भारत पर विदेशी आक्रमण : ईरानी और यूनानी (Foreign Invasion of India: Iranian and Greek

जिस समय मगध के नेतृत्व में पूर्वी भारत में एकीकरण की प्रक्रिया चल रही थी, लगभग उसी समय पश्चिमोत्तर भारत में विकेंद्रीकरण और राजनीतिक अराजकता का बोलबाला था। संपूर्ण पश्चिमोत्तर क्षेत्र अनेक छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था और ये राज्य अपनी स्वतंत्रता बनाये रखने के लिए आतुर थे। सभी राज्यों में परस्पर संघर्ष चलता रहता था। इस क्षेत्र में कोई ऐसी राजनीतिक शक्ति नहीं थी जो अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार करके इन संघर्षरत राज्यों को एकछत्र शासन के अंतर्गत संगठित करती। आर्थिक रूप से समृद्ध इस क्षेत्र की इसी राजनीतिक दुर्बलता और अराजकता ने विदेशी आक्रमणकारियों को अपनी ओर आकर्षित किया जिससे भारत को दो विदेशी आक्रमणों का शिकार होना पड़ा। इनमें से पहला ईरानी (हखामनी) आक्रमण था और दूसरा आक्रमण मकदूनिया के सिकंदर महान् ने किया।

ईरानी (हखामनी) आक्रमण

ईरानी आक्रमण के संबंध में हेरोडोटस, टेसियस, स्ट्रैबो तथा एरियन ने लिखा है। हखामनी राजाओं के शिलालेख भी इस संबंध में बहुत-कुछ सूचना देते हैं। छठी शताब्दी के मध्य में साइरस द्वितीय (ई.पू. 559-529) नामक एक महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति ने ईरान की सत्ता पर अधिकार कर हखामनी साम्राज्य की स्थापना की। उसने शीघ्र ही पश्चिम तथा पूरब में अपने साम्राज्य का विस्तार किया और उसकी पूर्वी सीमा भारत में कपिशा तक पहुँच गई।

साइरस द्वितीय (कुरुष)

इस समय पश्चिमोत्तर भारत की राजनीतिक परिस्थितियाँ साइरस द्वितीय की साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए उपयुक्त अवसर प्रदान कर रही थी। एरियन और स्ट्रैबो के आधार पर सिकंदर के थलसेनाध्यक्ष नियार्कस के वर्णन से ज्ञात होता है कि साइरस ने पश्चिमोत्तर भारत की राजनीतिक विश्रृंखलता का लाभ उठाते हुए ई.पू. 550 के लगभग जेड्रोसिया के रेगिस्तान से होकर भारत पर आक्रमण किया, किंतु उसे विनाशकारी असफलताओं का सामना करना पड़ा। मार्ग में उसकी सेना नष्ट हो गई और उसे जान बचा कर सात सैनिकों के साथ भागना पड़ा। मेगस्थनीज के विवरण से भी पता चलता है कि काबुल घाटी के मार्ग से हिरेक्लीज, डायोनिसस तथा सिकंदर को छोड़कर, किसी अन्य विदेशी शक्ति द्वारा न तो भारतीय कभी जीते गये और न ही उन्होंने अपने को किसी युद्ध में फंसाया। यद्यपि पारसीकों ने हिड़क (क्षुद्रक) सैनिकों को भाड़े पर लड़ने के लिए बुलाया था, फिर भी पारसीकों ने भारत पर कभी आक्रमण नही किया।

किंतु नियार्कस और मेगस्थनीज के इस विवरण को सत्य नहीं माना जा सकता है। इसके विपरीत, रोमन लेखक प्लिनी बताता है कि साइरस ने कपिशा नगर को ध्वस्त किया। इससे लगता है कि साइरस अपनी प्रारंभिक असफलता से निराश नहीं हुआ और उसने दूसरी बार काबुल घाटी की ओर से भारत पर आक्रमण किया जिसमें उसे कुछ सफलता भी मिली। एरियन बताता है कि ‘सिंधु तथा काबुल नदियों के बीच स्थित भारतीय प्राचीन समय में असीरियनों तथा मीडियनों और बाद में पारसीकों के अधीन थे। उन्होंने पारसीक नरेश साइरस को कर (टैक्स) दिया था।’ इन प्रदेशों की अष्टक व अश्वक जातियाँ पारसीक नरेश के अधीन थीं। जेनोफोन ने भी साइरस के जीवनी-ग्रंथ (साइरोपीडिया) में लिखा है कि उसने बैक्ट्रियनों और भारतीयों को जीतकर अपना प्रभाव एरीथ्रियन सी (हिंद महासागर) तक विस्तृत कर लिया। इससे स्पष्ट है कि काबुल घाटी पर साइरस का अधिकार था। एडवर्ड मेयर का यह कथन सही है, ‘साइरस ने हिंदकुश तथा काबुल घाटी, विशेष रूप से गांधार की भारतीय जनजातियों को जीता था। दारा स्वयं सिंधु नदी तक आया था।’

साइरस की मृत्यु के बाद उसका पुत्र केम्बिसीज या कंबुजीय (ई.पू. 529-522) हखामनी साम्राज्य का उत्तराधिकारी हुआ। वह अपने साम्राज्य की आंतरिक समस्याओं में ही उलझा रहा जिसके कारण उसको भारत-विजय का अवसर नहीं मिल सका।

डेरियस प्रथम (दारा प्रथम)

दारा प्रथम या डेरियस प्रथम (ई.पू. 521-485) के समय से भारत पर पारसीक आधिपत्य के विषय में अपेक्षाकृत अधिक सूचनाएँ मिलती हैं। उसके शासनकाल के तीन अभिलेखों- बेहिस्तून, पर्सीपोलस और नक्श-ए-रुस्तम से भारत-पारसीक संबंध के विषय में महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। बेहिस्तून अभिलेख (ई.पू. 520-518) में दारा के शासनांतर्गत 23 प्रांतों की चर्चा है, जिसमें ‘शतग’ और ‘गदर’ के नाम तो मिलते हैं, किंतु भारत का नाम नहीं है।

पर्सीपोलस (ई.पू. 518-515) तथा नक्श-ए-रुस्तम द्धई.पू. 515) के लेखों में ‘शतगु’ और ‘गदर’ के साथ ‘हिदु’ शब्द का उल्लेख उसके साम्राज्य के प्रांत के रूप में हुआ है। इससे स्पष्ट है कि शतगु, गदर और हिद दारा के साम्राज्य में शामिल थे। ये तीनों प्रदेश दारा के साम्राज्य के पूर्वी सीमा पर सिंधु घाटी में स्थित थे।

