मौलाना फ़ख़रुद्दीन देहलवी (फ़ख़्र-ए-पाक)
परिचय
हज़रत मौलाना फ़ख़रुद्दीन देहलवी अठारहवीं शताब्दी के दिल्ली के प्रसिद्ध सूफ़ी संत और इस्लामी विद्वान थे। उन्हें ‘फ़ख़्र-ए-पाक’, ‘फ़ख़्र-ए-जहाँ’ और पैग़ंबर मुहम्मद के प्रति गहरी भक्ति के कारण ‘मुहिब्बुन नबी’ (पैग़ंबर के प्रेमी) कहा जाता है। वे भारत के सबसे प्रतिभाशाली इस्लामी विद्वानों में गिने जाते हैं और चिश्ती सिलसिले के सबसे लोकप्रिय संतों में से एक थे।
कहा जाता है कि ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और उनके आरंभिक उत्तराधिकारियों, यानी पाँच बड़े चिश्ती संतों, के बाद इस सिलसिले के प्रसार में सबसे अधिक प्रभाव उन्हीं का रहा। चिश्ती सिलसिले की आज की अधिकांश शाखाएँ उन्हीं से जुड़ी मानी जाती हैं। उनका निधन 27 जमादिउस्सानी 1199 हिजरी (1785 ई.) को 73 वर्ष की आयु में हुआ। उनका मज़ार दिल्ली के महरौली शरीफ़ में ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी की दरगाह के पास है।
जन्म और वंश
मौलाना फ़ख़रुद्दीन का जन्म 1126 हिजरी (लगभग 1715 ई.) में औरंगाबाद में हुआ। कुछ स्रोतों में जन्म-वर्ष 1717 ई. भी मिलता है, इसलिए इसे ‘लगभग 1715-1717 ई.’ लिखना उचित है।
उनके पिता औरंगाबाद के प्रसिद्ध संत शेख़ निज़ामुद्दीन औरंगाबादी थे। परंपरा के अनुसार उनका वंश पिता की ओर से हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ से जुड़ता है। माता की ओर से वे हज़रत सैयद बंदा नवाज़ गेसू दराज़ के परिवार से थे और इस नाते पैग़ंबर मुहम्मद के वंशज माने जाते हैं।
फ़ख़रुद्दीन के जन्म की ख़बर जब दिल्ली में शाह कलीमुल्लाह जहानाबादी तक पहुँची, तो उन्होंने बालक का नाम ‘फ़ख़रुद्दीन’ रखा। शाह कलीमुल्लाह उनके पिता के पीर-ओ-मुर्शिद (आध्यात्मिक गुरु) थे। उन्होंने बालक को अपना ख़िरक़ा (संतों का गुदड़ी जैसा वस्त्र) भेंट किया और ‘मौलाना’ की उपाधि दी। साथ ही भविष्यवाणी की कि यह बालक आगे चलकर महान विद्वान और संत बनेगा।
शिक्षा और आध्यात्मिक साधना
जब शेख़ निज़ामुद्दीन मृत्युशय्या पर थे, तब उन्होंने अपने पुत्र को गले लगाया और क़ुरान की यह आयत पढ़ी : ‘…और मैंने उसमें अपनी रूह फूँकी’। इसके साथ उन्होंने सोलह वर्ष के फ़ख़रुद्दीन को अपना ख़लीफ़ा (आध्यात्मिक उत्तराधिकारी) नियुक्त किया।
इसके बाद तीन वर्ष तक फ़ख़रुद्दीन ने कठिन परिश्रम से धार्मिक और साहित्यिक शिक्षा पूरी की। फिर अगले आठ वर्ष उन्होंने तप, मुजाहिदे (आत्म-संयम की साधना) और ध्यान में बिताए। कभी-कभी वे भावोन्माद की अवस्था में पुराने भावोन्मत्त सूफ़ियों जैसी बातें कहने लगते थे, जिसे देखकर उनके प्रशंसक चकित रह जाते थे।
