सोलह महाजनपद (The Sixteen Mahajanapadas)

सोलह महाजनपद (The Sixteen Mahajanapadas)
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत की राजनीतिक दशा आरंभिक भारतीय इतिहास में छठी शताब्दी […]

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छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत की राजनीतिक दशा

आरंभिक भारतीय इतिहास में छठी शताब्दी ईसा पूर्व को एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण परिवर्तनकारी काल माना जाता है। यह काल प्रायः आरंभिक राज्यों, नगरों, लोहे के बढ़ते प्रयोग और सिक्कों के विकास के साथ जुड़ा हुआ है। लौह-तकनीक और मुद्राओं के व्यापक प्रयोग से भौतिक जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया और स्थायी कृषि-जीवन की प्रवृत्ति और अधिक सुदृढ़ हुई। इसी काल में बौद्ध तथा जैन धर्म सहित अनेक श्रमण दार्शनिक विचारधाराओं का उदय और विकास हुआ। उत्तर वैदिक काल में राज्यों या प्रशासनिक इकाइयों के रूप में जनपदों का उल्लेख मिलता है। वस्तुतः कृषि, उद्योग, व्यापार और वाणिज्य आदि के क्रमिक विकास के कारण ग्रामीण जीवन से नागरिक जीवन की ओर एक स्पष्ट खिसकाव हुआ, और ईसा पूर्व छठी सदी तक आते-आते यही जनपद अपेक्षाकृत बड़े और शक्तिशाली महाजनपदों के रूप में विकसित हो गए।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व की राजनीतिक दशा का सम्पूर्ण और स्पष्ट विवरण किसी एक ग्रंथ में उपलब्ध नहीं है, किंतु बौद्ध और जैन धर्म के कुछ प्रारंभिक ग्रंथों में कुल सोलह महाजनपदों का नामोल्लेख हुआ है। इनका नामकरण अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न-भिन्न है, जिसका कारण संभवतः भिन्न-भिन्न समय पर होने वाला राजनीतिक परिवर्तन और उन-उन सूची-निर्माताओं का सीमित भौगोलिक ज्ञान है। इसी संदर्भ में वैयाकरण पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी में बाईस महाजनपदों का उल्लेख किया है, जिनमें से मगध, कोशल तथा वत्स को उन्होंने विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण बताया है।

छठी शताब्दी ईसापूर्व में भारत (India in the 6th century BCE)
छठी शताब्दी ईसापूर्व में भारत

सोलह महाजनपद

सोलह महाजनपदों का उल्लेख और स्रोत

भारत के सोलह महाजनपदों का उल्लेख ईसा पूर्व छठी शताब्दी से भी पहले का प्रतीत होता है। बौद्ध ग्रंथ ‘अंगुत्तर निकाय’ में सोलह महाजनपदों का सुव्यवस्थित उल्लेख मिलता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि गौतम बुद्ध के उदय से कुछ समय पूर्व समस्त उत्तरी भारत सोलह बड़े राज्यों में विभक्त था। अंगुत्तर निकाय की सूची के अनुसार इन सोलह महाजनपदों के नाम इस प्रकार हैं- काशी, कोशल, अंग, मगध, वज्जि, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवंति, गांधार और कंबोज। इसके विपरीत ‘जनवसभसुत्त’ नामक ग्रंथ में केवल बारह राज्यों के ही नाम प्राप्त होते हैं। ‘चुल्लनिद्देश’ नामक ग्रंथ की सूची में सोलह महाजनपदों में कलिंग को अतिरिक्त रूप से जोड़ा गया है, तथा गांधार के स्थान पर योन का उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार ‘महावस्तु’ नामक ग्रंथ में गांधार और कंबोज के स्थान पर क्रमशः शिवि तथा दशार्ण का उल्लेख मिलता है। किंतु इन समस्त उपलब्ध सूचियों में अंगुत्तर निकाय की सूची ही सर्वाधिक प्रामाणिक और स्वीकृत मानी जाती है।

जैन ग्रंथ ‘भगवतीसूत्र’ में भी महाजनपदों की एक पृथक् सूची प्राप्त होती है, किंतु इस सूची में नाम कुछ भिन्न प्रतीत होते हैं, जैसे अंग, बंग, मगह (मगध), मलय, मालव, अच्छ, वच्छ (वत्स), कोच्छ, पाढ्य, लाढ़, वज्जि, मोलि (मल्ल), काशी, कोशल, अवध और सम्भुत्तर। प्रसिद्ध इतिहासकार हेमचंद्र रायचौधरी का अनुमान है कि भगवतीसूत्र में जिन राज्यों का उल्लेख हुआ है, वे वस्तुतः सुदूर-पूर्व और सुदूर-दक्षिण भारत की तत्कालीन राजनैतिक स्थिति के सूचक हैं। इन महाजनपदों के भौगोलिक विस्तार से यह भी प्रतीत होता है कि ये अंगुत्तर निकाय में उल्लिखित राज्यों की अपेक्षा कुछ परवर्ती काल के हैं। यह उल्लेखनीय है कि अंगुत्तर निकाय में वर्णित सोलह महाजनपद बुद्ध के काल से भी पूर्व विद्यमान थे, क्योंकि गौतम बुद्ध के समय तक काशी का राज्य कोशल में और अंग का राज्य मगध में पूर्णतः सम्मिलित कर लिया गया था। इसी प्रकार संभवतः अश्मक महाजनपद को भी अवंति द्वारा विजित करके अपने साम्राज्य में मिला लिया गया था।