‘शतगु’ का तात्पर्य सप्तसैंधव प्रदेश से है, और ‘गदर’ का गांधार से, जो निचली काबुल घाटी में स्थित था। ‘हिद’ का आशय निचली सिंधु घाटी से है। इससे लगता है कि दारा ने ई.पू. 518 के आसपास पश्चिमोत्तर भारत के इन प्रदेशों को जीत लिया था।

यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस के विवरण से ज्ञात होता है कि भारत दारा के साम्राज्य का 20वाँ प्रांत था। इस समृद्ध प्रदेश से दारा को उसके संपूर्ण राजस्व का तीसरा भाग (360 टैलेंट सोना) कर के रूप में प्राप्त होता था। हेरोडोटस के वर्णन से ही पता चलता है कि दारा ने ई.पू. 517 में अपने नौसेनाध्यक्ष स्काईलैक्स के नेतृत्व में एक जहाजी बेड़ा सिंधु नदी के मार्ग का पता लगाने के लिए भेजा था। संभव है कि इसी बेड़े की सहायता से दारा ने भारतीय क्षेत्रों पर अधिकार किया हो। हेरोडोटस के विवरण से भी स्पष्ट है कि दारा प्रथम के अधिकार में सिंधु घाटी का प्रदेश सम्मिलित था जिसमें संभवतः पंजाब का एक बड़ा क्षेत्र भी शामिल था। दारा कोयह अभियान राजनैतिक और आर्थिक उद्देश्यों से प्र्रेरित रहा होगा।

इस प्रकार दारा की विजयों ने समस्त सिंधु घाटी को एकता के सूत्रा में आबद्ध कर भारत का संपर्क पाश्चात्य जगत् से जोड़ दिया। उसके उत्तराधिकारियों ने अपने साम्राज्य की पूर्वी सीमा को इससे आगे बढ़ाने का प्रयास नहीं किया और वे दारा द्वारा जीते गये प्रदेशों को ही सुरक्षित करने में लगे रहे।

जरक्सीज (क्षयार्ष)

दारा प्रथम की मृत्यु के बाद इसका पुत्र जरक्सीज या क्षयार्ष (ई.पू. 485-465 ई.पू.) पारसीक-साम्राज्य का शासक हुआ। पर्सीपोलस से प्राप्त एक लेख में भारत के तीनों प्रदेशों- गांधार, शतगु और सिंधु का स्पष्ट उल्लेख है। इससे लगता है कि जरक्सीज ने अपने पिता के भारतीय साम्राज्य को सुरक्षित रखा। पर्सीपोलस लेख से यह भी ज्ञात होता है कि अहुरमज्दा की इच्छा से उसने देवताओं के मंदिरों को गिरवाया तथा उनकी पूजा को बंद किये जाने का आदेश दिया था। इतिहासकारों का अनुमान है कि उसने यूनान के विरुद्ध थर्मोपॅली के युद्ध में सिंधु एवं गांधार प्रदेश के भारतीय सैनिकों से सहायता प्राप्त की थी। हेरोडोटस ने भारतीय सैनिकों की वेशभूषा का वर्णन करते हुए लिखा है कि, ‘भारतीय सैनिकों के वस्त्रा सूती थे। उनके कन्धों पर धनुष और तीर-कमान लटक रहे थे।’ किंतु यह जरक्सीज का दुर्भाग्य रहा कि वह अपने ही अंगरक्षकों द्वारा ई.पू. 465 में मार डाला गया।

जरक्सीज की मृत्यु के बाद उसके पुत्र अर्तजरक्सीज प्रथम (ई.पू. 465-425) एवं अर्तजरक्सीज द्वितीय (ई.पू. 405-359) जैसे उत्तराधिकारी हुए। पर्सीपोलस के दक्षिणी मकबरे के ऊपर कुछ लेख मिलते हैं। कलात्मक आधार पर यह मकबरा इनके काल का माना जा सकता है। यहाँ सम्राट के सिंहासन के ऊपर करदाताओं के रूप में सत्तगिडाई, गांधार तथा सिंधु प्रदेश का चित्रण है। अर्तजरक्सीज के राजवैद्य टीसियस ने लिखा है कि उसने भारतीय राजाओं द्वारा सम्राट को भेजे गये उपहारों को स्वयं देखा था। इससे स्पष्ट है कि इस समय भी उक्त तीनों प्रदेश पारसीक साम्राज्य में शामिल रहे।

पारसीक साम्राज्य का अंतिम अंतिम शासक दारा तृतीय (ई.पू. 360-330) था। एरियन के विवरण से पता चलता है कि गागामेला के युद्ध (ई.पू. 331) में सिकंदर के विरुद्ध सिंधु के पूर्वी तथा पश्चिमी भाग के सैनिकों ने दारा तृतीय की सहायता की थी। इससे लगता है कि इस समय तक इन प्रदेशों पर पारसीकों का प्रभुत्व बना रहा। सिकंदर द्वारा पारसीक साम्राज्य पर अधिकार कर लेने और दारा की हत्या के बाद ही भारतीय क्षेत्र पारसीक प्रभाव से मुक्त हुए होंगे।

ईरानी आक्रमण का भारत पर प्रभाव

यद्यपि भारत के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र के कुछ ही प्रदेश हखामनी साम्राज्य के अधीन हुए थे, किंतु इसमें संदेह नहीं कि इसने भारतीय इतिहास को विविध रूपों में प्रभावित किया। पश्चिमोत्तर भारत के बिखरे प्रदेशों को पहली बार पारसीकों ने ही व्यवस्थित किया, जिससे बाद के भारतीय शासकों को पश्चिमोत्तर भारत को संगठित करने में सहायता मिली।

विशाल पारसीक साम्राज्य की स्थापना से भारत का पश्चिमी संसार से संपर्क अधिक दृढ़ हुआ और भारत तथा पश्चिमी जगत् के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मार्ग प्रशस्त हुआ। भारतीय विद्वान् और दार्शनिक पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से परिचित हुए।

हखामनी साम्राज्य से संबंध होने से भारत के विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन मिला। स्काईलैक्स ने भारत से पश्चिमी देशों तक एक समुद्र मार्ग खोज निकाला जिससे भारतीय व्यापारी पश्चिमी देशों में आने-जाने लगे और उनका सामान सुदूर मिस्र और यूनान तक पहुँचने लगा। पश्चिमोत्तर सीमा-प्रांत से प्राप्त होनेवाले ईरानी सिक्कों से भारत-ईरान के घनिष्ठ व्यापारिक संबंधों की पुष्टि होती है। ईरान की सामान्य मुद्रा डारिक और रजत मुद्रा सिग्लोई या शेकेल भारत के पश्चिमोत्तर भागों से पाई गई है।

