डॉ. बी. आर. आंबेडकर और दलित आंदोलन
आधुनिक भारतीय इतिहास में डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने सामाजिक न्याय, समानता, स्वतंत्रता, मानव-गरिमा और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया और विशेष रूप से दलितों तथा अन्य वंचित समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए उनका योगदान सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक और संवैधानिक- सभी क्षेत्रों में दिखाई देता है। उन्होंने जाति-आधारित भेदभाव और अस्पृश्यता को भारतीय समाज की गंभीर संरचनात्मक समस्याओं के रूप में देखा तथा इनके उन्मूलन के लिए एक सुसंगठित आंदोलन चलाया। डॉ. आंबेडकर केवल दलित नेता ही नहीं थे, बल्कि वे अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता, राजनीतिज्ञ, समाज-सुधारक और चिंतक भी थे। संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही और उन्होंने समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय तथा वंचित समुदायों के अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा पर विशेष बल दिया। उनका प्रसिद्ध आह्वान : ‘शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो’, दलित चेतना और सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन का प्रेरक सूत्र बन गया।
प्रारंभिक जीवन और सामाजिक चेतना
डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 ई. को मध्य प्रदेश की महू छावनी में हुआ था। उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल ब्रिटिश भारतीय सेना में सूबेदार थे और माता का नाम भीमाबाई था। वे अपने माता-पिता की चौदहवीं और अंतिम संतान थे। उनका जन्म महार समुदाय में हुआ था, जो उस समय अस्पृश्य जाति मानी जाती थी। बाल्यकाल से ही आंबेडकर को जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और अपमान का सामना करना पड़ा। विद्यालय में उन्हें अन्य विद्यार्थियों से अलग बैठाया जाता था और सार्वजनिक सुविधाओं के उपयोग में भी भेदभाव झेलना पड़ता था। इन अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व और सामाजिक चिंतन पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला।
आंबेडकर की प्रतिभा और अध्ययनशीलता के कारण उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के अवसर मिले। सतारा में उनके एक शिक्षक महादेव आंबेडकर ने उनके नाम के साथ ‘आंबेडकर’ उपनाम जोड़ा, जिसे उन्होंने आगे चलकर अपना स्थायी नाम बना लिया। 1908 ई. में उनका विवाह रमाबाई से हुआ, जिनका 1935 ई. में निधन हो गया। बाद में 1948 ई. में उन्होंने डॉ. शारदा कबीर से विवाह किया, जिन्हें सविता आंबेडकर के नाम से पहचान मिली।
उच्च शिक्षा और बौद्धिक विकास
सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद आंबेडकर ने उच्च शिक्षा प्राप्त की। बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ की छात्रवृत्ति पर वे 1913 ई. में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए और कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन किया, जहाँ उन्होंने अर्थशास्त्र, राजनीति, समाजशास्त्र, इतिहास और दर्शन सहित अनेक विषयों का गंभीर अध्ययन किया। कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्राप्त शिक्षा ने उनके चिंतन को आधुनिक लोकतांत्रिक, आर्थिक और सामाजिक विचारों से गहराई से प्रभावित किया और उन्होंने सामाजिक असमानता को केवल धार्मिक या नैतिक समस्या के रूप में न देखकर उसे आर्थिक तथा राजनीतिक संरचना से जुड़ी समस्या के रूप में समझना आरंभ किया। इसके पश्चात वे लंदन गए और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में अध्ययन किया। आर्थिक कठिनाइयों के कारण उन्हें कुछ समय के लिए भारत लौटना पड़ा, किंतु बाद में वे पुनः लंदन गए और अपनी शिक्षा पूर्ण की। उन्होंने अर्थशास्त्र में उच्च शोध-उपाधि प्राप्त की तथा ग्रेज़ इन से विधि की शिक्षा लेकर बैरिस्टर की योग्यता भी अर्जित की। इस प्रकार अर्थशास्त्र, विधि, राजनीति और सामाजिक विज्ञान में प्राप्त उनकी शिक्षा ने उनके सामाजिक और राजनीतिक चिंतन की सुदृढ़ आधारभूमि तैयार की।
