परवर्ती गुप्त सम्राट और गुप्त राजवंश का अवसान (Later Gupta Emperors and the End of the Gupta Dynasty)

स्कंदगुप्त की मृत्यु के बाद गुप्त राजवंश का सूरज अस्ताचल की ओर गतिमान हुआ। यद्यपि स्कंदगुप्त के पश्चात् गुप्त शासकों के नाम अभिलेखों एवं मुद्राओं से ज्ञात होते हैं, किंतु स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारयों का क्रम असंदिग्ध रूप से निर्धारित करना कठिन है।

पुरुगुप्त

अधिकारिक वंशानुवली में कुमारगुप्त के बाद पुरुगुप्त का नाम है, किंतु स्कंदगुप्त का नाम नहीं है। संभवतः स्कंदगुप्त की मृत्यु के बाद पुरुगुप्त सम्राट बना। वह स्कंदगुप्त का सौतेला भाई था और कुमारगुप्त की पट्टमहारानी का पुत्र था। पुरुगुप्त वृद्धावस्था में राजसिंहासन पर बैठा था, इसलिए उसकी दुर्बलता का लाभ उठाते हुए वाकाटक नरेश नरेंद्रसेन ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया। एक शिलालेख से सूचित होता है कि नरेंद्रसेन ने अपने वंश की डूबी हुई शक्ति का पुनरुद्धार किया था। इस प्रकार स्कंदगुप्त के निर्बल भाई पुरुगुप्त के शासनकाल में वाकाटक राज्य फिर से स्वतंत्र हो गया। परमार्थकृत ‘वसुबंधुजीवनवृत्त’ के अनुसार पुरुगुप्त बौद्ध धर्म का अनुयायी था। इसने संभवतः 467-473 ई. तक शासन किया। अभिलेखों के अनुसार पुरुगुप्त के दो पुत्र बुधगुप्त तथा नरसिंहगुप्त थे।

कुमारगुप्त द्वितीय

पुरुगुप्त के उत्तराधिकारी कुमारगुप्त द्वितीय का नाम गुप्त वंशावली में और जटिलता उत्पन्न करता है। संभवतः यह पुरुगुप्त का ही कोई पुत्र था। सारनाथ से गुप्त संवत् 154 (473 ई.) का बौद्ध प्रतिमा पर उत्कीर्ण एक लेख मिला है जिस पर ‘भूमिं रक्षति कुमारगुप्ते’ उत्कीर्ण है। कुछ इतिहासकार इसे स्वतंत्र शासक न मानकर पुरुगुप्त का ‘गोप्ता’ मानते हैं। कुमारगुप्त द्वितीय ने वाकाटकों से युद्ध किया और मालवा के प्रदेश को जीतकर फिर से अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया तथा ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की। वैष्णव धर्मानुयायी इस नरेश ने ‘परमभागवत्’ की उपाधि धारण की थी। इसने संभवतः 473 से 476 ई. तक चार वर्ष शासन किया था।

बुधगुप्त

कुमारगुप्त द्वितीय के बाद बुधगुप्त शासक हुआ जो नालंदा से प्राप्त मुहर के अनुसार पुरुगुप्त का पुत्र था। उसकी माता का नाम चंद्रदेवी था। इसका गुप्त संवत् 157 (477 ई.) का एक अभिलेख सारनाथ से मिला है, जिससे लगता है कि यह 477 ई. में शासन कर रहा था। बुधगुप्तकालीन शिलालेख एरण (मध्य प्रदेश) से लेकर दामोदरपुर तथा पहाड़पुर (बंगाल) तक से प्राप्त हुए हैं, जिनमें गुप्त संवत् की तिथियाँ दी गई हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि बुधगुप्त एक शक्तिशाली शासक था और उसके द्वारा नियुक्त प्रांतीय शासक बंगाल से लेकर मालवा तक शासन कर रहे थे। इसी ताम्रलेख से पता चलता है कि पुण्ड्रवर्धन भुक्ति का शासक ब्रह्मदत्त था।