पारसीक लोगों से संपर्क का एक अन्य महत्त्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि पश्चिमी भारत में दाईं से बाईं ओर लिखी जाने वाली खरोष्ठी नामक एक नई लिपि का प्रचार हुआ जो ईरानी आरमेइक से उत्पन्न हुई थी। मौर्य सम्राट अशोक के मानसेहरा और शहबाजगढ़ी अभिलेखों में खरोष्ठी लिपि ही प्रयुक्त है। पारसीक भाषा के प्रभाव के कारण ‘दिपि’ (राजाज्ञा) तथा ‘निपिष्ट’ (लिखित) शब्द इस प्रदेश में प्रयुक्त होने लगे।

मौर्य शासन के विभिन्न तत्त्वों के विकास में पारसीक प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। मौर्य सम्राटों ने पारसीक नरेशों के दरबारी शान-ओ-शौकत तथा कुछ परंपराओं का अनुकरण किया। पाटलिपुत्र की खुदाई में प्राप्त विशाल स्तंभोंवाले चंद्रगुप्त मौर्य के राजप्रासाद में अनेकानेक पारसीक तत्त्वों को स्पष्ट देखा जा सकता है। इसमें स्तंभ-मंडप बनाने की प्रेरणा दारा प्रथम के शत-स्तंभ से ग्रहण की गई प्रतीत होती है। संभव है, अशोक ने शिलाओं पर शासनादेश खुदवाने की शैली दारा प्रथम के लेखों से ही ग्रहण की हो। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मौर्ययुगीन स्तंभों पर घंटाशीर्ष की कल्पना तथा इसकी चमकदार पालिश भी फारसी स्तंभों से ही ग्रहण की गई है।

पारसीक शासक अपने साम्राज्य को प्रशासन-व्यवस्था के लिए प्रांतों (क्षत्रपों) में विभाजित करते थे। मौर्यकाल में भी साम्राज्य को प्रांतों में विभाजित करने की प्रथा चलती रही। ईरानी प्रभाव के कारण ही कालांतर में उत्तर-पश्चिमी भारत में क्षत्राप शासन-प्रणाली का विकास हुआ। इस प्रकार ईरानी आक्रमण ने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही भारत को प्रभावित किया।

यूनानी आक्रमण और सिकंदर महान्

इतिहास में सिकंदर को सबसे कुशल और यशस्वी सेनापति बताया गया है। सिकंदर (अलक्ष्येंद्र) का जन्म ई.पू. 20 जुलाई, 356 को मेसीडोन में हुआ था। वह मेसीडोन के योग्य और महत्त्वाकांक्षी शासक फिलिप द्वितीय (ई.पू. 359-336) का पुत्र था। उसकी माता का नाम ओलंपियास था। फिलिप अपने पुत्र सिकंदर को महान् विजेता बनने के सपने दिखाया करता था। उसे अपने पुत्र की क्षमता, शक्ति और योग्यता पर पूरा विश्वास था। वह सिकंदर से बराबर कहा करता था: ‘‘हे पुत्र, तुम अपने लिए एक महान् साम्राज्य की स्थापना करो क्योंकि मेसीडोनिया (मकदूनिया) का छोटा-सा राज्य तुम्हारी प्रतिष्ठा और क्षमता के अनुकूल नहीं है।’’

वैसे फिलिप स्वयं मेसीडोनिया को एक विस्तृत साम्राज्य बनाने के लिए हरसंभव प्रयत्न कर रहा था। वह अपने देशवासियों तथा सेना को फारस पर आक्रमण करने के लिए बराबर प्रेरणा देता रहा और अपने इस कार्य में वह कुछ हद तक सफल भी हुआ।

फिलिप की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सिकंदर ई.पू. 336 में मकदूनिया की गद्दी पर बैठा। उस समय उसकी आयु मात्र 20 वर्ष थी। वह अपने पिता की भाँति महत्त्वाकांक्षी था। शासक बनते ही उसने पिता के अधूरे काम को पूरा करने का बीड़ा उठाया और ई.पू. 334 में यूनान के विद्रोही राज्यों को पराभूत कर अपने अधीन कर लिया। मेसीडोन और यूनान में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद उसने विश्व-विजय की व्यापक योजना बनाई। उसने ईसस के मैदान में पारसीक शासक दारा तृतीय को भागने पर विवश कर दिया और एशिया माइनर, सीरिया, मिस्र, बेबीलोन, बैक्ट्रिया, सोग्डियाना आदि देशों को जीतकर अपने अधीन कर लिया।

गागामेला का युद्ध

ई.पू. 331 में गागामेला के रणक्षेत्र में सिकंदर की मुठभेड़ पुनः पारसीक शासक दारा तृतीय से हुई। यहाँ भी दारा को मैदान छोड़कर भागना पड़ा। गागामेला कोयुद्ध सिकंदर का फारसी सेना से अंतिम युद्ध था। अब सिकंदर समस्त फारसी साम्राज्य का सर्वेसर्वा बन गया। बेबीलोनिया, सूसा, पर्सीपोलिस और इकबत्तन के नगर, जो अभी सिकंदर के अधीन नहीं हुए थे, भी बड़ी आसानी से सिकंदर के अधीन हो गये। पारसीक शासक दारा की हत्या के बाद सिकंदर ने हिरकाना, एरिया और बैक्ट्रिया को एक-एक करके अपने नियंत्रण में कर लिया।

फारस विजय के बाद सिकंदर ने भारत-विजय की योजना बनाई। वस्तुतः सिकंदर ने भारत पर आक्रमण की योजना ई.पू. 330 के पहले ही बना ली थी क्योंकि जब वह सुग्ध और बल्ख में था, तभी वह तक्षशिला के राजा आम्भी और पुष्कलावती के शशिगुप्त से दुरभिसंधि करने लगा था। सुग्ध और बल्ख से निपटकर वह निकाइया नामक स्थान पर आ गया और वहीं से भारतीय सीमा में प्रविष्ट होने की तैयारी करने लगा। निकाइया नगर की प्रतिष्ठा सिकंदर ने ही की थी।

पश्चिमोत्तर भारत की राजनैतिक स्थिति

यूनानी आक्रमण के समय भी पश्चिमोत्तर भारत की राजनीतिक दशा वैसी ही थी जैसी ईरानी आक्रमण के समय थी। प्राचीनकाल में पश्चिमोत्तर भारत में कपिशा और गांधार के रूप में दो राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र थे, किंतु इस समय इस क्षेत्र में अनेक छोटे-छोटे जनपद, राजतंत्र और गणतंत्र विद्यमान थे और पूरा क्षेत्र अनेक राज्यों में विभक्त था जो पारस्परिक द्वेष और घृणा के कारण किसी भी आक्रमणकारी का संगठित रूप से सामना करने में असमर्थ थे।

