सम्राट गुप्त राजवंश के ऐतिहासिक स्रोत (Historical Sources of Emperor Gupta Dynasty)

गुप्त राजवंश भारतीय इतिहास के पृष्ठों में सर्वांगीण अभ्युत्थान हेतु गौरवान्वित स्थान का भागी रहा है। इस राजवंश के नरेशों ने अपने अदम्य उत्साह, संगठन-प्रतिभा, निशति एवं विदग्ध मति तथा अनवरत चेष्टाओं द्वारा एक ऐसे सुविशाल साम्राज्य का निर्माण किया, जो अपने उत्त्कर्ष-काल में पश्चिम में गुजरात से लेकर पूरब में बंगाल तक प्रसरित था। अव्यवस्था की प्रवत्तियों के उन्मूलन द्वारा गुप्तयुग में एकछत्र सुदृढ़ अभिनव-सत्ता की स्थापना हुई, जिसे उनके अभिलेखों में धरणिबंध, कृत्स्नपृथिवीजय तथा निखिलभुवनविजय आदि मनोरम पदावलियों द्वारा अभिव्यक्त किया गया है। ‘पराक्रमांक’ एवं ‘सर्वराजोच्छेता’ समुद्रगुप्त, ‘विक्रमांक’ चंद्रगुप्त द्वितीय, ‘महेंद्रादित्य’ कुमारगुप्त तथा ‘क्रमादित्य’ स्कंदगुप्त सदृश प्रतिभा-संपन्न ‘आसमुद्राक्षितीश’ गुप्त नरेशों ने अपने दिग्विजय एवं व्यावहारिक जीवन की विशेषताओं द्वारा नूतन आदर्शों को प्रस्तुत किया, जो कालांतर की पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय थे। उन्होंने कुषाणों, शकों का उन्मूलन तथा कुख्यात हूणों का दमन कर भारतभूमि को विदेशी शक्तियों से उन्मुक्त किया जो उनकी असाधारण सैनिक सफलता के प्रमाण हैं।

विदेशी लेखकों द्वारा प्रशंसित, सुखी एवं समृद्ध समाज की स्थापना, बृहत्तर भारत की अवधारणा का क्रियान्वयन, गुणग्राहकता, धर्म-सहिष्णुता, अर्थस्रोतों का विकास आदि उनकी प्रशस्त उपलब्धियाँ चिरस्मरणीय रहेंगी। कला, साहित्य एवं राष्ट्रीय जीवन के अन्य विविध क्षेत्रों में गुप्तकालीन विकासों से प्रभावित होकर अनेक इतिहाकारों ने इस काल की तुलना पेरीक्लीज, आगस्टस एवं तांग युग जैसे ज्वलन्त कालों से की है।

ऐतिहासिक स्रोत

गुप्त राजवंश के इतिहास निर्माण के लिए साहित्यिक तथा पुरातात्त्विक दोनों ही स्रोतों से सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त, विदेशी यात्रियों के विवरणों से भी गुप्तवंशीय राजाओं के संबंध में महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। गुप्तकाल में अनेक धार्मिक और लौकिक ग्रंथ लिखे गये जो तत्कालीन इतिहास-निर्माण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। धार्मिक ग्रंथों में पुराण, काव्य, नाटक, स्मृतियाँ, महाकाव्य महत्त्वपूर्ण हैं। यद्यपि इन ग्रंथों में गुप्त नरेशों की राजनीतिक उपलब्धियों से संबंधित सामग्री अत्यल्प है, फिर भी इस राजवंश के इतिहास-निर्माण में इनकी उपयोगिता निर्विवाद है।

साहित्यिक स्रोत

पुराण: धार्मिक ग्रंथों में पुराण उल्लेखनीय हैं जो भविष्यवाणी की शैली में लिखे गये हैं। इन पुराणों का वंशानुचरित खंड ऐतिहासिक सूचना की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। गुप्तवंशीय इतिहास की संरचना में मत्स्य, वायु तथा विष्णु पुराण निश्चित रूप से अधिक उपयोगी हैं। इन पुराणों के द्वारा गुप्तों के प्रारंभिक इतिहास एवं उनके आदि-राज्य के सीमा-निर्धारण में सहायता मिलती है तथा तत्कालीन समाज एवं संस्कृति के विविध पक्षों पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। ‘कलियुगराजवृतांत’ में कलियुग के वंश का इतिहास है तथा कुछ इतिहासकार इसे गुप्त इतिहास का मूल मानते हैं।

