ई.पू.) ने व्यापक धार्मिक सुधार आरंभ किए। इसी काल में भविष्यवक्ता यिर्मयाह ने यहूदा के नैतिक और राजनीतिक पतन की चेतावनी दी, किंतु उसके उपदेशों की उपेक्षा की गई, जिसके परिणामस्वरूप राज्य का पतन निकट आ गया।
बेबिलोन की विजय और निर्वासन
सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व के अंत तक असीरिया का पतन हो चुका था और नव-बेबिलोन साम्राज्य पश्चिमी एशिया की सबसे बड़ी शक्ति बन गया। उसके शासक नेबूकदनेस्सर द्वितीय ने 597 ईसा पूर्व में पहली बार यरूशलेम पर अधिकार किया तथा बाद में विद्रोह होने पर नगर की पुनः घेराबंदी की। लगभग डेढ़ वर्ष के संघर्ष के बाद 586 ईसा पूर्व में यरूशलेम पर अंतिम विजय प्राप्त हुई। नगर और प्रथम मंदिर को नष्ट कर दिया गया तथा बड़ी संख्या में यहूदियों को बंदी बनाकर बेबिलोन ले जाया गया। यह घटना यहूदी इतिहास में ‘बेबिलोन निर्वासन’ के नाम से प्रसिद्ध है। निर्वासित समुदाय लगभग 586 से 539/538 ईसा पूर्व तक बेबिलोन में रहा।
पुनर्स्थापन और फ़ारसी शासन
539 ईसा पूर्व में हखामनी (आकेमेनिड) सम्राट साइरस द्वितीय ‘महान’ ने बेबिलोन पर विजय प्राप्त की। इसके बाद फिलिस्तीन भी फ़ारसी साम्राज्य का अंग बन गया। साइरस ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई और निर्वासित यहूदियों को अपने देश लौटने तथा यरूशलेम के मंदिर के पुनर्निर्माण की अनुमति दी। कुछ यहूदी अपने देश लौट आए, जबकि अनेक लोग बेबिलोन और अन्य क्षेत्रों में ही बसे रहे। लौटने वाले लोगों ने फ़ारसी शासकों के संरक्षण में यहूदा के पुनर्गठन का कार्य प्रारंभ किया। यह काल यहूदी इतिहास में ‘पुनर्स्थापन’ के नाम से जाना जाता है।
एज्रा, नहेम्याह और धार्मिक पुनर्जागरण
फ़ारसी शासनकाल में लगभग 539 से 332 ईसा पूर्व तक यहूदी समाज का पुनर्गठन हुआ। एज्रा और नहेम्याह फारसी राजा (अर्तक्षत्र) के शासनकाल में यरुशलेम लौटे। एज्रा एक याजक था और नहेम्याह यरुशलेम का प्रांतीय गवर्नर। इन दोनों के नेतृत्व में धार्मिक, सामाजिक तथा प्रशासनिक सुधार किए गए। यरूशलेम की प्राचीर का पुनर्निर्माण कराया गया, आर्थिक कठिनाइयों से ग्रस्त लोगों को राहत दी गई तथा यहूदी धार्मिक व्यवस्था को व्यवस्थित रूप प्रदान किया गया।
धार्मिक कानूनों का संकलन और पालन अधिक कठोर बनाया गया। विदेशी विवाहों पर नियंत्रण लगाया गया तथा यहूदी समाज की विशिष्ट धार्मिक पहचान को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। इस काल में यरूशलेम पुनः यहूदी धर्म का प्रमुख धार्मिक केंद्र बन गया। अंततः 332 ईसा पूर्व में सिकंदर महान ने फिलिस्तीन पर अधिकार कर लिया और इसके साथ ही यह क्षेत्र यूनानी प्रभाव के अधीन आ गया।
राजनीतिक संगठन
तोराह और हिब्रू विधि-व्यवस्था
हिब्रू सभ्यता के राजनीतिक संगठन की जानकारी के लिए उसकी विधि-व्यवस्था और दंड प्रणाली महत्त्वपूर्ण हैं। हिब्रू कानूनों का प्रमुख आधार बाइबिल की प्रथम पाँच पुस्तकें हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘तोराह’ या ‘पंचग्रंथ’ कहा जाता है। ‘तोराह’ का सामान्य अर्थ ‘कानून’ है, जबकि इसका वास्तविक अर्थ ‘उपदेश’ या ‘मार्गदर्शन’ है। इन ग्रंथों में धार्मिक आस्थाओं के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक तथा न्यायिक नियमों का भी विस्तृत वर्णन मिलता है।
हिब्रू विधि-व्यवस्था पर प्राचीन मेसोपोटामिया, विशेषकर बेबिलोन के प्रसिद्ध शासक हम्मूराबी की विधि-संहिता का प्रभाव स्पष्ट है, जैसे- ‘आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत’ का सिद्धांत दोनों विधि-परंपराओं में मिलता है। इससे स्पष्ट है कि हिब्रू कानूनों ने पश्चिमी एशिया की पूर्ववर्ती विधिक परंपराओं से अनेक तत्त्व ग्रहण किए थे।
मूसा और हिब्रू कानून
यहूदी धार्मिक परंपरा के अनुसार हिब्रू कानूनों का निर्माण मूसा ने किया था। माना जाता है कि उन्हें सीनै पर्वत पर याहवे (यहोवा) से दस आज्ञाएँ तथा अन्य विधिक नियम प्राप्त हुए। किंतु आधुनिक इतिहासकार इस मत को पूर्णतः ऐतिहासिक नहीं मानते। उनका विचार है कि हिब्रू विधि-व्यवस्था का विकास लंबे समय में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के प्रभाव से हुआ। बाद के काल में इन कानूनों को दैवी अधिकार प्रदान करने के उद्देश्य से उन्हें मूसा और ईश्वर से जोड़ दिया गया।
प्राचीन विश्व की अनेक सभ्यताओं में कानूनों को दैवी उत्पत्ति का माना जाता था। बेबिलोन में हम्मूराबी ने अपनी विधि-संहिता को सूर्य देवता शमाश की देन बताया, मिस्र में कानूनों का संबंध ठोथ देवता से जोड़ा गया तथा ईरान में उन्हें अहुरमज़्दा की प्रेरणा माना गया। इसी परंपरा के अनुसार हिब्रू समाज ने भी अपने कानूनों को याहवे द्वारा मूसा को प्रदान किया गया दैवी विधान स्वीकार किया।
हिब्रू कानूनों की विशेषताएँ
हिब्रू विधि-व्यवस्था केवल न्याय और अपराध तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र को नियंत्रित करती थी। इसमें धार्मिक अनुष्ठानों, उपासना-पद्धति, व्रत, नैतिक आचरण, भोजन संबंधी नियम, सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत शुद्धता, विवाह, प्रसव, यौन आचरण, संक्रामक रोगों, विशेषकर कुष्ठ रोग, तथा सामाजिक व्यवहार से संबंधित विस्तृत निर्देश दिए गए हैं।
इस प्रकार धर्म और शासन को एक-दूसरे से अलग नहीं माना गया। धार्मिक नियम ही सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था का आधार थे। हिब्रू सभ्यता में राज्य, समाज और धर्म का घनिष्ठ संबंध था तथा नागरिक जीवन का संचालन धार्मिक सिद्धांतों के अनुरूप किया जाता था। इस दृष्टि से यह प्राचीन विश्व की सबसे प्रभावशाली धर्माधारित विधि-व्यवस्थाओं में से एक थी।
न्याय और दंड व्यवस्था
हिब्रू समाज की न्याय-व्यवस्था धार्मिक आधार पर संगठित थी। मंदिर न्याय का प्रमुख केंद्र था और पुरोहित तथा धर्माधिकारी न्यायाधीश का कार्य करते थे। न्याय का उद्देश्य केवल अपराधी को दंड देना नहीं, बल्कि धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था की रक्षा करना भी था।
दंड-व्यवस्था का प्रमुख आधार प्रतिशोध का सिद्धांत था। यदि किसी व्यक्ति ने दूसरे की आँख नष्ट कर दी, तो उसी प्रकार का दंड उसे भी दिया जा सकता था। इसी प्रकार दाँत, अंगभंग तथा अन्य शारीरिक क्षति के मामलों में भी समान प्रतिकार का सिद्धांत लागू होता था। यद्यपि व्यवहार में अनेक मामलों में आर्थिक क्षतिपूर्ति का भी प्रावधान था। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति द्वारा खोदे गए गड्ढे में गिरकर किसी दूसरे का पशु मर जाता था, तो गड्ढा खोदने वाले को पशु का मूल्य चुकाना पड़ता था, जबकि मृत पशु उसी के अधिकार में आ जाता था।
मानव-हत्या को अत्यंत गंभीर अपराध माना गया था और उसके लिए सामान्यतः मृत्युदंड का प्रावधान था। इसके अतिरिक्त व्यभिचार, माता-पिता पर आक्रमण, जादू-टोना, पशुगमन तथा निषिद्ध यौन संबंधों जैसे अपराधों के लिए भी कठोर दंड निर्धारित थे। याहवे के अतिरिक्त किसी अन्य देवता की उपासना को भी गंभीर धार्मिक अपराध माना जाता था और इसके लिए कठोर दंड दिया जा सकता था।
प्रारंभिक हिब्रू समाज में अनेक मामलों में दंड लागू करने का दायित्व पीड़ित पक्ष या उसके परिवार पर होता था। विशेषकर हत्या के मामलों में मृतक के निकट संबंधियों को प्रतिशोध लेने का अधिकार प्राप्त था। बाद के समय में इस व्यवस्था को अधिक संगठित न्यायिक संस्थाओं द्वारा नियंत्रित किया जाने लगा, जिससे न्याय-प्रक्रिया अपेक्षाकृत व्यवस्थित और संतुलित बन सकी।
सामाजिक संगठन
सामाजिक वर्ग-व्यवस्था
हिब्रू समाज मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित था- स्वतंत्र नागरिक और दास। स्वतंत्र वर्ग में राजा, राजपरिवार, पुरोहित, सैनिक, कृषक, पशुपालक, व्यापारी तथा शिल्पकार सम्मिलित थे। दास वर्ग समाज के श्रम-आधारित कार्यों का प्रमुख आधार था। सामाजिक प्रतिष्ठा की दृष्टि से राजपरिवार और पुरोहितों का स्थान सर्वोच्च माना जाता था। राजाओं और उच्च अधिकारियों का जीवन अपेक्षाकृत वैभवपूर्ण था तथा राज्य की आय, युद्धों से प्राप्त धन और करों का एक बड़ा भाग राजकीय वैभव तथा प्रशासन पर व्यय किया जाता था।
बाइबिल में सोलोमन के हरम में सात सौ रानियों और तीन सौ उपपत्नियों का उल्लेख मिलता है। अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इस संख्या को प्रतीकात्मक अथवा अतिरंजित मानते हैं, किंतु इससे यह स्पष्ट होता है कि उस काल के राजाओं में बहुविवाह और विशाल राजपरिवार प्रतिष्ठा का प्रतीक माने जाते थे। इसके विपरीत कृषकों और साधारण जनता का जीवन अपेक्षाकृत कठिन था। उन्हें कृषि, करों तथा सार्वजनिक कार्यों का भार वहन करना पड़ता था।
