भारत में मजदूर आंदोलन और श्रमिक-संघों का विकास (Labor Movement and Development of Trade Unions in India)

भारत में मजदूर आंदोलन और श्रमिक-संघों का विकास (Labor Movement and Development of Trade Unions in India)
भारत में मजदूर आंदोलन और श्रमिक-संघों का विकास : कालानुक्रमिक इतिहास भारतीय मजदूर आंदोलन की […]

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भारत में मजदूर आंदोलन और श्रमिक-संघों का विकास : कालानुक्रमिक इतिहास

भारतीय मजदूर आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में मजदूर आंदोलन और श्रमिक संघों का विकास किसी एकाकी कारण का परिणाम नहीं था। यह औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत पनपे आर्थिक शोषण, अमानवीय कार्य परिस्थितियों, अत्यल्प मजदूरी और भारतीय श्रमिकों की दारुण दुर्दशा के विरुद्ध एक दीर्घकालीन और बहुआयामी संघर्ष की उपज था। जब उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में आधुनिक उद्योगों का सूत्रपात हुआ- रेलवे, डाकघर, कोयला खनन, चाय बागान और तार-सेवाएँ विकसित होने लगीं, तब एक नए आधुनिक मजदूर वर्ग का उदय हुआ। किंतु इस वर्ग की वृद्धि अत्यंत मंद गति से हुई और जिन परिस्थितियों में यह वर्ग उभरा, वे परिस्थितियाँ अत्यंत कठोर और शोषणकारी थीं।

औद्योगीकरण और मजदूर वर्ग की सांख्यिकीय वृद्धि

भारत में पहली सूती कपड़ा मिल 1853 ई. में कावसजी नानाभाई ने बंबई में आरंभ की और पहली जूट मिल 1855 ई. में रिशरा (हुगली, बंगाल) में स्थापित की गई। 1879 ई. तक देश में 56 सूती कपड़ा मिलें थीं, जिनमें लगभग 43,000 श्रमिक कार्यरत थे। 1882 ई. में 20 जूट मिलें थीं, जिनमें लगभग 20,000 लोग काम करते थे। 1905 ई. तक सूती मिलों की संख्या 206 हो गई और उनमें लगभग 1,96,000 मजदूर काम करने लगे। पटसन उद्योग में 1879-80 ई. में 27,494 मजदूर थे जो 1906 ई. तक बढ़कर 1,54,962 हो गए। कोयला खान उद्योग में 1906 ई. में लगभग 1,00,000 लोग कार्यरत थे। 1911 ई. की जनगणना के अनुसार 30.3 करोड़ की जनसंख्या में संगठित उद्योग के मजदूरों की संख्या 21 लाख थी, जो 1921 ई. तक बढ़कर लगभग 26.81 लाख हो गई।

उल्लेखनीय है कि इसी दौर में 1875 ई. में बंबई में पहला ‘फैक्टरी कमीशन’ गठित किया गया था, जिसने पहली बार मिल-मजदूरों की दयनीय कार्य परिस्थितियों की आधिकारिक जाँच की थी, यद्यपि इसकी सिफारिशें अत्यंत सीमित रहीं और इसका उद्देश्य भी भारतीय मजदूरों के हित से अधिक ब्रिटिश हितों की रक्षा करना था।

भारतीय मजदूर वर्ग का स्वरूप और निर्माण

भारतीय मजदूर वर्ग मुख्यतः उन किसानों और हस्तशिल्पकारों से बना था जो औपनिवेशिक नीतियों और शोषण के कारण कंगाल हो गए थे और अब मजदूरी पर निर्भर हो गए थे। यूरोप के विपरीत भारत में मजदूरों की भर्ती की कोई सुव्यवस्थित और न्यायसंगत प्रणाली नहीं थी। असम के चाय बागानों के लिए कुलियों की भर्ती और फिजी, मॉरीशस, नटाल तथा वेस्टइंडीज भेजे जाने वाले प्रवासी भारतीय मजदूरों की भर्ती अनुबंधपत्र की पद्धति, जिसे ‘गिरमिटिया प्रथा’ भी कहा जाता है, द्वारा होती थी, जो मजदूरी से कहीं अधिक दासता के समान थी। खानों, रेलवे और कारखानों में भर्ती सिद्धांततः स्वतंत्र थी, किंतु ठेकेदारों (जिन्हें ‘सरदार’ या ‘जॉबर’ कहा जाता था) के माध्यम से होती थी जो अपनी दलाली का बोझ भी मजदूरों पर ही डालते थे।

पूर्वी भारत के बागानों और खानों के लिए मजदूर मुख्यतः पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और मद्रास प्रेसीडेंसी से आते थे, जिससे कलकत्ता के औद्योगिक क्षेत्र का मजदूर वर्ग मुख्यतः गैर-बंगाली था। इसके विपरीत अहमदाबाद के मजदूर गुजरात से और बंबई के मजदूर महाराष्ट्र के पृष्ठभूमि क्षेत्र, विशेषकर कोंकण के रत्नागिरी जिले, से आते थे। इस प्रकार भारत के विभिन्न औद्योगिक केंद्रों में मजदूर वर्ग की सामाजिक और सांस्कृतिक बनावट परस्पर भिन्न थी।