एरण लेख के अनुसार पूर्वी मालवा में मातृविष्णु तथा अंतर्वेदी (गंगा-यमुना दोआब) में सुरश्मिचंद्र बुधगुप्त के सामंत थे। दामोदरपुर ताम्रलेख में इसे ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज’ कहा गया है। इसके स्वर्ण सिक्कों पर उसकी उपाधि ‘श्रीविक्रम’ मिलती है। बुधगुप्त की रजत मुद्राओं पर ‘राजा बुधगुप्त पृथ्वी को जीतने के बाद स्वर्ग की विजय करता है’ (विजितवनिरवनिपति श्रीबुधगुप्त दिवि (दिवं) जयति) मुद्रालेख मिलता है।

बुधगुप्त के शासनकाल में अधीनस्थ राज्यों के साम्राज्य से अलग होने के कारण गुप्त साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया था। काठियावाड़ प्रायद्वीप में बल्लभी के मैत्रक तथा बुंदेलखंड के परिव्राजक शासकों ने सर्वोच्च सत्ता के रूप में गुप्त शासक का अस्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया है, जिससे उनके द्वारा गुप्त अधीनता को अस्वीकार करने का संकेत मिलता है।

इसी प्रकार बुधगुप्त के समकालीन महाराज सुबंधु के प्राचीन नगर महिष्मती से निर्गत एक अभिलेख से पता चलता है कि उसने अपनी स्वाधीनता स्थापित कर ली थी। बुधगुप्त के सिक्कों से भी गुप्त साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया का संकेत मिलता है। उसकी स्वर्ण मुद्राएँ अत्यंत कम हैं जिससे लगता है कि स्कंदगुप्त के बाद आंतरिक कमजोरियों तथा उत्तराधिकार के युद्धों के कारण साम्राज्य दुर्बल हो गया था।

चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार वह बौद्ध धर्मानुयायी था। उसने नालंदा बौद्ध महाविहार को धन दान दिया था। सारनाथ लेख के अनुसार अभयमित्र नामक भिक्षु ने 477 ई. में गौतम बुद्ध की प्रतिमा का निर्माण करवाया था (कारिताभयमित्रेण प्रतिमा शाक्यभिक्षुणा)। इसकी कुछ रजत मुद्राओं पर इसकी तिथि गुप्त संवत् 175 (495 ई.) मिलती है, जिससे लगता है कि उसने 476 से 495 ई. तक शासन किया।

नरसिंहगुप्त ‘बालादित्य’

बुधगुप्त की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई, पुरुगुप्त का पुत्र नरसिंहगुप्त शासक बना। भितरी मुद्रालेख में इसकी माता का नाम महादेवी चंद्रदेवी मिलता है। नरसिंहगुप्त ने अपने नाम के साथ ‘बालादित्य’ उपाधि प्रयुक्त की। उसके सिक्कों पर एक ओर उसका चित्र है और ‘नर’ लिखा हुआ है, तो दूसरी ओर पुरोभाग पर धनुष-बाण लिए राजा, गरुड़ध्वज की आकृति एवं ‘जयति नरसिंहगुप्तः’ मुद्रालेख उत्कीर्ण है। पृष्ठ भाग पर कमलासन पर विराजमान लक्ष्मी और मुद्रालेख ‘बालादित्य’ अंकित है।

नरसिंहगुप्त की सबसे बड़ी सफलता संभवतः हूण-विजय थी। ह्वेनसांग के अनुसार बालादित्य नामक गुप्त नरेश ने मिहिरकुल को पराजित कर दिया था। मिहिरकुल को बंदी बनाकर राजधानी लाया गया, किंतु राजमाता के कहने पर उसे मुक्त कर दिया गया। संभवतः नरसिंहगुप्त के इस हूण विजय में उसके सामंतों (मौखरि आदित्यवर्मा और परवर्ती गुप्त शासक हर्षगुप्त) ने सहयोग किया था।

