स्वराज पार्टी (Swaraj Party)

स्वराज पार्टी (Swaraj Party)
स्वराज पार्टी (मार्च 1923 ई.) असहयोग आंदोलन का स्थगन और कांग्रेस का संकटकाल 1922 ई. […]

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स्वराज पार्टी (मार्च 1923 ई.)

असहयोग आंदोलन का स्थगन और कांग्रेस का संकटकाल

1922 ई. में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एक गंभीर मोड़ पर खड़ा था। 4 फरवरी 1922 ई. को गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में एक पुलिस चौकी पर भीड़ ने आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी जलकर मर गए। यह घटना असहयोग आंदोलन के दौरान हिंसा का सबसे भयावह उदाहरण थी। महात्मा गांधी ने इसे अपने अहिंसा के सिद्धांत का घोर उल्लंघन माना और 12 फरवरी 1922 ई. को बर्धमान में एक विशाल जनसभा के समक्ष असहयोग आंदोलन की तत्काल वापसी की घोषणा कर दी। इस निर्णय ने राष्ट्रीय राजनीति में एक गहरी खाई पैदा कर दी। वह आंदोलन जो लाखों भारतीयों को एकसूत्र में बाँधे हुए था, अचानक थम गया।

10 मार्च 1922 ई. को गांधीजी को ‘यंग इंडिया’ में लेख लिखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें छह वर्षों की कारावास की सजा सुनाई गई। इस गिरफ्तारी ने आंदोलन के संगठनात्मक ढाँचे को और भी कमजोर कर दिया। कांग्रेस, जो कुछ महीने पूर्व तक जन-आंदोलन के उत्साह से लबरेज थी, अचानक निष्क्रियता के गहरे अंधकार में धकेल दी गई। मार्च 1923 ई. तक कांग्रेस की सदस्य संख्या घटकर मात्र 1,06,046 रह गई थी, जो असहयोग आंदोलन के चरम काल की तुलना में अत्यंत निराशाजनक थी।

इस विषम परिस्थिति में कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष एक जटिल प्रश्न था- आगे की रणनीति क्या हो? जून 1922 ई. में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कमेटी ने ‘सविनय अवज्ञा जाँच समिति’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य भावी कार्यक्रम पर विचार-विमर्श करना था। इस समिति के भीतर दो प्रमुख वैचारिक धाराएँ उभरकर सामने आईं। एक ओर सी. राजगोपालाचारी, वल्लभभाई पटेल, डॉ. अंसारी और राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने गांधीवादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व किया, जो ग्रामीण इलाकों में रचनात्मक कार्य, जैसे चरखा, खादी, हिंदू-मुस्लिम एकता और अछूत उद्धार के माध्यम से जन-संघर्ष के लिए धीरे-धीरे जमीन तैयार करने के पक्ष में थे। दूसरी ओर चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, विट्ठलभाई पटेल और हकीम अजमल खाँ का एक दूसरा समूह था, जो 1919 के भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत स्थापित विधान परिषदों के चुनावों में भाग लेकर, इन परिषदों के भीतर से ही संविधान को ‘तोड़ने’ की रणनीति अपनाना चाहता था। यह ‘संविधान को अंदर से तोड़ो’ की नीति थी, जिसने भविष्य में स्वराज पार्टी के गठन की नींव रखी।

गया अधिवेशन और पार्टी विभाजन का संकट (दिसंबर 1922 ई.)

1922 ई. का अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन बिहार के गया में 26 से 31 दिसंबर 1922 ई. को हुआ। इस अधिवेशन की अध्यक्षता चितरंजन दास ने की, जो उस समय कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। दास एक निपुण राजनीतिज्ञ, प्रखर वक्ता और बंगाल के ‘देशबंधु’ अर्थात देश के मित्र के रूप में जाने जाते थे। गया अधिवेशन से दो महीने पूर्व, अक्टूबर 1922 ई. में देहरादून में संयुक्त प्रांत के प्रादेशिक सम्मेलन में दास ने एक ऐतिहासिक नारा दिया था : “स्वराज जन-सामान्य के लिए होना चाहिए, केवल भद्रलोक के लिए नहीं।” यह घोषणा केवल एक वैचारिक कथन नहीं थी, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के वर्ग चरित्र में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव का संकेत थी। दास यह मानते थे कि स्वराज की लड़ाई को सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों से जोड़ना आवश्यक है, अन्यथा यह केवल अंग्रेजों की जगह भारतीय उच्चवर्गीय समाज का शासन स्थापित करने का साधन बनकर रह जाएगी।

