हेनरी अष्टम (1509–1547)
हेनरी सप्तम की मृत्यु 1509 ई. में होने के पश्चात् उसका पुत्र हेनरी अष्टम (1509–1547 ई.) इंग्लैंड के राजसिंहासन पर आसीन हुआ। ग्रीनविच पैलेस में जन्मा हेनरी अष्टम, हेनरी सप्तम और एलिज़ाबेथ ऑफ़ यॉर्क का तीसरा संतान था।
हेनरी अष्टम के राजगद्दी पर आरूढ़ होने का इंग्लैंड की जनता ने स्वागत किया, क्योंकि अठारह वर्षीय हेनरी अष्टम एक सुंदर, आकर्षक व्यक्तित्व वाला तथा संगीत, नृत्य और खेलकूद में रुचि रखने वाला नवयुवक था। उसके समकालीन उसे आकर्षक, शिक्षित और निपुण राजा मानते थे। वह विद्यानुरागी तथा विद्वानों का आश्रयदाता होने के साथ-साथ स्वयं भी विद्वान था। वह धर्मशास्त्र, फ्रांसीसी, लैटिन तथा अन्य अनेक भाषाओं का ज्ञाता था। उसके दरबार में कोलेट, इरैस्मस तथा थॉमस मूर जैसे विद्वानों का प्रभाव था। किंतु जीवन के अंतिम वर्षों में उसका व्यक्तित्व विलासी, अहंकारी, निरंकुश और अत्याचारी शासक के रूप में अधिक स्पष्ट हुआ।
हेनरी अष्टम संभवतः ट्यूडर वंश का सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी शासक था। वह इंग्लैंड में अपनी शक्ति को सर्वोच्च बनाना चाहता था और यूरोपीय राजनीति में इंग्लैंड को एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता था। विरासत में प्राप्त सुदृढ़ राजकीय शक्ति और संचित धनराशि का उपयोग उसने केवल दरबार की शान-शौकत बढ़ाने में ही नहीं किया, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने में भी किया। उसके समकालीन यूरोपीय शासकों में पवित्र रोमन साम्राज्य के सम्राट बनने की महत्त्वाकांक्षा थी। हेनरी भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहा, किंतु 1519 ई. में पवित्र रोमन सम्राट के चुनाव में वह चार्ल्स पंचम से हार गया। इससे पूर्व हेनरी ने स्पेन और फ्रांस के राजाओं का बारी-बारी से पक्ष लेकर उन्हें एक-दूसरे के विरुद्ध संतुलित रखने की नीति अपनाई थी। उसका मंत्री कार्डिनल थॉमस वूल्जे इस नीति के प्रयोग में दक्ष था और यूरोपीय राजनीति में शक्ति-संतुलन की नीति को प्रभावी रूप से अपनाने में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
अपने छह विवाहों के अलावा, हेनरी अष्टम चर्च ऑफ़ इंग्लैंड को रोमन कैथोलिक चर्च से पृथक करने में अपनी भूमिका के लिए भी प्रसिद्ध है। रोम के साथ हेनरी के संघर्षों के परिणामस्वरूप चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का पोप के प्रभुत्व से पृथक्करण हुआ, मठों का विघटन हुआ और हेनरी स्वयं चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का सर्वोच्च प्रमुख बन गया। उसने धार्मिक संस्थाओं तथा धार्मिक व्यवस्थाओं में अनेक परिवर्तन किए और मठों की संपत्ति को राजकीय नियंत्रण में ले लिया। किंतु रोमन कैथोलिक चर्च से संबंध-विच्छेद के बाद भी वह अनेक पारंपरिक कैथोलिक धार्मिक सिद्धांतों का समर्थक बना रहा। इसलिए उसके धार्मिक सुधारों को पूर्णतः प्रोटेस्टेंट सुधार कहना उचित नहीं है।
हेनरी अष्टम को अपने पिता हेनरी सप्तम से वैभव और सुदृढ़ राजसत्ता की विरासत मिली थी। राजसिंहासन पर आसीन होते ही उसने अपने पिता के शासनकाल के प्रभावशाली वित्तीय अधिकारियों रिचर्ड एम्प्सन और एडमंड डडले को गिरफ्तार कर लिया। उन पर राजद्रोह के आरोप लगाए गए और 1510 ई. में उन्हें फाँसी दे दी गई। इससे जनता में हेनरी की लोकप्रियता बढ़ी, क्योंकि एम्प्सन और डडले कर-वसूली तथा कठोर वित्तीय नीतियों के कारण अलोकप्रिय थे।
हेनरी अष्टम शीघ्र ही प्रशासन के कठिन एवं नियमित कार्यों से ऊब गया और 1514 ई. के बाद उसने शासन के दैनिक कार्यों में अपने विश्वसनीय मंत्री कार्डिनल थॉमस वूल्जे को अत्यधिक अधिकार प्रदान किए। वूल्जे ने 1529 ई. तक लॉर्ड चांसलर के रूप में व्यावहारिक रूप से राजा की घरेलू और विदेश नीति का संचालन किया। उसने फ्रांस के साथ संबंधों को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1520 ई. में फील्ड ऑफ़ द क्लॉथ ऑफ़ गोल्ड के अवसर पर फ्रांस और इंग्लैंड के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों का प्रदर्शन कराया। वूल्जे ने राष्ट्रीय सरकार को अधिक केंद्रीकृत किया तथा न्यायिक संस्थाओं, विशेष रूप से स्टार चैंबर, के अधिकार-क्षेत्र का विस्तार किया। इस प्रकार उसने राजसत्ता के केंद्रीकरण को मजबूत किया। किंतु जब वह हेनरी को कैथरीन ऑफ़ एरागॉन से विवाह-विच्छेद दिलाने में सफल नहीं हुआ, तो राजा उससे नाराज़ हो गया। 1529 ई. में वूल्जे ने अपना प्रभाव खो दिया। 1530 ई. में उस पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया, किंतु मुकदमे का सामना करने से पहले ही रास्ते में उसकी मृत्यु हो गई।
