आधुनिक तुर्की का निर्माण
उन्नीसवीं शताब्दी में राष्ट्रीयता की लहर ने यूरोप के अनेक देशों को प्रभावित किया। इसी प्रभाव के कारण इटली और जर्मनी ने अपना राष्ट्रीय एकीकरण पूरा किया, फ्रांस में अनेक क्रांतियों के बाद गणतांत्रिक शासन की स्थापना हुई तथा इंग्लैंड को अपने कई उपनिवेशों से हाथ धोना पड़ा। राष्ट्रीयता की इसी लहर ने पूर्व में स्थित ओटोमन तुर्की साम्राज्य के लिए भी अनेक समस्याएँ उत्पन्न कर दीं। साम्राज्य के विभिन्न भागों में राष्ट्रीय आंदोलनों का उदय हुआ और वहाँ के लोग तुर्की शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करने लगे।
तुर्की में राष्ट्रीय आंदोलनों का इतिहास वास्तव में उसी समय से प्रारंभ होता है, जब यूरोपीय शक्तियों ने तुर्की के मामलों में रुचि लेना शुरू किया। यूरोपीय राष्ट्र केवल तुर्की तक सीमित नहीं थे; एशिया, अफ्रीका तथा अन्य क्षेत्रों में भी उनका प्रभाव बढ़ रहा था। चीन, जापान और भारत उनके प्रमुख केंद्र बन चुके थे। फलतः फ्रांस, इंग्लैंड, रूस और जर्मनी जैसे शक्तिशाली राष्ट्र तुर्की में, जिसे ‘यूरोप का बीमार आदमी’ कहा जाता था, अपने-अपने हितों की पूर्ति के लिए सक्रिय हो गए।
आधुनिक तुर्की का इतिहास समझने के लिए उस देश की समस्याओं को समझना आवश्यक है। यूरोप में तुर्की से संबंधित अनेक जटिल प्रश्नों को सामूहिक रूप से ‘पूर्वी समस्या’ के नाम से जाना जाता है। यूरोपीय देशों का विचार था कि यदि निकट भविष्य में तुर्की साम्राज्य का पतन हो जाता है, तो उसकी राजधानी कुस्तुनतुनिया (कॉन्स्टेंटिनोपल) और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों पर अधिकार करने वाली शक्ति को सबसे अधिक लाभ प्राप्त होगा। रूस, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस और अन्य यूरोपीय राष्ट्र अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे।
चूँकि तुर्की का शासक मुसलमान था, इसलिए रूस ने स्वयं को यरुशलम के ईसाइयों का संरक्षक घोषित किया। इतना ही नहीं, उसने सुल्तान के कथित अत्याचारों के विरुद्ध हस्तक्षेप भी प्रारंभ कर दिया। तुर्की में रूस की बढ़ती घुसपैठ ने अन्य यूरोपीय शक्तियों को चिंतित कर दिया। परिणामस्वरूप इंग्लैंड ने तुर्की को कमजोर अवस्था में बनाए रखने तथा उसे बचाने के नाम पर हस्तक्षेप करना शुरू किया। फ्रांस का सम्राट नेपोलियन तृतीय फ्रांस की प्रतिष्ठा बढ़ाने के उद्देश्य से तुर्की की राजनीति में सक्रिय हो गया, जबकि जर्मनी अन्य शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता के बीच तुर्की के समर्थन में सामने आ गया। इस प्रकार संपूर्ण यूरोप इस ‘बीमार देश’ को आधार बनाकर अपने-अपने हित साधने में लगा हुआ था।
इसी परिस्थिति में 1876 ई. में अब्दुल हमीद द्वितीय तुर्की का सुल्तान बना। उसके शासनकाल में विद्रोहों को कठोरता से दबाया गया। बुल्गारिया और बोस्निया के विद्रोहों को बलपूर्वक कुचलने के कारण रूस ने पुनः हस्तक्षेप किया। ईसाई जनता के संरक्षण के बहाने 1877-78 के रूस-तुर्की युद्ध के बाद बर्लिन संधि (1878) हुई, जिसमें तुर्की को अपने अनेक प्रदेशों से हाथ धोना पड़ा।
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तुर्की अत्यंत कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़ चुकी थी और यूरोपीय शक्तियों के आक्रमण का निरंतर भय बना हुआ था। जनता पर करों का बोझ बढ़ता जा रहा था। 1878 में तुर्की को सर्बिया, मोंटेनेग्रो तथा रोमानिया की पूर्ण स्वतंत्रता को भी स्वीकार करना पड़ा।
प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व तुर्की
प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व तुर्की का इतिहास राजनीतिक अव्यवस्था और अस्थिरता का इतिहास था। उसके विभिन्न प्रदेश एक-एक करके उससे अलग होते जा रहे थे। सुल्तान रूस के आक्रामक व्यवहार से अत्यंत क्षुब्ध था और वह इंग्लैंड तथा फ्रांस से रूस के विरुद्ध सहायता की अपेक्षा कर रहा था। किंतु शीघ्र ही वह जर्मनी की ओर चला गया, क्योंकि उसे अनुभव होने लगा था कि इंग्लैंड और फ्रांस समय आने पर उसकी सहायता नहीं करेंगे।
इसी बीच तुर्की में राष्ट्रीय आंदोलन ने जोर पकड़ लिया और 1908-09 में वहाँ ‘युवा तुर्क क्रांति’ (यंग तुर्क रिवॉल्यूशन) हुई। इस क्रांति का लाभ उठाकर बुल्गारिया ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी तथा ऑस्ट्रिया-हंगरी ने बोस्निया और हर्जेगोविना को अपने राज्य में मिला लिया। 1909 से 1918 तक तुर्की पर युवा तुर्कों का प्रभावी और तानाशाही शासन बना रहा। उनकी नीति ‘आक्रामक राष्ट्रवाद” पर आधारित थी।
1911-12 में इटली-तुर्की युद्ध हुआ तथा 1912-13 में बाल्कन राज्यों—मोंटेनेग्रो, सर्बिया, बुल्गारिया और ग्रीस ने तुर्की के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। 1912-13 के बाल्कन युद्धों ने तुर्की की स्थिति को और अधिक कमजोर कर दिया तथा यही घटनाएँ आगे चलकर प्रथम विश्वयुद्ध का कारण बनीं। इस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध के प्रारंभ होने से पूर्व ही तुर्की के अनेक प्रदेश उससे अलग हो चुके थे।
प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की की भूमिका
