सोमवंशी राजवंश (9वीं से 12वीं शताब्दी ई.)
सोमवंशी राजवंश ने लगभग नौवीं से बारहवीं शताब्दी ईस्वी तक पूर्वी भारत के कलिंग, उत्कल और दक्षिण कोसल क्षेत्रों, जो वर्तमान ओडिशा में स्थित हैं, पर शासन किया। उनकी सत्ता के विस्तार के साथ इन क्षेत्रों का राजनीतिक एकीकरण हुआ और एक विशिष्ट ओडिया सांस्कृतिक पहचान का उदय हुआ। राजवंश के संस्थापक जनमेजय प्रथम थे, जिन्होंने नौवीं शताब्दी के अंत में पश्चिमी ओडिशा में अपनी शक्ति सुदृढ़ कर कलिंग और उत्कल पर अधिकार स्थापित किया। उनकी प्रमुख राजधानियों में सुवर्णपुर, विनीतपुर, ययातिनगर तथा अभिनव-ययातिनगर सम्मिलित थीं। अभिनव-ययातिनगर की पहचान आधुनिक जाजपुर से की जाती है, जबकि ययातिनगर को कुछ विद्वान आधुनिक बिंका से संबद्ध मानते हैं। बारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में पूर्वी गंग वंश के शक्तिशाली शासक अनंतवर्मन चोडगंगदेव ने सोमवंशी क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर इस राजवंश के शासन का अंत किया।
ऐतिहासिक स्रोत
सोमवंशी राजवंश के इतिहास के पुनर्निर्माण में अभिलेखीय, साहित्यिक, पुरातात्त्विक, मुद्राशास्त्रीय तथा धार्मिक स्रोत उपलब्ध हैं। इन सभी स्रोतों के समन्वित उपयोग से इस राजवंश के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास का समुचित पुनर्निर्माण संभव है।
अभिलेखीय एवं पुरातात्त्विक स्रोत
सोमवंशी इतिहास के सर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत उनके ताम्रपत्र, शिलालेख तथा मंदिर-अभिलेख हैं, जो प्रायः संस्कृत भाषा तथा नागरी अथवा पूर्वी भारतीय लिपियों में उत्कीर्ण हैं। इन अभिलेखों से राजाओं की वंशावली, उपाधियाँ, प्रशासनिक व्यवस्था, भूमि-दान, धार्मिक गतिविधियाँ तथा मंदिर-निर्माण का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है। प्रमुख अभिलेखों में तीवरदेव के राजिम और बलौदा ताम्रपत्र, महानन्नराज के आधाभार ताम्रपत्र, महाशिवगुप्त बालार्जुन के बोंडा ताम्रपत्र, जनमेजय प्रथम के पटना और कलिभाना ताम्रपत्र, ययाति प्रथम के कटक, निबिन्ना तथा पटना ताम्रपत्र, ब्रह्मेश्वर मंदिर अभिलेख, रत्नगिरि अभिलेख, खंडपारा ताम्रपत्र, कालिंजर शिलालेख, आरंग शिलालेख तथा सिरपुर शिलालेख सम्मिलित हैं।
पुरातात्त्विक अवशेष भी सोमवंशी इतिहास के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण सहायक हैं। भुवनेश्वर, जाजपुर, सोनपुर तथा रत्नगिरि क्षेत्रों से प्राप्त मंदिर, मूर्तियाँ, विहार तथा स्थापत्य अवशेष इस वंश की कला एवं संस्कृति का परिचय कराते हैं। लिंगराज मंदिर, ब्रह्मेश्वर मंदिर, राजारानी मंदिर तथा रत्नगिरि एवं उदयगिरि के बौद्ध अवशेष सोमवंशीकालीन स्थापत्य-कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
मुद्राशास्त्रीय स्रोत
सोमवंशी काल के कुछ सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। यद्यपि ये संख्या में अपेक्षाकृत कम हैं, तथापि उन पर अंकित प्रतीकों, देवताओं तथा राजचिह्नों से उनकी धार्मिक प्रवृत्तियों, आर्थिक दशा, व्यापारिक गतिविधियों तथा राज्य की आर्थिक संरचना पर प्रकाश पड़ता है।
साहित्यिक स्रोत
साहित्यिक स्रोतों में संस्कृत प्रशस्तियाँ, काव्य तथा ओडिशा की पारंपरिक ऐतिहासिक कृति ‘मादलापांजी’ उल्लेखनीय हैं। संस्कृत काव्यों में सोमवंशी राजाओं की वीरता, दानशीलता और धार्मिकता का वर्णन मिलता है। ‘मादलापांजी’ में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ पौराणिक तत्त्व भी सम्मिलित हैं, फिर भी यह ग्रंथ सोमवंशी शासकों, विशेषकर ययाति केशरी के संबंध में उपयोगी सामग्री प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, कुछ पुराणों तथा स्थानीय आख्यानों में सोमवंशियों को चंद्रवंशी क्षत्रिय बताया गया है, जिससे उनकी धार्मिक वैधता तथा सामाजिक प्रतिष्ठा का ज्ञान होता है।
विदेशी यात्रियों के विवरण