सेना की नौकरी और दिल्ली प्रस्थान
बढ़ती ख्याति से बचने के लिए उन्होंने निज़ाम के पुत्र नासिर जंग की सेना में अधिकारी के रूप में नौकरी कर ली। लेकिन शिविर का जीवन उनके धार्मिक स्वभाव के अनुकूल नहीं था। वहाँ भी उनकी प्रसिद्धि फैलने लगी, इसलिए उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और औरंगाबाद में अपने पिता की ख़ानक़ाह (सूफ़ी आश्रम) लौट आए।
कुछ समय बाद शिष्यों की बढ़ती माँग और भीतर की प्रेरणा से वे दिल्ली चले गए, जहाँ उनके पिता के गुरु शाह कलीमुल्लाह रहते थे। लगभग पचास वर्ष पहले शाह कलीमुल्लाह ने ही शेख़ निज़ामुद्दीन को दक्कन में अपना प्रतिनिधि बनाया था।
दिल्ली की यात्रा में एक घटना प्रसिद्ध है। एक अंधी हिंदू महिला क़ाफ़िले के पास आई और उसने मौलाना का हूबहू वर्णन करते हुए कहा कि उसकी देवी भवानी ने बताया है कि यह व्यक्ति उसकी आँखों की रोशनी लौटाएगा। मौलाना ने कहा कि वे एक साधारण सैनिक हैं और चमत्कार नहीं कर सकते। फिर भी क़ाफ़िले के रवाना होने से पहले उन्होंने उसके लिए प्रार्थना की, और कहा जाता है कि अल्लाह ने उसकी दृष्टि लौटा दी।
दिल्ली में शिक्षण और ख़ानक़ाह
दिल्ली पहुँचकर उन्होंने चौंतीस वर्ष तक अपना आध्यात्मिक और शैक्षणिक कार्य चलाया। अजमेरी गेट के बाहर ग़ाज़ीउद्दीन ख़ान फ़िरोज़ जंग के मदरसे में वे विभिन्न इस्लामी विषयों की कक्षाएँ लेते थे। यह स्थान धीरे-धीरे एक बड़े शिक्षा-केंद्र का रूप ले गया।
बाद में उन्होंने अपनी ख़ानक़ाह स्थापित की, जहाँ वे साधकों को अल्लाह के मार्ग का प्रशिक्षण देते थे। उनकी दिनचर्या व्याख्यानों, साधकों से संवाद, प्रार्थनाओं और रात्रि-जागरण में बँटी रहती थी। उनकी शिक्षाओं का केंद्र मुख्यतः क़ुरान और हदीस था।
पैग़ंबर के प्रति प्रेम
पैग़ंबर मुहम्मद के प्रति अगाध भक्ति के कारण ही उन्हें ‘मुहिब्बुन नबी’ कहा गया। वे सुन्नत (पैग़ंबर की जीवन-पद्धति) के पालन में अत्यंत सजग थे और शिष्यों को भी इसका महत्व समझाते रहते थे। कहा जाता है कि मृत्यु से कुछ पहले कमज़ोरी के कारण वे अपनी दाढ़ी कतर नहीं पाए। उन्हें इस बात का गहरा दुख हुआ कि दाढ़ी सुन्नत में बताई गई लंबाई से अधिक बढ़ गई थी।
उनका व्यक्तित्व चुंबक की तरह लोगों को अपनी ओर खींचता था। कहा जाता है कि उनके विरोधी और शत्रु भी अंततः उनके अनुयायी बन जाते थे। एक किंवदंती के अनुसार एक अफ़ग़ान हत्या के इरादे से उनके मदरसे में आया, लेकिन उनका व्याख्यान सुनते-सुनते उसे पश्चात्ताप हुआ और वह उनका शिष्य बन गया।
कठिन समय में जनसेवा