राजतंत्र और गणतंत्र की शासन-व्यवस्था

महाजनपद काल के इन सोलह महाजनपदों में मुख्यतः दो प्रकार की भिन्न-भिन्न शासन-प्रणालियाँ प्रचलित थीं। अंग, मगध, काशी, कोशल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवंति, गांधार और कंबोज जैसे अधिकांश महाजनपदों में राजतंत्रीय व्यवस्था प्रचलित थी, जबकि वज्जि एवं मल्ल जैसे कुछ महाजनपद गण अथवा संघ की सामूहिक व्यवस्था के अधीन थे। राजतंत्रीय महाजनपदों का संपूर्ण शासन एक ही राजा द्वारा संचालित होता था, परंतु गण और संघ के राज्यों में विशिष्ट कुलों के प्रमुखों का एक समूह सामूहिक रूप से शासन का संचालन करता था, और इस समूह का प्रत्येक सदस्य स्वयं में ‘राजा’ कहलाता था। इस प्रकार की गणतांत्रिक व्यवस्था प्राचीन भारत की राजनीतिक विविधता का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती है।

काशी महाजनपद

काशी महाजनपद प्राचीन काल में वर्तमान वाराणसी एवं उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में विस्तृत था। इसकी राजधानी वाराणसी थी, जो उत्तर में वरुणा और दक्षिण में असी नामक नदियों से घिरी हुई थी। इसकी ऐतिहासिक पुष्टि पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में भारत आने वाले चीनी यात्री फाहियान के यात्रा-विवरण से भी होती है। वायु, ब्रह्मांड, मत्स्य, मार्कंडेय तथा पद्म पुराणों में काशी की गणना मध्यदेशीय जनपदों के अंतर्गत की गई है। पुराणों के अनुसार काशी को बसाने वाले पुरुरवा के वंशज राजा ‘काश’ थे, इसीलिए उनके वंशज ‘काशि’ कहलाए और संभवतः यही कारण है कि इस जनपद का नाम ‘काशी’ पड़ गया। यह भी मान्यता है कि काशी भगवान शंकर के त्रिशूल पर स्थित है, इसीलिए इसे पृथ्वी से पृथक् एक विशिष्ट क्षेत्र माना जाता है।

जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ के पिता अश्वसेन काशी के प्रसिद्ध राजाओं में गिने जाते हैं। बौद्ध ग्रंथों से यह भी ज्ञात होता है कि काशी तथा कोशल के बीच दीर्घकाल तक निरंतर संघर्ष चलता रहा और एक समय काशी के राजा ब्रह्मदत्त ने कोशल को पराजित करके अपने अधीन कर लिया था। किंतु अंततः कोशल-नरेश कंस ने काशी को जीतकर उसे अपने राज्य में स्थायी रूप से सम्मिलित कर लिया। हेमचंद्र रायचौधरी ने वाराणसी की तुलना प्राचीन बेबीलोन तथा मध्यकालीन रोम जैसे महान नगरों से की है, जो इस नगर के ऐतिहासिक वैभव का सूचक है।

कोशल महाजनपद

अंगुत्तर निकाय के अनुसार बुद्धकाल से पूर्व कोशल की गणना उत्तर भारत के प्रमुखतम महाजनपदों में होती थी, जिसकी राजधानी अयोध्या तथा साकेत थी। यह जनपद सरयू नदी के तटवर्ती प्रदेश में बसा हुआ था, जिसमें वर्तमान उत्तर प्रदेश के अयोध्या (फैजाबाद), अंबेडकरनगर, गोंडा, बहराइच एवं जौनपुर के कुछ क्षेत्र सम्मिलित थे। पालि ग्रंथों में इसे ‘सुंदरिका’ नाम से भी संबोधित किया गया है। अयोध्या, साकेत और श्रावस्ती इस महाजनपद के प्रमुख नगर थे, जिनमें अयोध्या को कोशल की प्राचीनतम राजधानी होने का श्रेय प्राप्त है, जबकि साकेत इसकी द्वितीय राजधानी के रूप में प्रसिद्ध रही। बुद्ध के समय में साकेत और श्रावस्ती दोनों की गणना तत्कालीन छह प्रमुख महानगरों में की जाती थी।