मजदूरों की आरंभिक कठिनाइयाँ और कार्य परिस्थितियाँ

भारतीय मजदूर वर्ग उन्हीं कठिनाइयों का शिकार था जो इंग्लैंड और अन्य देशों में औद्योगीकरण के प्रारंभिक चरण में हुई थीं। 1881 और 1891 के कारखाना अधिनियमों के अंतर्गत लगाई गई सीमाओं का भी पालन शायद ही कहीं होता था। 15, 16 और यहाँ तक कि 18 घंटे प्रतिदिन काम कराना सामान्य बात थी। उल्लेखनीय है कि ये अधिनियम वास्तव में भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि लंकाशायर के ब्रिटिश कपड़ा उत्पादकों की बाजार में प्रतिस्पर्धा को बनाए रखने के लिए बनाए गए थे। आगे चलकर 1911 ई. और 1922 ई. के कारखाना अधिनियमों में कार्य के घंटों को क्रमशः 12 और फिर 10 घंटे तक सीमित करने का प्रयास किया गया, जो 1919 ई. में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO), जिसका भारत एक संस्थापक सदस्य था, की सिफारिशों से भी प्रेरित था, यद्यपि व्यवहार में इनका क्रियान्वयन बेहद कमजोर रहा।

मजदूरों की मजदूरी इतनी कम थी कि अधिकांश मजदूर एक शिलिंग प्रतिदिन से अधिक नहीं कमाते थे। 1938 ई. में जेनेवा में हुए अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में भारतीय मजदूरों के प्रतिनिधि एस.पी. परुलेकर ने अपने भाषण में कहा था : “भारत में अधिकांश मजदूरों को जो मजदूरी मिलती है वह इसके लिए भी काफी नहीं कि उन्हें जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएँ उपलब्ध करा सके। बीमारी, बेरोजगारी, बुढ़ापे और मृत्यु के विरुद्ध उन्हें कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं है।” ह्विटले कमीशन (रॉयल कमीशन ऑन लेबर, 1929-31 ई.) ने अपने निष्कर्षों में कहा था : “अधिकांश औद्योगिक केंद्रों में दो-तिहाई परिवार और व्यक्ति कर्ज में डूबे हैं।” असम घाटी के चाय बागानों में पुरुष मजदूरों की औसत मासिक आमदनी मात्र सात रुपये तीन आने थी, जबकि महिलाओं और बच्चों की क्रमशः पाँच रुपये चौदह आने और चार रुपये चार आने थी।

मजदूरों की बेहतरी के आरंभिक प्रयास

मजदूरों की दयनीय स्थिति के विरुद्ध कुछ सुधारवादी नेताओं ने आरंभिक प्रयास किए। ब्रह्मसमाजी समाज सुधारक शशिपद बनर्जी ने 1870 ई. में कलकत्ता के बड़ानगर उपनगर में बंगाली पटसन मजदूरों के लिए एक मजदूर क्लब स्थापित किया और 1874 ई. में ‘भारत श्रमजीवी’ नामक मासिक पत्रिका निकाली। उनका उद्देश्य श्रमिकों में मितव्ययिता, संयम और स्वावलंबन जैसे नैतिक गुण विकसित करना था। 1878 ई. में सोराबजी शपूर्जी बंगाली ने मजदूरों को बेहतर कार्य परिस्थितियाँ दिलाने के लिए बंबई की विधान परिषद में एक विधेयक रखने का प्रयास किया। 1880 के दशक में द्वारकानाथ गांगुली जैसे बंगाली बुद्धिजीवियों ने चाय बागानों की दास-श्रम जैसी परिस्थितियों के विरुद्ध प्रभावशाली आंदोलन चलाया।

बंबई में 1880 ई. में नारायण मेघाजी लोखंडे ने, जो महात्मा जोतिराव फुले के सहयोगी थे, ‘दीनबंधु’ नामक एक द्विभाषी (अंग्रेजी-मराठी) साप्ताहिक पत्रिका आरंभ की। उन्होंने 1884 ई. में श्रम के घंटों में कमी की माँग के लिए मजदूरों की सभाएँ आयोजित कीं और 1890 ई. में ‘बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन’ का गठन किया। यद्यपि यह किसी भी अर्थ में एक संगठित ट्रेड यूनियन नहीं थी, लोखंडे को आज भी ‘भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन के जनक’ के रूप में स्मरण किया जाता है। कलकत्ता के औद्योगिक क्षेत्र में प्रथम श्रम संगठन का उल्लेख 1895 ई. में स्थापित ‘मुहम्मडन एसोसिएशन ऑफ कांकीनारा’ के रूप में मिलता है। ये आरंभिक प्रयास मूलतः समाजसेवी प्रकृति के थे और संगठित मजदूर वर्ग के आंदोलनों का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। इसके अलावा तत्कालीन राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से इन समाजसेवियों का कोई ताल्लुक नहीं था।

