मुस्तफा कमाल पाशा की विदेश नीति (Mustafa Kemal Pasha's Foreign Policy)

मुस्तफा कमाल पाशा की विदेश नीति (Mustafa Kemal Pasha’s Foreign Policy)

तुर्की की विदेश नीति

प्रथम विश्व युद्ध में पराजय के पश्चात तुर्की को अत्यंत अपमानजनक सेवर्स की संधि (10 अगस्त 1920) पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया गया। युद्ध में तुर्की जर्मन गुट की ओर से सम्मिलित हुआ था और उसकी पराजय के बाद उसका राजनीतिक एवं सामरिक अस्तित्व संकट में पड़ गया। मित्र राष्ट्र पहले से ही ऑटोमन साम्राज्य के विभाजन की योजना बना चुके थे। यूरोपीय शक्तियाँ लंबे समय से तुर्की को ‘यूरोप का बीमार आदमी’ कहती थीं और सेवर्स की संधि ने उसके विघटन को लगभग सुनिश्चित कर दिया था।

ऐसी परिस्थिति में यदि तुर्की के राष्ट्रवादी सक्रिय न हुए होते और उन्हें मुस्तफा कमाल जैसा नेतृत्व प्राप्त न हुआ होता, तो संभवतः मित्र राष्ट्र अपनी योजनाओं को पूर्णतः कार्यान्वित कर देते। किंतु तुर्की के राष्ट्रवादियों ने सेवर्स की संधि का तीव्र विरोध किया और राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम आरंभ कर दिया। जब मित्र राष्ट्रों ने इस संधि को बलपूर्वक लागू करने के उद्देश्य से यूनानी सेनाओं को समर्थन दिया, तब मुस्तफा कमाल के नेतृत्व में राष्ट्रवादी सेनाओं ने दृढ़तापूर्वक संघर्ष किया। अंततः यूनानी सेनाएँ पराजित हुईं और उन्हें अनातोलिया से बाहर हटना पड़ा।

कमाल पाशा की बढ़ती शक्ति तथा उनकी सैन्य सफलताओं को देखकर मित्र राष्ट्रों को अपनी नीति में परिवर्तन करना पड़ा। राष्ट्रवादी नेतृत्व ने सेवर्स की संधि को कभी वैध नहीं माना और उसे स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। दूसरी ओर, मित्र राष्ट्रों ने भी धीरे-धीरे यूनान को समर्थन देना बंद कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप तुर्की और मित्र राष्ट्रों के बीच नई वार्ताएँ प्रारंभ हुईं, जिनका निष्कर्ष लोजान की संधि (24 जुलाई 1923) के रूप में सामने आया।

लोजान की संधि तुर्की के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इससे न केवल सेवर्स की संधि का अंत हुआ, बल्कि तुर्की की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा भी पुनर्स्थापित हुई। यह मुस्तफा कमाल की पहली बड़ी कूटनीतिक विजय थी, जिसने पराजित और विभाजित होते हुए तुर्की को पुनः अंतरराष्ट्रीय सम्मान दिलाया।

लोजान समझौते के पश्चात 29 अक्टूबर 1923 को तुर्की में गणराज्य की स्थापना हुई, किंतु विदेश नीति की चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुई थीं। तुर्की-इराक सीमा तथा मोसुल का प्रश्न विवादास्पद बना हुआ था। सीरिया से संबंधित सीमावर्ती समस्याएँ भी अनिश्चित थीं। इसके अतिरिक्त, यूनान और तुर्की के बीच जनसंख्या-विनिमय तथा क्षेत्रीय सुरक्षा के प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण थे। अतः मुस्तफा कमाल लोजान की सफलता से संतुष्ट होकर नहीं बैठे, बल्कि उन्होंने तुर्की की विदेश नीति को नए आधारों पर संगठित करने का प्रयास किया।