दास-प्रथा
प्राचीन विश्व की अन्य सभ्यताओं की भाँति हिब्रू समाज में भी दास-प्रथा विद्यमान थी। युद्धों में बंदी बनाए गए शत्रुओं को दास बनाया जाता था तथा उनसे मुख्यतः लकड़ी काटने, खदानों में कार्य करने, निर्माण कार्यों तथा अन्य कठिन श्रम करवाए जाते थे। फिर भी हिब्रू दास-प्रथा अन्य समकालीन सभ्यताओं की अपेक्षा कुछ मानवीय मानी जाती है।
हिब्रू धर्मशास्त्र के अनुसार प्रत्येक सप्ताह सातवें दिन सब्बाथ (विश्राम-दिवस) मनाया जाता था, जिस दिन दासों, सेवकों तथा पशुओं तक को विश्राम देने का निर्देश था। इसी प्रकार भूमि को भी प्रत्येक सातवें वर्ष परती छोड़ने की व्यवस्था थी। यह व्यवस्था धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास भी थी।
हिब्रू दासों को कुछ कानूनी अधिकार भी प्राप्त थे। सामान्यतः किसी हिब्रू दास को छह वर्ष की सेवा के बाद सातवें वर्ष मुक्त कर दिया जाता था। यदि वह विवाहित होकर दास बना था, तो पत्नी सहित स्वतंत्र हो सकता था। किंतु यदि स्वामी ने दासत्व के दौरान उसे पत्नी प्रदान की थी, तो पत्नी और उससे उत्पन्न संतान स्वामी की संपत्ति मानी जाती थी। यदि दास स्वेच्छा से अपने स्वामी के साथ ही रहना चाहता था, तो धार्मिक विधि के अनुसार उसे आजीवन दास रहने की अनुमति दी जा सकती थी।
दासों के साथ अत्यधिक क्रूरता करना भी अनुचित माना जाता था। यदि किसी दास की पिटाई से उसकी मृत्यु हो जाती थी, तो अपराधी को दंड दिया जाता था। यदि किसी दास या दासी की आँख अथवा दाँत क्षतिग्रस्त हो जाते थे, तो उसे स्वतंत्र कर दिया जाता था। इस प्रकार हिब्रू समाज में दासों की सुरक्षा के लिए कुछ कानूनी प्रावधान भी विद्यमान थे।
पारिवारिक व्यवस्था
हिब्रू समाज की आधारभूत इकाई परिवार था। सामान्यतः संयुक्त परिवार की प्रथा प्रचलित थी, जिनमें माता-पिता, विवाहित पुत्र, उनकी पत्नियाँ और बच्चे, अविवाहित संतानें तथा दास-दासियाँ एक साथ रहते थे। परिवार का मुखिया पिता होता था, जिसे सर्वोच्च अधिकार और सम्मान प्राप्त था। वह परिवार के आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक जीवन का संचालन करता था।
पिता की आज्ञा का उल्लंघन गंभीर अपराध माना जाता था। धार्मिक ग्रंथों में माता-पिता के सम्मान पर विशेष बल दिया गया है। यद्यपि प्रारंभिक समाज में पिता को परिवार के सदस्यों पर व्यापक अधिकार प्राप्त थे, आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि इन अधिकारों का व्यवहारिक स्वरूप समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहा।
स्त्रियों की स्थिति
हिब्रू समाज पितृसत्तात्मक था, इसलिए स्त्रियाँ सामान्यतः पति और परिवार के संरक्षण में रहती थीं। उनका प्रमुख दायित्व गृह-प्रबंधन, बच्चों का पालन-पोषण तथा पारिवारिक व्यवस्था को बनाए रखना था। इसके बावजूद अनेक स्त्रियों ने धार्मिक और सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सारा, राहेल, मरियम, एस्तेर, देबोरा और हुल्दा जैसी महिलाओं का उल्लेख बाइबिल में सम्मानपूर्वक किया गया है। विशेष रूप से देबोरा एक न्यायाधीश और सैन्य नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं।
यद्यपि स्त्रियों के अधिकार पुरुषों की अपेक्षा सीमित थे, फिर भी परिवार और धर्म में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान था। धार्मिक परंपराओं में मातृत्व को अत्यंत सम्मानित माना गया तथा परिवार की निरंतरता का प्रमुख आधार समझा गया।
विवाह और पारिवारिक जीवन
हिब्रू समाज में विवाह को धार्मिक और सामाजिक संस्था के रूप में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता था। अधिकांश विवाह माता-पिता या परिवार के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा निश्चित किए जाते थे, यद्यपि कुछ अवसरों पर प्रेम-विवाह के उदाहरण भी मिलते हैं। विवाह के समय वर-पक्ष द्वारा कन्या-पक्ष को वधू-मूल्य दिया जाता था, जो उस समय पश्चिमी एशिया की अनेक सभ्यताओं में प्रचलित था।
संतानोत्पत्ति को धार्मिक कर्तव्य माना जाता था। निःसंतानता को दुर्भाग्य समझा जाता था तथा अधिक संतान होना ईश्वर का आशीर्वाद माना जाता था। संपन्न वर्ग में बहुविवाह की प्रथा भी प्रचलित थी, विशेषकर राजपरिवारों और उच्च वर्ग में। यदि पत्नी संतान उत्पन्न करने में असमर्थ होती थी, तो कुछ परिस्थितियों में दासी के माध्यम से संतान प्राप्त करने की परंपरा भी विद्यमान थी, जिसका उल्लेख बाइबिल में मिलता है।
विधवा स्त्री के संबंध में लेविरात विवाह की व्यवस्था थी। इसके अनुसार यदि किसी पुरुष की संतान के बिना मृत्यु हो जाती थी, तो उसका भाई अथवा निकट संबंधी विधवा से विवाह कर परिवार की वंश-परंपरा को आगे बढ़ा सकता था। इस प्रथा का उद्देश्य परिवार की संपत्ति और वंश को सुरक्षित रखना था।
नैतिक व्यवस्था और सामाजिक आचार
हिब्रू समाज में नैतिक जीवन पर विशेष बल दिया गया था। व्यभिचार, निकट संबंधियों के साथ यौन संबंध, पशुगमन तथा अन्य निषिद्ध यौन आचरणों को गंभीर अपराध माना जाता था और इनके लिए कठोर दंड निर्धारित थे। विवाहेतर संबंधों को सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से अनुचित समझा जाता था। नैतिक नियम स्त्री और पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू माने गए, यद्यपि व्यवहार में पुरुषों को अपेक्षाकृत अधिक सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त थी।
तलाक का अधिकार मुख्यतः पुरुषों के हाथ में था, जबकि स्त्रियों के लिए यह अत्यंत सीमित था। समलैंगिक संबंधों का भी धार्मिक विधि में निषेध किया गया था। इन नियमों का उद्देश्य पारिवारिक संस्था, वंश-परंपरा और सामाजिक अनुशासन को बनाए रखना था।
समय के साथ, विशेषकर सोलोमन के शासनकाल में विदेशी प्रभावों के कारण सामाजिक जीवन में कुछ परिवर्तन आए। विदेशी व्यापार, राजनयिक संबंधों और बाहरी समुदायों के संपर्क से यरूशलेम जैसे नगरों में विलासिता और वेश्यावृत्ति का प्रसार हुआ। अनेक भविष्यवक्ताओं और धार्मिक सुधारकों ने इन प्रवृत्तियों की आलोचना करते हुए समाज में नैतिक शुद्धता तथा धार्मिक अनुशासन बनाए रखने का आह्वान किया।
आर्थिक संगठन
संपत्ति और आर्थिक व्यवस्था
हिब्रू सभ्यता की आर्थिक व्यवस्था का आधार व्यक्तिगत संपत्ति का सिद्धांत था। हिब्रू समाज में निजी संपत्ति को ईश्वर प्रदत्त अधिकार माना जाता था। संपत्ति की अवधारणा केवल भूमि तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें मकान, पशुधन, कृषि उपकरण, दास तथा अन्य चल-अचल संपत्तियाँ भी सम्मिलित थीं। आर्थिक जीवन में कृषि को सर्वाधिक महत्त्व प्राप्त था और उससे संबंधित अनेक नियम बनाए गए थे, जिनका उद्देश्य भूमि की उर्वरता बनाए रखना, किसानों के अधिकारों की रक्षा करना तथा समाज में आर्थिक संतुलन स्थापित करना था।
कृषि व्यवस्था
हिब्रुओं की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी। वे गेहूँ, जौ, अंगूर, जैतून और अंजीर जैसी प्रमुख फसलों की खेती करते थे। कृषि कार्यों के संचालन के लिए अनेक व्यावहारिक और दूरदर्शी नियम बनाए गए थे। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण व्यवस्था यह थी कि किसी खेत में लगातार छह वर्षों तक खेती करने के बाद सातवें वर्ष उसे परती छोड़ दिया जाता था। इससे भूमि की उर्वरता स्वाभाविक रूप से पुनः स्थापित हो जाती थी। यह व्यवस्था आधुनिक कृषि विज्ञान के फसल-चक्र और भूमि संरक्षण के सिद्धांतों से भी मेल खाती है।
सातवें वर्ष खेत में बिना जोते-बोए जो भी उपज होती थी, उसे भूमि का स्वामी अपने लिए एकत्र नहीं करता था। उस पर निर्धनों, भूमिहीनों तथा जरूरतमंद लोगों का अधिकार माना जाता था। इसी प्रकार फसल काटते समय खेत के किनारों की पूरी कटाई नहीं की जाती थी और कटाई के बाद खेत में बचे हुए दानों को भी नहीं बटोरा जाता था। इन अवशेषों को गरीब लोग एकत्र कर अपनी आजीविका चलाते थे। इस प्रकार कृषि व्यवस्था में सामाजिक कल्याण और दान की भावना को विशेष महत्त्व दिया गया था।
यदि किसी व्यक्ति के पशु द्वारा दूसरे की फसल को क्षति पहुँचती थी, तो पशु के स्वामी के लिए क्षतिपूर्ति करना अनिवार्य था। इसी प्रकार यदि किसी की लापरवाही से आग लगने के कारण दूसरे की खड़ी फसल, अनाज के भंडार या खेत को हानि पहुँचती थी, तो अपराधी को संपूर्ण क्षति की भरपाई करनी पड़ती थी। अंगूर, जैतून और अंजीर के बागों पर भी इसी प्रकार के नियम लागू होते थे। सातवें वर्ष उनकी छँटाई तथा फलों का व्यावसायिक संग्रह नहीं किया जाता था और यदि किसी प्रकार की क्षति होती थी, तो उसके लिए भी क्षतिपूर्ति का प्रावधान था।
पशुपालन
कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी हिब्रू अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग था। बैल, गधे, भेड़ और बकरियाँ प्रमुख पालतू पशु थे। अनेक हिब्रू समुदाय पशुओं के लिए उपयुक्त चरागाहों की खोज में अर्ध-घुमंतू जीवन व्यतीत करते थे और तंबुओं में रहना पसंद करते थे।
पशुओं की सुरक्षा तथा स्वामित्व की रक्षा के लिए भी स्पष्ट कानूनी नियम बनाए गए थे। यदि किसी व्यक्ति का बैल दूसरे के बैल को मार डालता था और वह पहले से हिंसक नहीं माना जाता था, तो जीवित बैल को बेचकर प्राप्त धन तथा मृत बैल दोनों स्वामियों में बाँट दिए जाते थे। किंतु यदि यह सिद्ध हो जाता था कि बैल पहले से ही लोगों या पशुओं को सींग मारने का आदी था और उसके स्वामी ने आवश्यक सावधानी नहीं बरती, तो उसे पूरी क्षतिपूर्ति करनी पड़ती थी।
पशु-चोरी को गंभीर अपराध माना जाता था। यदि कोई व्यक्ति किसी का बैल या भेड़ चुराकर बेच देता या मार डालता था, तो उसे एक बैल के बदले पाँच बैल तथा एक भेड़ के बदले चार भेड़ें क्षतिपूर्ति के रूप में देनी पड़ती थीं। यदि अपराधी के पास भुगतान करने की क्षमता नहीं होती थी, तो उसे दास के रूप में बेचकर क्षति की भरपाई की जाती थी। यदि चोरी किया गया पशु जीवित अवस्था में मिल जाता था, तो अपराधी को उसका दुगुना मूल्य चुकाना पड़ता था।
उद्योग, व्यापार और ऋण व्यवस्था
कृषि और पशुपालन के अतिरिक्त, विशेषकर राजा सोलोमन के शासनकाल में उद्योगों और व्यापार का उल्लेखनीय विकास हुआ। फिनीशिया के नगरों टायर और सिडोन सहित दमिश्क तथा यरूशलेम जैसे प्रमुख व्यापारिक केंद्रों से हिब्रुओं के व्यावसायिक संबंध स्थापित थे। स्थल और समुद्री दोनों मार्गों से व्यापार किया जाता था, जिससे राज्य की आर्थिक समृद्धि में वृद्धि हुई।
समय के साथ हिब्रू व्यापारी पश्चिमी एशिया में व्यापार तथा ऋण-व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध हो गए। धार्मिक परंपरा में यह निर्देश दिया गया था कि वे अन्य राष्ट्रों को ऋण दे सकते हैं, किंतु अनावश्यक रूप से स्वयं ऋणग्रस्त होने से बचें। प्रारंभिक काल में सिक्कों का व्यापक प्रचलन नहीं था। वस्तुओं का मूल्य मुख्यतः सोने और चाँदी के भार के आधार पर निर्धारित किया जाता था।
देश के भीतर भी ऋण देने की व्यवस्था थी, किंतु निर्धनों और जरूरतमंद लोगों से ब्याज लेना अनुचित तथा धार्मिक रूप से निषिद्ध माना गया था। इस व्यवस्था का उद्देश्य आर्थिक शोषण को रोकना तथा समाज के कमजोर वर्गों की सुरक्षा करना था। इस प्रकार हिब्रू आर्थिक संगठन में निजी संपत्ति के अधिकार, कृषि और व्यापार के विकास तथा सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है।
धर्म और धार्मिक जीवन
हिब्रू सभ्यता में धर्म का स्थान सर्वोच्च था। इसका प्रभाव केवल धार्मिक जीवन तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था का आधार भी धर्म ही था। हिब्रू धर्म का विकास एक दीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम था। प्रारंभिक काल में इसमें प्रकृति-पूजा, बहुदेववाद और अनेक अंधविश्वासों का प्रभाव था, जबकि बाद के समय में यही धर्म उच्च नैतिकता, एकेश्वरवाद तथा आध्यात्मिक चिंतन का वाहक बन गया। इस विकास में फिलिस्तीन की भौगोलिक स्थिति का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। मिस्र, मेसोपोटामिया, फिनीशिया और एशिया माइनर जैसी विकसित सभ्यताओं के मध्य स्थित होने के कारण हिब्रू समाज निरंतर बाहरी सांस्कृतिक प्रभावों के संपर्क में रहा।
धर्म के विकास की दृष्टि से हिब्रू धार्मिक इतिहास को सामान्यतः पाँच चरणों में विभाजित किया जाता है- प्राक्-मूसा काल, राष्ट्रीय एकेश्वरवाद का काल, पैगंबरी सुधार आंदोलन का काल, बेबिलोन निर्वासन (बंदीगृह) का काल तथा निर्वासनोत्तर पारसी प्रभाव का काल।
प्राक्-मूसा काल
प्राक्-मूसा काल में हिब्रू समाज पूर्णतः एकेश्वरवादी नहीं था। उस समय वे बहुदेववाद तथा प्रकृति-पूजा में विश्वास रखते थे। वृक्षों, पर्वतों, झरनों, कुओं, शिलाओं तथा विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों में दिव्य सत्ता का निवास माना जाता था। बैल, नाग तथा अन्य पशुओं की भी धार्मिक दृष्टि से पूजा की जाती थी। इस काल में धार्मिक अनुष्ठानों में जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, बलि तथा विभिन्न प्रकार की आभिचारिक क्रियाओं का विशेष महत्त्व था। इन अनुष्ठानों का संचालन पुरोहितों और ओझाओं द्वारा किया जाता था, इसलिए समाज में उनका प्रभाव अत्यधिक था।
समय के साथ धार्मिक विचारों में परिवर्तन होने लगा। देवताओं का मानवीकरण प्रारंभ हुआ और उन्हें मानव-सदृश गुणों से युक्त समझा जाने लगा। अधिकांश देवताओं को सामूहिक रूप से ‘एल’ कहा जाता था। कैनानी संस्कृति के संपर्क में आने के बाद अनेक हिब्रुओं ने कैनानी देवता बाल तथा देवी अश्तोरेत की भी उपासना आरंभ कर दी। इससे स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक हिब्रू धर्म पर पड़ोसी संस्कृतियों का गहरा प्रभाव था।
राष्ट्रीय एकेश्वरवाद का उदय
हिब्रू धार्मिक इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन मूसा के नेतृत्व में हुआ। इसी काल में याहवे की उपासना राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हुई। यह परिवर्तन तत्काल पूर्ण एकेश्वरवाद का प्रतीक नहीं था, क्योंकि अन्य देवताओं के अस्तित्व से पूर्णतः इनकार नहीं किया गया था। किंतु हिब्रू समाज ने याहवे को अपना सर्वोच्च और राष्ट्रीय देवता स्वीकार कर लिया।
हिब्रू धर्मग्रंथों में ईश्वर के लिए YHWH (टेट्राग्रामाटन) का प्रयोग मिलता है। प्राचीन हिब्रू भाषा में स्वर नहीं लिखे जाते थे, इसलिए इसके मूल उच्चारण के विषय में पूर्ण निश्चितता नहीं है। आधुनिक विद्वान इसका संभावित उच्चारण याहवे मानते हैं। बाद के मध्यकाल में ईसाई विद्वानों द्वारा जेहोवा नाम प्रचलित हुआ, किंतु आज अधिकांश इतिहासकार और भाषाविद् इसे मूल हिब्रू उच्चारण नहीं मानते हैं।
बाइबिल के अनुसार जब मूसा ने ईश्वर से उनका नाम पूछा, तब उत्तर मिला : ‘मैं हूँ जो मैं हूँ’। इसके बाद मूसा को निर्देश दिया गया कि वे इस्राएलियों से कहें कि अब्राहम, इसहाक और याकूब के ईश्वर ने उन्हें भेजा है। इससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर की पहचान किसी विशिष्ट नाम की अपेक्षा उसके अस्तित्व और शक्ति से जुड़ी हुई थी।
याहवे का स्वरूप
प्रारंभिक हिब्रू धर्म में याहवे को निराकार दार्शनिक सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि मानव-सदृश गुणों वाले देवता के रूप में चित्रित किया गया है। वह प्रसन्न होने पर अपने अनुयायियों की रक्षा करता था और अप्रसन्न होने पर कठोर दंड देता था। प्रारंभिक धार्मिक साहित्य में याहवे को न्यायप्रिय, क्रोधी, दयालु तथा युद्धप्रिय—सभी रूपों में प्रस्तुत किया गया है।
बाइबिल के अनेक प्रसंगों में याहवे को पर्वतों, बादलों, बिजली और गर्जन से संबद्ध देवता के रूप में वर्णित किया गया है। अनेक इतिहासकारों का मत है कि प्रारंभ में वह तूफान और मेघगर्जन से संबंधित देवता रहा होगा। बाद में जब हिब्रू समाज युद्धों और राजनीतिक संघर्षों से गुज़रा, तब याहवे की कल्पना एक ऐसे राष्ट्रीय युद्ध-देवता के रूप में विकसित हुई जो अपने अनुयायियों की विजय सुनिश्चित करता है।
मिस्र से हिब्रुओं के निष्क्रमण की कथा में भी याहवे को अपने अनुयायियों का रक्षक बताया गया है। इसी प्रकार कैनान विजय के प्रसंगों में भी उसे युद्ध में मार्गदर्शन और विजय प्रदान करने वाला देवता माना गया। प्रारंभिक धार्मिक ग्रंथों में याहवे के क्रोध और दंड के अनेक उल्लेख मिलते हैं, जिनसे उस समय की धार्मिक मानसिकता का परिचय मिलता है। आधुनिक इतिहासकार इन कथाओं को धार्मिक परंपरा का अंग मानते हैं, न कि सभी घटनाओं का शाब्दिक ऐतिहासिक विवरण।
याहवे की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि वह अपने अनुयायियों से पूर्ण निष्ठा की अपेक्षा करता था। दस आज्ञाओं में स्पष्ट निर्देश दिया गया कि उसके अतिरिक्त किसी अन्य देवता की उपासना नहीं की जाएगी और किसी प्रकार की मूर्ति नहीं बनाई जाएगी। इस प्रकार हिब्रू धर्म में मूर्तिपूजा का विरोध और एक सर्वोच्च ईश्वर की उपासना का सिद्धांत क्रमशः स्थापित हुआ।
यद्यपि प्रारंभिक काल में याहवे का स्वरूप मानवोचित गुणों से युक्त था, फिर भी समय के साथ उसे न्याय, सत्य, प्रकाश, करुणा और धर्म का संरक्षक माना जाने लगा। विधवाओं, अनाथों तथा निर्धनों की रक्षा करना भी उसके प्रमुख गुणों में सम्मिलित किया गया। इस प्रकार याहवे केवल युद्ध का देवता न रहकर नैतिक व्यवस्था का भी आधार बन गया।
कर्मकांड और पुरोहित व्यवस्था
