प्राचीन भारत में आकाशचारी देव : गंधर्व
प्राचीन भारतीय संस्कृति और ग्रंथों में गंधर्वों को आकाशचारी देव अर्थात् आकाश में विचरण करने वाले दिव्य जीव के रूप में माना गया है तथा हिंदू पौराणिक कथाओं, वेदों और महाकाव्यों में उनका वर्णन विशेष रूप से संगीत, कला, सुंदरता और स्वर्ग के वैभव से जुड़ा हुआ मिलता है। गंधर्व मुख्यतः स्वर्गलोक और अंतरिक्ष (आकाश) में निवास करते हैं तथा उन्हें देवताओं का गायक और संगीतकार माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार उनकी उत्पत्ति प्रजापति कश्यप और उनकी पत्नी अरिष्टा (मुनि से) से हुई थी, जबकि कुछ ग्रंथों में इन्हें ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में भी वर्णित किया गया है। संगीत, नृत्य और नाट्य कला के प्राचीन विज्ञान को ‘गंधर्व वेद’ कहा जाता है, जो सामवेद का एक उपवेद माना जाता है और इंद्र की सभा (देवसभा) में जब भी कोई उत्सव अथवा यज्ञ आयोजित होता है, तो गंधर्व मुख्य रूप से गायन-वादन करते हैं जबकि उनके साथ प्रायः अप्सराएँ नृत्य करती हैं। स्वभाव और रूप की दृष्टि से गंधर्व अत्यंत सुंदर, तेजस्वी तथा सदा युवा रहने वाले माने जाते हैं, वे सुगंधित वातावरण में निवास करते हैं जिस कारण इन्हें ‘गंधर्व’ कहा गया और स्वभाव से ये चंचल, रसिक तथा कलाप्रेमी होते हुए मनुष्यों और देवताओं के बीच एक सेतु की भाँति कार्य करते हैं। महाकाव्यों में महाभारत में गंधर्वों के राजा चित्रसेन का वर्णन मिलता है, जिन्होंने अर्जुन को संगीत और नृत्य (गंधर्व विद्या) की शिक्षा दी थी तथा जिन्होंने एक बार दुर्योधन को बंदी बना लिया था, जिसे बाद में युधिष्ठिर के कहने पर अर्जुन ने छुड़ाया था। इसके अतिरिक्त, जब कोई स्त्री और पुरुष बिना किसी सामाजिक या पारिवारिक रीति-रिवाज के, केवल आपसी प्रेम और सहमति से विवाह करते थे, तो प्राचीन भारत में उसे ‘गंधर्व विवाह’ (प्रेम-विवाह) कहा जाता था, जिसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण दुष्यंत और शकुंतला का विवाह है।
वैदिक ज्ञान-परंपरा और देवयोनियाँ
प्राचीन भारतीय देवमंडल में प्रमुख देवताओं के साथ-साथ अनेक गणों और उपदेवताओं का भी विस्तृत उल्लेख प्राचीन भारतीय साहित्य में मिलता है। अथर्ववेद की तैत्तिरीय संहिता में देवताओं के परिचारकों के रूप में गण-देवताओं का उल्लेख प्राप्त होता है। ज्ञान का अथाह सागर वेद है, जो एक विशाल साहित्य-संग्रह है। महर्षि दयानंद के अनुसार “विदन्ति-जानन्ति, विद्यन्ते-भवन्ति सर्वाः सत्य-विद्या यैः यत्र वस स वेदः” अर्थात् जिसके अंतर्गत सभी सत्य विद्याओं का ज्ञान प्राप्त होता है, उसे वेद कहते हैं। प्राचीन भारतीय देवताओं का व्यापक वर्णन वैदिक साहित्य तथा संहिता ग्रंथों में मिलता है और भारत की धार्मिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को इन्हीं देवताओं ने गहराई से प्रभावित किया है।