कमाल पाशा की विदेश नीति के उद्देश्य

राष्ट्रपति बनने के बाद मुस्तफा कमाल पाशा ने तुर्की की विदेश नीति के लिए कुछ स्पष्ट सिद्धांत निर्धारित किए। उनकी विदेश नीति का मूल उद्देश्य तुर्की की राष्ट्रीय स्वतंत्रता, प्रादेशिक अखंडता, सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को सुदृढ़ करना था। वे ऐसी विदेश नीति के पक्षधर थे, जो व्यावहारिक, संतुलित और राष्ट्रीय हितों पर आधारित हो।

उनकी विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे—

  1. तुर्की की प्रादेशिक अखंडता तथा राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा करना।
  2. विदेशी शक्तियों को तुर्की के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप अथवा अपने स्वार्थों की पूर्ति का अवसर न देना।
  3. सोवियत रूस के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना।
  4. पश्चिम एशियाई देशों के साथ सहयोगपूर्ण और सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करना।
  5. इटली की विस्तारवादी योजनाओं का प्रतिरोध करना।
  6. प्रमुख विश्व शक्तियों के साथ संतुलित और व्यावहारिक संबंध बनाए रखना।
  7. तुर्की को अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और शक्ति-राजनीति के प्रतिकूल प्रभावों से सुरक्षित रखना।
  8. ऐसी शांतिपूर्ण विदेश नीति अपनाना जिससे देश के विकास और आंतरिक सुधारों में बाधा उत्पन्न न हो।

मुस्तफा कमाल का मानना था कि तुर्की के आधुनिकीकरण और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए शांति अनिवार्य है। इस कारण उन्होंने विस्तारवादी नीति के स्थान पर शांतिपूर्ण और यथार्थवादी कूटनीति को प्राथमिकता दी। उनका उद्देश्य साम्राज्यवादी विस्तार नहीं, बल्कि एक सुदृढ़, सुरक्षित और आधुनिक राष्ट्रीय राज्य का निर्माण था।

कमाल ने धर्म और राजनीति को अलग रखते हुए विदेश नीति को भी धार्मिक विचारधाराओं से मुक्त रखा। उनके अनुसार नए तुर्की राज्य की स्थिरता तभी संभव थी, जब वह ऐसे क्षेत्रों को अपने भीतर सम्मिलित करने की नीति न अपनाए, जो भाषा, जातीयता और सांस्कृतिक दृष्टि से तुर्की समाज से भिन्न हों। इस दृष्टिकोण के कारण उन्होंने ऑटोमन साम्राज्य की पुरानी इस्लामवादी एवं साम्राज्यवादी नीतियों का परित्याग कर धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद को विदेश नीति का आधार बनाया।

तुर्की और रूस

समकालीन परिस्थितियों के कारण तुर्की और रूस के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने में विशेष कठिनाई नहीं हुई। दोनों देशों के बीच निकटता बढ़ने का एक प्रमुख कारण यह था कि सोवियत रूस ने तुर्की के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान तथा लोजान सम्मेलन में उसका समर्थन किया था।

1921 में तुर्की और रूस के बीच मैत्री संधि संपन्न हुई। इसके बाद 1922-23 के दौरान दोनों देशों के राजनेताओं और सैन्य अधिकारियों की पारस्परिक यात्राओं ने उनके संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाया। दोनों देशों के बीच सहयोग का आधार साम्राज्यवाद-विरोध और तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ थीं।

मोसुल समस्या के कारण भी तुर्की और रूस की निकटता बढ़ी। इसी पृष्ठभूमि में 1925 में दोनों देशों के बीच एक अनाक्रमण संधि हुई, जिसे 1935 में पुनः नवीनीकृत किया गया। इस संधि के अनुसार दोनों देश आपसी हितों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय प्रश्नों पर परामर्श करेंगे और ऐसा कोई कदम नहीं उठाएँगे जिससे उनके मैत्रीपूर्ण संबंधों को क्षति पहुँचे।