मूसा के समय में धार्मिक अनुष्ठानों, बलि-प्रथा तथा पुरोहितों के कर्तव्यों का व्यवस्थित स्वरूप विकसित हुआ। उपासना का केंद्र तंबू तथा बाद में मंदिर बना। पशु-बलि को धार्मिक अनुष्ठानों का प्रमुख अंग माना जाता था और पुरोहितों की उपस्थिति के बिना अनेक धार्मिक कर्म पूर्ण नहीं माने जाते थे।
समय के साथ पुरोहित वर्ग का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया। धार्मिक अनुष्ठानों, शुद्ध-अशुद्ध के नियमों, प्रसव, रोग, पाप और प्रायश्चित से संबंधित सभी निर्णय उन्हीं के अधिकार में आ गए। कृषि उपज, पशुधन का निश्चित अंश तथा मंदिर में चढ़ाए गए अर्पण का बड़ा भाग पुरोहितों को प्राप्त होने लगा। परिणामस्वरूप मंदिरों की संपत्ति और पुरोहित वर्ग की आर्थिक शक्ति निरंतर बढ़ती गई।
धर्म का स्वरूप धीरे-धीरे कर्मकांड प्रधान होता गया। धार्मिक जीवन में नैतिक आचरण की अपेक्षा बाह्य अनुष्ठानों और बलि को अधिक महत्त्व मिलने लगा। समाज में यह धारणा प्रबल हो गई कि ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए पुरोहितों द्वारा निर्धारित विधियों का पालन अनिवार्य है। इससे धार्मिक व्यवस्था औपचारिक और जटिल होती चली गई।
धार्मिक परिवर्तन और सुधार की आवश्यकता
राजसत्ता की निरंकुशता, उच्च वर्ग की विलासिता, भारी कर, बेगार, आर्थिक विषमता, असीरियाई आक्रमणों का भय तथा सामाजिक अन्याय के कारण सामान्य जनता में असंतोष बढ़ने लगा। दूसरी ओर विदेशी संस्कृतियों के प्रभाव से बाल, अश्तोरेत तथा अन्य स्थानीय देवताओं की उपासना पुनः फैलने लगी। सोने के बछड़े, कांस्य सर्प तथा अन्य प्रतीकों की पूजा भी अनेक स्थानों पर प्रचलित हो गई।
इन परिस्थितियों में हिब्रू धर्म अपने मूल नैतिक आदर्शों से दूर होता गया। कर्मकांड और बाह्य आडंबर बढ़ते गए, जबकि न्याय, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना कमजोर पड़ने लगी। इसी पृष्ठभूमि में अनेक पैगंबर और धार्मिक सुधारक सामने आए। उन्होंने धर्म को पुनः नैतिकता, सामाजिक न्याय और ईश्वर के प्रति सच्ची निष्ठा से जोड़ने का प्रयास किया तथा हिब्रू धार्मिक परंपरा को एक नई दिशा प्रदान की।
पैगंबरी क्रांति का काल
हिब्रू धर्म के इतिहास में नबियों (पैगंबरों) द्वारा संचालित धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन को पैगंबरी क्रांति अथवा धार्मिक सुधार का काल कहा जाता है। यह आंदोलन उस समय प्रारंभ हुआ, जब हिब्रू समाज राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक विषमता, सामाजिक अन्याय और धार्मिक आडंबरों से ग्रस्त था। तत्कालीन समाज में धर्म कर्मकांड, पुरोहितवाद और बाह्य अनुष्ठानों तक सीमित हो गया था, जबकि नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व की उपेक्षा होने लगी थी। ऐसे वातावरण में अनेक नबियों ने समाज के समक्ष धर्म का नया स्वरूप प्रस्तुत किया, जिसमें सत्य, न्याय, करुणा और नैतिक आचरण को सर्वोच्च स्थान दिया गया।
नबियों का स्वरूप एवं कार्य
हिब्रू परंपरा में नबियों को ईश्वर का संदेशवाहक माना जाता था। इनमें कुछ ऐसे भी थे जो भविष्यवाणी करने के लिए पारिश्रमिक लेते थे तथा स्वयं को अलौकिक शक्तियों का स्वामी बताते थे। कुछ अन्य धार्मिक उन्माद की अवस्था में नृत्य करते, मूर्छित हो जाते और रहस्यमय वचन बोलते थे, जिन्हें लोग ईश्वरीय संदेश मानकर श्रद्धा से सुनते थे। परंतु समाज में सबसे अधिक सम्मान उन नबियों को मिला जिन्होंने धर्म को कर्मकांड से मुक्त कर नैतिकता और सामाजिक सुधार का माध्यम बनाया। वे जनसाधारण के बीच जाकर अन्याय, अत्याचार, शोषण और भ्रष्टाचार का विरोध करते थे तथा लोगों को सत्य, न्याय और सदाचार का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देते थे। अधिकांश सुधारवादी नबी ग्रामीण जीवन से जुड़े थे और नगरों की विलासिता तथा नैतिक पतन की खुलकर आलोचना करते थे।
एलिजा और एलिशा का धर्म-सुधार आंदोलन
धर्म-सुधार की परंपरा का प्रारंभ एलिजा और उसके उत्तराधिकारी एलिशा से माना जाता है। एलिजा ने तत्कालीन शासक अहाब की कठोर आलोचना की, क्योंकि उसके शासनकाल में विदेशी देवी-देवताओं, विशेषतः बाल की उपासना को प्रोत्साहन दिया गया था। एलिजा ने इसे हिब्रू परंपरा और याहवे की उपासना के लिए घातक बताया। उसने नगरों के विलासमय जीवन, नैतिक पतन तथा विदेशी धार्मिक प्रभावों का विरोध किया और लोगों को अपने राष्ट्रीय धर्म तथा प्राचीन नैतिक आदर्शों की ओर लौटने का आह्वान किया।
एलिशा ने भी अपने गुरु एलिजा की परंपरा को आगे बढ़ाया। उसने याहवे की उपासना को सुदृढ़ करने तथा विदेशी देवताओं के प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास किया। उसके प्रभाव से बाल-पूजा के विरोध को बल मिला और याहवे को समस्त हिब्रुओं का न्यायप्रिय एवं दयालु ईश्वर माना जाने लगा। एलिजा और एलिशा के प्रयासों ने आगे चलकर व्यापक धार्मिक सुधार आंदोलन की आधारशिला रखी।
आमोस और होशे की शिक्षाएँ
एलिजा और एलिशा द्वारा आरंभ किए गए आंदोलन को आमोस और होशे (होसिया) जैसे नबियों ने अधिक व्यापक और नैतिक स्वरूप प्रदान किया। इनका एकेश्वरवाद केवल धार्मिक आग्रह तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय, नैतिकता और मानव-कल्याण पर आधारित था। इनके अनुसार याहवे संपूर्ण विश्व का न्यायकारी ईश्वर है, जो केवल यज्ञ, बलि और अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि सत्य, दया और न्यायपूर्ण आचरण से प्रसन्न होता है।
संत आमोस स्वयं को कोई महान पैगंबर नहीं, बल्कि एक साधारण गड़ेरिया मानता था। ग्रामीण जीवन से जुड़े होने के कारण उसने नगरों की आर्थिक विषमता, धनिकों के अत्याचार और निर्धनों के शोषण को निकट से देखा था। उसने धनी वर्ग की कठोर शब्दों में आलोचना करते हुए कहा कि वे निर्धनों का अधिकार छीनकर विलासिता का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उसके अनुसार ऐसा अन्याय अधिक समय तक नहीं टिक सकता और ईश्वर अन्याय करने वालों को दंड अवश्य देगा।
आमोस ने स्पष्ट कहा कि धार्मिक उत्सव, व्रत, उपवास और यज्ञ तभी सार्थक हैं, जब मनुष्य का जीवन न्यायपूर्ण और नैतिक हो। यदि समाज में अन्याय, भ्रष्टाचार और शोषण विद्यमान हैं, तो केवल कर्मकांड ईश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। उसने लोगों से अन्याय का त्याग कर सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने का आग्रह किया। उसके विचारों में सामाजिक समानता, नैतिक उत्तरदायित्व और धार्मिक शुद्धता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
होशे ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इजरायल की नैतिक अधोगति की कठोर आलोचना की। उसका मत था कि जनता ने ईश्वर से विमुख होकर पाप, अन्याय और विदेशी प्रभावों को स्वीकार कर लिया है, जिसके कारण राज्य का पतन निश्चित है। उसने लोगों को चेतावनी दी कि यदि वे अपने आचरण में सुधार नहीं करेंगे तो विदेशी शक्तियों का आधिपत्य स्थापित हो जाएगा और राष्ट्र विनाश का सामना करेगा।
यशायाह और मीका का उदार धार्मिक दृष्टिकोण
इजरायल के पतन के पश्चात जब जूडा राज्य असीरियाई आक्रमणों के भय से घिरा हुआ था, तब यशायाह (आइजा) और मीका जैसे महान नबियों का उदय हुआ। ये अपने पूर्ववर्ती नबियों की अपेक्षा अधिक दूरदर्शी तथा राजनीतिक दृष्टि से परिपक्व थे। उनका विश्वास था कि केवल विदेशी राज्यों के सैन्य सहयोग से राज्य की रक्षा संभव नहीं है, बल्कि नैतिक शक्ति, ईश्वर में आस्था तथा न्यायपूर्ण शासन ही राष्ट्र को स्थायी सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं।
यशायाह ने जूडा के शासकों को सलाह दी कि वे राजनीतिक परिस्थितियों में विवेकपूर्ण नीति अपनाएँ और अनावश्यक युद्धों से बचें। उसने लोगों को याहवे पर विश्वास रखने तथा सत्य, न्याय और सदाचार का पालन करने की प्रेरणा दी। उसके अनुसार ईश्वर सभी शासकों और समाज के प्रभावशाली वर्गों के कार्यों का न्याय करेगा। उसने बलि, यज्ञ और बाह्य उपासना की अपेक्षा दीन-दुखियों, अनाथों और विधवाओं की सेवा को अधिक महत्त्व दिया।
मीका ने भी सामाजिक अन्याय, भ्रष्टाचार और धनिक वर्ग के शोषण का विरोध किया। उसके विचार में धर्म का वास्तविक स्वरूप करुणा, न्याय और सत्यनिष्ठा में निहित है। उसने स्पष्ट कहा कि ईश्वर मनुष्य से केवल यही अपेक्षा करता है कि वह न्याय करे, दया का पालन करे और विनम्रतापूर्वक धर्ममय जीवन व्यतीत करे। इस प्रकार यशायाह और मीका ने हिब्रू धर्म को नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और आध्यात्मिक आदर्शों की नई दिशा प्रदान की।
यिर्मयाह का सुधार आंदोलन