गया अधिवेशन में दो प्रमुख मुद्दों पर तीव्र विवाद हुआ। प्रथम था विधान परिषदों में प्रवेश का प्रश्न। दास और उनके समर्थकों ने प्रस्ताव रखा कि कांग्रेस को 1923 ई. में होने वाले चुनावों में भाग लेना चाहिए और परिषदों में प्रवेश करके सरकारी कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करना चाहिए। परंतु कांग्रेस के पारंपरिक नेताओं ने इस प्रस्ताव का जोरदार विरोध किया। वल्लभभाई पटेल, सी. राजगोपालाचारी और राजेंद्र प्रसाद जैसे ‘अपरिवर्तनवादी’ नेताओं ने इसे गांधीवादी सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन माना। उनका तर्क था कि परिषदों का बहिष्कार ही ब्रिटिश सत्ता के प्रति नकारात्मक प्रतिरोध का सबसे प्रभावी साधन है। मत-विभाजन हुआ और परिषदों में प्रवेश का प्रस्ताव 890 मतों के पक्ष में तथा 1,740 मतों के विरोध में गिरा दिया गया। यह पराजय केवल एक राजनीतिक प्रस्ताव की नहीं थी। यह दो वैचारिक धाराओं के बीच गहरे मतभेद का खुला प्रकटीकरण था। इस पराजय के बाद चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू दोनों ने कांग्रेस कार्यकारिणी के अपने-अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया।

स्वराज पार्टी की स्थापना (मार्च 1923 ई.)

गया अधिवेशन की पराजय के बाद दास और उनके समर्थकों ने एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाने का निर्णय किया। 1 जनवरी 1923 ई. को कलकत्ता में एक बैठक आयोजित की गई और उसके बाद मार्च 1923 ई. में इस नई पार्टी का औपचारिक गठन हुआ। इस नई पार्टी का नाम ‘कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी’ रखा गया, जो बाद में संक्षिप्त रूप में ‘स्वराज पार्टी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। पार्टी की स्थापना में चितरंजन दास के अतिरिक्त मोतीलाल नेहरू, हकीम अजमल खाँ, विट्ठलभाई पटेल, मदनमोहन मालवीय और एन.एम. जयकर जैसे प्रमुख नेताओं ने सक्रिय भूमिका निभाई। संगठनात्मक रूप से, चितरंजन दास को पार्टी का अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू को सचिव नियुक्त किया गया।

स्वराज पार्टी ने अपने संविधान में यह स्पष्ट किया कि वह कांग्रेस का संपूर्ण कार्यक्रम पूर्णतः स्वीकार करती है, केवल विधान परिषदों के प्रश्न पर उसकी भिन्न राय है। पार्टी ने यह भी घोषित किया कि उसके सदस्य कांग्रेस की सदस्यता बनाए रखेंगे, चरखा चलाएंगे, अस्पृश्यता का विरोध करेंगे और सांप्रदायिक एकता के लिए कार्य करेंगे। वैचारिक स्तर पर, परिषदों में प्रवेश के समर्थकों को ‘परिवर्तनवादी’ कहा गया, क्योंकि वे कांग्रेस की पुरानी ‘बहिष्कार’ की नीति में परिवर्तन चाहते थे। गांधीजी के अनुयायी, जो परिषदों का बहिष्कार जारी रखना चाहते थे, ‘अपरिवर्तनवादी’ कहलाए।

स्वराज पार्टी (Swaraj Party)
स्वराज पार्टी

स्वराज पार्टी ने घोषणा की कि वह विधान परिषद में स्वदेशी सरकार के गठन की माँग उठाएगी और यदि यह माँग नहीं मानी गई, तो पार्टी के सभी निर्वाचित सदस्य एकजुट होकर विधान परिषद की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करेंगे। 14 अक्टूबर 1923 ई. को जारी अपने चुनाव घोषणा-पत्र में स्वराजवादियों ने साम्राज्यवाद के विरोध को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया। घोषणा-पत्र में कहा गया था : “भारत पर अंग्रेजी हुकूमत का मकसद इंग्लैंड के स्वार्थी हितों की पूर्ति करना है। अंग्रेजों का असली मकसद भारत के असीमित संसाधनों का शोषण करना और भारतीय जनता को ब्रिटेन का ताबेदार बनाकर रखना है।” घोषणा-पत्र में यह संकल्प भी किया गया था कि स्वराजी विधान परिषद में संघर्ष करेंगे और पाखंडी सरकार की कलई खोलेंगे। चितरंजन दास के शब्दों में : “हम उस व्यवस्था को नष्ट करना और उससे मुक्त होना चाहते हैं, जो हमारे लिए हितकर नहीं है और न हो सकती है।”