प्राचीन भारत के लोग विभिन्न प्रकार के तंत्र-मंत्र, जप, यज्ञ, हवन तथा पूजन जैसी क्रियाओं में गहरी आस्था रखते थे। इन साधनाओं के माध्यम से सिद्धि प्राप्त करने के उद्देश्य से कुछ लोग समाज से दूर, पर्वतीय क्षेत्रों में, नदियों के तटों पर अथवा सघन वनों में निवास करने लगे थे। सिद्धि के फलस्वरूप अलौकिक शक्तियाँ अर्जित कर लेने के कारण ही ऐसे साधकों को ‘अर्द्धदैवी-पुरुष’ की संज्ञा दी जाने लगी। इन अर्द्धदैवी-पुरुषों में गंधर्वों का स्थान विशेष महत्त्वपूर्ण है, जिन्हें अलौकिक पुरुष के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त थी।
देवयोनियों का वर्गीकरण
संस्कृत कोशकार अमरसिंह द्वारा रचित ‘अमरकोश’ में गंधर्वों को विद्याधर, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, किन्नर, पिशाच, गुह्यक तथा सिद्ध जैसी अन्य देवयोनियों के साथ गिनाया गया है :
“विद्याधरोप्सरो यक्षरक्षे गंधर्व किन्नराः,
पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः।”
इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि गंधर्व, किन्नर, विद्याधर आदि को देवताओं की भाँति एक पृथक ‘देवयोनि’ के रूप में मान्यता प्राप्त थी, यद्यपि वे मुख्य देवताओं से भिन्न, अर्द्ध-दैवीय श्रेणी के प्राणी थे। संभवतः ये मूलतः साधारण मानव ही थे, किंतु कालांतर में तंत्र-मंत्र तथा जादुई शक्ति अर्जित कर लेने पर उन्हें अर्द्धदैवी-पुरुष कहा जाने लगा था।
निवास स्थान और शैव संबद्धता
उपलब्ध प्रमाणों से ज्ञात होता है कि गंधर्व मुख्यतः हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में निवास करते थे तथा शिव की पूजा-अर्चना किया करते थे। स्कंद पुराण में गंधर्व, किन्नर, विद्याधर, अप्सरा और नाग जैसे गण-देवताओं का निवास स्थान अन्य देवताओं के साथ स्वर्ग में भी बताया गया है। शब्द-व्युत्पत्ति की दृष्टि से ‘गंधर्व’ का पुरुषवाचक अर्थ वायु से उत्पन्न होने वाले उस समूह से है, जो शिव के अनुयायी (गण) के रूप में प्रकट होते हैं तथा जिनका निवास हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में माना जाता है।
गंधर्वों के स्वरूप
पेंजर ने ‘कथासरित्सागर’ के आधार पर यह प्रतिपादित करने का प्रयास किया है कि प्राचीन काल में कुछ लोग तंत्र-मंत्र अथवा जादुई शक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से संन्यस्त जीवन व्यतीत करते थे और उस मंत्र-शक्ति (ज्ञान) को उपलब्ध कर लेने के पश्चात उसका उपयोग अपने सही अथवा गलत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करते थे। कालांतर में इस प्रकार की विद्या-शक्ति, जिसे विज्ञान अथवा कला भी कहा जा सकता है, को अर्जित करने वाले लोग ही गंधर्व अथवा विद्याधर कहे जाने लगे। रामायण में भी इन्हें महाविद्याओं के ज्ञाता के रूप में उल्लिखित किया गया है। विद्या अथवा मंत्र-शक्ति प्राप्त कर लेने पर उसकी सिद्धि आदि के उद्देश्य से ये लोग समाज से दूर जंगल अथवा पहाड़ियों पर निवास करने लगे। इस प्रकार की देवयोनियों में अप्सराएँ, देव, दानव, यक्ष, गंधर्व, पिशाच, नाग, किन्नर तथा विद्याधर आदि सम्मिलित माने जाते हैं।