1914 ई. में प्रथम विश्वयुद्ध प्रारंभ होते ही तुर्की रूस, इंग्लैंड और फ्रांस से निराश होकर 29 अक्टूबर 1914 को जर्मन गुट में सम्मिलित हो गया तथा मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। तुर्की की सेना ने काला सागर के आदेसा और सिबस्तोपोल बंदरगाहों पर बमबारी करके युद्ध में प्रवेश किया। दिसंबर 1914 में तुर्की की एक सेना कॉकेसस की ओर बढ़ी। इस ओर सफलता न मिलने पर तुर्की ने स्वेज नहर पर आक्रमण किया, परंतु 3-4 फरवरी 1915 को अंग्रेजी सेना के कड़े प्रतिरोध के कारण तुर्क सेना को पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद अंग्रेजों ने गल्लीपोली प्रायद्वीप के माध्यम से इस्तांबुल पर आक्रमण करने की योजना बनाई, किंतु यहाँ मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में तुर्की की सेना ने सफलतापूर्वक आक्रमणकारियों को रोक दिया। इसी युद्ध के दौरान एक गोली मुस्तफा कमाल की जेब घड़ी से टकराकर निकल गई, जिससे उसकी जान बच गई। दिसंबर 1915 में अंग्रेजों को गल्लीपोली खाली करना पड़ा, जिससे रूस को जाने वाला आपूर्ति मार्ग अवरुद्ध हो गया और उसकी पराजय निश्चित हो गई।
पैन-इस्लामवाद की नीति
तुर्की ने स्वयं को बचाने के लिए मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की थी। युद्ध में सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से तुर्की की सरकार ने पैन-इस्लामवाद की पुरानी नीति का पुनः सहारा लिया। सुल्तान ने मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध धार्मिक जेहाद की घोषणा की और संसार भर के मुसलमानों से अपील की कि वे ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों के युद्ध-प्रयत्नों में किसी प्रकार की सहायता न दें। यह पैन-इस्लामवाद की नीति की चरम परिणति थी।
ईसाई देश होते हुए भी जर्मनी ने इस नीति का समर्थन किया, क्योंकि यह उसके हित में था। जर्मन सम्राट ने आदेश दिया कि यदि मित्र राष्ट्रों की सेना के मुसलमान सैनिक बंदी बनाए जाएँ, तो उनके साथ कठोर व्यवहार न किया जाए और उन्हें तुर्की के सुल्तान के हाथ सौंप दिया जाए।
सुल्तान को आशा थी कि जेहाद की घोषणा से विश्व के मुसलमानों में उत्साह पैदा होगा और ब्रिटिश तथा फ्रांसीसी साम्राज्य के मुसलमान विद्रोह कर देंगे, किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। युद्ध से पहले ही अरब क्षेत्रों में राष्ट्रवाद की भावना विकसित हो चुकी थी और वे ओटोमन साम्राज्य से अलग होकर स्वतंत्र होना चाहते थे। अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने उनकी इस भावना को प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप मक्का के शरीफ हुसैन के नेतृत्व में अरबों ने तुर्की के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और वे मित्र राष्ट्रों का साथ देने लगे।
यद्यपि यमन के इमाम यहिया तथा कुछ अरब कबीलों ने तुर्की के प्रति निष्ठा बनाए रखी, फिर भी इन विद्रोहों का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। भारत में भी कुछ मुसलमानों ने खलीफा के समर्थन में खिलाफत आंदोलन चलाया, किंतु यह आंदोलन भी युद्ध की दिशा बदलने में सफल नहीं हुआ। इस प्रकार पैन-इस्लामवाद की नीति अंततः असफल सिद्ध हुई।
तुर्की की पराजय
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान तुर्की कोई निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सका। मित्र राष्ट्र लगातार ओटोमन साम्राज्य पर दबाव बनाए हुए थे और साम्राज्य के अन्य भागों पर एक-एक करके अधिकार करने लगे। नवंबर 1914 में ईरान के तेल क्षेत्रों की रक्षा के नाम पर ब्रिटेन ने बसरा पर अधिकार कर लिया और वह बगदाद की ओर बढ़ने लगा। जून 1915 में कूत में तुर्की की हार हुई। अप्रैल 1916 में दस हजार सैनिकों की एक ब्रिटिश टुकड़ी ने हथियार अवश्य डाला, किंतु मार्च 1917 में बगदाद मित्र राष्ट्रों के हाथों में चला गया। अक्टूबर 1917 में जनरल एलनबी ने फिलिस्तीन पर आक्रमण किया और दिसंबर 1917 में यरुशलम पर अधिकार कर लिया। सितंबर 1918 में मित्र राष्ट्रों ने मेगिद्दो से व्यापक सैन्य अभियान चलाया, जिसने तुर्की की सैन्य शक्ति को तोड़ दिया।
1918 के मध्य से विश्वयुद्ध की स्थिति बदलने लगी और मित्र राष्ट्रों की विजय लगभग निश्चित हो गई। सबसे पहले 22 सितंबर 1918 को बुल्गारिया ने आत्मसमर्पण किया, जिससे तुर्की अपने सहयोगियों से अलग पड़ गया और यह स्पष्ट हो गया कि अब वह अकेले मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध लड़ाई जारी नहीं रख सकेगा। इसी समय अरब प्रदेशों में राष्ट्रवादी आंदोलन तेज हो गया और वहाँ के निवासियों ने तुर्की शासन के विरुद्ध विद्रोह शुरू कर दिया। मित्र राष्ट्र इन विद्रोहियों को सक्रिय सहायता कर रहे थे। फ्रांस और इंग्लैंड जहाँ एक ओर अरबों को तुर्की के विरूद्ध भड़का रहे थे, वहीं दूसरी ओर उनकी सेनाएँ तुर्की सेनाओं को परास्त कर मेसोपोटामिया, सीरिया और अन्य क्षेत्रों पर अधिकार करती जा रही थीं। अंततः 30 अक्टूबर 1918 को लेम्नोस द्वीप के मुद्रोस नामक स्थान पर तुर्की को आत्मसमर्पण करना पड़ा।
पेरिस शांति सम्मेलन और तुर्की
प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद विजयी मित्र-राष्ट्रों ने पराजित देशों के साथ शांति-समझौते करने के उद्देश्य से 1919 में पेरिस में एक शांति सम्मेलन आयोजित किया। परंतु तुर्की के संबंध में शांति-समझौता करना अत्यंत जटिल प्रश्न बन गया था। इसका प्रमुख कारण यह था कि युद्धकाल में मित्र-राष्ट्रों ने आपस में तथा अन्य पक्षों के साथ अनेक गुप्त संधियाँ और समझौते किए थे, जो एक-दूसरे के विरोधी थे। इन समझौतों का उद्देश्य ओटोमन साम्राज्य के क्षेत्रों का विभाजन कर उन्हें विभिन्न शक्तियों के बीच बाँटना था।