यद्यपि प्रारंभिक वर्षों में दोनों देशों के संबंध प्रगाढ़ रहे, फिर भी तुर्की में साम्यवादी प्रभाव बढ़ने से कुछ तनाव उत्पन्न होने लगा। मुस्तफा कमाल तुर्की में साम्यवाद को मजबूत होने देना नहीं चाहते थे। वह सोवियत संघ के साथ मैत्री बनाए रखने के पक्षधर थे, किंतु उसकी वैचारिक प्रणाली को अपनाने के इच्छुक नहीं थे।

1936 के मॉन्ट्रो सम्मेलन में जलडमरूमध्यों से संबंधित प्रश्न पर रूस ने तुर्की का समर्थन किया, जिससे दोनों देशों के संबंधों में पुनः सुधार आया। किंतु यूरोप की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में जब 1939 में जर्मनी और सोवियत रूस के बीच अनाक्रमण संधि हो गई, तो तुर्की ने ब्रिटेन और फ्रांस के साथ समझौता करना अधिक उपयुक्त समझा, जिससे तुर्की-रूस संबंधों की पूर्ववत घनिष्ठता कम हो गई।

तुर्की और इंग्लैंड

मुस्तफा कमाल इंग्लैंड के साथ अपने संबंधों को सामान्य और संतुलित बनाना चाहते थे, किंतु प्रारंभिक वर्षों में मोसुल प्रश्न दोनों देशों के बीच विवाद का प्रमुख कारण बना रहा।

लोजान समझौते के अनुसार नौ महीनों के भीतर तुर्की और ब्रिटेन को आपसी सहमति से तुर्की-इराक सीमा निर्धारित करनी थी। उस समय इराक ब्रिटेन के संरक्षण में था और ब्रिटिश सरकार मोसुल क्षेत्र को इराक में सम्मिलित रखना चाहती थी। दूसरी ओर, तुर्की मोसुल को अपना ऐतिहासिक और भौगोलिक क्षेत्र मानता था।

यह विवाद राष्ट्रसंघ के समक्ष भी प्रस्तुत किया गया, जहाँ निर्णय ब्रिटेन के पक्ष में गया। तुर्की ने इसे साम्राज्यवादी शक्तियों की राजनीति मानते हुए असंतोष व्यक्त किया। अंततः 1926 में इस विवाद का समाधान हुआ। तुर्की ने मोसुल पर अपना दावा वापस ले लिया, जबकि उसे यह आश्वासन दिया गया कि मोसुल के तेल से प्राप्त आय का एक निश्चित भाग उसे प्रदान किया जाएगा।

मोसुल विवाद के समाधान के पश्चात तुर्की और ब्रिटेन के संबंधों में उल्लेखनीय सुधार हुआ। दोनों देशों ने पारस्परिक मतभेदों को कम करने और सहयोगपूर्ण संबंध विकसित करने का प्रयास किया। विशेषकर 1930 के दशक में इटली और जर्मनी की आक्रामक नीतियों के कारण तुर्की और ब्रिटेन को एक-दूसरे के अधिक निकट आ गए।

तुर्की और फ्रांस

फ्रांस के साथ तुर्की के संबंध मुख्यतः सीरिया और एलेक्ज़ेन्ड्रेटा (हाताय) प्रश्न से प्रभावित थे। प्रथम विश्व युद्ध के बाद मैंडेट प्रणाली के अंतर्गत सीरिया फ्रांस के नियंत्रण में था। इस कारण तुर्की और फ्रांस के बीच सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर समय-समय पर तनाव उत्पन्न होता रहा।

1936 में फ्रांस ने सीरिया को स्वतंत्रता देने की योजना प्रस्तुत की, जिसमें एलेक्ज़ेन्ड्रेटा क्षेत्र को भी सम्मिलित करने का विचार था। तुर्की ने इसका तीव्र विरोध किया, क्योंकि वहाँ पर्याप्त संख्या में तुर्क निवासी थे और तुर्की उस क्षेत्र को अपने प्रभाव-क्षेत्र का भाग मानता था।