स्मृतियाँ: अधिकांश स्मृतियों ने अपना वर्तमान स्वरूप गुप्तकाल में ही प्राप्त किया है। इन ग्रंथों से इस काल की सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था संबंधी सूचनाएँ मिलती हैं। नारद, पराशर, कात्यायन और बृहस्पति स्मृतियों से गुप्तकाल की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक इतिहास की जानकारी मिलती है।

महाकाव्य: रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों ने अपना वर्तमान स्वरूप इसी काल में प्राप्त किया, जो गुप्तकालीन इतिहास निर्माण के लिए महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ प्रदान करते हैं।

बौद्ध ग्रंथ: एक बौद्ध भिक्षु यति वृषभ के तिल्स्यपन्नति से गुप्तकाल में बौ( धर्म की लोकप्रियता पर प्रकाश पड़ता है। महायान बौद्ध धर्म से संबंधित ‘आर्यमंजुश्रीमूलकल्प’ भी महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है जिसमें 700 ई.पू. से लेकर 750 ई. तक के भारतीय इतिहास के राजवंशों का निरूपण है। इसमें गुप्त शासकों से संबंधित कई छंद यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं, जो कई वंशों के छंदों में घुले-मिले हैं। इसके अतिरिक्त ‘वसुबंधुचरित’ तथा ‘चंद्रगर्भ-परिपृच्छा’ भी ऐतिहासिक दृष्टि से उपयोगी हैं।

जैन ग्रंथ: जैन ग्रंथों में जिनसेनसूरी का’ हरिवंश पुराण’ यद्यपि बाद की रचना है, किंतु इसमें गुप्त शासकों का भी उल्लेख मिलता है। अन्य जैन ग्रंथों में ‘कुवलयमाला’, विमलकृत ‘जैन धर्म का रामायण’ आदि महत्त्वपूर्ण हैं।

लौकिक साहित्य

गुप्तकाल में अनेक लौकिक ग्रंथ भी लिखे गये जिनसे तत्कालीन समाज, शासन-व्यवस्था एवं नगर-जीवन के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

कामंदक का नीतिसार: कामंदक का ‘नीतिसार’ चंद्रगुप्त प्रथम के काल की रचना मानी जाती है। इससे गुप्तकालीन राजनीति और प्रशासन के बारे में सूचना मिलती है। इस ग्रंथ की तुलना कौटिल्य के अर्थशास्त्र से की जाती है।

वात्स्यायन का कामसूत्र: वात्स्यायन के कामसूत्र को भी प्रायः गुप्तकालीन रचना माना जाता है। इस ग्रंथ में तत्कालीन समाज में प्रचलित वेशभूषा, आभूषण, सुगंधित द्रव्य, वाहन, प्रासाद तथा नागरिकशाला, वाटिका, सरोवर, उद्यान, वाद्य एवं संगीत आदि के बारे में रोचक सामग्री मिलती है।

कालीदास की रचनाएँ: अनेक इतिहासकार कालीदास को गुप्तकालीन विभूति मानते हैं। उन्होंने ‘ऋतुसंहार’, ‘कुमारसंभव’, ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’, ‘मालविकाग्निमित्रम्’, ‘विक्रमोर्वशीयम्’ तथा ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ आदि उत्कृष्ट ग्रंथों की रचना की थी।

कालीदास के ग्रंथों में यद्यपि विषय-वस्तु प्रेम, प्रकृति और सौंदर्य है, किंतु गुप्तकालीन प्रशासन, समाज तथा धर्म पर भी उनसे प्रकाश पड़ता है। अनुमान किया जाता है कि उन्होंने ‘कुमारसंभव’ की रचना कुमारगुप्त प्रथम के जन्म के अवसर पर की थी।