सबसे पहले 18 मार्च 1915 को ‘कॉन्स्टेंटिनोपल समझौता’ हुआ। इस समझौते के अंतर्गत रूस, ब्रिटेन और फ्रांस ने यह स्वीकार किया कि युद्ध के बाद रूस को कॉन्स्टेंटिनोपल, डार्डानेल्स तथा बॉस्फोरस जलडमरूमध्यों का पश्चिमी तट, एशिया माइनर के कुछ तटीय क्षेत्र तथा मारमरा सागर के आसपास के प्रदेश दिए जाएँगे। यह समझौता मुख्यतः रूस को युद्ध में बनाए रखने और उसे संतुष्ट करने के उद्देश्य से किया गया था। इसके बाद 26 अप्रैल 1915 को ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और इटली के मध्य ‘लंदन की संधि’ हुई। इस संधि के अनुसार इटली को लीबिया, डोडेकेनीज़ द्वीपसमूह तथा भूमध्यसागर के तटवर्ती क्षेत्रों के कुछ भाग देने का आश्वासन दिया गया। इटली ने इसी समझौते के बाद मित्र-राष्ट्रों की ओर से प्रथम विश्वयुद्ध में प्रवेश किया था।
16 मई 1916 को ब्रिटेन और फ्रांस के बीच प्रसिद्ध ‘साइक्स-पिकॉट समझौता’ हुआ, जिसे बाद में रूस की स्वीकृति भी प्राप्त हो गई। यह ओटोमन साम्राज्य के विभाजन से संबंधित सबसे महत्त्वपूर्ण गुप्त समझौतों में से एक था। इसके अनुसार रूस को तुर्की आर्मेनिया तथा कुर्दिस्तान का एक भाग प्राप्त होना था। फ्रांस को सीरिया के कुछ भाग, सिलीसिया तथा आदान (अदन) क्षेत्र मिलने थे। ब्रिटेन को दक्षिणी मेसोपोटामिया, बगदाद तथा एकर और हैफ़ा के बंदरगाह प्राप्त होने थे। इसके अतिरिक्त, फिलिस्तीन को अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र बनाने तथा एलेक्जेंड्रेटा को स्वतंत्र बंदरगाह घोषित करने की योजना बनाई गई थी। शेष अरब क्षेत्रों को नाममात्र की स्वतंत्रता देने की बात कही गई, किंतु वास्तव में उन्हें ब्रिटिश और फ्रांसीसी प्रभाव-क्षेत्रों में रखा जाना था। यह एक पूर्णतः गुप्त समझौता था, जिसे युद्ध की समाप्ति के बाद लागू करने की योजना बनाई गई थी।
जब इटली को साइक्स-पिकॉट समझौते की जानकारी मिली, तो उसने इसका विरोध किया, क्योंकि उसमें इटली के हितों की पर्याप्त उपेक्षा की गई थी। फलस्वरूप ब्रिटेन और फ्रांस ने 17 अप्रैल 1917 को इटली के साथ ‘सेंट जीन-डी-मॉरिएन समझौता’ किया। इस समझौते के अनुसार इटली को अनातोलिया का एक बड़ा भाग देने का निर्णय लिया गया। यह भी ओटोमन साम्राज्य के विभाजन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था। किंतु रूस इस समझौते में सम्मिलित नहीं हुआ, क्योंकि उस समय वहाँ बोल्शेविक क्रांति प्रारंभ हो चुकी थी।
ओटोमन साम्राज्य से संबंधित युद्धकालीन समझौतों में अंतिम महत्त्वपूर्ण समझौता दिसंबर 1918 में हुआ, जिसे ‘लॉयड जॉर्ज–क्लिमेंशो समझौता’ कहा जाता है। मेसोपोटामिया के युद्ध के परिणामस्वरूप ब्रिटेन का मोसुल क्षेत्र पर अधिकार हो गया था। इसलिए साइक्स-पिकॉट समझौते में संशोधन आवश्यक समझा गया। दिसंबर 1918 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज और फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लिमेंशो ने यह निर्णय लिया कि मोसुल क्षेत्र, जो पहले फ्रांस को मिलने वाला था, अब ब्रिटेन को दिया जाएगा। इसके बदले फ्रांस को उत्तरी मेसोपोटामिया देने का निश्चय किया गया।
मित्र-राष्ट्रों ने केवल आपसी समझौते ही नहीं किए, बल्कि अरबों और यहूदियों से भी अलग-अलग वादे किए। जनवरी 1916 में ब्रिटेन ने मक्का के शरीफ हुसैन को एक विशाल स्वतंत्र अरब राज्य की स्थापना का आश्वासन दिया था। इस प्रस्तावित राज्य की सीमाएँ उत्तर में 37वें अक्षांश से लेकर दक्षिण में अरब की खाड़ी तक तथा पूर्व में फारस की खाड़ी से पश्चिम में लाल सागर तक फैली हुई थीं। केवल सीरिया के तटीय क्षेत्र को इससे अलग रखा गया था। इस प्रकार अरबों को स्वतंत्रता का प्रलोभन देकर तुर्की के विरुद्ध विद्रोह के लिए प्रेरित किया गया। दूसरी ओर 2 नवंबर 1917 को ब्रिटिश विदेश मंत्री आर्थर बालफोर ने प्रसिद्ध ‘बालफोर घोषणा’ जारी की। इसके द्वारा ब्रिटिश सरकार ने फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए “राष्ट्रीय गृह” स्थापित करने की योजना के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट की थी।
इन सभी संधियों और समझौतों में गंभीर अंतर्विरोध थे। साइक्स-पिकॉट समझौता, बालफोर घोषणा तथा ब्रिटिश-अरब समझौते परस्पर विरोधी थे। एक ओर अरबों को स्वतंत्रता का आश्वासन दिया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर उन्हीं क्षेत्रों को ब्रिटेन और फ्रांस के प्रभाव-क्षेत्रों में बाँटने की योजनाएँ बनाई जा रही थीं। इसी प्रकार फिलिस्तीन के संबंध में अरबों और यहूदियों दोनों से परस्पर विरोधी वादे किए गए थे। 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद सोवियत रूस की नई सरकार ने इन सभी गुप्त संधियों को सार्वजनिक कर दिया। इससे अरबों में गहरी निराशा फैल गई, क्योंकि उन्हें ज्ञात हो गया कि मित्र-राष्ट्र वास्तव में उनकी स्वतंत्रता के पक्षधर नहीं थे, बल्कि पश्चिम एशिया के विभाजन और नियंत्रण की योजनाएँ बना रहे थे।
पेरिस शांति सम्मेलन का आरंभ
1919 में जब पेरिस शांति सम्मेलन प्रारंभ हुआ, तब ओटोमन साम्राज्य पराजित और विखंडित हो चुका था। उसके विभिन्न क्षेत्रों पर मित्र-राष्ट्रों का अधिकार हो चुका था। इरान, सीरिया, मेसोपोटामिया, फिलिस्तीन और तुर्की के विशाल भाग में ब्रिटिश सेनाएँ तैनात थीं, जबकि सिलीसिया तथा आदान में फ्रांसीसी सेनाएँ जमी हुई थीं और अदालिया इटली के कब्जे में था।