नालंदा मुद्रालेख में नरसिंहगुप्त को ‘परमभागवत’ कहा गया है, किंतु वह बौद्ध धर्म का अनुयायी था। उसने बौद्ध विद्वान् वसुबंधु की शिष्यता ग्रहण की थी। उसने नालंदा में ईंटों का एक भव्य मंदिर बनवाया था जिसमें 80 फुट ऊँची बुद्ध की ताम्र-प्रतिमा स्थापित की गई थी।

वैन्यगुप्त

वैन्यगुप्त के संबंध में गुप्त संवत् 188 (507 ई.) के गुणैधर (कोमिल्ला, बंग्लादेश) ताम्रपत्र से सूचना मिलती है। गुणैधर ताम्र-दानपत्र में महादेव के चरणों में श्रद्धारत महाराज वैन्यगुप्त द्वारा एक बौद्ध भिक्षु को पड़ोस की कुछ भूमि के दान का उल्लेख है। यह दान-विसर्जन एक सामंत महाराज रुद्रदत्त की प्रेरणा पर किया गया था और एक असमी सेनापति महाराज विजयसेन इसका दूतक था। नालंदा से उसकी एक मुहर मिली है, जिस पर इसकी उपाधि ‘महाराजाधिराज’ मिलती है। संभवतः इसने ‘द्वादशादित्य’ की उपाधि भी धारण की थी।

भानुगुप्त

भानुगुप्त का एक प्रस्तर-स्तंभ लेख एरण से प्राप्त हुआ है जो 510 ई. का है। एरण लेख में इसे वीर तथा महान राजा कहा गया है। इसी लेख में उसके किसी गोपराज नामक सेनापति का उल्लेख मिलता है जो हूणों के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया तथा उसकी पत्नी अग्नि में सती हो गई-

श्री भानुगुप्तो जगति प्रवीरो, राजा महान्पार्थसमोऽति शूरः।

तेनाथ सार्द्धन्त्विह गोपराजो, मित्रानुगत्येन किलानुयातः।

कृत्वा च प्रिया युद्धं सुमहत्प्रकाशं, स्वर्ग गतो दिव्य नरेन्द्रकल्प।

भक्तानुरक्ता च प्रिया च कांता, भार्यावलग्नानुगताग्निराशिम्।।

यह सती प्रथा के उल्लेख का प्राचीनतम् प्रमाण है। हेमचंद्र रायचौधरी का अनुमान है कि बुधगुप्त के बाद पूर्वी मालवा में जो हूण सत्ता स्थापित हो गई थी, उसी का अंत करने के लिए भानुगुप्त ने युद्ध किया और हूणों का आधिपत्य समाप्त किया। किंतु इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है। लगता है कि हूणों ने मालवा को जीत लिया क्योंकि बुधगुप्त के सामंत मातृविष्णु का छोटा भाई धान्यविष्णु हूण नरेश तोरमाण की अधीनता में शासन करता था जिसका उल्लेख एरण की वराह-प्रतिमा लेख में है।

कुछ इतिहासकार भानुगुप्त की ‘राजा’ उपाधि के आधार पर उसे गुप्तों के अधीन स्थानीय शासक मानते हैं। संभवतः भानुगुप्त भी हूणों के विरुद्ध युद्ध में मार डाला गया।

कुमारगुप्त तृतीय

नरसिंहगुप्त के बाद उसका पुत्र कुमारगुप्त तृतीय मगध के सिंहासन पर बैठा। पहले इसे भ्रमवश सारनाथ अभिलेख में उल्लिखित कुमारगुप्त द्वितीय माना जाता था। भितरी और नालंदा से प्राप्त मुहरों के अनुसार कुमारगुप्त तृतीय नरसिंहगुप्त का पुत्र और विष्णुगुप्त का पिता था। उसने सोने के सिक्कों को प्रचलित किया और ‘क्रमादित्य’ की उपाधि धारण की। उसकी स्वर्ण मुद्राओं में मिलावट की अधिक मात्रा से लगता है कि इसके काल में गुप्त साम्राज्य तीव्रगति से पतन की ओर जा रहा था।