चीनी यात्री ह्वेनसांग का विवरण सोमवंशी काल से पूर्व का है। अतः उसे प्रत्यक्ष सोमवंशी स्रोत के रूप में नहीं, अपितु उस पूर्ववर्ती धार्मिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के स्रोत के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें आगे चलकर सोमवंशियों का उदय हुआ।
धार्मिक एवं मंदिर-परंपराएँ
जगन्नाथ मंदिर की परंपराएँ तथा शैव एवं शाक्त संप्रदायों से संबंधित धार्मिक अभिलेख सोमवंशी शासकों की धार्मिक नीतियों को स्पष्ट करते हैं और उनके इतिहास के अध्ययन में सहायक हैं।
सोमवंशियों की उत्पत्ति
सोमवंशी राजवंश संभवतः दक्षिण कोसल के पांडुवंशी राजवंश से संबंधित थे और दोनों राजवंश चंद्रवंशीय क्षत्रिय होने का दावा करते थे। सोमवंशी अभिलेखों में उनके कुल को ‘सोमकुल’, ‘सोमवंशसंभव’ तथा ‘सितांशुवंशविमलांबर’ जैसे विशेषणों से संबोधित किया गया है, जो उनके चंद्रवंशी होने के दावे को स्पष्ट करते हैं।
आरंभिक पांडुवंशी राजा अपनी वंशावली पौराणिक पांडवों से जोड़ते थे, किंतु बाद के पांडुवंशी राजाओं ने सोमवंशियों की भाँति ‘-गुप्त’ पर समाप्त होने वाले नाम अपनाए। पांडुवंशी राजाओं तीवरदेव और बलार्जुन ने क्रमशः ‘महाशिव’ तथा ‘महाशिवगुप्त’ की उपाधियाँ धारण कीं, जो अनेक सोमवंशी शासकों ने भी अपनाईं। इसी प्रकार दोनों वंशों के अभिलेख नागरी लिपि में उत्कीर्ण हैं। प्रथम ज्ञात सोमवंशी राजा महाशिवगुप्त प्रथम (जनमेजय) के चौद्वार शिलालेख में उन्हें “कोसलेंद्र” अर्थात् कोसल का स्वामी कहा गया है। अनेक सोमवंशी शिलालेखों में कोसल क्षेत्र के लोगों को दिए गए अनुदानों तथा कोसल-विशिष्ट अधिकारियों की नियुक्तियों का उल्लेख मिलता है। इन सभी समानताओं से संकेत मिलता है कि सोमवंशी पांडुवंशियों से संबंधित थे, यद्यपि यह निश्चितता से सिद्ध नहीं किया जा सकता।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार पांडुवंशियों को कलचुरी राजवंश द्वारा कोसल से खदेड़ दिया गया, जिसके बाद वे पूर्व की ओर बढ़े और महानदी के तट पर विनीतपुर (आधुनिक बिंका) को अपनी राजधानी बनाया। विनीतपुर के आसपास तक सीमित रहने वाले शासकों को ‘प्रारंभिक सोमवंशी’ कहा जाता है, जबकि ओडिशा के विस्तृत भाग पर शासन करने वाले ‘उत्तरकालीन सोमवंशी’ के रूप में जाने जाते हैं।
सोमवंशी परंपरा के अनुसार वे पांडव वंश के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी थे, जिन्होंने मेकल क्षेत्र पर शासन किया था। मेकल की पहचान आधुनिक मैकाल पर्वतमाला से की जाती है, जो विंध्य और सतपुड़ा पर्वतों को जोड़ती है तथा मध्यप्रदेश के खैरागढ़ से रीवा तक विस्तृत है। इन पांडुवंशी शासकों का प्रथम उल्लेख भरतबल के बाम्हनी ताम्रपत्रों में प्राप्त होता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गुप्तोत्तर काल और प्रारंभिक वंशावली
सोमवंशी राजवंश का उदय गुप्तोत्तर काल में हुआ, जब उत्तर भारत की केंद्रीय सत्ता दुर्बल पड़ चुकी थी और विभिन्न क्षेत्रीय राजवंश स्वतंत्र शक्तियों के रूप में उभर रहे थे। सोमवंशियों ने प्रारंभ में दक्षिण कोसल में अपनी सत्ता स्थापित की, जो वर्तमान छत्तीसगढ़ तथा पश्चिमी ओडिशा के विस्तृत भूभाग में फैला हुआ था। बाद में उन्होंने उत्कल, कलिंग और कोंगोद क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर एक सुदृढ़ साम्राज्य की नींव रखी।
इस वंश की प्रारंभिक वंशावली उदयन से आरंभ होती है, जिन्हें इसका संस्थापक माना जाता है। उदयन के पश्चात् इंद्रबल और तत्पश्चात् नन्नदेव शासक हुए, जिनके समय तक सोमवंशी सत्ता दक्षिण कोसल में एक प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो चुकी थी।
महाशिव तीवरदेव
राजवंश के चौथे शासक महाशिव तीवरदेव एक शक्तिशाली शासक थे। अभिलेखीय प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि वे नन्नदेव के वंशज तथा चंद्रगुप्त के भ्राता थे। उन्होंने संपूर्ण कोसल पर प्रभुत्व स्थापित कर “कोसलाधिपति” की उपाधि धारण की और सोमवंशियों को दक्षिण कोसल की प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया।
चंद्रगुप्त, हर्षगुप्त और महाशिवगुप्त बालार्जुन