मजदूर वर्ग में राष्ट्रीय और वर्गीय चेतना का विकास

भारतीय मजदूर वर्ग में राष्ट्रीय और वर्गीय चेतना शिक्षित मध्य वर्ग और पूँजीपति वर्ग की तुलना में बाद में विकसित हुई। इसका प्रमुख कारण था कि मजदूर वर्ग सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़ा और लगभग पूर्णतः निरक्षर था। अपने सांस्कृतिक पिछड़ेपन, जाति और धर्म के आधार पर विभाजन, धार्मिक अंधविश्वास और भाग्यवादी दृष्टिकोण के कारण ये प्रवासी मजदूर शहरी औद्योगिक बस्तियों में धार्मिक समूहों और जातीय इकाइयों के रूप में बँटे रहते थे। कार्यस्थलों पर भी विभिन्न विभाग विशेष धार्मिक या सामाजिक समूहों द्वारा संचालित होते थे। अच्छी नौकरियाँ उच्च जातियों के लोगों को मिलती थीं जबकि निचली जातियों और अछूतों के हिस्से में कम वेतन और जोखिम भरे काम आते थे।

फिर भी, कभी-कभी मजदूर अपने ही ढंग से प्रतिरोध का रास्ता अपनाते थे। मजदूर संघर्ष के इतिहास में 1877 ई. की नागपुर की एम्प्रेस मिल्स की हड़ताल सबसे प्रारंभिक दर्ज घटनाओं में से एक है। 1882 और 1890 ई. के बीच बंबई और मद्रास में 25 महत्वपूर्ण हड़तालें दर्ज की गईं। 1890 के दशक में कलकत्ता की जूट मिलों में भी अनेक हड़तालें हुईं। बंबई, कलकत्ता, अहमदाबाद, सूरत, मद्रास, वर्धा जैसे औद्योगिक केंद्रों में सूती मिलों, चाय बागानों और रेलवे में श्रमिक असंतोष बढ़ता जा रहा था।

भारत में मजदूर आंदोलन और श्रमिक-संघों का विकास (Labor Movement and Development of Trade Unions in India)
मजदूर वर्ग में राष्ट्रीय और वर्गीय चेतना का विकास

आरंभिक राष्ट्रवादी और मजदूर वर्ग

भारत में मजदूर वर्ग को आरंभ से ही दो प्रकार के शोषण का सामना करना पड़ा- एक ओर औपनिवेशिक शासन और दूसरी ओर विदेशी और भारतीय पूँजीपतियों का आर्थिक दोहन। आरंभिक राष्ट्रवादी नेता, विशेषकर उदारपंथी, मजदूरों की माँगों के प्रति प्रायः उदासीन रहे। इसके पीछे कई कारण थे। दादाभाई नौरोजी ने कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन (1886 ई.) में यह स्पष्ट किया था कि कांग्रेस को उन प्रश्नों तक ही सीमित रखना चाहिए जिनमें पूरे राष्ट्र की भागीदारी हो। दूसरे, राष्ट्रवादी नेता तीव्र उद्योगीकरण को देश की गरीबी दूर करने का एकमात्र उपाय मानते थे और किसी भी ऐसे कदम से बचते थे जो औद्योगीकरण की प्रक्रिया में बाधक बने।

किंतु ब्रिटिश स्वामित्व वाले उद्यमों के मजदूरों को समर्थन देने में राष्ट्रवादियों ने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। असम के चाय बागान मजदूरों के पक्ष में राष्ट्रवादी अखबारों ने जोरदार अभियान चलाया। मजदूर वर्ग की पहली बड़ी हड़ताल 1899 ई. में ब्रिटिश स्वामित्ववाली ग्रेट इंडियन पेनिनसुला (GIP) रेलवे में हुई। तिलक के ‘मराठा’ और ‘केसरी’ अखबारों ने इसका खुलकर समर्थन किया। फिरोजशाह मेहता, डी.ई. वाचा और सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे राष्ट्रवादी नेताओं ने मजदूरों के समर्थन में जनसभाएँ आयोजित कीं और चंदा इकट्ठा किया।

बीसवीं सदी के आरंभ में मजदूर आंदोलन (1900-1908 ई.)

बीसवीं सदी के आरंभ में 1903-08 ई. में बंगाल के प्रशासन पर हुए एक सर्वेक्षण ने ‘औद्योगिक असंतोष’ को उन पाँच वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बताया। विपिन पाल और जी. सुब्रह्मण्यम अय्यर जैसे राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी भारतीय मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए कानून बनाने की माँग करने लगे थे। अंबिकाचरण बनर्जी, प्रभातकुसुम राय चौधरी, एथेनियस अपूर्वकुमार घोष और प्रेमतोष बोस जैसे श्रमिक नेता उभर रहे थे।

16 अक्टूबर 1905 ई. को बंगाल विभाजन के दिन जूट मिल मजदूरों, प्रेस और फैक्टरी कामगारों तथा रेलवे कुलियों ने हड़ताल की। 21 अक्टूबर 1905 ई. को सरकारी छापाखानों की हड़ताल के बीच ‘प्रिंटर्स यूनियन’ नामक मजदूर संघ की स्थापना हुई। जुलाई 1906 ई. में ईस्ट इंडियन रेलवे की हड़ताल के बाद ‘रेलवेमेंस यूनियन’ की स्थापना हुई। 1905 और 1908 ई. के बीच पटसन कारखानों में 37 में से 18 कारखाने विभिन्न हड़तालों से प्रभावित हुए।