वूल्जे का पतन पोप तथा इंग्लैंड के पादरी-वर्ग के लिए एक स्पष्ट चेतावनी था कि राजा की इच्छाओं की पूर्ति में विफल रहने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसके बाद हेनरी ने शासन पर अपना प्रत्यक्ष नियंत्रण बढ़ा लिया, यद्यपि दरबार में विभिन्न गुट सत्ता और प्रभाव के लिए एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्ष करते रहे।
हेनरी अष्टम को अपने पिता से बड़ी धनराशि प्राप्त हुई थी। उसने अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में विलासिता और ऐश्वर्य पर अत्यधिक धन खर्च किया तथा राजकोष का बड़ा भाग समाप्त कर दिया। उसने अपनी पसंद के मंत्रियों और सलाहकारों को नियुक्त किया। किंतु बाद में उसे अनुभव हुआ कि अपनी धार्मिक और राजनीतिक नीतियों को लागू करने के लिए संसद तथा राजनीतिक वर्ग का समर्थन आवश्यक है। इसलिए उसके शासनकाल में संसद का महत्त्व बढ़ा और 1529 से 1536 ई. के बीच बैठने वाली संसद ने धार्मिक एवं संवैधानिक परिवर्तनों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वूल्जे के पतन के बाद हेनरी अष्टम ने प्रशासन पर अधिक प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया। उसने योग्य व्यक्तियों को अपने सलाहकार के रूप में नियुक्त किया और शासकीय कार्यों में गोपनीयता तथा केंद्रीकरण को महत्त्व दिया। पोप के प्रभाव को इंग्लैंड से समाप्त करके उसने राजसत्ता की सर्वोच्चता स्थापित की।
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Toggleहेनरी अष्टम के विवाह
हेनरी अष्टम अपने छह विवाहों के कारण अत्यंत प्रसिद्ध है। विशेष रूप से उसकी पहली पत्नी कैथरीन ऑफ़ एरागॉन से विवाह-विच्छेद और उसके परिणामस्वरूप इंग्लैंड के चर्च का रोम से संबंध-विच्छेद इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हैं।
हेनरी अष्टम का पहला विवाह कैथरीन ऑफ़ एरागॉन से 11 जून 1509 ई. को हुआ। कैथरीन उसके बड़े भाई आर्थर की विधवा थी। आर्थर की 1502 ई. में मृत्यु हो गई थी। कैथरीन एरागॉन के राजा फर्डिनेंड द्वितीय और कैस्टील की रानी इसाबेला प्रथम की पुत्री थी। आर्थर की मृत्यु के बाद कैथरीन का विवाह हेनरी से करने के लिए पोप से विशेष अनुमति प्राप्त की गई। कैथरीन हेनरी से उम्र में बड़ी थी और प्रारंभिक वर्षों में दोनों के संबंध अपेक्षाकृत मधुर रहे। किंतु 1520 के दशक के उत्तरार्ध में हेनरी ने उससे विवाह-विच्छेद की इच्छा प्रकट की।
इसके कई कारण थे। पहला, कैथरीन से कई संतानें हुईं, लेकिन उनकी अधिकांश संतानें जीवित नहीं रहीं और केवल पुत्री मैरी जीवित रही। दूसरा, हेनरी ट्यूडर वंश की स्थिरता के लिए एक पुरुष उत्तराधिकारी चाहता था। तीसरा, हेनरी को यह धार्मिक संदेह होने लगा कि अपने बड़े भाई की विधवा से विवाह करना ईसाई धर्म के अनुसार उचित नहीं था और संभवतः इसी कारण उसे पुरुष उत्तराधिकारी नहीं मिला। चौथा और तत्कालीन राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि हेनरी ऐनी बोलिन के प्रति आकर्षित हो गया था और उससे विवाह करना चाहता था। चूँकि कैथोलिक चर्च के अनुसार उसका पहला विवाह तब तक वैध था, जब तक उसे निरस्त न किया जाए, इसलिए हेनरी ने विवाह-विच्छेद की अनुमति प्राप्त करने का प्रयास किया।
हेनरी ने विवाह-विच्छेद के लिए कार्डिनल थॉमस वूल्जे को नियुक्त किया। वूल्जे ने राजा के पक्ष में हरसंभव प्रयास किया, किंतु वह सफल नहीं हो सका। परिणामस्वरूप हेनरी ने उसे पद से हटा दिया। बाद में वूल्जे पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया, किंतु मुकदमे का सामना करने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई।
इसके बाद हेनरी ने पोप क्लीमेंट सप्तम से विवाह-विच्छेद की अनुमति प्राप्त करने का प्रयास किया। किंतु पोप चार्ल्स पंचम के राजनीतिक दबाव में थे, क्योंकि कैथरीन, चार्ल्स पंचम की मौसी थी। इसलिए पोप ने हेनरी के विवाह-विच्छेद को स्वीकार करने में टालमटोल की और अंततः उसे अनुमति नहीं दी।
1529 ई. में थॉमस मूर को लॉर्ड चांसलर नियुक्त किया गया, लेकिन उन्होंने हेनरी के विवाह-विच्छेद के प्रश्न पर राजा की इच्छा के अनुरूप कार्य नहीं किया। उन्होंने 1532 ई. में अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद थॉमस क्रॉमवेल हेनरी के प्रमुख मंत्रियों में शामिल हुआ और उसने संसद के माध्यम से पोप तथा रोम के प्रभाव को समाप्त करने की नीति को आगे बढ़ाया।
हेनरी ने थॉमस क्रैनमर को कैंटरबरी का आर्कबिशप नियुक्त किया। क्रैनमर ने 23 मई 1533 को हेनरी और कैथरीन के विवाह को शून्य एवं प्रभावहीन घोषित कर दिया। इसके कुछ ही समय बाद 28 मई 1533 को हेनरी और ऐनी बोलिन के विवाह को वैध घोषित किया गया। कैथरीन से रानी की उपाधि छीन ली गई और 1 जून 1533 को ऐनी बोलिन का राज्याभिषेक हुआ।