‘मेघदूत’ संस्कृत साहित्य का सर्वोत्तम गीतिकाव्य है। इसमें गुप्तकालीन नगर उज्जयिनी के ठाट-बाट, महाकाल के मंदिर एवं उसके वातावरण का सजीव चित्राण है तथा वहाँ के नागरिकों के सामाजिक जीवन के विभिन्न अंगों का मनोरम वर्णन है। कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि ‘विक्रमोर्वशीयम्’ नाटक में संभवतः चंद्रगुप्त द्वितीय की ओर संकेत किया गया है। जहाँ रघुवंश महाकाव्य में प्रजारक्षक सम्राट के प्रशस्त गुणों का वर्णन है, वहीं अभिज्ञानशाकुंतलम् में राजत्व के आदर्श, मृगया, मनोविनोद के साधनों, लोकप्रिय विश्वासों, त्योहारों, वाहनों, आभूषणों तथा चित्रकला की सामग्रियों आदि का विशिष्ट उल्लेख मिलता है। मालविकाग्निमित्रम् में ग्राम-नगर-भेद का उल्लेख मिलता है।

विशाखदत्तकृत देवीचंद्रगुप्तम्: विशाखदत्त की रचना ‘देवीचंद्रगुप्तम्’ (राजनैतिक नाटक) यद्यपि अपने मूलरूप में उपलब्ध नहीं है, किंतु इसके कुछ अंश उद्धरण के रूप में भोज-प्रणीत ‘शृंगारप्रकाश’ तथा गुणचंद्र एवं रामचंद्रकृत नाट्य-दर्पण में मिलते हैं। नाटक के उद्धरणों से पता चलता है कि शक शासक ने रामगुप्त को पराजित किया था और चंद्रगुप्त द्वितीय ने शकराज को मारकर अपने बड़े भाई गुप्त शासक रामगुप्त की भी हत्या कर दी तथा उसकी भार्या ध्रुवदेवी से विवाह कर अपना राज्याभिषेक किया था।

शूद्रककृत मृच्छकटिकम्: गुप्तकालीन इतिहास के पुनर्निर्माण में ‘मृच्छकटिकम्’ भी महत्त्वपूर्ण है। मृच्छकटिक का अर्थ है- माटी की गाड़ी। मृच्छकटिक में ब्राह्मण चारुदत्त और गणिका वसंतसेना के बीच की प्रेम-कहानी है। इसमें गणिकाओं के जीवन और कुट्टनियों के काले-कारनामों का भी वर्णन किया गया है और कहा गया है कि ‘गणिका तो जूते में पड़ी किंकड़ी के समान है, जो एक बार घुस जाने के बाद बड़ी कठिनाई से बाहर निकलती है।’ इस ग्रंथ से तत्कालीन नगर-शासन पद्धति और नगर-न्यायालय के संबंध में विशेष सूचनाएँ मिलती हैं।

इसके अलावा वज्जिका विरचित ‘कौमुदीमहोत्सव’, अमरसिंह की रचना ‘अमरकोष’, ‘चंद्रगोमिन् का ‘व्याकरण’, सोमदेवकृत ‘कथासरित्सागर’, भास की रचना ‘स्वप्नवासवदत्ता’, राजशेखर की ‘काव्यमीमांसा’, ‘सेतुबंध’ (रावण-वध), ‘आयुर्वेद दीपिका’ जैसे ग्रंथ भी गुप्तकालीन इतिहास के निर्माण में उपयोगी हैं।

पुरातात्त्विक स्रोत

अभिलेख एवं प्रशस्तियाँ : गुप्तकालीन अभिलेख बड़ी संख्या में भारत के विभिन्न भागों से पाये गये हैं जो स्तंभ-लेख, शिलाफलक-लेख और ताम्र-लेख के रूप में हैं। इन अभिलेखों से गुप्तवंश के इतिहास-लेखन में पर्याप्त सहायता मिलती है। यदि ये अभिलेख न होते, तो हरिषेण, वीरसेन और वत्सभट्टि जैसे कवियों के संबंध में कोई सूचना ही नहीं मिल पाती।

गुप्तकालीन अभिलेखों की भाषा संस्कृत है और ये अभिलेख राजनीतिक इतिहास की दृष्टि से ही नहीं, अलंकार, छंद और रस की दृष्टि से भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इन अभिलेखों को विभिन्न उद्देश्यों से उत्कीर्ण कराया गया था। अभिलेखों के प्राप्ति-स्थानों से गुप्त शासकों की साम्राज्य-सीमा के निर्धारण में सहायता मिलती है। कुछ अभिलेखों में वंशावली, ऐतिहासिक घटनाएँ और शासकों की उपलब्धियों का काव्यात्मक विवरण मिलता है।