सीरिया की राजधानी दमिश्क में अमीर फैसल ने अपना शसन स्थापित कर लिया था। उसने पेरिस सम्मेलन में अरब राष्ट्रवाद के प्रतिनिधि के रूप में अरबों की स्वतंत्रता की माँग प्रस्तुत की। दूसरी ओर चाइम वीज़मैन ने फिलिस्तीन में यहूदी राज्य की स्थापना की माँग को लेकर पेरिस पहुँचे थे। इन दोनों को ब्रिटेन का समर्थन प्राप्त था। दूसरी ओर फ्रांस, इटली और यूनान भी ओटोमन साम्राज्य के विभिन्न भागों पर अपने-अपने दावे प्रस्तुत कर रहे थे। फ़्रांस सीरिया तथा उसके आसपास के क्षेत्रों की माँग कर रहा था और साइक्स-पिकॉट समझौते के कार्यान्वयन पर जोर दे रहा था। यूनान स्मिर्ना पर आँख गड़ाए बैठा था और अदालिया में अपने सेना भेज दी थी। इसके अतिरिक, अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के चौदह सूत्रों ने स्थिति को और भी जटिल बना दिया था। विल्सन ने गुप्त संधियों को मान्यता देने से इनकार कर दिया और आत्मनिर्णय के सिद्धांत का समर्थन किया। उनके अनुसार प्रत्येक राष्ट्र को अपनी राजनीतिक व्यवस्था निर्धारित करने का अधिकार होना चाहिए। यदि इस सिद्धांत को पूर्ण रूप से लागू किया जाता, तो मित्र-राष्ट्रों की साम्राज्यवादी योजनाएँ मिट्टी में मिल जातीं। इस प्रकार पेरिस शांति सम्मेलन में पश्चिम एशिया और तुर्की से संबंधित प्रश्नों का समाधान सरलता से नहीं हो सका और आगे चलकर पश्चिम एशिया की राजनीति में अनेक नए संघर्षों की नींव पड़ गई।
सेव्र की संधि (10 अगस्त 1920)
पेरिस शांति सम्मेलन में पराजित देशों के साथ जो संधियाँ की गईं, वे उनके ऊपर बलपूर्वक थोपी गई थीं। जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी और तुर्की—कोई भी देश इन संधियों से संतुष्ट नहीं था। जर्मनी में वर्साय की संधि के विरुद्ध अगले ही दिन से प्रतिक्रिया प्रारंभ हो गई। जर्मन समाचार-पत्रों में ‘कहीं हम भूल न जाएँ’ शीर्षक से लेख प्रकाशित होने लगे। जर्मन जनता अपनी पराजय और अपमान को भूल नहीं सकी और लगभग बीस वर्षों के भीतर एडोल्फ हिटलर के नेतृत्व में पुनः युद्ध की तैयारी करने लगी।
पराजित तुर्की के साथ जो सेव्र (Sevres) की संधि की गई, वह जर्मनी के साथ की गई वर्साय की संधि की तरह ही एक आरोपित संधि थी, जिसे विजयी राष्ट्रों ने तुर्की पर थोप दिया था। युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्र तुर्की से संबंधित अनेक गुप्त समझौते कर चुके थे, जिसके कारण यह संधि तत्काल लागू नहीं हो सकी, किंतु अंततः 10 अगस्त 1920 को तुर्की के सुल्तान मेहमद षष्ठ की ओर से दामाद फ़रीद पाशा (ग्रैंड वज़ीर) सहित ओटोमन प्रतिनिधिमंडल ने सेव्र की संधि पर हस्ताक्षर कर दिए।
सेव्र (Sevres) की संधि के प्रावधान
सेव्र की संधि के अंतर्गत की गई प्रादेशिक व्यवस्था को तीन भागों में बाँटा जा सकता है— प्रथम, यूरोप विशेषकर थ्रेस की व्यवस्था, जिसका प्रभाव यूनानी, बुल्गार और तुर्क लोगों पर पड़ा; दूसरे, जलडमरूमध्य तथा कॉन्स्टेंटिनोपल का अंतर्राष्ट्रीयकरण, जिसका संबंध तुर्की, इंग्लैंड, फ्रांस तथा इटली से था; तीसरे, एशिया माइनर, फिलिस्तीन, सीरिया तथा अरबों की समस्याएँ, जिनका संबंध यूनानी, तुर्क, अरब और यहूदी लोगों से था, जिसने पूर्व में राष्ट्र-निर्माण की विकट समस्या को जन्म दिया।
प्रादेशिक व्यवस्था : सेव्र की संधि के द्वारा सर्वप्रथम प्रादेशिक व्यवस्था में परिवर्तन किए गए। हिजाज़ को एक स्वतंत्र राज्य मान लिया गया। सीरिया, फिलिस्तीन और मेसोपोटामिया पर से तुर्की का नियंत्रण समाप्त हो गया। इन क्षेत्रों का भविष्य मित्रराष्ट्रों पर छोड़ दिया गया। पूर्वी थ्रेस यूनान को दे दिया गया। बुल्गारिया से प्राप्त पश्चिमी थ्रेस को भी मित्रराष्ट्रों ने यूनान के हवाले कर दिया। फिर पाँच वर्षों के लिए स्मिर्ना यूनानी शासन में रखा गया। एजियन द्वीपों पर भी यूनान की प्रभुसत्ता मान ली गई और आर्मेनिया को स्वतंत्र कर दिया गया। तुर्की ने कुर्दिश क्षेत्र के लिए स्थानीय स्वायत्तता मान ली और इसके लिए किसी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को स्वीकार करने का वचन दिया। तुर्की ने जलडमरूमध्यों पर अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण और रूस के आसपास के क्षेत्रों के निःशस्त्रीकरण को भी स्वीकार कर लिया। कॉन्स्टेंटिनोपल पर तुर्की का अधिकार बना रहा।
सैनिक व्यवस्था : सेव्र की संधि में कुछ सैनिक धाराएँ भी थीं, जिनके अनुसार तुर्की पर कई प्रकार के सैनिक प्रतिबंध लगा दिए गए। तुर्की के सैनिकों की संख्या निश्चित कर दी गई और यह तय हुआ कि तुर्की पचास हजार से अधिक सेना नहीं रख सकता है। अनिवार्य सैनिक सेवा को बंद कर दिया गया और यह प्रतिबंध भी लगाया गया कि तुर्की की सेना मित्रराष्ट्रों के परामर्श के बिना कहीं आ-जा नहीं सकती। जल-सेना को लगभग समाप्त ही कर दिया गया।
आर्थिक व्यवस्था : सेव्र की संधि के द्वारा तुर्की पर कई प्रकार के आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए गए। ब्रिटेन, फ्रांस तथा इटली को मिलाकर एक आर्थिक आयोग का गठन किया गया, जिसका कार्य तुर्की के सार्वजनिक ऋण, राजकीय बजट, सिक्कों, करों आदि पर कड़ा नियंत्रण रखना था। तुर्की ने यह भी स्वीकार किया कि वह राज्य में रहने वाले आर्मेनियाई, यूनानी तथा ईसाई अल्पसंख्यकों के साथ कभी बुरा व्यवहार नहीं करेगा और उनकी राष्ट्रीयता के विकास में पूरा सहयोग देगा।