हेनरी ने 1532–1533 के दौरान फ्रांस के राजा फ्रांसिस प्रथम से भी अपने नए विवाह के लिए समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया। उसने ऐनी बोलिन से गुप्त रूप से विवाह किया था और 25 जनवरी 1533 को उनके विवाह का सार्वजनिक समारोह आयोजित किया गया। 7 सितंबर 1533 को ऐनी बोलिन ने एक पुत्री को जन्म दिया, जिसका नाम एलिज़ाबेथ रखा गया। यही एलिज़ाबेथ बाद में इंग्लैंड की प्रसिद्ध महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम बनी।
प्रथम उत्तराधिकार अधिनियम, 1533 द्वारा हेनरी और ऐनी के विवाह को वैध माना गया तथा कैथरीन की पुत्री मैरी को उत्तराधिकार से बाहर कर दिया गया। ऐनी की संतानों को उत्तराधिकार की पंक्ति में स्थान दिया गया। इस अधिनियम में पोप तथा किसी विदेशी सत्ता के अधिकार को अस्वीकार किया गया। राज्य के प्रमुख अधिकारियों और अन्य व्यक्तियों से इस व्यवस्था को स्वीकार करने की शपथ लेने की अपेक्षा की गई। इसका विरोध करने वालों के विरुद्ध कठोर दंड का प्रावधान किया गया।
हेनरी किसी भी दशा में पुरुष उत्तराधिकारी चाहता था। जनवरी 1536 में ऐनी बोलिन का गर्भपात हुआ, जिसमें पुरुष भ्रूण था। इसके बाद हेनरी का ऐनी के प्रति विश्वास और भी कम हो गया। कुछ ही समय बाद ऐनी पर व्यभिचार, राजद्रोह तथा राजा के विरुद्ध षड्यंत्र जैसे आरोप लगाए गए। इन आरोपों की ऐतिहासिक विश्वसनीयता पर विवाद है। अंततः 19 मई 1536 को टॉवर ग्रीन में ऐनी बोलिन का सिर कलम कर दिया गया।
पुरुष उत्तराधिकारी की इच्छा में हेनरी ने तीसरा विवाह जेन सेमूर से किया। 1536 ई. में हुए इस विवाह से 1537 ई. में एक पुत्र एडवर्ड का जन्म हुआ, जो बाद में एडवर्ड षष्ठम के नाम से इंग्लैंड के सिंहासन पर बैठा। जेन सेमूर की प्रसव के बाद संक्रमण के कारण 24 अक्टूबर 1537 को हैम्पटन कोर्ट पैलेस में मृत्यु हो गई।
जेन सेमूर की मृत्यु के बाद हेनरी के मंत्री थॉमस क्रॉमवेल ने जर्मन प्रोटेस्टेंट राजकुमारों के साथ राजनीतिक गठबंधन मजबूत करने के उद्देश्य से ऐन ऑफ़ क्लेव्स से विवाह का सुझाव दिया। चित्रकार हैंस होल्बाइन द यंगर ने ऐन का चित्र बनाया। चित्र तथा उसके बारे में प्राप्त विवरणों से प्रभावित होकर हेनरी ने 1540 ई. में उससे चौथा विवाह किया। किंतु इंग्लैंड पहुँचने पर हेनरी उससे प्रभावित नहीं हुआ और शीघ्र ही विवाह-विच्छेद की इच्छा करने लगा।
ऐन ऑफ़ क्लेव्स ने राजनीतिक समझदारी का परिचय दिया और विवाह के निरस्तीकरण का विरोध नहीं किया। उसने स्वीकार किया कि विवाह पूर्ण नहीं हुआ था। परिणामस्वरूप 1540 ई. में विवाह निरस्त कर दिया गया। उसे पर्याप्त सम्मान और आर्थिक सुविधाएँ दी गईं तथा वह इंग्लैंड में ही रही। उसे ‘राजा की बहन’ की उपाधि प्रदान की गई। इसी वर्ष थॉमस क्रॉमवेल का राजनीतिक पतन हुआ और 28 जुलाई 1540 को उसे फाँसी दे दी गई।
हेनरी अष्टम ने उसी दिन कैथरीन हॉवर्ड से पाँचवाँ विवाह किया। कैथरीन हॉवर्ड ऐनी बोलिन की चचेरी बहन थी। विवाह के बाद उसके पूर्व और कथित वर्तमान संबंधों की जानकारी सामने आई। विशेष रूप से थॉमस कल्पेपर के साथ उसके संबंधों को गंभीर अपराध माना गया। अंततः कैथरीन हॉवर्ड पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया और 13 फरवरी 1542 को उसका सिर कलम कर दिया गया।
हेनरी ने 1543 ई. में दो बार विधवा हो चुकी कैथरीन पार से छठा और अंतिम विवाह किया। हेनरी उसके तीसरे पति थे। कैथरीन पार शिक्षित और राजनीतिक रूप से समझदार महिला थी। धार्मिक विषयों पर उसके विचार हेनरी से भिन्न थे, किंतु उसने सावधानीपूर्वक अपने विचार व्यक्त किए। उसने हेनरी और उसकी पुत्रियों मैरी तथा एलिज़ाबेथ के बीच संबंधों को सुधारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1544 ई. के उत्तराधिकार अधिनियम द्वारा मैरी और एलिज़ाबेथ को उत्तराधिकार की पंक्ति में पुनः स्थान दिया गया, यद्यपि उन्हें वैध संतान का दर्जा नहीं दिया गया था। हेनरी की मृत्यु 1547 ई. में हुई। इसके बाद कैथरीन पार ने जेन सेमूर के भाई थॉमस सेमूर से विवाह किया।
हेनरी के विवाहों के अतिरिक्त कम-से-कम दो प्रमुख प्रेम-संबंधों की जानकारी मिलती है—एलिज़ाबेथ ब्लाउंट और मैरी बोलिन। एलिज़ाबेथ ब्लाउंट से हेनरी का एक पुत्र हेनरी फिट्ज़रॉय हुआ, जिसे बाद में ड्यूक ऑफ़ रिचमंड और समरसेट बनाया गया। मैरी बोलिन भी ऐनी बोलिन से पहले हेनरी की प्रेमिका थी। मैरी की कुछ संतानों के पिता के रूप में हेनरी का नाम भी प्रस्तुत किया गया है, किंतु इस संबंध में ऐतिहासिक प्रमाण निश्चित नहीं हैं।
हेनरी अष्टम यद्यपि एक प्रभावशाली और शक्तिशाली शासक था, लेकिन उसके अनेक विवाहों, विवाहेतर संबंधों और क्रूर दमनात्मक नीतियों के कारण उसकी छवि अत्यंत विवादास्पद रही। उसने अपने राजनीतिक विरोधियों और असहमत व्यक्तियों के प्रति कठोरता दिखाई तथा राजद्रोह के आरोप में अनेक लोगों को मृत्युदंड दिया।
