कांग्रेस समाजवादी पार्टी: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में समाजवाद की गाथा
प्रस्तावना
कांग्रेस समाजवादी पार्टी (Congress Socialist Party—CSP) की स्थापना 1934 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर एक समाजवादी समूह के रूप में हुई। इसके प्रमुख संस्थापकों में आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया शामिल थे। इसके अन्य प्रमुख नेताओं में अशोक मेहता, मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, सम्पूर्णानंद, पुरुषोत्तम त्रिकमदास और यूसुफ मेहरअली थे। कांसपा का उद्देश्य कांग्रेस के स्वतंत्रता आंदोलन को समाजवादी दृष्टिकोण प्रदान करना तथा मजदूरों और किसानों के हितों की रक्षा करते हुए समाजवादी समाज की स्थापना करना था। यह संगठन कांग्रेस के भीतर रहकर सक्रिय रहा और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध जनआंदोलन को व्यापक बनाने पर बल देता था। 1948 में कांग्रेस द्वारा संगठन के भीतर गुटों पर रोक लगाए जाने के बाद कांग्रेस समाजवादी नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी के रूप में स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधियाँ शुरू कीं।
कांग्रेस में समाजवादी विचारधारा का उदय और राष्ट्रीय आंदोलन
भारत में कांग्रेस के समाजवादी विचारधारा के सर्वप्रमुख प्रेरणा-प्रतीक जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस थे। जवाहरलाल नेहरू ने फरवरी 1927 ईस्वी में ब्रुसेल्स (बेल्जियम) में आयोजित ‘साम्राज्यवाद-विरोधी और औपनिवेशिक दमन-विरोधी अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस’ में भाग लिया था, जहाँ विश्व के अनेक राष्ट्रवादी और समाजवादी नेताओं से उनका संपर्क हुआ। उसी वर्ष नवंबर 1927 ईस्वी में रूसी क्रांति की दसवीं वर्षगाँठ के अवसर पर नेहरू ने सोवियत रूस की यात्रा की और सोवियत समाज की योजनाबद्ध आर्थिक व्यवस्था से काफी प्रभावित हुए।
1927 ईस्वी के बाद पूरे देश में युवा संगठन स्थापित हुए और युवाओं के सैकड़ों अधिवेशन आयोजित किए गए। जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस ने पूरे देश का दौरा किया। अगस्त 1928 ईस्वी में जवाहरलाल नेहरू ने कलकत्ता में आयोजित ‘अखिल बंगाल छात्र-सम्मेलन’ की अध्यक्षता की। अपने दौरे में नेहरू ने साम्राज्यवाद, पूँजीवाद और जमींदारी प्रथा की आलोचना की तथा समाजवादी विचारधारा को अपनाने की प्रेरणा दी।
भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे अतिवादी क्रांतिकारी भी समाजवाद की ओर झुके, जिसका प्रमाण हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के घोषणापत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 1929 ईस्वी की वैश्विक आर्थिक मंदी, पूँजीवादी देशों की दुर्दशा और सोवियत संघ के आर्थिक संकट से अपेक्षाकृत मुक्ति के कारण समाजवादी विचारधारा और अधिक लोकप्रिय हुई। समाजवाद के प्रतीक जवाहरलाल नेहरू दिसंबर 1929 ईस्वी में ऐतिहासिक लाहौर कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष निर्वाचित हुए, जहाँ ‘पूर्ण स्वराज्य’ का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया। इसके पश्चात् 1936 ईस्वी (लखनऊ अधिवेशन) और 1937 ईस्वी (फैज़पुर अधिवेशन) में पुनः उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। नेहरू ने अपने दौरों, पुस्तकों, जैसे ‘ग्लिम्प्सेज़ ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री’ और ‘ऑटोबायोग्राफी’, लेखों और भाषणों के माध्यम से समाजवादी विचारों का प्रचार-प्रसार किया। सुभाषचंद्र बोस ने भी समाज के आर्थिक ढाँचे को समाजवादी रूप देने के लिए नेहरू का साथ दिया।
कांग्रेस समाजवादी पार्टी (कांसपा) की स्थापना
जयप्रकाश नारायण, फूलन प्रसाद वर्मा और कुछ अन्य नेताओं ने मिलकर जुलाई 1931 ईस्वी में बिहार में समाजवादी पार्टी की स्थापना की। 1933 ईस्वी में पंजाब में भी एक समाजवादी पार्टी का गठन किया गया तथा इसी अवधि में संयुक्त प्रांत, मद्रास आदि क्षेत्रों में भी छोटे-छोटे समाजवादी गुट सक्रिय हुए। 1932-33 ईस्वी के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दमन के दौरान अनेक युवा कांग्रेसी नेता जेलों में बंद हुए और वहीं जेल में बंद रहते हुए उन्होंने परस्पर विचार-विमर्श कर एक अखिल भारतीय समाजवादी पार्टी बनाने का प्रस्ताव रखा।
