प्राचीन भारत में गणराज्य
आरंभ में साम्राज्यवादी इतिहासकारों की धारणा थी कि भारत में सदैव निरंकुश राजाओं का ही शासन रहा है और भारतवासी प्राचीनकाल से ही निरंकुशता के अभ्यस्त रहे हैं। यह धारणा न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से भ्रामक थी, अपितु औपनिवेशिक शासन को वैधता प्रदान करने के राजनीतिक उद्देश्य से भी प्रेरित थी। इस मिथ्या धारणा को बनाए रखना ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हित में था, क्योंकि इससे यह प्रतीत होता था कि भारतीय जनता स्वशासन के लिए अनुपयुक्त है। किंतु 1903 ई. में ब्रिटिश विद्वान रीज डेविड्स की महत्त्वपूर्ण खोजों से यह स्पष्ट हो गया कि प्राचीन भारत में राजतंत्रों के साथ-साथ गणराज्यों का भी सुदृढ़ अस्तित्व था। इस खोज ने प्राचीन भारतीय राजनीति के विषय में प्रचलित भ्रांत धारणाओं को जड़ से उखाड़ फेंका और भारत के गौरवशाली लोकतांत्रिक इतिहास को नए सिरे से प्रकाश में लाया।
काशीप्रसाद जायसवाल पहले भारतीय इतिहासकार हैं जिन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘हिंदू पॉलिटी’ में विस्तारपूर्वक बताया कि प्राचीन काल में भारत में दो प्रकार के राज्य थे- एक राजाधीन (राजतंत्र) और दूसरे गणाधीन (गणतंत्र)। राजाधीन को एकाधीन भी कहते थे, क्योंकि इसमें शासन की समस्त शक्ति एक ही व्यक्ति में केंद्रित होती थी। इसके विपरीत जहाँ गण अर्थात् अनेक व्यक्तियों की सामूहिक सभा द्वारा शासन संचालित होता था, वे गणाधीन राज्य कहलाते थे। जायसवाल की इस खोज ने भारतीय इतिहास-लेखन की दिशा ही बदल दी और औपनिवेशिक इतिहासकारों के एकांगी दृष्टिकोण को चुनौती दी।
प्राचीन साहित्यिक स्रोतों में गणराज्यों का उल्लेख
प्राचीन भारत में गणराज्यों के अस्तित्व की पुष्टि अनेक साहित्यिक स्रोतों से होती है। द्वितीय शताब्दी ईस्वी के बौद्ध ग्रंथ अवदानशतक से पता चलता है कि जब मध्यदेश के कुछ व्यापारी दक्षिण भारत गए और वहाँ के लोगों ने उनकी राज्य-व्यवस्था के बारे में जिज्ञासावश पूछा, तो उन्होंने बताया कि कुछ देश गणों के अधीन हैं और कुछ राजा के। यह विवरण इस बात का प्रमाण है कि उस काल में राजतंत्र और गणतंत्र दोनों प्रकार की शासन-प्रणालियाँ इतनी सामान्य और प्रसिद्ध थीं कि आम व्यापारी भी उनके अंतर को भली-भाँति जानते थे।
जैन ग्रंथ आचारांगसूत्र में भिक्षुओं को स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि उन्हें ऐसे स्थानों पर जाने से बचना चाहिए जहाँ गणतंत्र का शासन हो। यह उल्लेख यद्यपि नकारात्मक संदर्भ में है, फिर भी गणतंत्रों के व्यापक भौगोलिक विस्तार और उनकी सामाजिक-राजनीतिक विशिष्टता का महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है। प्रसिद्ध वैयाकरण पाणिनि ने अपनी कृति अष्टाध्यायी में संघ को राजतंत्र से भिन्न संस्था के रूप में परिभाषित किया है और गण को संघ का पर्याय बताया है। पाणिनि का यह व्याकरणिक विश्लेषण इस बात का प्रमाण है कि गणतंत्रीय संस्थाएँ इतनी व्यापक और सुदृढ़ थीं कि उन्हें स्वतंत्र व्याकरणिक पारिभाषिक उपचार की आवश्यकता अनुभव हुई।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में संघ-राज्यों का वर्गीकरण
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में गणराज्यों का अत्यंत व्यवस्थित और विस्तृत वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। इस महान राजनीतिशास्त्र में दो प्रकार के संघ-राज्यों का उल्लेख मिलता है। प्रथम वर्ग ‘वार्ताशस्त्रोपजीवी’ कहलाता था अर्थात् ऐसे राज्य जो व्यापार, कृषि, पशुपालन तथा युद्ध पर आश्रित थे। इस वर्ग में कंबोज तथा सुराष्ट्र के क्षत्रियों का उल्लेख है। ये राज्य अपनी आर्थिक और सैन्य गतिविधियों से स्वयं को पोषित करते थे तथा गणतांत्रिक ढंग से शासित होते थे।
द्वितीय वर्ग ‘राजशब्दोपजीवी’ था अर्थात् ऐसे संघ-राज्य जो राजा की उपाधि तो धारण करते थे, किंतु वास्तव में उनका शासन गणतंत्रात्मक पद्धति से ही संचालित होता था। इस वर्ग में लिच्छवियों, वृज्जियों, मल्लों, मद्रों, कुकुरों और पांचालों आदि की गणना की गई है। वस्तुतः ‘संघ’ और ‘गण’ दोनों पद समानार्थक थे और ये संस्थाएँ देश के अनेक भागों में विभिन्न रूपों में प्रचलित थीं। कौटिल्य का यह वर्गीकरण न केवल गणराज्यों की विविधता का प्रमाण है, बल्कि यह भी पता चलता है कि चाणक्य जैसा व्यावहारिक राजनीतिज्ञ इन संस्थाओं को गंभीरता से लेता था।