तीवरदेव के बाद चंद्रगुप्त और हर्षगुप्त ने क्रमशः सत्ता संभाली। हर्षगुप्त के शासनकाल में सोमवंशियों को राष्ट्रकूटों से संघर्ष करना पड़ा और संभवतः राष्ट्रकूट नरेश दंतिदुर्ग के साथ संघर्ष में उनकी मृत्यु हुई।
हर्षगुप्त के पश्चात् महाशिवगुप्त बालार्जुन सोमवंशी-पांडुवंशी वंश के सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक बने। वे दक्षिण कोसल के अंतिम महान सोमवंशी शासक माने जाते हैं। शिव के उपासक होने के कारण वे “परममहेश्वर” की उपाधि धारण करते थे, किंतु उन्होंने बौद्ध धर्म को भी संरक्षण प्रदान किया। सिरपुर का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर, जिसका निर्माण उनकी माता रानी वसता ने कराया था, उनके काल की स्थापत्य-कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने लगभग सत्तावन वर्षों तक शासन किया और उनकी मृत्यु लगभग 810 ईस्वी में हुई। इसके बाद सोमवंशी इतिहास में लगभग आधी शताब्दी का अस्पष्ट अंतराल दिखाई देता है।
राष्ट्रकूट आक्रमण और पुनः स्वतंत्रता
नौवीं शताब्दी के प्रारंभ में राष्ट्रकूट नरेश गोविंद तृतीय (793–814 ई.) ने दक्षिण कोसल सहित पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्रों पर अभियान चलाया। संजन ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि कोसल कुछ समय के लिए राष्ट्रकूट प्रभाव में आ गया था। 814 ईस्वी में गोविंद तृतीय की मृत्यु के बाद राष्ट्रकूट साम्राज्य में उत्पन्न अस्थिरता का लाभ उठाकर दक्षिण कोसल के शासकों ने पुनः अपनी स्वतंत्र स्थिति स्थापित कर ली। इसके तुरंत बाद ही उन्हें रतनपुर के कलचुरी शासकों की चुनौती का भी सामना करना पड़ा। इन्हीं परिस्थितियों में नौवीं शताब्दी के मध्य में सोमवंशी धीरे-धीरे पूर्व की ओर अपने राज्य का विस्तार करने लगे।
नौवीं शताब्दी के अंतिम चरण में जनमेजय प्रथम के उदय के साथ सोमवंशियों की एक नई वंशावली का उल्लेख मिलता है, जो बारहवीं शताब्दी के प्रारंभ तक शासन करती रही। ओडिशा के सोमवंशी शासक क्रमशः ‘महाभवगुप्त’ और ‘महाशिवगुप्त’ की उपाधियाँ धारण करते थे, जो दक्षिण कोसल के पांडुवंशी-सोमवंशी वंश से उनके संबंध की ओर संकेत करते हैं।
ओडिशा में सोमवंशी सत्ता का उदय और विकास
शिवगुप्त (लगभग 855–880 ई.)
शिवगुप्त ओडिशा में सोमवंशी राजवंश के प्रथम ऐतिहासिक शासक हैं, यद्यपि उनका कोई स्वतंत्र शिलालेख अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। उनके संबंध में जानकारी मुख्यतः उनके पुत्र एवं उत्तराधिकारी के अभिलेखों से प्राप्त होती है। उनकी ‘परमभट्टारक’, ‘महाराजाधिराज’ तथा ‘परमेश्वर’ जैसी शाही उपाधियों से स्पष्ट होता है कि वे एक स्वतंत्र एवं शक्तिशाली शासक थे।
कुछ इतिहासकार शिवगुप्त की पहचान महाशिवगुप्त बालार्जुन से करते हैं, जो दक्षिण कोसल के पांडुवंशी राजवंश के प्रसिद्ध शासक थे। संभवतः बालार्जुन को पाली क्षेत्र में शासन करने वाले बाण सरदारों के दबाव अथवा कलचुरी सरदार मुग्धतुंग के दबाव के कारण पूर्व की ओर बढ़ना पड़ा। फिर भी, इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ कहना संभव नहीं है।

महाभवगुप्त जनमेजय प्रथम (लगभग 882–922 ई.)
ओडिशा में सोमवंशी सत्ता के वास्तविक संस्थापक महाभवगुप्त जनमेजय प्रथम थे, जो संभवतः शिवगुप्त के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। दक्षिण कोसल में पश्चिमी ओडिशा के अविभाजित संबलपुर और बोलांगीर क्षेत्र सम्मिलित थे, जिसकी राजधानी सुवर्णपुर (सोनपुर) थी।
जनमेजय प्रथम ने अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के पश्चात् खिंजली मंडल के भंज शासकों के विरुद्ध अभियान चलाया, जो तोसलि के भौम-कर राजवंश के सामंत थे। भंज शासक रणभंजदेव इस संघर्ष में पराजित हुआ और बौध-फूलबनी क्षेत्र सोमवंशी राज्य में सम्मिलित हो गया, जिससे उत्कल-विजय का मार्ग प्रशस्त हुआ।