हरिषेण विरचित प्रयाग की प्रशस्ति से समुद्रगुप्त के राज्याभिषेक, उसके दिग्विजय एवं व्यक्तित्व पर सुंदर प्रकाश पड़ता है। यह गद्य-पद्य मिश्रित (चंपू शैली) संस्कृत भाषा का उत्कृष्ट उदाहरण है। चंद्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरि से प्राप्त शैव गुहालेख में उसकी दिग्विजय-यात्रा (कृत्स्नपृथ्वीविजय) वर्णित है। स्कंदगुप्त के भितरी स्तंभलेख में विष्णु की प्रतिमा स्थापित करने का काव्यात्मक विवरण है, जबकि जूनागढ़ अभिलेख में सुप्रसिद्ध सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार का गेय पदावलियों में उल्लेख किया गया है। 510 ई. के भानुगुप्त के एरण लेख में सैनिक गोपराज की मृत्यु और उसकी भार्या के सती होने का उल्लेख मिलता है जो सतीप्रथा का पहला अभिलेखीय प्रमाण है।

कुछ गुप्तकालीन अभिलेख दानपत्र के रूप में भी मिले हैं, जो ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण हैं और अधिकांशतः बंगाल क्षेत्र से पाये गये हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से इन लेखों की उपयोगिता निर्विवाद है। इनमें गुप्तकालीन दान-संबंधी नियमों का वर्णन है जिनसे तत्कालीन सामाजिक-धार्मिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है। गुप्त अभिलेखों में तिथियाँ गुप्त संवत् में उत्कीर्ण हैं और स्कंदगुप्त के जूनागढ़ लेख में पहली बार गुप्त-संवत् का उल्लेख मिला है।

मुद्राएँ : गुप्त सम्राटों की सोने, चाँदी और ताँबे की मुद्राएँ पश्चिम में गुजरात से लेकर पूरब में बंगाल तक के विभिन्न केंद्रों से पाई गई हैं। स्वर्ण सिक्कों को ‘दीनार’, रजत सिक्कों को ‘रूपक’ तथा ताम्र-सिक्कों को ‘माषक’ कहा जाता था। गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों का सबसे बड़ा ढ़ेर राजस्थान के बयाना से मिला है।

मुद्राओं के प्राप्ति-स्थानों से गुप्त शासकों की साम्राज्य-सीमा को निर्धारित करने में सहायता मिलती है। अनेक सिक्कों पर तिथियाँ भी उत्कीर्ण मिलती हैं जिससे शासकों के तिथि-निर्धारण में सहायता मिलती है। इन मुद्राओं से कुछ विशिष्ट घटनाओं की भी सूचना मिलती है, जैसे- एक स्वर्ण मुद्रा के मुख भाग पर चंद्रगुप्त प्रथम तथा रानी कुमारदेवी का चित्र और पृष्ठ भाग पर ‘लिच्छवयः’ शब्द उत्कीर्ण है। इससे पता चलता है कि इस सम्राट के समय में गुप्तों और लिच्छवियों के बीच वैवाहिक-संबंध स्थापित हुआ था और गुप्त-सत्ता के उत्थान में लिच्छवियों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। समुद्रगुप्त की एक मुद्रा पर अश्वमेध घोड़े का चित्र अंकित है, जो इस बात का प्रमाण है कि उसने अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया था। शक-मुद्राओं के आदर्श पर ढ़ाली गई चंद्रगुप्त द्वितीय की रजत-मुद्राएँ उसके शक-विजय का प्रमाण हैं।

गुप्त शासकों की मुद्राओं पर शासकों के चित्र भी अंकित किये गये हैं जिनसे उनके शारीरिक बनावट और व्यक्तित्व का प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त होता है। समुद्रगुप्त की वीणावादन प्रकार की मुद्राएँ उसके संगीत-प्रेमी होने का सबल प्रमाण हैं। कुछ सिक्कों पर गुप्त शासकों को व्याघ्र और सिंह का आखेट करते प्रदर्शित किया गया है, जिससे लगता है कि गुप्त सम्राट मृगया के प्रेमी थे। मुद्राओं की शुद्धता और तौल से तत्कालीन समृद्धि एवं आर्थिक स्थिति का भी ज्ञान होता है। कुषाणकालीन स्वर्ण मुद्राओं की तुलना में उत्तरकालीन गुप्त शासकों की स्वर्ण मुद्राओं में सोने की मात्रा में कमी से परवर्ती काल में व्यापार-वाणिज्य के पतन का संकेत मिलता है।