यूनानी-रोमन साक्ष्य और मुद्राशास्त्रीय प्रमाण
यूनानी और रोमन लेखकों ने भी प्राचीन भारत में गणराज्यों के अस्तित्व को स्वीकार किया है। उनके विवरणों से ज्ञात होता है कि सिकंदर के आक्रमण (326 ई.पू.) के समय पंजाब तथा सिंधु क्षेत्र में अनेक गणराज्य विद्यमान थे, जो राजतंत्रों से स्पष्टतः भिन्न थे। सिकंदर को वापस लौटते समय मालव, अंबष्ठ और क्षुद्रक जैसे प्रजातांत्रिक राज्यों का सामना करना पड़ा था। इनमें से मालवों के साथ तो सिकंदर का इतना भीषण युद्ध हुआ कि स्वयं सिकंदर घायल हो गया था, जो इन गणराज्यों की अदम्य स्वाधीनता-प्रेम की भावना का प्रमाण है।
यूनानी दूत मेगस्थनीज, जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में रहा था, ने अपनी कृति ‘इंडिका’ में लिखा है कि उसके समय में बहुत से भारतीय नगरों में गणतंत्रात्मक शासन प्रचलित था। मुद्राशास्त्रीय साक्ष्य भी गणराज्यों की ऐतिहासिक वास्तविकता को प्रमाणित करते हैं। मालव, अर्जुनायन और यौधेय जैसे गणराज्यों के प्राप्त सिक्कों पर किसी राजा के नाम का नहीं, अपितु गण का ही उल्लेख मिलता है, जैसे ‘मालवानां जयः’ अर्थात् मालव गण की जय। यह मुद्राशास्त्रीय प्रमाण इस बात की पुष्टि करता है कि ये राज्य वास्तव में गणतंत्रात्मक चेतना से संचालित थे और उनकी सामूहिक पहचान किसी व्यक्ति में नहीं, अपितु समूह में निहित थी।
इस प्रकार स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में गणराज्य विद्यमान थे और वे इस अर्थ में राजतंत्रों से भिन्न थे कि उनका शासन किसी वंशानुगत राजा द्वारा न होकर गण अथवा संघ द्वारा संचालित होता था। परंतु प्राचीन भारत के गणतंत्र आधुनिक काल के गणतंत्र से इस अर्थ में भिन्न थे कि उनमें शासन का संचालन संपूर्ण प्रजा द्वारा न होकर कुल-विशेष के प्रमुख व्यक्तियों द्वारा किया जाता था।
बुद्धकालीन गणराज्य
प्राचीन ग्रंथों से ज्ञात होता है कि भगवान महावीर और गौतम बुद्ध के काल में उत्तर-पूर्वी भारत में अनेक गणराज्य विद्यमान थे। यह काल ईसा पूर्व छठी-पाँचवीं शताब्दी का है, जो भारतीय इतिहास में महाजनपद-युग के नाम से विख्यात है। इस समय लिच्छवि, विदेह, शाक्य, मल्ल, कोलिय, मोरिय, बुलि और भग्ग जैसे अनेक गणराज्य तिरहुत से लेकर कपिलवस्तु तक विस्तृत भू-भाग पर फैले हुए थे। बुद्धकालीन प्रमुख गणराज्यों में कपिलवस्तु के शाक्यों एवं वैशाली के लिच्छवियों के अलावा सुमसुमार पर्वत के भग, केसपुत्त के कालाम, रामग्राम के कोलिय, कुशीनारा के मल्ल, पावा के मल्ल, पिप्पलिवन के मोरिय और अलकप्प के बुलि विशेष महत्त्व के थे। इन गणराज्यों ने न केवल राजनीतिक, अपितु सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी उस युग को गहराई से प्रभावित किया।
कपिलवस्तु के शाक्य
नेपाल की तराई में स्थित शाक्य गणराज्य की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। इस गणराज्य के उत्तर में हिमालय पर्वत की विशाल श्रृंखला थी, पूर्व में रोहिणी नदी प्रवाहित होती थी तथा दक्षिण और पश्चिम में राप्ती नदी इसकी प्राकृतिक सीमा निर्धारित करती थी। इसकी राजधानी कपिलवस्तु थी, जिसकी पहचान नेपाल के आधुनिक तिलौराकोट से की जाती है। कुछ इतिहासकार इसकी पहचान उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के पिपरहवा नामक स्थान से भी करते हैं, जहाँ से बौद्ध स्तूप एवं धातुगर्भ-मंजूषा के महत्त्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए हैं। 1898 ई. में पिपरहवा में हुई खुदाई में एक पाषाण-पेटिका मिली थी, जिस पर अंकित लेख में उसे शाक्यमुनि बुद्ध की अस्थियों का पात्र बताया गया है। यह पुरातात्त्विक खोज कपिलवस्तु की पहचान को और भी पुष्ट करती है।
पालि ग्रंथों के अनुसार शाक्य इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रिय थे। कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि शाकवन के निकट होने के कारण इन्हें शाक्य नाम मिला, जबकि कपिल ऋषि के आश्रम के निकट होने के कारण यह नगर कपिलवस्तु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार शाक्य गणराज्य में लगभग अस्सी हजार परिवार निवास करते थे, जो उस युग के मानदंडों पर एक अत्यंत समृद्ध और घनी आबादी वाला गणराज्य था।