उत्कल में अपना प्रभाव बढ़ाने के उद्देश्य से जनमेजय प्रथम ने अपनी पुत्री का विवाह भौम-कर शासक शुभाकरदेव चतुर्थ के साथ किया। शुभाकरदेव चतुर्थ के पश्चात् उनके भाई शिवकर तृतीय सिंहासन पर बैठे, किंतु जनमेजय के समर्थन से 894 ईस्वी में उनकी पुत्री तथा शुभाकरदेव चतुर्थ की विधवा रानी त्रिभुवन महादेवी द्वितीय (पृथ्वी महादेवी) भौम-कर सिंहासन पर आरूढ़ हुईं।
ब्रह्मेश्वर मंदिर के एक शिलालेख में उल्लेख है कि ओड्र देश का राजा युद्ध में जनमेजय के भाले से मारा गया था। कुछ इतिहासकार इस ओड्र-राजा की पहचान शिवकर तृतीय से करते हैं, जबकि अन्य विद्वान मानते हैं कि ‘ओड्र’ शब्द यहाँ संपूर्ण ओडिशा का नहीं, अपितु आधुनिक ढेंकनाल के निकट स्थित एक ‘विषय’ (जिले) का बोधक है तथा उस ओड्र-राजा की पहचान विद्रोही भंज सामंत रणभंजदेव से की जानी चाहिए।
जनमेजय प्रथम ने अपने लगभग चौंतीस वर्षों के शासनकाल में विभिन्न “विजय-शिविरों” से अनेक ताम्रपत्र जारी किए, जिससे उनके सैन्य अभियानों का व्यापक विस्तार स्पष्ट होता है। उनके अभिलेखों में उन्हें ‘कोसलेंद्र’, ‘त्रिकलिंगाधिपति’, ‘परमेश्वर’ तथा ‘परमभट्टारक’ जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया है। शासनकाल के इकतीसवें वर्ष में उन्होंने कटक (आधुनिक चौद्वार) से तीन अनुदान जारी किए, जिससे संकेत मिलता है कि उनके शासन के अंतिम चरण तक सोमवंशियों का प्रभाव पूर्वी ओडिशा तक विस्तृत हो चुका था। उन्होंने कलचुरी राजवंश के विरुद्ध भी सफल अभियान चलाए। उनके उत्तराधिकारी ययाति प्रथम के अभिलेखों में उल्लेख है कि सुभतुंग (जनमेजय) ने चेदि (कलचुरी) शासकों को पराजित किया था। जनमेजय प्रथम का अंतिम ज्ञात अभिलेख उनके चौंतीसवें शासन-वर्ष का है; अतः उनका शासनकाल लगभग पैंतीस से चालीस वर्ष माना जाता है।
महाशिवगुप्त ययाति प्रथम (लगभग 922–955 ई.)
जनमेजय प्रथम के पश्चात् उनके पुत्र महाशिवगुप्त ययाति प्रथम सिंहासन पर आसीन हुए। ययाति प्रथम को सोमवंशी वंश का सर्वाधिक महान एवं शक्तिशाली शासक माना जाता है। उन्होंने कलचुरी चेदियों को पराजित किया, भंजों को खदेड़ा तथा भौम-कर राजवंश के राज्य पर अधिकार कर अपने साम्राज्य का व्यापक विस्तार किया।
सिंहासनारूढ़ होने के पश्चात् ययाति प्रथम ने अपनी राजधानी सुवर्णपुर से विनीतपुर (आधुनिक बिंका, महानदी तट) स्थानांतरित की। लगभग पंद्रह वर्ष बाद उन्होंने राजधानी को बौध क्षेत्र के निकट ययातिनगर में स्थानांतरित किया। तत्पश्चात् भौम-करों की राजधानी गुहेश्वरपाटक (आधुनिक जाजपुर) को नई राजधानी बनाकर उसका नाम ‘अभिनव-ययातिनगर’ रखा गया।
ययाति प्रथम के त्रिपुरी के कलचुरियों के साथ शत्रुतापूर्ण संबंध थे। उन्होंने चेदि सरदार दुर्गराज को पराजित कर 32 हाथियों पर अधिकार किया तथा दाहल प्रदेश को उजाड़ा। कुछ इतिहासकार दुर्गराज की पहचान कलचुरी युवराजदेव प्रथम (915–945 ई.) से करते हैं।
ययाति प्रथम की सबसे बड़ी उपलब्धि भौम-कर राज्य को अपने साम्राज्य में सम्मिलित करना थी। उनकी बहन त्रिभुवन महादेवी द्वितीय भौम-कर राज्य पर शासन कर रही थीं; संभवतः उनकी मृत्यु के बाद ययाति प्रथम ने ओद्र देश के बड़े भाग पर अधिकार स्थापित किया। उनके कटक ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि शासनकाल के नौवें वर्ष में उन्होंने दक्षिण तोसली के मारदा विषय में स्थित ‘चंद्रग्राम’ नामक गाँव एक ब्राह्मण को दान दिया, जो पूर्व में भौम-कर साम्राज्य का भाग था। बाद के वर्षों में उन्होंने संपूर्ण ओद्र प्रदेश पर अधिकार स्थापित कर भंजों को दक्षिण में गंजाम क्षेत्र तक पीछे हटने पर विवश किया।
मदलापांजी में ययाति प्रथम को ‘ययाति केसरी’ के नाम से विशेष स्थान दिया गया है। परंपराओं के अनुसार उन्होंने जगन्नाथ मंदिर में पुरुषोत्तम की प्रतिमा की पुनःस्थापना कराई। कहा जाता है कि उन्होंने ययातिनगर में दस अश्वमेध यज्ञ संपन्न कराए तथा कन्नौज से हजारों ब्राह्मणों को आमंत्रित किया। उनके शासनकाल में मंदिर-वास्तुकला की सोमवंशी शैली का विकास हुआ। ययाति प्रथम का अंतिम ज्ञात अभिलेख उनके शासनकाल के अट्ठाईसवें वर्ष का है; अतः उनका शासनकाल लगभग तीस से पैंतीस वर्षों तक माना जाता है।
महाभवगुप्त द्वितीय भीमरथ (लगभग 955–980 ई.)