ईसा पूर्व छठी शताब्दी में कोशल की राजधानी श्रावस्ती में स्थानांतरित हो चुकी थी, जिसके भग्नावशेष वर्तमान गोंडा के समीप सहेत-महेत नामक स्थल से प्राप्त हुए हैं। जातक ग्रंथों में कोशल के एक अन्य नगर सेतव्या का भी उल्लेख मिलता है। महावग्ग जातक में काशिराज ब्रह्मदत्त द्वारा कोशल पर आक्रमण की चर्चा प्राप्त होती है। कालांतर में कोशल की शक्ति निरंतर बढ़ती गई और इसने काशी पर पूर्ण अधिकार स्थापित कर लिया, जिसका श्रेय कोशल-नरेश कंस को दिया जाता है। बुद्ध के पूर्व कोशल का शासक महाकोशल था, जिसने अपनी पुत्री महाकोशला अथवा कोशलदेवी का विवाह मगध नरेश बिंबिसार के साथ संपन्न कराया था, जो उस समय की महत्त्वपूर्ण राजनीतिक-वैवाहिक कूटनीति का उदाहरण है। बुद्ध का समकालीन कोशल का प्रसिद्ध राजा प्रसेनजित था। छठी और पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में कोशल, मगध के समान ही एक अत्यंत शक्तिशाली और समृद्ध राज्य माना जाता था।

अंग महाजनपद

प्राचीन भारत के अंग महाजनपद में आधुनिक भागलपुर, मुंगेर और उससे संलग्न बिहार तथा पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्र सम्मिलित थे। रामायण में अंग की स्थापना का श्रेय अनंग नामक राजा को दिया गया है, जबकि महाभारत तथा मत्स्य पुराण में इसकी स्थापना का श्रेय स्वयं अंग नामक व्यक्ति को दिया गया है। इस महाजनपद की राजधानी चंपा नगरी चंपा नदी के तट पर स्थित थी। चंपा का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है, जबकि महाभारत तथा पुराणों में इसका प्राचीन नाम ‘मालिनी’ प्राप्त होता है। दीघनिकाय से यह भी ज्ञात होता है कि चंपा नगर की सुव्यवस्थित योजना प्रसिद्ध वास्तुकार महागोविंद ने तैयार की थी। बुद्धकाल में चंपा की गणना तत्कालीन छह प्रसिद्ध महानगरों में की जाती थी।

मगध का पड़ोसी महाजनपद होने के कारण अंग और मगध के बीच दीर्घकाल तक निरंतर आपसी प्रतिद्वंद्विता और संघर्ष चलता रहा। प्रारंभ में इस जनपद के राजा ब्रह्मदत्त ने मगध के राजा भट्टिय को पराजित करके मगध के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर लिया था। विधुरपंडित जातक के अनुसार राजगृह मूलतः अंग राज्य का ही नगर था। किंतु कालांतर में अंग की शक्ति क्रमशः क्षीण होती गई और अंततः इस महाजनपद को पूर्णरूपेण मगध साम्राज्य में विलीन कर लिया गया।

मगध महाजनपद

मगध महाजनपद वर्तमान बिहार प्रांत के पटना, गया और शाहाबाद जैसे क्षेत्रों में विस्तृत था। मगध महाजनपद की सीमा उत्तर में गंगा नदी से लेकर दक्षिण में विंध्य पर्वत तक, पूर्व में चंपा तथा पश्चिम में सोन नदी तक फैली हुई थी। बौद्ध काल तथा उसके बाद के परवर्ती काल में उत्तरी भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली जनपद मगध ही सिद्ध हुआ। जैन साहित्य के ग्रंथ प्रज्ञापणसूत्र में अनेक स्थलों पर मगध तथा उसकी राजधानी राजगृह का उल्लेख मिलता है। रामायण में इसकी स्थापना का श्रेय ब्रह्मा के पुत्र वसु को दिया गया है, और इसी आधार पर इसे ‘वसुमती’ भी कहा गया है। इसके विपरीत पौराणिक वर्णनों से यह भी पता चलता है कि इसकी वास्तविक स्थापना कुशाग्र नामक राजा ने की थी।