इस गणराज्य का ऐतिहासिक महत्त्व इसलिए अत्यंत विशिष्ट है क्योंकि स्वयं गौतम बुद्ध का जन्म यहीं लुंबिनी में हुआ था। उनके पिता शुद्धोदन इस गणराज्य के प्रमुख थे और माता महामाया देवदह नगर की राजकुमारी थीं। इस गणराज्य के अन्य नगरों में चातुमा, सामगाम, खोमदुस्स, सिलावती, नगरक, देवदह और शक्कर सम्मिलित थे। राजनीतिक शक्ति की दृष्टि से शाक्य गणराज्य कभी अत्यंत प्रभावशाली नहीं रहा और यह कोशल राज्य की अधीनता स्वीकार करता था।
शाक्यों को अपने रक्त की शुद्धता पर अत्यधिक अभिमान था। यही कारण था कि जब कोशल नरेश प्रसेनजित ने शाक्य राजकुमारी से विवाह का प्रस्ताव भेजा, तो शाक्यों ने भयवश उस प्रस्ताव को स्वीकार तो कर लिया, किंतु एक दासी की पुत्री वासभखत्तिया को राजकुमारी बताकर प्रसेनजित की सेवा में भेज दिया। यह छल अंततः शाक्यों के विनाश का कारण बना, क्योंकि कहा जाता है कि इस गणराज्य का अंत वासभखत्तिया के पुत्र विडूडभ के हाथों हुआ, जिसने अपनी माता के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए शाक्यों पर भीषण आक्रमण किया और उनके गणराज्य को नष्ट कर दिया।
वैशाली के लिच्छवि
बुद्ध के समय में प्राचीन भारत का सबसे बड़ा और शक्तिशाली गणराज्य बिहार में स्थित वैशाली के लिच्छवियों का था। वैशाली को प्राचीन भारत का प्रथम गणराज्य होने का गौरव प्राप्त है। लिच्छवि गणराज्य की राजधानी वैशाली थी, जिसका समीकरण आधुनिक मुजफ्फरपुर जिले के बसाढ़ ग्राम से किया जाता है। यह नगर अपने काल में इतना भव्य और समृद्ध था कि इसे देखकर यूनानी आक्रमणकारी भी विस्मित हो जाते थे। इस राज्य की स्थापना सूर्यवंशीय राजा इक्ष्वाकु के पुत्र विशाल ने की थी और इसी के नाम पर यह नगर वैशाली कहलाया।
बौद्ध, जैन एवं ब्राह्मण- तीनों परंपराओं के साहित्य में लिच्छवियों को अभिजात कुल के क्षत्रिय के रूप में वर्णित किया गया है। महापरिनिब्बाणसुत्त के अनुसार लिच्छवियों ने भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के पश्चात् उनके अवशेषों पर अपना अधिकार जताते हुए क्षत्रिय होने के आधार पर माँग की थी। सिगाल जातक में एक लिच्छवि कन्या को ‘क्षत्रिय पुत्री’ कहा गया है। जैन साहित्य में भी लिच्छवियों को क्षत्रिय बताया गया है- स्वयं भगवान महावीर की माता त्रिशला लिच्छवि राजकुमारी थीं और उन्हें क्षत्राणी की उपाधि दी गई है। ब्राह्मण ग्रंथ भी इसी मत का समर्थन करते हैं। सातवीं शताब्दी ई. में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी लिच्छवियों को क्षत्रिय स्वीकार किया है। ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण यह तथ्य है कि ईसा पूर्व सातवीं शताब्दी में वैशाली का लिच्छवि राज्य राजतंत्र से गणतंत्र में रूपांतरित हो गया, जो विश्व इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना है।

लिच्छवियों ने महात्मा बुद्ध के निवास और उपदेश के लिए महावन में प्रसिद्ध कूटागारशाला का निर्माण करवाया था, जो उनकी सांस्कृतिक उदारता और बौद्ध धर्म के प्रति श्रद्धा का परिचायक है। लिच्छवि शासक चेटक की पुत्री चेलना का विवाह मगध नरेश बिंबिसार से हुआ था, जो इस गणराज्य के राजनीतिक महत्त्व को दर्शाता है। चेटक स्वयं भगवान महावीर के मातुल (मामा) थे, जो लिच्छवियों के जैन धर्म से गहरे संबंध को प्रकट करता है। लिच्छवि अपनी शक्ति और प्रतिष्ठा से मगध के उदीयमान साम्राज्य के विस्तार में बाधक थे, किंतु वे अपनी स्वतंत्रता की रक्षा में कभी पीछे नहीं रहे। उन्होंने कभी मल्लों के साथ और कभी अन्यान्य गणों के साथ मिलकर एक शक्तिशाली संघ का निर्माण किया, जो वज्जिसंघ के नाम से इतिहास में अमर हो गया।
मिथिला के विदेह
बिहार के मिथिला क्षेत्र में, जो वर्तमान दरभंगा और उसके आसपास के जिलों में फैला हुआ था, विदेह गणराज्य स्थित था। इस राज्य में प्रारंभ में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी, जो बुद्धकाल में संघ-शासन में रूपांतरित हो गई। विदेह के लोग वज्जिसंघ के सक्रिय सदस्य थे। इसकी राजधानी मिथिला थी, जिसका समीकरण वर्तमान नेपाल के जनकपुर से किया जाता है। महाजनक जातक में मिथिला को समृद्ध, विशाल, सभी ओर से प्रकाशमान तथा सुंदर तोरणद्वारों से सुसज्जित नगर के रूप में वर्णित किया गया है। इस जातक के अनुसार मिथिला नगर की स्थापना विदेह ने की थी।