ययाति प्रथम के पश्चात् उनके पुत्र महाभवगुप्त द्वितीय भीमरथ सिंहासन पर आसीन हुए। उनकी जानकारी मुख्यतः उनके पुत्र धर्मरथ के खंडपाड़ा शिलालेखों से प्राप्त होती है। कलचुरी नरेश लक्ष्मणराज द्वितीय (लगभग 945–970 ई.) के बिलहरी शिलालेख से ज्ञात होता है कि उसने कोसल तथा ओद्र पर विजय प्राप्त की थी, किंतु यह अधिपत्य स्थायी नहीं था और ओद्र क्षेत्र सोमवंशी प्रभाव में बना रहा।
धर्मरथ के माहुलपाड़ा शिलालेख में ‘रुद्र’ नामक एक पूर्वी सेनापति का उल्लेख है, जिसने भीमरथ के समक्ष अपनी निष्ठा प्रकट की थी। धर्मरथ के खंडपाड़ा ताम्रपत्रों में काव्यात्मक शैली में भीमरथ की आंध्र और गौड़ पर विजय का उल्लेख है। अभिलेखों में उन्हें ‘धार्मिक, साहसी, वीर तथा अद्भुत कर्म करने वाले’ शासक के रूप में वर्णित किया गया है। ब्रह्मेश्वर मंदिर के शिलालेख में उन्हें ‘कलियुग का कल्पवृक्ष, राजकुमारों का मुकुटमणि तथा शत्रुओं का संहारक वीर’ कहा गया है। उनके शासनकाल में राज्य की सीमा दक्षिण में रायपुर क्षेत्र से लेकर ओडिशा के बामरा क्षेत्र तक विस्तृत थी।
भीमरथ के अनेक पुत्र थे, जिनमें से तीन ने क्रमशः उनके पश्चात् सिंहासन ग्रहण किया। उनकी एक रानी दुर्गा का उल्लेख इंद्ररथ के अभिलेखों में मिलता है।
महाशिवगुप्त द्वितीय धर्मरथ (लगभग 975–995 ई.)
भीमरथ के पश्चात् उनके ज्येष्ठ पुत्र धर्मरथ, जिन्हें ‘राजमल्ल’ भी कहा जाता है, सिंहासन पर आसीन हुए। उन्होंने अपने शासनकाल के ग्यारहवें वर्ष में अंतर्द विषय (वर्तमान पुरी जिला) में ग्राम-दान किया, जो पूर्व में भौम-कर राजवंश के अधीन था।
माहुलपाड़ा शिलालेखों के अनुसार धर्मरथ ने गौड़ और आंध्र के विरुद्ध सैन्य अभियान संचालित किए। गौड़ के शासक की पहचान कुछ इतिहासकार पाल वंशी विग्रहपाल द्वितीय से करते हैं। दक्षिण में आंध्र की राजनीतिक अस्थिरता, जो तेलुगु चोड़ शासक जटाचोड़ भीम द्वारा पूर्वी चालुक्य नरेश दानार्णव की हत्या के कारण उत्पन्न हुई थी, का लाभ उठाकर धर्मरथ ने कोल्लाभिगंड विजयादित्य को पराजित किया। ब्रह्मेश्वर मंदिर के शिलालेख में उन्हें ‘द्वितीय परशुराम’ कहा गया है।
धर्मरथ ने एक संप्रभु शासक के रूप में शासन किया और अपने भाइयों को विभिन्न प्रदेशों का प्रशासक नियुक्त किया। बानपुर अभिलेख से ज्ञात होता है कि उन्होंने अपने सौतेले भाई इंद्ररथ को कलिंग का राज्यपाल नियुक्त किया था।
महाभवगुप्त तृतीय नहुष (लगभग 995–1010 ई.)
धर्मरथ की निःसंतान मृत्यु के पश्चात् उनके भाई तथा भीमरथ के पुत्र नहुष सिंहासन पर आसीन हुए। उनका कोई स्वतंत्र अभिलेख अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है; उनके संबंध में जानकारी मुख्यतः उद्द्योतकेशरी तथा कर्ण के अभिलेखों से मिलती है। नरसिंहपुर अभिलेख में नहुष की प्रशंसा “देश के अधिपति तथा पृथ्वी के गौरवशाली आभूषण” के रूप में की गई है।
इंद्ररथ (लगभग 1010–1022 ई.)
इंद्ररथ भीमरथ की दूसरी रानी दुर्गा से उत्पन्न पुत्र थे, अतः वे धर्मरथ और नहुष के सौतेले भाई थे। नहुष की मृत्यु के पश्चात् सोमवंशी राज्य में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई। जनमेजय के वंशज होने का दावा करने वाले राजकुमार अभिमन्यु ने सिंहासन पर अधिकार का प्रयास किया, किंतु इंद्ररथ ने उसे पराजित कर मार डाला। ब्राह्मणों की स्वीकृति से सिंहासन पर आसीन होकर उन्होंने ओद्र, कलिंग और कोसल पर अपने शासन का दावा किया।
संभवतः इंद्ररथ ने कलिंग को चोल प्रभाव से मुक्त कराया था, जिसके प्रतिशोध में राजेंद्र चोल प्रथम ने सोमवंशी राज्य पर आक्रमण किया। चोल अभिलेखों के अनुसार लगभग 1021–1023 ईस्वी में राजेंद्र चोल ने आदिनगर (जिसकी पहचान अधिकांश इतिहासकार ययातिनगर से करते हैं) में इंद्ररथ को पराजित किया। त्रिपुरी के कलचुरी शासक गांगेयदेव (1015–1041 ई.) तथा रतनपुर के कमलराज (1020–1045 ई.) ने भी उत्कल पर आक्रमण किया। चोल अभिलेखों से संकेत मिलता है कि इंद्ररथ को बंदी बना लिया गया था अथवा उनकी हत्या कर दी गई थी, जिसके परिणामस्वरूप सोमवंशी राज्य में अराजकता फैल गई।
राजारानी मंदिर को कुछ विद्वान इंद्ररथ द्वारा निर्मित मानते हैं, क्योंकि इसे ‘इंद्रलिंगेश्वर’ भी कहा जाता है, किंतु इसकी पुष्टि किसी प्रत्यक्ष शिलालेखीय प्रमाण से नहीं होती।
महाशिवगुप्त तृतीय चंडीहर ययाति द्वितीय (1023–1040 ई.)