डा. रायचौधरी ने तत्कालीन पंजाब और सिंधु प्रदेशों में स्थित 28 शक्तियों- आस्पेशियन, गुरेअंस, अस्सकेनोस, नीसा, प्यूकेलाओटिस, तक्षशिला, अरसेक्स, अभिसार, पुरु, ग्लौगनिकाय, गांदारिस, अद्रेस्ताई, कथाई अथवा कैथियंस, सोफाइटस (सौभूति), फेगेला, सिबोई, अगलसोई, सूद्रक (क्षुद्रक), मलोई (मालब), आबस्टनोई (अम्बष्ठ), जाथ्रोई और ओसेडिआई, सोद्राई और मस्सनोई, मोसिकनोस, आक्सीकनोस, संबोस, पटलेन (पाटल) का उल्लेख किया है। मगध में विशाल नंदों का सम्राज्य था। पश्चिमोत्तर भारत के कुछ प्रमुख राज्यों का वर्णन निम्नलिखित है-

कपिशा

सिकंदर द्वारा आक्रान्त प्रथम भारतीय राज्य कपिशा था। यह पंचशिर और अलिंगार नदियों के बीच स्थित था। उत्तर और दक्षिण में कपिशा का प्रदेश क्रमशः हिंदुकुश पर्वत और काबुल नदी द्वारा सीमित था। पाणिनि के अनुसार इस प्रदेश की राजधानी कपिशा और यहाँ के निवासी कापिश्यान थे। ग्रीक साहित्य के अनुसार इनकी राजधानी निकाइया थी जो स्टेनकेनो और विल्सन के अनुसार आधुनिक बेग्राम है।

अश्वकों का प्रदेश

ग्रीक साहित्य में इन्हें एसाजिसयन कहा गया है। यह प्रदेश उत्तर में पामीर तथा दक्षिण में काबुल नदी द्वारा सीमित था। पूरब और पश्चिम की सीमाएँ अलिंगार और कुणार नदियों द्वारा निर्धारित होती थी। शायद अश्वकों का भू-प्रदेश आधुनिक लमगान था जिसे अशोक के एक शिलालेख में ‘लंपाक’ कहा गया है। सिकंदर के आक्रमण के समय इस प्रदेश में चार किले थे जिसमें सिकंदर द्वारा आक्रांत पहले किले का नाम नहीं मिलता; किंतु शेष तीन किले अंडक, गौरी और अरिगायन थे। अश्वकों की राजधानी गौरी थी।

काबुल

यह प्रदेश अश्वकों के दक्षिण में था, किंतु इस प्रदेश की चर्चा ग्रीक इतिहासकारों ने नहीं किया है। संभवतः इस समय इसकी राजनीतिक महत्ता नगण्य थी।

नीसा

यह राज्य काबुल तथा सिंधुघाटी के बीच कहीं स्थित था। एरियन ने नीसा का वर्णन अरनास युद्ध के बाद किया है, इस आधार पर कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह राज्य सिंधु नदी के निकट ही था। संभवतः सिकंदर का नीसा अभियान उसके कूणार नदी के पार करने के पूर्व किया गया था। कनिंघम और मैक्रिंडल नीसा की पहचान जलालाबाद के निकट प्राचीन नगरहार के खंडहरों से करते हैं।

गांधार

लंपाक और नगरहार के बाद गांधार का विस्तृत भूभाग था। कनिंघम के अनुसार इस प्रदेश के पश्चिम में लंपाक और जलालाबाद, स्वात और बुनर का प्रदेश उत्तर में, सिंधु नदी पूरब में तथा कालाबाग की पहाडि़याँ दक्षिण में स्थित थीं। सिकंदर के आक्रमण के समय इस भूभाग के निवासी मुख्यतः गौरी, अश्वक और अश्वकायन थे। गौरी नामक जाति सिकंदर के आक्रमण के समय लंपाक के पूरब में बसी हुई थी। अश्वक और अश्वकायनों का निवास उच्च स्वात में था, जिसमें मसग और अरनास जैसे सुदृढ़ नगर एवं किले थे

मसग

यह अश्वकायनों की राजधानी थी जो अर्लस्टाइन के अनुसार निम्न स्वात में था। मैक्रिंडल के अनुसार मसग वस्तुतः बाबरनामा का मशानगर तथा अष्टाध्यायी का मस्कावती है।

वजिरा

अर्लस्टाइन के अनुसार वाजिरा की स्थिति वस्तुतः उस वीरकोटि में थी जिसका ध्वंसावशेष आज भी विद्यमान है जिसका समर्थन एरियन के वाजिरा-विवरण से भी होती है।

ओरा

एरियन के अनुसार ओरा वीर कोट के ऊपर आधुनिक उद्ग्राम नामक स्थान पर स्थित था।

अरनास

अर्लस्टाइन ने अरनास की स्थिति पीरशर की ऊण नामक पहाड़ी पर बताया है। वस्तुतः अरनास अवर्ण का ही विकृत रूप प्रतीत होता है।

पुष्कलावती

कपिशा और सिंधु के बीच पुष्कलावती या पियोक्लोविस, ओरोवती और इम्बोलिका नगर थे। पुष्कलावती हस्तिनायनों की राजधानी थी जहाँ का शासक हस्तिन् था। कभी-कभी पुष्कलावती को कोई नगर न मानकर एक विस्तृत प्रदेश माना गया है। वस्तुतः पुष्कलावती पश्चिमी गांधार की राजधानी थी जो कनिंघम के अनुसार पेशावर के पास चरसद नामक स्थान में थी।

ओरवती

यह पुष्कलावती के पश्चिम में थी। इतिहासकारों ने इसकी पहचान नौशेरा के निकट स्थित अरबुत्त नामक स्थान से किया है। ओरवत्ती का शुद्ध नाम शायद इरावती या ऐरावती रहा होगा।

इम्बोलिमा

इसी स्थान पर सिकंदर की सेना ने सिंधु नदी को पार कर तक्षशिला में प्रवेश किया था। यह नगर सिंधु के दाहिने किनारे पर स्थित था। कनिंघम ने इसकी स्थिति पुष्कलावती और तक्षशिला के बीच में बताई है।

जिस प्रकार पश्चिमी उदीच्य (हिंदुकुश पर्वत से सिंधु नदी तक) कपिशा और गांधार नामक दो सांस्कृतिक इकाइयों का अंग था तथा राजनैतिक दृष्टि से अनेक स्वतंत्र राज्यों में विभक्त था, उसी प्रकार पूर्वी उदीच्य (सिंधु नदी से सतलज नदी तक) भी राजनैतिक दृष्टि से विभिन्न राजतंत्रों तथा गणतंत्रों द्वारा शासित था। इन राज्यों में तक्षशिला, पुरु का राज्य, अस्सपेसिओई गण, शिविगण, अगलस्सोई, मालव व क्षुद्रक, कठ आदि महत्त्वपूर्ण थे।