कुछ विद्वानों का मानना है कि पूर्व-बौद्ध काल में देवताओं के शाश्वत शत्रु असुर, दानव, राक्षस, गंधर्व, किन्नर तथा विद्याधर आदि अदृश्य रूप से आकाश में उड़ा करते थे तथा वे सभी प्रकार की मंत्र अथवा जादुई शक्ति के विशेषाधिकारी समझे जाते थे। इन्हें दुष्टात्मा भी माना जाता था और इनके द्वारा तत्कालीन समाज के लोगों की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया गया था। बौद्ध ग्रंथों के आधार पर इतिहासकार मेहता ने विद्याधरों और गंधर्वों को दुष्टाचरण करने वाला माना है।
इसके विपरीत प्रोफेसर ए. एल. बाशम का विचार है कि प्राचीन काल में विद्याधरों को अंतरिक्ष के जादूगर तथा रहस्यपूर्ण (गूढ़) जीव माना जाता था, जो हिमालय की पहाड़ियों में जादू-टोने वाली नगरी में निवास करते थे। बाशम के अनुसार गंधर्व और विद्याधर सर्वसाधारण के हितैषी थे तथा वे आकाश में उड़ सकते थे और अपनी इच्छा से अपना रूप भी बदल सकते थे।
अरब यात्री-विद्वान अलबरूनी ने विद्याधरों को आठ प्रकार की दैवी जातियों में से एक माना है। इससे यह ज्ञात होता है कि राक्षस, गंधर्व अथवा विद्याधर जिस माया-जाल का प्रसार करते थे, वह प्रकृति में क्षणिक होता था।
प्रोफेसर के. ए. एन. शास्त्री का विचार है कि मोरियर, जिन्हें हम मौर्य कहते हैं, चक्रवाल सम्राट अथवा विद्याधर और नाग कहे जाते हैं। चूँकि मौर्य लोग उत्तर भारत में हिमालय के आस-पास ही निवास करते थे, इससे लगता है कि विद्याधरों अथवा गंधर्वों का आवास भी हिमालय के पहाड़ी भागों में ही रहा होगा।
साहित्यिक साक्ष्य
महाभारत
महाभारत के वनपर्व में विद्याधरों को गंधमादन पर्वत के उच्च शिखर पर गंधर्व, किन्नर और नागों के साथ निवास करते हुए उल्लिखित किया गया है। इसी पर्व के एक अन्य स्थान पर अर्षिषेण गंधमादन पर्वत की शोभा का वर्णन करते हुए युधिष्ठिर से कहते हैं कि यहाँ विद्याधरों के गण भी सुंदर फूलों के हार पहने हुए अत्यंत मनोहर दिखाई पड़ रहे हैं। महाभारत के द्रोणपर्व में द्रोण और सात्यकि के युद्ध के वर्णन में बताया गया है कि उन दोनों योद्धाओं की युद्ध-कला को देखने के लिए ब्रह्मा और चंद्रमा सहित सभी देवता विमानों पर बैठकर वहाँ आते थे और उनके साथ सिद्धों के समूह, विद्याधर, गंधर्व तथा बड़े-बड़े नाग-गण भी उपस्थित रहते थे।
रामायण
रामायण में गंधर्वों और विद्याधरों को महाविद्याओं के ज्ञाता के रूप में उल्लिखित किया गया है। रामायण के उल्लेख से यह भी पता चलता है कि हनुमान जी ने लंका प्रस्थान करने के पूर्व महेंद्र पर्वत पर सिद्ध, विद्याधर तथा किन्नरों को खेलकूद करते हुए देखा था। इससे यह स्पष्ट है कि विद्याधर केवल उत्तर भारत में ही नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में भी निवास करते थे।