बड़ौदा का अनुभव और सामाजिक चेतना का विकास
उच्च शिक्षा पूर्ण करने के बाद आंबेडकर भारत लौटे और बड़ौदा राज्य की सेवा में सैन्य सचिव के रूप में नियुक्त हुए। उनकी उच्च शिक्षा और प्रशासनिक पद के बावजूद जातिगत भेदभाव समाप्त नहीं हुआ। कार्यालय में उन्हें सामाजिक अपमान का सामना करना पड़ा और रहने के लिए उपयुक्त स्थान मिलना भी कठिन हो गया। बड़ौदा के इस अनुभव ने उन्हें यह समझने में सहायता की कि केवल शिक्षा, व्यक्तिगत योग्यता अथवा आर्थिक उन्नति से जातिगत भेदभाव समाप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए सामाजिक संरचना में मूलभूत परिवर्तन आवश्यक है। यही अनुभव आगे चलकर उनके जाति-विरोधी आंदोलन और सामाजिक न्याय की विचारधारा का महत्त्वपूर्ण आधार बन गया।

अध्यापन, शोध और सार्वजनिक जीवन का आरंभ
भारत लौटने के बाद आंबेडकर ने अध्यापन और शोधकार्य के साथ अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था, कृषि और मुद्रा संबंधी समस्याओं का गहन अध्ययन किया और नवंबर 1918 ई. में वे बंबई के सिडेनहैम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए। अध्यापन के साथ-साथ वे सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों पर निरंतर लेखन करते रहे। 1920 ई. में वे पुनः लंदन गए और अपनी अधूरी शिक्षा पूर्ण की तथा 1923 ई. में भारत लौटने के बाद उन्होंने वकालत, लेखन, पत्रकारिता और सामाजिक आंदोलन को अपने सार्वजनिक जीवन का आधार बनाया। उनके प्रारंभिक अनुभवों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अस्पृश्यता केवल व्यक्तिगत व्यवहार की समस्या नहीं, बल्कि जाति-व्यवस्था से जुड़ी व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्या है। इसी कारण उन्होंने दलित मुक्ति के लिए शिक्षा, संगठन और राजनीतिक अधिकारों को अनिवार्य माना।
स्वतंत्रता-पूर्व दलित आंदोलन की पृष्ठभूमि
भारत में दलित चेतना का विकास आंबेडकर से पूर्व ही आरंभ हो चुका था। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के संतों, विशेषकर कबीर और रविदास ने जातिगत ऊँच-नीच तथा सामाजिक रूढ़ियों की आलोचना की और मानव-समानता तथा भक्ति पर बल दिया। यद्यपि उनका आंदोलन आधुनिक राजनीतिक दलित आंदोलन से भिन्न प्रकृति का था, फिर भी उन्होंने सामाजिक समानता की चेतना के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उन्नीसवीं शताब्दी में ज्योतिराव फुले ने जातिगत असमानता और सामाजिक वर्चस्व के विरुद्ध संगठित संघर्ष किया और 1873 ई. में सत्यशोधक समाज की स्थापना की। फुले ने शूद्रों और अतिशूद्रों की शिक्षा तथा सामाजिक अधिकारों के लिए कार्य किया, जबकि सावित्रीबाई फुले ने स्त्री-शिक्षा और वंचित समुदायों के शैक्षिक उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी अवधि में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज तथा अन्य सामाजिक सुधार आंदोलनों ने भी अस्पृश्यता और सामाजिक रूढ़ियों के प्रश्न को उठाया और दक्षिण भारत में गैर-ब्राह्मण आंदोलनों ने सामाजिक एवं राजनीतिक प्रतिनिधित्व की माँग को सुदृढ़ किया। इस व्यापक सामाजिक पृष्ठभूमि ने बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में संगठित दलित आंदोलन के विकास के लिए उपयुक्त आधार तैयार किया।
आंबेडकर द्वारा दलित आंदोलन का संगठन
भारत लौटने के बाद आंबेडकर ने वकालत के साथ-साथ अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध सार्वजनिक संघर्ष आरंभ किया। महाराष्ट्र में छत्रपति शाहूजी महाराज के सामाजिक सुधार-प्रयासों से पहले ही वंचित समुदायों में चेतना का विकास हो रहा था और इसी अनुकूल वातावरण में आंबेडकर के नेतृत्व को व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। 1924 ई. में उन्होंने ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य दलित समुदाय में शिक्षा का प्रसार करना, सामाजिक चेतना विकसित करना तथा सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना था। आंबेडकर का दृढ़ मत था कि दलितों की मुक्ति केवल सामाजिक सहानुभूति से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए शिक्षा, संगठन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक अवसर और कानूनी अधिकार- ये सभी तत्त्व अनिवार्य हैं।