सिकंदर का भारतीय अभियान

निकाइया में सिकंदर ने भारतीय अभियान के लिए जिस सेना का संगठन किया, उसकी शक्ति और संख्या के संबंध में जे.बी. ब्यूरी का कहना है कि यह सेना उस सेना से दुगुनी थी जिसे लेकर वह सात वर्ष पूर्व यूनान से निकला था। प्लूटार्क के अनुसार इस नई सेना में 1,20,000 पैदल और 15,000 घुड़सवार सैनिक थे। सिकंदर सैनिक तैयारी के साथ-साथ कूटनीतिक कुचक्र भी चला रहा था। निकाइया में तक्षशिला के राजा आम्भी के नेतृत्व में एक दूतमंडल सिकंदर से मिला, जिसने उसे सहायता का पूर्ण आश्वासन दिया। सिकंदर के कूटनीतिक आतंक से प्रभावित होकर शशिगुप्त जैसे कई भारतीय राजाओं ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा उसकी सहायता का वचन दिया। शेष राजा, जो सिकंदर के समक्ष आत्म-समर्पण करना अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं समझते थे, वे सिकंदर का प्रतिरोध करने के लिए कटिबद्ध थे। ऐसे शासकों को दंडित करने के लिए सिकंदर ने सैनिक शक्ति का प्रयोग करना आवश्यक समझा।

सिकंदर ने कपिशा और गांधार के स्वतंत्रता-प्रिय राजाओं को एक साथ युद्धरत करने के लिए अपनी सेना को दो भागों में बांटकर निकाइया से प्रस्थान किया। सिकंदर ने अपनी सेना के एक भाग का नायक हेफिस्टन और परडिकस को बनाया। यह सेना काबुल के किनारे से होकर खैबर की ओर बढ़ी। इस सेना के दो मुख्य कार्य थे- एक तो अभियान-पथ के राजाओं को पराजित करना और दूसरा, सिंधु नदी पर एक पुल का निर्माण करना जो सिकंदर के अधीनस्थ मुख्य सेना को सिंधु पार करने में सहायक हो। दूसरे भाग का नेतृत्व सिकंदर स्वयं कर रहा था।

पुष्कलावती पर आक्रमण

सिकंदर की सेना के अभियान-पथ में कितने राजा आये, स्पष्ट नहीं है। सिकंदर को सबसे पहले एक गणराज्य के प्रधान के विरोध का सामना करना पड़ा, जिसे यूनानी अस्टीज (संस्कृत में हस्तिन्) कहते हैं। वह हस्तिनायन जाति का प्रधान था। यूनानियों ने इसके लिए अस्टाकेनोई या अस्टानेनोई जैसे शब्दों का प्रयोग किया है जिसकी राजधानी प्यूकेलाओटिस अर्थात् पुष्कलावती थी। यूनानी विवरणों से पता चलता है कि पुष्कलावती के राजा हस्तिन् ने (अस्टीज) तीस दिनों तक सिकंदर की सेना का प्रतिरोध किया।

हस्तिन् की मृत्यु के बाद पुष्कलावती ने आत्म-समर्पण कर दिया। कहते हैं कि संजय और आम्भी ने पुष्कलावती के पतन में सिकंदर का साथ दिया और सिकंदर ने संजय को हस्तिन् के स्थान पर शासक नियुक्त किया। इसके बाद सिकंदर की सेना बड़ी सरलता से सिंधु नदी तक पहुँच गई जहाँ दूसरी सेना ने सुदृढ़ पुल का निर्माण कर लिया था।

अश्वकों से संघर्ष

वजौर क्षेत्र के अश्वकों ने कुणार के समतल मैदान में सिकंदर का सामना किया। अश्वकों ने सिकंदर का कड़ा प्रतिरोध किया और सैकड़ों अश्वक मारे गये। अश्वकों के अन्य केंद्र समय से संगठित नहीं हो सके। उनके दूसरे शक्ति-केंद्र अंडक को जीतकर सिकंदर उनकी राजधानी तक पहुँच गया जिसकी रक्षा गौरी नामक अश्वक कर रहा था। पर्डिकस की सहायता से टाल्मी ने बड़ी कठिनाई से अश्वकों से अरगियान का किला छीन लिया। अश्वकों ने इसके बाद भी प्र्रतिरोध जारी रखा, किंतु अंततः पराभूत हुए। टाल्मी के विवरण के अनुसार सिकंदर ने 40,000 से अधिक लोगों को बंदी बनाया और हजारों बैलों को मकदूनिया भेज दिया।

नीसा का समर्पण

अश्वकों के बाद सिकंदर ने नीसा पर आक्रमण किया। एरियन और जस्टिन के अनुसार इस जाति ने बिना लड़े ही सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली। किंतु कर्टियस के विवरण से पता चलता है कि नीसा के लोगों ने पहले सिकंदर का विरोध करने का प्रयत्न किया, किंतु आपसी फूट के कारण उन्हें सिकंदर की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।

नीसा के पतन बाद सिकंदर का संघर्ष एकाद्रिया और गोरी जाति के लोगों से हुआ और इन जातियों ने भी प्रायः बिना संघर्ष के ही आत्म-समर्पण कर दिया।

अश्वकायनों से युद्ध

वीर और स्वतंत्रता-प्रिय अश्वकायन स्वात घाटी की उपजाऊ भूमि में थे। अश्वकायनों ने सिकंदर का सामना करने के लिए एक बड़ी सेना का निर्माण कर लिया जिसमें एरियन के अनुसार 20,000 अश्वरोही, 30,000 से अधिक पैदल और 300 हाथी थे। इन्हें मित्र अभिसार से भी 7,000 पेशेवर सैनिक सहायता के रूप में प्राप्त हुए। अश्वकायनों से सिकंदर का पहला संघर्ष ‘मसग’ नामक प्राकृतिक दुर्ग में हुआ जिसका नेता असकनास था। कर्टियस के अनुसार युद्ध में असकनास की मृत्यु होने पर उसकी माता (पत्नी?) आकुफिस ने संघर्ष का नेतृत्व किया। अपनी वीरांगना रानी क्लियोफिस के नेतृत्व में आश्वकायनों ने अंत तक अपने देश की रक्षा करने का दृढ़ संकल्प किया। रानी के साथ ही वहाँ की स्त्रियों ने भी प्रतिरक्षा में भाग लिया। यूनानी लेखकों के विवरण से पता चलता है कि इस राज्य की स्त्रियों ने पुरुषों की मृत्यु के बाद युद्ध किया था। मसग के दुर्ग को जीतने के लिए सिकंदर ने एक विशेष प्रहार-यंत्र ‘कटापुल्ट’ का प्रयोग किया, जिसे सिराकूज के डायोनिसस नामक राजा ने आविष्कृत किया था। प्रबल प्रतिरोध के बावजूद अंततः अश्वकायनों को संधि करनी पड़ी। विश्वासघाती सिकंदर ने संधि की शर्तों का उल्लंघन कर नगर की अश्वकायन स्त्रियों को मौत के घाट उतार दिया। प्लूटार्क के अनुसार यह कृत्य सिकंदर के सामरिक यश पर एक काला धब्बा है।