22 जुलाई 1908 ई. को तिलक को सजा होने पर बंबई के मजदूरों ने छह दिनों की ऐतिहासिक हड़ताल की जो 28 जुलाई तक जारी रही। अपने चरम दिनों में इस हड़ताल ने 85 में से 76 कपड़ा मिलों के साथ परेल की रेलवे कार्यशाला को भी प्रभावित किया। पुलिस और सेना की गोलियों से सरकारी रिपोर्टों के अनुसार 16 लोग मारे गए और 43 घायल हुए। लेनिन ने भारतीय श्रमिकों की बढ़ती राजनीतिक चेतना के प्रतीक के रूप में इस हड़ताल का अभिनंदन किया था। स्वदेशी आंदोलन के इस चरण की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि मजदूर वर्ग असंगठित और स्वतःस्फूर्त हड़तालों से ऊपर उठकर राष्ट्रवादी नेताओं के समर्थन से संगठित हड़तालों की अवस्था में पहुँच गया था।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद संगठित श्रमिक संघों का विकास

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भारत में श्रमिक संघों और संगठित मजदूर संघर्षों का एक नया युग आरंभ हुआ। ह्विटले कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार 1918-19 ई. की सर्दियों से पहले भारतीय उद्योगों में शायद ही कभी हड़ताल हुई हो। युद्ध के दौरान बड़े पैमाने पर उद्योगों का विस्तार हुआ और मजदूर वर्ग की संख्या बढ़ी, किंतु मजदूरी की दरें नहीं बढ़ीं जबकि मालिक अंधाधुंध मुनाफे कमा रहे थे। कीमतों में भारी वृद्धि, कम उपज, 1918-19 ई. में इन्फ्लूएंजा महामारी और बेरोजगारी ने मजदूरों में गहरी बेचैनी भर दी। इसके अलावा, 1917 ई. की रूसी बोल्शेविक क्रांति और ऑस्ट्रिया-हंगरी तथा तुर्की में हुई जनतांत्रिक क्रांतियों ने भारतीय मजदूरों में एक नवीन राजनीतिक चेतना का संचार किया।

‘मद्रास लेबर यूनियन’ पहला संगठित मजदूर संगठन था जिसकी एक बाकायदा सदस्य सूची थी और जिसमें सदस्यता शुल्क लिया जाता था। इसकी स्थापना अप्रैल 1918 ई. में जी. रामानुजुलु नायडु और चेल्वेपति चेट्टी ने की। इसके अध्यक्ष एनी बेसेंट के सहयोगी बी.पी. वाडिया थे। इसी वर्ष गांधीजी ने अहमदाबाद में ‘अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन’ का गठन किया, जो उस समय की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन थी — इस संगठन के निर्माण में अनसूया साराभाई की भी उल्लेखनीय भूमिका रही, जिन्होंने मिल-मजदूरों, विशेषकर महिला श्रमिकों, के हितों के लिए सक्रिय आंदोलन चलाया था। मार्च 1918 ई. में गांधीजी के नेतृत्व में अहमदाबाद की हड़ताल, जो मिल-मालिकों द्वारा ‘प्लेग बोनस’ वापस लिए जाने के विरुद्ध हुई थी और जिसमें गांधीजी ने पहली बार भूख हड़ताल का प्रयोग किया और जनवरी 1919 ई. की बंबई की कपड़ा मिलों की बड़ी हड़ताल को आगामी हड़ताल लहर का अग्रदूत माना जाता है। 1920 ई. तक ट्रेड यूनियनों की बाढ़-सी आ गई और नवंबर 1920 ई. तक यूनियनों की संख्या लगभग 125 हो गई।

अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना (1920 ई.)

भारतीय मजदूर संघ आंदोलन के इतिहास में अक्टूबर 1920 ई. में बंबई में ‘अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ (AITUC/एटक) की स्थापना एक युगांतकारी घटना है। इसकी स्थापना एन.एम. जोशी, लाला लाजपत राय, जोसेफ बैप्टिस्टा और दीवान चमनलाल के संयुक्त प्रयासों से हुई, जिससे मजदूर संघ आंदोलन को पहली बार एक सर्वभारतीय आधार मिला। इसका उद्देश्य था : “देश के सारे प्रांतों में मजदूरों के सारे संगठनों के कार्यों को समन्वित करना और आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मसलों पर भारतीय मजदूर के हितों को प्रश्रय देना।”

नवंबर 1920 ई. में एटक के पहले अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में लाला लाजपत राय ने मजदूरों के संगठन और वर्ग-चेतना पर जोर दिया। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पूँजीवाद को साम्राज्यवाद से जोड़कर देखा और साम्राज्यवाद एवं सैन्यवाद को पूँजीवाद की ‘जुड़वाँ संतानें’ बताया। एटक के दूसरे सम्मेलन में दीवान चमनलाल ने संकेत दिया कि ‘स्वराज पूँजीपतियों का नहीं, मजदूरों का होगा।’ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गया अधिवेशन (1922 ई.) में एटक की स्थापना का स्वागत किया गया और कांग्रेस से मजदूरों को संबद्ध करने के लिए एक समिति भी बनाई गई।

लाला लाजपत राय के अलावा चितरंजन दास, सी.एफ. एंड्रूज, जे.एम. सेनगुप्त, सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू और सत्यामूर्ति जैसे बड़े राष्ट्रवादी नेता एटक से जुड़े रहे। किंतु गांधीजी और उनकी ‘अहमदाबाद मजदूर महाजन सभा’ ने इससे कभी नाता नहीं जोड़ा।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद मजदूर आंदोलन की लहर (1918-1922 ई.)

