मुस्तफा कमाल पाशा (Mustafa Kemal Pasha)

मुस्तफा कमाल पाशा (Mustafa Kemal Pasha)

तुर्की का नवनिर्माण और मुस्तफा कमाल पाशा

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मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में तुर्की का आधुनिकीकरण एशिया तथा विश्व इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना है। प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व जिस ओटोमन साम्राज्य को उसकी राजनीतिक दुर्बलता, आर्थिक संकट और प्रशासनिक जड़ता के कारण ‘यूरोप का बीमार आदमी’ कहा जाता था, वही युद्ध के उपरांत एक सशक्त, संगठित और आधुनिक राष्ट्र के रूप में विश्व मंच पर उभरकर सामने आया। तुर्की के इस व्यापक राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक परिवर्तन का मुख्य श्रेय मुस्तफा कमाल पाशा को दिया जाता है। उन्होंने विघटित हो रहे ओटोमन साम्राज्य के अवशेषों से एक नवीन तुर्की राष्ट्र का निर्माण किया और उसे आधुनिकता, राष्ट्रवाद तथा धर्मनिरपेक्षता के आधार पर पुनर्गठित किया। इसी कारण उन्हें ‘अतातुर्क’ (आधुनिक तुर्की का जनक) कहा जाता है।

मुस्तफा कमाल पाशा तुर्की गणराज्य के संस्थापक एवं उसके प्रथम राष्ट्रपति थे। 1923 ई. में तुर्की गणराज्य की स्थापना के बाद उन्होंने अपनी मृत्यु (1938 ई.) तक राष्ट्रपति के रूप में तुर्की का नेतृत्व किया। उनके शासनकाल में अनेक प्रगतिशील एवं क्रांतिकारी सुधार लागू किए गए, जिनके परिणामस्वरूप तुर्की एक धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक और औद्योगिक राष्ट्र के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने शिक्षा, न्याय, प्रशासन, भाषा, वेशभूषा तथा सामाजिक जीवन के क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन किए। धार्मिक संस्थाओं के राजनीतिक प्रभाव को सीमित कर उन्होंने आधुनिक राष्ट्रवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पाश्चात्य मूल्यों को प्रोत्साहित किया।

मुस्तफा कमाल पाशा धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद और आधुनिकीकरण के प्रबल समर्थक थे। उनके सिद्धांतों एवं नीतियों को सामूहिक रूप से ‘कमालवाद’ कहा जाता है। कमालवाद के माध्यम से उन्होंने तुर्की को आधुनिक पश्चिमी राज्य व्यवस्था के अनुरूप ढालने का प्रयास किया। अपनी असाधारण सैन्य क्षमता, दूरदर्शी नेतृत्व और राजनीतिक उपलब्धियों के कारण अतातुर्क की गणना बीसवीं शताब्दी के सबसे प्रभावशाली एवं परिवर्तनकारी राजनीतिक नेताओं में की जाती है।

मुस्तफा कमाल पाशा का आरंभिक जीवन

मुस्तफा कमाल का जन्म 1881 ई. में सलोनिका (सैलोनिका) में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम जुबैदा हानम तथा पिता का नाम अली रज़ा एफेंदी था। उनके पिता प्रारंभ  में सलोनिका के चुंगी विभाग में एक साधारण सरकारी कर्मचारी (क्लर्क) थे, किंतु  बाद में उन्होंने लकड़ी के व्यापार का कार्य आरंभ कर दिया। 1888 ई. में पिता की मृत्यु के पश्चात् उनकी माता ने धार्मिक शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से मुस्तफा का एक मदरसे में प्रवेश करवाया।

प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद मुस्तफ़ा ने 1895 ई. में मोनास्तीर (बिटोला, उत्तर मैसेडोनिया) के सैनिक विद्यालय में प्रवेश लिया। यहीं उनके गणित के शिक्षक कैप्टन मुस्तफ़ा एफेंदी उनकी प्रतिभा से अत्यंत प्रभावित हुए तथा उन्हें ‘कमाल’ (पूर्णत) की उपाधि प्रदान की। इसके बाद वे ‘मुस्तफ़ा कमाल’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए। मोनास्तीर के सैनिक विद्यालय में अध्ययन के दौरान उनकी मित्रता अली फेथी बे (ओक्यार) जैसे प्रतिभाशाली सहपाठियों से हुई और यहीं उनके राजनीतिक तथा राष्ट्रीय विचारों का भी विकास प्रारंभ हुआ।

मोनास्तीर में शिक्षा पूर्ण करने के बाद मार्च 1899 ई. में उन्होंने इस्तांबुल के युद्ध महाविद्यालय (वार कॉलेज) में प्रवेश लिया। वहाँ उनके मित्र और सहपाठी अली फुआत (जेबेसोय) ने उन्हें नगर के सामाजिक तथा वैचारिक जीवन से परिचित कराया। उस समय युद्ध महाविद्यालय में सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय की निरंकुश शासन-व्यवस्था के विरुद्ध असंतोष का वातावरण था। मुस्तफ़ा कमाल भी धीरे-धीरे सरकार-विरोधी गतिविधियों में भाग लेने लगे। सरकार को उनकी गतिविधियों की भनक लग जाने पर उन्हें हिरासत में लिया गया, किंतु उनकी प्रतिभा को देखते हुए शिक्षा जारी रखने की अनुमति दे दी गई।

1902 ई. में द्वितीय लेफ्टिनेंट के रूप में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने जनरल स्टाफ कॉलेज में प्रवेश लिया। 1905 ई. में वह कप्तान (कैप्टन) के पद के साथ स्नातक हुए और ऑटोमन सेना में अधिकारी नियुक्त हुए। इस दौरान नामिक कमाल जैसे राष्ट्रवादी एवं उदारवादी विचारकों की रचनाओं ने उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया।

सैनिक अधिकारी के रूप में

सैनिक अधिकारी के रूप में मुस्तफ़ा कमाल को द्रूज विद्रोहियों का दमन करने के लिए दमिश्क स्थित पाँचवीं सेना में नियुक्त किया गया। दमिश्क में नियुक्ति के दौरान अधिकारियों के भ्रष्ट एवं अन्यायपूर्ण व्यवहार से असंतुष्ट होकर मुस्तफ़ा कमाल ने अपने कुछ साथियों के साथ ‘वतन वे हुर्रियत’ (मातृभूमि और स्वतंत्रता) नामक एक गुप्त राष्ट्रवादी संगठन की स्थापना की, जो उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण चरण सिद्ध हुआ।

सितंबर 1907 ई. में मुस्तफ़ा कमाल को सलोनिका (थेसालोनिकी, ग्रीस) भेजा गया, जो उस समय ऑटोमन साम्राज्य में राजनीतिक गतिविधियों और क्रांतिकारी आंदोलनों का प्रमुख केंद्र था। वहीं उनका संपर्क ‘एकता और प्रगति समिति’ (कमेटी ऑफ यूनियन एंड प्रोग्रेस) से हुआ, जिसका संबंध राष्ट्रवादी एवं सुधारवादी ‘यंग तुर्क आंदोलन’ से था। यद्यपि मुस्तफ़ा कमाल संवैधानिक शासन और सुधारों के समर्थक थे, फिर भी वे समिति के कई नेताओं, विशेषकर अनवर पाशा, तलात पाशा और जमाल पाशा की कार्यशैली से पूर्णतः सहमत नहीं थे।

जुलाई 1908 ई. में मैसेडोनिया में यंग तुर्क क्रांति का आरंभ हुआ, जिसके परिणामस्वरूप सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय को 1876 ई. का संविधान पुनः लागू करने के लिए बाध्य होना पड़ा। उस समय मुस्तफ़ा कमाल सलोनिका में ही थे। वह क्रांति के उद्देश्यों का समर्थन करते थे, किंतु राजनीति में सेना के अत्यधिक हस्तक्षेप तथा एकता और प्रगति समिति की बढ़ती प्रभुत्ववादी प्रवृत्तियों के विरोधी थे।

अप्रैल 1909 ई. में प्रतिक्रियावादी तत्वों ने इस्तांबुल में विद्रोह कर दिया, जिससे संवैधानिक शासन संकट में पड़ गया। सलोनिका से भेजी गई ‘एक्शन आर्मी’ ने विद्रोह का दमन किया। इसके बाद सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय को पदच्युत कर उनके स्थान पर मेहमेद पंचम को सिंहासन पर बैठाया गया। इस घटना के बाद एकता और प्रगति समिति का प्रभाव ऑटोमन राजनीति में और अधिक बढ़ गया।

1910 ई. में मुस्तफ़ा कमाल को फ्रांस में आयोजित सैन्य युद्धाभ्यासों का अवलोकन करने का अवसर मिला। इस यात्रा के दौरान उन्होंने यूरोप की सैन्य एवं राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया। इसके पश्चात उन्होंने सक्रिय राजनीति से कुछ दूरी बनाकर सैन्य विषयों के अध्ययन, जर्मन सैन्य ग्रंथों के तुर्की अनुवाद तथा सेना के प्रशिक्षण-सुधार संबंधी कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया।

इटली ने 1911 ई. में त्रिपोली (लीबिया) पर आक्रमण कर दिया, जो उस समय ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। मुस्तफ़ा कमाल ने इटली के विरुद्ध युद्ध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अक्टूबर 1912 ई. में प्रथम बाल्कन युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य को पराजयों का सामना करना पड़ा। मुस्तफ़ा कमाल को दार्दानेल्स जलडमरूमध्य की सुरक्षा के लिए गैलीपोली क्षेत्र में नियुक्त किया गया, जहाँ उन्होंने सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। कुछ ही महीनों में ऑटोमन साम्राज्य ने यूरोप में अपने अधिकांश क्षेत्र खो दिए, जिनमें मोनास्तीर और सलोनिका जैसे महत्त्वपूर्ण नगर भी शामिल थे।

1913 ई. में द्वितीय बाल्कन युद्ध के दौरान ऑटोमन साम्राज्य ने अपने कुछ खोए हुए क्षेत्र पुनः प्राप्त कर लिए, जिनमें एड्रियनोपल (एदिर्ने) भी शामिल था। युद्ध के पश्चात अक्टूबर 1913 ई. में मुस्तफ़ा कमाल को बुल्गारिया की राजधानी सोफ़िया में सैन्य अताशे नियुक्त किया गया। 1914 ई. में उन्हें लेफ्टिनेंट लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर पदोन्नत किया गया।