मसग विजय के बाद सिकंदर अश्वकायनों के ओरा (उद्ग्राम) और वाजिरा (वीरकोट) नगरों को जीतता हुआ पुष्कलावती पहुँचा, जहाँ उसकी दूसरी सेना ने पहले ही अधिकार कर लिया था।

सिकंदर ने सिंधु नदी के पश्चिमी प्रदेशों को एक प्रांत (क्षत्रपी) में संगठित कर निकोनोर को वहाँ का क्षत्रप नियुक्त किया। फिलिप के नेतृत्व में एक सैनिक जत्थे ने पुष्कलावती तथा सिंधु के बीच स्थित सभी छोटे-छोटे प्रदेशों को जीतकर निचली काबुल घाटी में अपनी स्थित सुदृढ़ कर ली।

अवर्ण पर आक्रमण

स्वात और वूनर घाटी के आश्वकायन अवर्ण (अरनास) के दुर्ग में सुरक्षित हो गये थे। सिकंदर ने पुनः तैयारी कर टाल्मी के नेतृत्व में अवर्ण पर आक्रमण करने के लिए सेना भेजी। कड़े संघर्ष के बाद स्थानीय सहायकों की मदद से सिकंदर ने अवर्ण के दुर्ग पर अधिकार कर लिया और शशिगुप्त को यहाँ का शासक नियुक्त किया। सिंधु नदी के तट पर सिकंदर ने एक माह विश्राम किया।

ई.पू. 326 के बसंत में सिकंदर सिंधु नदी को पार कर तक्षशिला पहुँचा। तक्षशिला के राजा आम्भी ने, जिसका राज्य सिंधु नदी और झेलम नदी के बीच विस्तृत था, अपनी प्रजा और सेना के साथ सिकंदर का स्वागत किया और उसे अनेक भेंट आदि देकर सैनिक सहायता दी। चूंकि आम्भी पुरु अथवा पोरस का पड़ोसी प्रतिद्वंद्वी शासक था, इसलिए कुछ तो पोरस से ईर्ष्या के कारण और कुछ अपनी कायरता के कारण उसने पोरस के विरुद्ध युद्ध में सिकंदर का साथ देने का वचन दिया। तक्षशिला में ही पास-पड़ोस के अभिसार जैसे अनेक छोटे-छोटे राजाओं ने सिकंदर के सामने आत्म-समर्पण कर दिया। सिकंदर ने आम्भी को पुरस्कार-स्वरूप पहले तो तक्षशिला के राजा के रूप में मान्यता प्रदान कर दी और बाद में सिंधु के चिनाब-संगम क्षेत्र तक का शासन भी उसे सौंप दिया। तक्षशिला में खुशियां मनाते हुए सिकंदर ने झेलम और चिनाब के मध्यवर्ती प्रदेश के शासक पुरु (पोरस) को आत्म-समर्पण करने के लिए कहा, किंतु पोरस जैसे स्वाभिमानी शासक ने सिकंदर को खुली चुनौती देते हुए आत्म-समर्पण करने से इनकार कर दिया।

झेलम (वितस्ता) का युद्ध

पोरस तथा सिकंदर की सेनाएँ झेलम नदी के पूर्वी तथा पश्चिमी तटों पर डट गईं। उस समय बरसात के कारण झेलम में बाढ़ आ गई थी जिसके कारण कुछ दिनों तक दोनों पक्ष अवसर की प्रतीक्षा करते रहे। एरियन के अनुसार एक रात जब भीषण वर्षा हुई, सिकंदर ने रात के अंधेरे में अपने चुने हुए 1,1000 सैनिकों को झेलम नदी के पार उतार दिया। सिकंदर द्वारा झेलम पार करने की सूचना पाते ही पोरस ने अपने पुत्र के नेतृत्व में सेना की एक टुकड़ी सिकंदर का मार्ग रोकने के लिए भेजा, जिसे सिकंदर ने पराजित कर दिया। इस युद्ध में पोरस के 4,000 सैनिक व उसका पुत्र मारे गये।

अब पोरस सिकंदर के साथ निर्णायक युद्ध के लिए अपनी विशाल सेना के साथ आगे बढ़ा। एरियन के अनुसार पोरस की सेना में 30,000 पैदल सैनिक, 4,000 घुड़सवार, 300 रथ और 200 हाथी थे। जब सिकंदर के द्रुतगामी अश्वारोही तथा घोड़ों पर सवार तीरन्दाज सामने आ गये, तो पुरु ने झेलम के पूर्वी तट पर कर्री के मैदान में व्यूह-रचना करके उनका सामना किया। उसकी धीरे-धीरे चलने वाली पदाति सेना सबसे आगे थी, उसके पीछे हस्तिसेना थी। उसने जिस ढंग की वर्गाकार व्यूह-रचना की थी, उसमें सेना के लिए तेजी से गमन करना संभव नहीं था। उसके धनुषधारी सैनिकों के धनुष इतने बड़े थे कि उन्हें बरसात की दलदली जमीन पर टेक कर चलाना असंभव हो गया था। यद्यपि भारतीयों ने हाथियों, जिन्हें मेसीडोनियावासियों ने पहले कभी नहीं देखा था, को साथ लेकर युद्ध किया, परन्तु भारतीय हार गये। सिकंदर ने अपनी द्रुतगामी सेना की गतिशीलता का पूरा लाभ उठाया और उसकी इस रणनीति ने उसे युद्ध में विजयी बना दिया। यवन सैनिकों ने पोरस को बंदी बना लिया, किंतु पोरस की वीरता, उत्साह तथा युद्ध-कौशल से प्रभावित होकर सिकंदर ने उसे राजोचित सम्मान देते हुए न केवल उसका राज्य वापस लौटा दिया, बल्कि पंजाब में जीते गये कुछ और राज्य भी उसे सौंप दिया। प्लूटार्क के अनुसार इसमें 15 संघ राज्य, उनके पाँच बड़े नगर तथा अनेक ग्राम थे। इस प्रकार अंततः पोरस की पराजय भी जय में बदल गई।