विदेह गणराज्य राजनीतिक दृष्टि से सुदृढ़ था और समकालीन राजवंशों से उसके वैवाहिक संबंध भी थे, जो उसकी राजनयिक महत्ता को प्रकट करते हैं। मगध नरेश बिंबिसार की एक रानी वैदेही थीं। नाटककार भास के प्रसिद्ध नाटक स्वप्नवासवदत्ता के अनुसार स्वयं वत्सराज उदयन वैदेहीपुत्र थे। भगवान महावीर की माता त्रिशला भी विदेह राजकुमारी थीं। बुद्ध के काल में मिथिला एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र के रूप में भी विख्यात था। विदेह की ऐतिहासिकता रामायण काल से भी जुड़ती है, जहाँ राजा जनक के साथ इस क्षेत्र का नाम अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
सुस्सुमार पर्वत के भग
सुस्सुमार पर्वत का समीकरण वर्तमान मिर्जापुर जिले के चुनार से किया जाता है। भग गणराज्य का अधिकार-क्षेत्र विंध्य प्रदेश की यमुना और सोन नदियों के मध्यवर्ती भू-भाग में फैला हुआ था। यह क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था क्योंकि यह दो प्रमुख नदियों के बीच स्थित था। संभवतः भग लोगों का संबंध ऐतरेय ब्राह्मण में उल्लिखित भर्ग वंश से था। भग लोग वत्स जनपद की अधीनता स्वीकार करते थे, इसका प्रमाण यह है कि वत्सराज उदयन का पुत्र बोधिकुमार सुस्सुमारगिरि में निर्मित कोकनद नामक भव्य भवन में निवास करता था।
अलकप्प के बुलि
बुलियों का प्राचीन गणराज्य बिहार के शाहाबाद, आरा और मुजफ्फरपुर जिलों के मध्यवर्ती क्षेत्र में स्थित था। बुलियों का अपनी राजधानी वेठद्वीप के साथ घनिष्ठ ऐतिहासिक संबंध था। कुछ विद्वान वेठद्वीप का समीकरण कसिया से भी करते हैं। महापरिनिब्बाणसुत्त से यह महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है कि भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात् उनके पवित्र अस्थि-अवशेष प्राप्त कर बुलियों ने अलकप्प में एक भव्य स्तूप का निर्माण करवाया था। यह तथ्य बुलियों की बुद्ध के प्रति गहरी श्रद्धा और उनके शाक्यों से संबंधित होने का भी संकेत देता है।
केसपुत्त के कालाम
केसपुत्त का गणराज्य संभवतः कोशल जनपद के पश्चिम में स्थित था और इसका विस्तार सुल्तानपुर जिले के कुंडवार से लेकर पालिया नामक स्थान तक था। वैदिक साहित्य से ज्ञात होता है कि कालाम लोगों का संबंध पांचाल जनपद के केशियों से था। इस गणराज्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक योगदान यह है कि इसके प्रसिद्ध आचार्य आलार कालाम से, जो उरुवेला के समीप निवास करते थे, गौतम बुद्ध ने अपनी ज्ञान-यात्रा में प्रथम उपदेश ग्रहण किया था। आलार कालाम ध्यान-साधना में इतने निपुण थे कि बुद्ध को भी उनसे शिक्षा लेने की आवश्यकता अनुभव हुई। इस गणराज्य के एक अन्य विद्वान् आचार्य भरण्डु का आश्रम कपिलवस्तु में था। केसपुत्तियसुत्त के विवरण से लगता है कि कालाम लोग कोशल राज्य की अधीनता स्वीकार करते थे।
रामगाम के कोलिय
शाक्य गणराज्य के पूर्व में रामगाम के कोलियों का गणराज्य स्थित था। कोलियों की राजधानी रामगाम की पहचान आधुनिक देवकाली ग्राम या वर्तमान रामपुर कारखाना (देवरिया) से की जाती है, किंतु कुछ विद्वानों के अनुसार इसका समीकरण वर्तमान गोरखपुर के रामगढ़ताल से किया जाना अधिक उचित प्रतीत होता है। पालि परंपरा के अनुसार कोलिय भी शाक्यों की भाँति इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रिय थे और परस्पर वैवाहिक संबंधों से भी जुड़े हुए थे। स्वयं गौतम बुद्ध की माता महामाया और उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी दोनों कोलिय राजकुमारियाँ थीं।
शाक्य और कोलिय गणराज्यों के बीच रोहिणी नदी प्रवाहित होती थी और दोनों राज्यों की जनता पेयजल एवं सिंचाई के लिए इसी नदी के जल पर निर्भर थी। इस जल-विभाजन को लेकर दोनों गणराज्यों में बारंबार संघर्ष होता रहता था। रुक्खधम्म तथा फंदन जातक से पता चलता है कि एक बार जब बुद्ध जेतवन में थे, उस समय शाक्यों और कोलियों के बीच जल-विवाद इतना उग्र हो गया था कि युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। किंतु बुद्ध ने स्वयं हस्तक्षेप कर इस संघर्ष को शांत कर दिया और रक्तपात से बचाया। यह घटना गणराज्यों की आपसी प्रतिस्पर्धा और बुद्ध के नैतिक प्रभाव दोनों का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