प्रथम विश्वयुद्ध और तुर्की

अगस्त 1914 में यूरोप में प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो गया, जो 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918 ई. तक चला। इस विश्वयुद्ध में विभिन्न देश अलग-अलग चरणों में इस युद्ध में सम्मिलित हुए। मुस्तफ़ा कमाल आरंभ में जर्मनी के साथ युद्ध में शामिल होने के पक्ष में नहीं थे। फिर भी, जब ओटोमन साम्राज्य केंद्रीय शक्तियों के पक्ष में युद्ध में सम्मिलित हो गया, तब मुस्तफ़ा कमाल को गैलीपोली प्रायद्वीप में तैनात 19वीं डिवीजन की कमान सौंपी गई। उन्होंने अगस्त 1915 ई. में गैलीपोली अभियान में अनाफार्ता और सुवला खाड़ी के मोर्चों पर मित्र राष्ट्रों की प्रगति को रोककर असाधारण वीरता और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। गैलीपोली अभियान के दौरान एक गोले का छर्रा उनकी जेबघड़ी से टकराया, जिससे उनका जीवन बच गया। गैलीपोली की विजय के बाद मुस्तफ़ा कमाल तुर्की में ‘अनाफार्ता का नायक’  तथा ‘इस्तांबुल का रक्षक’ के रूप में प्रसिद्ध हो गए। उनकी उत्कृष्ट सैन्य सेवाओं के लिए 1 जून 1915 ई. को उन्हें कर्नल के पद पर पदोन्नत कर दिया गया।

गैलीपोली अभियान की सफलता के बाद मुस्तफ़ा कमाल को 1 अप्रैल 1916 ई. को ब्रिगेडियर जनरल (मिरीलिवा) के पद पर पदोन्नत किया गया और उन्हें परंपरागत रूप से ‘पाशा’ की उपाधि से संबोधित किया जाने लगा। इसके पश्चात उन्हें काकेशस मोर्चे पर रूसी सेनाओं के विरुद्ध अभियान का दायित्व सौंपा गया। वहाँ उन्होंने मुश और बिटलिस जैसे महत्त्वपूर्ण नगरों को रूसी नियंत्रण से मुक्त कराया, जिससे उनकी ख्याति और बढ़ गई।

1917 ई. में मुस्तफ़ा कमाल को दक्षिण-पूर्वी अनातोलिया में स्थित दूसरी सेना की कमान सौंपी गई। इसी समय उनका संपर्क इस्मत इनोनू सहित अनेक प्रतिभाशाली सैन्य अधिकारियों से हुआ। उसी वर्ष मुस्तफ़ा कमाल को सीरिया-फ़िलिस्तीन मोर्चे पर भेजा गया, जहाँ उन्होंने सातवीं सेना का नेतृत्व सँभाला। किंतु उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और रणनीतिक मतभेदों के कारण कुछ समय के लिए अपना पद छोड़ दिया और इस्तांबुल लौट आए।

1917 ई. के उत्तरार्ध में वह युवराज मेहमेद वाहिदेद्दीन के साथ जर्मनी की यात्रा पर गए और जर्मनी की सैन्य और राजनीतिक स्थिति का निकट से अध्ययन किए। इसी समय वे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए और उपचार के लिए वियना तथा कार्ल्सबैड (कार्लोवी वेरी) गए।

1918 ई. में सुल्तान मेहमेद पंचम की मृत्यु के बाद वाहिदेद्दीन ने मेहमेद षष्ठम के रूप में सिंहासन ग्रहण किया। इसी वर्ष मुस्तफ़ा कमाल को पुनः सीरिया मोर्चे पर सातवीं सेना की कमान सौंपी गई। उस समय ब्रिटिश सेनाएँ एडमंड एलेनबी के नेतृत्व में तेजी से आगे बढ़ रही थीं। यद्यपि ऑटोमन सेना को लगातार पीछे हटना पड़ा, फिर भी मुस्तफ़ा कमाल ने अपने सैन्य कौशल का परिचय देते हुए सेना की सुव्यवस्थित वापसी सुनिश्चित की।

राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रारंभ

1918 ई. में जब मुस्तफ़ा कमाल अलेप्पो क्षेत्र में युद्ध की तैयारी कर रहे थे, इसी दौरान उन्हें 30 अक्टूबर 1918 ई. को संपन्न मुद्रोस युद्धविराम संधि की सूचना मिली। इसके तुरंत बाद अनवर पाशा तथा कमेटी ऑफ यूनियन एंड प्रोग्रेस के अन्य नेता जर्मनी भाग गए। सुल्तान मेहमेद षष्ठम ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए मित्र राष्ट्रों के साथ सहयोग करना स्वीकार कर लिया। 13 नवंबर 1918 ई. को कमाल पाशा इस्तांबुल पहुँचे, जहाँ सुल्तान और प्रतिक्रियावादी शक्तियों का प्रभाव बढ़ चुका था और मित्र राष्ट्रों की सेनाएँ औपचारिक शांति संधि की प्रतीक्षा किए बिना ही ऑटोमन साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों पर अधिकार करने लगी थीं। साम्राज्य की दयनीय स्थिति और विदेशी शक्तियों के बढ़ते हस्तक्षेप को देखकर उन्होंने राष्ट्रीय प्रतिरोध संगठित करने का निश्चय किया। उन्होंने अली फुआत, रऊफ़ ओरबे तथा अन्य राष्ट्रवादी नेताओं के साथ मिलकर अनातोलिया में एक संगठित राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा करने की योजना बनाई।

इसी बीच ऑटोमन सरकार ने 30 अप्रैल 1919 ई. को मुस्तफ़ा कमाल को नौवीं सेना का इंस्पेक्टर नियुक्त कर अनातोलिया भेजा गया, जहाँ उन्हें ओटोमन सेना को निरस्त्र करने और शांति-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई थी। इस बीच 15 मई 1919 ई. को यूनानी सेना इज़मिर (स्मिर्ना) में उतरकर  अनातोलिया के भीतरी भागों की ओर बढ़ने लगी। इस घटना से तुर्की के राष्ट्रवादियों में व्यापक आक्रोश पैदा हो गया। 19 मई 1919 को कमाल पाशा ने समसून पहुँच कर तुर्की सेनाओं को पुनर्गठित करना प्रारंभ किया और धार्मिक तथा नागरिक नेताओं को संगठित कर राष्ट्रीय आंदोलन की तैयारी करने लगे। यही कारण है कि आधुनिक तुर्की के इतिहास में 19 मई को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रारंभ का प्रतीक माना जाता है।

मुस्तफा कमाल पाशा का आंदोलन मूलतः यंग तुर्क विचारधारा से प्रेरित था, किंतु इसमें तुर्की राष्ट्रवाद की भावना भी अत्यंत प्रबल थी, जिसके कारण  अनेक प्रतिष्ठित समूहों और राष्ट्रवादियों ने कमाल का समर्थन किया। 22 जून 1919 ई. को जारी ‘अमास्या घोषणा’ में मुस्तफ़ा कमाल ने तुर्की की स्वतंत्रता और अखंडता को संकटग्रस्त बताते हुए सभी देशभक्तों से संघर्ष के लिए तैयार होने का आह्वान किया तथा एक राष्ट्रीय कांग्रेस बुलाने की घोषणा की।

मुस्तफ़ा कमाल की राष्ट्रवादी गतिविधियों से चिंतित होकर इस्तांबुल की सरकार ने मित्र राष्ट्रों के दबाव में उन्हें वापस आने का आदेश दिया, किंतु कमाल ने आदेश मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने 8–9 जुलाई 1919 ई. को सुल्तान को अपना त्यागपत्र भेजते हुए कहा : ‘जब तक राष्ट्र अपनी पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर लेता, मैं अनातोलिया में ही रहूँगा।’

23 जुलाई 1919 ई. को एर्ज़ुरुम कांग्रेस का उद्घाटन हुआ, जिसमें मुस्तफ़ा कमाल अध्यक्ष चुने गए। इस सम्मेलन में “मिल्ली मिसाक” (राष्ट्रीय पैक्ट) का प्रारूप तैयार किया गया और यह घोषणा की गई कि तुर्की की राष्ट्रीय सीमाओं और स्वतंत्रता की हर परिस्थिति में रक्षा की जाएगी तथा किसी भी विदेशी हस्तक्षेप का विरोध किया जाएगा। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि इस्तांबुल की सरकार देश की रक्षा करने में असफल रहती है, तो जनता स्वयं एक अस्थायी सरकार का गठन करेगी।

इसके बाद सितंबर 1919 ई. में सिवास कांग्रेस आयोजित हुई, जिसमें न केवल एर्ज़ुरुम के निर्णयों को स्वीकार किया गया, बल्कि विभिन्न राष्ट्रवादी संगठनों को एक मंच पर संगठित कर मुस्तफ़ा कमाल के नेतृत्व में एक स्थायी कार्यसमिति का गठन किया गया और राष्ट्रीय आंदोलन को अखिल-तुर्की स्वरूप प्रदान किया गया।

ग्रैंड नेशनल असेंबली की स्थापना (23 अप्रैल 1920 ई.)

16 मार्च 1920 ई. को मित्र राष्ट्रों ने इस्तांबुल पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया और 11 अप्रैल 1920 ई. को सुल्तान ने ऑटोमन संसद को भंग कर दिया। इसके प्रत्युत्तर में कमाल पाशा ने 23 अप्रैल 1920 ई. को अंगोरा (भावी अंकारा) में ‘ग्रैंड नेशनल असेंबली’ (महान राष्ट्रीय सभा) की स्थापना की और अपनी स्वतंत्र राष्ट्रीय सरकार का गठन किया। इस सभा ने स्वयं को तुर्की राष्ट्र की एकमात्र वैध प्रतिनिधि संस्था घोषित किया और मुस्तफ़ा कमाल को शासनाध्यक्ष तथा सर्वोच्च सेनापति के अधिकार प्रदान किए।

सेव्र की संधि (10 अगस्त 1920 ई.)