आंबेडकर ने पत्रकारिता को भी सामाजिक जागरण का एक प्रभावी माध्यम बनाया। उन्होंने 1920 ई. में प्रारंभ किए गए ‘मूकनायक’ तथा बाद में ‘बहिष्कृत भारत’ जैसे पत्रों के माध्यम से दलितों की समस्याओं, जाति-व्यवस्था, अस्पृश्यता और सामाजिक असमानता को सार्वजनिक विमर्श का केंद्रीय विषय बनाया और इसी माध्यम से उन्होंने दलित समाज में आत्मसम्मान, अधिकार-बोध तथा राजनीतिक चेतना विकसित करने का सतत प्रयास किया।
महाड़ सत्याग्रह और सामाजिक अधिकारों का संघर्ष
डॉ. आंबेडकर के आंदोलन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण चरण महाड़ सत्याग्रह (1927 ई.) था। महाराष्ट्र के महाड़ स्थित चवदार तालाब का पानी सिद्धांततः सार्वजनिक उपयोग के लिए उपलब्ध था, किंतु दलितों को उसका उपयोग करने से सामाजिक रूप से रोका जाता था। आंबेडकर ने सार्वजनिक जलस्रोतों पर दलितों के समान अधिकार के लिए आंदोलन चलाया। यह संघर्ष केवल जल के अधिकार का प्रश्न नहीं था, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों पर समान नागरिक अधिकार स्थापित करने का व्यापक प्रयास था। 25 दिसंबर 1927 ई. को महाड़ में आयोजित सम्मेलन के दौरान मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन किया गया, जो जातिगत असमानता को वैचारिक वैधता प्रदान करने वाली सामाजिक व्यवस्था के प्रतीकात्मक विरोध का प्रमुख उदाहरण था। इसके पश्चात आंबेडकर ने मंदिर-प्रवेश के अधिकार के लिए भी आंदोलन किया और 1930 ई. में नासिक के कालाराम मंदिर सत्याग्रह के माध्यम से धार्मिक स्थलों में दलितों के समान प्रवेश की माँग को प्रमुखता से उठाया। इन समस्त आंदोलनों का व्यापक उद्देश्य सामाजिक समानता, आत्मसम्मान और मानव-गरिमा की स्थापना करना था।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पृथक निर्वाचन की माँग
डॉ. आंबेडकर के राजनीतिक चिंतन में दलितों का स्वतंत्र और प्रभावी प्रतिनिधित्व अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता था। उनका मानना था कि यदि सामाजिक रूप से वंचित समुदाय राजनीतिक सत्ता में प्रभावी रूप से प्रतिनिधित्व नहीं पाएँगे, तो उनके अधिकारों की पर्याप्त रक्षा नहीं हो सकेगी। इसी आधार पर उन्होंने विधानमंडलों में दलितों के प्रतिनिधित्व तथा राजनीतिक सुरक्षा के लिए पृथक निर्वाचन की माँग उठाई। उनका तर्क था कि सामान्य निर्वाचन-व्यवस्था में दलित प्रतिनिधि सामाजिक रूप से प्रभावशाली समूहों पर निर्भर हो सकते हैं और अपने समुदाय के हितों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त नहीं कर पाएँगे।
गोलमेज सम्मेलनों में आंबेडकर ने दलितों के राजनीतिक अधिकारों और सत्ता में भागीदारी के प्रश्न को प्रमुखता से उठाया और विशेष रूप से 1931 ई. के दूसरे गोलमेज सम्मेलन में पृथक निर्वाचन के प्रश्न पर महात्मा गांधी के साथ उनका गंभीर मतभेद हुआ। 1932 ई. में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडॉनल्ड ने सांप्रदायिक निर्णय (कम्यूनल अवॉर्ड) घोषित किया, जिसमें दलितों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई थी। महात्मा गांधी ने इसका विरोध करते हुए पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन आरंभ किया, जिसके परिणामस्वरूप गांधी और आंबेडकर के बीच समझौता हुआ, जिसे पूना समझौता (1932 ई.) कहा जाता है। इसके अंतर्गत पृथक निर्वाचन की व्यवस्था के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन को स्वीकार किया गया, किंतु अनुसूचित जातियों के लिए विधानमंडलों में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा दी गई। पूना समझौते ने भारत में दलित राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न को नया स्वरूप प्रदान किया और आगे चलकर राजनीतिक आरक्षण की व्यवस्था के विकास को गहराई से प्रभावित किया।
आंबेडकर के राजनीतिक संगठन