इस प्रस्ताव को साकार रूप देते हुए मई 1934 ईस्वी में पटना में एक संगठनात्मक बैठक आयोजित हुई तथा इसके पश्चात् 22-23 अक्टूबर 1934 ईस्वी को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बंबई अधिवेशन के अवसर पर आचार्य नरेंद्रदेव, जयप्रकाश नारायण, मीनू मसानी, अशोक मेहता और अन्य नेताओं ने विधिवत रूप से ‘कांग्रेस समाजवादी पार्टी’ (कांसपा) की स्थापना की। आचार्य नरेंद्रदेव इसके प्रथम अध्यक्ष और जयप्रकाश नारायण इसके महासचिव (जनरल सेक्रेटरी) नियुक्त हुए। पार्टी का मुखपत्र ‘कांग्रेस सोशलिस्ट’ नामक साप्ताहिक पत्रिका के रूप में बंबई से प्रकाशित होता था, जो पार्टी के विचारों के प्रचार-प्रसार का प्रमुख माध्यम बना।
कांसपा के उद्देश्य और कार्यक्रम
कांसपा के सभी सदस्य मानते थे कि कांग्रेस राष्ट्रीय संघर्ष का नेतृत्व करने वाली आधारभूत संस्था है। कांग्रेस समाजवादी पार्टी का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस का अभिन्न अंग बने रहकर समाजवादी ढंग से स्वराज्य की प्राप्ति और उसके बाद समाजवाद की स्थापना करना था। जयप्रकाश नारायण ने ‘समाजवाद ही क्यों?’ (और आचार्य नरेंद्रदेव ने ‘समाजवाद और राष्ट्रीय आंदोलन’ जैसी पुस्तकों की रचना कर पार्टी की वैचारिक आधारशिला तैयार की।
कांसपा ने विचारधारात्मक आधार पर कांग्रेस को समाजवादी दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया। इसने एक पंद्रह-सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत देश के आर्थिक विकास की प्रक्रिया को राज्य द्वारा नियोजित और नियंत्रित करने की घोषणा की, जिसमें प्रमुख उद्योगों तथा सेवाओं के राष्ट्रीयकरण, जमींदारी प्रथा के उन्मूलन, न्यूनतम मजदूरी की गारंटी तथा किसानों की ऋण-मुक्ति जैसी माँगें सम्मिलित थीं।
कम्युनिस्टों के साथ सहयोग और मेरठ सम्मेलन
1936 ईस्वी में मेरठ सम्मेलन में कांसपा ने निर्णय लिया कि भारत के सभी वामपंथी दलों को एकजुट हो जाना चाहिए। साम्यवादी दल (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) और उसके अनुषंगी संगठन जुलाई 1934 ईस्वी में ब्रिटिश सरकार द्वारा अवैध घोषित किए जा चुके थे। ऐसी स्थिति में पी.सी. जोशी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में साम्यवादी कांसपा में शामिल हो गए, ताकि वे कांग्रेस के मंच का उपयोग कर सकें। कम्युनिस्टों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर रहकर बड़ी लगन और परिश्रम से कार्य किया। कांग्रेस की जिला और प्रांतीय समितियों में लगभग 20 साम्यवादी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने। 1936 से 1942 ईस्वी के दौरान कम्युनिस्टों ने केरल, आंध्र और पंजाब में शक्तिशाली किसान आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिनमें अखिल भारतीय किसान सभा (1936 ई. में स्थापित) की भूमिका उल्लेखनीय रही।
साम्यवादियों से अलगाव
साम्यवादियों और कांसपा का गठबंधन अधिक समय तक नहीं चल सका। 1938 ईस्वी में मीनू मसानी ने ‘कम्युनिस्ट षड्यंत्र’ नामक एक दस्तावेज प्रकाशित कर कम्युनिस्टों की कार्यशैली और सोवियत-समर्थक नीतियों की आलोचना की। द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ होने पर जब कम्युनिस्ट पार्टी ने पहले इसे ‘साम्राज्यवादी युद्ध’ और बाद में सोवियत संघ पर जर्मन आक्रमण (जून 1941 ई.) के बाद ‘जनयुद्ध’ घोषित कर ब्रिटिश युद्ध-प्रयासों का समर्थन करना शुरू किया, तो कांसपा के साथ उनके मतभेद और गहरे हो गए। परिणामस्वरूप द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कांसपा ने साम्यवादियों को संगठन से बाहर कर दिया।
भारत छोड़ो आंदोलन में कांसपा की भूमिका
1942 ईस्वी के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कांसपा के नेताओं, जैसे जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अरुणा आसफ अली, अच्युत पटवर्धन और यूसुफ मेहरअली ने भूमिगत रहकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जनता को प्रोत्साहित किया। जयप्रकाश नारायण नवंबर 1942 ईस्वी में हजारीबाग जेल से नाटकीय ढंग से भाग निकले और भूमिगत रहकर क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करते रहे। इन नेताओं ने गुप्त रेडियो प्रसारण, भूमिगत पर्चों तथा ‘आजाद दस्ता’ जैसी गुप्त सशस्त्र इकाइयों के माध्यम से आंदोलन को जीवित रखा। कांसपा 1947 ईस्वी तक राष्ट्रीय आंदोलन और कांग्रेस को सशक्त बनाने में निरंतर योगदान देती रही।