हेनरी अष्टम और धर्म-सुधार
हेनरी अष्टम जब इंग्लैंड की गद्दी पर बैठा, उस समय वह रोमन कैथोलिक चर्च और पोप का समर्थक था। उसने 1512 ई. में फ्रांस के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया और 1521 ई. में मार्टिन लूथर की आलोचना करते हुए एक पुस्तक लिखी। इससे प्रभावित होकर पोप ने उसे ‘धर्म-रक्षक’ (Defender of the Faith) की उपाधि प्रदान की।
1527 ई. के बाद हेनरी अष्टम के शासन की धार्मिक नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आने लगा। लंबे समय तक पोप का समर्थन करने के बाद 1529 ई. के आसपास उसके और पोप के संबंधों में गंभीर तनाव उत्पन्न हो गया। इसका तत्कालीन प्रमुख कारण हेनरी का कैथरीन ऑफ़ एरागॉन से विवाह-विच्छेद था। हेनरी कैथरीन से कोई जीवित पुरुष उत्तराधिकारी प्राप्त नहीं कर सका था और वह उससे विवाह-विच्छेद करना चाहता था। किंतु पोप क्लीमेंट सप्तम चार्ल्स पंचम के राजनीतिक प्रभाव के कारण हेनरी को विवाह-विच्छेद की अनुमति देने में असमर्थ रहा।
हेनरी शीघ्रातिशीघ्र कैथरीन से विवाह-विच्छेद चाहता था, इसलिए वह पोप के विरुद्ध होता गया। वूल्जे, जिसके रोम से अच्छे संबंध थे, भी हेनरी की समस्या का समाधान नहीं कर सका और परिणामस्वरूप उसका पतन हो गया। इसके बाद थॉमस क्रॉमवेल ने राजा को संसद के माध्यम से पोप के अधिकार को समाप्त करने की नीति अपनाने की सलाह दी। इस प्रकार व्यक्तिगत विवाह-विवाद ने इंग्लैंड में चर्च और राजसत्ता के संबंधों में व्यापक परिवर्तन का अवसर प्रदान किया।
हेनरी ने थॉमस क्रैनमर को अपना समर्थक बनाया और 1533 ई. में उसे कैंटरबरी का आर्कबिशप नियुक्त किया। क्रैनमर ने हेनरी के कैथरीन से विवाह को अमान्य घोषित किया और उसके ऐनी बोलिन से विवाह को वैध माना।
किंतु अंग्रेजी धर्म-सुधार का कारण केवल कैथरीन से विवाह-विच्छेद नहीं था। तलाक का प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण अवसर था, लेकिन इसके पीछे राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और व्यक्तिगत अनेक कारण कार्य कर रहे थे। हेनरी स्वयं पूर्णतः प्रोटेस्टेंट नहीं बना था। 1534 ई. में स्वयं को चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का सर्वोच्च प्रमुख घोषित करने के बावजूद उसने अनेक पारंपरिक कैथोलिक धार्मिक सिद्धांतों को बनाए रखा।
1529 ई. में प्रारंभ हुई संसद 1536 ई. तक चलती रही। इस संसद ने राजा की धार्मिक और राजनीतिक नीतियों को लागू करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1532 से 1537 ई. के बीच अनेक कानून पारित किए गए, जिनके द्वारा राजा और पोप के संबंधों, पादरियों पर नियंत्रण तथा मठों की संपत्ति से संबंधित व्यापक परिवर्तन किए गए। हेनरी द्वारा संसद की सहायता से किए गए प्रमुख परिवर्तन तीन भागों में बाँटे जा सकते हैं—
- पोप से संबंध-विच्छेद संबंधी अधिनियम
- पादरियों पर नियंत्रण संबंधी अधिनियम
- मठों के विघटन संबंधी अधिनियम
पोप से संबंध-विच्छेद संबंधी अधिनियम
ऐनेट्स अधिनियम
पोप के आर्थिक प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से 1532 ई. में ऐनेट्स अधिनियम (Act in Conditional Restraint of Annates) पारित किया गया। ‘ऐनेट्स’ से आशय नए बिशपों से संबंधित उस आय से था, जो परंपरागत रूप से रोम को भेजी जाती थी। इस अधिनियम द्वारा रोम को भेजी जाने वाली इस आय पर नियंत्रण स्थापित किया गया और इंग्लैंड के राजा का अधिकार बढ़ा।
पीटर्स पेंस अधिनियम
‘पीटर्स पेंस’ वह वार्षिक धनराशि थी, जिसे इंग्लैंड से पोप को भेजा जाता था। 1534 ई. में इसे समाप्त कर दिया गया। इससे इंग्लैंड से पोप को जाने वाली आर्थिक सहायता पर रोक लग गई और राजसत्ता का आर्थिक नियंत्रण मजबूत हुआ।
अपील अधिनियम
1533 ई. में अपील अधिनियम (Act in Restraint of Appeals) पारित किया गया। इसके द्वारा इंग्लैंड के धार्मिक मामलों में रोम के न्यायालयों में अपील करने की परंपरा को समाप्त किया गया। इस अधिनियम की प्रसिद्ध घोषणा थी कि इंग्लैंड एक ‘साम्राज्य’ है और उसके धार्मिक एवं न्यायिक मामलों का अंतिम अधिकार इंग्लैंड के भीतर ही होना चाहिए।
इस अधिनियम के बाद रोम का न्यायिक प्रभाव इंग्लैंड में लगभग समाप्त हो गया। इसी प्रक्रिया के दौरान थॉमस मूर ने लॉर्ड चांसलर के पद से त्यागपत्र दिया और थॉमस क्रॉमवेल का प्रभाव बढ़ गया। इसी समय थॉमस क्रैनमर को कैंटरबरी का आर्कबिशप नियुक्त किया गया।
उत्तराधिकार अधिनियम
प्रथम उत्तराधिकार अधिनियम, 1533 द्वारा हेनरी और ऐनी बोलिन के विवाह को वैध माना गया तथा उनकी संतानों को उत्तराधिकार का अधिकार दिया गया। कैथरीन की पुत्री मैरी को उत्तराधिकार से बाहर कर दिया गया। इस प्रकार इस अधिनियम ने पोप के अधिकार को चुनौती देने के साथ-साथ राजवंशीय उत्तराधिकार को भी पुनर्गठित किया।