डॉ. आंबेडकर ने दलितों और अन्य वंचित वर्गों को राजनीतिक रूप से संगठित करने के लिए समय-समय पर विभिन्न संगठनों की स्थापना की। 1936 ई. में उन्होंने ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ (स्वतंत्र मजदूर पार्टी) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य केवल दलितों के अधिकारों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह मजदूरों, किसानों और अन्य वंचित वर्गों के सामाजिक-आर्थिक हितों को राजनीतिक मंच प्रदान करने का प्रयास था। 1937 ई. के प्रांतीय चुनावों में इस पार्टी ने बंबई प्रांत में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की, जिससे आंबेडकर के राजनीतिक प्रभाव का विस्तार हुआ और सामाजिक न्याय के प्रश्न व्यापक राजनीतिक विमर्श में स्थान पाने लगे। इसके बाद 1942 ई. में उन्होंने ‘ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन’ (अखिल भारतीय अनुसूचित जाति महासंघ) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य अनुसूचित जातियों को एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच प्रदान करना तथा उनके राजनीतिक हितों की रक्षा करना था। किंतु स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-उत्तर राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस का जनाधार और संगठनात्मक शक्ति अधिक व्यापक होने के कारण आंबेडकर के इन राजनीतिक संगठनों अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का मूल आधार मानते हुए आंबेडकर ने 1945 ई. में ‘पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी’ की स्थापना की, जिसके माध्यम से उन्होंने वंचित समुदायों के लिए उच्च शिक्षा के अवसरों का विस्तार करने का प्रयास किया।
आंबेडकर और गांधी
महात्मा गांधी और डॉ. आंबेडकर दोनों अस्पृश्यता के प्रबल विरोधी थे, किंतु उनके दृष्टिकोण और राजनीतिक रणनीतियों में महत्त्वपूर्ण अंतर था। गांधी अस्पृश्यता को हिंदू समाज की एक गंभीर बुराई मानते थे और हिंदू समाज के भीतर सुधार के माध्यम से इसे समाप्त करना चाहते थे। उन्होंने अस्पृश्यता-निवारण को राष्ट्रीय आंदोलन के सामाजिक कार्यक्रम से जोड़ा तथा हरिजन सेवक संघ और ‘हरिजन’ पत्र के माध्यम से इस दिशा में निरंतर कार्य किया। इसके विपरीत, आंबेडकर का दृष्टिकोण अधिक संरचनात्मक और अधिकार-आधारित था। वे केवल नैतिक सुधार अथवा सामाजिक सद्भाव को पर्याप्त नहीं मानते थे क्योंकि उनका मत था कि दलितों को राजनीतिक शक्ति, कानूनी सुरक्षा, शिक्षा और आर्थिक अवसर अनिवार्य रूप से प्राप्त होने चाहिए। पृथक निर्वाचन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक संरक्षण के प्रश्न पर दोनों के बीच तीखा मतभेद रहा, फिर भी दोनों के संघर्षों का एक महत्त्वपूर्ण साझा पक्ष अस्पृश्यता का विरोध और सामाजिक सुधार था।
इसी प्रकार डॉ. आंबेडकर और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच भी दलितों के राजनीतिक अधिकारों तथा स्वतंत्र भारत में उनकी स्थिति को लेकर गंभीर मतभेद थे। कांग्रेस का प्रमुख लक्ष्य औपनिवेशिक शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना था, जबकि आंबेडकर राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक समानता तथा दलितों की राजनीतिक सुरक्षा को भी अनिवार्य मानते थे। आंबेडकर को यह आशंका थी कि यदि राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भी सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ बनी रहीं, तो दलित समुदाय वास्तविक स्वतंत्रता से वंचित रह सकता है और इसी कारण उन्होंने संवैधानिक तथा राजनीतिक संरक्षण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। इन मतभेदों के बावजूद उनकी विधिक विशेषज्ञता, प्रशासनिक क्षमता और संवैधानिक दृष्टि के कारण स्वतंत्र भारत में उन्हें महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय जिम्मेदारी सौंपी गई।

संविधान-निर्माण में डॉ. आंबेडकर की भूमिका