‘कथासरित्सागर’ तथा ‘समराइच्चकहा’ में विद्याधरों को पर्वतों पर अथवा पहाड़ी वाले एकांत स्थानों में निवास करते हुए उल्लिखित किया गया है। वहाँ उनके नगर ‘विद्याधरपुरम्’ तथा उनके नगर-शासक ‘विद्याधराधिप’ भी हुआ करते थे। अपने ही समाज अथवा समूह में जो विद्याधर मंत्र अथवा विद्या की सिद्धि द्वारा अर्जित शक्ति से सर्वाधिक शक्तिशाली होता था, वह सरलता से उनका अधिपति बन जाता था और उन पर शासन करता था। जैन साहित्य ‘समराइच्चकहा’ में विद्याधरों का उल्लेख दो रूपों में मिलता है : कहीं उनके द्वारा महत्त्वपूर्ण अवसरों पर आकाश से पुष्प-वर्षा किए जाने का वर्णन है, तो अन्यत्र वे अपने दुष्कर्मों के द्वारा लोगों को प्रभावित करते हुए दिखाए गए हैं। इसी ग्रंथ में एक अन्य स्थान पर एक विद्याधर द्वारा श्रमण-व्रत को स्वीकार करते हुए भी उल्लेख किया गया है।
कालिदास की रचना ‘रघुवंश’ महाकाव्य में दिलीप द्वारा अपने गुरु की गाय नंदिनी की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व अर्पण कर देने पर विद्याधरों द्वारा पुष्प-वर्षा किए जाने का उल्लेख मिलता है। भवभूति द्वारा रचित ‘उत्तररामचरितम्’ में भी इसी प्रकार के साक्ष्य प्राप्त होते हैं, जिनमें गंधर्व और विद्याधरों को सन्मार्ग के पक्षधर और पुष्प-वर्षा करने वाले आकाशचारी देवताओं के रूप में चित्रित किया गया है।
राजनैतिक-मूल
हिमालय के कुमायूँ-गढ़वाल क्षेत्र के कुछ पूर्व-मध्यकालीन हिंदू शासकों को उनके दान-पत्रों के आधार पर कुछ मुसलमान लेखकों ने ग्यारहवीं शताब्दी के चंदेल शासक विद्याधर से संबंधित बताया है। पश्चिमी भारत में शासन करने वाले शिलाहार राजवंश की उत्पत्ति भी विद्याधरों से बताई गई है और वे शिलाहार आठवीं शताब्दी के अंत तक आते-आते पश्चिमी भारत में अपना राजनैतिक गौरव प्राप्त कर चुके थे। महोबा शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि परमार शासक भोज तथा कलचुरी नरेश गांगेयदेव ने एक विद्याधर की अध्यक्षता में ही कन्नौज के शासक राज्यपाल के विरुद्ध युद्ध किया था।
प्राचीन भारतीय चित्रकला में विद्याधरों को उड़ते हुए चित्रित किया गया है। वे माला पहने हुए, पुष्प-वर्षा करने वाले देव के रूप में उत्कीर्ण हैं। भरहुत, साँची और अमरावती से प्राप्त अनेक प्राचीन बौद्ध अवशेषों में तथा उदयगिरि एवं भुवनेश्वर (उड़ीसा) के निकट खंडगिरि की जैन गुफाओं में भी इस प्रकार के चित्र देखने को मिलते हैं।
कलाकारों द्वारा विद्याधरों के चित्रांकन को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है : प्रथम वर्ग में वर्णसंकर रूप, जिसमें ऊपर का आधा भाग पंखयुक्त मानव के रूप में तथा नीचे का आधा भाग पक्षी के रूप में चित्रित किया गया है। दूसरा वर्ग पूर्णतः मानव रूप में चित्रित किया गया है। जे. एन. बनर्जी के अनुसार प्रथम वर्ग में गंधर्वों का तथा द्वितीय वर्ग में विद्याधरों का चित्रांकन प्रदर्शित होता है। कर्तबुद्ध की प्रभावली, प्लेट संख्या 4 के चित्र 9 से यह स्पष्ट होता है कि विद्याधर आकाश-मार्ग से अपने दाहिने हाथ में पुष्पयुक्त टोकरी लेकर उड़ते थे।