दिल्ली और काकीनाडा अधिवेशन: कांग्रेस-स्वराज समझौता (1923 ई. )

स्वराज पार्टी के गठन के बाद कांग्रेस में विधान परिषदों के प्रश्न पर गहरा मतभेद बना रहा। इस स्थिति को सुलझाने के लिए सितंबर 1923 ई. में दिल्ली में कांग्रेस का एक विशेष अधिवेशन बुलाया गया। इसके बाद दिसंबर 1923 ई. में आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में नियमित अधिवेशन हुआ। इन दोनों अधिवेशनों में एक महत्त्वपूर्ण समझौता संपन्न हुआ, जिसके अनुसार कांग्रेसी सदस्यों को विधान परिषदों के चुनावों में खड़े होने की अनुमति दी गई, परंतु किसी भी प्रकार का सरकारी पद स्वीकार करने पर प्रतिबंध लगाया गया। यह एक व्यावहारिक समाधान था जिसने कांग्रेस के दोनों धड़ों को अपनी-अपनी रणनीति अपनाने की स्वतंत्रता दी और साथ ही संगठनात्मक एकता भी बनाए रखी। इसी समय देश में एक अखिल भारतीय खादी बोर्ड की स्थापना भी की गई, जो अपरिवर्तनवादियों के रचनात्मक कार्यक्रम का हिस्सा था।

बंगाल पैक्ट: सांप्रदायिक एकता का ऐतिहासिक प्रयोग (दिसंबर 1923 ई. )

बंगाल की राजनीति में हिंदू-मुस्लिम समीकरण सदैव से जटिल रहा था। चितरंजन दास ने इस समस्या का समाधान एक राजनीतिक समझौते के माध्यम से खोजने का प्रयास किया। दिसंबर 1923 ई. में बंगाल पैक्ट या ‘दास-निहाल समझौता’ संपन्न हुआ, जिसमें दास की ओर से कांग्रेस और सर निहाल अहमद की ओर से बंगाल के मुस्लिम नेताओं ने भाग लिया। इस समझौते में यह तय हुआ कि स्वराज मिलने पर मुसलमानों को 55 प्रतिशत प्रशासकीय पद दिए जाएंगे, विधान परिषद में उनका उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाएगा, मस्जिदों के समीप संगीत एवं बाजे बजाने में संयम बरता जाएगा और बकरीद के अवसर पर गोकुशी में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। यह पैक्ट एक ऐतिहासिक प्रयास था, किंतु कांग्रेस के भीतर कई नेताओं ने इसे मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति माना। हिंदू महासभा के नेताओं ने इसका तीखा विरोध किया। परंतु इस समझौते ने बंगाल में स्वराज पार्टी को मुस्लिम समुदाय का महत्त्वपूर्ण समर्थन अवश्य दिलाया।

1923 ई. के चुनाव: स्वराज पार्टी की प्रारंभिक सफलता

नवंबर 1923 ई. में केंद्रीय विधान सभा और प्रांतीय परिषदों के चुनाव संपन्न हुए। स्वराज पार्टी ने इन चुनावों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। केंद्रीय विधान सभा की कुल 101 निर्वाचित सीटों में से स्वराज पार्टी ने 42 सीटें जीतकर सबसे बड़े एकल दल का दर्जा प्राप्त किया। पार्टी ने 85 आम हिंदू और मुसलमान सीटों में से 47 सीटें जीतीं, जिनमें 21 मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्र भी सम्मिलित थे। प्रांतीय स्तर पर बंगाल में स्वराज पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला और मध्य प्रांत में भी पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। बंगाल में एक विशेष उल्लेखनीय घटना यह हुई कि स्वराज दल के प्रत्याशी डॉ. बी.सी. राय ने दिग्गज उदारवादी नेता सुरेंद्रनाथ बनर्जी को बुरी तरह पराजित किया, जो एक युग-परिवर्तन का प्रतीक था। बंगाल में इस विजय का सबसे बड़ा श्रेय चितरंजन दास के प्रभावशाली नेतृत्व, उनकी व्यापक जनप्रियता और बंगाल पैक्ट के माध्यम से निर्मित हिंदू-मुस्लिम एकता को जाता था।

विधान परिषदों में स्वराजवादियों की रणनीति और उपलब्धियाँ (1924-1925 ई.)