स्वतंत्र भारत की सरकार में डॉ. आंबेडकर प्रथम विधि मंत्री (कानून मंत्री) बने और संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संविधान के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वास्तव में, भारतीय संविधान किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं था क्योंकि संविधान सभा के अनेक सदस्यों, समितियों, विधि-विशेषज्ञों और अधिकारियों ने इसके निर्माण में योगदान दिया। इसलिए आंबेडकर को संविधान का एकमात्र निर्माता कहना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं है। फिर भी, प्रारूप समिति के अध्यक्ष और प्रमुख संवैधानिक विचारक के रूप में उनकी भूमिका निर्णायक थी। भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता, न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों को मूल संवैधानिक मूल्यों के रूप में प्रतिष्ठापित किया।
समानता और भेदभाव के निषेध से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों में अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता तथा कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग अथवा जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है, जबकि अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता सुनिश्चित करता है और अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन करते हुए उसके किसी भी रूप में व्यवहार को निषिद्ध करता है। इनके अतिरिक्त संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक हितों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए। ऐतिहासिक दृष्टि से उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद 15(4) मूल संविधान का अंग नहीं था, बल्कि इसे 1951 ई. के प्रथम संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया। इसी प्रकार अनुच्छेद 16(4बी) भी बाद के संवैधानिक संशोधन से जोड़ा गया। अतः इन प्रावधानों को आंबेडकर द्वारा शामिल किए गए प्रावधानों के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं है।
सामाजिक-आर्थिक न्याय और महिलाओं के अधिकार
आंबेडकर केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को राजनीतिक लोकतंत्र की सफलता के लिए अनिवार्य मानते थे। उनका विचार था कि यदि समाज में अत्यधिक सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रहती है, तो राजनीतिक समानता भी कमजोर पड़ सकती है। उन्होंने श्रमिकों, महिलाओं और वंचित समुदायों के अधिकारों की सशक्त वकालत की और श्रम-नीति, कार्य-घंटे, श्रमिक-कल्याण, मातृत्व लाभ तथा सामाजिक सुरक्षा जैसे विषयों पर महत्त्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। उनकी दृष्टि में लोकतंत्र केवल शासन की एक राजनीतिक प्रणाली नहीं, बल्कि एक जीवन-पद्धति भी था, इसलिए वे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था की आधारभूत शर्त मानते थे।
महिलाओं की सामाजिक और कानूनी स्थिति में सुधार के लिए भी आंबेडकर ने महत्त्वपूर्ण प्रयास किए। हिंदू कोड बिल के माध्यम से वे हिंदू महिलाओं को संपत्ति, विवाह और उत्तराधिकार से संबंधित अधिक समान अधिकार दिलाना चाहते थे, किंतु विधेयक को अपेक्षित राजनीतिक समर्थन न मिलने से वे निराश हो गए और अंततः 1951 ई. में केंद्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिए। महिलाओं की समानता के संबंध में उनका दृष्टिकोण उनके व्यापक सामाजिक न्याय के विचार का ही अभिन्न अंग था और वे मानते थे कि किसी समाज की वास्तविक प्रगति का मूल्यांकन उसकी महिलाओं की स्थिति से भी किया जाना चाहिए।
आंबेडकर आर्थिक समानता के प्रबल समर्थक थे, किंतु उनका दृष्टिकोण मार्क्सवादी साम्यवाद से भिन्न था, क्योंकि वे भारतीय समाज की विशिष्ट समस्या के रूप में जाति को विशेष महत्त्व देते थे। उनके अनुसार भारतीय समाज में केवल आर्थिक वर्ग-संघर्ष के आधार पर सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं था, क्योंकि जाति सामाजिक संबंधों, श्रम-विभाजन और सामाजिक प्रतिष्ठा को गहराई से प्रभावित करती थी। वे लोकतांत्रिक साधनों के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक न्याय स्थापित करने के पक्षधर थे और उनके लिए राजनीतिक लोकतंत्र तभी सार्थक हो सकता था, जब उसके साथ सामाजिक लोकतंत्र भी विद्यमान हो।