युद्ध के बाद की बदली परिस्थितियों के प्रति मजदूर वर्ग ने असाधारण प्रतिक्रिया व्यक्त की। दिसंबर 1918 ई. में सेंचुरी मिल के कामगारों ने मजदूरी में 25 प्रतिशत वृद्धि और बोनस की माँग को लेकर हड़ताल की। शीघ्र ही बंबई की समस्त 83 कपड़ा मिलें बंद हो गईं और एक लाख से अधिक मजदूर सड़कों पर आ गए। यह हड़ताल व्यापारिक कार्यालयों के बाबुओं और रेलवे इंजीनियरिंग कामगारों तक फैल गई।

1919 ई. में पंजाब में दमन (जलियाँवाला बाग हत्याकांड) और गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद अहमदाबाद में 51 सरकारी भवनों में आग लगाई गई, रेलगाड़ियाँ पटरी से उतारी गईं और टेलीफोन के तार काटे गए। उपद्रवकारियों में मुख्यतः कपड़ा मिलों के कामगार थे। मार्शल लॉ लगाकर स्थिति नियंत्रित की गई। 1921 ई. के दौरान 376 हड़तालें हुईं जिनमें 6,00,351 कामगार सम्मिलित हुए और लगभग 70 लाख कार्य-दिवसों की हानि हुई। मई 1921 ई. में चारगोला के कुलियों ने ‘गांधी महाराज की जय’ के नारे लगाते हुए पारिश्रमिक में वृद्धि माँगी और लगभग 8,000 मजदूरों ने, जो कुल मजदूरों के 52 प्रतिशत थे, यह कहते हुए बंगाल छोड़ दिया कि यह गांधीजी की आज्ञा है।

नवंबर 1921 ई. में प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत दौरे के विरोध में कांग्रेस के बहिष्कार के आह्वान के जवाब में मजदूरों ने देशव्यापी हड़ताल की। बंबई में लगभग 1,40,000 मजदूर सड़कों पर निकल पड़े। मद्रास में बिन्नी की सूती मिलों के हड़ताली मजदूरों ने असहयोगवादियों को नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया। 4 फरवरी 1922 ई. को चौरी-चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन के स्थगन से एक बार फिर मजदूर आंदोलन में शिथिलता आई।

1922-1927 ई. के दौरान मजदूर आंदोलन में उतार-चढ़ाव

1922-27 ई. के दौरान मजदूर आंदोलन में एक स्पष्ट गिरावट दिखाई दी। 1921 ई. की 376 हड़तालों की तुलना में 1924-27 ई. में प्रति वर्ष औसतन केवल 130 हड़तालें रह गईं। यद्यपि हड़तालें कम हुईं, किंतु वे अधिक लंबी और कटुतापूर्ण होने लगीं। अहमदाबाद में अप्रैल 1923 ई. में मजदूरी में 20 प्रतिशत कटौती के विरुद्ध हड़ताल में 64 में से 56 मिलें बंद हो गईं। गांधीजी जेल में थे, वरना 1925 ई. में उन्होंने अहमदाबाद के मजदूरों को यह समझाया था कि व्यापार में मंदी के समय वे अपने मालिकों को ‘सांसत में न डालें’ और ‘स्वामिभक्त सेवक की भाँति बिना वेतन भी स्वामियों की सेवा करें।’

1926 ई. में पहली बार भारतीय ट्रेड यूनियन अधिनियम द्वारा यूनियनों को कुछ कानूनी संरक्षण मिला, यद्यपि इसमें अनेक प्रतिबंधात्मक धाराएँ भी थीं- अपंजीकृत यूनियनों द्वारा चंदा इकट्ठा करना अवैध था, कार्यकारिणी में 50 से अधिक ‘बाह्य तत्वों’ की उपस्थिति पर रोक थी और यूनियन के धन को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए खर्च करना वर्जित था। यह अधिनियम भारत में पहली बार ट्रेड यूनियनों को वैधानिक मान्यता देने वाला कानून था, इसलिए इसे भारतीय मजदूर आंदोलन के संस्थागतकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जाता है, भले ही इसकी प्रतिबंधात्मक धाराओं की व्यापक आलोचना हुई।

मजदूर आंदोलन में साम्यवादियों का प्रवेश और उभार (1925-1929 ई.)

बीसवीं सदी के तीसरे दशक के उत्तरार्ध में भारत में समाजवादी और साम्यवादी विचारों के प्रसार ने मजदूर वर्ग में राजनीतिक चेतना को असाधारण गति से फैलाया। 1925-26 ई. में बंगाल में ‘लेबर स्वराज पार्टी’ का गठन हुआ, जो शीघ्र ही ‘किसान-मजदूर पार्टी’ बन गई। पंजाब में जनवरी 1927 ई. में ‘किरती किसान पार्टी’ का गठन हुआ। बंबई में भी जनवरी 1927 ई. में ‘मजदूर किसान पार्टी’ की स्थापना एस.वी. मिराजकर, के.एन. जोगलेकर और एस.वी. घाटे ने की।

कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली ‘गिरनी कामगार यूनियन’ की सदस्य संख्या 1928 ई. के अंत तक 324 से बढ़कर 54,000 हो गई। 1928 ई. के अंत में सरकार ने रिपोर्ट देना शुरू किया कि “मुश्किल से कोई जनसेवा या उद्योग बचा होगा जिसमें कम्युनिज्म का प्रभाव न पहुँचा हो।” बंबई की कपड़ा मिलों में अप्रैल से सितंबर 1928 ई. तक छह माह तक चलने वाली महान हड़ताल ‘लाल बावटा गिरनी कामगार यूनियन’ के नेतृत्व में हुई। इस यूनियन की सबसे बड़ी शक्ति थी उसकी चुनी हुई गिरनी समितियाँ- अप्रैल 1929 ई. में 42 ऐसी समितियाँ सक्रिय थीं और यूनियन में 60,000 से अधिक सदस्य थे। दिसंबर 1928 ई. में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन के पंडाल पर लगभग दो घंटे तक 30,000 मजदूरों ने कब्जा रखा और भारत की पूर्ण स्वाधीनता तथा एक श्रम-कल्याण योजना के प्रस्ताव पारित किए।

मेरठ षड्यंत्र केस और सरकारी दमन (1929 ई.)

मजदूर आंदोलन की बढ़ती उग्रता से घबराई ब्रिटिश सरकार ने 20 मार्च 1929 ई. को एक साथ 32 सक्रिय मजदूर नेताओं को गिरफ्तार करके उन पर ‘मेरठ षड्यंत्र केस’ का मुकदमा चलाया — यह मुकदमा लगभग साढ़े चार वर्ष तक चला और 1933 ई. में अधिकांश अभियुक्तों को कारावास की सजा सुनाई गई, यद्यपि इस लंबे मुकदमे ने अनायास ही भारत और विश्व में साम्यवादी विचारों तथा भारतीय मजदूर आंदोलन को अभूतपूर्व प्रचार दिलाया। अप्रैल 1929 ई. में ‘ट्रेड डिस्प्यूट्स एक्ट’ बनाकर सभी ‘सांप्रदायिक विवाद से असंबंधित’ हड़तालों पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया गया। इसी वर्ष बंबई में पठानों को जानबूझकर हड़ताल तोड़ने के काम पर लगाया गया, जिससे फरवरी 1929 ई. में एक बड़ा सांप्रदायिक दंगा हुआ। दिसंबर 1929 ई. के नागपुर अधिवेशन में एन.एम. जोशी का उदारवादी समूह एटक से अलग होकर ‘ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन फेडरेशन’ के रूप में पृथक हो गया और बाद में 1931 ई. में रणदीव और देशपांडे के कम्युनिस्टों ने ‘रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ बनाई। इस प्रकार 1929-31 ई. के आते-आते भारतीय मजदूर आंदोलन तीन प्रमुख धड़ों- उदारवादी, राष्ट्रवादी और साम्यवादी में विभाजित हो चुका था।

सविनय अवज्ञा आंदोलन और मजदूर वर्ग (1930-1932 ई.)

6 अप्रैल 1930 ई. को जिस दिन गांधीजी ने नमक कानून तोड़ा, GIP रेलवे यूनियन के कर्मचारियों ने एक नया सत्याग्रह शुरू किया- वे स्टेशनों पर लाल झंडा लगाकर रेल की पटरी पर लेट जाते थे। कराची के गोदी मजदूरों, कलकत्ता के परिवहन और मिल-मजदूरों तथा मद्रास के मिल-मजदूरों ने साहसी संघर्ष किया। महाराष्ट्र के शोलापुर में गांधीजी की गिरफ्तारी की खबर सुनकर 7 मई को कपड़ा मिलों के मजदूरों ने हड़ताल कर दी। कुछ दिनों के लिए विद्रोहियों ने प्रशासन अपने हाथ में ले लिया और राष्ट्रीय ध्वज फहराया। 16 मई के बाद मार्शल लॉ से ही स्थिति नियंत्रित हो सकी। जब कांग्रेस कार्यकारिणी ने 6 जुलाई को ‘गांधी दिवस’ घोषित किया, तो लगभग 50,000 मजदूरों ने हड़ताल में भाग लिया।

किंतु गांधीजी मजदूरों के स्वतंत्र जुझारूपन को पसंद नहीं करते थे। उनका तर्क था : “राजनीतिक उद्देश्यों के लिए मजदूरों की हड़तालों का उपयोग करना भारी भूल होगी।” और “हम पूँजी या पूँजीपतियों को नष्ट करने का प्रयास नहीं करते, बल्कि पूँजी और श्रम के संबंधों का नियमन करना चाहते हैं।” 1932-34 ई. के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण में मजदूरों की भागीदारी नगण्य रही।

श्रमिक संघ आंदोलन का पुनरुत्थान (1933-1936 ई.)

1933-34 ई. में मजदूर आंदोलन का पुनरुत्थान हुआ। 1934 ई. में 159 हड़तालें हुईं जिनमें 2,20,808 मजदूरों ने भाग लिया और लगभग 48 लाख कार्य-दिवसों का नुकसान हुआ। मंदी का बोझ मजदूरों पर डालने की मिल-मालिकों की नीति के विरुद्ध 1934 ई. में शोलापुर (फरवरी-मई) और नागपुर (मई-जुलाई) में बड़ी हड़तालें हुईं। अप्रैल 1935 ई. में कानपुर में कम्युनिस्टों की ‘रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ पुनः एटक में शामिल हो गई। 1938 ई. में ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन’ भी एटक में विलीन हो गई, यद्यपि गांधीजी के प्रभाव वाला अहमदाबाद लेबर एसोसिएशन अलग बना रहा।