इस प्रकार तुर्की साम्राज्य के संबंध में जो नई व्यवस्था हुई, उसके अनुसार चार लाख चालीस हजार वर्गमील भूमि तुर्की के हाथ से निकल गई। अब उसकी आबादी केवल अस्सी लाख रह गई और एक करोड़ बीस लाख व्यक्ति उसकी अधीनता से मुक्त हो गए। यह व्यवस्था की गई कि तुर्की की सेना में सैनिकों की संख्या पचास हजार से अधिक न हो। तुर्की की जल-सेना लगभग समाप्त कर दी गई और उसे एक छोटे और शक्तिहीन राज्य में परिवर्तित कर दिया गया। सेव्र की संधि के कारण मिस्र, सूडान, साइप्रस, त्रिपोलितानिया, मोरक्को और ट्यूनीशिया पर तुर्की का अधिकार पूर्ण रूप से समाप्त हो गया। इन देशों पर तुर्की को जो अनेक प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे, उनका भी अंत हो गया। अरब, फिलिस्तीन, मेसोपोटामिया और सीरिया तुर्की से मुक्त कर दिए गए और यूरोप में जो अनेक प्रदेश तुर्की के साम्राज्य में थे, उन्हें ग्रीक को दे दिया गया।
सेव्र की संधि का प्रतिरोध और कमाल पाशा
तुर्की के राष्ट्रवादियों ने इस आरोपित और अपमानजनक संधि का एक स्वर से कड़ा विरोध किया और इन विरोधियों का नेतृत्व मुस्तफा कमाल पाशा अतातुर्क ने किया। सुल्तान की सरकार को लगता था कि सेव्र की संधि को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है। परंतु कमाल पाशा का कहना था कि तुर्की को इस संधि को स्वीकार नहीं करना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर युद्ध का सहारा लेकर भी इसका प्रतिरोध करना चाहिए। मुस्तफ़ा कमाल सुल्तान को पदच्युत किए जाने के पक्ष में नहीं था। पहले उसे आशा थी कि वह सुल्तान को सही रास्ते पर ला सकेगा। परंतु जब उसने देखा कि सुल्तान अपने दरबारियों और निकम्मे अधिकारियों के हाथों कठपुतली बन गया है और सुल्तान को सत्ता में बनाए रखने का अर्थ सेव्र की अपमानजनक संधि को स्वीकार करना होगा, तो वह क्रांति का समर्थक हो गया। फ्रांस की राज्यक्रांति के इतिहास से जो शिक्षाएँ उसने ग्रहण की थीं, उनका उसने अनुसरण किया और इसका परिणाम हुआ कि तुर्की में सल्तनत का अंत होकर गणराज्य की स्थापना हुई और इसका पूरा श्रेय कमाल पाशा को ही जाता है।
प्रथम ग्रैंड नेशनल असेंबली
जिस समय सुल्तान की सरकार सेव्र (Sevres) की संधि पर हस्ताक्षर कर रही थी, उस समय मुस्तफा कमाल पाशा अनातोलिया में इंस्पेक्टर जनरल के पद पर कार्य कर रहा था। जब मुस्तफ़ा कमाल ने सेव्र की संधि का विरोध प्रारंभ किया, तो तुर्की के राष्ट्रवादी और देशभक्त उसके चारों ओर एकत्र होने लगे। अनातोलिया में एक ‘राष्ट्रीय सभा’ का संगठन किया गया था, जिसमें कमाल पाशा ने भाग लेना शुरू किया। इस राष्ट्रीय सभा ने सितंबर 1919 में एक ‘अखिल तुर्क कांग्रेस’ का आयोजन किया, जिसका प्रथम अधिवेशन सिवास नामक स्थान पर हुआ। मुस्तफ़ा कमाल इसके अध्यक्ष चुने गए और उसने तुर्की को निर्बल तथा निष्प्राण प्रशासन से मुक्त कराने का संकल्प लिया। इस घटना से सुल्तान की सरकार की चिंता बहुत बढ़ गई। उसने कमाल पाशा को गिरफ्तार करने का आदेश दिया, परंतु अनातोलिया के किसी सरकारी अधिकारी में इतना साहस नहीं हुआ कि वह कमाल पाशा को बंदी बना सके। संपूर्ण अनातोलिया में विद्रोह और क्रांति की भावनाएँ प्रबल हो रही थीं। कमाल पाशा के नेतृत्व में वहाँ एक स्वतंत्र समानांतर सरकार की स्थापना की गई, जिसकी राजधानी अंकारा बनाई गई। अंकारा एशिया माइनर के मध्य में स्थित कॉन्स्टेंटिनोपल से दूर एक महत्त्वपूर्ण नगर था।
23 अप्रैल 1920 को अंकारा में प्रथम ग्रैंड नेशनल असेंबली की बैठक हुई, जिसमें मुस्तफ़ा कमाल अध्यक्ष तथा राष्ट्रीय सेना के सर्वोच्च नेता चुने गए। उन्होंने यह संकल्प लिया कि जब तक खलीफा-सुल्तान विदेशी विजेताओं के सामने झुकने की नीति अपनाएगा, तब तक वे तुर्की की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहेंगे।
1921 में अंकारा में ग्रैंड नेशनल असेंबली ने घोषणा की कि अंकारा की सरकार तुर्की राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है, सुल्तान की सरकार नहीं। इसी सभा में राष्ट्रीय सत्ता को वैधानिक रूप देने की प्रक्रिया आरंभ हुई। इसके अंतर्गत ‘राष्ट्रीय प्रतिज्ञा” घोषित की गई, जिसमें कॉन्स्टेंटिनोपल की पूर्ण स्वतंत्रता तथा मुस्लिम-बहुल ऑटोमन क्षेत्रों के तुर्की प्रभुसत्ता के अधीन एकीकरण की माँग की गई। असेंबली ने अंकारा समझौते के अंतर्गत एक ‘छह-सूत्रीय’ कार्यक्रम घोषित किया, जिसे ‘नेशनल पैक्ट’ कहा गया है—
- अरबों की स्वतंत्रता स्वीकार किया जाए, तुर्कों और कुर्दों को भी अपना अलग अस्तित्व प्राप्त हो।
- बाटुम, कार्स तथा आर्दाहान के तीन संजकों में जनमत-संग्रह कराया जाए।
- पश्चिमी थ्रेस के लिए भी जनमत-संग्रह कराया जाए।
- कॉन्स्टेंटिनोपल की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, क्योंकि वह सुल्तान का निवास-स्थान था, भले ही इसके बदले तुर्की जलडमरूमध्य का अंतर्राष्ट्रीयकरण हो जाए।
- अल्पसंख्यकों की अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा की व्यवस्था की जाए तथा तुर्की के बाहर रहने वाले मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भी संरक्षण प्रदान किया जाए।
महान राष्ट्रीय सभा ने प्रारंभिक प्रशासनिक और संवैधानिक कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा करना आरंभ कर दिया। अंततः 2 नवंबर 1922 को अंकारा की महान राष्ट्रीय सभा ने सुल्तान मेहमद षष्ठ को सिंहासन से हटा दिया। सुल्तान का पद समाप्त कर दिया गया, यद्यपि साम्राज्य की औपचारिक समाप्ति की तत्काल घोषणा नहीं की गई।