10 अगस्त 1920 ई. को इस्तांबुल की सरकार ने सेव्र की संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। इस संधि की शर्तें तुर्की के लिए अत्यंत कठोर और अपमानजनक थीं। मुस्तफ़ा कमाल और उनके समर्थकों ने इस संधि को अस्वीकार कर दिया और राष्ट्रीय प्रतिरोध के लिए अंकारा में एक राष्ट्रीय सेना का गठन किया।

1921 ई. में ग्रैंड नेशनल असेंबली (महान राष्ट्रीय सभा) ने घोषणा की कि अंकारा की सरकार ही तुर्की राष्ट्र की वास्तविक प्रतिनिधि है। इसी समय ‘राष्ट्रीय प्रतिज्ञा’ (नेशनल पैक्ट) को राष्ट्रवादी आंदोलन का आधार बनाया गया, जिसमें कॉन्स्टेंटिनोपल की स्वतंत्रता और तुर्क-बहुल क्षेत्रों की रक्षा की माँग की गई।

कमाल पाशा की सरकार ने केवल सेव्र की संधि को ही अस्वीकार नहीं किया, बल्कि यूनान और इटली द्वारा हथियाए गए तुर्की क्षेत्रों को वापस लेने का भी निश्चय किया। दूसरी ओर सुल्तान मित्र राष्ट्रों का समर्थन कर रहा था और जनता से अंकारा सरकार का विरोध करने की अपील कर रहा था। किंतु मुस्तफ़ा कमाल की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई और तुर्क जनता उन्हें अपना राष्ट्रीय नेता मानने लगी।

कमाल पाशा ने एक मजबूत और संगठित सेना के सहारे अपने सैन्य अभियानों की शुरुआत की। सबसे पहले उन्होंने उन अर्मेनियाई सेनाओं के विरुद्ध संघर्ष किया, जिन्होंने काकेशस क्षेत्र में एक स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था। बाद में आर्मेनिया सोवियत संघ में सम्मिलित हो गया। मार्च 1921 ई. में कमाल पाशा ने सोवियत संघ के साथ ‘मित्रता और भाईचारे की संधि’ कर ली, जिसने तुर्की को आर्थिक और सैन्य सहायता देने का वचन दिया। इसी समय इटली ने अनातोलिया से अपनी सेनाएँ हटाने पर सहमति दी और फ्रांस ने भी यूनान का समर्थन बंद कर दिया। इससे कमाल पाशा की स्थिति और अधिक मजबूत हो गई।

यूनानी सेना एशिया माइनर के बड़े भाग पर अधिकार कर चुकी थी, किंतु फ्रांस तथा इटली ने युद्ध से अपने हाथ पीछे खींच लिए थे, जिससे उसकी स्थिति कमजोर हो चुकी थी। 26 अगस्त 1922 ई. को मुस्तफ़ा कमाल ने यूनानी सेना के विरुद्ध निर्णायक आक्रमण आरंभ किया। तुर्की सेना ने यूनानियों को बुरी तरह पराजित कर दिया और 9 सितंबर 1922 ई. को स्मिर्ना (इज़मिर) पर पुनः अधिकार कर लिया। इस विजय के साथ ही अनातोलिया से यूनानी सेनाओं का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया।

जब विजयी तुर्की सेना चनक के तटस्थ क्षेत्र तक पहुँची, तब ब्रिटेन और तुर्की के बीच युद्ध की आशंका उत्पन्न हो गई, जिसे ‘चनक संकट’ कहा जाता है। किंतु स्थिति युद्ध तक नहीं पहुँची और 11 अक्टूबर 1922 ई. को मुदानिया युद्धविराम संधि पर हस्ताक्षर हो गए। इस संधि के अनुसार पूर्वी थ्रेस तथा दार्दानेल्स क्षेत्र पर तुर्की का अधिकार स्वीकार कर लिया गया।

लोज़ान की संधि (24 जुलाई 1923 ई.)

मित्र राष्ट्रों ने तुर्की की नई राष्ट्रवादी सरकार के साथ समझौता करने का निर्णय लिया और 20 नवंबर 1922 ई. को स्विट्जरलैंड के लोज़ान नगर में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जापान, अमेरिका, रूमानिया, यूगोस्लाविया, रूस, तुर्की और यूनान के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। लंबी बातचीत के बाद 24 जुलाई 1923 ई. को लोज़ान की संधि पर हस्ताक्षर हुए।

लोज़ान की संधि के अनुसार मित्र राष्ट्रों ने कमाल की राष्ट्रवादी सरकार को तुर्की की वैध सरकार स्वीकार किया और तुर्की की स्वतंत्रता, क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्रदान की। इस संधि के अनुसार तुर्की को पूर्वी थ्रेस, स्मिर्ना (इज़मिर) तथा अनातोलिया के अनेक क्षेत्र वापस मिल गए और अर्मेनियाई, यूनानी और यहूदी समुदायों को ‘अल्पसंख्यक’ का दर्जा प्रदान किया गया। इस संधि के बाद यूनान और तुर्की के बीच बड़े पैमाने पर जनसंख्या की अदला-बदली की गई, जिसमें लगभग 9 लाख यूनानी ईसाई ग्रीस चले गए और लगभग 4 लाख मुसलमान तुर्की आ गए।

वास्तव में, लोज़ान की संधि मुस्तफ़ा कमाल पाशा की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता थी क्योंकि इस संधि के द्वारा आधुनिक तुर्की की सीमाओं को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल गई और तुर्की का क्षेत्रफल लगभग 2,95,000 वर्गमील हो गया।

सुल्तान के पद की समाप्ति

मित्र राष्ट्रों ने लोज़ान सम्मेलन में भाग लेने के लिए सुल्तान की सरकार तथा राष्ट्रवादी सरकार दोनों को आमंत्रित किया था। मुस्तफा कमाल पाशा यूरोपीय देशों की चालाकी को समझ गए  थे कि वे तुर्की में फूट डालने का षडयंत्र कर रहे हैं। इसलिए मुस्तफा कमाल पाशा ने सम्मेलन से पूर्व ही सुल्तान के पद को समाप्त करने का निश्चय किया।

कमाल पाशा का प्रयास सुल्तान और खिलाफत को पृथक् कर दोनों को समाप्त करना था। 1 नवंबर 1922 ई. को सुल्तान के पद को समाप्त करने का प्रस्ताव राष्ट्रीय सभा के समक्ष रखा गया। मुस्तफा कमाल पाशा ने अपने भाषण में कहा कि ‘तुर्की की प्रभुसत्ता किसी व्यक्ति विशेष में न रहकर राष्ट्र सभा में निहित है। सुल्तानों ने बहुत अत्याचार किए हैं और इन अत्याचारों के विरुद्ध राष्ट्र ने विद्रोह कर दिया है।’ राष्ट्रीय सभा ने एक प्रस्ताव पारित कर सुल्तान के पद को समाप्त कर दिया और सुल्तान मेहमद षष्ठम (1918–1922 ई.) अंग्रेजों के एक युद्धपोत में बैठकर माल्टा भाग गया।

16 अप्रैल 1923 ई. को राष्ट्रीय सभा का कार्यकाल समाप्त हो गया। नवीन संसद के लिए 286 प्रतिनिधियों का निर्वाचन हुआ। 11 अगस्त 1923 ई. को संसद ने मुस्तफा कमाल पाशा को राष्ट्रपति चुन लिया। इस प्रकार शताब्दियों से चला आ रहा आटोमन साम्राज्य समाप्त हो गया।

लोसान की संधि (24 जुलाई 1923 ई.) के बाद मुस्तफा कमाल पाशा ने 9 सितंबर 1923 ई. को ‘जनता दल’ (पीपुल्स पार्टी) की स्थापना की, जिसके नेतृत्व में तुर्की के पुनर्निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ। 6 अक्टूबर 1923 को राष्ट्रवादी सेना ने कॉन्स्टेंटिनोपल में प्रवेश किया। बाद में इसका नाम बदलकर इस्तांबुल कर दिया गया और अंकारा को नई राजधानी बनाया गया।

अतातुर्क युग (1923-1938 ई.)

आधुनिक तुर्की का इतिहास 29 अक्टूबर 1923 ई. को गणतंत्र की स्थापना के साथ शुरू होता है, जब तुर्की की राष्ट्रीय महासभा ने तुर्की गणराज्य की आधिकारिक घोषणा की और मुस्तफा कमाल पाशा उसके प्रथम राष्ट्रपति चुने गए। नवीन तुर्की गणराज्य की शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए 20 अप्रैल 1924 ई. को नया जनतांत्रिक संविधान लागू किया गया और पूरे देश को “तुर्किये” नाम दिया गया। बाद में 10 नवंबर 1924 ई. को जनता दल का नाम बदलकर ‘रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी’ कर दिया गया, जो कालांतर में तुर्की की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनी।

रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी का सर्वोच्च नेतृत्व स्वयं मुस्तफा कमाल पाशा के हाथों में था। किंतु कमाल पाशा राष्ट्रीयता और आधुनिकता के सिद्धांतों के समर्थक थे। यद्यपि उनका शासन काफी हद तक केंद्रीकृत था, तथापि उनकी सत्ता पूर्णतः स्वेच्छाचारी नहीं थी; उनमें लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति आस्था तथा राष्ट्रहित की भावना विद्यमान थी। पश्चिमी उदारवादी सिद्धांतों के प्रति उनका झुकाव, रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी में उनका प्रभाव तथा उनके सहयोगियों की भागीदारी उनकी शक्ति को एक सीमा तक संतुलित बनाए रखते थे।

तुर्की के आधुनिकीकरण में कठिनाइयाँ

तुर्की के नव-निर्माण और आधुनिकीकरण में अनेक कठिनाइयाँ थीं। प्रथम महायुद्ध के कारण तुर्की का मध्यकालीन प्रशासनिक ढाँचा नष्ट हो गया था। तुर्की के पास अब न यूरोपीय प्रदेश थे और न अरब भू-भाग। तुर्की के पास अब गैर-तुर्की आबादी की समस्या भी नहीं थी, परंतु तुर्की की आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो चुकी थी। देश पर विदेशी ऋणों का भार बहुत बढ़ चुका था। तुर्की आबादी का बहुत बड़ा भाग युद्धों में नष्ट हो गया था। अल्पसंख्यक कुर्द लोग स्वराज्य के लिए प्रयत्नशील होने के कारण उपद्रव कर रहे थे।

खिलाफत और सुल्तानत की समाप्ति के बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो गई थी। धार्मिक नेता और मुल्ला मुस्तफ़ा कमाल पाशा की नीतियों का द्वारा निरंतर विरोध कर रहे थे और उनके विरुद्ध फतवे जारी जारी कर रहे थे। मुल्लाओं के साथ-साथ कमाल पाशा के अनेक पूर्व सहयोगी भी उनके विरुद्ध विद्रोह पर उतारू थे। इन विद्रोहियों को विदेशी पूँजीपतियों से आर्थिक सहायता भी प्राप्त हो रही थी।