स्वराजवादियों ने विधान परिषदों में ‘अवरोध की राजनीति’ को एक नई ऊँचाई तक पहुँचाया। उनका मुख्य उद्देश्य सरकारी कार्यों में व्यवस्थित बाधा उत्पन्न करना, बजट का विरोध करना, प्रशासन की बुराइयों को उजागर करना, अवांछनीय विधेयकों को पारित नहीं होने देना और पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता तथा डोमिनियन स्टेटस की माँग करना था। 8 फरवरी 1924 ई. को केंद्रीय विधान सभा में स्वराजवादियों ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित करवाया, जिसमें माँग की गई कि गवर्नर जनरल भारत के लिए उत्तरदायी सरकार स्थापित करने की दृष्टि से 1919 ई. के अधिनियम में आवश्यक परिवर्तन करें और निकट भविष्य में भारत के प्रतिनिधियों का एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया जाए, जिसमें अल्पसंख्यक जातियों के हितों का भी ध्यान रखा जाए।

सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में स्वराजवादियों ने एक साझा राजनीतिक मोर्चा बनाया और द्वैध शासन का भंडाफोड़ किया कि यह कोई वास्तविक संवैधानिक सुधार नहीं है। स्वराजियों ने यह सिद्धांत बना लिया था कि जब तक शिकायतों को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक कोई वित्तीय विधेयक पारित नहीं होने दिया जाएगा। इस रणनीति का प्रभाव यह हुआ कि गवर्नर जनरल को बार-बार अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करके वित्तीय प्रस्तावों को प्रमाणित करना पड़ा, जिससे औपनिवेशिक प्रशासन की अलोकतांत्रिक प्रकृति सबके सामने उजागर हो गई। राष्ट्रवादी वक्ता सत्यमूर्ति ने इसी सदन में कहा था कि सरकारी अधिकारी स्वयं अपराधी हैं, क्योंकि वे स्वतंत्रता से प्रेम करने वाली जनता की स्वाधीनता की हत्या कर रहे हैं।

स्वराजवादियों ने 1924 ई. में ‘ली कमीशन’ को भी स्वीकृत नहीं होने दिया, जिसकी स्थापना सरकारी नौकरियों में यूरोपीय जातीय वर्चस्व बनाए रखने के लिए की गई थी। प्रांतीय परिषदों में भी स्वराज पार्टी के सदस्यों ने सरकार के लिए प्रशासन चलाना मुश्किल कर दिया। मध्य प्रांत और बंगाल में गवर्नरों को विधेयक पारित कराने के लिए बार-बार अपनी प्रमाणन शक्ति का प्रयोग करने पर बाध्य होना पड़ा। बंगाल में पूर्ण बहुमत होने के कारण चितरंजन दास को मंत्री पद के लिए आमंत्रित किया गया, किंतु पार्टी की स्पष्ट नीति के कारण उन्होंने यह पद अस्वीकार कर दिया। मार्च 1925 ई. में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में, विट्ठलभाई पटेल केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष चुने गए — यह पहला अवसर था जब एक राष्ट्रवादी नेता ने इस महत्त्वपूर्ण संवैधानिक पद को सुशोभित किया।

गांधीजी की रिहाई और अहमदाबाद अधिवेशन का संघर्ष (1924 ई.)