एक वर्ष बाद तुर्की को गणतंत्र घोषित किया गया और मुस्तफ़ा कमाल को उसका प्रथम राष्ट्रपति चुना गया। दूसरी ओर सुल्तान बार-बार तुर्क जनता से अपील करता रहा कि वे अंकारा सरकार का साथ छोड़ दें, किंतु उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मुस्तफ़ा कमाल पाशा की वीरता, नेतृत्व क्षमता और मातृभूमि के प्रति समर्पण ने उसे तुर्क जनता का सर्वमान्य नेता बना दिया।
सेव्र की संधि का विरोध
कमाल पाशा की समानांतर सरकार ने केवल यह घोषणा नहीं की कि सेव्र की संधि उसे स्वीकार नहीं है, बल्कि यूनान और इटली आदि ने तुर्की के जिन प्रदेशों पर अपना अधिकार स्थापित किया था, उनके विरुद्ध उसने युद्ध करने का निश्चय किया। सुल्तान इस समय पूरी तरह मित्रराष्ट्रों के साथ था। उसने घोषणा की कि अंकारा की सरकार के कार्यों से तुर्की की वैध सरकार किसी भी प्रकार सहमत नहीं है और प्रत्येक राजभक्त तुर्क का कर्तव्य है कि वह सुल्तान का साथ दे और अंकारा से कोई संबंध न रखे। परंतु कमाल पाशा के साहसी कृत्यों के कारण तुर्क जनता उसे अपना वीर नेता मानने लगी थी।
यूनान के साथ युद्ध
सेव्र की संधि के अनुसार यूनान का प्रधानमंत्री एलेफ्थेरियोस वेनिज़ेलोस मृतप्राय तुर्की साम्राज्य में अधिक से अधिक हिस्सा पाना चाहता था। किंतु मुस्तफ़ा कमाल और उसकी राष्ट्रीय सभा ने इस संधि को स्वीकार करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया और घोषणा की कि उनका उद्देश्य तुर्की की पूर्ण स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकीकरण है।
यूनानी प्रधानमंत्री एलेफ़्थेरियोस वेनिज़ेलोस की महत्त्वाकांक्षाओं को देखते हुए मुस्तफ़ा कमाल ने तुरंत अपनी सेनाओं को संगठित करना प्रारंभ किया। सबसे पहले 1920 के आरंभ में उसकी सेना ने फ्रांसीसियों पर धावा बोला और उन्हें अलेप्पो की ओर खदेड़ दिया। इसके बाद कमाल आर्मेनिया की ओर बढ़ा क्योंकि सेव्र की संधि के अनुसार तुर्क आबादी वाले कुछ क्षेत्र उससे छीन लिए गए थे।। इन क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करने के उद्देश्य से सैन्य कार्रवाई की गई और तुर्की को सफलता मिली। एलेक्ज़ेंड्रोपोल की संधि के अनुसार तुर्की को अनेक क्षेत्र वापस मिल गए।
इस प्रकार ऐसा लग रहा था कि सेव्र की संधि का अंत उसके जन्म के साथ ही हो जाएगा। तुर्की सेना की गतिविधि अत्यंत खतरनाक हो रही थी। विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद मित्र राष्ट्र थक चुके थे और वे अब तुर्की की राजनीति में अधिक उलझना नहीं चाहते थे। किंतु तुर्की के राष्ट्रवादियों द्वारा सेव्र की संधि की खुली अवहेलना भी उन्हें स्वीकार नहीं थी। अंततः ब्रिटिश ऋण की सहायता से यूनान ने तुर्की के राष्ट्रीय आंदोलन को दबाने का बीड़ा उठाया और तुर्की के विरुद्ध सैनिक कार्रवाई शुरू की।
कमाल पाशा ने 1921 के आरंभ में पश्चिमी अनातोलिया से यूनानियों को भगाने की योजना बनाई और कूटनीतिक समझौतों के द्वारा अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। 13 मार्च को उसने इटली के साथ एक संधि कर ली, जिसके अनुसार इटली कुछ आर्थिक सुविधाओं के बदले अनातोलिया पर से अपना अधिकार हटाने के लिए राजी हो गया। इसके अतिरिक्त 16 मार्च 1921 को सोवियत संघ के साथ तुर्की की एक संधि हुई। तुर्की ने रूस को बाटुम का प्रदेश दे दिया और इसके बदले रूस ने आर्मेनिया के संबंध में अलेक्जेंड्रोपोल की संधि को मान्यता दे दी। कमाल पाशा को सोवियत संघ ने सैनिक सहायता देने का भी वचन दिया। उधर फ्रांस भी ब्रिटेन द्वारा यूनानियों के समर्थन को अच्छा नहीं समझता था, क्योंकि इससे पश्चिम एशिया में ब्रिटिश प्रभाव बढ़ने की आशंका थी। इसलिए यूनानी आक्रमणकारियों के विरुद्ध कमाल पाशा की कार्रवाई को सफल बनाने के लिए फ्रांस ने सिलीसिया से भी अपना सैनिक संबंध समाप्त कर लिया।
रूस, फ्रांस और इटली से निश्चिंत होकर कमाल पाशा ने यूनानियों से लड़ने की तैयारी की। इस समय तक वेनिजेलोस का पतन हो चुका था और यूनान में पुनः राजतंत्र की स्थापना हो गई थी। नया राजा कॉन्स्टेंटाइन, जिसे इंग्लैंड का नैतिक समर्थन और वित्तीय सहायता प्राप्त थी, तुर्की की राजधानी अंकारा पर अधिकार करना चाहता था।
मुस्तफा कमाल को अपनी स्थिति पर पूर्ण विश्वास था। उसने कहा कि यूनानी भले ही उसे पराजित कर दें, परंतु वह उसके घेरे में नहीं आएगा। वह ऐसे प्रदेशों में चला जाएगा जहाँ यूनानी सेना कभी पहुँच नहीं सकेगी और तब तक संघर्ष जारी रखेगा, जब तक यूनानी पराजय स्वीकार नहीं कर लेते।
1921 में यूनानियों ने तुर्की पर आक्रमण किया और कमाल पाशा ने उनका सामना करने का निश्चय किया। यूनानी सेना बड़ी वीरता के साथ आगे बढ़ती गई, परंतु अंकारा के आसपास के पथरीले पठारी क्षेत्रों को पार नहीं कर सकी और वहाँ पहुँचने से पहले ही यूनानी आक्रमण रुक गया। अब यूनानी सेना एशिया माइनर में एक ऐसे अनिश्चित मोर्चे पर फँस गई थी, जहाँ से वह न तो आगे बढ़ सकती थी और न पीछे हट सकती थी। यूनानी सेना की पराजय लगभग निश्चित हो चुकी थी।
अगस्त 1922 में जब यूनानी सेना कठिन परिस्थिति में फँसी हुई थी, मुस्तफा कमाल ने पहाड़ियों से उतरकर अचानक यूनानियों पर आक्रमण कर दिया और यूनानी सैनिकों को पीछे धकेल दिया। यह एक पूर्ण और महान विजय थी। सितंबर में स्मिर्ना पर भी तुर्कों का अधिकार हो गया और नगर में आग लगा दी गई। इस युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम दोनों देशों की जनसंख्या का अनिवार्य विनिमय था। यूनानी सैनिकों को ही नहीं, बल्कि यूनानी निवासियों को भी तुर्की छोड़ना पड़ा और यूनान में रहने वाले तुर्कों को वापस तुर्की लौटना पड़ा। थ्रेस और कॉन्स्टेंटिनोपल में रहने वाले यूनानियों और तुर्कों को इससे मुक्त रखा गया और इन क्षेत्रों की मिश्रित जनसंख्या को यथावत रहने दिया गया।