ऐसी परिस्थिति में कमाल पाशा का दृढ़ और कठोर नेतृत्व अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। उन्होंने प्रमुख विरोधी नेताओं को गिरफ्तार करवा दिया और अनेक विद्रोहियों को फाँसी की सजा दी गई। किंतु कमाल ने अनुभव किया कि केवल कठोर दंड देकर समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। देश को आधुनिक शिक्षा प्रदान कर पुरानी रूढ़ियों, परंपराओं और पारंपरिक पहनावे में भी परिवर्तन लाना जरूरी था, ताकि तुर्की को एक आधुनिक और प्रगतिशील राष्ट्र के रूप में विकसित किया जा सके। उन्होंने सरकारी समाचार-पत्रों के माध्यम से धर्म और पुरानी रूढ़ियों के विरुद्ध प्रचार आरंभ किया।

मार्च 1924 ई. में कमाल ने खिलाफत प्रथा को समाप्त कर दिया और तुर्की को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने के उद्देश्य से संसद में एक विधेयक प्रस्तुत किया। संसद के अनेक सदस्यों ने इसका विरोध किया, किंतु कमाल के दृढ़ एवं प्रभावशाली नेतृत्व के कारण अंततः यह विधेयक पारित हो गया।

मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने तुर्की के नवनिर्माण के लिए आर्थिक, सामाजिक तथा न्यायिक ढाँचे में क्रांतिकारी परिवर्तन किए। उनका मुख्य उद्देश्य पिछड़े और ‘बीमार’ समझे जाने वाले तुर्की को उन्नतिशील पश्चिमी देशों की पंक्ति में खड़ा करना था। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने दृढ़ और केंद्रीकृत शासन स्थापित किया तथा तुर्की की गृह-नीति में व्यापक परिवर्तन किए।

मुस्तफा कमाल पाशा की आंतरिक नीति

प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् तुर्की का पुराना राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ढाँचा बुरी तरह टूट चुका था। ओटोमन साम्राज्य समाप्त हो चुका था, गैर-तुर्क प्रदेश अलग हो चुके थे और देश विदेशी ऋण से दबा हुआ था। युद्ध के कारण जन-धन की व्यापक हानि हुई थी तथा कृषि और उद्योग लगभग नष्टप्राय हो चुके थे। ऐसी परिस्थिति में तुर्की को एक आधुनिक राष्ट्र में बदलने के लिए एक व्यापक और सुनियोजित कार्यक्रम की आवश्यकता थी।

तुर्की गणराज्य को संविधान प्रदान करने के बाद मुस्तफा कमाल पाशा पूरे उत्साह के साथ राष्ट्र-निर्माण के कार्य में जुट गए। उनका दृढ़ विश्वास था कि यूरोपीय सभ्यता के मूल तत्त्वों को अपनाकर ही तुर्की को आधुनिक और शक्तिशाली राष्ट्र बनाया जा सकता है। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने तुर्की में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सुधार लागू किए। उन्होंने तुर्की को पुरातनपंथी बंधनों और रूढ़िवादी प्रभावों से मुक्त करने का प्रयास किया। कई अवसरों पर उन्होंने कठोर प्रशासनिक उपायों का भी सहारा लिया। उनकी लोकप्रियता, दृढ़ इच्छाशक्ति और स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण उनके विरोधी अधिक समय तक टिक नहीं सके और  तुर्की धीरे-धीरे एक आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और संगठित राष्ट्र के रूप में विकसित हुआ।

मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में तुर्की की न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता सुदृढ़ हुई, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी व्यापक परिवर्तन हुए। इस प्रकार कमाल पाशा ने आधुनिक तुर्की के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई और इतिहास में ‘अतातुर्क’ (तुर्कों के पिता) के रूप में प्रसिद्ध हुए।

कमालवाद के छह सिद्धांत

अंकारा की तीसरी कांग्रेस में मुस्तफा कमाल ने सुधारों की एक व्यापक योजना प्रस्तुत की, जिसका उद्देश्य पुरानी रूढ़ियों और परंपराओं का अंत  करना था। कांग्रेस ने इस योजना को स्वीकार कर लिया, जो ‘कमालवाद के छह सिद्धांतों’ पर आधारित थी- 1. गणतंत्रवाद 2. राष्ट्रवाद 3. लोकवाद 4.  नियंत्रित अर्थवाद 5.  धर्म निरपेक्षवाद और  6. क्रांतिवाद। इन्हीं  छह सिद्धांतों के आधार पर मुस्तफा कमाल पाशा ने तुर्की को प्राचीन परंपराओं से मुक्त करके राष्ट्रीयता और आधुनिकता पर आधारित एक धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और आधुनिक गणराज्य बनाने का निश्चय किया। इन सिद्धांतों को 1931 ई. में उनके राजनीतिक दल ने मान्यता प्रदान कर दी और वह 1937 ई. में तुर्की के संविधान का अंग बन गए।

गणतंत्रवाद

मुस्तफा कमाल अतातुर्क की विचारधारा लोकतांत्रिक भावना से ओतप्रोत थी। वह तुर्की में गणराज्य की स्थापना करके राजनीतिक समानता स्थापित करना चाहते थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने खिलाफत और सुल्तानत का अंतकर तुर्की को गणराज्य घोषित कर दिया।

20 जनवरी 1921 ई. के वैधानिक कानून के अनुसार यह घोषणा की गई कि प्रभुसत्ता पूर्णतः राष्ट्र में निहित है तथा शासन-व्यवस्था इस सिद्धांत पर आधारित होगी कि जनता स्वयं अपने भाग्य की निर्माता और संचालक है। यह विचार इस्लाम की उस पारंपरिक मान्यता से भिन्न था, जिसके अनुसार प्रभुसत्ता अल्लाह में निहित मानी जाती है और मनुष्य का कर्तव्य उसके आदेशों का पालन करना है।

1 नवंबर 1922 ई. को एक प्रस्ताव द्वारा सुल्तान के पद का अंत कर दिया गया। इसके बाद जुलाई 1923 ई. में लोजान की संधि संपन्न हुई और अक्टूबर तक विदेशी सेनाएँ तुर्की से हट गईं। 29 अक्टूबर 1923 ई. को तुर्की को एक गणतंत्र घोषित किया गया और मुस्तफा कमाल पाशा उसके प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।

इस गणराज्य का नया संविधान 20 अप्रैल 1924 ई. को लागू किया गया, जिसमें जनता की संप्रभुता को सर्वोच्च स्थान दिया गया। देश में राष्ट्रीय सभा नामक संसद की स्थापना की गई, जिसके सदस्य जनता द्वारा निर्वाचित होने लगे।

कार्यपालिका को संसद के प्रति उत्तरदायी बनाया गया। संसद का कार्यकाल चार वर्ष निर्धारित किया गया तथा उसके सदस्यों के लिए शिक्षित होना आवश्यक माना गया। इसके अतिरिक्त, संविधान में मौलिक अधिकारों को स्थान दिया गया तथा व्यक्तिगत, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों के साथ-साथ विचारों की स्वतंत्रता पर भी विशेष बल दिया गया।

इस प्रकार मुस्तफा कमाल पाशा ने तुर्की में प्रजातांत्रिक शासन-व्यवस्था की आधारशिला रखी। तुर्की के इतिहास में यह एक असाधारण परिवर्तन था। लंबे समय से राष्ट्रवादी और देशभक्त तत्त्व अपने देश में लोकतांत्रिक शासन की स्थापना के लिए प्रयासरत थे, किंतु उन्हें सफलता प्राप्त नहीं हुई थी। मुस्तफा कमाल के नेतृत्व में ही तुर्की की परंपरागत शासन-व्यवस्था का अंत हुआ और वहाँ आधुनिक लोकतांत्रिक शासन की स्थापना हुई।

कुछ समय बाद तुर्की की इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का कुछ प्रतिक्रियावादी तत्त्वों ने दुरुपयोग करना प्रारंभ कर दिया। अनेक लोगों ने कमाल पाशा के क्रांतिकारी सुधारों का विरोध आरंभ किया। 15 जून 1926 ई. को इज़मिर में जिया खुर्शीद के नेतृत्व में मुस्तफा कमाल अतातुर्क की हत्या का षड्यंत्र रचा गया, किंतु समय से इसकी सूचना मिल जाने से उनकी रक्षा हो गई।

1927 ई. में रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (जुमहुरियत हाल्क पार्टिसी) के द्वितीय महाधिवेशन में मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क ने लगभग छह दिनों (15–20 अक्टूबर 1927 ई.) तक एक विस्तृत भाषण दिया, जिसे “नुतुक” (भाषण) कहा जाता है। इसमें उन्होंने 1919 से 1927 ई. तक के तुर्की राष्ट्रीय आंदोलन और गणराज्य की स्थापना का अपना आधिकारिक विवरण प्रस्तुत किया। बाद में यह ग्रंथ तुर्की गणराज्य के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया।

4 मार्च 1929 ई. को आपातकालीन अधिनियम की अवधि समाप्त होने पर कमाल पाशा ने पुनः लोकतंत्र की बहाली की दिशा में कदम बढाया और एक स्वतंत्र गणतंत्रीय दल की स्थापना की गई। आगे चलकर दिसंबर 1934 ई. में महिलाओं को भी मताधिकार प्रदान कर दिया गया।

मुस्तफा कमाल पाशा जनतंत्र में राजनीतिक दलों के महत्त्व को भली-भाँति समझते थे। इसलिए उन्होंने पाश्चात्य लोकतांत्रिक सिद्धांतों के आधार पर देश में राजनीतिक दलों के विकास को प्रोत्साहित किया। उनके सहयोगियों ने अप्रैल 1923 ई. में ‘पीपुल्स पार्टी’ की स्थापना की, जिसका नाम 1924 ई. में बदलकर ‘रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी’ कर दिया गया। महिलाओं के अधिकारों के लिए 1923 ई. में नेज़ीहे मुहिद्दीन और उनकी सहयोगी महिलाओं ने महिला जन पार्टी (कदीनलार हाल्क फ़िरकासी) की स्थापना का प्रयास किया, किंतु सरकार ने इस संगठन को राजनीतिक दल के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया। इसके परिणामस्वरूप 1924 ई. में इसके संस्थापकों ने ‘तुर्क महिला संघ’ (तुर्क कादिनलार बिरलिगी) नामक संगठन की स्थापना की।