5 फरवरी 1924 ई. को गांधीजी येरवदा जेल से स्वास्थ्य कारणों से रिहा किए गए। जून 1924 ई. में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन अहमदाबाद में हुआ। इस अधिवेशन में गांधीजी ने तीन महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव रखे। पहला यह कि कांग्रेस की सदस्यता के लिए चरखे पर कताई को न्यूनतम अर्हता बनाई जाए। दूसरा यह कि विधान परिषदों में जाने वाले सदस्यों को कांग्रेस पदों से हटाया जाए। तीसरा यह कि बंगाल में गोपीनाथ साहा द्वारा किए गए एक दुर्भाग्यपूर्ण हत्याकांड की निंदा की जाए। गोपीनाथ साहा एक क्रांतिकारी युवक थे, जिन्होंने 24 जनवरी 1924 ई. को कलकत्ता के पुलिस कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट को मारने के इरादे से गलती से एक निर्दोष व्यक्ति अर्नेस्ट डे की हत्या कर दी थी।

पहले दो प्रस्ताव सभा में अस्वीकृत हो गए। तीसरे प्रस्ताव पर चितरंजन दास और बंगाली प्रतिनिधियों ने तीव्र विरोध किया। उनका तर्क था कि क्रांतिकारी युवकों के त्याग की निंदा न करके उनके आक्रोश के मूल कारणों को समझना आवश्यक है। अंततः यह प्रस्ताव मात्र 8 मतों के अंतर से अर्थात 78 के मुकाबले 70 से ही स्वीकृत हो सका। गांधीजी ने इसे अपनी नैतिक पराजय माना और ‘यंग इंडिया’ के 3 जुलाई 1924 ई. के अंक में स्पष्ट रूप से लिखा कि “मैं पराजित और अपमानित हुआ हूँ।”

गांधी-दास-नेहरू समझौता और एकता का पुनर्स्थापन (1924 ई.)

अहमदाबाद अधिवेशन की घटनाओं के बाद कांग्रेस में दरार और गहरी हो गई थी। इस स्थिति में 25 अक्टूबर 1924 ई. को सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर अनेक स्वराजवादियों, क्रांतिकारियों और कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इस दमन ने गांधीजी को स्वराजवादियों के पक्ष में खड़े होने के लिए विवश किया। उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में लिखा : “यदि मैं जरूरत की इस घड़ी में स्वराजवादियों का साथ नहीं देता, तो यह देश के साथ घोखा होगा।” 6 नवंबर 1924 ई. को गांधीजी ने स्वराजियों और उनके विरोधियों के बीच की खाई पाट दी। चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू और गांधीजी ने एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि कांग्रेस के नेतृत्व में स्वराजी नेता कांग्रेस के एक अभिन्न अंग के रूप में विधानमंडलों में अपना काम करते रहेंगे।

इस समझौते के संदर्भ में प्रसिद्ध कांग्रेसी इतिहासकार पट्टाभि सीतारमैया ने लिखा कि परिषद प्रवेश और बहिष्कार के सवाल पर यह देशबंधु दास और मोतीलालजी के सामने गांधी का आत्मसमर्पण था। वास्तव में यह कोई पराजय नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक और राष्ट्रहित में किया गया समझौता था, जिसने आंदोलन की दोनों धाराओं को एक छत के नीचे बनाए रखा। 1925 ई. में गांधीजी ने कांग्रेस का संपूर्ण संगठनात्मक दायित्व स्वराजियों के हाथ सौंप दिया और अपने रचनात्मक कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए अलग से एक अखिल भारतीय चरखा संघ की स्थापना करने का निश्चय किया।

मुडिमैन समिति और साइमन कमीशन की घोषणा (1925 ई.)

सरकार ने 1919 ई. के सुधारों की जाँच के लिए गृह सदस्य अलेक्जेंडर मुडिमैन की अध्यक्षता में एक 12 सदस्यीय समिति का गठन किया। 1925 ई. में जब मुडिमैन समिति की रिपोर्ट केंद्रीय विधान सभा में प्रस्तुत हुई, तो मोतीलाल नेहरू ने इसकी तीव्र आलोचना करते हुए द्वैध शासन को अयोग्य और असफल सिद्ध किया और इस रिपोर्ट के विरुद्ध एक प्रस्ताव सफलतापूर्वक पारित करवाया। इस संसदीय दबाव के फलस्वरूप और स्वराजवादियों की लगातार चुनौतियों से तंग आकर सरकार ने भारत की भावी संवैधानिक स्थिति के विषय में जाँच करने के लिए एक नई समिति- साइमन कमीशन नियुक्त करने की घोषणा की। यह स्वराजवादियों की एक अप्रत्यक्ष किंतु महत्त्वपूर्ण विजय थी, क्योंकि सरकार समय से पूर्व ही संवैधानिक समीक्षा के लिए बाध्य हो गई थी।

चितरंजन दास की मृत्यु और पार्टी का पतन (1925-1926 ई.)