1937 ई. की कांग्रेसी सरकारें और मजदूर आंदोलन

1937 ई. में प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस की सफलता के बाद विभिन्न प्रांतों में कांग्रेसी सरकारों के गठन से मजदूर संगठनों को प्रोत्साहन मिला। 1937 ई. की तुलना में 1938 ई. में ट्रेड यूनियनों की सदस्य संख्या में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 1937 और 1939 ई. के बीच ट्रेड यूनियनों की संख्या 271 से बढ़कर 562 हो गई और उनकी सदस्य संख्या 2,61,047 से बढ़कर 3,99,159 हो गई। 1937-38 ई. में पूरे देश में हड़तालों की एक लहर फैल गई। कानपुर की 55 दिवसीय हड़ताल, जिसमें 40,000 मजदूर शामिल थे, इस काल की सबसे महत्वपूर्ण हड़ताल थी।

किंतु कांग्रेसी सरकारों ने शीघ्र ही पूँजीपतियों के दबाव में झुककर अपना मजदूर-विरोधी चरित्र उजागर कर दिया। नवंबर 1938 ई. में बंबई के ‘ट्रेड डिस्प्यूट्स एक्ट’ के पारित होने ने, जिसमें अनिवार्य मध्यस्थता, अवैध हड़तालों के लिए छह महीने की जेल और ट्रेड यूनियनों के लिए नए पंजीकरण नियम थे, कांग्रेस का मजदूर-विरोधी रुख स्पष्ट कर दिया। 6 नवंबर को विरोध सभा में 80,000 लोगों ने भाग लिया जिसे डांगे, इंदुलाल याज्ञनिक और डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने संबोधित किया।

द्वितीय विश्वयुद्ध और मजदूर आंदोलन (1939-1945 ई.)

3 सितंबर 1939 ई. को द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ होते ही 2 अक्टूबर 1939 ई. को बंबई के मजदूर वर्ग ने युद्ध-विरोध में लगभग 90,000 मजदूरों की हड़ताल आयोजित की। 1940 ई. में बंबई के सूती मिल मजदूरों, डिग्बोई के तेल मजदूरों, धनबाद-झरिया के कोयला मजदूरों और जमशेदपुर के लोहा मजदूरों ने हड़तालें कीं। 1941 ई. में जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण के बाद कम्युनिस्टों ने युद्ध को ‘लोकयुद्ध’ घोषित करके मित्रराष्ट्रों के युद्ध प्रयास का समर्थन किया, जिससे उनकी विश्वसनीयता मजदूरों के बीच कम हो गई।

9 अगस्त 1942 ई. को ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के तहत मजदूरों ने बंबई, दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, नागपुर, अहमदाबाद, जमशेदपुर, मद्रास, इंदौर और बंगलोर में देशव्यापी हड़तालें कीं। टाटा स्टील प्लांट 13 दिन तक बंद रहा और अहमदाबाद की कपड़ा मिलों में साढ़े तीन महीने तक हड़ताल चली, जिसे बाद में ‘भारत का स्टालिनग्राद’ कहा गया।

द्वितीय विश्वयुद्ध और मजदूर आंदोलन
द्वितीय विश्वयुद्ध और मजदूर आंदोलन

स्वतंत्रता के उत्कर्ष की ओर (1945-1947 ई.)

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1945-47 ई. में मजदूर आंदोलन की गतिविधियों में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। 1945 ई. के अंत तक बंबई और कलकत्ता के बंदरगाहों के मजदूरों ने इंडोनेशिया भेजे जाने वाले रसद को जहाजों पर लादने से इनकार कर दिया क्योंकि इससे दक्षिण-पूर्व एशिया के राष्ट्रीय मुक्ति-संग्राम का दमन होता। 1946 ई. में शाही नौसेना के जहाजियों के विद्रोह (रॉयल इंडियन नेवी म्यूटिनी) के साथ बंबई के मजदूरों ने अभूतपूर्व एकजुटता का प्रदर्शन किया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के विरोध के बावजूद 22 फरवरी 1946 ई. को 3,00,000 मजदूरों ने काम नहीं किया, लगभग सभी मिलें बंद हो गईं और सड़कों पर हिंसक झड़पें हुईं जिनमें लगभग 228 नागरिक मारे गए।

1946 ई. का वर्ष हड़तालों के इतिहास में अभूतपूर्व था- इस वर्ष 1,629 बार काम रोका गया, जिससे 19,41,948 मजदूर प्रभावित हुए और 1,27,17,762 श्रम-दिवसों की क्षति हुई। डाक-तार विभाग के कर्मचारियों की अखिल भारतीय हड़ताल, दक्षिण भारतीय रेलवे और पश्चिमोत्तर रेलवे की हड़तालें इस काल की प्रमुख घटनाएँ थीं।

भारतीय मजदूर आंदोलन का मूल्यांकन

भारत में मजदूर वर्ग ने स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण और सक्रिय भूमिका निभाई, यद्यपि उसे न तो कांग्रेस से न्यायसंगत समर्थन मिला और न उसके हितों को राष्ट्रीय आंदोलन के एजेंडे में उचित स्थान दिया गया। गांधीजी पूँजी और श्रम के सामंजस्य के दर्शन में विश्वास करते थे और मजदूरों के स्वतंत्र संघर्ष को ‘अनुशासनहीनता’ मानते थे। कांग्रेस का मजदूर वर्ग के प्रति रवैया उदासीन और सीमित रहा- जहाँ यूरोपीय पूँजीपतियों के खिलाफ लड़ाई होती थी, वहाँ कांग्रेस मुखर होती थी, किंतु भारतीय पूँजीपतियों के मामले में वह संयम बरतती थी।