मुस्तफा कमाल पाशा के विरोधियों ने 17 नवंबर 1924 ई. को ‘प्रोग्रेसिव रिपब्लिकन पार्टी’ की स्थापना की। किंतु इस दल की विघटनकारी नीतियों के फलस्वरूप जून 1925 ई. में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद तुर्की में केवल एक ही राजनीतिक दल शेष रह गया। फिर भी, मुस्तफा कमाल संसद में एक प्रभावी विपक्षी दल की आवश्यकता को स्वीकार करते थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपने निकट सहयोगी अली फ़ेथी बे ओक्यार को एक नए विपक्षी दल के संगठन का दायित्व सौंपा, जिसके फलस्वरूप अगस्त 1930 ई. में ‘मुक्त गणतांत्रिक दल’ (सेरबेस्ट जुम्हुरियत फ़िर्कासी) की स्थापना हुई। किंतु सरकार और सत्तारूढ़ नेतृत्व के बढ़ते दबाव के कारण 17 नवंबर 1930 को इसे भंग कर दिया गया। इस प्रकार मुस्तफा कमाल द्वारा बहुदलीय लोकतंत्र की दिशा में प्रयास के बावजूद 1945 तक तुर्की में एक सशक्त विपक्षी दल का विकास नहीं हो सका और देश में एकदलीय शासन बना रहा।

राष्ट्रवाद

मुस्तफा कमाल पाशा स्वयं एक महान् राष्ट्रवादी थे। उनका विश्वास था कि तुर्की गणराज्य की उन्नति के लिए तुर्क जनता में राष्ट्रीय चेतना का विकास अत्यंत आवश्यक है। उनके अनुसार राष्ट्रीय भावना के अभाव में सच्ची देशभक्ति का विकास संभव नहीं था।

तुर्की राष्ट्रवाद के संबंध में कमाल पाशा के अपने विशिष्ट विचार थे। वह तुर्की की राष्ट्रीय उन्नति के लिए पश्चिमीकरण को अनिवार्य मानते थे। उनका लक्ष्य तुर्की को आधुनिक पश्चिमी राष्ट्रों की श्रेणी में खड़ा करना था। यह तभी संभव था, जब देश का पुरानी रूढ़ियों और अप्रासंगिक परंपराओं से पूर्णतः संबंध-विच्छेद कर दिया जाए। इसलिए उन्होंने तुर्की को पुरानी व्यवस्था से मुक्त कर आधुनिक पश्चिमी वातावरण में ढालने के उद्देश्य से सुधारों का एक व्यापक कार्यक्रम तैयार किया।

शिक्षा संबंधी सुधार

मुस्तफा कमाल पाशा राष्ट्रीयता के विकास के लिए शिक्षा के प्रसार को अत्यंत आवश्यक मानते थे। उस समय तुर्की की शिक्षा-व्यवस्था धार्मिक आधार पर संचालित होती थी, जिसमें रूढ़िवाद और अंधविश्वास का प्रभाव अधिक था। इसके साथ ही शिक्षा के प्रसार और नई शिक्षा-पद्धति को लागू करने में भी अनेक कठिनाइयाँ थीं, क्योंकि तुर्की की अधिकांश जनता अशिक्षित थी और विद्यालयों के लिए धन तथा प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव था। फिर भी, कमाल पाशा ने धैर्यपूर्वक एक व्यापक शिक्षा-योजना तैयार की।

कमाल पाशा ने तुर्की की धार्मिक एवं परंपरागत शिक्षा-व्यवस्था के स्थान पर आधुनिक शिक्षा-प्रणाली का प्रारंभ किया। पूरे देश में नए विद्यालय खोले गए, बड़ी संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति की गई और शिक्षा का स्तर ऊँचा उठाने के लिए विदेशों से विशेषज्ञ बुलाए गए। शिक्षकों के प्रशिक्षण हेतु विशेष संस्थाएँ स्थापित की गईं तथा लड़कियों के लिए अलग विद्यालय खोले गए। प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य तथा निःशुल्क कर दिया गया और पुरानी “मकतब” प्रणाली को समाप्त कर “बच्चों का सप्ताह” नामक कार्यक्रम आरंभ किया गया। खेलकूद, स्काउट प्रशिक्षण और शारीरिक व्यायाम को भी शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया।

माध्यमिक शिक्षा को भी यूरोपीय पद्धति के अनुसार संगठित किया गया। शिक्षण संस्थानों में उद्योग, कृषि, वानिकी आदि विषयों की पढ़ाई प्रारंभ की गई और इन विषयों से संबंधित अनेक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित की जाने लगीं। शिक्षा में अपनी व्यक्तिगत रुचि के कारण कमाल कभी-कभी भेष बदलकर शिक्षण संस्थाओं का निरीक्षण भी किया करते थे।

कमाल पाशा ने विश्वविद्यालयी शिक्षा का भी पुनर्गठन किया। इस उद्देश्य से स्विट्ज़रलैंड के विशेषज्ञ प्रोफेसर माल्के को तुर्की बुलाया गया, जिन्होंने उच्च शिक्षा के लिए एक विस्तृत योजना तैयार की। कॉलेजों में राजनीति विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा प्रारंभ की गई। इस्तांबुल में एक मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई, जिसमें अनेक विदेशी प्रोफेसरों को नियुक्त किया गया। इसके अतिरिक्त, कूटनीतिशास्त्र और नागरिक प्रशासन के अध्ययन की व्यवस्था की गई तथा इसके लिए अंकारा में एक विशेष कॉलेज स्थापित किया गया।

इस प्रकार तुर्की में शिक्षा का स्तर अप्रत्याशित रूप से ऊँचा उठ गया। वस्तुतः शिक्षा के क्षेत्र में किए गए सुधार मुस्तफा कमाल पाशा की सफलता के प्रमुख आधारों में से एक थे।

भाषा और लिपि में सुधार

कमाल पाशा जानते थे कि शिक्षा में सुधार के लिए भाषा और लिपि में परिवर्तन आवश्यक है। उस समय तुर्की की अपनी स्वतंत्र लिपि नहीं थी और तुर्क लोग अरबी लिपि का प्रयोग करते थे, जो अपेक्षाकृत जटिल थी। 1926 ई. में आयोजित तुर्की भाषाभाषी सम्मेलन ने अरबी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि अपनाने की सिफारिश की। 9 अगस्त 1928 ई. को मुस्तफा कमाल पाशा ने अरबी लिपि को समाप्त कर रोमन लिपि के प्रचार का व्यापक अभियान चलाया। 16 से 40 वर्ष आयु वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति के लिए नई लिपि सीखना अनिवार्य कर दिया गया।

1 नवंबर 1928 ई. को संसद ने नई लिपि को औपचारिक स्वीकृति प्रदान की और 3 नवंबर 1928 ई. को कानून पारित किया गया कि वर्ष के अंत तक सभी सरकारी तथा सार्वजनिक कार्यों में नई लिपि का प्रयोग अनिवार्य होगा तथा अरबी लिपि का सार्वजनिक उपयोग बंद कर दिया जाएगा। 1929 ई. में अरबी और फारसी को शिक्षा के पाठ्यक्रम से बाहर निकाल दिया गया।

सरकारी नौकरियों के लिए रोमन लिपि का ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया, जिसके फलस्वरूप नई लिपि का तीव्र गति से प्रसार हुआ। ऐसा प्रतीत होने लगा कि जैसे ‘संपूर्ण तुर्की एक विशाल विद्यालय बन गया हो और प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह विद्यालय में हो, घर में हो या किसी छोटे नगर में, नई तुर्की लिपि सीखने में लग गया है।’

नई लिपि के प्रसार से तुर्की साहित्य का भी विकास हुआ और उसमें उच्चकोटि के ग्रंथों की रचना होने लगी। इसके साथ ही कुरान तथा हदीस का तुर्की भाषा में अनुवाद करवा कर नवीन वर्णमाला के आधार पर इसका प्रकाशन करवाया गया। नई लिपि को लोकप्रिय बनाने के लिए विदेशों से छपाई मशीनें और छापाखाने मँगाए गए, जिससे  समाचार-पत्रों का भी तेजी से विकास हुआ। सरकार ने स्वयं ‘अनातोलिया समाचार एजेंसी’ की स्थापना की तथा अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ किया। इनके अतिरिक्त, देश में कई निजी समाचार-पत्र भी प्रकाशित होने लगे।

कमाल पाशा ने कलाओं की उन्नति की ओर भी ध्यान दिया और इस्लाम के चित्र-विरोधी सिद्धांत के बावजूद विभिन्न कलाओं को प्रोत्साहन दिया। कला सिखाने वाले विद्यालय खोले गए तथा उन्हें सरकार से सहायता प्रदान की गई।

तुर्की भाषा परिषद एवं भाषा-सुधार

तुर्की गणराज्य के समक्ष अरबी तथा इस्लामी रूढ़ियों के स्थान पर एक नई राष्ट्रीय परंपरा स्थापित करने की चुनौती थी। इसी उद्देश्य से 12 जुलाई 1932 ई. को तुर्की भाषा परिषद की स्थापना की गई । इसका मुख्य उद्देश्य तुर्की भाषा के प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित करना था। उसी वर्ष सितंबर में तुर्की भाषा-सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसमें मुस्तफा कमाल ने भी भाग लिया। परिषद ने तुर्की भाषा से अरबी-फारसी शब्दों को हटाने का अभियान चलाया, प्राचीन स्रोतों का अध्ययन करके नए शब्दों का निर्माण किया तथा नई परिभाषाएँ विकसित कीं। तुर्की भाषा को लोकप्रिय बनाने के लिए समाचार पत्रों में तुर्की भाषा की शब्दावली प्रकाशित होने लगी। इस शुद्धीकृत तुर्की भाषा का उत्कृष्ट उदाहरण 1945 ई. का संविधान है।

शहरों के नामों में परिवर्तन

राष्ट्रीयता की भावना को सुदृढ़ करने के लिए कमाल पाशा ने तुर्की के नगरों के पुराने नाम बदलकर उन्हें नए नाम देने की नीति अपनाई। इस प्रक्रिया में उन्होंने यूरोपीय परंपरा को भी ध्यान में रखा। कान्स्टैन्टिनोपोल (कुस्तुन्तुनिया) का नाम बदलकर इस्तांबुल, अंगोरा का अंकारा, एड्रियानोपुल का एडिरने और स्मर्ना का इज़मिर कर दिया गया। इस प्रकार धीरे-धीरे अधिकांश पुराने नामों का स्थान नए नामों ने ले लिया।