सर्वोच्चता का अधिनियम
सर्वोच्चता का अधिनियम, 1534 (Act of Supremacy) अंग्रेजी धर्म-सुधार की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक था। इसके द्वारा हेनरी अष्टम को चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का सर्वोच्च प्रमुख घोषित किया गया। इस प्रकार पोप का धार्मिक अधिकार इंग्लैंड में समाप्त कर दिया गया और राजा की सर्वोच्चता स्थापित हुई। इस व्यवस्था का विरोध करने वालों के विरुद्ध कठोर दंड का प्रावधान था।
इन अधिनियमों के परिणामस्वरूप इंग्लैंड की राजसत्ता पोप के नियंत्रण से मुक्त हो गई, चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का रोम से औपचारिक संबंध-विच्छेद हुआ और हेनरी अष्टम स्वयं चर्च का सर्वोच्च प्रमुख बन गया।
पादरियों पर नियंत्रण संबंधी अधिनियम
पादरियों की शक्ति पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए हेनरी ने संसद से अनेक अधिनियम पारित करवाए। इससे एक ओर पादरियों पर राजसत्ता का प्रभुत्व स्थापित हुआ और दूसरी ओर राजकोष को आर्थिक लाभ हुआ। Probates and Mortuaries से संबंधित व्यवस्थाओं द्वारा धार्मिक शुल्कों को नियंत्रित किया गया। Pluralities Act के माध्यम से एक ही व्यक्ति द्वारा अनेक धार्मिक पदों पर एक साथ अधिकार रखने की प्रथा पर नियंत्रण लगाया गया।
हेनरी अष्टम की सरकार ने प्रेमुनायर के कानून का भी प्रयोग किया। इसके माध्यम से उन धार्मिक अधिकारियों पर कार्रवाई की गई, जिन्होंने पोप के अधिकार को इंग्लैंड के राजा से ऊपर माना था। कैंटरबरी के पादरी-वर्ग ने लगभग एक लाख पाउंड और यॉर्क के पादरी-वर्ग ने लगभग अठारह हजार पाउंड की राशि देकर राजा से क्षमा प्राप्त की।
इसके अतिरिक्त 1539 ई. में छह अनुच्छेदों का अधिनियम (Act of Six Articles) पारित किया गया। इसमें पारंपरिक कैथोलिक सिद्धांतों को बनाए रखा गया, जैसे—ट्रांससब्सटैंशिएशन, एक प्रकार के तत्व में कम्युनियन, पादरियों के विवाह पर प्रतिबंध, ब्रह्मचर्य की शपथ, निजी मिस्सा तथा मौखिक स्वीकारोक्ति। इन सिद्धांतों का उल्लंघन करने वालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान था।
मठों के विघटन संबंधी अधिनियम
इंग्लैंड में अनेक ईसाई धार्मिक संस्थाएँ थीं, जिन्हें मठ कहा जाता था। इन मठों के पास बड़ी मात्रा में भूमि और संपत्ति थी। मध्ययुग में मठों का सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान था। मठों के भिक्षु और भिक्षुणियाँ धार्मिक शिक्षा देने के साथ-साथ शिक्षा, चिकित्सा, दान और जनसेवा के कार्यों में भी योगदान करते थे।
हेनरी अष्टम ने चर्च में सुधार तथा राजसत्ता को मजबूत करने की प्रक्रिया के अंतर्गत 1536 से 1541 ई. के बीच मठों का व्यापक विघटन कराया। इसके पीछे कई कारण थे। पहला, कुछ मठों में भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता की शिकायतें थीं। दूसरा, मठों का संबंध पोप की धार्मिक व्यवस्था से था और इसलिए उन्हें पोप के प्रभाव के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। तीसरा, मठों के पास विशाल संपत्ति और भूमि थी, जिसे राजसत्ता अपने नियंत्रण में लेना चाहती थी। चौथा, मठों की भूमि का उपयोग राजा अपने समर्थकों और नए कुलीन वर्ग को मजबूत करने के लिए करना चाहता था।
हेनरी ने 1535 ई. में मठों की आर्थिक एवं प्रशासनिक स्थिति की जाँच के लिए थॉमस क्रॉमवेल के नेतृत्व में आयोग नियुक्त किया। इसकी रिपोर्ट के आधार पर 1536 ई. में छोटे मठों के विघटन का अधिनियम पारित किया गया। लगभग 200 पाउंड से कम वार्षिक आय वाले अनेक मठ समाप्त कर दिए गए और उनकी संपत्ति राजसत्ता के अधीन आ गई। लगभग 376 छोटे मठों के विघटन का उल्लेख मिलता है।
छोटे मठों के बाद बड़े मठों को भी समाप्त किया गया। प्रारंभ में मठों को स्वेच्छा से आत्मसमर्पण करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, लेकिन विरोध करने वाले मठों पर दबाव डाला गया। 1540 ई. तक लगभग सभी प्रमुख मठ समाप्त कर दिए गए और उनकी संपत्ति पर राजकीय नियंत्रण स्थापित हो गया। कुछ धार्मिक संस्थाओं को पुनर्गठित किया गया, जबकि अधिकांश संपत्ति राजा के नियंत्रण में चली गई। राजा ने भूमि का एक बड़ा भाग अपने मंत्रियों, दरबारियों और समर्थकों को दान अथवा बिक्री के माध्यम से प्रदान किया।
मठों के विघटन का प्रभाव
हेनरी अष्टम द्वारा मठों का विघटन इंग्लैंड के इतिहास में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था। संसद ने भी इस प्रक्रिया में पूरा सहयोग किया। मठों के विघटन ने इंग्लैंड को राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से प्रभावित किया।
पहला, मठ पोप की धार्मिक सत्ता के प्रमुख संस्थागत आधारों में से थे। उनके विघटन से इंग्लैंड में पोप का प्रभाव और अधिक कमजोर हो गया।