इस प्रकार साहित्यिक तथा कलात्मक दोनों प्रकार के साक्ष्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि विद्याधर अपनी मंत्र अथवा जादुई शक्ति से अर्जित विद्या के बल पर आकाश-मार्ग से उड़ान भरते थे। वे मानव देहधारी किंतु दैवी चरित्र वाले प्राणी के रूप में चित्रित किए गए हैं।
चारित्रिक विशेषताएँ
ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन साहित्य में उपलब्ध साक्ष्यों में विद्याधरों की चारित्रिक विशेषताओं को लेकर स्पष्ट मतभेद है। ब्राह्मण ग्रंथों, जैसे महाभारत, रघुवंश तथा उत्तररामचरित आदि में इन्हें सन्मार्ग के हिमायती अर्द्धदैवी पुरुष के रूप में चित्रित किया गया है, जबकि बौद्ध और जैन ग्रंथों में इन्हें अच्छे और बुरे दोनों ही रूपों में वर्णित किया गया है। यद्यपि विद्याधरों को कहीं-कहीं सत्कृत्य अथवा अच्छे कार्यों का पक्षपाती देवता भी माना गया है, फिर भी अधिकतर उन्हें राक्षसों तथा दुष्टात्माओं के साथ चित्रित किया गया है, जो समाज में रहने वाले सर्वसाधारण लोगों को परेशान किया करते थे। संभवतः विद्याधरों एवं गंधर्वों के विषय में जैन और बौद्ध विचारधारा, ब्राह्मण विचारधारा की प्रतिद्वंद्विता का ही परिणाम थी।
सामाजिक विकास और सामाजीकरण की प्रक्रिया
यद्यपि प्राचीन काल में विद्याधरों का समाज से दूर पहाड़ियों तथा गुफाओं आदि में अपना स्वतंत्र अस्तित्व था, किंतु धीरे-धीरे समय के परिवर्तन एवं आवश्यकतानुसार इनमें भी परिवर्तन आते गए और वे सामाजिक प्राणियों से भी अपना संबंध जोड़ने लगे। पूर्व-मध्यकालीन जैन ग्रंथ ‘समराइच्चकहा’ में एक विद्याधर को श्रमण-व्रत का पालन करते हुए दिखाया गया हैं, जिससे पता चलता है कि विद्याधर वर्ग धीरे-धीरे प्रचलित धार्मिक परंपराओं में भी सम्मिलित होने लगा था।
गंधर्व-अवधारणा से संबंधित अतिरिक्त ऐतिहासिक तथ्य
ऋग्वेद में गंधर्व
गंधर्व की अवधारणा वैदिक साहित्य में अत्यंत प्राचीन है। ऋग्वेद में गंधर्व का उल्लेख एकवचन तथा बहुवचन दोनों रूपों में मिलता है। ऋग्वेद में एक विशिष्ट गंधर्व का वर्णन मिलता है, जो आकाश और अंतरिक्ष में निवास करता है, सोम रस का रक्षक है तथा जिसकी पत्नी अप्सरा है। इसी वैदिक गंधर्व को बाद के साहित्य में विश्वावसु, चित्ररथ जैसे प्रसिद्ध गंधर्वों के पूर्वरूप के रूप में देखा जा सकता है। सोम के साथ गंधर्व का यह संबंध यह संकेत देता है कि प्रारंभिक काल में गंधर्व की अवधारणा यज्ञ-संबंधी अनुष्ठानों तथा सोम-रस की पवित्रता की रक्षा से जुड़ी हुई थी।
गंधर्व और अप्सरा का युगल-संबंध