नए इतिहास की परिकल्पना

तुर्की परंपरा को ऐतिहासिक आधार प्रदान करने के लिए 1930 ई. में तुर्की इतिहास परिषद की स्थापना की गई  तथा 1932 ई. में उसका प्रथम सम्मेलन अंकारा में आयोजित किया गया। कमाल पाशा के निर्देशन में यह सिद्धांत प्रस्तुत किया गया कि तुर्क श्वेत आर्य जाति के हैं और मध्य एशिया उनका मूल निवास-स्थान था। वहीं से वे विभिन्न क्षेत्रों में फैल गए, जिसके परिणामस्वरूप चीनी, भारतीय तथा पश्चिम एशियाई संस्कृतियों का विकास हुआ। यह भी प्रतिपादित किया गया कि पश्चिम एशिया की प्राचीन सभ्यताओं के निर्माता सुमेरी और हित्ती लोग मूलतः तुर्क थे। इस प्रकार यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि अनातोलिया प्राचीन काल से ही तुर्कों का देश रहा है। विद्यालयों में इसी दृष्टिकोण पर आधारित इतिहास पढ़ाया जाने लगा।

उपाधियों की समाप्ति

तुर्की में उस समय तक फारसी उपाधियों और पारंपरिक खिताबों का व्यापक प्रचलन था, जो राष्ट्रीय विकास में बाधक माने गए। मुस्तफा कमाल पाशा ने 28 जून 1934 ई. के एक कानून के द्वारा 1 जनवरी 1935 ई. से प्रत्येक तुर्क के लिए उपनाम धारण करना अनिवार्य कर दिया तथा पुराने सामंतीय खिताबों और उपाधियों को समाप्त कर दिया। कमाल ने स्वयं अपने नाम से ‘मुस्तफा’ शब्द हटाकर ‘अतातुर्क’ की उपाधि धारण की और उनके सहयोगी इस्मत पाशा ने ‘इनोनु’ उपनाम ग्रहण किया।

लोकवाद
प्रशासनिक एवं न्यायिक सुधार

1926 ई. में कमाल पाशा के नेतृत्व में प्रशासनिक सुधार किए गए। देश को अनेक प्रांतों और जिलों में विभाजित कर प्रशासन को अधिक संगठित बनाया गया। इसके साथ ही इस्लाम के सिद्धांतों पर आधारित पुरानी न्याय-व्यवस्था में भी व्यापक परिवर्तन किए गए।

पहले तुर्की में कानून का आधार शरीयत था, परंतु कमाल पाशा ने आधुनिक तथा पाश्चात्य कानूनों के आधार पर तुर्की में समान न्याय प्रणाली स्थापित करने का निश्चय किया। अप्रैल 1924 ई. में राष्ट्रीय संसद द्वारा सभी धार्मिक अदालतें समाप्त कर दी गईं। मुल्लाओं के विद्यालय और धार्मिक संस्थाएँ बंद कर दी गईं तथा धार्मिक मामलों के संचालन के लिए पृथक संस्थाओं की स्थापना की गई।

1926 ई. में न्यायिक क्षेत्र में और भी महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए। पुराने कानूनों को समाप्त करके स्विट्ज़रलैंड की दीवानी संहिता, इटली की दंड-संहिता तथा जर्मनी के वाणिज्यिक कानूनों को लागू किया गया। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार तथा वसीयत संबंधी पारिवारिक कानूनों में भी परिवर्तन किए गए। इस प्रकार तुर्की की न्याय और कानून की व्यवस्था में व्यापक और आधुनिक परिवर्तन करके मुस्तफ़ा कमाल ने तुर्की की पुरानी परंपराओं से संबंध-विच्छेद कर लिया।

महिलाओं की स्थिति में सुधार

तुर्की में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें न तो राजनीतिक अधिकार प्राप्त थे और न ही सामाजिक स्वतंत्रता। समाज में पर्दाप्रथा का प्रचलन था और शिक्षा के अवसर भी सीमित थे। ऐसी स्थिति में मुस्तफा कमाल पाशा ने महिलाओं के उत्थान के अनेक क्रांतिकारी कदम उठाए।

कमाल पाशा ने सबसे पहले पर्दाप्रथा को समाप्त किया, जिसका महिलाओं ने स्वागत किया। महिलाओं को पश्चिमी वेशभूषा अपनाने की स्वतंत्रता दी गई और उनके लिए सामाजिक संस्थाओं की स्थापना की गई। महिला शिक्षा का प्रसार करके तुर्की महिलाओं को  प्रशासनिक नौकरियाँ प्रदान की गईं। विवाह-व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किए गए तथा सिविल विवाह प्रणाली लागू की गई। सत्रह वर्ष से कम आयु की लड़कियों के विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

1926 ई. में स्विस कानूनों के आधार पर लागू की गई दीवानी संहिता द्वारा बहुविवाह की प्रथा समाप्त कर दी गई। पत्नी-त्याग (तलाक) के मामलों में पति-पत्नी को समान अधिकार प्रदान किए गए। मुस्लिम महिलाओं को गैर-मुस्लिमों से विवाह की अनुमति भी दी गई, जो तत्कालीन इस्लामी समाज में एक अत्यंत क्रांतिकारी परिवर्तन था।

कमाल पाशा ने महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों को भी महत्त्व दिया। 1930 ई. में उन्हें स्थानीय चुनावों में मतदान का अधिकार मिला तथा बाद में1934 ई. में महिलाओं को राष्ट्रीय महासभा में मतदान करने तथा सदस्य बनने का भी अधिकार मिल  गया, जिसके परिणामस्वरूप राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी। कमाल के जीवनकाल में ही राष्ट्रीय सभा में सत्रह महिला सदस्य थीं और अनेक महिलाएँ सरकारी पदों पर कार्यरत थीं।

वेश-भूषा में सुधार

कमाल पाशा ने तुर्की समाज की वेश-भूषा को आधुनिक यूरोपीय स्वरूप देने के लिए पारंपरिक ‘फेज’ टोपी तथा बुरके के प्रयोग को समाप्त करने का निर्णय लिया। 25 नवंबर 1925 ई. को एक कानून पारित करके तुर्की (फेज) टोपी पहनने पर रोक लगा दिया गया और उसके स्थान पर आधुनिक छज्जेदार टोपी (हैट) को अनिवार्य कर किया गया। मुस्तफ़ा कमाल ने स्वयं फ़ेज़ के स्थान पर पश्चिमी शैली की टोपी (हैट) पहनना प्रारंभ किया। इसके साथ ही लोगों को यूरोपीय पोशाक, कोट-पतलून तथा टाई अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

कमाल के इन क्रांतिकारी परिवर्तनों से मुस्लिम कट्टरपंथियों का रुष्ट होना स्वाभाविक था। मुस्लिम जगत के अनेक धार्मिक नेताओं ने इसे इस्लामी परंपराओं पर आघात बताया और कमाल पाशा पर निरंकुशता का आरोप लगाया, किंतु वह अपने निर्णय से विचलित नहीं हुए। उन्होंने विरोधियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की और कुछ फेज टोपी पहनने के कारण दंडित भी किए गए।

 नियंत्रित अर्थवाद
आर्थिक पुनर्गठन

मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क ने अनुभव किया कि केवल राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सुधारों के आधार पर तुर्की का पूर्ण पुनर्निर्माण संभव नहीं है। राष्ट्र की वास्तविक प्रगति के लिए आर्थिक क्षेत्र में भी व्यापक परिवर्तन आवश्यक है। इसलिए उन्होंने आर्थिक पुनर्गठन को अपने सुधार कार्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण अंग बनाया। उनका उद्देश्य ऐसी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का निर्माण करना था, जो विदेशी नियंत्रण, आर्थिक निर्भरता तथा पिछड़ेपन से मुक्त होकर राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हो

1 दिसंबर 1921 ई. को अंकारा में दिए गए एक भाषण में अतातुर्क ने स्पष्ट किया कि तुर्की को ऐसी आर्थिक व्यवस्था अपनानी चाहिए, जो उसे साम्राज्यवाद तथा शोषणकारी पूँजीवाद दोनों के विरुद्ध संघर्ष करने की क्षमता प्रदान करे। उनका मत था कि आर्थिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता भी अधूरी है। 17 फरवरी 1923 ई. को इज़मिर में आयोजित आर्थिक सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कृषि, उत्पादन और राष्ट्रीय उद्योगों के विकास पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि तलवार की अपेक्षा हल अधिक स्थायी विजय दिलाता है। इस सम्मेलन में ‘आर्थिक संकल्प’ (मीसाक-ए-इकतिसादी) स्वीकार किया गया, जिसमें वर्ग-संघर्ष के स्थान पर राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सहयोग और आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी गई। अतातुर्क ने किसानों, श्रमिकों, कारीगरों और व्यापारियों से परस्पर सहयोग का आह्वान करते हुए कहा कि राष्ट्र की आर्थिक उन्नति में समाज के सभी वर्गों की सहभागिता आवश्यक है।

कृषि में सुधार

मुस्तफ़ा कमाल कृषि और उद्योग को राष्ट्र की आर्थिक शक्ति का आधार मानते थे। प्रथम विश्वयुद्ध और स्वतंत्रता संग्राम के कारण कृषि व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो चुकी थी। फलतः कृषकों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए सहकारी समितियाँ बनाई गईं और कृषकों को ऋण तथा आर्थिक सहायता देने के लिए 1925 ई. में एक कृषि बैंक (ज़िराअत बैंकासी) स्थापित किया गया। कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने पर बल दिया गया और विदेशों से आधुनिक कृषि उपकरण और मशीनें मँगाई गईं, जिसके फलस्वरूप ट्रैक्टर तथा अन्य आधुनिक कृषि उपकरणों का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

कृषि शिक्षा और अनुसंधान के लिए कृषि महाविद्यालय तथा प्रशिक्षण संस्थान खोले गए, तुर्की  के छात्र कृषि का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अमेरिका और यूरोप के देशों में भेजे गए। अंकारा के निकट एक आदर्श कृषि फार्म (गाजी फॉरेस्ट फार्म) स्थापित किया गया और तंबाकू तथा अन्य कृषि उत्पादों के विकास के लिए भी अनुसंधान केंद्रों की स्थापना की गई।

कमाल पाशा के प्रयासों के परिणामस्वरूप गेहूँ, तंबाकू, शक्कर और कपास के उत्पादन में वृद्धि हुई और तुर्की की आर्थिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त हुआ।