यह मामला राष्ट्रसंघ में ले जाया गया। वहाँ एक घोषणा के माध्यम से एलेक्ज़ेन्ड्रेटा क्षेत्र में रहने वाले तुर्कों की सुरक्षा की गारंटी दी गई और क्षेत्र के निःशस्त्रीकरण की व्यवस्था की गई। किंतु वहाँ के तुर्क निवासी इस समाधान से संतुष्ट नहीं हुए और परिणामस्वरूप फ्रांस तथा तुर्की के संबंधों में तनाव बढ़ने लगा।

अंततः 1938 में दोनों देशों के बीच एक समझौता हो गया, जिसके अनुसार उस क्षेत्र के भविष्य का निर्धारण चुनाव द्वारा किया जाना निश्चित हुआ। सितंबर 1938 के चुनावों में तुर्की समर्थक उम्मीदवार बहुमत से विजयी हुए। इसके बाद वहाँ एक स्वतंत्र सरकार की स्थापना की गई, जिसने तुर्की के राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार कर लिया। यद्यपि क्षेत्र में फ्रांसीसी सैन्य उपस्थिति बनी रही, फिर भी वहाँ तुर्की का प्रभाव स्पष्ट रूप से स्थापित हो गया, जो तुर्की की विदेश नीति की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता थी।

मॉन्ट्रो कन्वेंशन, जुलाई 1936

तुर्की में राष्ट्रीय भावना के प्रभाव के कारण लंबे समय से यह माँग उठ रही थी कि उसे जलडमरूमध्यों की किलेबंदी करने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। लोजान संधि के अंतर्गत जलडमरूमध्यों का अंतर्राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था, जिसके कारण तुर्की की सुरक्षा संबंधी शक्तियाँ सीमित हो गई थीं। किंतु 1930 के दशक में इटली, जर्मनी और जापान की विस्तारवादी नीतियों के उभार ने अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को बदल दिया। इन परिस्थितियों में तुर्की ने अनुभव किया कि यदि जलडमरूमध्य क्षेत्रों की किलेबंदी नहीं की गई, तो उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। इसलिए उसने इस संबंध में अपनी माँग मित्र राष्ट्रों के समक्ष प्रस्तुत की।

उस समय मित्र राष्ट्र भी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में फासीवादी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित थे। परिणामस्वरूप उन्होंने तुर्की की माँग स्वीकार कर ली और जुलाई 1936 में मॉन्ट्रो स्ट्रेट्स कन्वेंशन के माध्यम से लोजान संधि की संबंधित शर्तों में संशोधन कर दिया गया। इस सम्मेलन में निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए गए—

  1. तुर्की को जलडमरूमध्यों की किलेबंदी करने का अधिकार प्रदान किया गया।
  2. काला सागर से बाहर के देशों के युद्धपोतों के आवागमन पर नियंत्रण का अधिकार तुर्की को प्राप्त हुआ।
  3. यदि तुर्की स्वयं किसी युद्ध में सम्मिलित हो, तो जलडमरूमध्यों से जहाजों के आवागमन का निर्णय उसकी इच्छा पर निर्भर होगा।
  4. शांतिकाल में काला सागर से संबंधित देशों के व्यापारिक एवं सामरिक जहाजों को निश्चित नियमों के अंतर्गत आवागमन की अनुमति दी गई।

यह समझौता बीस वर्षों के लिए किया गया था। मॉन्ट्रो कन्वेंशन तुर्की की विदेश नीति की दूसरी बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जाती है। इससे न केवल तुर्की की सुरक्षा सुदृढ़ हुई, बल्कि पश्चिमी शक्तियों के साथ उसके संबंध भी अधिक मजबूत बन गए।