मगध तथा अंग परस्पर पड़ोसी राज्य थे, और चंपा नदी इन दोनों राज्यों के बीच एक प्राकृतिक विभाजक रेखा का कार्य करती थी। उत्तर वैदिक काल तक मगध आर्य सभ्यता के मुख्य प्रभाव-क्षेत्र से बाहर ही रहा था, और अभिधान चिंतामणि नामक ग्रंथ में इसे ‘कीकट’ नाम से संबोधित किया गया है। विश्वस्फटिक नामक राजा ने मगध में पहली बार वर्ण-व्यवस्था की परंपरा प्रचलित करके आर्य सभ्यता का प्रचार-प्रसार किया था। बुद्ध के समय तक मगध एक अत्यंत शक्तिशाली तथा सुसंगठित राजतंत्र बन चुका था। इस समय मगध में पहले बिंबिसार और तत्पश्चात् उसके पुत्र अजातशत्रु का शासन स्थापित हुआ। बिंबिसार ने गिरिव्रज, जिसे आज राजगीर कहा जाता है, को अपनी राजधानी बनाया था। कालांतर में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में स्थानांतरित हो गई। परवर्ती शताब्दियों में इस जनपद की राजनीतिक और सैन्य शक्ति निरंतर बढ़ती गई, और अंततः मगध का इतिहास ही संपूर्ण भारतवर्ष के इतिहास का पर्याय बन गया।

वज्जि गणराज्य

वज्जि गणराज्य प्राचीन भारत के एक महत्त्वपूर्ण राज्य-संघ का अभिन्न अंग था। यह महाजनपद गंगा नदी एवं नेपाल की तराई के मध्य वर्तमान मुजफ्फरपुर क्षेत्र में विस्तृत था। इस राज्य-संघ के कुल आठ सदस्य कुल थे, जिन्हें ‘अट्ठकुल’ कहा जाता था, जिनमें मिथिला के विदेह, वैशाली के लिच्छवि तथा कुंडपुर के ज्ञातृक विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। मिथिला की पहचान नेपाल की सीमा पर स्थित वर्तमान जनकपुर से की जाती है। प्रारंभ में विदेह में राजतंत्रात्मक व्यवस्था प्रचलित थी, किंतु कालांतर में यह भी गणतांत्रिक संघ में सम्मिलित हो गया। वैशाली की पहचान उत्तरी बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के वर्तमान बसाढ़ नामक स्थल से की जाती है, जबकि कुंडग्राम वैशाली के अत्यंत निकट स्थित था, जिसकी पहचान क्षत्रियकुंड से की जाती है।

जैन तीर्थंकर महावीर स्वयं कुंडग्राम के ज्ञातृकगण के प्रधान सिद्धार्थ के पुत्र थे और उनकी माता त्रिशला वैशाली के लिच्छविगण की राजकुमारी थीं। इस संघ के अन्य सम्मिलित राज्यों में संभवतः उग्र, भोग, इक्ष्वाकु तथा कौरव भी सम्मिलित थे। बुद्ध के काल तक वज्जि गणराज्य एक अत्यंत शक्तिशाली और सुसंगठित गण-संघ के रूप में विद्यमान था।

मल्ल गणसंघ

मल्ल गणसंघ पूर्वी उत्तर प्रदेश के वर्तमान देवरिया एवं गोरखपुर जनपद के क्षेत्रों में विस्तृत था। वज्जियों के समान ही मल्ल भी एक गणतांत्रिक संघ राज्य था। वाल्मीकि रामायण से यह ज्ञात होता है कि रामचंद्र ने अपने भाई लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु के लिए इस दिव्य नगरी को बसाया था। बौद्ध साहित्य के अनुसार मल्लों की दो प्रमुख शाखाएँ थीं- कुशीनारा, जिसे कुशावती भी कहा जाता है तथा पावा। कुशीनारा की पहचान वर्तमान देवरिया से लगभग चौंतीस किलोमीटर उत्तर स्थित कसया के अनुरुधवा गाँव के टीले से की जाती है। मल्लों की द्वितीय राजधानी पावा की पहचान देवरिया जिले के पडरौना से की जाती है, यद्यपि कुछ विद्वान इसका तादात्म्य कसया के दक्षिण-पूर्व स्थित फाजिल नगर से भी करते हैं।

विदेह की भाँति ही यहाँ भी प्रारंभ में राजतंत्रात्मक शासन प्रचलित था, किंतु परवर्ती काल में इसका स्वरूप गणतांत्रिक हो गया। बौद्ध तथा जैन दोनों साहित्यिक परंपराओं में मल्लों और लिच्छवियों के मध्य पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। बुद्धकाल तक मल्लों का स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व बना रहा, किंतु कालांतर में यह भी मगध की सुनियोजित विस्तारवादी नीति का शिकार होकर उसमें विलीन हो गया।