भूमि-सुधार

भूमि-व्यवस्था के क्षेत्र में भी कमाल पाशा की सरकार ने महत्त्वपूर्ण सुधार किए। 17 फरवरी 1925 ई. को किसानों के कुछ करों को समाप्त या कम कर दिया गया, जिससे उन्हें बड़ी राहत मिली। इसके बाद 1926 ई. में स्विस विधि-संहिता के आधार पर भूमि-व्यवस्था को अधिक संगठित और एकरूप बनाया गया तथा सामंतवादी अवशेषों को समाप्त करने का प्रयास किया गया।

1929 ई. में भूमि-वितरण संबंधी कानून बनाए गए, जो तुर्की में सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था। जनता दल की स्थानीय शाखाओं ने किसानों को कृषि के आधुनिक तरीकों की शिक्षा देना शुरू किया।

औद्योगिक विकास

कमाल पाशा ने तुर्की की राष्ट्रीय प्रगति के लिए औद्योगिक विकास पर विशेष बल दिया, किंतु इस क्षेत्र में उनकी नीति राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था की थी। उनके अनुसार औद्योगिक विकास को केवल निजी पूँजी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि राज्य के संरक्षण, निर्देशन और नियंत्रण में संचालित होना चाहिए। इस नीति का आधार आर्थिक राष्ट्रवाद था।

औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अनेक योजनाएँ लागू कीं। कारखानों तथा आवागमन के प्रमुख साधनों का राष्ट्रीयकरण किया गया और पूरे देश में रेलवे नेटवर्क का विस्तार किया गया। अक्टूबर 1929 ई. में सरकार ने देशी उद्योगों की रक्षा के लिए आयातित वस्तुओं पर चुंगी की दरें बढ़ा दीं तथा आयात-नियंत्रण संबंधी नीतियाँ अपनाईं।

1932 ई. में अतातुर्क ने घोषणा की कि ‘जनता को इस समय राजनीति को एक ओर रख देना चाहिए; उन्हें कृषि और उद्योगों में रुचि लेनी चाहिए।’ इसी विचार के अनुरूप 1933 ई. में प्रथम पंचवर्षीय योजना लागू की गई, जिस पर आंशिक रूप से सोवियत आर्थिक योजनाओं का प्रभाव था। इस योजना में उपभोग की वस्तुओं के उत्पादन पर विशेष बल दिया गया और  चीनी, कपड़ा, दरियाँ तथा अन्य उद्योगों की स्थापना की गई।

सरकार ने राज्य की आय में वृद्धि करने के लिए शराब, तंबाकू, नमक, पेट्रोल, अल्कोहल, नौ-परिवहन, माचिस एवं हथियारों जैसे उद्योगों पर राज्य का एकाधिकार स्थापित किया। साथ ही, यातायात और आधारभूत संरचना के विकास के लिए दीर्घकालीन योजनाएँ चलाई गईं। सड़कों और परिवहन सुविधाओं के विस्तार हेतु दस वर्षीय योजना लागू की गई, जिसके अंतर्गत नई सड़कों का निर्माण तथा पुरानी सड़कों की मरम्मत की गई और नई रेलवे लाइनें बनाई गई। इन योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए विदेशी विशेषज्ञों की सेवाएँ ली गईं और कुछ कार्य विदेशी कंपनियों को भी सौंपे गए।

आर्थिक विकास को सुसंगठित रूप देने के लिए 1934 ई. में कृषि की उन्नति की चतुर्वर्षीय योजना, उद्योगों के लिए पंचवर्षीय योजना, खनिज उत्पादन के लिए त्रिवर्षीय योजना तथा सड़क निर्माण के लिए दसवर्षीय योजना प्रारंभ की गई। खनन क्षेत्र के विकास के लिए विशेष योजनाएँ बनाई गईं और खनिज संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग पर बल दिया गया।

औद्योगीकरण के साथ-साथ मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए भी सरकार ने महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। 1936 ई. में श्रम कल्याण हेतु नए श्रम-कानून लागू किए गए तथा अंकारा में एक केंद्रीय श्रम कार्यालय की स्थापना की गई। बाल श्रमिकों के संरक्षण की व्यवस्था की गई, श्रमिक अधिकारों को विनियमित किया गया तथा हड़तालों पर नियंत्रण लगाया गया। जनस्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के लिए अलग विभाग स्थापित किए गए तथा नशीली वस्तुओं के नियंत्रण हेतु भी विशेष प्रबंध किए गए। व्यापार और उद्योग के संगठन के लिए चैंबर ऑफ कॉमर्स की स्थापना की गई।

विदेशी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न देशों के साथ व्यापारिक समझौते किए गए, मेलों और प्रदर्शनियों का आयोजन हुआ तथा व्यापार-संबंधी उच्चस्तरीय समितियाँ गठित की गईं। 1934 ई. में तुर्की को रूस से ब्याज रहित ऋण मिला, जिससे औद्योगीकरण में सहायता मिली। विदेशी सहायता से खनिज, कोयला, ताँबा, क्रोमियम आदि धातुओं का उत्पादन बढ़ गया। वस्त्र उद्योग में भी आशातीत उन्नति हुई। श्रम-शक्ति की कमी को पूरा करने के लिए सरकार ने विदेशों में बसे तुर्कों को वापस लौटने के लिए प्रोत्साहित किया।

आर्थिक नियंत्रण और वित्तीय सुदृढ़ीकरण के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण वित्तीय संस्थाओं की स्थापना की गई और उन्हें पृथक्-पृथक् कार्य सौंपे गए। व्यापार-व्यवसाय के लिए 1924 ई. में इश बैंक, मुद्रा एवं ऋण के लिए 1930 ई. में केंद्रीय बैंक, उद्योगों के लिए 1933 ई. में सूमेर बैंक और खनिज क्षेत्र के प्रबंधन के उद्देश्य से 1935 ई. में एतीबैंक की स्थापना की गई। इन संस्थाओं ने तुर्की की अर्थव्यवस्था को संगठित, आत्मनिर्भर और अधिक स्थिर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे विदेशी निवेशकों का विश्वास भी बढ़ा। इन उपायों के परिणामस्वरूप 1928 से 1931 ई. के बीच तुर्की का औद्योगिक उत्पादन 26,000,000 डॉलर से बढ़कर 50,000,000 डॉलर तक पहुँच गया।

इस प्रकार कमाल अतातुर्क ने तुर्की के आर्थिक ढाँचे में व्यापक परिवर्तन करके उसका आर्थिक कायाकल्प किया। यद्यपि उनकी आर्थिक नीति में राज्य की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी, फिर भी यह सोवियत मॉडल से भिन्न थी, क्योंकि तुर्की में उद्योगों का बलात् राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया था; बल्कि राज्य के नेतृत्व और निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी पर आधारित एक राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था विकसित की गई थी।

धर्मनिरपेक्षवाद

धर्मनिरपेक्षतावाद अतातुर्क की राजनीतिक विचारधारा का सबसे प्रमुख प्रतीक माना जाता है। उन्होंने ऑटोमन साम्राज्य से जुड़ी अनेक धार्मिक और राजनीतिक संस्थाओं को समाप्त कर दिया, किंतु व्यवहार में इस्लाम का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। राज्य का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि धर्म तुर्की की राष्ट्रीय एकता और आधुनिक पहचान के लिए चुनौती न बने।

खिलाफत की समाप्ति

कमाल पाशा के सामने राष्ट्र-निर्माण और विकास के मार्ग में धर्म सबसे बड़ी बाधा था। वह धर्म के क्षेत्र में यूरोपीय मॉडल से प्रभावित थे और चाहते थे कि तुर्की में भी धर्म और राजनीति को एक-दूसरे से अलग रखा जाए।

तुर्की में सल्तनत समाप्त हो चुकी थी, परंतु खिलाफत अभी तक शेष थी। 1922 ई. में राष्ट्रीय सभा ने सुल्तान के माल्टा भाग जाने पर उसके चचेरे भाई अब्दुल मजीद को खलीफा बनाया था। खिलाफत इस्लामी जगत की सांस्कृतिक और धार्मिक एकता का प्रतीक था। तुर्की के राष्ट्रवादी नेता खिलाफत को निरर्थक और राष्ट्रीय विकास में बाधक मानते थे, जबकि दूसरी ओर अनेक रूढ़िवादी मुसलमान और भारत के आगा ख़ाँ और अमीर अली जैसे कुछ नेता खिलाफत बचाने के लिए आंदोलन चला रहे थे।

3 मार्च 1924 ई. को तुर्की संसद ने खिलाफत को समाप्त करने और अब्दुल मजीद को खलीफा पद से पदच्युत करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। अगले दिन खलीफा अब्दुल मजीद को पद से हटा दिया गया और ओटोमन साम्राज्य के उस्मानी राजवंश के सभी सदस्यों को तुर्की से निष्कासित कर दिया। इस प्रकार खलीफा अबू बक्र के समय से चली आ रही एक प्राचीन इस्लामी परंपरा का कमाल पाशा ने अंत कर दिया।

खिलाफत की समाप्ति के परिणामस्वरूप तुर्की में धर्म और राजनीति को अलग कर दिया गया और घोषित किया गया कि राज्य सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करेगा।

खिलाफत समाप्त होते ही शेख-उल-इस्लाम का पद भी समाप्त कर दिया गया, शरीयत मंत्रालय बंद कर दिया गया, सभी खानकाहों (मठों) और धार्मिक संस्थानों पर ताले लगा दिए गए तथा शरई अदालतें और उनमें कार्यरत मुल्ला-काज़ी हटा दिए गए। 24 अप्रैल 1924 ई. को राष्ट्रीय संसद ने सभी प्रकार के कानून बनाने का अधिकार अपने हाथ में ले लिया। दरवेशों की जमातों और गुप्त धार्मिक संप्रदायों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। धार्मिक मामलों के संचालन के लिए गैर-धार्मिक संस्थाओं की स्थापना की गई।

इन सुधारों का तुर्की में तीव्र विरोध हुआ। कमाल पाशा के कुछ प्रमुख सहयोगी, जैसे- रऊफ, रफ़त, फुआद और जनरल कासिम भी उनके विरोधी हो गए। इसी बीच फरवरी 1925 ई. में पूर्वी तुर्की में नक्शबंदी दरवेशों के नेता शेख सईद ने कुर्द विद्रोह शुरू कर दिया, जो दक्षिणी क्षेत्रों तक फैलने लगा। ऐसी परिस्थिति में कमाल पाशा ने 4 मार्च 1925 ई. को संसद से ‘शांति और सुरक्षा अधिनियम’ पारित करवाकर दो वर्षों के लिए व्यापक शासनाधिकार अपने हाथ में ले लिया। अप्रैल 1925 ई. में शेख सईद तथा उसके सहयोगियों को गिरफ्तार कर मृत्युदंड  दिया गया।