जब असीरियाई साम्राज्य का पतन हुआ, तब जूडा के लोगों में स्वतंत्रता की आशा जागी। किंतु शीघ्र ही नव-बेबिलोनियन (कैल्डियन) शक्ति का उदय हुआ और जूडा पर नया संकट मंडराने लगा। इसी संक्रमणकाल में महान नबी यिर्मयाह का आविर्भाव हुआ। वह अपने समय का सबसे यथार्थवादी तथा दूरदर्शी धार्मिक विचारक था। उसने जूडा के शासकों को चेतावनी दी कि वे परिस्थितियों को समझें और बेबिलोन के शक्तिशाली शासक नेबूकदनेस्सर द्वितीय का अनावश्यक विरोध न करें। उसके अनुसार यह ईश्वर की इच्छा थी कि तत्कालीन परिस्थितियों में बेबिलोन की सत्ता को स्वीकार किया जाए।
यिर्मयाह की इस नीति को तत्कालीन शासकों और जनता ने राष्ट्रविरोधी समझा। उसे देशद्रोही घोषित किया गया तथा अनेक प्रकार की यातनाएँ दी गईं। उसके उपदेशों की उपेक्षा की गई, किंतु जब 586 ईसा पूर्व में जेरूसलेम का पतन हुआ और यहूदी बेबिलोन की बंदी-प्रथा में चले गए, तब लोगों को उसकी भविष्यवाणियों की सत्यता का अनुभव हुआ।
यिर्मयाह की नैतिक शिक्षाएँ
यिर्मयाह केवल राजनीतिक दूरदर्शी ही नहीं था, बल्कि वह समाज के नैतिक उत्थान का भी समर्थक था। उसने स्पष्ट कहा कि जूडा का वास्तविक संकट बाहरी आक्रमण नहीं, बल्कि आंतरिक नैतिक पतन है। उसने लोगों से प्रश्न किया कि यदि पूरे नगर में एक भी न्यायप्रिय और सत्यनिष्ठ व्यक्ति मिल जाए, तो ईश्वर संपूर्ण जेरूसलेम को क्षमा कर सकता है। इस प्रकार उसने व्यक्तिगत चरित्र और सामाजिक नैतिकता को राष्ट्र की शक्ति का आधार बताया।
यिर्मयाह ने समाज में व्याप्त अनैतिक जीवन, व्यभिचार, लोभ, छल और अन्याय की कठोर आलोचना की। उसके अनुसार लोग धर्म के नाम पर बाहरी आडंबर तो करते हैं, किंतु उनके जीवन में सत्य, करुणा और ईमानदारी का अभाव है। उसने पुरोहितों तथा झूठे भविष्यवक्ताओं की भी निंदा की, जो स्वार्थवश जनता को भ्रमित करते थे। यिर्मयाह का मत था कि केवल बाहरी धार्मिक संस्कार पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि मनुष्य के हृदय और आचरण का शुद्ध होना अधिक आवश्यक है। उसने कहा कि वास्तविक धार्मिकता जीवन के आंतरिक परिवर्तन में निहित है, न कि केवल बाहरी कर्मकांडों में।
धार्मिक सुधार आंदोलन का स्वरूप
हिब्रू धर्म के सुधार आंदोलन का उद्देश्य केवल प्राचीन परंपराओं को पुनर्जीवित करना नहीं था। नबियों का प्रयास धर्म को उसकी मूल नैतिक भावना से जोड़ना था। उनका विश्वास था कि विदेशी प्रभावों, विलासिता, सामाजिक विषमता और धार्मिक आडंबरों के कारण हिब्रू समाज अपनी मौलिक सांस्कृतिक पहचान से दूर होता जा रहा है। इसलिए उन्होंने धर्म को पुनः सत्य, न्याय, करुणा और नैतिकता के आधार पर स्थापित करने का प्रयास किया।
नबियों ने यह प्रतिपादित किया कि याहवे केवल इजरायल का राष्ट्रीय देवता नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता का न्यायकारी ईश्वर है। उसकी दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं और वह किसी जाति या वर्ग का पक्षपाती नहीं है। ईश्वर को प्रसन्न करने का सर्वोत्तम उपाय बलि, यज्ञ अथवा बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण व्यवहार, दीन-दुखियों की सहायता, अनाथों और विधवाओं की रक्षा तथा सत्यनिष्ठ जीवन है। इस प्रकार हिब्रू धर्म में पहली बार नैतिक एकेश्वरवाद का सुदृढ़ विकास हुआ।
सामाजिक एवं आर्थिक पृष्ठभूमि
नबियों के सुधार आंदोलन के पीछे गंभीर सामाजिक और आर्थिक कारण भी विद्यमान थे। समय के साथ संपत्ति कुछ धनी परिवारों और सामंतों के हाथों में केंद्रित हो गई थी। बड़ी संख्या में कृषक अपनी भूमि और आर्थिक स्वतंत्रता खोकर संपन्न वर्ग पर आश्रित हो गए थे। करों का भार, बेगार, ऋणग्रस्तता तथा सामाजिक असमानता लगातार बढ़ रही थी। न्यायालयों में घूसखोरी का बोलबाला था और न्याय धन के आधार पर खरीदा-बेचा जाने लगा था।
धनिक वर्ग विलासिता और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा था, जबकि सामान्य जनता निर्धनता, शोषण और असुरक्षा से पीड़ित थी। इस विषमता ने समाज में व्यापक असंतोष उत्पन्न कर दिया। नबियों ने इन परिस्थितियों की खुलकर आलोचना की और आर्थिक शोषण तथा सामाजिक अन्याय को धर्मविरुद्ध बताया। उनके उपदेशों में निर्धनों के प्रति सहानुभूति तथा सामाजिक समानता की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
आंदोलन का प्रभाव और महत्त्व
पैगंबरी आंदोलन ने हिब्रू धर्म की दिशा और स्वरूप दोनों को बदल दिया। इस आंदोलन ने कर्मकांडप्रधान धर्म के स्थान पर नैतिक धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। सत्य, न्याय, दया, करुणा, ईमानदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व को धार्मिक जीवन का अनिवार्य अंग माना गया। यद्यपि तत्कालीन शासकों और समाज ने अधिकांश नबियों की शिक्षाओं की उपेक्षा की और उनके जीवनकाल में उनके प्रयासों को व्यापक सफलता नहीं मिली, फिर भी उनके विचारों ने हिब्रू धार्मिक परंपरा को स्थायी रूप से प्रभावित किया।
इन नबियों की शिक्षाओं ने आगे चलकर यहूदी धर्म की नैतिक चेतना को गहराई प्रदान की तथा ईसाई धर्म के विकास पर भी महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाला। न्याय, दया, मानव-सेवा और ईश्वर के प्रति आंतरिक निष्ठा जैसे आदर्श बाद की धार्मिक परंपराओं के आधार बने। इस प्रकार पैगंबरी आंदोलन ने हिब्रू समाज में धार्मिक, सामाजिक और नैतिक पुनर्जागरण की मजबूत आधारशिला स्थापित की, यद्यपि तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियाँ उसके उद्देश्यों की पूर्ण सफलता में बाधक बनी रहीं।
प्रवास अथवा बेबिलोनियन बंदीकाल
हिब्रू धर्म के विकास में नबियों द्वारा किए गए सुधारों के बाद एक नया चरण आरंभ हुआ, जिसे ‘बेबिलोनियन बंदीकाल’ या ‘प्रवास काल’ कहा जाता है। इस काल में हिब्रू धार्मिक जीवन, दर्शन और परंपराओं पर बेबिलोनिया की संस्कृति का गहरा प्रभाव पड़ा। 586 ईसा पूर्व में जेरूसलेम के पतन के पश्चात बड़ी संख्या में हिब्रुओं को बंदी बनाकर बेबिलोन ले जाया गया। लगभग आधी शताब्दी तक वहाँ रहने के कारण उनके धार्मिक विचारों और सामाजिक जीवन में अनेक परिवर्तन हुए। जब 539–538 ईसा पूर्व में फारसी सम्राट साइरस द्वितीय ने बेबिलोन पर अधिकार कर उन्हें स्वदेश लौटने की अनुमति दी, तब लौटने वाले हिब्रुओं पर बेबिलोनियन संस्कृति की स्पष्ट छाप दिखाई देती थी।
बेबिलोनियन प्रभाव और धार्मिक परिवर्तन
बेबिलोनियन प्रवास के दौरान हिब्रुओं के धार्मिक चिंतन में गंभीर परिवर्तन हुए। इसका प्रभाव विशेष रूप से ‘बुक ऑफ जॉब’ (अय्यूब ग्रंथ) में दिखाई देता है। इस ग्रंथ में ईश्वर को सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ बताया गया है और यह प्रतिपादित किया गया है कि मनुष्य उसकी योजनाओं और रहस्यों को पूर्णतः समझने में असमर्थ है। इसलिए ईश्वर की इच्छा को बिना विरोध स्वीकार करना ही उचित है।
इस काल में केवल धार्मिक सिद्धांत ही नहीं बदले, बल्कि धार्मिक व्यवहार और अनुष्ठानों का भी विस्तार हुआ। अपने धर्म और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से हिब्रुओं ने कर्मकांडों को अधिक संगठित और कठोर बनाया। सब्बाथ (विश्राम दिवस), मंदिर-पूजा, खतना, भोजन की शुद्धि-अशुद्धि तथा धार्मिक नियमों के पालन को विशेष महत्त्व दिया जाने लगा। यद्यपि इन परंपराओं का अस्तित्व पहले भी था, किंतु बंदीकाल में इन्हें अधिक प्रतिष्ठा और अनिवार्यता प्राप्त हुई।
पुरोहितों की बढ़ती भूमिका
कर्मकांडों के विस्तार के साथ पुरोहितों का प्रभाव भी अत्यधिक बढ़ गया। धार्मिक जीवन के संचालन में उनकी भूमिका निर्णायक बन गई। परिणामस्वरूप हिब्रू धर्म में नैतिक उपदेशों की अपेक्षा विधि-विधान और अनुष्ठानों का महत्त्व बढ़ने लगा। धार्मिक संगठन अधिक संस्थागत हो गया तथा मंदिर धार्मिक और सामाजिक जीवन के केंद्र बन गए। इस प्रकार हिब्रू धर्म का स्वरूप क्रमशः पुरोहित-प्रधान होता गया।
इजकील का धार्मिक दृष्टिकोण
बेबिलोन प्रवास के समय नबी इजकील (यहेजकेल) ने हिब्रुओं को यह समझाया कि उनकी दुर्दशा उनके अपने पापों और धार्मिक विचलन का परिणाम है। उसने विदेशी देवताओं की उपासना करने वाले जेरूसलेम की कठोर आलोचना की और उसे नैतिक पतन का प्रतीक बताया।
किंतु इजकील केवल दंड और विनाश का प्रवक्ता नहीं था। उसने भविष्य के प्रति आशा भी व्यक्त की। उसके अनुसार एक समय ऐसा आएगा जब ईश्वर अपने लोगों पर पुनः कृपा करेगा, बेबिलोन में बंदी बनाए गए हिब्रू अपने देश लौटेंगे, जेरूसलेम का पुनर्निर्माण होगा, मंदिर फिर से स्थापित किया जाएगा तथा ईश्वर के संरक्षण में एक आदर्श समाज का निर्माण होगा। उसने धार्मिक जीवन में पुरोहितों की महत्त्वपूर्ण भूमिका का भी समर्थन किया।
यशायाह द्वितीय का संदेश