चेदि महाजनपद

चेदि राज्य आधुनिक बुंदेलखंड क्षेत्र में यमुना नदी के दक्षिण में चंबल और केन नदियों के मध्य विस्तृत था। चेतिय जातक में इसकी राजधानी सोत्थिवती, जिसे शुक्तिमती भी कहा जाता है, बताई गई है। अंगुत्तर निकाय में उल्लिखित चेदि प्रदेश के ‘सहजाति’ नामक नगर का समीकरण महाभारत में वर्णित शुक्तिमती से किया जाता है। विष्णु पुराण में चेदिराज शिशुपाल का उल्लेख मिलता है, जिसे महाभारतकालीन भगवान कृष्ण का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बताया गया है। चेतिय जातक में यहाँ के एक राजा का नाम उपरिचर मिलता है और महाभारत में भी उपरिचर का उल्लेख चेदिराज के रूप में हुआ है। संभवतः प्रसिद्ध कलिंगराज खारवेल भी इसी वंश परंपरा से संबंधित राजा थे। विशाखदत्त रचित मुद्राराक्षस नाटक में मलयकेतु की सेना में खस, मगध, यवन, शक और हूण जनजातियों के साथ-साथ चेदि लोगों का नाम भी उल्लिखित मिलता है।

वत्स महाजनपद

वत्स महाजनपद वर्तमान प्रयागराज (इलाहाबाद) एवं बाँदा के आसपास के क्षेत्रों में विस्तृत था। पालि ग्रंथों में इसे ‘वंस’ तथा जैन साहित्य में ‘वच्छ’ नाम से संबोधित किया गया है। इसकी राजधानी कोशांबी की पहचान इलाहाबाद से लगभग अड़तालीस किलोमीटर पश्चिम यमुना के बाएँ तट पर स्थित वर्तमान कोसम नामक स्थल से की जाती है। रामायण तथा महाभारत में कोशांबी की स्थापना का श्रेय कुशांब नामक राजा को दिया गया है। विष्णुपुराण से यह भी ज्ञात होता है कि हस्तिनापुर के राजा निचक्षु ने हस्तिनापुर के गंगा की बाढ़ में बह जाने के पश्चात् कोशांबी को अपनी नई राजधानी बनाया था।

गौतम बुद्ध के समय वत्स देश का शासक पौरववंशी राजा उदयन था, जिसने अवंति-नरेश चंडप्रद्योत की पुत्री वासवदत्ता के साथ विवाह किया था, जो उस युग की एक प्रसिद्ध राजनीतिक-वैवाहिक घटना मानी जाती है। कोशांबी में किए गए पुरातात्त्विक उत्खनन में श्रेष्ठि घोषित द्वारा निर्मित विहार, नगर की सुरक्षा-परिखा तथा राजा उदयन के राजप्रासाद के महत्त्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस महाजनपद के ऐतिहासिक अस्तित्व की प्रामाणिक पुष्टि करते हैं।

कुरु महाजनपद

कुरु महाजनपद में वर्तमान थानेश्वर, मेरठ और दिल्ली के क्षेत्र सम्मिलित थे। इसकी राजधानी इंद्रप्रस्थ (आधुनिक दिल्ली) थी, जबकि महाभारत-काल में कुरु जनपद की राजधानी हस्तिनापुर, जो वर्तमान मेरठ जिले में स्थित है, हुआ करती थी। कुरु का निकटवर्ती और घनिष्ठ जनपद पांचाल था, इसीलिए प्राचीन साहित्य में इन दोनों को प्रायः साथ-साथ उल्लिखित किया गया है। कुरु के शासकों के राजनीतिक तथा वैवाहिक संबंध यादवों, भोजों तथा पांचालों से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे। बुद्धकाल में यहाँ का शासक कोरव्य नामक राजा था। प्रारंभ में कुरु एक विशुद्ध राजतंत्रात्मक राज्य था, किंतु परवर्ती काल में यहाँ भी गणतंत्र की स्थापना हुई।

पांचाल महाजनपद

पांचाल महाजनपद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली, बदायूँ, एटा, मैनपुरी और फर्रुखाबाद जिलों में विस्तृत था। ‘पांचाल’ नाम वस्तुतः पाँच प्राचीन कुलों- क्रीवि, केशी, सृंजय, तुर्वस तथा सोमक का सामूहिक नाम था। महाभारत तथा बौद्ध ग्रंथों से यह भी ज्ञात होता है कि इसकी भी दो प्रमुख शाखाएँ थीं- उत्तरी पांचाल तथा दक्षिणी पांचाल और गंगा नदी इन दोनों के मध्य एक प्राकृतिक विभाजक रेखा का कार्य करती थी। उत्तरी पांचाल हिमालय की तलहटी से लेकर गंगा के उत्तरी तट तक विस्तृत था, जिसकी राजधानी अहिच्छत्र या छत्रवती अथवा टॉलमी द्वारा उल्लिखित अदिसद्र थी, जिसके अवशेष वर्तमान रामनगर, बरेली से प्राप्त हुए हैं। दक्षिणी पांचाल गंगा के दक्षिणी तट से लेकर चर्मण्वती (चंबल) नदी तक विस्तृत था और उसकी राजधानी काम्पिल्य थी, जिसकी पहचान फर्रुखाबाद जिले में फतेहगढ़ के निकट स्थित कंपिल से की जाती है। ब्राह्मण, बौद्ध तथा जैन तीनों परंपराओं के ग्रंथों में पांचाल के शासक चूलिन ब्रह्मदत्त का उल्लेख मिलता है। शतपथ ब्राह्मण में पांचाल की ‘परिचक्रा’ नामक नगरी का उल्लेख है, जिसकी पहचान महाभारत की ‘एकचक्रा’ नगरी से की जा सकती है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में कुरु तथा पांचाल का एक संयुक्त संघ-राज्य विद्यमान था।