विष्णुगुप्त

कुमारगुप्त तृतीय के बाद उसका पुत्र विष्णुगुप्त अंतिम गुप्त शासक सिद्ध हुआ जिसका उल्लेख नालंदा से प्राप्त एक लेख में मिलता है। मुद्राओं पर उसकी उपाधि ‘चंद्रादित्य’ मिलती है। विष्णुगुप्त अयोग्य और दुर्बल शासक था। तोरमाण के नेतृत्व में हूणों ने ग्वालियर तथा मालवा के एक बड़े भूभाग पर अधिकार कर लिया। विष्णुगुप्त ने संभवतः 550 ई. तक शासन किया, किंतु इसके बाद गुप्त साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया।

गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण (Due to the Fall of the Gupta Empire)

परवर्ती गुप्त सम्राट और गुप्त राजवंश का अवसान (Later Gupta Emperors and the End of the Gupta Dynasty)
गुप्त राजवंश का अवसान

स्थापना काल से लेकर लगभग दो शताब्दियों तक गुप्त साम्राज्य प्रतिभाशाली गुप्त नरेशों के सफल संरक्षण में पल्लवित और पुष्पित होता रहा, किंतु 467 ई. में स्कंदगुप्त की मृत्यु के साथ ही इस विशाल साम्राज्य के उत्कर्ष-काल की भी इतिश्री हो गई। अब विघटन और हृास की विविध प्रवृत्तियाँ क्रियाशील हो गईं और गुप्त साम्राज्य के खंडहर पर अनेक छोटे-छोटे राज्य स्थापित होने लगे थे।

वस्तुतः गुप्त साम्राज्य का विघटन कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। इस विघटन के वास्तविक कारण वही थे, जो किसी भी साम्राज्य के विनाश के संबंध में लागू होते हैं। रमेशचंद्र मजूमदार का विचार है कि गुप्त साम्राज्य के विनाश में उन्हीं परिस्थितियों का योगदान था जो पहले मौर्य साम्राज्य तथा कालांतर में मुगल साम्राज्य के हृास में सक्रिय थे। इस विशाल साम्राज्य के अधःपतन के कुछ मूलभूत कारण इस प्रकार थे- बाह्य आक्रमण, अयोग्य तथा निर्बल उत्तराधिकारी, साम्राज्य का सामंत-संघीय संघटन, वंशानुगत आधार पर नियुक्ति, प्रांतपतियों के विशेषाधिकार, बौद्ध धर्म का प्रभाव, नवीन शक्तियों का उदय आदि।

बाह्य आक्रमण

गुप्त अभिलेखों से पता चलता है कि कुमारगुप्त के शासनकाल के अंतिम समय में गुप्त साम्राज्य पर बाह्य आक्रमण प्रारंभ हो गये थे। भितरी स्तंभ लेख से स्पष्ट है कि पुष्यमित्रों का आक्रमण विपत्तिजनक सिद्ध हुआ था। लगभग उसी समय हूणों का आक्रमण भी प्रारंभ हो गया था। किंतु स्कंदगुप्त के समय तक पुष्यमित्र या हूण गुप्तों का कुछ नहीं बिगाड़ सके। जूनागढ़ और भितरी लेखों से पता चलता है कि स्कंदगुप्त ने हूणों को सफलतापूर्वक खदेड़ दिया था। गुप्त शासकों ने उत्तरी-पश्चिमी सीमा को सुरक्षित रखने का कोई ठोस प्रबंध नहीं किया। स्कंदगुप्त के बाद हूण पुनः आक्रमण करने लगे और जैन लेखक सोमदेव के अनुसार वे चित्रकूट तक आ गये थे। रायचौधरी को कोशांबी से हूण शासक तोरमाण की एक मुद्रा प्राप्त हुई है। ह्वेनसांग की मानें तो बाद में मिहिरकुल के नेतृत्व में हूणों का दबाव और बढ़ता गया और गुप्त सम्राट नरसिंहगुप्त बालादित्य ने हूण नरेश को पराजित कर बंदी बना लिया था, किंतु राजमाता के अनुरोध पर उसे मुक्त कर दिया। अभिलेखीय साक्ष्यों से पता चलता है कि बुधगुप्त के बाद हूणों ने तोरमाण के नेतृत्व में एरण को जीत लिया। भानुगुप्त के काल में हूणों को खदेड़ने का प्रयत्न किया गया जिसमें उसका सेनापति गोपराज मारा गया।