दूसरा, मठों के विघटन से राजा की राजनीतिक और धार्मिक शक्ति अत्यधिक बढ़ गई। चर्च की विशाल संपत्ति पर राजसत्ता का नियंत्रण स्थापित हो गया।
तीसरा, पोप तथा रोम को जाने वाली आर्थिक आय का बड़ा हिस्सा इंग्लैंड के भीतर ही रहने लगा। इससे राजकोष को पर्याप्त आर्थिक लाभ हुआ।
चौथा, मठों की भूमि का एक बड़ा भाग राजा ने अपने समर्थकों, मंत्रियों और दरबारियों को प्रदान किया। इससे राजा के प्रति निष्ठावान एक नया भूमि-स्वामी वर्ग विकसित हुआ।
पाँचवाँ, मठों की भूमि के बड़े पैमाने पर हस्तांतरण से भूमि के स्वामित्व की संरचना में परिवर्तन आया और नए जमींदार तथा मध्यवर्गीय भूमि-स्वामी उभरे।
छठा, मठों के विघटन ने इंग्लैंड में धार्मिक परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज किया। मठों की भूमि प्राप्त करने वाले नए भूमि-स्वामी प्रायः राजसत्ता की धार्मिक नीति के समर्थक बने, क्योंकि कैथोलिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना होने पर उनकी भूमि वापस लिए जाने की आशंका थी।
हालाँकि, इसके अनेक नकारात्मक प्रभाव भी हुए। मठों से जुड़े अनेक भिक्षु, कर्मचारी और आश्रित अपनी पारंपरिक आजीविका से वंचित हुए। अनेक धार्मिक भवन, मूर्तियाँ, पुस्तकें और कलात्मक वस्तुएँ नष्ट हो गईं। इस प्रकार इंग्लैंड अपनी मध्ययुगीन धार्मिक कला और स्थापत्य की अनेक महत्त्वपूर्ण धरोहरों से भी वंचित हुआ।
हेनरी ने पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था में अन्य परिवर्तन भी किए। क्रॉमवेल के संरक्षण में माइल्स कवरडेल द्वारा अंग्रेजी बाइबिल का अनुवाद किया गया और बाद में अंग्रेजी बाइबिल को चर्चों में उपलब्ध कराया गया। क्रैनमर ने भी अंग्रेजी धार्मिक साहित्य के विकास में योगदान दिया। हेनरी ने अंधविश्वास, कुछ चमत्कार-कथाओं और धार्मिक अवशेषों से संबंधित प्रथाओं पर नियंत्रण लगाने का प्रयास किया। 1545 ई. की धार्मिक पुस्तक King’s Primer में भी धार्मिक शिक्षा को नए रूप में प्रस्तुत किया गया। इन परिवर्तनों ने अंग्रेजी धर्म-सुधार को आगे बढ़ाने में सहायता की।
विरोधों का दमन
हेनरी की धार्मिक नीतियों का विरोध करने वालों का कठोरता से दमन किया गया। अनेक धार्मिक अधिकारियों और भिक्षुओं को गिरफ्तार किया गया और मृत्युदंड दिया गया। प्रमुख विरोधियों में जॉन फिशर और सर थॉमस मूर शामिल थे। दोनों ने राजा की धार्मिक सर्वोच्चता की शपथ लेने से इनकार किया। उन्हें राजद्रोह का दोषी ठहराया गया और 1535 ई. में मृत्युदंड दिया गया।
पिल्ग्रिमेज ऑफ़ ग्रेस
हेनरी की मठ-विघटन नीति तथा धार्मिक और राजनीतिक परिवर्तनों के विरोध में अक्टूबर 1536 ई. में उत्तरी इंग्लैंड में ‘पिल्ग्रिमेज ऑफ़ ग्रेस’ (Pilgrimage of Grace) नामक व्यापक विद्रोह हुआ। यह ट्यूडर काल के सबसे गंभीर विद्रोहों में से एक था। लगभग 30,000 लोगों के इसमें शामिल होने का अनुमान लगाया जाता है। इसका प्रमुख नेता रॉबर्ट आस्के था।
विद्रोहियों की माँगों में मठों की पुनर्स्थापना, धार्मिक परिवर्तनों को रोकना और राजा के कुछ मंत्रियों को हटाना शामिल था। हेनरी ने प्रारंभ में बातचीत और आश्वासन की नीति अपनाई तथा विद्रोहियों को क्षमा का आश्वासन दिया। किंतु 1537 ई. में पुनः विद्रोह की स्थिति उत्पन्न होने पर सरकार ने कठोर कार्रवाई की। रॉबर्ट आस्के को गिरफ्तार कर राजद्रोह का दोषी ठहराया गया और 1537 ई. में उसे फाँसी दे दी गई। अनेक अन्य विद्रोहियों को भी मृत्युदंड दिया गया। इस प्रकार विद्रोह को कठोरता से दबा दिया गया।
वैदेशिक नीति
हेनरी अष्टम को अपने पिता से बड़ी धनराशि प्राप्त हुई थी और उसके राज्यारोहण के समय इंग्लैंड में अपेक्षाकृत शांति थी। इसलिए उसने सक्रिय तथा युद्धोन्मुख वैदेशिक नीति अपनाई। उसकी विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य यूरोप की राजनीति में इंग्लैंड की प्रतिष्ठा बढ़ाना और फ्रांस तथा स्पेन जैसी शक्तियों के बीच इंग्लैंड को महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में स्थापित करना था।
पवित्र संघ
फ्रांस और इंग्लैंड लंबे समय से एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी थे। इस समय इटली यूरोपीय राजनीति का प्रमुख केंद्र था। उत्तरी इटली के विभिन्न क्षेत्रों पर फ्रांस और स्पेन दोनों की रुचि थी। 1508 ई. में पोप तथा यूरोपीय शक्तियों ने फ्रांस के विरुद्ध लीग ऑफ़ कैंब्रे का गठन किया था। बाद में राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलने पर पोप जूलियस द्वितीय ने फ्रांसीसी प्रभाव को इटली से हटाने के उद्देश्य से 1511 ई. में पवित्र संघ (Holy League) बनाया।