16 जून 1925 ई. को मात्र 55 वर्ष की आयु में चितरंजन दास का निधन हो गया। उनकी मृत्यु स्वराज पार्टी के लिए एक अपूरणीय क्षति थी। देशबंधु दास न केवल एक प्रभावी नेता थे, बल्कि वे पार्टी के वैचारिक स्तंभ भी थे जिन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता, जन-सामान्य के हितों और संसदीय रणनीति को एक साथ जोड़े रखा था। उनके जाते ही पार्टी के भीतर उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष शुरू हो गया। बंगाल में जे.एम. सेनगुप्त और वीरेंद्र सस्माल के बीच नेतृत्व की होड़ मच गई और 1927 ई. में सेनगुप्त ने सस्माल को पराजित किया।

इसी समय सरकार की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति रंग लाने लगी। स्वराजवादियों को उदारवादियों से, गरमपंथी स्वराजियों को नरमपंथी स्वराजियों से और हिंदुओं को मुसलमानों से पृथक करने के प्रयास तेज हो गए। बंगाल में बहुसंख्यक स्वराजियों ने जमींदारों, जिनमें अधिकांश हिंदू थे, के विरुद्ध काश्तकारों की माँगों का समर्थन नहीं किया, जिससे मुस्लिम काश्तकार नाराज हो गए। सत्ता में भागीदारी और सांप्रदायिकता के मुद्दे पर पार्टी भीतर से टूटने लगी।

1925 ई. में ही पूर्व साथी मदनमोहन मालवीय ने लाला लाजपत राय और एन.सी. केलकर के साथ मिलकर हिंदू हितों की रक्षा के नाम पर एक स्वतंत्र ‘नेशनलिस्ट पार्टी’ की स्थापना की। इसे ‘प्रत्युत्तरवादी पार्टी’ या ‘रिस्पॉन्सिविस्ट पार्टी’ भी कहा गया, क्योंकि ये सरकार के साथ सहयोग के पक्षधर थे। मध्य प्रांत में स्वराज पार्टी के सदस्य एस.बी. ताम्बे ने अक्टूबर 1925 ई. में गवर्नर की कार्यकारिणी परिषद में मंत्री पद स्वीकार कर लिया, जो पार्टी की मूल नीति का प्रत्यक्ष उल्लंघन था। 1926 ई. के चुनावों में स्वराजवादी मद्रास के अतिरिक्त सभी स्थानों पर हिंदू महासभा और प्रत्युत्तरवादियों के संयुक्त मोर्चे के सामने बुरी तरह पराजित हुए। 1927 ई. के मद्रास अधिवेशन में स्वराज पार्टी औपचारिक रूप से कांग्रेस में विलीन हो गई।

अपरिवर्तनवादियों का रचनात्मक कार्य

जब स्वराजवादी विधानमंडलों में साम्राज्यवादी शासन का प्रतिरोध कर रहे थे, तब अपरिवर्तनवादी शांतिपूर्वक रचनात्मक कार्यों में संलग्न थे। उन्होंने पूरे देश में सैकड़ों आश्रम स्थापित किए, जहाँ चरखा और खादी को प्रोत्साहित किया जाता था। इसके साथ-साथ सैकड़ों राष्ट्रीय विद्यालय और महाविद्यालय स्थापित किए गए, जिनमें युवक-युवतियों को उपनिवेश-विरोधी विचारधारा में प्रशिक्षित किया जाता था। अपरिवर्तनवादियों ने अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष, शराब एवं विदेशी कपड़ों के बहिष्कार तथा प्राकृतिक आपदाओं में पीड़ितों की सहायता करने जैसे सामाजिक कार्यक्रम भी चलाए। स्वराजवादियों और अपरिवर्तनवादियों की कार्यशैली भिन्न थी, किंतु उनके बीच कोई बुनियादी वैचारिक विरोध नहीं था। दोनों का लक्ष्य एक ही था : स्वराज की प्राप्ति। नागपुर के कुछ क्षेत्रों में 1923 ई. में हुआ ‘झंडा सत्याग्रह’ भी इसी रचनात्मक प्रतिरोध का हिस्सा था, जो कांग्रेसी झंडे के प्रयोग पर लगाए गए स्थानीय प्रतिबंध के विरोध में किया गया था।