वैदिक तथा परवर्ती संस्कृत साहित्य में गंधर्व और अप्सरा को सदैव एक साथ युगल के रूप में वर्णित किया गया है। गंधर्व पुरुष देवयोनि तथा अप्सरा स्त्री देवयोनि मानी जाती है और दोनों को संगीत, नृत्य तथा कला में निपुण बताया गया है। स्वर्गलोक में इंद्र की सभा में गंधर्व गायन-वादन तथा अप्सराएँ नृत्य के माध्यम से देवताओं का मनोरंजन किया करते थे, ऐसा पौराणिक तथा महाकाव्य-साहित्य में वर्णित है। इसी कारण गंधर्वों को भारतीय परंपरा में संगीत और गंधर्व-विद्या (संगीत-कला) का अधिष्ठाता देवता भी माना गया है और आज भी शास्त्रीय संगीत के लिए ‘गंधर्व-विद्या’ या ‘गंधर्व वेद’ शब्द का प्रयोग प्रचलित है।
‘गंधर्व विवाह’ की सामाजिक-विधिक अवधारणा
प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों, विशेषतः ‘मनुस्मृति’ में वर्णित आठ प्रकार के विवाहों में से एक विवाह-प्रकार का नाम ‘गांधर्व विवाह’ है, जिसमें वर और वधू परस्पर सहमति से बिना किसी सामाजिक अथवा पारिवारिक अनुष्ठान के प्रेमवश विवाह-बंधन में बँध जाते थे। इस प्रकार के विवाह का नामकरण गंधर्वों की स्वच्छंद तथा प्रेम-प्रधान जीवन-शैली के आधार पर किया गया प्रतीत होता है, जो यह दिखाता है कि गंधर्वों को समाज में स्वतंत्र और अनुशासन-रहित प्रेम-संबंधों के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता था। शकुंतला और दुष्यंत का विवाह इसी गंधर्व विवाह पद्धति का प्रसिद्ध उदाहरण माना जाता है।
महाभारत में चित्ररथ गंधर्व और अर्जुन का प्रसंग
‘महाभारत’ के वनपर्व में अर्जुन और गंधर्वराज चित्ररथ, जिसे अंगारपर्ण भी कहा गया है, के बीच हुए युद्ध का विस्तृत वर्णन है, जिसमें अर्जुन ने अग्न्यस्त्र के प्रयोग से चित्ररथ के दिव्य रथ को नष्ट कर उसे पराजित किया था। पराजय के पश्चात चित्ररथ ने अर्जुन से मित्रता स्थापित की और उसे ‘चाक्षुषी विद्या’ नामक दिव्य विद्या प्रदान की, जिसके द्वारा किसी भी वस्तु को उसके वास्तविक रूप में देखा जा सकता था। यह प्रसंग गंधर्वों के योद्धा-स्वरूप तथा उनके पास विशिष्ट गुह्य विद्याओं के भंडार होने की मान्यता को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।
बौद्ध परंपरा में ‘गंधब्ब’ की अवधारणा
बौद्ध साहित्य में गंधर्व को पालि भाषा में ‘गंधब्ब’ कहा गया है, और इसका एक विशिष्ट प्रयोग बौद्ध पुनर्जन्म-सिद्धांत में मिलता है, जहाँ गंधब्ब को उस चेतना अथवा प्राणी के रूप में वर्णित किया गया है, जो माता-पिता के मिलन के समय गर्भ में प्रवेश कर नए जीवन का आरंभ करता है। इस प्रकार बौद्ध ग्रंथों में गंधर्व की अवधारणा को जन्म-मृत्यु के चक्र (पुनर्जन्म) से भी जोड़ा गया है, जो इस देवयोनि के एक भिन्न तथा दार्शनिक आयाम को प्रस्तुत करता है और यह ब्राह्मण-परंपरा में वर्णित योद्धा तथा संगीतज्ञ गंधर्व की छवि से पर्याप्त भिन्न है।
गंधर्वनगर की अवधारणा