हेनरी अष्टम भी इस संघ में शामिल हो गया। उसका उद्देश्य फ्रांस को पराजित करके इंग्लैंड की प्रतिष्ठा बढ़ाना था। हेनरी का मंत्री वूल्जे भी इस नीति का समर्थक था और उसने राजा के लिए बड़ी सेना तथा पर्याप्त धनराशि जुटाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
फ्रांस से युद्ध
1512 ई. में हेनरी ने फ्रांस के विरुद्ध अभियान प्रारंभ किया, किंतु विशेष सफलता नहीं मिली। 1513 ई. में उसने स्वयं सेना का नेतृत्व किया और थेरौएन पर अधिकार किया तथा बैटल ऑफ़ द स्पर्स में फ्रांसीसी सेना को पराजित किया। इसी समय फ्रांस के समर्थक स्कॉटलैंड के राजा जेम्स चतुर्थ ने इंग्लैंड पर आक्रमण किया। इंग्लैंड की सेना ने फ्लोडन के युद्ध में स्कॉटिश सेना को पराजित किया और जेम्स चतुर्थ मारा गया। इन विजयों से इंग्लैंड की प्रतिष्ठा तो बढ़ी, किंतु उसे स्थायी राजनीतिक लाभ नहीं मिला।
1515 ई. में फ्रांसिस प्रथम फ्रांस का राजा बना। उसने इटली में अभियान चलाकर 1515 ई. में मारिग्नानो के युद्ध में विजय प्राप्त की। 1516 ई. में स्पेन के फर्डिनेंड द्वितीय की मृत्यु के बाद चार्ल्स पंचम स्पेन की शक्ति के प्रमुख उत्तराधिकारी बने। हेनरी और चार्ल्स ने फ्रांस के प्रभाव को कम करने का प्रयास किया, लेकिन इंग्लैंड को इससे कोई स्थायी लाभ नहीं मिला।
1519 ई. में चार्ल्स पंचम पवित्र रोमन साम्राज्य का सम्राट निर्वाचित हुआ। फ्रांस और स्पेन दोनों इंग्लैंड का समर्थन प्राप्त करना चाहते थे। हेनरी अष्टम ने दोनों शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने की नीति अपनाई। इंग्लैंड का व्यापार विशेष रूप से नीदरलैंड्स और फ्लैंडर्स से जुड़ा था, जो चार्ल्स पंचम के प्रभाव में थे। इसलिए हेनरी फ्रांस के साथ स्थायी गठबंधन करने में सावधान रहा।
1521 ई. में इंग्लैंड ने पुनः फ्रांस के विरुद्ध युद्ध किया। अंग्रेजी सेना ने फ्रांस पर आक्रमण किया, किंतु अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इस बीच यूरोप की राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती रहीं और हेनरी को बार-बार अपनी कूटनीतिक नीति में परिवर्तन करना पड़ा। इन युद्धों से इंग्लैंड को स्थायी लाभ नहीं हुआ और राजकोष पर भारी बोझ पड़ा।
स्पेन से युद्ध
1525 ई. में चार्ल्स पंचम ने पाविया के युद्ध में फ्रांसिस प्रथम को पराजित करके बंदी बना लिया। इसके बाद चार्ल्स पंचम की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई। 1527 ई. में उसकी सेना ने रोम पर अधिकार कर पोप क्लीमेंट सप्तम को बंदी बना लिया। हेनरी अष्टम ने चार्ल्स की बढ़ती शक्ति से चिंतित होकर फ्रांस के साथ सहयोग किया। वूल्जे के प्रयासों से फ्रांस, इंग्लैंड और पोप के बीच चार्ल्स पंचम के विरुद्ध गठबंधन बनाया गया। किंतु यह गठबंधन भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका।
स्कॉटलैंड
स्कॉटलैंड का राजा जेम्स चतुर्थ फ्रांस का समर्थक था। 1513 ई. में उसने इंग्लैंड पर आक्रमण किया, किंतु फ्लोडन के युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई। बाद में उसके उत्तराधिकारी जेम्स पंचम और हेनरी अष्टम के बीच भी संघर्ष हुआ।
हेनरी अष्टम अपने पुत्र एडवर्ड का विवाह स्कॉटलैंड की राजकुमारी मैरी से करना चाहता था। इसका उद्देश्य दोनों राजवंशों के बीच संबंध स्थापित करना था और भविष्य में इंग्लैंड तथा स्कॉटलैंड के एकीकरण की संभावना उत्पन्न करना था। किंतु स्कॉटिश राजनीतिक वर्ग ने इसका विरोध किया। परिणामस्वरूप हेनरी ने स्कॉटलैंड के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई की और 1544 ई. में एडिनबरा पर आक्रमण कर उसे भारी क्षति पहुँचाई।
आयरलैंड
हेनरी अष्टम ने इंग्लैंड में पोप के अधिकार को समाप्त करने के बाद आयरलैंड पर भी अपनी राजकीय और धार्मिक सर्वोच्चता स्थापित करने का प्रयास किया। 1536–1537 ई. के बाद आयरलैंड में भी धार्मिक सुधार तथा मठ-विघटन की प्रक्रिया आरंभ की गई। 1541 ई. में आयरिश संसद ने हेनरी को ‘आयरलैंड का राजा’ घोषित किया। यह परिवर्तन महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि इससे पहले इंग्लैंड के राजा को आयरलैंड का ‘Lord’ माना जाता था।
हेनरी ने आयरिश सरदारों को अपनी सत्ता स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित किया और उन्हें भूमि तथा पद देकर अपने पक्ष में करने की नीति अपनाई। किंतु आयरलैंड में कैथोलिक परंपराएँ अत्यंत मजबूत थीं और हेनरी की धार्मिक नीतियों का पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं हुआ।
शक्तिशाली नौसेना
हेनरी सप्तम ने इंग्लैंड के व्यापारिक बेड़े को विकसित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किए थे। हेनरी अष्टम ने इस नीति को आगे बढ़ाते हुए राजकीय नौसेना को मजबूत किया। उसने नए युद्धपोतों का निर्माण करवाया और नौसैनिक शस्त्रों पर विशेष ध्यान दिया। मैरी रोज़ जैसे प्रसिद्ध युद्धपोत इसी काल की नौसैनिक शक्ति का प्रतीक थे। पोर्ट्समाउथ में नौसैनिक सुविधाओं के विकास के साथ-साथ जहाज निर्माण को प्रोत्साहन दिया गया।