इसके पश्चात् सिकंदर ने वीरगति पाने वाले सैनिकों की अंत्येष्ठि कर यूनानी देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की। इसी समय उसने दो नगरों की स्थापना की, एक रणक्षेत्र में ही विजय के उपलक्ष्य में ‘निकाइया’ (विजय नगर) और दूसरा झेलम नदी के दूसरे तट पर ‘बउकफेला’, जहाँ सिकंदर के प्रिय घोड़े बउकफेला की मृत्यु हुई थी।

झेलम युद्ध के बाद सिकंदर ने चिनाब नदी के पश्चिमी तट पर स्थित ग्लौचुकायन राज्य को पराभूत कर पोरस के राज्य में मिला दिया। इसी बीच अश्वकों के प्रदेश में विद्रोह हो गया तथा यूनानी क्षत्रप निकानोर की हत्या कर दी गई। सिकंदर के आदेश पर एलेक्जेड्रिया तथा तक्षशिला के क्षत्रपों- टाइरेसपेस तथा फिलिप ने विद्रोह को दबा दिया। इसके बाद सिकंदर चिनाब नदी पार कर गान्दारिस राज्य के शासक पोरस के भतीजे ‘छोटा पुरु’ से चिनाब और रावी नदियों के बीच के उसके राज्य पर अधिकार कर संपूर्ण क्षेत्र को पोरस के राज्य में मिला दिया।

सिकंदर ने रावी नदी पार कर अद्रेष्टाई (आद्रिज) को आत्म-समर्पण के लिए बाध्य किया और उनकी राजधानी ‘पिम्प्रमा’ पर अधिकार कर लिया। आगे बढ़ते हुए सिकंदर ने कथाई (कठ) गणराज्य पर आक्रमण किया। कठ एक और वीर जाति थी, जो अपने शौर्य के लिए दूर-दूर तक विख्यात थी। कठों की राजधानी संगल में थी। कठों ने सिकंदर का कड़ा प्रतिरोध किया और अपनी राजधानी के चारों ओर रथों कोघेरा बना दिया। अंततः पोरस की मदद से सिकंदर कठों को पराजित करने में सफल हो गया। उनका नगर ध्वस्त कर दिया गया और कठों की सामूहिक हत्या कर दी गई। इन गणजातीय राज्यों को भी पोरस के अधीन कर दिया गया। इसके बाद सिकंदर ने सौभूति और फेगला के राजाओं से उपहार प्राप्त किया। यहाँ से सिकंदर व्यास नदी के तट पर उपस्थित हुआ।

सिकंदर का प्रत्यावर्तन

व्यास के पश्चिमी तट पर पहुँचकर सिकंदर की सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। सिकंदर ने नाना प्रकार के प्रलोभनों से अपने सैनिकों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया, किंतु उसके सारे प्रयास निष्फल रहे। वस्तुतः भारत के विभिन्न जनपदों ने जिस वीरता से यूनानियों का प्रतिरोध किया था, उससे यवन-सैनिकों का उत्साह भंग हो गया था। नंद साम्राज्य की शक्ति के कारण भी यवन सैनिक आगे नहीं बढ़ना चाह रहे थे। सैनिकों के हठ के सामने सिकंदर को झुकना पड़ा और उसने सैनिकों को वापसी का आदेश दे दिया।

सिकंदर ई.पू. 326 में वापस झेलम पहुँचा। यहाँ उसने विजित प्रदेशों के प्रशससन की समुचित व्यवस्था की। व्यास तथा झेलम के बीच का संपूर्ण प्रदेश पोरस को दिया गया तथा झेलम और सिंधु के बीच का क्षेत्र गांधारराज आम्भी के सुपुर्द किया गया। अभिसार को अर्सेस राज्य के साथ कश्मीर के भू-भाग पर शासन करने का अधिकार दिया। सिंधु के पश्चिम के भारतीय प्रदेश सेनापति फिलिप्स को दिये गये। भारत के जिन प्रदेशों पर सिकंदर का आधिपत्य स्थापित हो गया था, उनके अनेक नगरों में यवन-सेना की छावनियां स्थापित की गईं ताकि ये यवनराज के विरुद्ध विद्रोह न कर सकें।

स्वायत्त जातियों का प्रतिरोध

लौटते समय सिकंदर को मालव व क्षुद्रक जैसी स्वायत्त-जातियों के संघ के संगठित विरोध का सामना करना पड़ा। इनकी संयुक्त सेना में 90,000 पैदल सिपाही, 10,000 घुड़सवार और 900 से अधिक रथ थे। मालव तथा क्षुद्रक सेना ने यूनानी सेना से भीषण युद्ध किया जिसमें सिकंदर को भी गम्भीर चोटें आईं। किंतु मालव पराजित हुए और उनके नर-नारी तथा बच्चे मौत के घाट उतार दिये गये। मालवों के पतन के बाद क्षुद्रकों ने भी हथियार डाल दिया और उनका संघ भंग कर दिया गया।

सिकंदर जब सिंधु नदी के मार्ग से भारत से वापस लौट रहा था, तो व्यास तथा चिनाब नदियों के संगम के आसपास निवास करनेवाली शिवि और अगलस्सोई द्धअगलस्स) जातियों से उसका मुकाबला हुआ। शिवि लोगों ने तो बिना किसी प्रतिरोध के आत्म-समर्पण कर दिया, किंतु अगलस्सोई जाति के लोगों ने 40,000 पैदल सिपाहियों और 3,000 घुड़सवारों की सेना लेकर सिकंदर से टक्कर ली। कहा जाता है कि उनके एक नगर के 20,000 निवासियों ने अपने बाल-बच्चों को आग में झोंककर लड़ते हुए प्राण देना उचित समझा। यह कृत्य राजपूतों में प्रचलित जौहर प्रथा से मिलती प्रतीत होती है।

दक्षिणी-पश्चिमी पंजाब में सिकंदर को अम्बष्ठ, क्षत् और वसाति आदि छोटे-छोटे गणराज्यों से भी लड़ना पड़ा। उत्तरी सिंधु में सिकंदर ने सोग्डोई (सौगदी) तथा मूसिकनोई (मुसिक) नामक जनपद को पराजित किया। इसी समय मुसिक राज्य के पड़ोसी शासक सम्बोस ने भी सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली।

जुलाई, 325 ई.पू. में सिंधु नदी के मुहाने पर पहुँचकर सिकंदर ने अपनी सेना को दो भागों में विभक्त किया। जल सेनापति नियार्कस को जहाजी बेड़े के साथ समुद्र-मार्ग से वापस लौटने का आदेश देकर वह स्वयं मकरान के किनारे-किनारे स्थल मार्ग से अपने देश की ओर चला। जेड्रोसिया के रेगिस्तानों से होता हुआ सिकंदर बेबीलोन पहुँचा, जहाँ 11 (10 जून?) जून, 323 ई.पू. को उसकी मुत्यु हो गई।