मजदूर वर्ग का जुझारूपन, उनकी बलिदान की भावना और औपनिवेशिक व पूँजीवादी शोषण के विरुद्ध उनके अदम्य संघर्ष ने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन को एक व्यापक सामाजिक आधार दिया। 1946 ई. की हड़तालों की लहर ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत में ब्रिटिश शासन की जड़ें अब उखड़ चुकी हैं और स्वतंत्रता का समय आ गया है। आज भी भारतीय मजदूर वर्ग के उस संघर्ष की गूँज श्रमिक अधिकारों की प्रत्येक लड़ाई में सुनाई देती है, यही उस महान और अमर संघर्ष की विरासत है।

भारत में मजदूर आंदोलन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

प्रश्न: भारत में मजदूर आंदोलन की शुरुआत कब और कैसे हुई?

भारत में आधुनिक मजदूर वर्ग का उदय उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में रेलवे, कोयला खनन, चाय बागानों और सूती-जूट मिलों के विस्तार के साथ हुआ। इसकी शुरुआती हड़तालों में 1877 ई. की नागपुर की एम्प्रेस मिल्स हड़ताल तथा 1890 के दशक की कलकत्ता की जूट मिल हड़तालें उल्लेखनीय हैं।

प्रश्न: भारत में पहली ट्रेड यूनियन कौन-सी थी?

आमतौर पर ‘मद्रास लेबर यूनियन’ (स्थापना अप्रैल 1918 ई.) को भारत की पहली विधिवत सदस्यता-सूची और सदस्यता-शुल्क वाली ट्रेड यूनियन माना जाता है। इसके पूर्व नारायण मेघाजी लोखंडे की ‘बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन’ (1890 ई.) एक प्रारंभिक किंतु अनौपचारिक मजदूर संगठन था।

प्रश्न: अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना कब हुई?

एटक की स्थापना अक्टूबर 1920 ई. में बंबई में एन.एम. जोशी, लाला लाजपत राय, जोसेफ बैप्टिस्टा और दीवान चमनलाल के प्रयासों से हुई थी। यह भारत का पहला सर्वभारतीय मजदूर संगठन था।

प्रश्न: गांधीजी और मजदूर आंदोलन का क्या संबंध था?

गांधीजी ने 1918 ई. में ‘अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन’ की स्थापना की और मजदूर-मालिक विवादों में सामंजस्य के मार्ग का समर्थन किया। वे मजदूरों की स्वतंत्र और उग्र हड़तालों को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए अनुचित मानते थे तथा पूँजी-श्रम सहयोग के दर्शन में विश्वास रखते थे।

प्रश्न: मेरठ षड्यंत्र केस क्या था?

20 मार्च 1929 ई. को ब्रिटिश सरकार ने 32 मजदूर एवं साम्यवादी नेताओं को गिरफ्तार कर उन पर ‘मेरठ षड्यंत्र केस’ का मुकदमा चलाया। यह मुकदमा साढ़े चार वर्ष तक चला और इसने भारत तथा विश्व में मजदूर आंदोलन को व्यापक प्रचार दिलाया।

प्रश्न: 1946 ई. में भारतीय नौसेना विद्रोह का मजदूर आंदोलन से क्या संबंध था?

फरवरी 1946 ई. में शाही भारतीय नौसेना के विद्रोह के समर्थन में बंबई के लगभग 3,00,000 मजदूरों ने हड़ताल की, जिससे मजदूर वर्ग और स्वतंत्रता संग्राम के बीच गहरी एकजुटता प्रदर्शित हुई।

प्रश्न: भारतीय मजदूर आंदोलन में साम्यवादियों (कम्युनिस्टों) की क्या भूमिका थी?

1920 के दशक के उत्तरार्ध से साम्यवादियों ने मजदूर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई, जैसे ‘गिरनी कामगार यूनियन’ और ‘लाल बावटा गिरनी कामगार यूनियन’ के माध्यम से बंबई की कपड़ा मिलों में बड़ी हड़तालों का नेतृत्व किया। इससे मजदूर आंदोलन में वैचारिक विभाजन भी हुआ, जिसके परिणामस्वरूप एटक, ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन फेडरेशन और रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस जैसे अलग-अलग संगठन बने।

प्रश्न: भारतीय मजदूर आंदोलन का स्वतंत्रता संग्राम में क्या योगदान था?

मजदूर वर्ग ने स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी करके राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार प्रदान किया। 1946 ई. की व्यापक हड़तालों ने ब्रिटिश शासन की समाप्ति को अनिवार्य बना दिया।

प्रश्न: भारत में ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता कब मिली?

1926 ई. में पारित भारतीय ट्रेड यूनियन अधिनियम (ITUA) के माध्यम से पहली बार ट्रेड यूनियनों को कानूनी संरक्षण प्राप्त हुआ, यद्यपि इसमें कई प्रतिबंधात्मक धाराएँ भी शामिल थीं।
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