इसके पश्चात् पूरे तुर्की में सूफी साधु-संतों की संस्थाओं, उनकी गद्दियों, तकियों और धार्मिक संगठनों को समाप्त कर दिया गया। उनके सम्मेलनों, वेश-भूषा तथा धार्मिक रीति-रिवाजों पर कठोर नियंत्रण लगाया गया। इसी क्रम में कमाल ने फेज टोपी के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया गया था, जिसका उद्देश्य धार्मिक परंपराओं के प्रभाव को कम करना था।

इस्लामिक कैलेंडर और अरबी अंकों में परिवर्तन

कमाल पाशा ने कई अन्य महत्त्वपूर्ण धार्मिक परिवर्तन भी किए। 26 दिसंबर 1925 ई. को उन्होंने पारंपरिक इस्लामी पंचांग के स्थान पर ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू किया और प्रत्येक वयस्क स्त्री-पुरुष को अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करने का कानूनी अधिकार दिया गया। मई 1928 में एक कानून द्वारा अरबी अंकों के स्थान पर नई अंक-पद्धति लागू किए गए। 1935 ई. में शुक्रवार की छुट्टी बंद कर दी गई और उसके स्थान पर रविवार को साप्ताहिक अवकाश घोषित किया गया। धार्मिक प्रभाव से दूर करने के उद्देश्य से राजधानी कान्स्टैन्टिनोपोल (इस्तांबुल) से हटाकर अंकारा में स्थापित की गई, जिससे प्रशासनिक और राजनीतिक जीवन में धर्मनिरपेक्ष प्रवृत्तियों को बल मिला।

मस्जिदों का आधुनिकीकरण

1924 ई. में पवित्र संस्थाओं के मंत्रालय (शेख-उल-इस्लाम) को समाप्त कर उसके स्थान पर ‘धार्मिक मामलों का विभाग’ स्थापित किया गया, जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त किया जाता था। इमाम, मुअज्जिन और मुअल्लिम (धार्मिक शिक्षक) सरकारी कर्मचारी बन गए। धार्मिक मदरसे बंद कर दिए  गए,  सुलेमानिया मदरसे को इस्तांबुल विश्वविद्यालय के धर्मशास्त्र संकाय में परिवर्तित कर दिया गया और प्रसिद्ध सांता सोफिया मस्जिद को संग्रहालय बना दिया गया।

1928 ई. में कमाल सरकार ने इस्लाम के आधुनिकीकरण के लिए प्रो. मुहम्मद फुआद कोप्रूलू की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की। इस समिति ने मस्जिदों की स्वच्छता, तुर्की भाषा में प्रार्थना और उपदेश, मस्जिदों में संगीत की व्यवस्था तथा प्रवचनों को प्रकाशित कर जनता तक पहुँचाने जैसी सिफारिशें प्रस्तुत कीं, जो इस्लामी धार्मिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन का प्रयास था।

30 जनवरी 1932 ई. को इस्तांबुल की फ़ातिह मस्जिद में पहली बार तुर्की भाषा में अज़ान दी गई। इसके बाद तुर्की में अज़ान को तुर्की भाषा में पढ़ने का प्रचलन शुरू हुआ।। इससे पहले 5 अप्रैल 1928 ई. को संविधान की दूसरी धारा से यह वाक्य हटा दिया गया था कि ‘तुर्की राज्य का धर्म इस्लाम है।’ 10 अप्रैल 1928 ई. को इसे विधिक रूप प्रदान कर दिया गया। इस प्रकार तुर्की आधिकारिक रूप से एक धर्मनिरपेक्ष (ला-दीनी) राज्य बन गया।

क्रांतिवाद

कमालवाद का छठा और अंतिम सिद्धांत क्रांतिवाद था। इसके अनुसार कमाल पाशा तुर्की में निरंतर क्रांतिकारी चेतना का विकास करना चाहते थे। उनका मानना था कि तुर्की की उन्नति के लिए जनता में परिवर्तनशील और प्रगतिशील दृष्टिकोण विकसित करना आवश्यक है। रूढ़िवादिता सुधारों में बाधा उत्पन्न करती है; इसलिए वह प्रचार, शिक्षा और राजनीतिक गतिविधियों के माध्यम से जनता में क्रांतिकारी भावना का प्रसार करते  रहे।

कमाल के सुधारों को स्कूलों के प्रगतिशील शिक्षकों, अनेक समाचार-पत्रों तथा विचारशील नागरिकों का समर्थन प्राप्त हुआ। इसी व्यापक समर्थन के कारण कमाल पाशा अपने सुधारवादी कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू करने में समर्थ हुए।

मुस्तफा कमाल पाशा की विदेश नीति

मुस्तफा कमाल अतातुर्क की विदेश नीति का मूल उद्देश्य नवगठित तुर्की गणराज्य की स्वतंत्रता, संप्रभुता तथा राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना था। उन्होंने ओटोमन साम्राज्य की परंपरागत कूटनीतिक नीति के अनुरूप क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया तथा ऐसे संबंध विकसित किए जो तुर्की की सुरक्षा और स्थिरता के लिए लाभकारी थे। तुर्की राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान सोवियत संघ ने मुस्तफा कमाल के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलन को हथियार, धन तथा कूटनीतिक समर्थन प्रदान किया, जिससे दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हुए।

गणराज्य की स्थापना के बाद अतातुर्क ने किसी शक्ति-गुट में शामिल होने के बजाय “शांति और संतुलन” की नीति अपनाई तथा तुर्की को अंतरराष्ट्रीय विवादों से दूर रखने का प्रयास किया। उनकी विदेश नीति का आधार प्रसिद्ध सिद्धांत ‘देश में शांति, विश्व में शांति’ (युर्त्ता सुल्ह, जहाँदा सुल्ह) था। इस नीति के अंतर्गत तुर्की ने अपने पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित किए और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित किया।

धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुर्की की स्थिति मजबूत होती गई और जुलाई 1932 ई. में तुर्की को राष्ट्र संघ की सदस्यता मिल गई, जिससे उसे विश्व समुदाय में एक स्वतंत्र और आधुनिक राष्ट्र के रूप में मान्यता मिली। इस प्रकार अतातुर्क की विदेश नीति ने तुर्की की राष्ट्रीय संप्रभुता को सुदृढ़ किया, उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को बढ़ाया तथा देश को एक स्वतंत्र और सम्मानित राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।

अंततः दीर्घकालीन अस्वस्थता के पश्चात् 10 नवंबर 1938 ई. को इस्तांबुल के दोल्माबहचे महल में मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क का मुस्तफा कमाल का देहांत हो गया। उनकी मृत्यु पर समूचे तुर्की में शोक की लहर फैल गई। उनकी स्मृति में राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया और बाद में 1953 ई. में उनके पार्थिव शरीर को अंतिम रूप से अंकारा स्थित अनितकबिर समाधि में सम्मानपूर्वक स्थानांतरित किया गया।

कमाल के सुधारों का मूल्यांकन

इस प्रकार अपने छह सिद्धांतों के आधार पर मुस्तफा कमाल पाशा ने तुर्की को नया जीवन प्रदान किया और एक मृतप्राय राष्ट्र पुनः विश्व समुदाय में सम्मानपूर्वक खड़ा हो सका। कमाल के सुधारों का मुख्य उद्देश्य तुर्की का पश्चिमीकरण अथवा यूरोपीयकरण करना था और इस लक्ष्य की प्राप्ति में उन्हें आशातीत सफलता मिली। यह सही है कि इन सुधारों को लागू करने के लिए कमाल को निरंकुशता का सहारा लेना पड़ा, किंतु उनकी निरंकुशता उदारवादी भावना से प्रेरित थी और उनहोंने कभी भी उसका उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति के लिए नहीं किया।

यद्यपि कमाल अतातुर्क द्वारा लागू किए गए सभी सुधारों को संसद की स्वीकृति प्राप्त थी। फिर भी, उन्हें अपने सुधारात्मक कार्यक्रमों को लागू करने में अनेक विरोधों का सामना करना पड़ा। इस्तांबुल के व्यापारियों ने उसकी आर्थिक नीतियों की आलोचना की। कुर्दों तथा पिछड़े समुदायों ने उसकी धार्मिक नीतियों का विरोध किया, जबकि पुरातनपंथी मुल्ला उनके कट्टर विरोधी बने रहे। किंतु मुस्तफा कमाल पाशा ने बड़ी दृढ़ता से इन विरोधियों का दमन किया।

कमाल विरोधियों का दमन करने के साथ ही साथ उन्हें तर्क और संवाद के माध्यम से समझाने और अपने पक्ष में करने का प्रयास भी करते  रहे, जिसके परिणामस्वरूप अनेक विरोधी अंततः उनके समर्थक बन गए और धीरे-धीरे तुर्क जनता भी राष्ट्रवाद की धारा में प्रवाहित होने लगी।

उन्नीसवीं शताब्दी में जिस तुर्की राज्य को ‘यूरोप का बीमार व्यक्ति’ कहा जाता था, उसे कमाल अतातुर्क ने कमालवाद के क्रांतिकारी सिद्धांतों के माध्यम से एक स्वतंत्र, पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, आधुनिक, प्रगतिशील और संगठित राष्ट्र में परिवर्तित कर दिया। यह एक अत्यंत साहसपूर्ण कार्य था, जिसे इतिहासकार वेब्स्टर ने ‘अस्पताल का आश्चर्यजनक नाटक’ कहा है। युवा तुर्कों के विपरीत, मुस्तफा कमाल ने ‘यूरोप के मरीज’ को केवल औषधि देने का प्रयास नहीं किया, बल्कि एक कुशल शल्य-चिकित्सक की भाँति राष्ट्र के जर्जर और अनुपयोगी अंगों को काटकर अलग कर दिया। वास्तव में, मुस्तफा कमाल आधुनिक तुर्की के निर्माता थे और यही कारण है कि तुर्क जनता आज भी उन्हें सम्मानपूर्वक ‘राष्ट्रपिता’ (अतातुर्क) कहकर संबोधित करती है।

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