गांधीजी और समाजवादियों के बीच वैचारिक मतभेद
कांग्रेस में दक्षिणपंथी नेताओं का वर्चस्व रहा, जिसके कारण कांसपा अपने प्रगतिशील उद्देश्यों को पूर्ण रूप से प्राप्त करने में असफल रही। दक्षिणपंथी कांग्रेसी समाजवादियों को ‘अंतरराष्ट्रीयवादी’ कहते थे और उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में ‘अविश्वसनीय’ मानते थे।
समाजवादी गांधीजी की समझौतावादी नीति के विरोधी थे। गांधीजी घोर अहिंसावादी थे, जबकि समाजवादी आवश्यकतानुसार सशस्त्र आंदोलन के पक्षधर थे। समाजवादी जनता की आर्थिक माँगों के आधार पर संगठन स्थापित कर संघर्ष करना चाहते थे, जबकि गांधीजी को किसी भी प्रकार का वर्ग-विभाजन स्वीकार्य नहीं था। समाजवादी लोकतांत्रिक औद्योगिक राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे, जहाँ आय का समान वितरण हो। गांधीजी के अनुसार कांग्रेस में समाजवादी गुट का निर्माण स्वागतयोग्य था, किंतु उनके कार्यक्रम स्वीकार्य नहीं थे। उनके विचार में समाजवादियों द्वारा प्रचारित वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत हिंसा पर आधारित था, जो कांग्रेस के मूल सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत था।
नेहरू-बोस संबंध और वैचारिक भिन्नता
नेहरू के विषय में सुभाषचंद्र बोस ने लिखा है : “वे दिमाग से तो वामपंथियों के साथ थे, किंतु हृदय से महात्मा गांधी के समर्थक थे।” नेहरू और बोस भी अधिक समय तक एक साथ कार्य नहीं कर सके। 1939 ईस्वी में त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में बोस पुनः कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए, किंतु गांधीजी के समर्थकों के साथ गहरे मतभेदों के कारण उन्हें अप्रैल 1939 ईस्वी में पद से त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद बोस और समाजवादी अलग हो गए, यद्यपि कांसपा के अनेक नेताओं ने व्यक्तिगत रूप से बोस के प्रति सहानुभूति बनाए रखी।
राष्ट्रीय आंदोलन में कांसपा ने कांग्रेस को और अधिक शक्तिशाली बनाया और उसे जनसाधारण के निकट लाया। कांसपा ने लोकप्रिय समाजवादी नारों के माध्यम से आम जनमानस को राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। इसने किसानों और श्रमिकों को संगठित कर राष्ट्रीय आंदोलन में भागीदार बनाया। यदि कांसपा की स्थापना न हुई होती और कांग्रेस के मंच से प्रगतिशील नारे न दिए गए होते, तो संभवतः कांग्रेस एकमात्र प्रमुख राजनीतिक दल न बन पाती।

कांसपा का पुनर्गठन: स्वतंत्र सोशलिस्ट पार्टी का उदय (1948)
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् 1947 ईस्वी में सरदार वल्लभभाई पटेल ने कांग्रेस में दोहरी सदस्यता (एक साथ कांग्रेस और किसी अन्य दल दोनों की सदस्यता) का कड़ा विरोध किया, क्योंकि उनका मानना था कि सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर संगठित गुटों का बने रहना अब उपयुक्त नहीं है। इसी संदर्भ में 1948 ईस्वी के नासिक अधिवेशन में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने दोहरी सदस्यता पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पारित किया।
इसके परिणामस्वरूप कांसपा के नेताओं को कांग्रेस अथवा अपनी समाजवादी पार्टी में से किसी एक को चुनना पड़ा। अतः 1948 ईस्वी में कांसपा ने अपने नाम से ‘कांग्रेस’ शब्द हटाकर स्वतंत्र ‘सोशलिस्ट पार्टी’ की स्थापना की तथा इसके नेताओं ने औपचारिक रूप से कांग्रेस की सदस्यता त्याग दी। कांसपा का गठन इसलिए हुआ था ताकि कांग्रेस के अंदर रहकर उसे मजबूत किया जाए और उसकी नीतियों में प्रगतिशील परिवर्तन और संशोधन किया जाए, किंतु दक्षिणपंथी वर्चस्व और अंततः दोहरी सदस्यता पर प्रतिबंध के कारण यह प्रयोग स्थायी नहीं रह सका। आगे चलकर 1952 ईस्वी में सोशलिस्ट पार्टी का किसान मजदूर प्रजा पार्टी के साथ विलय होकर ‘प्रजा समाजवादी पार्टी’ का निर्माण हुआ, जो स्वतंत्र भारत की राजनीति में समाजवादी धारा का एक महत्त्वपूर्ण चरण सिद्ध हुआ।