कुशीनारा के मल्ल
कुशीनारा का ऐतिहासिक समीकरण देवरिया से लगभग 34 किलोमीटर उत्तर में वर्तमान कसया के निकट स्थित अनुरुधवा ग्राम के टीले से किया जाता है। यह स्थल इसलिए अत्यंत पवित्र और महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहीं भगवान बुद्ध का 483 ई.पू. में महापरिनिर्वाण हुआ था। यहाँ से एक ताम्रपत्र मिला है, जिस पर ‘परिनिर्वाण चैत्य ताम्रपट्ट इति’ लेख उत्कीर्ण है। यहाँ से प्राप्त कुछ मुद्राओं पर ‘श्री महापरिनिर्वाण विहारे भिक्षुसंघस्य’ का लेख भी मिलता है, जो इस स्थल की पहचान को और अधिक प्रामाणिक बनाता है। वाल्मीकि रामायण में मल्लों को लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु मल्ल का वंशज बताया गया है, जो इनकी प्राचीनता और पौराणिक महत्ता को प्रमाणित करता है।
पावा के मल्ल
मल्लों की दूसरी शाखा का केंद्र पावा था, जिसकी पहचान आधुनिक देवरिया जिले के पडरौना से की जाती है। कुछ इतिहासकार इसकी पहचान फाजिल नगर से करने के पक्ष में भी हैं। यह स्थान इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहीं भगवान महावीर ने 527 ई.पू. में निर्वाण प्राप्त किया था। जैन साहित्य से ज्ञात होता है कि मगध नरेश अजातशत्रु के बढ़ते प्रभाव और शक्ति से भयभीत होकर मल्लों ने लिच्छवियों के साथ मिलकर एक रक्षात्मक संघ की स्थापना की थी। किंतु यह संघ अजातशत्रु की सैन्य शक्ति के सामने टिक नहीं सका और लिच्छवियों को पराजित करने के पश्चात् अजातशत्रु ने मल्लों को भी अपने अधीन कर लिया।
पिप्पलिवन के मोरिय
मोरिय गणराज्य प्राचीन भारत के इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है क्योंकि इसी गणराज्य से भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्य- मौर्य साम्राज्य की उत्पत्ति हुई। मोरिय गणराज्य के लोग शाक्यों की एक शाखा थे। महावंशटीका से पता चलता है कि कोशल नरेश विडूडभ के अत्याचारों से बचने के लिए शाक्यवंश के जो लोग हिमालय प्रदेश में पलायन कर गए थे, उन्होंने वहाँ मोरों की मधुर कूँक से गुंजायमान एक वन में पिप्पलिवन नामक नगर बसाया। मोरों के प्रदेश के निवासी होने के कारण ही ये लोग ‘मोरिय’ कहलाए। उनके इसी वंश-चिह्न मोर को बाद में मौर्य सम्राटों ने अपने साम्राज्य का प्रतीक बनाया।
महापरिनिब्बाणसुत्त के अनुसार भगवान बुद्ध के पवित्र अस्थि-अवशेषों पर अपना अधिकार जताने वालों में मोरिय भी थे, किंतु विलंब से पहुँचने के कारण वे अवशेष नहीं प्राप्त कर सके। उन्हें केवल अंगार (राख) प्राप्त हुई, जिस पर उन्होंने अपने नगर पिप्पलिवन में एक स्तूप का निर्माण करवाया। चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य इसी मोरिय गणराज्य में उत्पन्न हुए थे। यद्यपि पिप्पलिवन को गोरखपुर जिले के कुसुम्हीं के पास स्थित राजधानी नामक ग्राम से समीकृत किया जाता है, किंतु अनेक विद्वानों का मत है कि इसका समीकरण सिद्धार्थनगर के पिपरहवा से किया जाना अधिक तर्कसंगत और प्रमाण-सम्मत प्रतीत होता है।
गणराज्यों का शासन-विधान और प्रशासनिक संरचना
प्राचीन भारत के गणराज्यों की शासन-व्यवस्था अत्यंत सुव्यवस्थित और परिष्कृत थी। गण की कार्यपालिका का अध्यक्ष एक निर्वाचित पदाधिकारी होता था, जिसे गणराज्य का प्रमुख, नायक अथवा राजा की संज्ञा दी जाती थी। सामान्य प्रशासन के संचालन के साथ-साथ गणराज्य में आंतरिक शांति एवं सामंजस्य बनाए रखना उसका प्रमुख दायित्व था। कर-संग्रह तथा जनता के उपयोग के लिए मार्ग, सेतु आदि का निर्माण करवाना भी उसके कर्तव्यों में सम्मिलित था। अन्य प्रमुख पदाधिकारियों में उपराजा, सेनापति और भांडागारिक (कोषाध्यक्ष) का उल्लेख मिलता है।
सर्वोच्च गणसभा अथवा संस्थागार : प्राचीन संसद
गणराज्य की वास्तविक और सर्वोच्च शक्ति एक केंद्रीय सभा में निहित होती थी, जिसे गणसभा अथवा संस्थागार कहा जाता था। यह आधुनिक संसद के समतुल्य संस्था थी। इस सभा के सदस्यों की संख्या परंपरागत रूप से निर्धारित होती थी। वस्तुतः गण के निर्माण की मूल इकाई ‘कुल’ था और प्रत्येक कुल का एक प्रतिनिधि गणसभा का सदस्य होता था। गणसभा के प्रत्येक कुलवृद्ध या सदस्य की संघीय उपाधि ‘राजा’ होती थी।