स्मारक : गुप्तकालीन अनेक स्मारकों, जैसे- मंदिरों, स्तंभों, मूर्तियों तथा गुफाओं के अवशेष विभिन्न स्थानों से प्राप्त हुए हैं जो तत्कालीन धर्म, समाज और कला के अध्ययन के लिए उपयोगी हैं। गुप्तकाल के मंदिरों में भूमरा का शिव मंदिर, तिगवा का विष्णु मंदिर, नचनाकुठारा का पार्वती मंदिर, देवगढ़ का दशावतार मंदिर, भीतरगाँव का ईंटों से बना मंदिर, लड़खान का मंदिर और दर्रा मंदिर महत्त्वपूर्ण हैं, जो उस समय की वास्तुकला, उत्कीर्ण कला तथा धार्मिक विश्वास के परिचायक हैं।

मंदिरों में शिखर-निर्माण की परंपरा गुप्तकाल में ही आरंभ हुई। देवगढ़ का दशावतार मंदिर शिखरयुक्त मंदिर का प्राचीनतम् पुरातात्त्विक उदाहरण है। अभिलेखीय साक्ष्यों से लगता है कि गुप्तकाल में शिखरयुक्त मंदिरों के निर्माण की परंपरा लोकप्रिय होती जा रही थी। कुमारगुप्त द्वितीय के मालव संवत् 529 (472-73 इस्वी) के मंदसौर के लेख से पता चलता है कि मालवा के दशपुर में एक भव्य सूर्य मंदिर था जिसके उत्तुंग और विस्तीर्ण शिखर रात्रि में चंद्रमा की श्वेत किरणों से विशेष शोभा पाते थे जिससे नगर की शोभा द्विगुणित हो जाती थी।1

मौर्यकालीन स्तंभों की भाँति गुप्तकालीन स्तंभ भी प्रायः एक ही विशाल प्रस्तर-खंड को तराश कर बनाये गये हैं, जैसे- स्कंदगुप्तकालीन भितरी का स्तंभ एवं बुधगुप्तकालीन एरण का गरुड़ स्तंभ। मेहरौली का लौह-स्तंभ अपने ढ़ंग का गुप्तयुगीन विकसित तकनीक एवं कला का अद्वितीय उदाहरण है।

मूर्तियाँ : गुप्तकाल की अनेक वैष्णव, शैव, बौद्ध और जैन प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं जो भारतीय तक्षण कला के विकास का परिचायक हैं। इन प्रतिमाओं से पता चलता है कि गुप्तकाल में सभी धर्म अपने स्वाभाविक रूप में विकसित हो रहे थे। कुछ मूर्तियों के पादमूल में लेख भी मिलते हैं जो ऐतिहासिक दृष्टि से अधिक उपयोगी हैं। कुमारगुप्त द्वितीय के काल की सारनाथ की बौद्ध प्रतिमा के अधोभाग में मिले लेख से ज्ञात होता है कि गुप्त संवत् 154 में अभयमित्र नामक भिक्षु ने पुण्यार्जन के निमित्त बुद्ध मूर्ति की स्थापना की थी। बुधगुप्तकालीन सारनाथ प्रतिमा के नीचे उत्कीर्ण लेख से पता चलता है कि अभयमित्र ने ही इस मूर्ति की स्थापना गुप्त संवत् 157 में धर्मार्जन हेतु की थी।

गुप्तकालीन गुहा लेख : गुहा गृहों से भी गुप्तों के इतिहास-निर्माण में सहायता मिलती है। गुप्तकालीन तक्षणकारों ने अत्यंत कुशलता और धैर्य से शिलाखंडों को तराश कर गुफाओं के निर्माण में निपुणता प्राप्त कर लिया था। ब्राह्मण गुफा का उत्कृष्ट उदाहरण उदयगिरि गुफा की दीवार पर उत्कीर्ण लेख है जिसे चंद्रगुप्त द्वितीय के संधि-विग्रहिक सचिव वीरसेन शैव ने शिव के प्रति भक्ति के कारण निर्मित करवाया था’ (भत्या भगवतः शंभोः गुहामेतामकारयत्)। यह ब्राह्मण गुहामंदिर का प्राचीनतम् उदाहरण है। इसमें प्रतिमा-स्थापना के निमित्त एक गर्भगृह है जिसके समक्ष स्तंभयुक्त मण्डप है।