मत्स्य महाजनपद

मत्स्य, जिसे मच्छ भी कहा जाता है, महाजनपद वर्तमान राजस्थान के अलवर, भरतपुर तथा जयपुर जिलों में विस्तृत था। इसकी राजधानी विराटनगर, जो आधुनिक बैराट के नाम से जाना जाता है, की स्थापना विराट नामक राजा ने की थी। भागवत तथा विष्णु पुराण में मत्स्य जनपद का उल्लेख राजा वसु के पाँच पुत्रों में से एक के रूप में हुआ है। महाभारत में सहज नामक राजा को मत्स्य एवं चेदि दोनों राज्यों पर एक साथ शासन करते हुए वर्णित किया गया है। दीघनिकाय में मत्स्य जनपद का उल्लेख शूरसेन के साथ संयुक्त रूप से मिलता है। यह उल्लेखनीय है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का एक वर्ष मत्स्य देश में राजा विराट के दरबार में रहकर व्यतीत किया था। बुद्धकाल में इस महाजनपद का राजनीतिक दृष्टि से कोई विशेष महत्त्व नहीं रह गया था।

शूरसेन महाजनपद

शूरसेन उत्तरी भारत का एक अत्यंत प्रसिद्ध महाजनपद था, जो वर्तमान ब्रजमंडल क्षेत्र में विस्तृत था और इसकी राजधानी मथुरा थी। प्राचीन यूनानी लेखकों ने इस राज्य को ‘शूरसेनोई’ तथा इसकी राजधानी को ‘मेथोरा’ नाम से संबोधित किया है। महाभारत तथा पुराणों के अनुसार यहाँ यदु (यादव) वंश का शासन था और भगवान कृष्ण स्वयं यहाँ के राजा माने जाते थे। यदुवंश आगे वीतिहोत्र, सात्वत आदि अनेक उपकुलों में विभक्त था। बुद्ध के समय यहाँ का शासक अवंतिपुत्र था, जिसकी सक्रिय सहायता से मथुरा में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार संभव हो सका। मज्झिमनिकाय के अनुसार अवंतिपुत्र का जन्म अवंति-नरेश प्रद्योत की पुत्री के गर्भ से हुआ था। मेगस्थनीज के समय तक मथुरा कृष्णोपासना का एक प्रमुख धार्मिक केंद्र बन चुका था। प्रारंभ में यहाँ गणतंत्रात्मक व्यवस्था प्रचलित थी, किंतु परवर्ती काल में राजतंत्र की स्थापना हुई।

अश्मक महाजनपद

प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदों में अश्मक एकमात्र ऐसा महाजनपद था, जो विंध्य पर्वत श्रृंखला के दक्षिण में स्थित था। बौद्ध साहित्य के ग्रंथ सुत्तनिपात में अश्मक को गोदावरी नदी के तट पर स्थित बताया गया है। वायु पुराण और महाभारत में भी अश्मक नामक एक राजा का उल्लेख मिलता है और संभवतः इसी राजा के नाम पर यह जनपद ‘अश्मक’ कहलाया। प्रारंभ में अश्मक निवासी गोदावरी के तट पर ही बसे हुए थे, और पोतलि अथवा पैठान, जिसे प्रतिष्ठानपुर भी कहा जाता है, इनकी राजधानी थी। पुराणों के अनुसार इक्ष्वाकु वंश के राजाओं ने ही अश्मक में राजतंत्रात्मक व्यवस्था की स्थापना की थी। ग्रीक लेखकों ने ‘अस्सकेनोई’ अर्थात् अश्वकों का उल्लेख उत्तर-पश्चिमी भारत के संदर्भ में भी किया है। अस्सक जातक में पोतलि नगर की गणना काशी के अंतर्गत की गई है। बुद्ध के काल से पूर्व अश्मक का अवंति के साथ निरंतर संघर्ष चलता रहा, और अंततः बुद्ध के समय में अवंति ने इसे पूर्णतः विजित करके अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।