इस प्रकार हेनरी अष्टम ने इंग्लैंड को एक अधिक संगठित नौसैनिक शक्ति बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण आधार तैयार किया। आगे चलकर यही नौसैनिक शक्ति इंग्लैंड की सामुद्रिक शक्ति के विकास का आधार बनी।
हेनरी अष्टम की वैदेशिक नीति को विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई। फ्रांस और स्कॉटलैंड के साथ उसके युद्धों में इंग्लैंड को कुछ सैन्य सफलताएँ अवश्य मिलीं, लेकिन इनसे स्थायी राजनीतिक लाभ नहीं हुआ। युद्धों पर भारी धनराशि खर्च हुई और राजकोष पर आर्थिक दबाव बढ़ा।
हेनरी अष्टम का निधन 28 जनवरी 1547 ई. को 55 वर्ष की आयु में पैलेस ऑफ़ व्हाइटहॉल में हुआ। उसे विंडसर कैसल के सेंट जॉर्ज चैपल में उसकी तीसरी पत्नी जेन सेमूर के पास दफनाया गया। बाद में चार्ल्स प्रथम को भी उसी स्थान पर दफनाया गया।
हेनरी अष्टम का मूल्यांकन
हेनरी अष्टम (1509–1547 ई.) इंग्लैंड के इतिहास का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और विवादास्पद शासक था। उसकी वैदेशिक नीति को विशेष सफलता नहीं मिली, लेकिन इंग्लैंड के राजनीतिक और धार्मिक इतिहास पर उसका प्रभाव अत्यंत गहरा था। 1541 ई. में उसने ‘आयरलैंड का राजा’ की उपाधि धारण की। उसका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य इंग्लैंड में पोप की सर्वोच्चता को समाप्त करके राजसत्ता और चर्च ऑफ़ इंग्लैंड की सर्वोच्चता को स्थापित करना था।
हेनरी ने मठों से प्राप्त संपत्ति का उपयोग राजसत्ता को मजबूत करने, अपने समर्थकों को भूमि प्रदान करने तथा नौसैनिक शक्ति के विकास में किया। उसके शासनकाल में इंग्लैंड की नौसेना को अधिक संगठित और शक्तिशाली बनाने के प्रयास हुए।
साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी उसके शासनकाल में महत्त्वपूर्ण संस्थागत विकास हुआ। हेनरी स्वयं शिक्षित और विद्वान था। उसके शासनकाल में धार्मिक साहित्य तथा अंग्रेजी भाषा में बाइबिल के प्रसार को प्रोत्साहन मिला। वूल्जे ने ऑक्सफोर्ड में कार्डिनल कॉलेज की स्थापना की, जो बाद में क्राइस्ट चर्च के रूप में प्रसिद्ध हुआ। हेनरी ने शिक्षा और स्थापत्य से संबंधित अनेक संस्थाओं तथा भवनों को संरक्षण दिया।
हेनरी अष्टम की प्रमुख विशेषता उसकी व्यक्तिगत प्रभावशीलता और राजसत्ता को मजबूत करने की दृढ़ इच्छा थी। वह अपने समय के यूरोपीय शासकों के समान इंग्लैंड को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाना चाहता था। किंतु उसकी निरंकुशता, क्रूरता, अनेक विवाह, विवाह-विच्छेद और विरोधियों के दमन ने उसके व्यक्तित्व को अत्यंत विवादास्पद बना दिया।
वास्तव में, हठी, निरंकुश, क्रूर और कभी-कभी अत्याचारी होने के बावजूद हेनरी अष्टम का शासनकाल इंग्लैंड के इतिहास में व्यापक राजनीतिक, धार्मिक और संस्थागत परिवर्तन का युग था। उसके शासनकाल में इंग्लैंड ने पोप की धार्मिक सत्ता से स्वतंत्र होकर एक राष्ट्रीय चर्च की स्थापना की और राजसत्ता का केंद्रीकरण मजबूत हुआ। इसी कारण हेनरी अष्टम को इंग्लैंड के इतिहास में मध्ययुगीन कैथोलिक व्यवस्था से आधुनिक राष्ट्रीय राजसत्ता की ओर संक्रमण के प्रमुख शासकों में गिना जाता है।
महत्त्वपूर्ण FAQ
1. हेनरी अष्टम का शासनकाल कब था?
हेनरी अष्टम का शासनकाल 1509 से 1547 ई. तक था। वह ट्यूडर वंश का दूसरा शासक था और हेनरी सप्तम का उत्तराधिकारी था।
2. हेनरी अष्टम के छह विवाह किन-किन महिलाओं से हुए थे?
हेनरी अष्टम के छह विवाह क्रमशः कैथरीन ऑफ अरागॉन, ऐनी बोलिन, जेन सेमूर, ऐन ऑफ क्लीव्स, कैथरीन हॉवर्ड और कैथरीन पार से हुए थे।
3. हेनरी अष्टम और इंग्लैंड के धर्म-सुधार का क्या संबंध था?
कैथरीन ऑफ अरागॉन से विवाह-विच्छेद की अनुमति न मिलने के कारण हेनरी अष्टम का पोप से संघर्ष हुआ। इसके परिणामस्वरूप 1534 के सर्वोच्चता अधिनियम द्वारा हेनरी को चर्च ऑफ इंग्लैंड का सर्वोच्च प्रमुख घोषित किया गया और इंग्लैंड का चर्च रोमन कैथोलिक चर्च से अलग हो गया।
4. हेनरी अष्टम के शासनकाल में मठों का विघटन क्यों किया गया?
मठों पर पोप के प्रभाव को समाप्त करने, उनकी विशाल संपत्ति पर राजकीय अधिकार स्थापित करने तथा राजकोष को मजबूत करने के उद्देश्य से 1536–1541 ई. के बीच मठों का विघटन किया गया। उनकी भूमि और संपत्ति का बड़ा भाग राजा के नियंत्रण में आ गया।
5. हेनरी अष्टम की मृत्यु कब और कैसे हुई?
हेनरी अष्टम की मृत्यु 28 जनवरी 1547 ई. को व्हाइटहॉल पैलेस में हुई। उसकी आयु लगभग 55 वर्ष थी। उसे विंडसर कैसल के सेंट जॉर्ज चैपल में उसकी तीसरी पत्नी जेन सेमूर के पास दफनाया गया।