समकालीन अन्य वामपंथी दल
कांग्रेस समाजवादी पार्टी के समानांतर इसी काल में अनेक अन्य वामपंथी और समाजवादी दलों का भी उदय हुआ, जिन्होंने भारतीय राजनीति की वैचारिक विविधता को समृद्ध किया:
ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक
ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर वामपंथी और साम्राज्यवाद-विरोधी शक्तियों को संगठित करने के उद्देश्य से की थी। इसका प्रमुख लक्ष्य भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाना तथा स्वतंत्र भारत का समाजवादी आधार पर पुनर्निर्माण करना था। सुभाषचंद्र बोस फरवरी 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में सर्वसम्मति से कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे और जनवरी 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन में गांधीजी-समर्थित पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर दूसरी बार यह पद प्राप्त किया। किंतु त्रिपुरी में पारित ‘पंत प्रस्ताव’ ने कार्यसमिति का गठन गांधीजी की इच्छानुसार करने की माँग की, जिससे बोस की स्थिति नाममात्र की रह गई। असफल वार्ताओं के बाद उन्होंने 29 अप्रैल 1939 ईस्वी को इस्तीफा दिया, और मात्र चार दिन बाद 3 मई 1939 ईस्वी को कलकत्ता में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की घोषणा की।
जून 1939 ईस्वी में बंबई सम्मेलन में संगठन का संविधान स्वीकृत हुआ; जुलाई में बोस अध्यक्ष, सरदुल सिंह कवीशर उपाध्यक्ष तथा लाल शंकरलाल महासचिव बने। अगस्त 1939 ईस्वी में ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ नामक साप्ताहिक पत्र आरंभ हुआ। सितंबर 1939 ईस्वी में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ने के बाद ब्रिटिश सरकार ने बिना परामर्श भारत को युद्ध में झोंक दिया, जिसका बोस ने विरोध किया। मार्च 1940 ईस्वी में उन्होंने रामगढ़ में किसान सभा के सहयोग से समझौता-विरोधी सम्मेलन आयोजित किया। इसके बाद 20-22 जून 1940 ईस्वी को नागपुर अधिवेशन में संगठन को औपचारिक समाजवादी दल घोषित किया गया, यही तिथि पार्टी अपनी स्थापना-तिथि मानती है और बोस अध्यक्ष तथा एच.वी. कामथ महासचिव चुने गए।
2 जुलाई 1940 ईस्वी को हॉलवेल स्मारक आंदोलन के सिलसिले में बोस को गिरफ्तार कर प्रेसीडेंसी जेल भेजा गया। जेल में आमरण अनशन के बाद दिसंबर 1940 ईस्वी में उन्हें रिहा कर नजरबंद रखा गया। जनवरी 1941 ईस्वी में वेश बदलकर वे गुप्त रूप से पेशावर-काबुल होते हुए मास्को, फिर अप्रैल 1941 ईस्वी में जर्मनी पहुँचे, जहाँ आजाद हिंद केंद्र और इंडियन लीजन की स्थापना की तथा ‘नेताजी’ की उपाधि पाई। भारत छोड़ो आंदोलन के साथ अगस्त 1942 ईस्वी में ब्रिटिश सरकार ने फॉरवर्ड ब्लॉक को अवैध घोषित कर दिया; बिहार में कार्यकर्ता ‘आजाद दस्ता’ जैसे भूमिगत समूहों से जुड़े रहे। 1943 ईस्वी में बोस सिंगापुर पहुँचे, रासबिहारी बोस से आजाद हिंद फौज का नेतृत्व लिया और 21 अक्टूबर 1943 ईस्वी को आजाद हिंद की अस्थायी सरकार बनाई।
युद्ध की समाप्ति पर फरवरी 1946 ईस्वी में जबलपुर में संगठन का पुनर्गठन हुआ और यह पार्टी 1946 ईस्वी के चुनावों में शामिल हुई; जनवरी 1947 ईस्वी में आरा में दूसरा अधिवेशन हुआ। स्वतंत्रता-विभाजन (1947 ई.) का इसने तीव्र विरोध किया, किंतु फरवरी 1948 ईस्वी की वाराणसी बैठक के बाद संगठन विभाजित हो गया- रुइकर-नीत सुभाषवादी गुट, जो 1953 ईस्वी में प्रजा समाजवादी पार्टी में विलीन हो गया तथा मार्क्सवादी गुट, जिसने मूल नाम बनाए रखा और आज भी पश्चिम बंगाल में सक्रिय है। फॉरवर्ड ब्लॉक ने पूर्ण स्वतंत्रता, साम्राज्यवाद-विरोध और समाजवादी पुनर्निर्माण की जिस उग्र-राष्ट्रवादी धारा को जीवंत रखा, वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्र भारत की वामपंथी राजनीति दोनों में आज भी स्मरणीय है।
रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी
रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी (RDP) की स्थापना प्रसिद्ध क्रांतिकारी, राजनीतिक चिंतक और बाद में मानवतावादी विचारक मानवेंद्र नाथ राय (एम. एन. राय) ने 1940 ईस्वी में की थी। एम. एन. राय पूर्व में अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन के प्रमुख नेता रह चुके थे। उन्होंने 1919 ईस्वी में मेक्सिको में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में केंद्रीय भूमिका निभाई और 1920 ईस्वी में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नींव रखी तथा कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में लेनिन के निकट सहयोगी के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में सोवियत साम्यवाद और उसकी नीतियों से उनके गहरे मतभेद उत्पन्न हो गए, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने साम्यवाद से पूर्ण रूप से नाता तोड़ लिया। भारत लौटने के बाद उन्होंने लोकतंत्र, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक पुनर्गठन पर आधारित वैकल्पिक राजनीतिक विचार विकसित किए।
1939 ईस्वी में राय ने ‘लीग ऑफ रेडिकल कांग्रेसमेन’ के माध्यम से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक और समाजवादी विचारों वाले लोगों को संगठित करने का प्रयास किया। द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ने के बाद युद्ध को लेकर उनके विचार कांग्रेस तथा अन्य वामपंथी संगठनों से भिन्न हो गए और इसी मतभेद के चलते राय व उनके सहयोगियों ने कांग्रेस छोड़ दी। इसी पृष्ठभूमि में 1940 ईस्वी में रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन हुआ। राय का मानना था कि द्वितीय विश्वयुद्ध केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद और भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं, बल्कि फासीवाद और लोकतांत्रिक शक्तियों के बीच का संघर्ष भी था। वे नाजी जर्मनी, फासीवादी इटली और जापानी सैन्यवाद को विश्व लोकतंत्र तथा मानव स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा मानते थे, अतः उन्होंने मित्र राष्ट्रों के युद्ध-प्रयासों के समर्थन की नीति अपनाई, इस विश्वास के साथ कि फासीवाद की विजय स्वतंत्रता के लिए और अधिक घातक सिद्ध होगी। पार्टी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की समर्थक नहीं थी, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकारों के विस्तार और राजनीतिक भागीदारी की पक्षधर थी। इस प्रकार उसका दृष्टिकोण उस कांग्रेसी वर्ग से भिन्न था, जो ब्रिटिश सरकार पर तत्काल स्वतंत्रता के लिए दबाव डाल रहा था।
पार्टी ने लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, धर्मनिरपेक्षता, आर्थिक पुनर्गठन और व्यक्ति की स्वतंत्रता को विशेष महत्त्व दिया, तथा स्वतंत्रता को केवल विदेशी शासन से मुक्ति तक सीमित न मानकर व्यक्ति की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक मुक्ति की व्यापक प्रक्रिया माना। इसका श्रमिक संगठन ‘इंडियन फेडरेशन ऑफ लेबर’ था, जिसके माध्यम से मजदूरों के बीच रायवादी विचारों का प्रचार होता था, तथा पार्टी उन औद्योगिक हड़तालों की आलोचक थी जिनसे फासीवाद-विरोधी युद्ध-प्रयास कमजोर पड़ने की आशंका रहती थी।
वी. एम. तारकुंडे, जो पूर्व में कांग्रेस समाजवादी पार्टी से जुड़े थे किंतु त्रिपुरी अधिवेशन (1939 ई.) में बोस-विरोधी रुख से असंतुष्ट होकर राय से जुड़ गए थे, 1944 से 1948 ईस्वी तक पार्टी के महासचिव रहे। इस अवधि में राय के विचार पारंपरिक दलगत राजनीति से आगे बढ़कर ‘रेडिकल ह्यूमनिज्म’ (उग्र मानवतावाद) की ओर विकसित हुए, जिसमें वैज्ञानिक चिंतन, तर्क, नैतिक स्वतंत्रता और स्वतंत्र व्यक्तित्व को समाज-प्रगति का आधार माना गया। यह निष्कर्ष निकालते हुए कि राजनीतिक दल मानव-स्वतंत्रता की प्राप्ति का समुचित माध्यम नहीं हैं, राय ने दिसंबर 1948 ईस्वी में रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी को भंग कर दिया और उसके स्थान पर रेडिकल ह्यूमनिस्ट आंदोलन प्रारंभ किया। भारतीय राजनीतिक इतिहास में इस दल का महत्त्व मुख्यतः राय के लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक और मानवतावादी चिंतन तथा युद्धकालीन उसके विशिष्ट फासीवाद-विरोधी दृष्टिकोण के कारण है।
क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी
क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी (RSP) की स्थापना 19 मार्च 1940 ईस्वी को त्रिदिब कुमार चौधरी तथा उनके सहयोगियों द्वारा की गई थी। पार्टी की वैचारिक जड़ें मुख्यतः बंगाल की क्रांतिकारी परंपरा में थीं, विशेषकर अनुशीलन समिति और युगांतर जैसी क्रांतिकारी धाराओं तथा हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) में। 1920 के दशक से लेकर 1930 के दशक के अंत तक जेलों में बंद रहते हुए अनुशीलन-परंपरा के अनेक क्रांतिकारियों ने मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा को आत्मसात किया और रिहाई के बाद संगठित होकर सशस्त्र क्रांति की पुरानी रणनीति के स्थान पर व्यापक जनसंघर्ष आधारित समाजवादी राजनीति की दिशा में कार्य करने का निर्णय लिया, जिसका परिणाम मार्च 1940 ईस्वी में RSP के औपचारिक गठन के रूप में सामने आया।
1930 और 1940 के दशक में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर कांग्रेस की रणनीति और नेतृत्व को लेकर विभिन्न मत उभर रहे थे। महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस के बीच त्रिपुरी अधिवेशन (1939 ई.) से उत्पन्न राजनीतिक मतभेदों के दौरान क्रांतिकारी समाजवादी धारा ने बोस का समर्थन किया, क्योंकि उसका मानना था कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष को अधिक उग्र और व्यापक जनआंदोलन का रूप दिया जाना चाहिए। इसी कारण 1940 ईस्वी में त्रिदिब चौधरी तथा अनेक अनुशीलन-मार्क्सवादी नेता बोस के ‘युद्ध-विरोधी और तत्काल कार्रवाई’ के रुख का समर्थन करने के आरोप में ब्रिटिश सरकार द्वारा डिफेंस ऑफ इंडिया नियमों के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिए गए, और चौधरी को छह वर्षों (1940-1946 ई.) तक हिजली, ढाका तथा दमदम की जेलों में सुरक्षा-बंदी के रूप में रखा गया। पार्टी ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के साथ-साथ समाजवादी व्यवस्था की स्थापना को भी अपने राजनीतिक उद्देश्यों में शामिल किया।
रिहाई के बाद त्रिदिब चौधरी ने स्वतंत्र भारत में पार्टी के महासचिव के रूप में इसे संगठित रूप दिया। 1946 ईस्वी में पार्टी के कुछ युवा सदस्यों ने अलग होकर ‘सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर’ नामक मंच बनाया, जो आगे चलकर 1948 ईस्वी में मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा पर आधारित सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया के रूप में विकसित हुआ। इस प्रकार क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय क्रांतिकारी परंपरा और समाजवादी विचारधारा के बीच एक सेतु के रूप में विकसित हुई, जिसका उद्देश्य राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक-आर्थिक समानता स्थापित करना था। स्वतंत्रता के बाद भी इसने पूँजीवादी व्यवस्था और आर्थिक असमानताओं की आलोचना करते हुए श्रमिकों, किसानों तथा वंचित वर्गों के हितों को राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता दी।
स्वतंत्रता के बाद पार्टी ने संसदीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में। यह पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में वाम मोर्चे का हिस्सा रही, जबकि केरल में इसने समय-समय पर कांग्रेस-नीत गठबंधनों (यूडीएफ) तथा वाम-नीत लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ), दोनों के साथ राजनीतिक सहयोग किया। इस प्रकार पार्टी ने वामपंथी राजनीति के साथ-साथ व्यापक लोकतांत्रिक गठबंधन-राजनीति में भी भागीदारी की। लोकसभा चुनावों में भी पार्टी ने समय-समय पर उपस्थिति दर्ज कराई- 1999 और 2004 ईस्वी के चुनावों में उसे लगभग 0.4 प्रतिशत मत और तीन-तीन सीटें प्राप्त हुईं। सीमित संगठनात्मक आधार के बावजूद पार्टी ने भारतीय वामपंथी राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी और आज भी बंगाल की क्रांतिकारी परंपरा, समाजवाद तथा संसदीय लोकतंत्र के बीच विकसित हुए ऐतिहासिक संबंधों की एक विशिष्ट धारा का प्रतिनिधित्व करती है।
भारतीय बोल्शेविक दल