अवंति महाजनपद

अवंति महाजनपद को जैन ग्रंथ भगवतीसूत्र में ‘मालव’ नाम से संबोधित किया गया है और जैन ग्रंथ विविधतीर्थकल्प में भी मालवा प्रदेश का प्राचीन नाम अवंति ही मिलता है। इस महाजनपद में स्थूल रूप से वर्तमान मालवा, निमाड़ और मध्य प्रदेश के मध्यवर्ती भाग सम्मिलित थे। पुराणों के अनुसार अवंति की स्थापना यदुवंशी क्षत्रियों द्वारा की गई थी। संभवतः अवंति जनपद दो प्रमुख भागों में विभाजित था- उत्तरी अवंति और दक्षिणी अवंति। उत्तरी अवंति की राजधानी उज्जयिनी थी, जबकि दक्षिणी अवंति की राजधानी महिष्मती थी। अवंतिका अथवा उज्जयिनी की गणना भारत के मुक्तिदायक सात पवित्र नगरों में की जाती है। पुराणों से यह भी ज्ञात होता है कि पुलिक अथवा पुणिक नामक व्यक्ति ने अपने स्वामी की हत्या करके अपने पुत्र प्रद्योत को सिंहासन पर अभिषिक्त किया था। बुद्ध के समय अवंति का शासक चंडप्रद्योत था। भास द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक स्वप्नवासवदत्ता से यह भी ज्ञात होता है कि प्रद्योत की पुत्री वासवदत्ता के साथ वत्सराज उदयन ने विवाह किया था। जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन् से यह स्पष्ट होता है कि मगध और अवंति के मध्य दीर्घकाल तक निरंतर राजनीतिक संघर्ष चलता रहा।

गांधार महाजनपद

गांधार महाजनपद वर्तमान पाकिस्तान के पश्चिमी तथा अफगानिस्तान के पूर्वी क्षेत्रों में विस्तृत था और इस प्रदेश का मुख्य केंद्र वर्तमान पेशावर के आसपास स्थित था। इसकी राजधानी तक्षशिला की पहचान रावलपिंडी से लगभग उन्नीस किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित शाह की ढेरी नामक स्थल से की जाती है। कथा के अनुसार केकय-नरेश युधाजित् के आग्रह पर रामचंद्र के भाई भरत ने गंधर्व देश को विजित करके यहाँ तक्षशिला और पुष्कलावती नामक दो प्रसिद्ध नगरों की स्थापना की थी। तक्षशिला प्राचीन काल से ही शैक्षिक तथा व्यापारिक गतिविधियों का एक प्रमुख और प्रतिष्ठित केंद्र रहा है। धम्मपदट्ठकथा से यह भी ज्ञात होता है कि कोशल-नरेश प्रसेनजित् की शिक्षा-दीक्षा तक्षशिला में ही संपन्न हुई थी। यहाँ का शासक पुष्करसारिन मगध के शासक बिंबिसार का समकालीन था, जिसने अपना एक दूत-मंडल मगध-नरेश के राजदरबार में भेजा था, जो उस काल में विभिन्न महाजनपदों के बीच स्थापित कूटनीतिक संबंधों का प्रमाण है।

कंबोज महाजनपद

बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय एवं पाणिनि की अष्टाध्यायी में कंबोज की गणना पंद्रह शक्तिशाली जनपदों में की गई है। बौद्ध ग्रंथ अस्सलायनसुत्त तथा सम्राट अशोक के शिलालेखों में ‘योनकंबोजेसु’, ‘योनकंबोजगंधारयेसु’ (धौली शिलालेख) तथा ‘योनकंबोजगंधाराणाम्’ (गिरनार शिलालेख) जैसे उल्लेख मिलते हैं, जिससे यह प्रतीत होता है कि कंबोज गांधार के अत्यंत निकट और उससे संलग्न प्रदेश था। प्राचीन वैदिक साहित्य से यह भी ज्ञात होता है कि कंबोज देश का विस्तार उत्तर में कश्मीर से लेकर हिंदुकुश पर्वत तक था। राजपुर, द्वारका तथा कपिशी इसके प्रमुख नगर थे। कंबोजाल्लुक सूत्र से यह भी पता चलता है कि प्रसिद्ध वैयाकरण पाणिनि स्वयं कंबोज के सन्निकट प्रदेश के ही निवासी थे। चतुर्थ शताब्दी ईसा पूर्व में कंबोज में एक संघ अथवा गणराज्य की स्थापना भी की गई थी, क्योंकि कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कंबोजों को ‘वार्ताशस्त्रोपजीवी संघ’ अर्थात् कृषि और शस्त्र-विद्या दोनों के माध्यम से जीविका अर्जित करने वाला संघ कहा गया है।