इस प्रकार गुप्तों को निर्बल बनाने में हूणों का बड़ा हाथ अवश्य था, किंतु हूण आक्रमण को ही गुप्त साम्राज्य के पतन का सबसे मुख्य कारण नहीं माना जा सकता है। इसके अलावा अन्य भी कई कारण थे जिनसे गुप्त साम्राज्य का पतन संभव हुआ। वस्तुतः इस वंश के अयोग्य उत्तराधिकारी, आंतरिक मतभेद, यशोधर्मन का अर्थपूर्ण-गौरव-अभिमान और सामंत राज्यों तथा प्रांतपतियों द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा गुप्त साम्राज्य के पतन के नैमित्तिक कारण सिद्ध हुए।

अयोग्य तथा निर्बल उत्तराधिकारी

गुप्त साम्राज्य के पतन का तात्कालिक कारण स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारियों की अयोग्यता और दुर्बलता थी। गुप्तवंश के प्रारंभिक नरेश दूरदर्शी और शक्तिशाली थे, किंतु परवर्ती गुप्त नरेशों में वीरता और कार्य-कुशलता नहीं थी। तत्कालीन राजनैतिक वातावरण में जब साम्राज्य पर बाह्य और आंतरिक संकट के बादल छाये हुए थे, केवल दूरदर्शी और पराक्रमी शासक ही साम्राज्य को बचा सकते थे। किंतु परवर्ती गुप्त शासक अयोग्य तथा दुर्बल सिद्ध हुए जिससे गुप्त साम्राज्य का विघटन अवश्यसंभावी हो गया।

गुप्तवंश में आरंभ से ही आंतरिक कलह होने के प्रमाण मिलते हैं। उत्तराधिकार के निश्चित नियमों के अभाव में गुप्तवंश के राजकुमारों में आंतरिक कटुता बनी रहती थी। आंतरिक झगड़ों से गुप्त साम्राज्य में कई बार विपत्तिजनक स्थिति उत्पन्न हो गई थी। जब हूणों के आक्रमण और सामन्तों के विद्रोह से गुप्त साम्राज्य की शक्ति क्षीण हो रही थी, उस समय राजकुमारों ने पारस्परिक एकजुटता न दिखाकर कलह और विवाद का वातावरण पैदा किया जो अंततः साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुआ।

सामंत-संघीय संघटन

गुप्त प्रशासन का स्वरूप संघात्मक था। अभिलेखों से पता चलता है कि गुप्तकाल में सामंतवाद का विकास हो चुका था और अनेक सामंत शासक अपने-अपने क्षेत्रों में शासन करते थे। गुप्तकालीन सामंत विशेषाधिकारों से युक्त थे। उन्हें सेना रखने, भूमिकर वसूलने और यहाँ तक कि भूमिदान देने का भी अधिकार प्राप्त था। इसके बदले उन्हें एक निश्चित राशि सम्राट को भेंट करनी पड़ती थी और आवश्यकता के समय राजा की सैनिक सहायता करनी पड़ती थी।