इंद्ररथ की मृत्यु के पश्चात् सिंहासन रिक्त हो गया और राज्य में व्यापक अव्यवस्था उत्पन्न हो गई। ऐसी परिस्थिति में मंत्रियों ने अभिमन्यु के पुत्र तथा विचित्रवीर्य के पौत्र चंडीहर को, जो जनमेजय के वंशज थे, सिंहासन पर आसीन किया। चंडीहर ‘ययाति द्वितीय’ के नाम से भी जाने जाते हैं।
राज्यारोहण के पश्चात् ययाति द्वितीय ने कोसल और उत्कल राज्यों को एकीकृत कर पुनः सोमवंशी शासकों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में लाया। उनके जतेसिंघा-दुंगरी अभिलेख (शासनकाल का तृतीय वर्ष) में उन्हें कलिंग, कोसल और उत्कल का अधिपति कहा गया है। इसी अभिलेख में उन्हें कर्नाटक, लाट, गुर्जर, कांची, गौड़ और राढ़ जैसे दूरस्थ प्रदेशों का विजेता भी बताया गया है, किंतु इन दावों को अधिकांश इतिहासकार प्रशस्तिपरक अतिशयोक्ति मानते हैं। उनका राज्य पूर्व में बंगाल की खाड़ी से पश्चिम में संबलपुर तक तथा उत्तर में दंडकाभुक्ति से दक्षिण में गंजाम तक विस्तृत था। मदलापांजी के अनुसार उन्होंने लिंगराज मंदिर के निर्माण का आरंभ करवाया, जिसे उनके पुत्र उद्द्योतकेशरी के शासनकाल में पूर्ण किया गया।
महाभवगुप्त चतुर्थ उद्द्योतकेशरी (लगभग 1040–1065 ई.)
ययाति द्वितीय के पश्चात् उनके पुत्र उद्द्योतकेशरी सिंहासन पर आसीन हुए। उन्होंने कोसल और उत्कल दोनों प्रदेशों को एकीकृत एवं सुरक्षित बनाए रखा। ब्रह्मेश्वर मंदिर के शिलालेख में उन्हें दाहल, ओद्र और गौड़ पर विजय का श्रेय दिया गया है। उनका प्रमुख प्रतिद्वंद्वी संभवतः कलचुरी शासक लक्ष्मीकर्ण (1040–1073 ई.) था, जिसने ‘त्रिकलिंगाधिपति’ की उपाधि धारण की थी। गौड़ के पाल शासकों- नयपाल और विग्रहपाल तृतीय के साथ भी सोमवंशियों की शत्रुता जारी रही।
उद्द्योतकेशरी परम शैव भक्त थे और उन्होंने अनेक मंदिरों तथा जलाशयों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार कराया। उनके शासनकाल के अठारहवें वर्ष में उनकी माता कोलावती देवी ने भुवनेश्वर में ब्रह्मेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया। खंडगिरि गुफाओं में प्राप्त उनके अभिलेखों से स्पष्ट है कि उन्होंने जैन धर्म को भी संरक्षण प्रदान किया, जो उनकी धार्मिक सहिष्णुता का प्रमाण है।
अंतिम पतन
महाशिवगुप्त जनमेजय द्वितीय (लगभग 1065–1085 ई.)
जनमेजय द्वितीय उद्द्योतकेशरी के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। उनके शासनकाल से सोमवंशी राज्य का क्रमिक पतन आरंभ हुआ। पूर्वी गंग वंश, कलचुरी तथा चिंदक-नाग वंश — तीनों शक्तियाँ सोमवंशी राज्य पर दबाव बना रही थीं। रतनपुर के कलचुरियों ने पश्चिमी भागों पर अधिकार स्थापित किया, क्योंकि कलचुरी नरेश पृथ्वीदेव प्रथम (1065–1090 ई.) को अमोदा ताम्रपत्र में ‘सकल-कोसलाधिपति’ की उपाधि दी गई है।
पूर्वी गंग राजराज प्रथम देवेंद्रवर्मन (1070–1078 ई.) के सेनापति वनपति ने उत्कल और कोसल के राजाओं को पराजित किया। चिंदक-नाग शासक सोमेश्वर प्रथम (1069–1097 ई.) ने भी ओद्र पर आक्रमण एवं कोसल पर अधिकार का दावा किया। इस प्रकार सोमवंशी सत्ता धीरे-धीरे संकुचित होती गई।
महाभवगुप्त पंचम पुरंजय (लगभग 1085–1100 ई.)
पुरंजय के संबंध में जानकारी मुख्यतः उनके भाई कर्ण के रत्नगिरि अभिलेखों से प्राप्त होती है। इन अभिलेखों में उनकी व्यापक विजयों का जो वर्णन मिलता है, वह प्रशस्तिपरक प्रतीत होता है, क्योंकि वास्तविकता में उस समय सोमवंशी राज्य पर निरंतर बाहरी आक्रमण हो रहे थे।
महाशिवगुप्त कर्ण (लगभग 1100–1110 ई.)