एकपण्ण जातक के उल्लेखनीय विवरण के अनुसार लिच्छवि गणराज्य की केंद्रीय समिति में 7,707 राजा थे और उतनी ही संख्या में उपराजा, सेनापति और कोषाध्यक्ष भी थे। यह संख्या आधुनिक दृष्टि से आश्चर्यजनक प्रतीत होती है, किंतु यह लिच्छवि गणराज्य की व्यापक प्रशासनिक संरचना और उसकी लोकतांत्रिक भावना का परिचायक है। शाक्यों के संस्थागार के सदस्यों की संख्या 500 बताई गई है। लगता है कि लिच्छवि राज्य अनेक छोटी-छोटी प्रशासनिक इकाइयों में विभक्त था और प्रत्येक इकाई का अध्यक्ष एक राजा होता था, जो अपने अधीन पदाधिकारियों की सहायता से उस इकाई का शासन संचालित करता था।
संस्थागार की कार्यवाही
गणसभा में गण के समस्त प्रतिनिधियों को सम्मिलित होने का अधिकार था। चूँकि सदस्यों की संख्या कई हजार तक होती थी, इसलिए विशेष और महत्त्वपूर्ण अवसरों को छोड़कर उपस्थिति सीमित रहती थी। दैनंदिन शासन के लिए अंतरंग अधिकारी नियुक्त किए जाते थे, किंतु नीति-निर्माण और नियम-निर्धारण का पूर्ण दायित्व गणसभा पर ही था। इस सभा में राजनीतिक विषयों के साथ-साथ सामाजिक, व्यावहारिक और धार्मिक प्रश्न भी विचारार्थ प्रस्तुत किए जाते थे।
गणराज्यों से संबंधित सभी महत्त्वपूर्ण विषयों, जैसे संधि-विग्रह, कूटनीतिक संबंध और राजस्व-संग्रह पर गणसभा के सदस्य संस्थागार में उपस्थित होकर पर्याप्त वाद-विवाद के पश्चात् बहुमत से निर्णय करते थे। रोहिणी जल-विवाद और विडूडभ के आक्रमण के संकट-काल में शाक्यों ने अपनी राजधानी के केंद्रीय संस्थागार में एकत्रित होकर विस्तृत विचार-विमर्श के पश्चात् निर्णय लिया था। लिच्छवि गणराज्य में सेनापति खंड की मृत्यु के पश्चात् नए सेनापति सिंह की नियुक्ति संस्थागार के सदस्यों द्वारा निर्वाचन की प्रक्रिया से की गई थी। कुशीनारा के मल्लों ने भगवान बुद्ध के अंतिम संस्कार और उनकी धातुओं के वितरण के संबंध में भी अपने संस्थागार में विचार-विमर्श किया था। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि संस्थागार की कार्यवाही वास्तव में आधुनिक प्रजातंत्रात्मक संसद के समतुल्य थी।
संस्थागार की कार्यप्रणाली अत्यंत सुव्यवस्थित थी। प्रत्येक सदस्य के बैठने की व्यवस्था निर्धारित थी और ‘आसनपन्नापक’ नामक पदाधिकारी इस व्यवस्था का दायित्व संभालता था। कोरम-पूर्ति, प्रस्ताव-प्रस्तुति और मतगणना के लिए सुस्पष्ट और निश्चित नियम थे। गणसभा में नियमानुसार प्रस्ताव रखा जाता था और उसकी तीन वाचनाएँ होती थीं। विरोध होने पर शलाकाओं द्वारा गुप्त मतदान प्रणाली से निर्णय लिया जाता था। मतदान-अधिकारी को ‘शलाका-ग्राहक’ कहा जाता था और मत के लिए ‘छंद’ शब्द का प्रयोग होता था। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि अनुपस्थित सदस्यों के मत लेने के भी नियम थे। ‘गणपूरक’ नामक पदाधिकारी गणसभा का सचेतक था, जो बैठकों में कोरम पूर्ण करवाने का दायित्व निभाता था।
मंत्रिपरिषद् और कार्यपालिका की संरचना
गणराज्यों की समस्त गतिविधियों पर गणसभा का पूर्ण नियंत्रण होता था। इसके अतिरिक्त संभवतः एक मंत्रिपरिषद् भी होती थी, जिसमें चार से लेकर बीस सदस्य तक हो सकते थे। ‘गणाध्यक्ष’ ही इस मंत्रिपरिषद् का प्रधान होता था। राज्य के उच्च पदाधिकारियों, मंत्रियों तथा प्रादेशिक शासकों की नियुक्ति प्रायः गणसभा द्वारा की जाती थी। यही केंद्रीय गणसभा राष्ट्रीय न्यायाधिकरण अर्थात् सर्वोच्च न्यायालय के रूप में भी कार्य करती थी। इस प्रकार गणराज्यों में शासन की तीनों शाखाएँ- कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका एक सुनिश्चित संवैधानिक ढाँचे के अंतर्गत कार्यरत थीं।
न्याय-व्यवस्था
बुद्धघोष की प्रसिद्ध टीका सुमंगलविलासिनी से वज्जिसंघ की न्याय-व्यवस्था के विषय में अत्यंत महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इस संघ में कुल आठ न्यायालय थे और किसी व्यक्ति को तभी दंडित किया जा सकता था जब उसे एक-एक करके आठों न्यायालय दोषी सिद्ध कर दें। राजा का न्यायालय सर्वोच्च और अंतिम होता था। प्रत्येक न्यायालय अभियुक्त को निर्दोष पाए जाने पर मुक्त तो कर सकता था, किंतु दोष सिद्ध होने पर दंडित करने का अधिकार उसे नहीं था। वह उसे उच्चतर न्यायालय में प्रेषित करता था। दंड देने का अधिकार एकमात्र राजा को था। राजा दंड देते समय पूर्व-दृष्टांतों के संग्रह ‘पवेनिपोट्ठक’ का अनुसरण करता था।