प्रवास काल में यशायाह द्वितीय (आइजा द्वितीय) ने भी हिब्रू धर्म को नई दिशा प्रदान की। उसने याहवे की कल्पना केवल युद्ध और प्रतिशोध के देवता के रूप में नहीं, बल्कि करुणामय, दयालु और विश्वव्यापी ईश्वर के रूप में प्रस्तुत किया। उसके अनुसार ईश्वर अपने भक्तों का उद्धार करने वाला पिता है, जो पश्चाताप करने वालों को क्षमा करता है।
यशायाह द्वितीय ने यह भविष्यवाणी की कि फारस का महान शासक साइरस द्वितीय बेबिलोन पर विजय प्राप्त करेगा और हिब्रुओं को दासता से मुक्त कर उनके स्वदेश लौटने का मार्ग प्रशस्त करेगा। उसने एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना भी की, जहाँ शांति, समानता और न्याय का राज्य होगा। उसके उपदेशों में यह विश्वास प्रकट होता है कि ईश्वर के राज्य में हिंसा और वैरभाव समाप्त हो जाएगा तथा संपूर्ण समाज शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करेगा।
प्रवासोत्तर अथवा पारसीक प्रभावकाल
हिब्रू धर्म का अगला चरण प्रवासोत्तर अथवा पारसीक प्रभावकाल कहलाता है। इसका आरंभ फारसी सम्राट साइरस द्वितीय द्वारा 539 ईसा पूर्व में बेबिलोन विजय के पश्चात हुआ। साइरस एक शक्तिशाली होने के साथ-साथ दूरदर्शी और उदार शासक था। उसने विभिन्न पराजित जातियों के साथ सहिष्णु नीति अपनाई। इसी नीति के अंतर्गत उसने हिब्रुओं को जेरूसलेम लौटकर अपने मंदिर और धार्मिक जीवन का पुनर्निर्माण करने की अनुमति प्रदान की।
साइरस ने केवल स्वदेश लौटने की अनुमति ही नहीं दी, बल्कि जेरूसलेम के मंदिर से लूटी गई अनेक पवित्र वस्तुएँ भी वापस कराईं तथा पुनर्निर्माण के लिए राजकीय सहायता दी। यद्यपि अनेक हिब्रू बेबिलोन में ही बस गए, फिर भी पर्याप्त संख्या में लोग अपने देश लौट आए और उन्होंने धार्मिक तथा सामाजिक पुनर्गठन का कार्य प्रारंभ किया।
पारसीक धर्म का प्रभाव
स्वदेश लौटने वाले हिब्रुओं पर पारसीक धर्म और संस्कृति का गहरा प्रभाव पड़ा। बंदीकाल से पूर्व हिब्रू धर्म मुख्यतः लौकिक था। मृत्यु के बाद के जीवन, पुनरुत्थान, स्वर्ग-नरक अथवा अंतिम न्याय जैसी धारणाओं का उसमें स्पष्ट विकास नहीं हुआ था। इसी प्रकार ईश्वर के विरोधी किसी स्वतंत्र दुष्ट शक्ति या शैतान की भी स्पष्ट अवधारणा नहीं थी।
पारसीक धर्म के संपर्क में आने के बाद हिब्रू धार्मिक चिंतन में अनेक नए तत्त्व सम्मिलित हुए। अब उन्होंने अच्छाई और बुराई की दो विरोधी शक्तियों की धारणा को स्वीकार करना प्रारंभ किया। साथ ही, मसीहा (त्राता) के आगमन, मृतकों के पुनरुत्थान, अंतिम न्याय तथा परलोक में पुरस्कार और दंड जैसी मान्यताएँ विकसित होने लगीं। इन विश्वासों ने हिब्रू धर्म को अधिक आध्यात्मिक और परलोकवादी स्वरूप प्रदान किया।
धार्मिक ग्रंथों की पवित्रता
पारसीक प्रभाव के पश्चात हिब्रुओं में यह विश्वास दृढ़ हुआ कि उनके पवित्र ग्रंथ दैवी प्रेरणा से रचे गए हैं। इजकील तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों को ईश्वर-प्रदत्त मानकर उन्हें सर्वोच्च धार्मिक अधिकार प्रदान किया गया। परिणामस्वरूप धर्मग्रंथों के अध्ययन, संरक्षण और व्याख्या का कार्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन गया तथा धार्मिक जीवन का केंद्र शास्त्र और उसके नियम बनने लगे।
इसी काल में हिब्रू धर्म का स्वरूप अधिक संगठित, शास्त्राधारित और अनुशासित हुआ। बाद में यही धार्मिक धारणाएँ यहूदी धर्म के परिपक्व स्वरूप का आधार बनीं तथा इन्हीं से ईसाई धर्म की अनेक मूल अवधारणाओं का भी विकास हुआ।
कला एवं स्थापत्य
हिब्रू सभ्यता का सर्वाधिक विकास धर्म, नैतिकता और आध्यात्मिक चिंतन के क्षेत्र में हुआ, जबकि ललित कलाओं का विकास अपेक्षाकृत सीमित रहा। इसका प्रमुख कारण उनका धार्मिक दृष्टिकोण था। हिब्रू धर्म मूर्तिपूजा का विरोधी था, इसलिए मूर्तिकला जैसी कलाओं को प्रोत्साहन नहीं मिल सका। उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वर निराकार और सर्वोच्च सत्ता था, अतः उसकी प्रतिमा बनाकर पूजा करना अनुचित माना जाता था। फलस्वरूप मूर्तिकला का वह उत्कर्ष यहाँ नहीं दिखाई देता जो मिस्र, मेसोपोटामिया अथवा यूनान में विकसित हुआ।
यद्यपि मूर्तिकला का विकास सीमित था, फिर भी वास्तुकला के क्षेत्र में हिब्रुओं ने उल्लेखनीय कार्य किए। विशेषकर राजा सुलैमान के शासनकाल में जेरूसलेम को एक भव्य नगरी के रूप में विकसित किया गया। उसने नगर के दुर्ग को सुदृढ़ कराया, विशाल राजप्रासाद का निर्माण कराया तथा प्रसिद्ध जेरूसलेम मंदिर का निर्माण करवाया, जो हिब्रू धार्मिक जीवन का प्रमुख केंद्र बन गया। इसी काल में विशाल अश्वशालाओं तथा अन्य राजकीय भवनों का भी निर्माण हुआ। इन निर्माण कार्यों में फिनीशिया, विशेषकर टायर के शिल्पियों और कारीगरों की सहायता ली गई थी।
हिब्रू समाज में संगीत को भी विशेष महत्त्व प्राप्त था। धार्मिक अनुष्ठानों, पर्वों तथा यात्रा-समारोहों में सामूहिक भजन-गायन, वीणा, तुरही और अन्य वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता था। धार्मिक मंत्रों तथा स्तोत्रों का सस्वर पाठ उनकी उपासना-पद्धति का अभिन्न अंग था। इस प्रकार यद्यपि ललित कला का विकास सीमित रहा, फिर भी धार्मिक संगीत और वास्तुकला ने उनकी सांस्कृतिक परंपरा को समृद्ध बनाया।
बौद्धिक उपलब्धियाँ
साहित्य
हिब्रू सभ्यता की सबसे महान उपलब्धि उसका साहित्य है। विश्व के प्राचीन साहित्य में ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ (पुराना नियम) का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि इतिहास, दर्शन, नीति, काव्य और सामाजिक जीवन का भी महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसकी रचना एक ही समय में नहीं हुई, बल्कि कई शताब्दियों में विभिन्न लेखकों और परंपराओं द्वारा क्रमशः संकलित की गई।
परंपरा के अनुसार इसकी रचना का श्रेय मूसा को दिया जाता है, किंतु आधुनिक इतिहासकारों और बाइबिल-विशेषज्ञों का मत है कि इसके विभिन्न भाग भिन्न-भिन्न कालों में लिखे गए। इसके प्राचीनतम अंश सामान्यतः नौवीं–आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व के माने जाते हैं, जबकि अनेक ग्रंथों का अंतिम रूप फारसी और हेलेनिस्टिक युग में प्राप्त हुआ। इस प्रकार ओल्ड टेस्टामेंट विभिन्न युगों की धार्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परंपराओं का संकलित रूप है।
ओल्ड टेस्टामेंट में इतिहास, धार्मिक विधि, भविष्यवाणी, नीति, दर्शन और काव्य का अद्भुत समन्वय मिलता है। यही कारण है कि इसका प्रभाव केवल यहूदी धर्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ईसाई और इस्लामी परंपराओं पर भी गहरा पड़ा।
हिब्रू काव्य
हिब्रू काव्य का प्रारंभ मूसा तथा डेबोरा के विजय-गीतों से माना जाता है। इसके बाद स्तोत्र, धार्मिक गीत और प्रेमकाव्य की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। स्तोत्र-संग्रह हिब्रू साहित्य की सर्वाधिक प्रसिद्ध काव्य-कृतियों में से एक है। परंपरा इन्हें राजा डेविड से जोड़ती है, किंतु विद्वानों का मत है कि इनकी रचना विभिन्न कालों में अनेक कवियों द्वारा की गई और बाद में इनका संकलन किया गया।
हिब्रू स्तोत्रों पर मेसोपोटामिया तथा मिस्र के धार्मिक साहित्य का प्रभाव भी देखा जाता है। विशेष रूप से मिस्र के फ़राओ इख्नातेन के सूर्य-स्तोत्रों से कुछ वैचारिक समानताएँ विद्वानों ने इंगित की हैं। इन स्तोत्रों का उद्देश्य केवल काव्य-रस उत्पन्न करना नहीं था, बल्कि श्रद्धा, भक्ति, नैतिकता और धार्मिक आस्था को सुदृढ़ करना था। इनमें याहवे को दयालु, न्यायप्रिय और सर्वशक्तिमान ईश्वर के रूप में चित्रित किया गया है, जो सदाचारी लोगों की रक्षा करता है तथा पापियों को दंड देता है।
सुलैमान के गीत
हिब्रू साहित्य में ‘सॉन्ग ऑफ सॉन्ग्स’ (गीत-गीतों का ग्रंथ) अथवा ‘सुलैमान के गीत’ का विशिष्ट स्थान है। यह अन्य धार्मिक ग्रंथों से भिन्न प्रेम और सौंदर्य पर आधारित एक उत्कृष्ट काव्य-ग्रंथ है। इसमें स्त्री-पुरुष के प्रेम, प्रकृति के सौंदर्य तथा मानवीय भावनाओं का अत्यंत कोमल, मार्मिक और कलात्मक चित्रण मिलता है।
विद्वानों का मत है कि इन गीतों पर कैनानी, फिनीशियाई तथा मेसोपोटामियाई प्रेम-काव्य का प्रभाव विद्यमान है। इनमें उर्वरता-पूजा, वसन्तोत्सव तथा प्रेम-परंपराओं की झलक दिखाई देती है। कुछ विद्वान इन पर मिस्री प्रेमगीतों तथा हेलेनिस्टिक प्रभाव की भी सम्भावना स्वीकार करते हैं। यद्यपि परंपरा इन्हें सुलैमान की रचना मानती है, परंतु अधिकांश आधुनिक विद्वानों का मत है कि इनका संकलन बाद के काल में हुआ। इन गीतों का बाइबिल में सम्मिलित होना विशेष महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वे धार्मिक उपदेशों के स्थान पर मानवीय प्रेम और सौंदर्य का उत्सव प्रस्तुत करते हैं और ईश्वर तथा उसके भक्तों के आध्यात्मिक प्रेम का भी प्रतीक माना जाता है।