धर्मांतरण और बौद्ध आंदोलन
आंबेडकर ने दीर्घकाल तक जाति-व्यवस्था और अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष किया, किंतु धीरे-धीरे उनका यह विश्वास क्षीण होता गया कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था के भीतर रहकर जाति-व्यवस्था का पूर्ण उन्मूलन संभव है। 1935 ई. में उन्होंने येवला सम्मेलन में घोषणा की कि यद्यपि उनका जन्म हिंदू समाज में हुआ है, किंतु वे हिंदू के रूप में मृत्यु स्वीकार नहीं करेंगे। इसके पश्चात उन्होंने विभिन्न धर्मों का गहन अध्ययन किया और अंततः बौद्ध धर्म को अपनाने का निर्णय लिया। 14 अक्टूबर 1956 ई. को नागपुर में डॉ. आंबेडकर ने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया, जो ‘धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस’ के नाम से जाना जाता है। इस घटना ने भारतीय दलित आंदोलन तथा बौद्ध नवजागरण को एक नई वैचारिक और सांस्कृतिक दिशा प्रदान की। आंबेडकर ने बौद्ध धर्म की व्याख्या सामाजिक समानता, नैतिकता, तर्कशीलता और मानवतावाद के संदर्भ में की और उनकी पुस्तक ‘बुद्ध और उनका धम्म’ उनके बौद्ध चिंतन की महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। 6 दिसंबर 1956 ई. को डॉ. आंबेडकर का दिल्ली में निधन हो गया, और उनके सामाजिक, राजनीतिक, विधिक तथा बौद्धिक योगदान के सम्मान में भारत सरकार ने 1990 ई. में उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया, जो भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
समकालीन अन्य दलित और सामाजिक न्याय आंदोलन
डॉ. आंबेडकर के समानांतर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक दलित और सामाजिक सुधार आंदोलनों का विकास हुआ। बिहार में जगजीवन राम ने दलित समुदाय के सामाजिक और राजनीतिक संगठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा ‘ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज लीग’ के माध्यम से दलित हितों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। इसी प्रकार बिहार में कुशवाहा, यादव और कुर्मी समुदायों से जुड़े नेताओं ने 1933 ई. में ‘त्रिवेणी संघ’ का गठन किया, जिसका उद्देश्य सामाजिक प्रतिनिधित्व, राजनीतिक भागीदारी तथा सामाजिक वर्चस्व की मौजूदा संरचनाओं को चुनौती देना था।
इनके समानांतर दक्षिण भारत में ई. वी. रामासामी ‘पेरियार’ गैर-ब्राह्मण आंदोलन के प्रमुख नेताओं में थे। वे प्रारंभ में कांग्रेस से जुड़े थे, किंतु जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के प्रश्न पर मतभेद होने के बाद उन्होंने 1925 ई. में आत्मसम्मान आंदोलन प्रारंभ किया। तमिलनाडु में गैर-ब्राह्मण राजनीतिक चेतना के विकास में जस्टिस पार्टी की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। पेरियार ने सामाजिक समानता, तर्कवाद, आत्मसम्मान और जाति-विरोधी विचारों को अपने आंदोलन का आधार बनाया तथा आगे चलकर द्रविड़ आंदोलन को संगठित स्वरूप देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आंबेडकर के सामाजिक चिंतन पर ज्योतिराव फुले के विचारों का गहरा प्रभाव था। दोनों ने जातिगत असमानता, सामाजिक रूढ़ियों और सामाजिक वर्चस्व की आलोचना की तथा शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का महत्त्वपूर्ण साधन माना। दोनों ने वंचित और शोषित समुदायों को संगठित करने तथा सामाजिक संरचना में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता पर भी बल दिया। फिर भी उनकी रणनीतियों में स्पष्ट अंतर था- फुले ने स्त्रियों, शूद्रों और अतिशूद्रों के व्यापक सामाजिक गठबंधन को सामाजिक परिवर्तन का आधार बनाया, जबकि आंबेडकर ने दलित समुदाय की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान, प्रतिनिधित्व और संगठित शक्ति पर अधिक बल दिया। इस प्रकार फुले और आंबेडकर दोनों का उद्देश्य सामाजिक समानता और जातिगत भेदभाव का अंत था, किंतु उनके राजनीतिक अनुभव, ऐतिहासिक परिस्थितियाँ और आंदोलन की रणनीतियाँ परस्पर भिन्न थीं।