सोलह महाजनपद (The Sixteen Mahajanapadas)
सोलह महाजनपदों कई स्थिति

भौगोलिक विस्तार और सांस्कृतिक एकता

इस प्रकार छठी शताब्दी ईसा पूर्व के समस्त सोलह महाजनपद वर्तमान उत्तरी अफगानिस्तान से लेकर बिहार तक, तथा हिंदुकुश पर्वत से लेकर गोदावरी नदी तक के विशाल भू-भाग में फैले हुए थे। बौद्ध निकायों में समूचे भारत को पाँच प्रमुख भौगोलिक भागों में विभाजित किया गया है- उत्तरापथ (पश्चिमोत्तर भाग), मध्यदेश, प्राची (पूर्वी भाग), दक्षिणापथ तथा अपरांत (पश्चिमी भाग)। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता की अवधारणा ईसा पूर्व छठी सदी से ही परिकल्पित थी। जैन ग्रंथ भगवतीसूत्र और सूत्रकृतांग, पाणिनि की अष्टाध्यायी, बौधायन धर्मसूत्र तथा महाभारत में उपलब्ध विभिन्न जनपद-सूचियों पर सूक्ष्म दृष्टिपात करने से यह भी ज्ञात होता है कि उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक तथा पश्चिम में गांधार प्रदेश से लेकर पूर्व में असम तक का विशाल भू-भाग इन महाजनपदों से आच्छादित था।

सोलह महाजनपद से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQS

1. सोलह महाजनपद कौन-कौन से थे?

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में उत्तर भारत और उससे जुड़े क्षेत्रों में अंग, मगध, काशी, कोशल, वज्जि, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवंति, गांधार और कंबोज प्रमुख महाजनपद थे। इनकी प्रसिद्ध सूची बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में मिलती है।

 2. ‘महाजनपद’ से क्या तात्पर्य है?

‘महाजनपद’ का अर्थ विस्तृत या शक्तिशाली जनपद है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक कृषि के विस्तार, लोहे के बढ़ते उपयोग, जनसंख्या वृद्धि, व्यापार, नगरीकरण और राजनीतिक संगठन के विकास से अनेक जनपद शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्यों में परिवर्तित हुए, जिन्हें महाजनपद कहा गया।

3. सोलह महाजनपदों की जानकारी के प्रमुख स्रोत कौन-से हैं?

सोलह महाजनपदों की सबसे प्रसिद्ध सूची बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में मिलती है। इसके अतिरिक्त महावस्तु तथा जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में भी महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। विभिन्न ग्रंथों की सूचियों में कुछ भिन्नताएँ पाई जाती हैं।

4. महाजनपदों का उदय कब हुआ?

महाजनपदों का उदय मुख्यतः छठी शताब्दी ईसा पूर्व में हुआ। इस समय कृषि उत्पादन में वृद्धि, लोहे के व्यापक उपयोग, व्यापार एवं नगरीकरण के विकास तथा राजनीतिक केंद्रीकरण ने बड़े राज्यों के निर्माण को बढ़ावा दिया।

5. सोलह महाजनपदों में सबसे शक्तिशाली कौन-सा था?

मगध धीरे-धीरे सबसे शक्तिशाली महाजनपद बनकर उभरा। इसकी सफलता में उपजाऊ भूमि, लौह संसाधनों, हाथियों की उपलब्धता, अनुकूल भौगोलिक स्थिति तथा बिंबिसार और अजातशत्रु जैसे शासकों की विस्तारवादी नीतियों का महत्वपूर्ण योगदान था।

6. कौन-कौन से महाजनपद गण-संघात्मक व्यवस्था वाले थे?

वज्जि और मल्ल प्रमुख गण-संघात्मक राजनीतिक इकाइयाँ थीं। वज्जि संघ का प्रमुख केंद्र वैशाली था। इन राजनीतिक व्यवस्थाओं में शासन किसी एक वंशानुगत राजा के बजाय गण या कुलीन समूहों की सामूहिक सत्ता पर आधारित था।

7. दक्षिण भारत की ओर स्थित प्रमुख महाजनपद कौन-सा था?

अश्मक सोलह महाजनपदों में दक्षिण की ओर स्थित प्रमुख महाजनपद था। इसका क्षेत्र मुख्यतः गोदावरी नदी के आसपास माना जाता है।

8. मगध महाजनपद की राजधानी कहाँ थीं?

मगध महाजनपद की राजधानी राजगृह थी, बाद में पाटलिपुत्र इसकी राजधानी बनीं।

9. महाजनपदों के उदय का ऐतिहासिक महत्त्व क्या था?

महाजनपदों के उदय से बड़े राज्यों, संगठित प्रशासन, कर-व्यवस्था, सेनाओं, नगरों और व्यापार का विकास हुआ। इसने मगध के उदय तथा बौद्ध-जैन धर्मों के प्रसार की पृष्ठभूमि तैयार की।
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