सूक्तिग्रंथ
हिब्रू साहित्य में नीतिवचन अथवा सूक्तिग्रंथ का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसमें जीवन के व्यावहारिक अनुभवों, नैतिक आदर्शों और सामाजिक व्यवहार से संबंधित अनेक शिक्षाप्रद सूक्तियाँ संकलित हैं। इनमें सत्य, परिश्रम, संयम, विनम्रता, न्याय और विवेकपूर्ण जीवन का समर्थन किया गया है। इन सूक्तियों में आलस्य की निंदा करते हुए परिश्रम को सफलता का आधार बताया गया है। अत्यधिक महत्त्वाकांक्षा, व्यर्थ विवाद, असंयम और अनैतिक आचरण से बचने की शिक्षा दी गई है। परिवार, समाज और दाम्पत्य जीवन की मर्यादा पर विशेष बल दिया गया है। विशेष रूप से परस्त्रीगमन के दुष्परिणामों का उल्लेख करते हुए सदाचार का पालन करने की प्रेरणा दी गई है। यद्यपि परंपरा इन्हें राजा सुलैमान से संबद्ध करती है, किंतु विद्वानों का मत है कि इनका बड़ा भाग मिस्री, मेसोपोटामियाई तथा अन्य प्राचीन पूर्वी परंपराओं से प्रभावित है और इनका वर्तमान स्वरूप अपेक्षाकृत बाद के काल में विकसित हुआ।
बुक ऑफ जॉब
हिब्रू साहित्य की सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक कृतियों में ‘बुक ऑफ जॉब’ (अय्यूब ग्रंथ) का विशेष स्थान है। इसमें मनुष्य के दुःख, ईश्वर के न्याय और जीवन के रहस्यों पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया गया है। इसका मूल कथानक संभवतः प्राचीन मेसोपोटामियाई परंपराओं से प्रेरित था, किंतु हिब्रू लेखकों ने उसे उच्च दार्शनिक स्वरूप प्रदान किया। इस ग्रंथ का नायक अय्यूब (जॉब) एक धर्मनिष्ठ, संपन्न और सदाचारी व्यक्ति है। उसके पास विशाल धन-संपत्ति, अनेक पशु, दास-दासियाँ तथा सुखी परिवार था। अचानक वह अनेक विपत्तियों का शिकार हो जाता है। उसकी संपत्ति नष्ट हो जाती है, उसके पुत्र-पुत्रियों की मृत्यु हो जाती है और वह स्वयं असाध्य रोग से पीड़ित हो जाता है।
प्रारंभ में अय्यूब इन सभी कष्टों को ईश्वर की इच्छा मानकर धैर्यपूर्वक सहन करता है, किंतु निरंतर पीड़ा के कारण उसके मन में प्रश्न उठने लगते हैं कि यदि वह निर्दोष है तो उसे इतना दुःख क्यों सहना पड़ रहा है। उसके मित्र यह तर्क देते हैं कि प्रत्येक कष्ट मनुष्य के पापों का परिणाम होता है, किंतु अय्यूब स्वयं को निर्दोष मानता है और इस तर्क से संतुष्ट नहीं होता। यही संवाद इस ग्रंथ का मुख्य दार्शनिक आधार बनता है।
ग्रंथ के वर्तमान स्वरूप में आरंभ में ईश्वर और शैतान के मध्य एक संवाद जोड़ा गया है। शैतान यह सिद्ध करना चाहता है कि अय्यूब की धार्मिकता केवल उसके सुख और समृद्धि का परिणाम है। इसलिए ईश्वर उसकी परीक्षा लेने की अनुमति देता है। अंततः ईश्वर स्वयं अय्यूब के समक्ष प्रकट होकर यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य की बुद्धि सीमित है और वह सृष्टि तथा ईश्वर की योजनाओं के रहस्यों को पूर्णतः नहीं समझ सकता।
अय्यूब अपनी सीमाओं को स्वीकार करता है और ईश्वर के प्रति पुनः समर्पित हो जाता है। तब ईश्वर उसे पहले से अधिक समृद्धि, संतान और वैभव प्रदान करता है। इस प्रकार यह ग्रंथ यह प्रतिपादित करता है कि मनुष्य को विपत्तियों में भी धैर्य, आस्था और नैतिकता का परित्याग नहीं करना चाहिए। ईश्वर की व्यवस्था मनुष्य की सीमित बुद्धि से परे है, इसलिए सच्चे विश्वास और धैर्य का अंततः शुभ फल प्राप्त होता है।
आख्यान साहित्य
हिब्रू साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका समृद्ध आख्यान साहित्य है। ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में काव्य के साथ-साथ अनेक धार्मिक, ऐतिहासिक तथा नैतिक आख्यान सुरक्षित हैं। इनमें सृष्टि की उत्पत्ति, महाप्रलय (जल-प्लावन), पूर्वजों के जीवन, वीर पुरुषों, नायकों तथा धार्मिक व्यक्तित्वों से संबंधित कथाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन आख्यानों का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं था, बल्कि धार्मिक आस्था, नैतिक आदर्शों तथा सामाजिक मूल्यों का प्रसार करना भी था।
हिब्रू आख्यानों में विश्व-सृष्टि और महाप्रलय की कथाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कथाओं में ईश्वर की सृष्टि-शक्ति, मानव जीवन की उत्पत्ति, पाप और दंड की अवधारणा तथा मानव और ईश्वर के संबंधों का वर्णन किया गया है। विद्वानों का मत है कि इन आख्यानों पर पश्चिम एशिया की प्राचीन मेसोपोटामियाई परंपराओं का भी प्रभाव दिखाई देता है, किंतु हिब्रू लेखकों ने उन्हें अपने धार्मिक दृष्टिकोण के अनुरूप नया स्वरूप प्रदान किया।
ओल्ड टेस्टामेंट में अनेक प्रेमकथाएँ, वीरगाथाएँ, युद्ध-वर्णन, धार्मिक गीत तथा ईश्वर के दूतों (नबियों) के संदेश भी संग्रहीत हैं। इनकी भाषा भावपूर्ण, प्रभावशाली तथा साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत उच्चकोटि की है। इनमें आस्था, त्याग, साहस, प्रेम, निष्ठा और न्याय जैसे आदर्शों का प्रभावशाली चित्रण मिलता है।
हिब्रू आख्यान साहित्य में अब्राहम, इसहाक, रिबका, याकूब (जेकब), राहेल (रेचल), यूसुफ (जोसिफ), बिंयामीन (बेंजामिन), सामसन (सैम्सन), दलीला (डिलाइला), एस्तेर (ईश्टर), जूडिथ तथा दानिय्येल (डेनियल) जैसे पात्रों की कथाएँ विश्व साहित्य में अत्यंत प्रसिद्ध हैं। इन कथाओं में मानव जीवन के विविध पक्षों- संघर्ष, विश्वास, कर्तव्य, पारिवारिक संबंध, त्याग, नेतृत्व तथा ईश्वर-भक्ति का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया गया है। इसी कारण हिब्रू आख्यान साहित्य का प्रभाव आगे चलकर यहूदी, ईसाई तथा इस्लामी धार्मिक परंपराओं पर भी पड़ा।
इतिहास या ऐतिहासिक साहित्य
हिब्रू सभ्यता की एक विशिष्ट उपलब्धि इतिहास लेखन की समृद्ध परंपरा थी। प्राचीन विश्व की अनेक सभ्यताओं में जहाँ इतिहास का स्वरूप मुख्यतः राजाओं की विजयगाथाओं तक सीमित था, वहीं हिब्रू लेखकों ने अपने धार्मिक, राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन की घटनाओं को क्रमबद्ध रूप से सुरक्षित रखने का प्रयास किया। इस कारण ओल्ड टेस्टामेंट केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि प्राचीन इजरायल के इतिहास का भी एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
इतिहास संबंधी सामग्री मुख्यतः जोशुआ, जजेज, सैमुएल, किंग्स तथा क्रॉनिकल्स जैसे ग्रंथों में सुरक्षित है। इन ग्रंथों में कनान पर अधिकार, न्यायाधीशों का शासन, संयुक्त राज्य की स्थापना, साऊल, दाऊद (डेविड) और सुलैमान (सुलैमान) के शासन, राज्य के विभाजन, इजरायल और जूडा के राजनीतिक उत्थान-पतन तथा विदेशी आक्रमणों का विस्तृत विवरण मिलता है। इन इतिहास ग्रंथों का उद्देश्य केवल घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन करना नहीं था। इनके लेखकों ने प्रत्येक राजनीतिक घटना को धार्मिक दृष्टि से भी व्याख्यायित किया। उनके अनुसार राज्य की समृद्धि या पतन का मूल कारण शासकों तथा जनता का नैतिक आचरण और ईश्वर के प्रति उनकी निष्ठा थी। इसलिए इन ग्रंथों में इतिहास और धर्म का घनिष्ठ समन्वय दिखाई देता है।
अनेक इतिहासकारों का मत है कि इन ग्रंथों का अंतिम संकलन बेबिलोन की बंदी-स्थिति के पश्चात् किया गया, ताकि हिब्रू समाज अपनी ऐतिहासिक परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान तथा धार्मिक विश्वासों को सुरक्षित रख सके। यद्यपि इनमें धार्मिक दृष्टिकोण का प्रभाव स्पष्ट है, फिर भी प्राचीन इजरायल के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन में इनका विशेष महत्त्व है।
दर्शन
दर्शन के क्षेत्र में हिब्रुओं का स्थान प्राचीन पाश्चात्य सभ्यताओं में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यद्यपि वे यूनानी दार्शनिकों की भाँति तर्कप्रधान तत्त्वमीमांसा के विकास में अधिक आगे नहीं बढ़ सके, फिर भी मानव जीवन, नैतिकता, भाग्य तथा ईश्वर के संबंध में उनके विचार अत्यंत मौलिक और प्रभावशाली थे। भारतीय दर्शन की भाँति उन्होंने भी जीवन के नैतिक पक्ष को विशेष महत्त्व दिया।
हिब्रू दार्शनिक चिंतन का प्रमुख उद्देश्य ब्रह्मांड की उत्पत्ति या पदार्थ की प्रकृति का विश्लेषण करना नहीं था, बल्कि मनुष्य के जीवन, उसके कर्तव्यों, नैतिक आचरण तथा ईश्वर के साथ उसके संबंधों की व्याख्या करना था। उनके अनुसार धर्म, सदाचार, आत्मसंयम और न्यायपूर्ण जीवन ही मानव कल्याण का आधार हैं।