सामंतवाद की यह प्रथा गुप्त साम्राज्य की स्थिरता के लिए घातक सिद्ध हुई। स्कंदगुप्त तक तो ये सामंत दबे रहे, किंतु जैसे ही गुप्तों की शक्ति कमजोर हुई, इन सामंतों ने स्वतंत्र शासकों जैसा आचरण करना आरंभ कर दिया। इतना ही नहीं, गुप्त शासकों की दुर्बलता का लाभ उठाकर अनेक सामंतों ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया जिसके परिणामस्वरूप गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया।

गुप्त प्रशासन में ऊँचे-ऊँचे पद प्रायः वंशानुगत होते थे। हरिषेण, जो महादंडनायक के पद पर नियुक्त था, का पिता ध्रुवभूति भी इसी पद कार्य कर चुका था। उदयगिरि गुहालेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय का सचिव वीरसेन शैव आनुवांशिक रूप से इसी पद पर कार्य कर रहा था (अन्वयप्राप्त साचिव्यो व्यापृतसान्धिविग्रहः)। करमदंडा लेख से स्पष्ट है कि कुमारगुप्त का मंत्री पृथ्वीसेन अपने पिता के बाद इस पद पर नियुक्त हुआ था। आनुवांशिक आधार पर नियुक्ति करने से कभी-कभी अयोग्य व्यक्ति भी इन पदों पर नियुक्त हो जाते थे जिससे प्रशासनिक शिथिलता आना स्वाभाविक था। इन पदाधिकारियों की सफलता पूर्णतया सम्राट की योग्यता पर निर्भर करती थी। सम्राट के दुर्बल होने पर इन पदाधिकारियों की अयोग्यता राज्य की एकता और स्थायित्व के लिए अधिक घातक सिद्ध हुई।

प्रांतपतियों के विशेषाधिकार

गुप्त अभिलेखों से पता चलता है कि राजकुमारों के अलावा सुयोग्य और विश्वस्त कर्मचारी भी प्रांतपतियों और सामंतों के पद पर नियुक्त किये जाते थे। ये प्रांतपति और सामंत अपने-अपने क्षेत्रों में सम्राट की तरह ठाट-बाट से रहते थे। उन्हें नृप, महाराज, उपरिक महाराज आदि उपाधियों को धारण करने का अधिकार भी प्राप्त था। प्रांतपति भी अपने क्षेत्रों में जनता से कर वसूल करते थे और अपनी सेना तक रखते थे। केंद्रीय शक्ति के दुर्बल होते ही इन कर्मचारियों का आचरण राज्य-विरोधी हो जाता था। अग्रहार दान की प्रथा से भी गुप्तों को हानि उठानी पड़ी। अग्रहार भूमिदान में दानग्राही को उस भूमि पर सभी प्रकार का राजनैतिक और प्रशासनिक अधिकार प्राप्त हो जाता था, जिससे राज्य के भीतर राज्य की स्थिति उत्पन्न हुई। गया जिले के अमौना से प्राप्त एक ताम्रपत्र कुमारामात्य महाराजनंदन ने गुप्त संवत् 232 (551 ई.) में बिना गुप्त सम्राट का उल्लेख किये प्रवर्तित किया था। इससे स्पष्ट है कि इस तिथि के पूर्व गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया था। यदि सामन्ती प्रथा और अग्रहार प्रथा को समाप्त कर सभी भुक्तियों एवं विषयों में सीधा नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया जाता, तो यह गुप्त साम्राज्य के हित में होता।