यूनानी आक्रमण का प्रभाव

सिकंदर का विजय अभियान विश्व-इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। यूरोपीय इतिहासकारों ने इसका बहुत विस्तृत और अतिरंजित विवरण दिया है। प्लूटार्क लिखता है कि यदि सिकंदर का आक्रमण न होता तो बड़े-बड़े नगर नहीं बसते। जूलियन के अनुसार सिकंदर ने ही भारतीयों को सभ्यता का पाठ पढ़ाया। इसके विपरीत प्राचीन भारतीय साहित्य में इस आक्रमण का कोई उल्लेख नहीं मिलता है और अनेक इतिहासकार मानते है कि सिकंदरी अभियान का तत्कालीन भारतीय जन-जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, वह आँधी की तरह आया और चला गया। विंसेंट स्मिथ के अनुसार, ‘भारत अपरिवर्तित रहा, युद्ध के घाव शीघ्र भर गये,….भारत का यूनानीकरण नहीं हुआ। वह अपना शानदार पृथकता का जीवन व्यतीत करता रहा और मेसीडोनियन झंझावत के प्रवाह को शीघ्र भूल गया।’

यह सच है कि भारत का यूनानीकरण नहीं हुआ। यवन-सेना केवल भारत के पश्चिमोत्तर सीमांत को ही छू सकी और भारत में यवन-सत्ता शीघ्र ही विघटित हो गई; किंतु इसके साथ ही यवन-प्रमाणों से यह भी सिद्ध होता है कि अत्यंत वीरता दिखाते हुए भी पश्चिमोत्तर भारत के राज्य यवन-सेना के सामने क्रमशः धराशायी होते गये और उसके प्रवाह को दूसरी साम्राज्यवादी मगध-सेना ही रोक सकी।

यह भी सत्य है कि जिस प्रकार यूनान के स्वतंत्रातावादी छोटे-छोटे गणराज्य मकदूनिया की संगठित सेना के सामने नष्ट हो गये, उसी प्र्रकार पश्चिमोत्तर भारत के छोटे-छोटे गणराज्य और राजतंत्रा भी। यूनानी गणतंत्रा इसके बाद पुनर्जीवित नहीं हुए, जबकि भारतीय गणतंत्र पाँचवीं शताब्दी के आरंभ तक जीवित रहे।

किंतु यह भी सत्य है कि राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भारत प्रभावित भी हुआ। सिकंदर ने पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत के छोटे-बड़े राज्यों की सत्ता नष्ट करके पश्चिमोत्तर के संपूर्ण विजित प्रदेशों को चार प्रशासनिक इकाइयों में विभक्त कर दिया जिससे भारतीय एकता को प्रोत्साहन मिला और चंद्रगुप्त मौर्य के लिए साम्राज्य स्थापित करना आसान हो गया। ‘यदि पूर्वी भारत में उग्रसेन महापद्मनंद मगध के सिंहासन पर चंद्रगुप्त का अग्रज रहा, तो पश्चिमोत्तर भारत में सिकंदर स्वयं उस सम्राट का अग्रदूत था।’ सिकंदर के आक्रमण से स्पष्ट हो गया कि केवल देशप्रेम की भावना ही राष्ट्र-रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है, इसके लिए संगठन, सैन्य-शक्ति और योग्य नेतृत्व भी आवश्यक है।

सिकंदर के अभियान के दौरान पश्चिमोत्तर भारत में निकाइया, बउकफेला और सिकन्दरिया जैसे अनेक यूनानी उपनिवेश स्थापित हुए जिसके कारण भारत और पश्चिमी देशों के व्यापारिक संबंधों में प्रगाढ़ता आई और व्यापार-वाणिज्य के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई। व्यापारिक-संपर्क के फलस्वरूप भारत में यूनानी-मुद्राओं के अनुकरण पर ‘उलूक शैली’ के सिक्के ढ़ाले गये जिससे भारतीय मुद्रा-निर्माण कला का विकास हुआ। पश्चिम एशिया तथा भारत के बीच होनेवाले व्यापार के कारण भारत में नगरीकरण की प्रक्रिया को भी गति मिली।

सिकंदर के आक्रमण की तिथि (ई.पू. 326) ने प्राचीन भारत के तिथिक्रम की अनेक गुत्थियों को सुलझा दिया जिससे भारत के क्रमागत इतिहास को लिखने में सहायता मिली। इसके अलावा सिकंदर के साथ अनेक यवन लेखक और इतिहासकार भी आये जिनके विवरणों से पंजाब और सिंधु की तत्कालीन परिस्थिति का ज्ञान होता है।

रोमिला थापर के अनुसार ‘सिकंदर के आक्रमण का सर्वाधिक उल्लेखनीय परिणाम न राजनीतिक था, न सैनिक। उसका महत्त्व इस बात में निहित है कि वह अपने साथ कुछ ऐसे यूनानियों को लाया जिन्होंने भारत के विषय में अपने विचारों को लिपिबद्ध किया और वे इस काल पर प्रकाश डालने की दृष्टि से मूल्यवान हैं।’

सिकंदर के आक्रमण का कुछ सांस्कृतिक प्रभाव भी पड़ा। दो भिन्न जातियों के संपर्क ने एक दूसरे को प्रभावित किया और दोनों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ। यूनानी साम्राज्यिक व्यवस्था के प्रभाव से भारत में हिंदू-राज्यतंत्र स्थायी तत्त्व हो गया। कला और ज्योतिष के क्षेत्र में भी भारतीयों ने यूनान से बहुत-कुछ सीखा।

भारतीय दर्शन पर यूनानी दार्शनिक पाइथागोरस का प्रभाव स्पष्ट है। यूनानी कला के प्रभाव से ही कालांतर में पश्चिमोत्तर प्रदेशों की गांधार कला शैली का विकास हुआ। कुछ इतिहासकार मौर्य-स्तंभों की कलाकृतियों पर भी यूनानी कला का ही प्रभाव देखते हैं ।

सिकंदर के भारत से लौटने के बाद उसकी विजय के बचे-खुचे चिन्हों को चंद्र्रगुप्त मौर्य ने मिटा दिया। यद्यपि सिकंदर की विजय-यात्रा प्रशंसनीय थी, किंतु इसमें भारतीय युद्ध-कौशल की यथार्थ परीक्षा नहीं हुई क्योंकि उसको भारत के किसी बड़े सम्राट का सामना नहीं करना पड़ा।