इनकी दार्शनिक प्रवृत्ति का उत्कृष्ट रूप ‘बुक ऑफ प्रोवर्ब्स’ (नीतिवचन) तथा ‘एक्लीज़ियास्टिस’ जैसे ग्रंथों में दिखाई देता है। विद्वानों का मत है कि इन ग्रंथों का अंतिम रूप बाद के काल में विकसित हुआ तथा इन पर मिस्र और पश्चिम एशिया की ज्ञान-परंपराओं का भी प्रभाव है। इनका मुख्य उद्देश्य मनुष्य को संयमी, परिश्रमी, बुद्धिमान, ईमानदार और नैतिक जीवन अपनाने की प्रेरणा देना था। इनके अनुसार विवेक, परिश्रम और सदाचार से ही व्यक्ति को सम्मान, सफलता और दीर्घायु प्राप्त होती है।
एक्लीज़ियास्टिस का दार्शनिक दृष्टिकोण
हिब्रू दर्शन का सर्वाधिक परिपक्व स्वरूप ‘एक्लीज़ियास्टिस’ में दिखाई देता है। परंपरागत रूप से इसकी रचना का श्रेय सुलैमान को दिया जाता है, किंतु आधुनिक विद्वान इसे उत्तरवर्ती काल, संभवतः तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की रचना मानते हैं।
इस ग्रंथ में जीवन की अनित्यता, समय की निरंतरता तथा संसार की चक्रीय व्यवस्था का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार प्रकृति का क्रम निरंतर चलता रहता है। सूर्य प्रतिदिन उदित और अस्त होता है, नदियाँ समुद्र में मिलती रहती हैं, पीढ़ियाँ आती और चली जाती हैं, किंतु संसार का मूल क्रम अपरिवर्तित रहता है। जो कुछ वर्तमान में नया प्रतीत होता है, वह भी किसी न किसी रूप में अतीत में घटित हो चुका होता है।
ग्रंथ के अनुसार मानव जीवन भाग्य और समय के अधीन है। केवल परिश्रम से सफलता की गारंटी नहीं मिलती। कभी बुद्धिमान व्यक्ति भी असफल हो जाता है और कभी साधारण व्यक्ति सफलता प्राप्त कर लेता है। जन्म, मृत्यु, सुख, दुःख, प्रेम, घृणा, निर्माण और विनाश—सभी का अपना निश्चित समय होता है। इसलिए मनुष्य को जीवन की अनिश्चितताओं को धैर्यपूर्वक स्वीकार करना चाहिए।
संशयवाद, संयम और नैतिक जीवन
एक्लीज़ियास्टिस में संशयवाद और यथार्थवाद दोनों के तत्त्व दिखाई देते हैं। इसमें कहा गया है कि अंतिम सत्य को पूर्णतः जान पाना मनुष्य की क्षमता से बाहर है। मनुष्य और अन्य प्राणियों का जीवन भी अंततः नश्वर है तथा सभी मृत्यु के बाद मिट्टी में मिल जाते हैं। इस दृष्टिकोण में सांसारिक वैभव, धन, प्रसिद्धि और भोग-विलास को क्षणभंगुर बताया गया है।
ग्रंथ में यह भी कहा गया है कि धन-संपत्ति से स्थायी सुख प्राप्त नहीं होता। धनवान व्यक्ति अनेक चिंताओं से घिरा रहता है, जबकि परिश्रमी श्रमिक अल्प साधनों में भी शांति से विश्राम कर सकता है। इसी प्रकार अत्यधिक महत्त्वाकांक्षा, क्रोध, अहंकार और अतिरेकपूर्ण व्यवहार को अनुचित माना गया है।
एक्लीज़ियास्टिस आत्मसंयम, संतुलित जीवन और मध्यम मार्ग का समर्थन करता है। इसके अनुसार न अत्यधिक भोग उचित है और न ही अनावश्यक कठोर तपस्या। मनुष्य को अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हुए विवेकपूर्ण, संयमित और नैतिक जीवन व्यतीत करना चाहिए। यही जीवन को सार्थक और संतुलित बनाने का सर्वोत्तम मार्ग है।
हिब्रू सभ्यता की महत्ता एवं देन
हिब्रू सभ्यता राजनीतिक दृष्टि से बेबिलोन, असीरिया और मिस्र जैसी समकालीन महाशक्तियों की तुलना में अपेक्षाकृत छोटी थी, किंतु धार्मिक, नैतिक तथा वैचारिक क्षेत्र में उसका प्रभाव अत्यंत व्यापक और स्थायी रहा। यद्यपि हिब्रुओं ने विशाल साम्राज्य की स्थापना नहीं की, फिर भी उनके धार्मिक विचारों, नैतिक सिद्धांतों तथा साहित्य ने प्राचीन और आधुनिक विश्व की सभ्यता को गहराई से प्रभावित किया। डेविड (दाऊद), सुलैमान, आमोस, होशे (होशेआ) तथा अन्य नबियों ने हिब्रू समाज में जो धार्मिक एवं नैतिक चेतना विकसित की, उसका विश्व इतिहास पर स्थायी प्रभाव पड़ा।
धर्म, शासन और साहित्य पर प्रभाव
हिब्रू सभ्यता की सबसे बड़ी देन उसका एकेश्वरवादी धर्म और नैतिक जीवन-दृष्टि है। ईसाई तथा इस्लाम धर्म के अनेक मूल सिद्धांत, जैसे एक ईश्वर की अवधारणा, ईश्वर को न्यायी और विधिदाता मानना, सृष्टि एवं महाप्रलय की कथाएँ तथा नैतिक आचरण का महत्त्व हिब्रू धार्मिक परंपराओं से प्रभावित हैं। ओल्ड टेस्टामेंट ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल का अभिन्न अंग है। ईसा मसीह स्वयं हिब्रू परंपरा से जुड़े थे और उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनका उद्देश्य प्राचीन धार्मिक नियमों को समाप्त करना नहीं, बल्कि उन्हें पूर्णता प्रदान करना है।
हिब्रू सभ्यता ने शासन और विधि के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सीमित राजसत्ता, विधि की सर्वोच्चता, व्यक्तिगत उत्तरदायित्व तथा नैतिक शासन जैसे सिद्धांतों ने आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के विकास को प्रभावित किया। मानवाधिकार, सामाजिक न्याय तथा स्वतंत्र समाज की अवधारणाओं के विकास में हिब्रू धार्मिक विचारों का भी उल्लेखनीय योगदान माना जाता है।
साहित्य के क्षेत्र में हिब्रुओं की उपलब्धियाँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। ओल्ड टेस्टामेंट विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है, जिसमें इतिहास, काव्य, दर्शन, नीति तथा धार्मिक विचारों का उत्कृष्ट समन्वय मिलता है। इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और इटली के मध्यकालीन तथा आधुनिक साहित्य को समझने के लिए ओल्ड टेस्टामेंट का ज्ञान अत्यंत उपयोगी माना जाता है। साप्ताहिक विश्राम (सब्बाथ) की परंपरा भी हिब्रू धार्मिक मान्यताओं से ही विकसित हुई और बाद में विश्व के अनेक समाजों ने इसे अपनाया।
वर्णमाला के आविष्कार का श्रेय परंपरागत रूप से फीनीशियनों को दिया जाता रहा है। यद्यपि इस विषय पर विद्वानों में मतभेद है, फिर भी यह निर्विवाद है कि हिब्रुओं ने भाषा, साहित्य, धर्म, नैतिकता और सांस्कृतिक परंपराओं के विकास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, जिसने विश्व सभ्यता के इतिहास को स्थायी रूप से प्रभावित किया।
हिब्रू सभ्यता से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs
1. हिब्रू सभ्यता का उद्भव कहाँ हुआ था?
उत्तर : हिब्रू सभ्यता का उद्भव पश्चिमी एशिया के प्राचीन फिलिस्तीन (कनान) क्षेत्र में हुआ था। यह क्षेत्र भूमध्यसागर के पूर्वी तट पर स्थित था। हिब्रू लोग प्राचीन सेमेटिक भाषा-परिवार से संबंधित थे और उनकी सभ्यता का विकास मुख्यतः इस क्षेत्र में हुआ।
2. हिब्रू सभ्यता के प्रमुख पूर्वज किसे माना जाता है?
हिब्रू परंपरा में अब्राहम को इस समुदाय का प्रमुख पूर्वज माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अब्राहम मेसोपोटामिया के ऊर नगर से कनान प्रदेश आए थे। उनके पुत्र इसहाक और पौत्र याकूब को भी हिब्रू वंश परंपरा में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। याकूब को इज़राइल नाम से भी जाना जाता है।
3. हिब्रू सभ्यता में एकेश्वरवाद का क्या महत्त्व था?
हिब्रू सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता एकेश्वरवाद थी। हिब्रू लोग यहोवा को अपना एकमात्र ईश्वर मानते थे। उनका विश्वास था कि ईश्वर ने उनके साथ एक विशेष धार्मिक वाचा स्थापित की है। इस धार्मिक परंपरा ने यहूदी धर्म के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा आगे चलकर ईसाई और इस्लाम धर्म की धार्मिक परंपराओं को भी प्रभावित किया।
4. हिब्रू सभ्यता में मूसा का क्या योगदान था?
उत्तर : मूसा हिब्रू धार्मिक परंपरा के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्वों में से एक थे। बाइबिल की परंपरा के अनुसार उन्होंने हिब्रू लोगों को मिस्र की दासता से मुक्त कराया और उन्हें मिस्र से बाहर निकालकर सिनाई पर्वत तक पहुँचाया। यहीं उन्हें ईश्वर से दस आज्ञाएँ प्राप्त हुईं। इन आज्ञाओं ने हिब्रू समाज के धार्मिक, नैतिक और सामाजिक जीवन को दिशा प्रदान की।
5. प्राचीन हिब्रू राज्य की स्थापना किन शासकों के शासनकाल में हुई थी?
हिब्रू परंपरा के अनुसार शाऊल को प्राचीन इज़राइली राज्य का पहला राजा माना जाता है। उसके बाद दाऊद ने शासन किया और यरूशलेम को अपनी राजधानी बनाया। दाऊद के उत्तराधिकारी सुलैमान के शासनकाल में राज्य ने राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उन्नति प्राप्त की। सुलैमान ने यरूशलेम में प्रथम मंदिर का निर्माण कराया, जो हिब्रू धार्मिक जीवन का प्रमुख केंद्र बना।
6. हिब्रू सभ्यता के पतन और विभाजन के प्रमुख कारण क्या थे?
सुलैमान की मृत्यु के बाद लगभग 930 ईसा पूर्व हिब्रू राज्य दो भागों में विभाजित हो गया। उत्तरी राज्य इज़राइल तथा दक्षिणी राज्य यहूदा कहलाया। आंतरिक राजनीतिक संघर्ष और बाहरी आक्रमणों ने दोनों राज्यों को कमजोर कर दिया। 722 ईसा पूर्व में असीरियाई शासक ने उत्तरी इज़राइल राज्य पर अधिकार कर लिया, जबकि 586 ईसा पूर्व में नव-बेबीलोनियाई शासक नबूकदनेस्सर द्वितीय ने यरूशलेम पर आक्रमण करके यहूदा राज्य को पराजित किया और प्रथम मंदिर को नष्ट कर दिया। इसके बाद अनेक हिब्रू लोगों को बेबीलोन निर्वासित कर दिया गया।