तुर्की और जर्मनी

तुर्की और जर्मनी के संबंध सामान्यतः मैत्रीपूर्ण रहे। दोनों ही देश प्रथम विश्व युद्ध में पराजित हुए थे और दोनों को मित्र राष्ट्रों की कठोर नीतियों और अपमानजनक संधियों का सामना करना पड़ा था। युद्ध के दौरान दोनों देशों को भारी राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य क्षति उठानी पड़ी थी। इसी पृष्ठभूमि में 1919 से 1939 के बीच तुर्की और जर्मनी के बीच आर्थिक सहयोग तथा सामान्य राजनयिक संबंध बने रहे।

यद्यपि दोनों देशों के बीच सहयोग बना रहा, फिर भी मुस्तफा कमाल की विदेश नीति मूलतः व्यावहारिक और संतुलित थी। वह जर्मनी के साथ संबंध बनाए रखना चाहते थे, किंतु तुर्की को किसी एक शक्ति-गुट पर निर्भर करने के पक्ष में नहीं थे।

तुर्की और इटली

इटली के साथ तुर्की के संबंध अपेक्षाकृत अधिक जटिल थे। अनातोलिया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र से संबंधित प्रश्नों के कारण तुर्की इटली की नीतियों को लेकर सतर्क था। तुर्की के निकटवर्ती अनेक द्वीपों पर इटली का नियंत्रण था, जिससे तुर्की की सुरक्षा संबंधी चिंताएँ बढ़ती रहती थीं। इसके बावजूद प्रारंभिक वर्षों में तुर्की ने इटली के प्रति मैत्रीपूर्ण नीति अपनाई। मुसोलिनी के शासनकाल के आरंभिक दौर में भी दोनों देशों के संबंध अपेक्षाकृत सामान्य रहे और 1928 में दोनों के मध्य तटस्थता, शांति और मैत्री संबंधी संधि संपन्न हुई।

बाद में जब इटली ने भूमध्यसागरीय क्षेत्र में आक्रामक एवं विस्तारवादी नीति अपनाई, तब दोनों देशों के संबंधों में तनाव उत्पन्न होने लगा। विशेष रूप से अबीसीनिया (इथियोपिया) पर इटली के आक्रमण के बाद तुर्की की चिंताएँ और बढ़ गईं। इटली की साम्राज्यवादी नीतियों से तुर्की को यह अनुभव हुआ कि क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन उसके विरुद्ध जा सकता है।

इन परिस्थितियों में तुर्की ने अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करते हुए ब्रिटेन और फ्रांस के साथ निकटता बढ़ाई। फलतः 1939 में उसने इटली की विस्तारवादी नीति के विरुद्ध ब्रिटेन और फ्रांस के साथ सहयोगपूर्ण संबंध स्थापित कर लिए। बाद में यूरोप की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों तथा जर्मन दबाव के प्रभाव में 1941 में तुर्की और जर्मनी के मध्य भी एक समझौता हो गया।

तुर्की और संयुक्त राज्य अमेरिका

प्रथम विश्व युद्ध के प्रभाव के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका और तुर्की के संबंध प्रारंभिक वर्षों में अधिक मधुर नहीं थे। युद्धोपरांत अमेरिका तुर्की के साथ अपने संबंधों को सामान्य बनाने का इच्छुक था, किंतु तत्काल इस दिशा में कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा सका। इसी बीच तुर्की ने उन देशों पर अतिरिक्त कर लगाना आरंभ कर दिया, जिनके साथ उसके औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं थे।

इन परिस्थितियों में अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका ने तुर्की के साथ संबंध सुधारने का प्रयास किया। फलतः 1927 में दोनों देशों के मध्य एक समझौता हुआ तथा तुर्की में एक अमेरिकी राजदूत की नियुक्ति की गई। इसके बाद तुर्की और अमेरिका के संबंधों में क्रमशः सुधार होने लगा और दोनों देशों के बीच राजनयिक तथा आर्थिक संपर्कों का विस्तार हुआ।