इन न्यायालयों के प्रधान अधिकारी क्रमशः विनिच्चय महामात्त, वोहारिक, सूत्ताधार, अट्ठकुलक, भांडागारिक, सेनापति, उपराजा और अंत में राजा थे। वज्जि गणराज्य में अत्यंत गंभीर और जघन्य अपराध पर ही मृत्युदंड की व्यवस्था थी। यह बहुस्तरीय न्यायिक प्रणाली आधुनिक अपील की अवधारणा का प्राचीन प्रतिरूप है और प्राचीन भारत की विधिक चेतना का उत्कृष्ट उदाहरण है।
गणराज्यों की विशेषताएँ और सामाजिक-आर्थिक स्वरूप
प्राचीन ग्रंथों के विवरणों से ज्ञात होता है कि गणराज्य पर्याप्त समृद्ध और संपन्न थे। इन गणराज्यों में ग्राम पंचायतें भी होती थीं, जो राजतंत्रात्मक राज्यों की ग्राम पंचायतों की भाँति कार्य करती थीं और कृषि, उद्योग तथा व्यापार के विकास की देखभाल करती थीं। अधिकांश गणराज्य बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। महापरिनिर्वाणसूत्र के अनुसार भगवान बुद्ध ने वज्जिसंघ की कार्यप्रणाली की मुक्तकंठ से प्रशंसा की थी और उन्होंने अपने बौद्ध भिक्षुओं के संप्रदाय को ‘भिक्खु संघ’ की संज्ञा देकर गणतंत्रीय भावना को धार्मिक संस्था में भी प्रतिष्ठित किया।
युद्ध से गण की स्थिति सुदृढ़ नहीं रहती, इसलिए गणों ने प्रायः शांति और सह-अस्तित्व की नीति अपनाई। इन गणराज्यों के पास स्थायी नियमित सेना का अभाव था, किंतु इसकी क्षतिपूर्ति इस प्रकार होती थी कि गणराज्य का प्रत्येक नागरिक अस्त्र-शस्त्र की विद्या में दक्ष होता था और आवश्यकता पड़ने पर सैनिक का दायित्व निभाता था। जब तक गणराज्य संघ-जीवन के नियमों का पालन करते रहे और आपसी एकता बनाए रखी, वे अपराजेय बने रहे।
गणराज्यों का पतन
बुद्धकालीन सोलह महाजनपदों और गणतंत्रात्मक राज्यों की आपसी शत्रुता एवं संघर्ष के परिणामस्वरूप ईसा पूर्व छठी शताब्दी के उत्तरार्ध तक अनेक छोटे महाजनपद और गणतंत्र बड़े और शक्तिशाली महाजनपदों की विस्तारवादी नीति के शिकार बनकर या तो उनमें विलीन हो गए या महत्त्वहीन हो गए। कोशल ने काशी के गौरव को धूल में मिला दिया, तो मगध ने अंग के ऐश्वर्य का अंत कर दिया। अवंति ने चेदि के कुछ भाग पर अपना अधिकार स्थापित करते हुए वत्स की सीमा तक विस्तार कर लिया। बुद्धकाल तक आते-आते समस्त उत्तर भारत की राजनीतिक शक्ति केवल चार प्रमुख राजतंत्रों- कोशल, वत्स, अवंति और मगध के हाथों में सिमट गई। कोशल में प्रसेनजित, वत्स में उदयन, अवंति में चंडप्रद्योत और मगध में हर्यंककुलीय बिंबिसार अपनी-अपनी साम्राज्यवादी नीतियों से पड़ोसी राज्यों को अपनी अधीनता में लाने का प्रयास कर रहे थे।
गणराज्यों का महत्त्व और अंतिम पतन
भारतवर्ष में लगभग एक सहस्र वर्षों- ईसा पूर्व छठी शताब्दी से लेकर चौथी शताब्दी ईस्वी तक गणराज्यों के उत्थान और पतन का इतिहास मिलता है। नवीन पुरातात्त्विक उत्खननों में गणराज्यों के लेख, सिक्के और मिट्टी की मुहरें प्राप्त हुई हैं। विशेषकर यौधेय गणराज्य के संबंध में प्रामाणिक पुरातात्त्विक सामग्री उपलब्ध हुई है। गणराज्यों की छाया गुप्त साम्राज्य के उदयकाल तक दिखाई पड़ती है, जिसके पश्चात् धरणिबंध के आदर्श से प्रेरित समुद्रगुप्त के व्यापक सैनिक अभियानों ने अधिकांश गणराज्यों को गुप्त साम्राज्य में समाहित कर लिया।
भारतीय इतिहास के वैदिक युग में जनों अथवा गणों की प्रतिनिधि संस्थाएँ विदथ, सभा और समिति थीं। कालांतर में उन्हीं का स्वरूप वर्ग, श्रेणी, पूग और जनपद आदि में रूपांतरित होता गया। राजतंत्रात्मक और गणतंत्रात्मक परंपराओं के मध्य संघर्ष निरंतर चलता रहा- गणराज्य राजतंत्र में और राजतंत्र गणराज्य में परिवर्तित होते रहे। यह प्रक्रिया भारतीय राजनीतिक इतिहास की एक अनवरत गतिशीलता को प्रकट करती है।
गणराज्यों की एकाकीपन की नीति और उनके मध्य मतैक्य का अभाव उनके विनाश का प्रमुख कारण बना। मगध के महत्त्वाकांक्षी शासक अजातशत्रु ने, जो स्वयं वैदेहीपुत्र थे, गणराज्यों की स्वतंत्रता पर निर्णायक प्रहार किया। उन्होंने अपने कूटनीतिक सलाहकार वर्षकार (वस्सकार) की सहायता से वज्जिसंघ में फूट डाली और लिच्छवियों को पराजित करने के पश्चात् मल्लों को भी अपने अधीन कर लिया। अजातशत्रु और वर्षकार की यही नीति आगे चलकर चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य का आदर्श बनी। तत्पश्चात् साम्राज्यवादी शक्तियों का सर्वग्राही स्वरूप और प्रखर हो गया तथा अधिकांश गणतंत्र मौर्यों के विशाल एकात्मक शासन में विलीन हो गए।