स्वतंत्रता के बाद दलित आंदोलन
स्वतंत्रता के बाद दलित आंदोलन ने अनेक नए रूप ग्रहण किए और आंबेडकर के विचारों ने बाद की दलित राजनीति, साहित्य और सामाजिक आंदोलनों को व्यापक रूप से प्रभावित किया। 1972 ई. में महाराष्ट्र में ‘दलित पैंथर्स’ का गठन हुआ, जिसके प्रमुख संस्थापकों में नामदेव ढसाल और जे. वी. पवार सम्मिलित थे। यह आंदोलन अमेरिकी ब्लैक पैंथर आंदोलन से प्रेरित था, किंतु इसने भारतीय सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप अपनी स्वतंत्र वैचारिक पहचान विकसित की और दलित पैंथर्स ने जातिगत हिंसा, सामाजिक भेदभाव तथा आर्थिक शोषण के विरुद्ध राजनीतिक एवं सांस्कृतिक प्रतिरोध प्रस्तुत किया। बाद में कांशीराम ने आंबेडकरवादी राजनीति को व्यापक सामाजिक गठबंधन तथा राजनीतिक संगठन के माध्यम से आगे बढ़ाया और 1984 ई. में ‘बहुजन समाज पार्टी’ की स्थापना की, जिसके माध्यम से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा अन्य वंचित समूहों को राजनीतिक रूप से संगठित करने का प्रयास किया गया।
दलित आंदोलन में आंबेडकर की विरासत
डॉ. आंबेडकर का दलित आंदोलन केवल अस्पृश्यता के विरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सामाजिक समानता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा, आर्थिक न्याय, आत्मसम्मान और संवैधानिक अधिकारों के व्यापक संघर्ष से जुड़ा था। उन्होंने दलितों को शिक्षा प्राप्त करने, संगठित होने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का निरंतर आह्वान किया। बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना, पत्रकारिता, महाड़ सत्याग्रह, मंदिर-प्रवेश आंदोलन, पृथक निर्वाचन की माँग, पूना समझौते में भूमिका, स्वतंत्र राजनीतिक संगठनों का निर्माण तथा संविधान-निर्माण में योगदान उनके संघर्ष के प्रमुख पड़ाव थे। उनकी दृष्टि में वास्तविक लोकतंत्र केवल मतदान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं था, बल्कि लोकतंत्र का वास्तविक आधार सामाजिक और आर्थिक समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा बंधुत्व था, इसलिए उन्होंने राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक लोकतंत्र को भी अनिवार्य माना। डॉ. आंबेडकर ने जाति-व्यवस्था और अस्पृश्यता को केवल सामाजिक बुराई के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें सत्ता, संसाधनों, अवसरों और सामाजिक प्रतिष्ठा के असमान वितरण से जुड़ी गहरी संरचनात्मक समस्याओं के रूप में समझा। उनकी विचारधारा ने दलित समाज में आत्मसम्मान, राजनीतिक चेतना और अधिकार-बोध को स्थायी रूप से सुदृढ़ किया।
इस प्रकार डॉ. बी. आर. आंबेडकर का दलित आंदोलन आधुनिक भारतीय सामाजिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तनकारी प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने दलित प्रश्न को सामाजिक सुधार के सीमित दायरे से निकालकर अधिकार, प्रतिनिधित्व, सत्ता में भागीदारी और संवैधानिक संरक्षण के व्यापक प्रश्न से जोड़ा। उनका संघर्ष शिक्षा से आरंभ होकर सामाजिक संगठन, सत्याग्रह, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकार और सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र तक विस्तृत हुआ और उन्होंने सामाजिक न्याय को लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त मानते हुए स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व को न्यायपूर्ण समाज के आधार के रूप में प्रस्तुत किया। फुले, पेरियार, गांधी और अन्य सामाजिक सुधारकों के आंदोलनों के साथ आंबेडकर का संघर्ष आधुनिक भारत में जाति-विरोधी चेतना के विकास की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। यद्यपि भारतीय संविधान ने अस्पृश्यता को विधिक रूप से समाप्त कर दिया है, फिर भी, सामाजिक समानता की वास्तविक स्थापना एक सतत प्रक्रिया बनी रही। इसी कारण डॉ. आंबेडकर की विरासत आज भी सामाजिक न्याय, समान नागरिकता, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक समानता संबंधी बहसों में अत्यंत प्रासंगिक है।