तुर्की और बालकन राज्य

मुस्तफा कमाल पाशा की विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य यूरोप और विशेष रूप से बालकन क्षेत्र में मैत्रीपूर्ण तथा स्थिर संबंध स्थापित करना था। इसी नीति के अंतर्गत तुर्की ने विभिन्न यूरोपीय देशों के साथ समझौतों और मैत्री-संधियों का मार्ग अपनाया।

1923 में तुर्की ने हंगरी तथा 1924 में ऑस्ट्रिया के साथ मैत्री संधियाँ कीं। इसके बाद 1925 में यूगोस्लाविया और बुल्गारिया के साथ भी समझौते संपन्न किए गए। इन संधियों का उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाना तथा राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना था।

तुर्की और यूनान के संबंध विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण थे, क्योंकि दोनों देशों के बीच लंबे समय से राजनीतिक तनाव और जनसंख्या-विनिमय की समस्या विद्यमान थी। 1930 में दोनों देशों के मध्य एक समझौता हुआ, जिसके माध्यम से अल्पसंख्यकों की अदला-बदली से संबंधित विवादों का समाधान किया गया। इससे दोनों देशों के संबंधों में उल्लेखनीय सुधार आया।

इसके पश्चात 1933 में तुर्की और यूनान के बीच एक दस वर्षीय संधि संपन्न हुई, जिसने दोनों देशों के सहयोग को और अधिक सुदृढ़ बनाया। अंततः 1934 में तुर्की के प्रयासों से बालकन समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते का उद्देश्य बालकन क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देना था।

कमाल अतातुर्क की विदेश नीति का मूल्यांकन

1938 में अपनी मृत्यु तक मुस्तफा कमाल पाशा तुर्की की विदेश नीति के प्रमुख संचालक बने रहे और इस क्षेत्र में उन्हें उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई। उनकी व्यावहारिक, संतुलित और राष्ट्रहित आधारित विदेश नीति के कारण तुर्की की गणना एक सम्मानित और प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में होने लगी। यूरोप में उसके अनेक मित्र बन चुके थे और बालकन क्षेत्र में भी उसकी स्थिति पहले की तुलना में अधिक सुदृढ़ हो गई थी।

अतातुर्क ने अपने नाम ‘तुर्की के पिता’ को वास्तविक अर्थों में सार्थक सिद्ध किया। उन्होंने कठोर अनुशासन, दूरदर्शी नेतृत्व और व्यापक सुधारों के माध्यम से देश में स्थिरता स्थापित की तथा आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। उनके नेतृत्व में पिछड़ा और संकटग्रस्त तुर्की एक आधुनिक, संगठित और प्रगतिशील राष्ट्र के रूप में विकसित हुआ।

मुस्तफा कमाल पाशा निःसंदेह आधुनिक तुर्की के निर्माता और उसके महान राष्ट्रीय नेता थे। उन्होंने धर्म को राजनीति और शासन से अलग रखते हुए राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। यद्यपि धार्मिक रूढ़िवादी वर्गों ने उनके सुधारों का विरोध किया, फिर भी उन्होंने वे सभी कदम उठाए जिन्हें वे राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक समझते थे। सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन, प्रशासनिक सुधारों और राष्ट्रीय एकता की स्थापना में उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था।

विदेश नीति के क्षेत्र में भी उनकी उपलब्धियाँ उल्लेखनीय थीं। लोजान संधि और उसके बाद मॉन्ट्रो कन्वेंशन में प्राप्त सफलताओं ने तुर्की की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को अत्यधिक सुदृढ़ कर दिया। उनके कुशल नेतृत्व ने ‘यूरोप का बीमार राष्ट्र’ तुर्की एक आधुनिक और शक्तिशाली राष्ट्र में परिवर्तित हो गया।

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