मित्र राष्ट्रों की नीति में परिवर्तन
अपनी विजय के बाद मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने अपनी सेना के साथ इस्तांबुल की ओर प्रयाण किया और डार्डानेल्स तथा अन्य जलडमरूमध्यों की ओर बढ़ गया। वहाँ उसने देखा कि पूरे क्षेत्र को तीन भागों में बाँटकर ब्रिटिश, फ्रांसीसी और इतालवी सैनिकों ने अधिकार कर रखा है। कॉन्स्टेंटिनोपल में अभी तक ब्रिटिश सेना और मारमरा सागर में ब्रिटिश नौसैनिक बेड़ा मौजूद था। किंतु तुर्की सेना के सामने फ्रांसीसी और इतालवी सेनाएँ अधिक देर तक टिक नहीं सकीं और पीछे हट गईं, परंतु ब्रिटिश सैनिक अपने स्थान पर डटे रहे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज ने घोषणा की कि वह जलडमरूमध्यों की स्वतंत्रता की रक्षा करेगा और कमाल पाशा की सेना को यूरोप में प्रवेश नहीं करने देगा। परंतु ब्रिटेन की स्थिति उतनी मजबूत नहीं थी जितनी दिखाई देती थी। वह पहले ही संकेत दे चुका था कि पूर्वी थ्रेस तुर्की को लौटाया जा सकता है।
मित्र राष्ट्र अब तक यह समझ चुके थे कि तुर्की के राष्ट्रीय आंदोलन को रोकना संभव नहीं है क्योंकि मुस्तफ़ा कमाल के नेतृत्व में राष्ट्रीय सेना किसी भी संघर्ष के लिए तैयार थी। मित्र राष्ट्रों को यह अनुभव होने लगा कि तुर्की के साथ संघर्ष जारी रखने की अपेक्षा बेहतर यह है कि तुर्की की नई सरकार के साथ संधि कर ली जाए। इसके लिए स्विट्जरलैंड के नगर लोज़ान में एक सम्मेलन आयोजित किया गया, जहाँ तुर्की की नई सरकार के साथ सभी विवादित मामलों का नए सिरे से समाधान खोजने का प्रयास किया गया।
लोजान की संधि, 24 जुलाई 1923
लोज़ान सम्मेलन के प्रारंभ होने से पहले ही कमाल पाशा की सरकार तुर्की की एकमात्र सरकार बन चुकी थी, क्योंकि 1 नवंबर 1922 को महान राष्ट्रीय सभा ने सुल्तान मेहमद षष्ठ को सिंहासन से हटा दिया था और वह तुर्की छोड़कर बाहर चला गया था। इस परिस्थिति में कमाल पाशा की सरकार से वार्ता शुरू हुई और 24 जुलाई 1923 को लोज़ान की संधि पर हस्ताक्षर हुए। 29 अक्टूबर 1923 को तुर्की को गणतंत्र घोषित कर दिया गया। मुस्तफ़ा कमाल पाशा उसके प्रथम राष्ट्रपति चुने गए।
लोजान की संधि के प्रमुख प्रावधान
लोजान की संधि के अनुसार तुर्की को यूनान से पूर्वी थ्रेस तथा बुल्गारिया से एड्रियानोपिल का प्रदेश मिल गया और स्मिर्ना पर तुर्की का अधिकार स्वीकार कर लिया गया। अनातोलिया के वे सभी प्रदेश, जो इटली को दिए गए थे, पुनः तुर्की को लौटा दिए गए। कुर्दिस्तान पर भी तुर्की का अधिकार स्वीकार किया गया, किंतु इराक और कुर्दिस्तान की सीमा निश्चित करने का तथा मोसुल सीमा विवाद का प्रश्न भविष्य के लिए स्थगित कर दिया गया।
संधि के अनुसार जलडमरूमध्यों पर से अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण हटा दिया गया और तुर्की ने वहाँ किलेबंदी न करने का वचन दिया। शांति काल में सभी देशों के जहाज़ों को वहाँ से आने-जाने की स्वतंत्रता प्रदान की गई।
तुर्की में विदेशियों को प्राप्त विशेष संरक्षण समाप्त कर दिए गए तथा मित्र राष्ट्रों को क्षतिपूर्ति के रूप में दी जाने वाली राशि भी त्याग दी गई। उसकी सैनिक शक्ति पर लगाए गए सभी प्रतिबंध समाप्त कर दिए गए और उसे अपनी सुरक्षा तथा सेना के संगठन का पूर्ण अधिकार प्राप्त हो गया। इस प्रकार तुर्की ने राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक दृष्टि से पुनः स्वतंत्र अस्तित्व प्राप्त कर लिया।
इस प्रकार लोजान की संधि से तुर्की को अनेक विशाल प्रदेश पुनः मिल गए, जिससे उसकी जनसंख्या नब्बे लाख से बढ़कर लगभग एक करोड़ तीस लाख हो गई। यद्यपि नवीन तुर्की राज्य क्षेत्रफल की दृष्टि से पूर्व ओटोमन साम्राज्य की तुलना में छोटा था, फिर भी वह पूर्णतः स्वतंत्र तथा विदेशी प्रभावों से मुक्त हो चुका था। इतिहासकार शेविल ने लिखा है : ‘लोजान की संधि के परिणामस्वरूप जिस स्वतंत्र तुर्की का उदय हुआ, वह एक अकेले व्यक्ति मुस्तफ़ा कमाल का कार्य था।” वास्तव में मुस्तफ़ा कमाल पाशा के नेतृत्व, दृढ़ संकल्प और राष्ट्रवादी आंदोलन के कारण ही तुर्की सेवर्स की अपमानजनक संधि को समाप्त कर सम्मानजनक स्थिति प्राप्त करने में सफल हुआ।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की समाप्ति के बाद जितनी भी संधियाँ हुईं, उनमें केवल लोजान की संधि ही ऐसी थी, जो दोनों पक्षों के मध्य आपसी समझौते से तय हुई थी। तुर्की का राजनीतिक क्षेत्रफल पहले की अपेक्षा काफी बढ़ गया और उसकी प्रायः अपनी सभी मुख्य माँगें मान ली गई थीं। कहा गया है कि ‘लोजान की संधि ही ऐसी संधि थी, जिसे सभी देशों ने आगामी तेरह वर्षों तक उचित माना।’ यही एकमात्र ऐसी संधि थी, जिसे आगामी कई वर्षों तक सभी देशों ने मान्यता दी। यह तुर्की के राष्ट्रवादियों की महान विजय थी और मुस्तफ़ा कमाल ने अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता का जो स्वप्न देखा था, उसे साकार कर दिया।
इस प्रकार लोजान की संधि ने न केवल मुस्तफ़ा कमाल के स्वप्नों को पूरा किया, बल्कि मित्र राष्ट्रों को भी तुर्की के राष्ट्रीय आंदोलन की शक्ति का एहसास करा दिया। संभवतः इसी कारण मित्र राष्ट्रों ने जुलाई 1923 में सर्वसम्मति से इस संधि पर हस्ताक्षर कर दिए और नवीन तुर्की राज्य को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्रदान की।