बौद्ध गुफाओं के उदाहरण अजंता और बाघ से मिले हैं। अजंता की गुफा संख्या 16, 17 और 19 गुप्तकाल की मानी जाती हैं, जो कला और स्थापत्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। इन गुफाओं में ब द्ध श्रमण निवास करते थे, इसलिए इनमें गौतम बुद्ध, बोधिसत्त्व की प्रतिमाएँ अधिकता में मिलती हैं। इन चित्रों से गुप्तकालीन चित्रकला के सिद्धांतों और निर्माण-विधि को समझने में सहायता मिलती है।

विदेशी यात्रियों के विवरण

समय-समय पर भारत आने वाले विदेशी यात्रियों के विवरणों से भी गुप्तकालीन राज्य और प्रशासन के संबंध में महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलती हैं ।

फाह्यान: चीनी यात्री फाह्यान चंद्रगुप्त द्वितीय के काल में भारत आया था। उसने पश्चिम में पुष्कलावती से लेकर पूरब में ताम्रलिप्ति तक विभिन्न ऐतिहासिक केंद्रों में रुककर स्थानीय प्रथाओं, धार्मिक विश्वासों और परंपराओं, जलवायु, वनस्पति आदि का वर्णन किया है। मध्य देश की जनता का वर्णन करते हुए उसने लिखा है कि यहाँ की जनता सुखी और समृ द्ध थी, चोर-डाकुओं का कोई भय नहीं था। लोग मदिरा, माँस, लहसुन एवं प्याज का सेवन नहीं करते थे। उसने भारतीयों की दान-परायणता और अतिथि-सत्कार की मुक्त-कंठ से प्रशंसा की है।

ह्वेनसांग: 7वीं. शताब्दी ई. में सम्राट हर्षवर्धन के काल में भारत आने वाले चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण से भी गुप्तों के संबंध में जानकारी मिलती है। उसने बुद्धगुप्त, कुमारगुप्त प्रथम, शक्रादित्य तथा बालादित्य आदि गुप्त शासकों का उल्लेख किया है। उसके विवरण से पता चलता है कि शक्रादित्य कुमारगुप्त ने नालंदा के विश्वविद्यालय की स्थापना की थी और बालादित्य हूणों का विजेता था।

इत्सिंग: सातवीं शताब्दी के अंतिम चरण में इत्सिंग नामक चीनी यात्री भारत आया था। उसने लिखा है कि नालंदा के विश्वविद्यालय के भवन गगनस्पर्शी थे। यह विश्वविद्यालय अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा का केंद्र बन गया था। सांस्कृतिक इतिहास के निर्माण की दृष्टि से इस चीनी यात्री के विवरण भी उपयोगी हैं।

अल्बरूनी: महमूद गजनवी के साथ भारत आने वाला अल्बरूनी गणित, ज्योतिष, खगोलशास्त्र के साथ-साथ अनेक शास्त्रों और भाषाओं का ज्ञाता था। इसका पूरा नाम ‘अबू रेहान मुहम्मद अहमद अल्बरूनी’ था। वह भारतीय छंदशास्त्र और संस्कृत व्याकरण का प्रशंसक था। उसके अनुसार हिंदू अच्छे दार्शनिक, ज्योतिषी और खगोलशास्त्र के मर्मज्ञ एवं महान् गणितज्ञ होते हैं। वह भगवद्गीता से विशेष प्रभावित था।

इस प्रकार साहित्यिक और पुरातात्त्विक दोनों ही स्रोतों से गुप्तकालीन इतिहास के पुनर्निर्माण में सहायता मिलती है। कालीदास और विशाखदत्त की कृतियाँ, शिलाखंडों पर उत्कीर्ण हरिषेण, वीरसेन एवं वत्सभट्टि की अमर पंक्तियाँ तथा तत्कालीन देवालय, गुफाएं गुप्तकाल का मनोरम दिग्दर्शन कराती हैं।