भारत की बोल्शेविक दल (BPI) की स्थापना 1939 ईस्वी में हुई थी और जिसका विशेष प्रभाव पश्चिम बंगाल के श्रमिक व ट्रेड यूनियन आंदोलन में रहा। इसकी वैचारिक-संगठनात्मक जड़ें 1933 ईस्वी में निहारेंदु दत्त मजूमदार के नेतृत्व में स्थापित बंगाल लेबर पार्टी में थीं, जिससे सिसिर राय, सुधा राय, बिश्वनाथ दुबे, कमल सरकार, नंदलाल बोस और प्रमोद सेन जैसे नेता जुड़े थे। बंगाल लेबर पार्टी ने 1930 ईस्वी के दशक में कलकत्ता पोर्ट एवं डॉक वर्कर्स यूनियन, जूट मिल श्रमिक संघों तथा अन्य अनेक ट्रेड यूनियनों का नेतृत्व किया।
1930 के दशक के मध्य में बंगाल लेबर पार्टी के नेता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए, किंतु लेबर पार्टी को एक खुले मोर्चे के रूप में बनाए रखा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन (1939 ई.) में सुभाषचंद्र बोस और कांग्रेस के बीच उत्पन्न मतभेदों के संदर्भ में इन नेताओं का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से मतभेद बढ़ गया, क्योंकि उनका आरोप था कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने बोस और उनके ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक को उचित समर्थन नहीं दिया तथा राष्ट्रीय मोर्चे के नाम पर वर्ग-सहयोगवादी नीति अपनाई। इसी पृष्ठभूमि में निहारेंदु दत्त मजूमदार, सिसिर राय, बिश्वनाथ दुबे और अजित राय सहित कुछ नेताओं ने 1939 ईस्वी में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग होकर भारत की बोल्शेविक पार्टी की स्थापना की तथा निहारेंदु दत्त मजूमदार इसके संस्थापक महासचिव बने। पार्टी एक भूमिगत मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठन के रूप में कार्य करती थी और बंगाल लेबर पार्टी को अपने खुले मोर्चे के रूप में बनाए रखती थी।
द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ में पार्टी ने इसे साम्राज्यवादी युद्ध बताते हुए ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी जन-आंदोलन का आह्वान किया, किंतु 1941 ईस्वी में जर्मनी के सोवियत संघ पर आक्रमण के बाद पार्टी ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के समान फासीवाद-विरोधी एकता और ब्रिटिश युद्ध-प्रयासों के समर्थन की नीति अपना ली। निहारेंदु दत्त मजूमदार इस परिवर्तन से असहमत रहे और उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन किया, जिस कारण उन्हें तीन वर्ष तक हिरासत में रखा गया। 1943 ईस्वी में निर्मल सेन सहित लगभग बीस सदस्य भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में चले गए तथा 1944 ईस्वी में प्रमोद सेन के नेतृत्व में एक अन्य समूह कांग्रेस में शामिल हो गया। 1944 ईस्वी के प्रारंभ में केंद्रीय नेतृत्व ने बंगाल समिति भंग कर बरदा मुकुटमणि, मणि विष्णु चौधरी, अमर नस्कर और दीनानाथ गुप्ता की चार-सदस्यीय गुप्त सचिवालय बनाई।
स्वतंत्रता के समय सिसिर राय महासचिव बने। पार्टी ने विभाजन को विश्वासघात बताते हुए भाषाई राज्यों व जनजातीय स्वायत्तता पर आधारित ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया’ की अवधारणा तथा राष्ट्रमंडल से अलगाव व सोवियत-चीन के साथ संबंधों का समर्थन किया। 1950 के दशक में फॉरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के आनंदी मुखर्जी गुट व 1954 ईस्वी में नेपाल भट्टाचार्य की वर्कर्स एंड पीजेंट्स लीग के विलय से पार्टी का आधार बढ़ा तथा इससे जुड़ी यूनियनें यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस में शामिल हुईं, जहाँ सिसिर राय महासचिव बने। 1957 ईस्वी में सिसिर राय-बिश्वनाथ दुबे मतभेद से विभाजन हुआ। 1960 ईस्वी में राय की मृत्यु पर नेपाल भट्टाचार्य महासचिव बने। 1965 ईस्वी में सुधा राय के भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-विलय प्रस्ताव की अस्वीकृति पर वे व समर्थक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में चले गए। 1967 ईस्वी में पार्टी पीपुल्स यूनाइटेड लेफ्ट फ्रंट से जुड़ी, जो संयुक्त मोर्चे में बदल गया। मार्च 1969 ईस्वी में मुकुटमणि पर्यटन मंत्री बने, किंतु जुलाई 1969 ईस्वी में उन्हें निष्कासित कर दिया गया, जिससे पार्टी पुनः विभाजित हुई। बाद के दशकों में इसका प्रभाव घटता गया, यद्यपि यह पश्चिम बंगाल वाम मोर्चे से जुड़ी रही।
लेनिनिस्ट दल