गणराज्यों की विरासत
गणराज्यों की आत्मा को दबाना किसी के लिए भी संभव नहीं हुआ। सिकंदर की तलवार, अजातशत्रु का प्रहार, मौर्यों की शक्ति अथवा हिंद-यवनों और शक-कुषाणों की आक्रमणकारी बाढ़, इनमें से कोई भी गणतंत्रीय भावना को पूर्णतः नष्ट नहीं कर सका। ये आक्रमण उनमें से मात्र कुछ निर्बलों को ही विचलित कर सके। अपनी स्वतंत्रता का हर मूल्य चुकाने को तत्पर मल्लोई (मालव), यौधेय, मद्र और शिवि जैसे गण पंजाब से नीचे उतरकर राजपूताना में प्रवेश कर गए और वहाँ शताब्दियों तक अपने गणराज्य बनाए रखे। उन्होंने शाकल (आधुनिक स्यालकोट) जैसे अपने प्राचीन नगरों का मोह छोड़कर माध्यमिका तथा उज्जयिनी जैसे नए नगरों की स्थापना की, अपने विशिष्ट सिक्के प्रचलित किए और अपने-अपने गणों की विजयकामना अपने सिक्कों पर ‘मालवानां जयः’ जैसे लेखों में अंकित की।
मालव गणतंत्र ने शकों को पराजित कर अपने गण की पुनर्स्थापना की और इस ऐतिहासिक विजय की स्मृति में ईसा पूर्व 57-56 में एक नया संवत् चलाया, जो विक्रम संवत् के नाम से सुप्रसिद्ध है। यह संवत् आज भी भारतीय गणना-पद्धति का प्रमुख आधार है और इस प्रकार एक प्राचीन गणराज्य की विजय-स्मृति आज भी जीवित है।
गुप्त साम्राज्य के प्रतिभाशाली सम्राटों की साम्राज्यवादी नीति ने गणतंत्रीय स्वतंत्रता की भावना की अंतिम लौ को अंततः बुझा दिया। यह भारतीय इतिहास की एक विडंबना ही थी कि भारतीय गणों में सर्वप्रमुख लिच्छवियों के दौहित्र स्वयं समुद्रगुप्त ने ही उनकी स्वतंत्रता का हरण कर लिया। उसने मालव, आर्जुनायन, यौधेय, काक, खरपरिक, आभीर, प्रार्जुन और सनकानीक आदि गणों को प्रणाम, आगमन और आज्ञापालन के लिए बाध्य करके धरणिबंध के राजनीतिक आदर्श को पूर्ण किया। इस प्रकार यह भारतीय गणराज्यों के भाग्य-चक्र की करुण विडंबना थी कि उन्हीं के सगे-संबंधियों ने उन पर प्रहार किया- वैदेहीपुत्र अजातशत्रु ने लिच्छवियों को, मोरियगण के राजकुमार चंद्रगुप्त मौर्य ने अनेक गणों को और लिच्छवि-दौहित्र समुद्रगुप्त ने शेष गणराज्यों को अपने साम्राज्य में समाहित कर लिया। किंतु गणतंत्रीय भावनाएँ पूर्णतः समाप्त नहीं हो सकीं और अहीर तथा गूजर जैसी अनेक जातियों के सामूहिक जीवन में यह भावना कई शताब्दियों तक पनपती-पलती रही।
गणराज्य की भावना की चिरंतनता और आधुनिक प्रासंगिकता
आज इतिहास के पटल से साम्राज्यों और सम्राटों के नामोनिशान मिट चुके हैं और निरंकुश व असीमित राज्य-व्यवस्थाएँ कालकवलित हो चुकी हैं, किंतु स्वतंत्रता की वह मूल भावना जो गणराज्य-परंपरा की आत्मा है, मानव-हृदय से कभी दूर नहीं की जा सकती। विश्व इतिहास के प्राचीन गणों की भाँति आज के गणराज्य न तो क्षेत्रफल में अत्यंत लघु हैं और न ही आपसी फूट और द्वेषभावना से जर्जर। उनमें न तो प्राचीन ग्रीस का दासवाद है और न प्राचीन तथा मध्यकालीन भारत और यूरोप के गणराज्यों का संकुचित और सीमित मतदान-अधिकार। आधुनिक गणराज्यों में समस्त जनता का प्राधान्य स्थापित हो गया है और राष्ट्र के भाग्य की विधायिका वही जन-प्रतिनिधि सभा है। आज तो सैनिक अधिनायकवादी शासक भी जनवाद का दम भरते हैं और कभी-कभी उसके लिए कार्य भी करते हैं। गणराज्य की भावना वस्तुतः अमर है और उसका जनवाद सदैव अमर रहेगा।
प्राचीन भारत के गणराज्यों से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs
1. प्रश्न : प्राचीन भारत में गणराज्य से क्या तात्पर्य है?
2. प्रश्न : प्राचीन भारत के प्रमुख गणराज्य कौन-से थे?
3. प्रश्न : वज्जिसंघ क्या था?
4. प्रश्न : लिच्छवियों की शासन-व्यवस्था कैसी थी?
5. प्रश्न : शाक्य गणराज्य कहाँ स्थित था?
6. प्रश्न : मल्ल गणराज्य का क्या महत्त्व था?
7. प्रश्न : गणराज्यों में निर्णय कैसे लिए जाते थे?
8. प्रश्न : क्या प्राचीन भारतीय गणराज्य आधुनिक लोकतंत्र जैसे थे?
9. प्रश्न : प्राचीन भारत के गणराज्यों के स्रोत कौन-से हैं?
10. प्रश्न : प्राचीन भारतीय गणराज्यों का पतन क्यों हुआ?
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