आर्थिक कारण

गुप्त साम्राज्य के पतन का एक प्रमुख कारण परवर्ती काल की जर्जर अर्थव्यवस्था थी। हूणों के आक्रमण और अत्यधिक भूमि अनुदानों के कारण गुप्त साम्राज्य की आर्थिक स्थिति डावाँडोल हो गई थी। राजनीतिक अशांति के कारण व्यापार-वाणिज्य की भी हानि हुई। सामंती प्रथा के कारण भी केंद्रीय राजस्व की भारी क्षति हो रही थी, जिससे केंद्रीय कोष खाली हो गया। गुप्त सम्राट सैन्यशक्ति के लिए अपने सामंतों की सेना पर ही आश्रित थे, जिसके कारण सामंतों के ऊपर गुप्त सम्राट का कोई नियंत्रण नहीं रहता था। आवश्यकता पड़ने पर सामंतों की एकत्रित सेना में भी कोई तालमेल नहीं होता था। इसके अलावा सामंत सेना के सैनिकों की निष्ठा अपने स्वामी सामंत के प्रति होती थी और वे अपने स्वामी के हित का ही ध्यान रखते थे।

बौद्ध धर्म का आलिंगन

कुछ इतिहासकारों के अनुसार गुप्त साम्राज्य के पतन का कारण परवर्ती गुप्त शासकों द्वारा बौद्ध धर्म का आलिंगन था। इन इतिहासकारों का मानना है कि आरंभिक गुप्त शासक वैष्णव धर्मानुयायी होने के कारण ही धरणिबंध तथा कृत्स्नपृथ्वीजय के आदर्श से प्रेरित थे। बौद्ध धर्म का अनुयायी होने के कारण परवर्ती गुप्त नरेशों ने बौद्ध संस्थाओं और विहारों को अत्यधिक धन दान दिया, जिससे राजकोष खाली हो गया। इन नरेशों की शांति और अहिंसा की नीति से सैनिक शक्ति कुण्ठित हो गई और गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया।

किंतु यह मत पूर्वाग्रहपूर्ण प्रतीत होता है क्योंकि इसी काल में सबसे पहले बड़े पैमाने पर मंदिरों के निर्माण का दावा किया जाता है। सही तो यह है कि इस काल में ब्राह्मणों को सबसे अधिक भूमिदान दिये गये, किंतु पता नहीं किन कारणों से इनकी चर्चा नहीं की जाती है।

नवीन शक्तियों का उदय

गुप्त साम्राज्य आंतरिक-विच्छेद तथा बाह्य आक्रमणों से दुर्बल हो चुका था। प्रांतीय क्षत्राप तथा सामंत प्रायः स्वतंत्र शासकों की भाँति व्यवहार कर रहे थे। कुछ ही दिनों में यशोधर्मन ने सम्राट के विरुद्ध विद्रोह कर विजयों का सिलसिला आरंभ कर दिया। यशोधर्मन के सैन्य-अभियान से गुप्त साम्राज्य को भारी आघात पहुँचा। उसने गुप्तों की गिरती हुई शक्ति का लाभ उठाया और गुप्तों के अधिकांश क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। मंदसौर के स्तंभ-लेख से पता चलता है कि जिन प्रदेशों के ऊपर गुप्त नरेशों ने अपने प्रताप से शासन नहीं किया था, उन प्रदेशों पर भी उसने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। नरसिंहगुप्त बालादित्य ने मिहिरकुल को पराजित कर गुप्त साम्राज्य की साख को बचाने का सफल प्रयत्न किया। बाद में मौखरियों तथा परवर्ती गुप्तों की उभरती शक्ति और कुछ सीमा तक बंग तथा गौड़ का राजनीतिक शक्तियों के रूप में उत्थान अधीश्वर गुप्तों के पतन में सर्वाणिक महत्त्वपूर्ण कारक थे।

इस प्रकार लगभग तीन सौ वर्ष तक शासन करने वाले गुप्तवंश के अधःपतन में उत्तराधिकारियों की दुर्बलता, आंतरिक झगड़ों, सामंत-संघीय संगठन, बाह्य आक्रमण, राजनीतिक भूलों, सामंतवादी व्यवस्था और अनेक नवीन शक्तियों के उदय जैसे अनेक ऐतिहासिक कारकों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जिन्होंने गुप्त साम्राज्य को अतीत की वस्तु बना दिया।

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