स्वराजवादियों की उपलब्धियों का मूल्यांकन

स्वराज पार्टी का ऐतिहासिक महत्त्व बहुआयामी और गहरा है। इसने यह सिद्ध किया कि औपनिवेशिक संस्थाओं का भी उपयोग राष्ट्रीय आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। स्वराजवादियों ने विधान परिषदों में ब्रिटिश प्रशासन की त्रुटियों और अलोकतांत्रिक स्वभाव को जन-जन तक पहुँचाया। उनके निरंतर दबाव के फलस्वरूप सरकार समय से पूर्व साइमन कमीशन नियुक्त करने पर बाध्य हुई और कुछ वर्षों बाद द्वैध शासन को समाप्त करना पड़ा। 1924 ई. में सरकार ने टाटा के इस्पात उद्योग को संरक्षण प्रदान किया, जो भारतीय उद्योगों के पक्ष में स्वराजवादियों के सतत दबाव का परिणाम था।

अपने संघर्ष के दौरान स्वराजवादी कभी भी औपनिवेशिक सत्ता के प्रलोभन में नहीं आए। यह उनकी नैतिक दृढ़ता का प्रमाण था। किंतु उनकी सीमाएं भी स्पष्ट थीं। वे संसद के भीतर की लड़ाई को बाहर के जन-संघर्ष से जोड़ने में असफल रहे। पार्टी मुख्यतः शहरी मध्यवर्ग और जमींदारों का प्रतिनिधित्व करती थी। चितरंजन दास ने मजदूरों और किसानों के संगठन पर जोर दिया था, किंतु इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी। स्वराजी पार्टी में घुसपैठ करने वाले सांप्रदायिक तत्वों को रोकने में भी पार्टी असफल रही। इन सीमाओं के बावजूद, स्वराज पार्टी ने भारतीय राजनीति में संसदीय प्रतिरोध की एक नई परंपरा स्थापित की और राष्ट्रीय आंदोलन को उस निराशा और निष्क्रियता से उबारा, जो असहयोग आंदोलन की असमय वापसी के बाद छा गई थी। यही इसकी सबसे बड़ी और स्थायी ऐतिहासिक देन है।

स्वराज पार्टी से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. स्वराज पार्टी की स्थापना कब और किसने की थी?

स्वराज पार्टी की स्थापना 1 जनवरी 1923 ई. को चित्तरंजन दास (सी. आर. दास) और मोतीलाल नेहरू ने की थी। इसका उद्देश्य विधान परिषदों में प्रवेश करके औपनिवेशिक शासन की नीतियों का संवैधानिक और राजनीतिक विरोध करना था।

2. स्वराज पार्टी के गठन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद कांग्रेस के भीतर इस बात पर मतभेद उत्पन्न हुआ कि आगे की रणनीति क्या हो। परिवर्तनवादियों ने विधान परिषदों में प्रवेश कर ब्रिटिश शासन को भीतर से बाधित करने की नीति अपनाने का समर्थन किया, जिसके परिणामस्वरूप स्वराज पार्टी का गठन हुआ।

3. स्वराज पार्टी का मुख्य उद्देश्य क्या था?

स्वराज पार्टी का प्रमुख उद्देश्य विधान परिषदों में प्रवेश करके सरकार के कार्यों में बाधा डालना, औपनिवेशिक नीतियों का विरोध करना और स्वशासन की माँग को मजबूत करना था। इसके नेताओं ने बजट, सरकारी प्रस्तावों और दमनकारी नीतियों का विरोध कर ब्रिटिश सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास किया।

4. स्वराज पार्टी को चुनावों में कितनी सफलता मिली?

1923 ई. के चुनावों में स्वराज पार्टी ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। उसने केंद्रीय विधान सभा तथा कई प्रांतीय परिषदों में प्रभावशाली संख्या में सीटें जीतीं। विठ्ठलभाई पटेल 1925 ई. में केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए, जो पार्टी की संसदीय सफलता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण था।

5. स्वराज पार्टी का पतन क्यों हुआ?

स्वराज पार्टी को आंतरिक मतभेदों, ब्रिटिश सरकार की सीमित संवैधानिक व्यवस्था तथा कांग्रेस के साथ रणनीतिक मतभेदों के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सी. आर. दास की 1925 ई. में मृत्यु के बाद पार्टी कमजोर हुई। बाद में साइमन कमीशन के विरोध और कांग्रेस की नई राजनीतिक रणनीति के कारण इसका स्वतंत्र राजनीतिक महत्त्व धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
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