उस दौर में दिल्ली के लोगों पर भारी संकट था। मराठों, जाटों, सिखों और रोहिलों के हमलों के अलावा अहमद शाह अब्दाली ने एक दशक से अधिक समय तक लगातार आक्रमण किए और दिल्ली को लूटा। ऐसे कठिन समय में फ़ख़रुद्दीन आम लोगों को हमेशा आशा और साहस देते रहे।
एक घटना में उन्हें बताया गया कि अब्दाली की सेना के एक अफ़ग़ान सिपाही ने एक कुलीन महिला को बंदी बना लिया है। वे अपनी पत्नी को साथ लेकर उस सिपाही के पास गए और कहा कि वह उस महिला को छोड़ दे और बदले में उनकी अपनी पत्नी को ले ले। उनकी विनती से सिपाही का मन पिघल गया और उसने अपनी लूट छोड़ दी।
समाज-सुधार और शासकों से संबंध
वे मुस्लिम समाज के सुधार में सक्रिय रहे और क़ुरान तथा पैग़ंबर की परंपराओं के सही पालन का अभियान चलाते रहे। उनका प्रभाव केवल आम जनता तक सीमित नहीं था। ग़ाज़ीउद्दीन ख़ान, उनके पुत्र और बादशाह शाह आलम द्वितीय उनके मुरीदों (शिष्यों) में गिने जाते थे।
अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र भी उनके बड़े प्रशंसक थे और उन्होंने अपनी कविताओं में उनकी स्तुति की। एक कविता में वे स्वयं को क़ुतबुद्दीन का भक्त और फ़ख़रुद्दीन के चरणों की धूल बताते हैं। यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि बहादुर शाह ज़फ़र का काल मौलाना के निधन (1785 ई.) के बाद का है। इसलिए यह श्रद्धा उनकी परंपरा और वंशजों से जुड़ाव के संदर्भ में ही समझनी चाहिए।
शाह वलीउल्लाह से भिन्न दृष्टिकोण
दिल्ली में उनके समकालीन प्रसिद्ध विद्वान शाह वलीउल्लाह थे, पर दोनों का दृष्टिकोण कुछ विषयों पर भिन्न था। चिश्ती मान्यता थी कि हसन बसरी ने हज़रत अली से गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया था। शाह वलीउल्लाह इस मान्यता को स्वीकार नहीं करते थे।
मौलाना फ़ख़रुद्दीन ने अरबी में एक पुस्तिका लिखी और लगभग पंद्रह प्राचीन स्रोतों का हवाला देकर इस मान्यता का दृढ़ता से बचाव किया। उनके एक शिष्य ने इसका फ़ारसी अनुवाद किया, जिसका नाम ‘फ़ख़रुलहसन’ रखा गया।
प्रमुख रचनाएँ और उन पर लिखे ग्रंथ
मौलाना की अपनी रचनाओं में ‘ऐन-उल-यक़ीन’ और पत्रों का संकलन ‘मक्तूबात-ए-फ़ख़रुद्दीन’ महत्वपूर्ण हैं। अहमद शाह के प्रधानमंत्री इमादुल मुल्क उनके भक्तों में थे। ‘मनाक़िब-ए-फ़ख़रिया’ में उनके गुणों का वर्णन मिलता है। सैयद नूरुद्दीन हुसैन फ़ख़री ने भी उनकी प्रशंसा में लिखा।
फ़ख़रुद्दीन देहलवी का महत्त्व
मौलाना फ़ख़रुद्दीन देहलवी ने हज़ारों विद्यार्थियों और शिष्यों को ज्ञान और मार्गदर्शन दिया और उनकी दी हुई शिक्षा आज भी जीवित है। इस्लाम की सेवा, ज्ञान-प्रसार और पैग़ंबर-प्रेम के लिए उन्हें आज भी श्रद्धा से याद किया जाता है। चिश्ती परंपरा में उनका स्थान बहुत ऊँचा है।