पुरंजय के पश्चात् उनके भाई कर्णदेव सोमवंशी सिंहासन पर आसीन हुए। वे इस वंश के अंतिम शासक माने जाते हैं। गंग, तेलुगु चोड़ तथा कलचुरियों के निरंतर आक्रमणों के कारण उनका राज्य सिकुड़कर वर्तमान बालासोर और पुरी जिलों के मध्य स्थित तटीय क्षेत्र तक सीमित रह गया।
पाल नरेश रामपाल के सेनापति जयसिंह ने कर्णदेव को पराजित किया, किंतु बाद में रामपाल ने उन्हें सत्ता बनाए रखने में सहायता की, जिससे सोमवंशियों और पालों के मध्य मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हुए। कर्णदेव के योग्य मंत्री कृष्णदेव ने पालों की सहायता से कुछ समय तक उत्कल को गंग आक्रमणों से बचाए रखा, किंतु अंततः अनंतवर्मन चोडगंगदेव ने उत्कल पर अधिकार कर लिया। लगभग 1114 ईस्वी तक सोमवंशी सत्ता का पूर्णतः अंत हो गया।
सोमवंशियों के पतन के कारण
सोमवंशी राजवंश के पतन के पीछे बाह्य और आंतरिक, दोनों प्रकार के कारण उत्तरदायी थे। बाह्य रूप से पूर्वी गंग वंश, तेलुगु चोड़ों तथा कलचुरियों के निरंतर आक्रमणों ने सोमवंशी साम्राज्य को कमजोर कर दिया। राजेंद्र चोल प्रथम द्वारा इंद्ररथ की पराजय ने भी राज्य की राजनीतिक स्थिति को अस्थिर किया। आंतरिक स्तर पर उत्तराधिकार-संघर्ष, राजपरिवार के षड्यंत्र और कमजोर उत्तराधिकारियों ने केंद्रीय सत्ता को दुर्बल बनाया। मदलापांजी के अनुसार, सोमवंशी सेनापति वाहिनीपति रथ ने अनंतवर्मन चोडगंगदेव को उत्कल पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया था, जो राजपरिवार और सामंतों के बीच विद्यमान मतभेदों को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, ब्राह्मणों और अधिकारियों को व्यापक भूमि-दान तथा प्रशासनिक, वित्तीय और न्यायिक विशेषाधिकार दिए जाने से सामंती शक्तियाँ अत्यधिक प्रभावशाली हो गईं। सामंतों ने स्वयं भूमि-दान करने और स्वतंत्र उपाधियाँ धारण करने की प्रवृत्ति विकसित कर ली, जिससे केंद्रीय सत्ता का प्रभाव निरंतर घटता गया। परिणामतः दुर्बल राजसत्ता के कारण राज्य की एकता और प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखना कठिन हो गया। राजनीतिक पतन के बावजूद सोमवंशियों का कला, स्थापत्य, साहित्य और धर्म के क्षेत्र में योगदान ओडिशा के इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा।
सोमवंशियों की प्रशासनिक व्यवस्था
सोमवंशी काल में ओडिशा का राजनीतिक एकीकरण हुआ और पहली बार एक संगठित एवं स्थिर प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित हुई, जिसे बाद के पूर्वी गंग शासकों ने भी अपनाया।
राजा का पद
प्रशासनिक व्यवस्था में राजा का स्थान सर्वोच्च था। राजपद सामान्यतः वंशानुगत होता था; प्रायः ज्येष्ठ पुत्र ही उत्तराधिकारी बनता था, किंतु कभी-कभी मंत्रियों और सामंतों की सहमति भी अनिवार्य होती थी। उदाहरणस्वरूप, कलिंग, उत्कल और कोंगोडा के मंत्रियों तथा सैन्य अधिकारियों ने महाशिवगुप्त ययाति द्वितीय को राजा चुना था। अल्पवयस्क उत्तराधिकारी की स्थिति में शाही परिवार का कोई वरिष्ठ सदस्य संरक्षक अथवा राजप्रतिनिधि के रूप में शासन संचालित करता था। राजकुमारों को युद्धकला, धनुर्विद्या, घुड़सवारी, हाथी संचालन तथा प्रशासनिक कार्यों का प्रशिक्षण दिया जाता था तथा उन्हें प्रांतों का शासन सौंपकर व्यावहारिक अनुभव भी प्रदान किया जाता था।
मंत्रिमंडल एवं अधिकारीतंत्र
राजा की सहायता के लिए अनेक उच्च अधिकारी एवं मंत्री नियुक्त किए जाते थे, जिनमें मंत्रितिलक (मुख्यमंत्री), महासंधिविग्रहिक (युद्ध और शांति मंत्री), महाक्षपटलिक (राजकीय अभिलेख अधिकारी) तथा महासेनापति (सेना प्रमुख) प्रमुख थे। इसके अतिरिक्त समाहर्त्री, सन्निधात्री, औतका, नियुक्तका, दंडपाशिक, चट्ट, भट्ट, रणक तथा राजपुत्र जैसे विभिन्न प्रशासनिक और सैन्य पदाधिकारी भी नियुक्त किए जाते थे।
प्रादेशिक विभाजन
सोमवंशी राज्य को प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था। सबसे बड़ी इकाई ‘मंडल’ थी, जो ‘भुक्ति’ में विभाजित होती थी। प्रत्येक भुक्ति को ‘भोग’, ‘खंड’ तथा ‘ग्राम’ में बाँटा जाता था। ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी।