अजीत राय और इंद्रसेन ने 1941 ईस्वी में ‘लेनिनवादी दल’ की स्थापना की। इस दल की वैचारिक अवधारणा व्लादिमीर लेनिन द्वारा विकसित कम्युनिस्ट पार्टी के संगठनात्मक मॉडल पर आधारित थी, जिसे ‘अग्रदूत दल’ की अवधारणा से भी जोड़ा जाता है। लेनिन के अनुसार मजदूर वर्ग में मात्र आर्थिक संघर्ष के माध्यम से व्यापक राजनीतिक और वर्ग-चेतना स्वतः विकसित नहीं हो सकती, जैसा कि उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘व्हाट इज़ टु बी डन?’ (1902 ई.) में विस्तार से प्रतिपादित किया था। इसी विचार के आधार पर एक ऐसे संगठित, अनुशासित और वैचारिक रूप से प्रशिक्षित क्रांतिकारी दल की आवश्यकता महसूस की गई, जो मजदूरों को राजनीतिक शिक्षा दे, उन्हें संगठित करे और क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व करे। इसी दृष्टिकोण से प्रेरित होकर भारत में अजीत राय और इंद्रसेन ने मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांतों को व्यावहारिक राजनीति में लागू करने तथा मजदूर वर्ग के नेतृत्व में क्रांतिकारी परिवर्तन को संगठित करने के उद्देश्य से इस दल की स्थापना की।
लेनिनवादी दल का प्रमुख संगठनात्मक सिद्धांत ‘लोकतांत्रिक केंद्रीयवाद’ था, जिसके अंतर्गत पार्टी के भीतर नीतियों और निर्णयों पर स्वतंत्र चर्चा-बहस की अनुमति रहती थी, किंतु निर्णय हो जाने के बाद सभी सदस्यों से उसका पालन करने और पार्टी-अनुशासन बनाए रखने की अपेक्षा की जाती थी। इस व्यवस्था का उद्देश्य पार्टी में एकता, अनुशासन और केंद्रीय नेतृत्व को सुदृढ़ बनाए रखना था। इसके साथ ही संगठन में ‘पेशेवर क्रांतिकारियों’ की भूमिका को भी महत्त्वपूर्ण माना गया, जो अपना अधिकांश समय राजनीतिक संगठन, प्रचार, जनसंपर्क और क्रांतिकारी गतिविधियों को समर्पित करते थे, तथा विशेषकर ब्रिटिश दमन की परिस्थितियों में संगठन की सुरक्षा और निरंतरता बनाए रखने हेतु कठोर अनुशासन एवं गोपनीयता पर विशेष बल दिया जाता था।
लेनिनवादी दल का प्रमुख कार्य मजदूरों तथा आम जनता को राजनीतिक रूप से शिक्षित और संगठित करना, पूँजीवादी व्यवस्था की आलोचना कर वर्ग-संघर्ष की चेतना विकसित करना, जनआंदोलनों को संगठित दिशा देना और समाजवादी क्रांति के लिए अनुकूल राजनीतिक परिस्थितियाँ तैयार करना था। क्रांति के पश्चात् राज्य-सत्ता का उपयोग समाजवादी व्यवस्था स्थापित करने तथा उत्पादन के साधनों पर समाज के नियंत्रण को बढ़ाने के लिए किए जाने की परिकल्पना की गई थी। इस प्रकार लेनिनवादी दल केवल एक राजनीतिक संगठन नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना, अनुशासित संगठन, वर्ग-संघर्ष और समाजवादी परिवर्तन पर केंद्रित एक व्यापक क्रांतिकारी अवधारणा थी।
कांसपा की भूमिका का मूल्यांकन
कांग्रेस समाजवादी पार्टी को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है, क्योंकि इसने कांग्रेस जैसे व्यापक बहुवर्गीय राष्ट्रीय मंच के भीतर रहते हुए वर्ग-आधारित आर्थिक न्याय, समाजवादी योजना-व्यवस्था और श्रमिक-किसान हितों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का अभिन्न हिस्सा बनाया। इसने कांग्रेस को केवल एक राजनीतिक स्वतंत्रता की माँग करने वाले संगठन से आगे बढ़ाकर सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत की योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था, मिश्रित अर्थव्यवस्था की अवधारणा तथा भूमि-सुधार जैसी नीतियों की वैचारिक पृष्ठभूमि में कांसपा और उससे प्रभावित समाजवादी विचारकों का महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
इस प्रकार कांग्रेस समाजवादी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर वैचारिक विविधता और सामाजिक-आर्थिक चेतना का प्रतीक बनकर उभरी। यद्यपि यह दल कांग्रेस के भीतर अपने समाजवादी कार्यक्रम को पूर्णतः लागू करवाने में सफल नहीं हो सका, तथापि इसने राष्ट्रीय आंदोलन को श्रमिकों, किसानों और आम जनमानस के निकट लाने में निर्णायक भूमिका निभाई। जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्रदेव और राममनोहर लोहिया जैसे नेताओं द्वारा प्रतिपादित समाजवादी विचारधारा ने स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-पश्चात् दोनों कालखंडों में भारतीय राजनीति और नीति-निर्माण को गहराई से प्रभावित किया, जो आज भी भारतीय समाजवादी राजनीतिक परंपरा में जीवंत है।