संस्कृत साहित्य में ‘गंधर्वनगर’ नामक एक विशिष्ट खगोलीय अथवा वायुमंडलीय भ्रम-दृश्य का उल्लेख मिलता है, जिसमें आकाश में क्षणिक रूप से नगर, महल अथवा भवनों की आकृतियाँ दिखाई देती प्रतीत होती हैं, किंतु वे वास्तविक नहीं होतीं। इस भ्रम-दृश्य को गंधर्वों की माया-शक्ति से जोड़ा गया है, और भारतीय दर्शन-साहित्य, विशेषतः अद्वैत वेदांत में ‘गंधर्वनगर’ शब्द का प्रयोग संसार की क्षणभंगुरता तथा मायिक स्वरूप को समझाने के लिए एक प्रचलित रूपक के रूप में किया जाता रहा है।
कुबेर के दरबार से संबद्धता
पौराणिक साहित्य में गंधर्वों को यक्षराज कुबेर के दरबार से भी संबद्ध बताया गया है। कुबेर, जो धन तथा उत्तर दिशा के अधिपति देवता माने जाते हैं, की सभा में गंधर्व संगीत-वादन के माध्यम से उपस्थित रहते थे। इस प्रकार गंधर्वों का संबंध केवल इंद्र की सभा तक ही सीमित नहीं था, अपितु अन्य देवताओं की सभाओं में भी उनकी उपस्थिति और भूमिका पौराणिक साहित्य में उल्लिखित मिलती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय कल्पना में गंधर्व एक सर्वव्यापी आकाशचारी संगीत-देवयोनि के रूप में प्रतिष्ठित थे।
इस प्रकार साहित्यिक, कलात्मक तथा ऐतिहासिक साक्ष्यों के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि अति प्राचीन काल में गंधर्व मूलतः एक आदिवासी जाति के लोग थे, जो गंधर्व, किन्नर, शबर, किरात, राक्षस, विद्याधर आदि की भाँति समाज से दूरस्थ स्थानों में- पहाड़ियों, पहाड़ों से लगी गुफाओं तथा जंगली भागों में निवास करते थे। मंत्र, जप, जादू तथा हवन आदि क्रियाओं की सहायता से विद्या की सिद्धि प्राप्त कर लेने के कारण ही वे सामाजिक जन-जीवन को प्रभावित करने लगे, जिससे लोगों ने इन्हें अर्द्ध-लौकिक देव के रूप में मान्यता देना प्रारंभ कर दिया। यौगिक क्रियाओं तथा तंत्र-मंत्र की सिद्धि हेतु उपयुक्त स्थान पर्वत और गुफाएँ ही थीं, जिस कारण गंधर्वों एवं विद्याधरों ने इन्हीं स्थानों को अपना स्थायी आवास बनाया। वहीं पर वे पूजा, मंत्र तथा हवन आदि के द्वारा अपनी विद्याओं की सिद्धि करके मंत्र एवं जादुई शक्ति पर प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया करते थे।
आरंभिक उल्लेखों से यह भी स्पष्ट होता है कि गंधर्व, विद्याधर आदि समाज से दूर आदिवासियों की भाँति ही रहते थे। संभवतः ये पहले साधारण आदिवासी ही रहे होंगे और तंत्र-मंत्र तथा विद्या-सिद्धि के माध्यम से ही अर्द्ध-लौकिक देव बन गए, जिन्हें ‘अर्द्ध-आदिवासी देवता’ की संज्ञा भी दी जा सकती है। इस प्रकार वे प्राचीन काल में मानवीय स्वभाव में कम, किंतु अलौकिक विशेषताओं में अधिक प्रतिष्ठित माने जाते थे। वैदिक काल के सोम-रक्षक गंधर्व से लेकर महाकाव्यों के योद्धा-संगीतज्ञ गंधर्व, बौद्ध दर्शन के पुनर्जन्म-संबंधी गंधब्ब तथा मध्यकालीन राजवंशों तक की यह संपूर्ण विकास-यात्रा से सपष्ट है कि गंधर्व की अवधारणा भारतीय सांस्कृतिक चेतना में अत्यंत व्यापक, बहुआयामी तथा दीर्घकालिक रूप से प्रभावशाली रही है।