सैन्य व्यवस्था
सोमवंशी शासकों ने एक विशाल स्थायी सेना का संगठन किया, जिसमें पैदल सेना, घुड़सवार सेना तथा गजसेना (हाथियों की सेना) सम्मिलित थी। राजा स्वयं सेना का सर्वोच्च सेनानायक होता था।
धर्म और धार्मिक नीति
सोमवंशी शासक मुख्यतः शैव धर्म के अनुयायी थे और ‘परम महेश्वर’ की उपाधि धारण करते थे। उनके काल में शैव धर्म के पाशुपत तथा मत्त-मयूर संप्रदाय विशेष रूप से लोकप्रिय थे। भौमकर काल में बौद्ध धर्म से ब्राह्मण धर्म की ओर जो क्रमिक परिवर्तन आरंभ हुआ था, सोमवंशी काल में वह और तीव्र हो गया।
तथापि, सोमवंशी शासकों ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाते हुए जैन, वैष्णव, शाक्त और बौद्ध धर्मों को भी संरक्षण प्रदान किया। महाशिवगुप्त बालार्जुन बौद्ध धर्म के संरक्षक थे; उद्द्योतकेशरी के काल में खंडगिरि की गुफाओं में जैन अभिलेख उत्कीर्ण हुए। मादलापांजी भुवनेश्वर के अधिकांश मंदिरों के निर्माण का श्रेय ययाति केशरी को देता है। ययाति प्रथम ने मुक्तेश्वर मंदिर का निर्माण कराया, ययाति द्वितीय ने लिंगराज मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया और उद्द्योतकेशरी ने उसे पूर्ण कराया।
कला और स्थापत्य
सोमवंशी काल ओडिशा की कला और स्थापत्य का स्वर्णयुग माना जाता है। कलिंग मंदिर-वास्तुकला शैली का आरंभ शैलोद्भव काल में हुआ था, किंतु सोमवंशी काल के अंत तक वह अपनी पूर्णता के शिखर पर पहुँच गई। इस काल की स्थापत्य-कला की प्रमुख विशेषताएँ थीं — जगमोहन का विकास, ऊँचे एवं भव्य शिखर, पंचरथ योजना, मंडप एवं अंतराल का विकास तथा मूर्तिकला में उत्कृष्टता।
सोमवंशीकालीन प्रमुख मंदिरों में लिंगराज मंदिर, ब्रह्मेश्वर मंदिर, मुक्तेश्वर मंदिर, राजारानी मंदिर तथा रानीपुर-झरियाल का योगिनी मंदिर विशेष उल्लेखनीय हैं। लिंगराज मंदिर, जिसमें विमान, जगमोहन, नाटमंडप और भोगमंडप की चतुष्संरचना विद्यमान है, सोमवंशी स्थापत्य का सर्वोत्तम नमूना माना जाता है।
शिक्षा और साहित्य
सोमवंशी शासक संस्कृत विद्या और साहित्य के महान संरक्षक थे। उनके काल के संस्कृत शिलालेख तत्कालीन विद्वानों की वेद, वेदांग, स्मृति, पुराण, काव्य, व्याकरण, अर्थशास्त्र, खगोल विज्ञान तथा तर्कशास्त्र में गहन निपुणता के प्रमाण हैं। प्रमुख विद्वानों में जनमेजय प्रथम के मुख्यमंत्री साधारण, पुरुषोत्तम भट्ट, भवदेव, आचार्य शुभचंद्रदेव तथा नारायण सातकर्णी सम्मिलित थे।
सोमवंशी शिलालेखों में ‘खम्बा’, ‘पुण्य’ और ‘माछा’ जैसे ओड़िया शब्द मिलते हैं, जो इस काल में ओड़िया भाषा के विकास में सोमवंशियों के योगदान का प्रमाण हैं।
सोमवंशी शासन का सांस्कृतिक महत्त्व
सोमवंशी राजवंश ने ओडिशा की संस्कृति और समाज पर गहरा एवं स्थायी प्रभाव डाला। वैदिक यज्ञों और भूमि-दानों के माध्यम से उत्तर भारत से ब्राह्मणों के आगमन को प्रोत्साहित किया गया, जिससे ओडिशा के धार्मिक एवं सामाजिक जीवन का ब्राह्मणीकरण हुआ तथा उत्तर भारतीय संस्कृत परंपराओं का स्थानीय ओड़िया संस्कृति के साथ समन्वय हुआ।
सोमवंशी समाज में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था और अनेक रानियों ने धार्मिक-स्थापत्य गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। उदाहरणस्वरूप, कोलावती देवी ने ब्रह्मेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया। तथापि, इस काल में देवदासी प्रथा के प्रसार के कुछ संकेत भी मिलते हैं।
संदर्भ ग्रंथ
बनर्जी, आर. डी. (1930–1931), हिस्ट्री ऑफ उड़ीसा, आर. चटर्जी, कलकत्ता।
बील, सैमुअल, सी-यू-की : बुद्धिस्ट रिकॉर्ड्स ऑफ द वेस्टर्न वर्ल्ड, खंड II, लंदन।
दास, मानस कुमार (2000, 2004, 2008), हिस्ट्री ऑफ ओडिशा, खंड I–III, कलिंग पब्लिकेशन्स, भुवनेश्वर।
पाणिग्रही, कृष्णचन्द्र (1961), क्रोनोलॉजी ऑफ द भौम-कराज एंड द सोमवंशी किंग्स ऑफ उड़ीसा, मॉडर्न प्रकाशन, भुवनेश्वर।
शास्त्री, अजय मित्र (1995), शरभपुरीय, पांडुवंशी और सोमवंशी शासकों के अभिलेख, भाग I–II, मोतीलाल बनारसीदास।