लोजान की संधि यूरोप की शक्तियों के लिए अत्यंत अपमानजनक थी, किंतु उनके पास इसे स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं था। इस गौरवपूर्ण विजय के बाद मुस्तफा कमाल ने निरस्त्रीकरण तथा सैनिक शक्ति को सीमित करने से भी इनकार कर दिया। यूरोप की शक्तियों को चुनौती देने के उद्देश्य से उसने तुर्की की राजधानी को अंकारा के सुरक्षित पहाड़ी क्षेत्र में स्थापित किया।
इस प्रकार मुस्तफा कमाल पाशा ने लोजान की संधि के माध्यम से सेव्र की संधि के कलंक को धो दिया। इस संधि द्वारा कैपिचुलेशन्स का अंत कर दिया गया। तुर्की पर लगाए गए सभी आर्थिक नियंत्रण समाप्त कर दिए गए और उसकी सेना पर भी अब कोई प्रतिबंध नहीं रहा। नि:संदेह लोजान की संधि तुर्की के राष्ट्रवादियों की एक महान् विजय थी। इसके द्वारा कमाल की सरकार को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त हुई तथा राष्ट्रीय पैक्ट का कार्यक्रम लगभग पूर्ण हो गया। ओटोमन परंपरा का अंत हो गया और तुर्की को स्वतंत्र राष्ट्रीय अस्तित्व प्राप्त हुआ। न्याय, सेना तथा अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में विदेशी प्रभाव समाप्त कर दिया गया। तुर्की पहले की अपेक्षा छोटा अवश्य हो गया, किंतु नए प्रगतिशील नेतृत्व में उसके भविष्य के लिए आशा का संचार हुआ। पश्चिमी एशिया में शांति स्थापित करने की दृष्टि से सेव्र की संधि की अपेक्षा लोजान की संधि अधिक प्रभावशाली सिद्ध हुई, क्योंकि यह कोई आरोपित संधि नहीं थी, बल्कि आपसी विचार-विमर्श और सहमति पर आधारित थी।
तुर्की गणराज्य की स्थापना
1923 में लोजान सम्मेलन आरंभ होने से कुछ समय पूर्व ही तुर्की का सुल्तान गद्दी छोड़कर भाग गया था। उसके जाने के बाद उसके भतीजे अब्दुल मजीद को सुल्तान घोषित किया गया, किंतु उसके सभी अधिकार छीन लिए गए। कुछ समय बाद पूरे देश में चुनाव कराए गए तथा ग्रैंड नेशनल एसेम्बली का गठन किया गया। इस सभा ने 29 अक्टूबर 1923 को तुर्की गणराज्य की औपचारिक घोषणा की और मुस्तफा कमाल पाशा सर्वसम्मति से इस नवीन गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित किए गए।
मुस्तफा कमाल पाशा ने शासन की समस्त शक्तियाँ अपने हाथ में केंद्रित कर लीं। यद्यपि उनका शासन अधिनायकवादी था, फिर भी उनका उद्देश्य तुर्की का उत्थान और आधुनिकीकरण था। यही कारण था कि वह 1927 में दूसरी बार और 1931 में तीसरी बार सर्वसम्मति से राष्ट्रपति चुने गए।
मुस्तफ़ा कमाल ने खलीफा के प्रभुत्व को अस्वीकार कर दिया। उसका शासन यद्यपि कठोर था, परंतु वह सुधारों के लिए पूर्णतः समर्पित था। वे तुर्की का पश्चिमीकरण करके उसे एक आधुनिक, प्रगतिशील और गणतांत्रिक राष्ट्र बनाना चाहते थे। उनके नेतृत्व में तुर्की गणराज्य एक उदार, सहिष्णु और आधुनिक राष्ट्र के रूप में विकसित हुआ, जहाँ धर्म की अपेक्षा राष्ट्र के प्रति निष्ठा को अधिक महत्त्व दिया गया।
प्रजातांत्रिक सरकार के मूल सिद्धांत
मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने अपनी गणतांत्रिक सरकार के लिए कुछ मूलभूत सिद्धांत निर्धारित किए, जिसका उसने स्वयं पालन किया और कठोरतापूर्वक लागू भी कराया—
- तुर्की में राजतंत्र को समाप्त करके प्रजातांत्रिक व्यवस्था स्थापित की जाएगी।
- सरकार राष्ट्रवादी नीति का पालन करेगी। उसने घोषणा की कि ‘जो लोग तुर्की में निवास करते हैं, तुर्की भाषा बोलते हैं, तुर्की के कानूनों का पालन करते हैं और तुर्की को अपना राष्ट्र मानते हैं, वे सभी तुर्की के नागरिक माने जाएँगे।’
- जनता की सर्वोच्चता को स्वीकार किया जाएगा।
- राष्ट्रहित में कार्य करते हुए व्यापक सुधार योजनाएँ लागू की जाएँगी।
- तुर्की को निरंतर विकास और प्रगति की दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा।
- तुर्की को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाया जाएगा।
प्रारंभ में यह निर्णय लिया गया था कि सुल्तान मेहमद षष्ठ का शासन से कोई संबंध नहीं रहेगा, किंतु उसे खलीफा के पद पर बने रहने दिया जाएगा। परंतु तुर्की में क्रांतिकारी विचारों के तीव्र प्रसार के कारण कमाल ने मार्च 1924 में खिलाफत की संस्था को समाप्त कर तुर्की को औपचारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित कर दिया। इसके पश्चात अप्रैल 1924 में गणराज्य के लिए एक नवीन संविधान लागू किया गया, जिसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—
- राज्य की संप्रभुता तुर्की की जनता में निहित रहेगी।
- जनता द्वारा निर्वाचित सभा तुर्की की संसद कहलाएगी।
- संसद एकसदनीय होगी तथा उसके सदस्य जनता द्वारा चुने जाएँगे।
- संसद के नियमित अधिवेशन आयोजित किए जाएँगे।
- राष्ट्रीय सभा को राष्ट्रपति के चुनाव का अधिकार दिया गया।
- राष्ट्रीय सभा के सदस्यों में से प्रधानमंत्री का चयन किया जाएगा तथा उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा।
- शासन संचालन के लिए मंत्रिमंडल का गठन होगा, जिसमें मंत्रियों के चयन में प्रधानमंत्री की प्रमुख भूमिका होगी।
- मंत्रिमंडल सामूहिक रूप से राष्ट्रीय सभा के प्रति उत्तरदायी रहेगा।
इस प्रकार मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने नवीन संविधान लागू करके तुर्की में गणराज्य की स्थापना को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।
1934 में एक कानून पारित किया गया, जिसके अनुसार प्रत्येक तुर्क नागरिक के लिए अपने नाम के साथ उपनाम धारण करना अनिवार्य कर दिया गया। इसके अंतर्गत मुस्तफ़ा कमाल ने स्वयं ‘अतातुर्क’ (तुर्कों का पिता) उपनाम ग्रहण किया।




